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सत्ता के खेल में भारत की आबरू बदनाम न करो: आलोक मेहता

हम जैसे पत्रकार या कोई भी नागरिक अपराध बढ़ने की बात से चिंतित होते हैं, लिखते बोलते भी हैं, लेकिन यदि सही ढंग से सोचे विचारें तो सुधार की बात पर जोर देना चाहते हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 7 months ago

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

आपने कभी यह गाना सुना होगा, 'दीवानों ऐसा काम न करो राम का नाम बदनाम न करो', इसलिए मुझे सत्ता के खिलाडियों से एक अनुरोध करने की इच्छा होती है 'सत्ता के दीवानों कृपया बिहार, मुंबई, दिल्ली सहित भारत को बदनाम न करो।' इन दिनों बिहार चुनाव से पहले 'लालू के जंगल राज' या 'नीतीश राज में अपराध बेकाबू' के आरोपों पर जमकर राजनीति हो रही है। मुंबई में राज उद्धव ठाकरे को मुंबई महानगरपालिका के 75 हजार करोड़ के बजट वाले खजाने पर चुनाव में जीत से कब्जे के लिए भाषा के नाम पर मारपीट की गूंज देश दुनिया तक पहुँच रही है।

दिल्ली चुनाव में चुनावी पराजय से घायल केजरीवाल राहुल गाँधी कभी पानी कभी अपराध पर हाय हाय कर रहे हैं। हम जैसे पत्रकार या कोई भी नागरिक अपराध बढ़ने की बात से चिंतित होते हैं, लिखते बोलते भी हैं, लेकिन यदि सही ढंग से सोचे विचारें तो सुधार की बात पर जोर देना चाहते हैं। यह बात इसलिए कहना पड़ी कि लंदन में भारत के लिए पूंजी निवेश के लिए एक बड़ी फाइनेंस कंपनी में बड़े पद पर कार्य कर रही रीतिका लंगर ने फोन पर हमसे पूछा कि 'क्या मुंबई दिल्ली पटना की तरह अन्य बड़े शहरों में भी भयानक अपराध और राजनीतिक अस्थिरता है?

कई इन्वेस्टर इस तरह की आशंका करने लगे हैं। मेरा उत्तर था , उनसे कहो अपने लन्दन और न्यूयार्क का क्राइम रिकॉर्ड देख लें। बहुत हद तक उनसे अधिक सुरक्षित भारत के अधिकांश इलाके हैं। इसी तरह किसी का पक्ष लिए बिना हम राहुल गाँधी, तेजस्वी यादव, अरविन्द केजरीवाल तथा उनके सलाहकारों को अपने नेता के पसंदीदा लंदन के बढ़ते अपराधों रिकॉर्ड को देखने का कष्ट करने के लिए कहेंगे, तो शायद उन्हें अपने आरोपों के बोर्ड हटाकर कुछ और मुद्दे ढूंढने पढ़ेंगे।

कृपया इस बात को मेरा पूर्वाग्रह मत मानिये। ब्रिटिश रिटेल कंसोर्टियम के अनुसार पिछले साल 2023 - 24 में दुकानों को लूटने की दो करोड़ घटनाएं हुई, जिससे करीब दो अरब पाउंड्स यानी 200 अरब रुपयों का सामान लूटा गया। प्रतिदिन लूटमार की करीब दो हजार घटनाएं हो रही है। क्या भारत के किसी प्रमुख शहर में रोज बाजार की दुकानों से चार पांच के गिरोह में आकर मनचाहा सामान लूटने की घटनाएं सामने आती है? क्या स्टोर के प्रबंधन से स्टाफ को उन्हें न रोकने के निर्देश हैं? जी नहीं।

राजनीतिक प्रशासनिक भ्रष्टाचार अलग बात है लेकिन लन्दन और ब्रिटेन के स्टोर्स के प्रबंधन के यही निर्देश हैं। वहां बड़े सूटकेस या ट्रॉली लेकर आने वाले गिरोह कई दुकानों को एक साथ लूटते हैं। एक दुकान को एक ही दिन में तीन बार लूटा गया। पुलिस की निष्क्रियता का फायदा लेते हुए ऐसे गिरोह इसे अधिकार / लाइसेंस समझते हैं , क्योंकि जब दस चोरी हुई, लेकिन रिपोर्ट दर्ज ही नहीं हुई। स्टोर स्टाफ के साथ 1,300 हिंसा की घटनाएँ हुई जो पिछले वर्ष से 50 प्रतिशत अधिक है।

यह अपराध अक्सर संगठित गिरोहों द्वारा योजनाबद्ध तरीके से हो रहे हैं। 2023– 2024 में लंदन में 116 हत्‍याएँ दर्ज की गईं—जो 2022–23 में 112 से थोड़ी बढ़ोतरी थी। बिहार और भारत को कोसने वाले यह तथ्य भी देखें कि लंदन में करीब 55,860 चोरी के मामले दर्ज हुए और उनमें से केवल 3,462 मामलों में ही आरोप तय हुए।

लंदन में अपराध बढ़ने के कारण महंगाई और बेरोजगारी, युवाओं में गैंग गतिविधि और नशे ड्रग्स की लत बताए जाते हैं लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि सारी समस्याओं के बावजूद राज्यों की सरकारें और गृह मंत्री अमित शाह कानून व्यवस्था को सुधरने, पुलिस बल की संख्या, साधन बजट बढाने के निर्णय बराबर कर रहे हैं लेकिन अपराधों में लगातार वृद्धि के बावजूद सम्पन्न विकसित देश ब्रिटेन की सरकार पुलिस की संख्या में कमी के बावजूद उसमें कटौती छंटनी और इस साल के बजट में कटौती तक कर रही। ग्रेटर लंदन की आबादी लगभग 90 लाख है।

लंदन यूरोप का तीसरा सबसे अधिक आबादी वाला शहर है। ब्रिटेन की आबादी करीब 7 करोड़ है। मार्च 2025 तक लंदन की मेट्रो पुलिस में लगभग 33,201 नियमित और 1,127 विशेष पुलिस अधिकारी हैं। इस तरह प्रति 100,000 लंदनवासियों लगभग 310 पुलिस अधिकारी हैं। 2025–26 में मेट्रो पुलिस के पास लगभग £400–450 मिलियन की बजट कमी बताई जाती है, जिससे लगभग 2,300 अधिकारी और 400 स्टाफ की कटौती हो सकती है।

यह अधिकारियों को "सबसे कम स्टाफ स्तर" पर पहुँचा सकता है, जिससे सार्वजनिक सुरक्षा और गश्त प्रभावित हो सकते हैं। इधर पटना मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र की जनसंख्या लगभग 27 लाख है। बिहार की आबादी लगभग 13 करोड़ है। यह भारत का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला राज्य माना जाता है। बिहार में हत्याओं में से लगभग 72–73% घटनाएं व्यक्तिगत दुश्मनी, जमीन, अनैतिक रिश्तों के कारण होती हैं। बिहार पुलिस दावा करती है कि संज्ञेय अपराध दर भारत औसत से कम है यानी 277.1 प्रति लाख जबकि 422.2 राष्ट्रीय औसत है।

बिहार में हत्या की दर पिछले दो दशकों में लगभग आधी हुई है, और 2023 में 24 वर्षों में सबसे कम हुआ है। पिछले महीनों में 14,962 गिरफ्तारियां हुई हैं। पटना में हालिया गिराफ्तारी और गश्त से हत्या तथा अन्य अपराधों में कमी देखी गई है। पुलिस पर हमले और व्यापारी हत्याएं चिंताजनक बनी हैं, जिससे कानून व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। पुलिस दावा करती है कि बिहार पूरे देश की तुलना में स्थिति बेहतर है, हालांकि विपक्ष गहरी असुरक्षा की बात कर रहा है।

इसलिए लंदन या फिर कभी अमेरिका के अपराधों, गोलीबारी की घटनाओं पर ध्यान दीजिये और निश्चित रुप से भारत में अपराधों को रोकने के लिए राजनीतिक प्रशासनिक सामाजिक आर्थिक प्रयास भी निरंतर किए जाएं। एक दल और प्रदेश की नहीं देश की प्रतिष्ठा की रक्षा की जाए।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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