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विकास में पैसा लगता नहीं, बनता है: पूरन डावर
यदि खबरें ठीक हैं तो निश्चय ही अच्छे दिन आने वाले हैं। सरकार की नीतियों और सोच को नमन। गड्डों को भरना, अच्छे बसअड्डे, रेलवे स्टेशन, रोड व्यवस्था और क्या चाहिये।
पूरन डावर 4 years ago
यदि खबरें ठीक हैं तो निश्चय ही अच्छे दिन आने वाले हैं। सरकार की नीतियों और सोच को नमन। गड्डों को भरना, अच्छे बसअड्डे, रेलवे स्टेशन, रोड व्यवस्था और क्या चाहिये। रोड पर बिल्डर खर्च करें, हमारे टैक्स का पैसा न लगे, बसअड्डों पर पूरी सुविधा हो, पैसा भी सरकार का न लगे, यही तो विकसित देशों में होता है। विकास में पैसा लगता नहीं, बनता है।
अधिक विकास-अधिक समृद्ध, भारत जितना निजीकरण होगा उतनी ही अच्छी सुविधा। रेलवे स्टेशन यदि निजी हाथों में हों तो मेट्रो स्टेशन से कम नहीं। रेस्टोरेंट भी, शॉपिंग भी, एयर कंडिशन का मजा भी... जो दिखता है वो बिकता है। देश की अर्थव्यवस्था भी तेजी से भागती है। स्टेशन पर समय से पहले पहुंच गए तो कॉफी भी पी रहे हैं, शॉपिंग भी कर रहे हैं।
बस स्टैंड जब निजी उपक्रम बनाएंगे, तो किसी मॉल से कम नही होंगे। साफ सुथरे होंगे। व्यवस्थित होंगे। बसें सरकारी भी होंगी, प्राइवेट भी। शर्म आती है आगरा का आईएसबीटी देखकर। लगता है किसी गांव में है अंतरराष्ट्रीय शहर में नहीं।
अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए सर्वाधिक महत्व है घाटे की घरों को बंद करना। उसके दो उपाय हैं, या बंद या निजीकरण। निजीकरण से एक नहीं, दो नहीं, तीन लाभ होते हैं। पहला सरकार का घाटा बंद, दूसरा बंद करने से सुविधा-सेवा समाप्त और लागत का डूब जाना। निजीकरण से लागत जो लग चुका है उसका कुछ हिस्सा मिल जाता। निजी उपक्रमों की गुणवत्ता कई गुनी होती है। निजी संस्थान जो कमाते हैं, उस पर टैक्स भी मिलता है। निजी उपक्रम अच्छी सेवा देकर, पैसा बनाते हैं। यदि उल्लंघन करते हैं तो सरकार है, अदालतें है सरकारी उपक्रम के विरुद्द आप कुछ नहीं कर पाते। सीमित सोच के व्यक्ति सिर्फ व्यक्तिगत आरोप लगा सकते हैं, बेच दिया-बेच दिया कर सकते हैं।
सरकार का कार्य मूलभूत सेवाएं उपलब्ध कराना है। सुरक्षा देना है, कानून व्यवस्था बनाना, जो अब तक हो रहा था वह कतई गलत नही था। निजी उपक्रम तब तक नहीं आते जब तक लाभदायक न हों। सरकार को सेवा देनी ही है, लेकिन जब घाटे का बोझ बढ़ जाता है और समय के साथ निजी उपक्रम के लिये व्यवहार्य भी हो जाता है। ‘बेच दिया-बेच दिया’ से हास्यास्पद सोच कोई हो नहीं सकती।
बैंक निजी होतीं, तो माल्या को भगा दिया या चौकसी को भगा दिया, बड़े आदमी के कर्जे नफा कर दिया। बैंकिंग एक व्यवसाय है ब्याज कमाते हैं, तो जोखिम भी होगा। हर व्यवसाय में जोखिम होता है, जोखिम न हो तो सभी व्यवसाय कर लें। बैंक जब करोड़ों ब्याज कमाती हैं, तो कुछ एनपीए भी होंगे। हर व्यवसाय में लेनदारियां मरती हैं। सरकारी बैंक होते हैं, तो राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना होती है। एनपीए भी बढ़ते हैं। सरकार पर माफ करने के आरोप लगते रहते हैं। राजनीति हस्तक्षेप से गलत सेटलमेंट होते भी हैं। आरोप लगता है जनता के टैक्स का पैसा लेकर भाग गये और सरकार ने कुछ नहीं किया। लिहाजा एकमात्र उपाय है- निजीकरण। जब राष्ट्रीयकरण हुआ था, तो उस समय देश की आवश्यकता थी। आज उससे निकलने की आवश्यकता है। आज बैंकिंग परिपक्व हो चुकी है। सरकार को केवल छोटे-छोटे ऋण और किसानों के लिए सहकारी बैंक की ही व्यवस्था करनी चाहिए।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
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