होम / विचार मंच / सवालों के काजल से सबक लेना जरूरी: विनोद अग्निहोत्री

सवालों के काजल से सबक लेना जरूरी: विनोद अग्निहोत्री

सरकार ने सेना की कामयाबी का ब्योरा देश को दिया और सत्ताधारी भाजपा ने देश में तिरंगा यात्रा निकालकर इस विजय का राजनीतिक श्रेय लेने की कवायद शुरु कर दी।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 8 months ago

विनोद अग्निहोत्री, वरिष्ठ सलाहकार संपादक, अमर उजाला समूह।

भारतीय सेना ने अपने शौर्य और पराक्रम से भारत माता के माथे पर ऑपरेशन सिंदूर का जो लाल विजय तिलक लगाया है, उससे हर भारतीय उत्साहित है। साथ ही कुछ सवालों का काजल भी है, जो भविष्य के लिए सबक है।

22 अप्रैल को पहलगाम में जघन्य आतंकवादी हमले में मारे गए दो दर्जन से ज्यादा निर्दोष पर्यटकों के खून का बदला लेने और आतंकवाद के सरपरस्तों को जड़ मिटाने की आंच में जब पूरा देश तप रहा था, तब जनभावना के अनुरूप छह-सात मई की रात को भारत की सेनाओं ने ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम देते हुए पाकिस्तान में चिन्हित नौ आतंकवादी ठिकानों पर मिसाइल हमले करके उन्हें तबाह कर दिया और जवाब में जब पाकिस्तान की सेना ने अपने ड्रोन और मिसाइलों से भारत पर हमला किया तो उस हमले को निरस्त करते हुए भारत ने पाकिस्तान के कई सैन्य ठिकानों पर ब्राह्मोस मिसाइलें दाग कर कड़ा सबक देना शुरु कर दिया।

दोनों तरफ से हो रही सैन्य कार्रवाई किसी बड़े युद्ध में बदलती इसके पहले ही 10 मई को शाम पांच बजे अचानक संघर्षविराम की घोषणा हो गई। हालांकि, इसके पहले ही सुबह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर पोस्ट करके भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम की घोषणा कर दी थी और इसका श्रेय अमेरिका को दिया। ट्रंप के इस बयान ने भारत की राजनीति में हलचल मचा दी।

विपक्ष ने सरकार पर हमले तेज करते हुए कहा कि ऐसे समय में जब हमारी सेना पाकिस्तान को घुटनों पर लाकर पाक अधिकृत कश्मीर को अपने कब्जे में ले सकती थी, अचानक अमेरिका के दबाव में सरकार ने संघर्षविराम घोषित कर दिया। सरकार और सत्तारूढ़ भाजपा ने इसे गलत बताया और विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने साफ किया कि संघर्षविराम पाकिस्तान के अनुरोध पर बिना किसी बाहरी दबाव के किया गया है।

लेकिन विपक्ष के सवालों के हमले कम नहीं हुए। कांग्रेस ने मांग की कि संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए। जबकि अन्य विपक्षी दलों ने तत्काल सर्वदलीय बैठक बुलाकर संघर्षविराम के कारणों और उसके बाद की परिस्थितियों की जानकारी देने की मांग की। लेकिन सरकार ने इस पर कोई प्रतिक्रिया न देते हुए भारत का पक्ष समझाने के लिए तत्काल एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल विदेश में भेजने की घोषणा कर दी।

सदस्यों के नाम भी सरकार ने तय किए और कांग्रेस द्वारा भेजे गए चार नामों में सिर्फ पूर्व विदेश राज्य मंत्री आनंद शर्मा का नाम ही शामिल किया। साथ ही कांग्रेस नेतृत्व की इच्छा के खिलाफ सांसद शशि थरूर, मनीष तिवारी और पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद और कांग्रेस छोड़कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुरीद बने पूर्व केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद को भी विदेश जाने वाले प्रतिनिधिमंडल में शामिल करके सरकार ने कांग्रेस को और चिढ़ा दिया। लेकिन कांग्रेस ने सावधानी बरतते हुए कहा कि देशहित के लिए वह इस मामले को तूल नहीं देगी।

लेकिन ऑपरेशन सिंदूर पर पक्ष-विपक्ष के बीच राजनीतिक घमासान तेज है। जहां सरकार ने सेना की कामयाबी का ब्योरा देश को दिया और सत्तारूढ़ भाजपा ने देश में तिरंगा यात्रा निकालकर इस विजय का राजनीतिक श्रेय लेने की कवायद शुरु कर दी, तो दूसरी तरफ कांग्रेस ने सेना के समर्थन में जय हिंद यात्रा और सभाओं के जरिए खुद को राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे से जोड़ने की कवायद की है।

वहीं, विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बयान कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत में ही पाकिस्तान को बता दिया था कि वह वहां के आतंकवादी ठिकानों को नष्ट कर रहा है, उसका पाकिस्तान के सैनिक ठिकानों और नागरिक इलाकों पर हमले का कोई इरादा नहीं है, इसलिए पाकिस्तान की सेना के पास इससे दूर रहने का विकल्प है। इसे लेकर लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने सरकार और विदेश मंत्री पर निशाना साधा कि वह हमले की सूचना पहले पाकिस्तान को देकर किसका हित साध रहे थे।

राहुल ने पूछा कि क्या जयशंकर ने ऐसा करके आतंकवादी हाफिज सईद, मसूद अजहर और उनके साथियों को निकल भागने का मौका नहीं दिया। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने हमलावर होकर विदेश मंत्री को मुखबिर तक कह डाला। जवाब में भाजपा ने राहुल गांधी के खिलाफ पोस्टर निकाला, जिसमें उनका आधा चेहरा पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनील का बनाकर उन्हें आधुनिक युग का मीर जाफर कह दिया। इसके बाद कांग्रेस-भाजपा में पोस्टर वार शुरू हो गया और एक दूसरे के लिए मुखबिर, गद्दार, जयचंद, मीर जाफर जैसी उपमाओं की भरमार लग गई। राहुल गांधी ने सरकार से यह भी पूछा कि ऑपरेशन में भारत के कितने लड़ाकू विमान पाकिस्तान ने गिराए।

जयशंकर के मुद्दे पर विदेश मंत्रालय ने सफाई दी कि हमले के दौरान भारतीय सेना के डीजीएमओ मेजर जनरल राजीव घई ने पाकिस्तान के डीजीएमओ को आतंकवादी ठिकानों को नष्ट करने के लिए की गई भारत की कार्यवाही की जानकारी दी थी जो एक सामान्य प्रक्रिया है। ऐसा इसलिए किया गया था कि दोनों देशों के बीच युद्ध की स्थिति न बने, लेकिन पाकिस्तान ने जिस तरह भारत पर हमले शुरु किए तो भारत को भी उनका जवाब देना पड़ा।

जहां तक लड़ाकू विमानों के नुकसान की बात है तो सरकार ने इस पर कुछ नहीं कहा, लेकिन मीडिया ब्रीफिंग में पूछे गए एक सवाल के जवाब में डीजीएओ एके भारती ने कहा कि सेना जब कार्रवाई करती है तो वह नुकसान की परवाह किए बिना अपने लक्ष्य को हासिल करने पर जोर देती है और इस ऑपरेशन में भारत के सभी पायलट सुरक्षित वापस आ गए हैं। राहुल गांधी ये सवाल इसलिए पूछ रहे हैं कि पाकिस्तान भारत के पांच से छह लड़ाकू विमानों को गिराने का दावा कर रहा है और विदेशी मीडिया में भी भारत के कुछ लड़ाकू विमानों, जिनमें एक राफेल शामिल है, के नुकसान की खबरें पाकिस्तान के हवाले से छपी हैं। लेकिन भारत ने इन खबरों को गलत बताया है।

जहां विदेशी मीडिया ने भारत के कथित नुकसान को बढ़ा चढ़ाकर बताया है, वहीं भारतीय मीडिया एक हिस्से ने भी ऑपरेशन के दौरान भारतीय सेना के पाकिस्तान के लाहौर, इस्लामाबाद, रावलपिंडी और कराची जैसे शहरों में घुसने और तबाही मचाने की खबरें चलाईं जो बाद में गलत निकलीं। कुछ टीवी चैनलों नें जनरल आसिम मुनीर की गिरफ्तारी तक की खबर चला दी, जो बिल्कुल ही गलत साबित हुई। उधर, पाकिस्तानी मीडिया में पाकिस्तान की जीत और 1971 का बदला लेने जैसे झूठे दावे भी किए जा रहे हैं।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी अपने भाषणों में ऐसे भ्रामक दावे किए हैं। लेकिन सच्चाई ये है कि ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना ने पाकिस्तान में न सिर्फ नौ आतंकी ठिकानों को नष्ट किया, बल्कि पाकिस्तानी सेना के सारे हमलों को विफल करते हुए उनके कई सैनिक ठिकानों को भी खासा नुकसान पहुंचाया है। नूरपुर एयरबेस पर भारतीय मिसाइल हमले के बाद तो पाकिस्तान इतना घबरा गया कि उसने संघर्षविराम की गुहार लगाई और भारत ने उसे मंजूर कर लिया।

दावों और प्रतिदावों के बीच कुछ सवाल हैं, जो आने वाले दिनों में भारतीय राजनीति और जनमानस को मथते रहेंगे। पहला सवाल पुलवामा के बाद पहलगाम में हुई खुफिया और सुरक्षा तंत्र की विफलता का है। दोनों ही मामलों में यह सवाल इसलिए भी जरूरी है कि दोनों ही मामलों में इसकी जिम्मेदारी अभी तक तय नहीं की गई। जबकि पहलगाम में तो सरकार ने भी सुरक्षा चूक की बात मानी है।

दूसरा सवाल है कि पहलगाम में नरसंहार को अंजाम देने वाले आतंकवादी अभी तक पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ से बाहर क्यों हैं। तीसरा सवाल जीत रही भारतीय सेना को अचानक संघर्षविराम करके क्यों रोका गया और इसकी अधिकारिक घोषणा के कई घंटे पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसकी घोषणा कैसे कर दी। कांग्रेस सवाल कर रही है कि जब 1962 में भारत चीन युद्ध के दौरान लड़ाई के बीच विपक्ष की मांग पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने संसद का विशेष सत्र बुलाया।

26 नवंबर 2008 को मुंबई पर हुए भीषण आतंकवादी हमले के बाद संसद का विशेष सत्र बुलाया गया तो अब सरकार को क्या परेशानी है। विपक्ष दो सर्वदलीय बैठकों में प्रधानमंत्री मोदी की अनुपस्थिति पर भी सवाल कर रहा है। इन सारे सवालों के बीच एक बड़ा सवाल ये भी है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जहां पाकिस्तान के समर्थन में चीन, तुर्किए और अजरबैजान खुलकर सामने आए वहीं भारत के समर्थन में इस्राईल के सिवा एक भी देश खुलकर क्यों नहीं आया। सबने बेहद सधी और संतुलनकारी प्रतिक्रिया दी।

यहां तक कि हर संकट में भारत के साथ डटकर खड़ा होने वाला रूस भी इस बार खामोश रहा और भारत के मित्रवत पड़ोसी नेपाल, भूटान, श्रीलंका जैसे देश भी समर्थन में नहीं आए। सवाल है हमारी सेना ने तो शानदार काम किया लेकिन क्या हमारी कूटनीति कहीं कमजोर पड़ी। क्या प्रधानमंत्री मोदी की अथक विदेश यात्राओं से बनी सद्भावना और मैत्री को विदेश मंत्रालय, दुनिया भर में भारतीय दूतावास और उच्चायोग आगे बढ़ाने में कमजोर पड़ गए।

जबकि ऑपरेशन सिंदूर में भारत के पक्ष में विश्व के बड़े देशों के खड़े न होने से दुखी भाजपा के एक अति वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री इशारों में इस कूटनीतिक कमजोरी के लिए प्रधानमंत्री मोदी को नहीं बल्कि विदेश मंत्रालय को जिम्मेदार मानते हैं। वह कहते हैं कि कारगिल के समय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने पूरे विश्व का समर्थन भारत के पक्ष में जुटाकर पाकिस्तान को अलग थलग कर दिया था और भारतीय सेना की बहादुरी और विश्व जनमत के दबाव ने पाकिस्तान को पीछे हटने को मजबूर कर दिया था। इसमें तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह की अहम भूमिका थी।

कांग्रेस 1971 की इंदिरा गांधी की याद दिला रही है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व महासचिव ओंकारनाथ सिंह कहते हैं कि जब दिसंबर में पाकिस्तान से युद्ध के पहले ही भारत ने सोवियत संघ के साथ अगस्त 1971 में मैत्री रक्षा संधि करके पूरे सोवियत खेमे का एक मुश्त समर्थन जुटा लिया था जो युद्ध के दौरान पाकिस्तान के पक्ष में अमेरिका के सातवें बेड़े की धमकी और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत का मददगार साबित हुआ। पूर्व सांसद मोहम्मद अदीब बताते हैं कि जब बांग्लादेश बनने के बाद पाकिस्तान ने मुस्लिम देशों के संगठन ओआईसी में भारत पर एक मुस्लिम देश तोड़ने का आरोप लगाते हुए भारत के खिलाफ तेल प्रतिबंधों की गुहार लगाई।

तब भारत ने फलस्तीनी मुक्ति संगठन के अध्यक्ष यासिर अराफात की मदद ली जिन्होंने मुस्लिम देशों को बताया कि कैसे पाकिस्तानी फौज ने बांग्लादेश में बंगाली मुसलमानों का कत्लेआम किया और एक करोड़ से ज्यादा बंग्लादेशी मुसलमान पलायन करके भारत में शऱणार्थी बने हुए है।इसके बाद तब कुल मुस्लिम देशों में महज तीन ने पाकिस्तान के प्रस्ताव का समर्थन किया जबकि 50 से ज्यादा मुस्लिम देशों ने प्रस्ताव का विरोध करके भारत का साथ दिया।

क्या हमें अपने इस इतिहास से आगे के लिए सबक नहीं लेना चाहिए। शायद हम ले भी रहे हैं। सरकार ने दुनिया भर में सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल भेजकर विश्व को भारत की एकजुटता का संदेश दिया है। यह बेहद सराहनीय कदम है लेकिन अगर यही कदम पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद उठाया जाता और आतंकवाद व पाकिस्तान के रिश्ते को बेनकाब किया जाता तो तब जबकि उस मर्मांतक घटना पर पूरा विश्व स्तंभित और दुखी था तब हमारा सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल उससे भारत के प्रति उपजी सहानुभूति को कई देशों के भारत के लिए समर्थन में बदल सकता था।

और सबसे बड़ा सवाल है कि जिस तरह देश में तुर्किए और अजरबैजान के खिलाफ गुस्सा है और उनके हर तरह के बहिष्कार की अपील की जा रही है क्या ऐसा ही गुस्सा और बर्ताव हम चीन के प्रति भी दिखा सकते हैं। क्योंकि पाकिस्तान की असली ताकत चीन है।हमें आगे भी पाकिस्तान के पीछे खड़े चीन से मुकाबला करना है। इसे ध्यान में रखकर आगे की रणनीति बनानी होगी।भारत को यह भी सोचना होगा कि वह अमेरिका पर कितना भरोसा करे और पश्चिमी देशों के साथ अपने रिश्तों को फिर से कैसे परिभाषित करे। ये सवाल और सबक ऐसे हैं जिन्हें पक्ष विपक्ष को चुनावी राजनीति से नही देशहित की रोशनी में देखना होगा और मिलकर इनका जवाब खोजना होगा।

( यह लेखक के निजी विचार हैं ) साभार - अमर उजाला डिजिटल।


टैग्स
सम्बंधित खबरें

समस्य़ाओं को हल करने के लिए हो एआई का इस्तेमाल: रजत शर्मा

मेरा यह मानना है कि सबसे ज़रूरी है, AI का इस्तेमाल रोज़मर्रा की जिंदगी में आने वाली समस्य़ाओं को हल करने के लिए हो। भारी भरकम शब्दों से इसे परिभाषित करके उससे डराया न जाए।

20 hours ago

मैट शूमर के लेख का मतलब क्या है? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

मैट ने सबको सलाह दी है कि हर रोज AI का इस्तेमाल गंभीरता से शुरू करें। ChatGPT , Gemini जैसे टूल को गूगल सर्च की तरह इस्तेमाल नहीं करें। उससे अपने रोजमर्रा के काम करवाए।

2 days ago

सभ्यतागत चेतना की पुनर्स्थापना का संकल्प: अनंत विजय

जब प्रधानमंत्री मोदी 2047 में विकसित भारत की बात करते हुए आध्यत्मिकता की बात करते हैं तो हमें स्मरण होता है कि यही काम तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी अपने देश में कर रहे हैं।

2 days ago

अब परदेस में भी आतंकियों पर सीधे प्रहार को भारत तैयार: आलोक मेहता

किसी भी राज्य की आधिकारिक भूमिका पर अंतिम निर्णय कानूनी प्रक्रिया और साक्ष्यों के आधार पर ही तय होगा। भारत सरकार ने अमेरिका या कनाडा में ऐसे किसी भी प्रयास के आरोप गलत बताए हैं।

2 days ago

बांग्लादेश की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत: रजत शर्मा

बांग्लादेश संसदीय चुनाव में बीएनपी गठबंधन को बड़ी जीत मिली है। तारिक रहमान प्रधानमंत्री बनेंगे। शेख हसीना ने चुनाव को गैरकानूनी बताया, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई सरकार को बधाई दी।

4 days ago


बड़ी खबरें

Zee ने बढ़ाया कंटेंट नेटवर्क, 350+ चैनल और वर्टिकल-ऑडियो फॉर्मेट पर जोर

देश की बड़ी मीडिया कंपनी जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (Z) ने अपने सिंडिकेशन बिजनेस को और मजबूत कर लिया है।

11 hours ago

इंडिया AI इम्पैक्ट समिट: पीएम मोदी ने AI, नौकरियों और भविष्य को लेकर रखी विस्तार से बात

इंडिया AI इम्पैक्ट समिट 2026 का आगाज हो चुका है। इस बड़े मंच पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के असर, उसके फायदे और उससे जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा हो रही है।

17 hours ago

NDTV में फुल-टाइम भूमिका में लौटे शाह रजा

एनडीटीवी के साथ वर्ष 2013 से जुड़े हुए हैं रजा, पिछले कुछ महीनों से अपने गृह नगर में निजी कारणों से पार्ट-टाइम भूमिका में कर रहे थे काम

8 hours ago

PMAR 2026 की झलक: 1.55 लाख करोड़ के विज्ञापन बाजार में डिजिटल का 60% दबदबा

मेडिसन वर्ल्ड (Madison World) ने प्रतिष्ठित मैगजीन 'पिच' (Pitch) और एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के साथ मिलकर पिच मेडिसन ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट (PMAR) 2026 की एक झलक पेश की।

18 hours ago

'आजतक' का नया प्रयोग, लॉन्च किया अपना डिजिटल ‘वीडियो पेपर’

हिंदी पत्रकारिता की दुनिया में जाना-पहचाना नाम ‘आजतक’ अब एक नए अंदाज़ में सामने आया है। ‘आजतक’ ने अपना नया डिजिटल ‘वीडियो पेपर’ लॉन्च किया है

18 hours ago