धार्मिक आस्था केंद्रों के प्रबंधन का मुद्दा गंभीर मोड़ पर: आलोक मेहता

अयोध्या का श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट अक्सर इस बहस में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह ट्रस्ट सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद केंद्र सरकार द्वारा गठित किया गया था।

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Monday, 29 June, 2026
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आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, शिक्षा, समाज सेवा और अर्थव्यवस्था के सबसे पुराने केंद्र रहे हैं। आज देश में एक बार फिर यह बहस तेज है कि क्या हिन्दू मंदिरों का प्रबंधन सरकार के हाथ में रहना चाहिए या उन्हें पूरी तरह स्वतंत्र ट्रस्टों को सौंप दिया जाना चाहिए? यह प्रश्न केवल धर्म का नहीं, बल्कि संविधान, प्रशासन, पारदर्शिता, करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति से जुड़ा हुआ है।

विशेष रूप से अयोध्या के श्रीराम मंदिर के निर्माण और उसके बाद देशभर में मंदिरों के प्रबंधन को लेकर चर्चा और भी तेज हुई है। कई धार्मिक संगठन यह मांग करते हैं कि जैसे मस्जिदों, चर्चों, गुरुद्वारों और जैन मंदिरों का संचालन उनके अपने धार्मिक निकाय करते हैं, उसी प्रकार हिन्दू मंदिरों को भी सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, कुछ लोग मानते हैं कि सरकार के नियंत्रण से पारदर्शिता, विरासत संरक्षण और सार्वजनिक जवाबदेही बनी रहती है।

अयोध्या का श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट अक्सर इस बहस में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह ट्रस्ट सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद केंद्र सरकार द्वारा गठित किया गया था और इसका उद्देश्य मंदिर निर्माण एवं प्रबंधन है। इसके समर्थक कहते हैं— सरकार दैनिक धार्मिक प्रबंधन नहीं करती। ट्रस्ट निर्णय लेता है। देशभर से दान आता है। बड़े पैमाने पर विकास कार्य हुए। वहीं आलोचक समय-समय पर पारदर्शिता, भूमि खरीद, प्रशासनिक निर्णयों या ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाते रहे हैं। इन मुद्दों पर ट्रस्ट ने विभिन्न अवसरों पर अपना पक्ष भी सार्वजनिक रूप से रखा है।

हजारों वर्षों से मंदिर केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं रहे, बल्कि वे समाज के विकास की धुरी भी रहे हैं। प्राचीन भारत में मंदिरों के माध्यम से— शिक्षा दी जाती थी। वेद और शास्त्रों का अध्ययन होता था। संगीत और नृत्य का संरक्षण होता था। आयुर्वेद और चिकित्सा सेवाएं संचालित होती थीं। यात्रियों के लिए धर्मशालाएं बनती थीं। गरीबों को भोजन मिलता था। किसानों को सहायता दी जाती थी। अकाल के समय अन्न भंडार खोले जाते थे। दक्षिण भारत के अनेक मंदिर मध्यकाल में स्थानीय अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े संस्थान थे। उनके पास कृषि भूमि, जलाशय, बाजार और हजारों कर्मचारी होते थे। मंदिर अपने क्षेत्र के सबसे बड़े "नियोक्ता" भी होते थे।

22 जनवरी 2024 को प्राण-प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या विश्व के प्रमुख हिन्दू तीर्थों में तेजी से उभरा। बताया जाता है कि अब तक लगभग 15 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने दर्शन किए हैं। जून 2026 में अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़े दान के गबन का मामला सामने आया। प्रधानमंत्री कार्यालय ने अयोध्या के भाजपा नेता रजनीश सिंह की ओर से लिखे गए पत्र के आधार पर जवाब मांगा था। जब जिला प्रशासन ने राम मंदिर ट्रस्ट से आमदनी, खर्च, दान, बैंक खातों, जमीन के लेन-देन और संपत्ति के बारे में जानकारी मांगी, तो ट्रस्ट के सचिव चंपत राय ने जानकारी देने से इनकार कर दिया।

राम मंदिर में चढ़ावा चोरी मामले को लेकर भाजपा नेता रजनीश सिंह ने दो बार पत्र लिखा था। पहला पत्र 9 जून को लिखा गया था, जिसमें उन्होंने मांग की थी कि मंदिर ट्रस्ट को निर्देश दिया जाए कि वह अपनी शुरुआत से लेकर अब तक के वित्तीय लेन-देन और संपत्ति की पूरी जानकारी सार्वजनिक करे। प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्र में भाजपा नेता ने कई जानकारियों को सार्वजनिक करने की मांग की थी।

इनमें 'समर्पण निधि' अभियान के जरिए इकट्ठा किए गए पैसे, अलग-अलग तरीकों से मिले दान, सोना, चांदी और गहनों के तौर पर मिले योगदान, बैंक खाते और वित्तीय लेन-देन, जमीन की खरीद-बिक्री, मंदिर निर्माण और प्रशासन पर खर्च, ऑडिट तथा निरीक्षण रिपोर्ट शामिल हैं। दूसरा पत्र 12 जून को लिखा गया। 13 जून को पूरे मामले की जांच के लिए एसआईटी (SIT) का गठन हो गया।

जिला प्रशासन ने इस मामले को लेकर श्रीराम मंदिर ट्रस्ट से संपर्क किया। चंपत राय ने यह कहकर कोई भी जानकारी देने से इनकार कर दिया कि फिलहाल एसआईटी (SIT) की जांच चल रही है। जांच पैनल सभी जरूरी रिकॉर्ड और जानकारी एकत्र कर रहा है। इसलिए अभी मांगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा सकती।

राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने चढ़ावा चोरी मामले को बेहद गंभीर माना है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि दान की गिनती में 'शून्य निगरानी' थी और इसे 'चोरी' नहीं, बल्कि एक 'खुला डाका' कहा जाना चाहिए। मिश्रा जी ने बताया कि ट्रस्ट और बैंक के बीच हुए समझौते के अनुसार दान की गिनती की पूरी जिम्मेदारी बैंक की है। बैंक ने अपने स्थायी कर्मचारियों को लगाने के बजाय नियमों की अनदेखी की और प्रक्रिया में बड़ी लापरवाही बरती। गिनती वाले कमरे में निगरानी नाम की कोई व्यवस्था नहीं थी। लोग अपनी जेबों में नोटों के बंडल छिपाकर बाहर ले जाते थे।

इसके अलावा, दान पेटी में आए आभूषणों की कोई रसीद नहीं काटी जा रही थी। उन्होंने माना कि दान कक्ष का सीसीटीवी फुटेज 45 दिनों के बाद स्वतः (ऑटोमैटिक) डिलीट हो जाता था और उसका कोई बैकअप नहीं रखा जाता था, जिससे एसआईटी की जांच में मुश्किलें आ रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी दान प्रणाली में हुई इस अनियमितता को लेकर काफी चिंतित हैं। भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए उन्होंने मंदिर प्रशासन में एक वरिष्ठ नौकरशाह (आईएएस) को पूर्णकालिक सीईओ नियुक्त करने की वकालत की है, जिसका अयोध्या से भावनात्मक जुड़ाव हो।

इस महाघोटाले को लेकर राम मंदिर आंदोलन के फायरब्रांड नेता और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद विनय कटियार ने अयोध्या में इस समय बनी मौजूदा स्थिति पर अपनी गहरी नाराजगी और गुस्सा जाहिर किया है। कटियार का आरोप है कि चंपत राय कई बार मंदिर के चढ़ावे को लेकर अपने निजी निवास, कारसेवकपुरम, गए थे, जो नियमों के खिलाफ और एक गंभीर अपराध है। उन्होंने स्पष्ट किया कि परंपरा और नियम के अनुसार मंदिर में आने वाला दान वहीं गिना जाता है और सीधे बैंक भेजा जाता है। ऐसे में उस धन को किसी के निजी निवास स्थान पर ले जाने की क्या आवश्यकता थी, यह एक बहुत बड़ा सवाल है।

पूर्व सांसद ने यह भी उजागर किया कि जब उन्हें इस बात का पता चला, तो उन्होंने इस संबंध में सीधे चंपत राय से जवाब मांगा था, जिसके बाद दोनों नेताओं के बीच तीखी बहस भी हुई थी। कटियार ने बताया कि प्रधानमंत्री के दखल के बाद अब इस पूरे प्रकरण की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन कर दिया गया है। चूंकि प्रधानमंत्री स्वयं इस मामले की निगरानी कर रहे हैं, इसलिए बहुत जल्द सच सबके सामने आ जाएगा।

चंपत राय पर सीधा हमला बोलते हुए कटियार ने कहा कि उन्हें उनके पद से बर्खास्त किया जाना चाहिए। मंदिर का चढ़ावा निवास स्थान पर ले जाने के अपराध का जवाब उन्हें देना ही होगा। उन्होंने आम प्रक्रिया का हवाला देते हुए कहा कि हर दिन मंदिर में लाखों-करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है, जिसकी गिनती बैंक अधिकारियों के सामने होती है और उसे सीधे बैंक में जमा किया जाता है। इस तय व्यवस्था के बावजूद पैसे को बाहर ले जाना पूरी तरह से गलत है।

विनय कटियार ने इस पूरे घटनाक्रम पर गहरा दुख जताते हुए कहा कि राम मंदिर करोड़ों देशवासियों की अटूट आस्था का प्रतीक है, इसलिए मंदिर परिसर के भीतर अनुशासन, मर्यादा और पारदर्शिता बनाए रखना सबसे ज्यादा जरूरी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मंदिर की पूरी व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कड़े कदम उठाए जाने चाहिए। अयोध्या की पावन भूमि पर चढ़ावे के पैसों के साथ ऐसी गंभीर वित्तीय अनियमितता की खबर से वह बेहद आहत हैं।

प्रारंभिक जांच के बाद पुलिस ने दान राशि के कथित गबन के संबंध में एफआईआर दर्ज की और कई कर्मचारियों तथा संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई की। अब तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया। उन पर आरोप है कि मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए नकद दान के एक हिस्से का कथित गबन किया गया।

पुलिस ने आरोपियों के विरुद्ध चोरी, आपराधिक विश्वासघात, आपराधिक षड्यंत्र सहित विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया। पुलिस ने जांच के दौरान लगभग ₹79.85 लाख की बरामदगी की भी जानकारी दी है। अंतिम राशि और जिम्मेदारी का निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा। विपक्षी दलों ने मांग की है कि सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में जांच हो।

यह मामला केवल राम मंदिर तक सीमित नहीं है। यह पूरे देश के लिए एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है। देश में मंदिरों की कोई एक आधिकारिक राष्ट्रीय गणना उपलब्ध नहीं है। विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी आकलनों के अनुसार, देश में 20 लाख से अधिक हिन्दू मंदिर हैं। इनमें अधिकांश छोटे ग्राम-स्तरीय मंदिर हैं, जबकि कुछ हजार मंदिर ऐतिहासिक, आर्थिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनमें से केवल सीमित संख्या—बड़े, आय-संपन्न या ऐतिहासिक मंदिर—राज्य सरकारों के अधीन विभिन्न कानूनों के तहत आते हैं।

ब्रिटिश शासन के समय कई बड़े मंदिरों में आय और संपत्ति को लेकर विवाद उत्पन्न हुए। औपनिवेशिक प्रशासन ने कुछ क्षेत्रों में धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन के लिए कानून बनाए। यदि किसी राज्य में सबसे अधिक हिन्दू मंदिर सरकारी विभाग के अधीन हैं, तो वह तमिलनाडु है। राज्य सरकार का एक विभाग हजारों मंदिरों, मठों और धार्मिक संस्थानों का प्रशासन देखता है। चिदंबरम नटराज मंदिर का प्रशासन समय-समय पर न्यायिक विवादों का विषय भी रहा है। वहीं सरकार का तर्क है कि उसने अनेक मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया, भूमि वापस दिलाई और डिजिटल रिकॉर्ड बनाए।

आंध्र प्रदेश का तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् एक स्वतंत्र वैधानिक ट्रस्ट-जैसी संस्था है, लेकिन इसके बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति राज्य सरकार करती है। इसलिए इसे पूर्णतः निजी ट्रस्ट नहीं माना जाता है। यह विश्व के सबसे समृद्ध मंदिर संस्थानों में से एक है। केरल का मॉडल पूरे देश में अलग माना जाता है। यहाँ मंदिर सीधे सरकार द्वारा नहीं, बल्कि देवस्वम बोर्डों द्वारा संचालित होते हैं। इन बोर्डों में सरकार की भूमिका नियुक्तियों और प्रशासनिक ढाँचे में होती है, लेकिन वे स्वतंत्र वैधानिक संस्थाएँ हैं।

प्रमुख मंदिर सबरीमला, गुरुवायूर (अलग वैधानिक व्यवस्था) और पद्मनाभस्वामी (विशेष न्यायिक व्यवस्था के अंतर्गत) हैं। ओडिशा में पुरी का जगन्नाथ मंदिर विशेष कानून के अंतर्गत संचालित होता है। राज्य सरकार की प्रशासनिक निगरानी, रथयात्रा व्यवस्था, सुरक्षा और वित्तीय नियंत्रण के कुछ पहलू उसके अधीन हैं, लेकिन धार्मिक परंपराओं का संचालन सेवायत समुदाय द्वारा किया जाता है। जम्मू-कश्मीर में श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड एक वैधानिक बोर्ड है, जिसकी अध्यक्षता परंपरागत रूप से उपराज्यपाल (पूर्व में राज्यपाल) करते हैं।

भारत में प्रतिवर्ष करोड़ों लोग तीर्थयात्रा करते हैं। कई प्रमुख मंदिरों में प्रतिदिन 50 हजार से लेकर 2 लाख तक श्रद्धालु पहुँचते हैं, जबकि प्रमुख पर्वों पर यह संख्या कई लाख तक पहुँच जाती है। इन मंदिरों के आसपास होटल, परिवहन, प्रसाद, हस्तशिल्प, भोजन, फूल, पूजा सामग्री और स्थानीय व्यापार का विशाल नेटवर्क विकसित हो चुका है। सरकार पिछले कुछ वर्षों से धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रही है।

रामायण सर्किट, कृष्ण सर्किट, बौद्ध सर्किट, चारधाम परियोजना, काशी कॉरिडोर, महाकाल लोक और अयोध्या विकास जैसी योजनाओं ने मंदिरों के आसपास भारी निवेश आकर्षित किया है। मंदिरों के सरकारी नियंत्रण की बहस केवल पूजा-पद्धति की नहीं है, बल्कि हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति, लाखों एकड़ भूमि, श्रद्धालुओं के दान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी है।

संविधान भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करता है। लेकिन भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी देशों जैसी "राज्य और धर्म के पूर्ण पृथक्करण" की अवधारणा नहीं है। भारत में राज्य आवश्यकता पड़ने पर धार्मिक संस्थाओं के प्रशासनिक पहलुओं को विनियमित कर सकता है, जबकि धार्मिक आस्था और आवश्यक धार्मिक प्रथाओं की रक्षा भी संविधान करता है।

कई निर्णयों में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य का उद्देश्य स्थायी रूप से धार्मिक संस्थाओं पर अधिकार स्थापित करना नहीं, बल्कि आवश्यकता होने पर प्रशासनिक सुधार करना हो सकता है। यदि किसी मंदिर में गंभीर कुप्रबंधन हो, तो राज्य हस्तक्षेप कर सकता है; परंतु यह हस्तक्षेप अनिश्चितकाल तक चलता रहे, यह संवैधानिक बहस का विषय बना रहा है।

अन्य धार्मिक केंद्रों में अधिकांश मस्जिदें वक्फ संपत्तियों के ढाँचे से जुड़ी होती हैं। वक्फ बोर्ड कानून द्वारा स्थापित वैधानिक निकाय हैं, जो वक्फ संपत्तियों का प्रशासन देखते हैं। हालाँकि मस्जिदों की धार्मिक गतिविधियों का संचालन स्थानीय इमाम, मुतवल्ली और संबंधित समुदाय की भूमिका के साथ चलता है। प्रमुख गुरुद्वारों का संचालन निर्वाचित समितियों द्वारा होता है।

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी इसका प्रमुख उदाहरण है। इन संस्थाओं में सरकार प्रत्यक्ष दैनिक प्रबंधन नहीं करती, हालांकि उनका संचालन विशेष कानूनों के अधीन होता है। अधिकांश चर्च संबंधित ईसाई संप्रदायों, डायोसीज़ या चर्च ट्रस्टों द्वारा संचालित होते हैं। वे भी लागू नागरिक, कर और चैरिटी कानूनों के अधीन रहते हैं।

मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने वाले हिन्दू संगठनों की मुख्य आपत्तियाँ और प्रमुख तर्क हैं कि यदि सभी धर्म समान हैं, तो केवल हिन्दू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण क्यों? दान श्रद्धालु भगवान को देता है, सरकार को नहीं। मंदिर की आय मंदिर पर ही खर्च होनी चाहिए। सरकार बदलने से मंदिर प्रशासन नहीं बदलना चाहिए। राजनीतिक नियुक्तियाँ नहीं होनी चाहिए।

वहीं राज्य सरकारें कहती हैं कि मंदिरों में सार्वजनिक धन आता है, इसलिए ऑडिट आवश्यक है। हजारों एकड़ भूमि की सुरक्षा करनी पड़ती है। यदि प्रशासन भ्रष्ट हो, तो सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। छोटे मंदिरों को भी सहायता चाहिए। पुरातात्विक धरोहर की रक्षा सरकार की जिम्मेदारी भी है। कई विधि विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि भारत में एक राष्ट्रीय मंदिर प्रशासन मॉडल बनाया जा सकता है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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विवाद युक्त नहीं संस्कार युक्त हों हमारे परिसर: प्रो.संजय द्विवेदी

कई स्थानों से यह विमर्श सुनने में आता है कि शिक्षा परिसरों को राजनीति मुक्त कर देना चाहिए और विद्यार्थी सिर्फ पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान दें। उन्हें राजनीति से क्या मतलब?

Last Modified:
Monday, 12 October, 2026
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प्रो.संजय द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

हमारे कुछ शिक्षा परिसर इन दिनों विवादों में हैं। ये विवाद कुछ प्रायोजित भी हैं, तो कुछ वास्तविक भी। विचारधाराएं परिसरों को आक्रांत कर रही हैं और राजनीति भयभीत है। जैसी राजनीति हो रही है, उससे लगता है कि ये परिसर देश का प्रतिपक्ष हैं। जबकि यह पूरा सच नहीं है। कुछ मुट्ठी भर लोग भारतीय युवा और उसकी समझ को चुनौती नहीं दे सकते।

देश का औसतन युवा देशभक्त और अपने विवेक पर भरोसा करने वाला है। उसे अपने देश की शक्ति और कमजोरियों का पता है। वह भावुक है, पर भावनात्मक आधार पर फैसले नहीं लेता। दुनिया की चमकीली प्रगति से चमत्कृत भी है, पर इसके पीछे छिपे अंधेरों को भी पहचानता है।

कई स्थानों से यह विमर्श सुनने में आता है कि शिक्षा परिसरों को राजनीति मुक्त कर देना चाहिए और विद्यार्थी सिर्फ पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान दें। उन्हें राजनीति से क्या मतलब? जबकि यह सोच एकांगी है। देश के महत्वपूर्ण छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का मानना है कि “छात्र कल का नहीं, आज का नागरिक है।” अतएव छात्र शक्ति को सही मार्गदर्शन देते हुए राष्ट्रहित में उसका योगदान सुनिश्चित करना जरूरी है।

हम एक लोकतांत्रिक समाज में रहते हैं, हमारे परिसर भी इसी व्यवस्था का हिस्सा हैं। राजनीति, छात्रों का इस्तेमाल कर अपने वोट बैंक को मजबूत तो करना चाहती है, किंतु छात्रसंघों के चुनाव अनेक राज्यों में प्रतिबंधित हैं। छात्रसंघों से राजनीति और सत्ता को घबराहट होती है। यहां तक कि जो राजनेता छात्रसंघों के माध्यम से राजनीति में आए, वे भी छात्रसंघों के प्रति उदार नहीं हैं।

होना यह चाहिए कि छात्रसंघ विद्यार्थियों के सांस्कृतिक, वैचारिक और राजनीतिक रुझानों के विकास में सहायक बनें, ताकि छात्र नेतृत्व और उसकी गंभीरता को समझकर अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें। छात्रसंघ और छात्र राजनीति कहीं न कहीं इस भूमिका से विरत हुई है, इसलिए देश के राजनेताओं व अन्य प्रशासकों को इनका गला दबाने का अवसर मिला। कहा जाता है कि इसके चलते परिसर में तनाव और हिंसाचार भी बढ़ता है।

हम देखते हैं कि जब अनेक बुराइयों के बावजूद भी हम संसदीय राजनीति के खिलाफ नहीं हो जाते, बल्कि उसमें सुधार का ही प्रयास करते हैं। इसी तरह छात्रसंघों के रचनात्मक इस्तेमाल की भूमिका बनाने के बजाए, उनका गला दबा देने का विचार लोकतांत्रिक नहीं है। हमें देखना होगा कि छात्र संगठन क्यों राजनीतिक दलों के हस्तक बन रहे हैं। सभी प्रकार के आंदोलनों की तरह छात्र आंदोलन भी मर रहे हैं। विचारधारा के आधार पर विभाजित राजनीति कब पंथ और जाति की गलियों में भटक जाती है, कहा नहीं जा सकता।

ऐसे समय में शिक्षकों, शिक्षाविदों और परिसरों को जीवंत देखने की आकांक्षा रखने वाले लोगों की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। सत्ता-राजनीति तो चाहती ही है कि परिसरों में फेयरवेल पार्टियां हों, फ्रेशर्स पार्टियां हों, मनोरंजन प्रधान आयोजन हों। किंतु ऐसे आयोजन, जिससे बहस का प्रारंभ हो, नए विचार सृजित हों—उन्हें किए जाने से परिसरों के अधिपति घबराते हैं।

एक लोकतंत्र में होते हुए हमें असहमतियों के लिए स्थान बनाना होगा। विमर्शों को जगह देनी होगी और असुविधाजनक सवालों के लिए भी तैयार रहना होगा। एक लोकतंत्र का यही सौंदर्य है और यही उसकी ताकत भी है। विद्यार्थियों को इस तरह से तैयार करना कि वे भावी चुनौतियों से टकराने का साहस अर्जित कर सकें, जरूरी है।

यहां यह कहना आवश्यक है कि यह सारा कुछ अपने तिरंगे और देश को मजबूत करने के लिए होगा। देश को तोड़ने और खंडित करने वाले विचारों के लिए यहां जगह नहीं होनी चाहिए। अगर ऐसा होगा तो परिसर आतंक की जगह बनेंगे। राज्य की ताकत को हम जानते हैं, इसलिए परिसर विमर्शों का केंद्र तो बनें, किंतु देशतोड़कों की पनाहगाह नहीं।

अपने शोध-अनुसंधान और शिक्षण-प्रशिक्षण से हमें इस देश को बनाना है, बर्बाद नहीं करना है, यह सोच हमेशा केंद्र में रहनी चाहिए। कोई भी विश्वविद्यालय अपने अध्यापकों और विद्यार्थियों के अवदान से ही बड़ा बनता है। हमें हमारे परिसरों को जीवंत बनाने के लिए इन्हीं दो पर ध्यान देना होगा। ऊर्जावान, नए विचारों से भरे हुए अध्यापक ही अपने विद्यार्थियों को नई रोशनी दे सकते हैं। वे ही नवाचारों के लिए प्रेरणा बन सकते हैं।

कोई विद्यार्थी जब किसी भी परिसर में आता है तो एक उम्मीद के साथ आता है। उसे अपने दल का कैडर बनाने के बजाए, एक विचारवान नागरिक बनाना शिक्षकों का पहला कर्तव्य है। वे उसे आंखें दें, पर उधार की आंखें न दें। शिक्षकों का यह कर्तव्य है कि वे चाणक्य बनें और उनके विद्यार्थी चंद्रगुप्त।

अध्यापकों के सामने सर्वश्री डा. राधाकृष्णन, हजारीप्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डा. एपीजे अबुल कलाम, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, श्यामाचरण दुबे, विद्यानिवास मिश्र जैसे अनेक उदाहरण हैं, जिनके सानिध्य में जाकर कोई भी साधारण बालक एक असाधारण प्रतिभा में बदल जाता है। विद्यार्थी के इस रूपांतरण के लिए ऐसे शिक्षकों का राष्ट्र भी आदर करता है। गुरु-शिष्य परंपरा ऐसी हो, जिससे राष्ट्र के लिए हर क्षेत्र में नायक गढ़े जाएं।

सही बात तो यह है कि कुछ शिक्षकों को यह खबर ही नहीं कि उनके विद्यार्थी क्या कर रहे हैं। वे एक वेतनभोगी कर्मचारी की तरह अपनी कक्षा को बहुत निरपेक्ष तरीके से करते हुए बस जिए जा रहे हैं, तो कुछ ऐसे हैं, जिन्हें अपनी कक्षा से ही अपनी विचारधारा के लिए वैचारिक योद्धा और अपने राजनीतिक दल के लिए कैडर गढ़ने हैं। ऐसी दोनों प्रकार की अतियां गलत हैं।

हमारी शिक्षा और उकसावे से हमारे किसी विद्यार्थी का जीवन बदल जाए तो ठीक है, पर बिगड़ जाए तो...। हमारे क्रांतिकारी विचार उसे जेल की यात्राएं करवा दें, तो विचार करना होगा कि हमने शिक्षा में क्या गड़बड़ की है। हमारे विद्यार्थी हमारी अपनी संतानों की तरह हैं। हम उनसे वही अपेक्षा करें, वही मार्ग दिखाएं, जिस पर हमारी अपनी संतानों के चलने पर हमें आपत्ति न हो। यही एक सूत्र है, जो हमारी खुद की परीक्षा के लिए काफी है।

हमारे विद्यार्थी बहुत सी उम्मीदों, आशाओं, आकांक्षाओं और सपनों के साथ परिसर में आते हैं। उनके सपनों में रंग भरने की उन्हें ताकत देना हम शिक्षकों की जिम्मेदारी है। दिल पर हाथ रखकर सोचिए कि क्या हम उनके साथ ऐसा कर पा रहे हैं।

परिसरों को राजनीति मुक्त नहीं, संस्कार युक्त बनाकर ही हम देश की प्रतिभाओं को उचित मंच दे पाएंगे। हम शिक्षकों ने आज ही यह शुरुआत नहीं की, तो कल बहुत देर हो जाएगी।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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मस्क की पॉलिटिक्स क्या है? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

मस्क की संपत्ति 1 लाख करोड़ डॉलर से थोड़ी ज़्यादा है यानी करीब 99 लाख करोड़ रुपए। यह आँकड़ा भारत के दूसरे सबसे अमीर मुकेश अंबानी से 10 गुना ज़्यादा है।

Last Modified:
Monday, 12 October, 2026
milindkhandekarhisabkitab

मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।

एलन मस्क दो-तीन दिन से भारत की पॉलिटिक्स पर पोस्ट कर रहे हैं। उनके पोस्ट पर राजनीतिक गरमा-गरमी हो रही है, लेकिन इस बहस में कहीं यह बात छूट रही है कि मस्क की पॉलिटिक्स राइट विंग रही है। हिसाब-किताब मस्क की पॉलिटिक्स का।

मस्क दुनिया के सबसे अमीर आदमी हैं। उनकी संपत्ति 1 लाख करोड़ डॉलर से थोड़ी ज़्यादा है, यानी करीब 99 लाख करोड़ रुपए। यह आंकड़ा भारत के दूसरे सबसे अमीर मुकेश अंबानी से 10 गुना ज़्यादा है। मस्क के निशाने पर अंबानी हैं। दोनों टेलीकॉम बिज़नेस में हैं। मस्क को लगता है कि अंबानी के कारण उनकी सेटेलाइट इंटरनेट सर्विस शुरू नहीं हो पा रही है।

अंबानी की Jio और सुनील भारती मित्तल की Airtel अभी ब्रॉडबैंड और मोबाइल टॉवर से इंटरनेट बेचती हैं। इन दोनों कंपनियों ने भी सेटेलाइट इंटरनेट के लिए अप्लाई किया है। सरकार का कहना है कि तीनों कंपनियों की अर्ज़ी एक ही स्टेज पर है। कोई भेदभाव नहीं किया जा रहा है।

एलन मस्क ने जब पोस्ट किया कि अंबानी भारत के असली बॉस हैं तो विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने लिखा कि आपको अभी तो एक का पता चला है, दूसरा भी है। मस्क ने लिखा कि यह तो चिंताजनक है। वो यहीं नहीं रुके, उन्होंने तंज कसते हुए अंबानी को भारत का प्रधानमंत्री तक कह डाला।

भारत में कांग्रेस के साथ मस्क की जुगलबंदी चौंकाने वाली है। वो अमेरिका में राइट विंग की सबसे मजबूत आवाज़ बनकर उभरे हैं। पहले उनकी पॉलिटिक्स का झुकाव डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ़ होता था, लेकिन दो साल पहले वो डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन में खुलकर आए। उन्होंने अपने प्लेटफ़ॉर्म X का चुनाव में खुलकर इस्तेमाल किया। ट्रंप को सबसे ज़्यादा चंदा दिया। वो ‘Woke पॉलिटिक्स’ का विरोध करते हैं।

चाहे सामाजिक मुद्दे हों या आर्थिक, उनका रुझान राइट विंग की तरफ़ है। वो यूरोप की पॉलिटिक्स में भी दख़ल दे रहे हैं। ब्रिटेन में कट्टर दक्षिणपंथी पार्टी Reform UK का समर्थन कर रहे हैं, जो Immigration के विरोध में है। मस्क ने तो यहां तक कहा है कि Immigration के कारण ब्रिटेन में सिविल वॉर होगा।

भारत में मस्क के पोस्ट का कारण वैचारिक नहीं है, बल्कि व्यावसायिक लगता है। मस्क की कंपनी Starlink भारत में करीब 5 साल से अपना बिज़नेस शुरू करना चाहती है। इसमें देरी के कारण वो शोर मचा रहे हैं। मस्क की कंपनी ने पिछले साल अंबानी की कंपनी के साथ करार किया था कि रिलायंस जियो Starlink की सर्विस भारत में बेचेगी। करार तो Airtel के साथ भी हुआ था, लेकिन अभी तक सिक्योरिटी क्लीयरेंस नहीं मिला है, ना ही स्पैक्ट्रम आवंटन हुआ है।

दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने बिना नीलामी के सेटेलाइट स्पैक्ट्रम आवंटित करने के लिए कानून में बदलाव किया था तो कांग्रेस ने उसका विरोध किया था। कानून में इस बदलाव के कारण ही मस्क की एंट्री का रास्ता खुला। अब मस्क कांग्रेस के साथ जुगलबंदी कर रहे हैं, जबकि अंबानी पर हमलावर हैं। यह धंधे की लड़ाई है, जिसमें पॉलिटिक्स घुस गई है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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राहुल के ' गुरिल्ला ' धरनों से सुरक्षा तंत्र पर नए खतरे: आलोक मेहता

राहुल गांधी पहले पुलिस बैरिकेड पर चढ़े और फिर आकाशवाणी भवन के प्रवेश की ओर गए। बाहर खड़े प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसी के कर्मचारियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की।

Last Modified:
Monday, 12 October, 2026
aalokmehta

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

राहुल गांधी और उनके समर्थकों द्वारा आकाशवाणी भवन परिसर में 'गुरिल्ला' शैली से घुसकर किए गए धरने ने क्या सुरक्षा तंत्र के लिए नए खतरों की घंटियाँ नहीं बजाई? यह राहुल दस्ते का पूर्व नियोजित धरना था या केवल सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी निचले स्तर की असावधानी या उनसे किसी तरह की मिली-जुली कोशिश? इससे पहले भी राहुल गांधी समर्थक भीड़ चकमा देकर प्रधानमंत्री निवास के दरवाजे पर धरना देकर गंभीर खतरे पैदा कर चुकी थी।

इस तरह के छापामार प्रयासों के दौरान किसी भी आतंकी अथवा माओवादी नक्सल की घुसपैठ होने पर कोई भयानक घटना भी हो सकती है। दुनिया के कई देशों में उनके प्रमुख रेडियो स्टेशनों पर कब्जा कर 'सत्ता' से विद्रोह के ऐलान तक की घटनाएं होती रही हैं।

दिल्ली पुलिस ने आकाशवाणी भवन में बिना अनुमति प्रवेश करने और परिसर में धरना देने के मामले में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा तथा अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। राहुल गांधी ने इसे राजनीतिक संघर्ष का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ पहले से 45 एफआईआर हैं और उनका लक्ष्य 100 एफआईआर का है। उनके शब्दों में प्रत्येक एफआईआर उनके लिए “मेडल” है।

भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शन और असहमति लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि किसी भी सरकारी परिसर में बिना अनुमति प्रवेश किया जा सकता है। आकाशवाणी भवन कोई सामान्य सार्वजनिक प्रदर्शन स्थल नहीं है। वहां प्रसारण-संबंधी संवेदनशील गतिविधियां और सुरक्षा व्यवस्थाएं होती हैं। राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि वे ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक आंदोलन जारी रखने की बात कह रहे हैं।

लोकतंत्र में धरने आदि से विरोध करने का अधिकार है, लेकिन सरकारी परिसर की सुरक्षा और कानून का उल्लंघन करने का अधिकार किसी को नहीं है। प्रश्न यह है कि विरोध का स्थान कौन-सा चुना गया, वहां प्रवेश कैसे हुआ और यदि यही तरीका किसी अधिक गंभीर उद्देश्य से इस्तेमाल किया जाता तो क्या होता?

आकाशवाणी, अर्थात ऑल इंडिया रेडियो, भारत की राष्ट्रीय सार्वजनिक प्रसारण व्यवस्था का संवेदनशील और महत्वपूर्ण हिस्सा है। उसके परिसर में प्रसारण से जुड़े स्टूडियो, तकनीकी सुविधाएं, संचार व्यवस्था और कर्मचारी काम करते हैं। वहां से करोड़ों लोगों को एकसाथ संबोधित किया जा सकता है।

राहुल गांधी पहले पुलिस बैरिकेड पर चढ़े और फिर आकाशवाणी भवन के प्रवेश की ओर गए। बाहर खड़े प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसी के कर्मचारियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन जबरन वे अंदर चले गए। यह घटना सुरक्षा एजेंसियों के लिए कई सवाल छोड़ती है। यदि किसी संवेदनशील सरकारी प्रसारण परिसर में राजनीतिक नेता और उनके समर्थक बिना पूर्व अनुमति के प्रवेश कर सकते हैं, तो क्या प्रवेश नियंत्रण पर्याप्त है? यदि पुलिस बाहर आंदोलन को नियंत्रित कर रही थी, तो परिसर के अंदर जाने का रास्ता कैसे खुला?

जब कानूनी रूप से उस परिसर को संबंधित कानूनों के तहत “प्रतिबंधित क्षेत्र” माना जाता है, भारतीय न्याय संहिता की धाराएं 329 (3 और 4) के तहत तीन महीने से एक साल तक की सजा का प्रावधान है।

यदि राहुल के साथ भीड़ के असामाजिक तत्व या हिंसक समूह इसी तरह अंदर पहुंच जाता तो? और सबसे महत्वपूर्ण—अगर कोई व्यक्ति स्टूडियो या तकनीकी प्रसारण क्षेत्र तक पहुंच जाता तो क्या वह राष्ट्रीय प्रसारण व्यवस्था को प्रभावित कर सकता था? लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से किसी संवेदनशील प्रसारण केंद्र की सुरक्षा इसी आधार पर नहीं की जा सकती कि अंदर आने वाला व्यक्ति ऐसा नहीं करेगा।

इतिहास बताता है कि रेडियो और टेलीविजन स्टेशन केवल मीडिया संस्थान नहीं रहे हैं; अनेक राजनीतिक संकटों, सैनिक तख्तापलटों और क्रांतियों में वे सत्ता और जनमत पर नियंत्रण का रणनीतिक केंद्र बन चुके हैं। यही कारण है कि आकाशवाणी जैसी संस्था में प्रवेश की घटना को केवल “धरना” कहकर समाप्त कर देना सुरक्षा की दृष्टि से पर्याप्त नहीं होगा।

1979 की ईरानी क्रांति इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। 11 फरवरी 1979 को क्रांतिकारी समूहों ने रेडियो मुख्यालय पर नियंत्रण किया। इससे तेहरान की रेडियो और टेलीविजन प्रसारण व्यवस्था पर उनका नियंत्रण स्थापित हुआ। इतिहासकारों ने इसे ईरानी क्रांति की निर्णायक घटनाओं में माना है।

इससे पहले भी ईरान में रेडियो को सत्ता संघर्ष के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा चुका था। 19 अगस्त 1953 को प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक के खिलाफ तख्तापलट के दौरान रेडियो तेहरान पर नियंत्रण हासिल किया गया और प्रसारण के माध्यम से सरकार के गिरने की घोषणा की गई। रेडियो स्टेशन पर कब्जा केवल समाचार प्रसारण रोकना नहीं था—यह जनता को यह विश्वास दिलाने का माध्यम था कि सत्ता बदल चुकी है।

इसी तरह मिस्र में 1952 के फ्री ऑफिसर्स आंदोलन ने राजशाही के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की। आंदोलन की सफलता के बाद रेडियो के माध्यम से जनता को बताया गया कि सेना ने सत्ता अपने हाथ में ले ली है। 23 जुलाई 1952 की क्रांति का पहला महत्वपूर्ण सार्वजनिक संदेश रेडियो के माध्यम से प्रसारित हुआ।

अनवर सादात ने रेडियो स्टूडियो से पहला संदेश पढ़ा था। मिस्र के आधिकारिक ऐतिहासिक स्रोतों में भी इस प्रसारण का उल्लेख मिलता है। इस उदाहरण से एक मूलभूत बात सामने आती है: जिसके पास संचार माध्यम है, वह केवल सूचना नहीं देता—वह संकट की राजनीतिक व्याख्या भी जनता तक पहुंचाता है।

रोमानिया की 1989 की क्रांति में भी राष्ट्रीय प्रसारण संस्थानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। जब निकोलस का शासन गिर रहा था, प्रदर्शनकारी रेडियो-टीवी के परिसरों में पहुंच गए। रेडियो और टेलीविजन के भवन प्रदर्शनकारियों के नियंत्रण में आ गए और रेडियो ने घटनाओं का सीधा प्रसारण शुरू किया। सेना को राजधानी के महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थानों के साथ रेडियो टेलीविजन की सुरक्षा के लिए भी तैनात किया गया था।

टेलीविजन भवन विशेष रूप से संघर्ष का केंद्र बन गया था। उस समय की रिपोर्टों में बताया गया कि टेलीविजन परिसर को सुरक्षा कारणों से लगभग किले में बदल दिया गया था और वहां प्रवेश करने वालों की पहचान तथा तलाशी की जाती थी। यह इतिहास बताता है कि जब किसी देश में सत्ता-संघर्ष गंभीर हो जाए तो प्रसारण केंद्र स्वयं राजनीतिक युद्धभूमि बन सकते हैं। यह समस्या केवल तानाशाही देशों की नहीं है।

फ्रांस जैसे लोकतांत्रिक देश में भी 1961 के संकटों के दौरान रेडियो प्रसारण का महत्व सामने आया। सत्ता के विरुद्ध विद्रोही सैनिकों के लिए रेडियो जनता और सैनिकों को संदेश देने का महत्वपूर्ण माध्यम था। स्पेन में 1981 के असफल सैन्य तख्तापलट के दौरान भी संसद भवन और राष्ट्रीय संचार व्यवस्था का महत्व स्पष्ट हुआ। राजा का टेलीविजन संदेश लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा में निर्णायक साबित हुआ। लोकतंत्र में भी संचार व्यवस्था की सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा है।

भारत ने स्वयं आपातकाल, युद्ध, आतंकवाद, अलगाववाद और अनेक राजनीतिक संकट देखे हैं। ऐसे समय में सरकारी प्रसारण व्यवस्था की भूमिका सामान्य दिनों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है।

कल्पना कीजिए कि किसी राजनीतिक आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारी केवल परिसर में धरना देने तक सीमित न रहें, बल्कि किसी स्टूडियो, नियंत्रण कक्ष या प्रसारण क्षेत्र तक पहुंच जाएं। वे वहां से कोई असत्यापित संदेश प्रसारित कर दें। वे प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, संसद, सेना या सरकार के बारे में कोई आपातकालीन घोषणा कर दें। या वे जनता से सरकारी आदेश न मानने, सरकारी संस्थानों पर कब्जा करने अथवा सड़कों पर उतरने का आह्वान कर दें। कुछ मिनट का प्रसारण भी हजारों-लाखों लोगों में भ्रम और अफरातफरी पैदा कर सकता है।

राहुल गांधी देश के प्रमुख विपक्षी नेता हैं। विपक्ष लोकतंत्र का अनिवार्य स्तंभ है। लेकिन जितना बड़ा राजनीतिक नेता, उतनी बड़ी जिम्मेदारी। यदि कोई सामान्य कार्यकर्ता सुरक्षा बैरिकेड पार करता है तो एक स्तर का प्रश्न है। लेकिन जब लोकसभा का नेता प्रतिपक्ष स्वयं सुरक्षा अवरोध पार करता है और राष्ट्रीय प्रसारण संस्थान के परिसर में बैठ जाता है, तो उसका राजनीतिक संदेश बहुत बड़ा होता है।

युवा कार्यकर्ता उसी व्यवहार को अनुकरणीय समझ सकते हैं। कल कोई दूसरा दल कह सकता है, “जब विपक्ष के बड़े नेता ने किया तो हम क्यों नहीं?” और धीरे-धीरे संवेदनशील सरकारी संस्थानों में राजनीतिक घुसपैठ सामान्य व्यवहार बन सकती है।

इसलिए सवाल राहुल गांधी के राजनीतिक विचारों का नहीं, संस्थागत सुरक्षा की सीमा का है। लोकतंत्र में सरकार बदली जा सकती है। नीतियों का विरोध किया जा सकता है। चुनाव आयोग की आलोचना की जा सकती है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के खिलाफ आंदोलन किया जा सकता है। लेकिन राष्ट्रीय संस्थानों की सुरक्षा से समझौता नहीं होना चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र केवल विरोध करने की स्वतंत्रता का नाम नहीं है; लोकतंत्र उन संस्थाओं की सुरक्षा का नाम भी है जिनके कारण विरोध, चुनाव, सूचना और सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण संभव होता है।

आकाशवाणी के भीतर हुआ यह धरना इसलिए केवल एक दिन की राजनीतिक घटना नहीं माना जाना चाहिए। यह पुलिस, इंटेलिजेंस, प्रसारण संस्थान और सभी राजनीतिक दलों के लिए एक चेतावनी है—संवेदनशील राष्ट्रीय संस्थानों की सुरक्षा में “एक बार की चूक” को सामान्य राजनीतिक तमाशा मानकर छोड़ देना भविष्य में बहुत महंगा पड़ सकता है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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इसलिए आज भी ब्रैंड्स के लिए भरोसे का दूसरा नाम हैं अमिताभ बच्चन: डॉ. अनुराग बत्रा

हिंदी सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन 84 साल के हो गए हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी वह बड़े और छोटे पर्दे पर सक्रिय हैं। फिल्मों में अपने लंबे सफर के साथ-साथ टीवी पर भी उन्होंने खास पहचान बनाए रखी है।

Last Modified:
Sunday, 11 October, 2026
Amitabh Bachchan

डॉ. अनुराग बत्रा।। 

हिंदी सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन 84 साल के हो गए हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी वह बड़े और छोटे पर्दे पर सक्रिय हैं। फिल्मों में अपने लंबे सफर के साथ-साथ टेलीविजन पर भी उन्होंने अपनी खास पहचान बनाए रखी है। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जो लगातार बड़ी संख्या में दर्शकों को आकर्षित कर रहा है।

हर मुश्किल से उबरकर आगे बढ़े अमिताभ: अमिताभ बच्चन का फिल्मी सफर कई उतार-चढ़ाव से गुजरा है, लेकिन उन्होंने मुश्किलों के सामने हार नहीं मानी। अपने करियर में आने वाली चुनौतियों से निकलकर उन्होंने बार-बार वापसी की है। फिल्म इंडस्ट्री और दर्शकों की पसंद में बदलाव के बावजूद वह लगातार काम करते रहे हैं और अलग-अलग भूमिकाएं निभाते रहे हैं। उनकी सोच और काम करने के तरीके में सकारात्मकता उनके लंबे सफर का अहम हिस्सा रही है। मुश्किल दौर में भी आगे बढ़ते रहने की उनकी क्षमता ने उन्हें मनोरंजन जगत में प्रासंगिक बनाए रखा है।

‘कौन बनेगा करोड़पति’ में भी कायम है उनका आकर्षण: अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है। टेलीविजन पर ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के होस्ट के रूप में भी वह दर्शकों को जोड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं। प्रतियोगियों से बातचीत करने का उनका अंदाज और कार्यक्रम को रोचक बनाए रखने की उनकी शैली दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखती है। इस कार्यक्रम के साथ उनका जुड़ाव इसकी पहचान का अहम हिस्सा बन गया है। बदलते समय और दर्शकों की पसंद के बीच भी वह टेलीविजन पर सक्रिय हैं।

ब्रैंड्स के लिए इसलिए खास हैं अमिताभ बच्चन: अमिताभ बच्चन की पहचान एक अभिनेता के साथ-साथ एक प्रभावशाली ब्रैंड पर्सनैलिटी के रूप में भी है। कई ब्रैंड्स ने उन्हें अपना ब्रैंड एंबेसडर बनाया है। इसकी बड़ी वजह उनकी लोकप्रियता के साथ लोगों का उन पर भरोसा और उनकी विश्वसनीयता है। अमिताभ बच्चन की आवाज में एक खास प्रभाव है। जब वह किसी ब्रैंड के बारे में बात करते हैं, तो लोग उनकी बात सुनते हैं। ब्रैंड्स उनकी इसी खासियत और लोगों के बीच उनकी विश्वसनीयता का महत्व समझते हैं।

किसी ब्रैंड एंबेसडर की भूमिका सिर्फ विज्ञापन में दिखाई देने तक सीमित नहीं होती। उसे लोगों से जुड़ना और ब्रैंड के प्रति भरोसा पैदा करना भी जरूरी होता है। अमिताभ बच्चन ने वर्षों के दौरान यह भरोसा बनाया है। उनकी लोकप्रियता के साथ उनकी विश्वसनीयता उन्हें दूसरे लोगों से अलग बनाती है।

हालांकि, अमिताभ बच्चन को ब्रैंड एंबेसडर बनाने के लिए बड़ा बजट जरूरी होता है और हर ब्रैंड इसे वहन नहीं कर सकता। लेकिन जो ब्रैंड उनके साथ जुड़ सकते हैं, उन्हें सिर्फ एक लोकप्रिय चेहरा ही नहीं, बल्कि लोगों के बीच पहचान और भरोसा रखने वाली शख्सियत का साथ मिलता है। यही वजह है कि विज्ञापन जगत में उनका महत्व आज भी बना हुआ है।

भारतीय सिनेमा में अनुभव और प्रभाव की खास पहचान: अमिताभ बच्चन ने कई दशकों में भारतीय सिनेमा को बदलते हुए देखा है और खुद भी इस बदलाव का हिस्सा रहे हैं। उनके लंबे अनुभव ने उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में एक खास स्थान दिलाया है। वह भारतीय सिनेमा में प्रभावशाली आवाज और विचार रखने वाली शख्सियत के रूप में भी पहचाने जाते हैं।

84 साल की उम्र में भी अमिताभ बच्चन सक्रिय हैं। उनके करियर में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उन्होंने मुश्किल समय को अपने सफर का अंत नहीं बनने दिया। फिल्मों और टेलीविजन पर दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ-साथ ब्रैंड्स के लिए भरोसेमंद चेहरा बने रहना उनकी खास पहचान है।

उनका जन्मदिन सिर्फ एक अभिनेता के लंबे सफर का उत्सव नहीं है, बल्कि उस शख्सियत की लोकप्रियता और विश्वसनीयता को भी रेखांकित करता जिसने दशकों बाद भी मनोरंजन और विज्ञापन जगत में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी है।

(डॉ. अनुराग बत्रा BW Businessworld के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ और एक्सचेंज4मीडिया के फाउंडर हैं।) 

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जेफ्री आर्चर को डॉ. संदीप गोयल ने किया याद, बोले-उनकी कहानियों ने दुनिया को बांधे रखा

दुनिया के बेहतरीन फिक्शन लेखकों में शुमार जेफ्री आर्चर का 86 साल की उम्र में पांच अक्टूबर को निधन हो गया। वह अपने अंतिम उपन्यास ‘एडम एंड ईव’ पर काम कर रहे थे और छह अक्टूबर को यह प्रकाशित होना था।

Last Modified:
Wednesday, 07 October, 2026
Dr Sandeep Goyal ...

डॉ. संदीप गोयल।।

दुनिया के बेहतरीन फिक्शन लेखकों में शुमार जेफ्री आर्चर का 86 साल की उम्र में निधन हो गया। जेफ्री हॉवर्ड आर्चर (1940-2026), बैरन आर्चर ऑफ वेस्टन-सुपर-मेयर ने 5 अक्टूबर 2026 को अपने घर पर आखिरी सांस ली। वह इन दिनों अपने अंतिम उपन्यास ‘एडम एंड ईव’ पर काम कर रहे थे और छह अक्टूबर को यह प्रकाशित होना था। इसके प्रकाशन से एक दिन पहले ही उनका निधन हो गया।

‘नॉट अ पेनी मोर, नॉट अ पेनी लेस’ से लेकर ‘केन एंड एबेल’ तक अपनी कहानियों से दुनिया भर के पाठकों के बीच खास पहचान बनाने वाले जेफ्री आर्चर ने 119 देशों में 300 मिलियन से ज्यादा किताबें बेचीं। वह ‘द संडे टाइम्स’ की बेस्टसेलर सूची में 14 साल और ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की सूची में पांच साल से ज्यादा समय तक रहे। वह खुद कहते थे कि वह ‘लेखक नहीं, कहानीकार’ हैं।

डॉ. संदीप गोयल ने जेफ्री आर्चर को श्रद्धांजलि देते हुए उनके लेखन और जीवन को याद किया है। डॉ. गोयल बताते हैं कि आर्चर की पहली किताब ‘नॉट अ पेनी मोर, नॉट अ पेनी लेस’ 1976 में प्रकाशित हुई थी और वह भारत में इसके शुरुआती पाठकों में शामिल रहे होंगे। उन्होंने इस किताब को शानदार और बेहद मनोरंजक बताया और कहा कि इसी किताब के बाद वह जीवनभर जेफ्री आर्चर के प्रशंसक बने रहे।

कर्ज ने बनाया लेखक: जेफ्री आर्चर ऑक्सफोर्ड ब्लू रहे थे और उन्होंने 100 गज की दौड़ 9.6 सेकंड में पूरी की थी। 1969 में 29 साल की उम्र में वह लाउथ से ब्रिटेन के सबसे कम उम्र के सांसद बने। लेकिन 34 साल की उम्र में कनाडा की एक सफाई कंपनी ‘एक्वाब्लास्ट’ में खराब निवेश के बाद वह लगभग दिवालिया हो गए। उन्होंने दिवालियापन से बाहर निकलने के लिए लिखना शुरू किया और इसी दौरान ‘नॉट अ पेनी मोर, नॉट अ पेनी लेस’ लिखी, जो 1976 में प्रकाशित हुई।

यह उपन्यास चार ऐसे लोगों की कहानी है, जिन्हें एक धोखेबाज फाइनेंसर ठग लेता है। इनमें हार्ले स्ट्रीट का एक डॉक्टर, ऑक्सफोर्ड का एक शिक्षक, मेफेयर का एक कला कारोबारी और एक कुलीन प्लेबॉय शामिल हैं। पैसे गंवाने के बाद चारों बदला लेने का फैसला करते हैं, लेकिन उनकी एक नैतिक शर्त होती है कि वे जितना पैसा गंवा चुके हैं, उससे न एक पैसा ज्यादा लेंगे और न एक पैसा कम।

डॉ. गोयल के मुताबिक, इस किताब की खासियत केवल इसकी कहानी नहीं बल्कि इसके विचारों की सहजता है। आर्चर ने यह समझ लिया था कि एक बेहतरीन कहानी छोटे-छोटे सटीक जालों की एक श्रृंखला होती है। उनके हर अध्याय का अंत एक रोमांचक मोड़ पर होता था। आलोचकों ने इस किताब को पसंद नहीं किया, लेकिन पाठकों ने इसे खूब खरीदा। यही पैटर्न अगले 50 वर्षों तक देखने को मिला। इस किताब की 50वीं वर्षगांठ के मौके पर पैरामाउंट इसका नया रूपांतरण भी तैयार कर रहा है।

‘केन एंड एबेल’ बना उनकी पहचान: अगर ‘नॉट अ पेनी मोर, नॉट अ पेनी लेस’ ने जेफ्री आर्चर को आर्थिक रूप से संभाला, तो ‘केन एंड एबेल’ ने उन्हें अमर बना दिया। इस किताब की 34 मिलियन प्रतियां बिकीं और यह दुनिया के सबसे ज्यादा बिकने वाले उपन्यासों में शामिल रही। ‘केन एंड एबेल’ पर 1985 में सीबीएस ने मिनी-सीरीज भी बनाई थी, जिसमें विलियम लोवेल केन की भूमिका सैम नील और एबेल रोस्नोव्स्की की भूमिका पीटर स्ट्रॉस ने निभाई थी। कहानी 18 अप्रैल 1906 को एक ही दिन जन्मे दो लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है। विलियम केन का जन्म बोस्टन में एक संपन्न परिवार में होता है, जबकि व्लाडेक कोसकीविच का जन्म पोलैंड के एक जंगल में होता है। अनाथ और प्रवासी व्लाडेक आगे चलकर एबेल रोस्नोव्स्की बनता है।

दोनों एक-दूसरे को खत्म करना चाहते हैं और करीब 60 वर्षों तक उनके बीच यह संघर्ष चलता रहता है। डॉ. गोयल के अनुसार, आर्चर ने दोनों की जिंदगी को समानांतर तरीके से रचा। शोध बहुत गहरा था, लेकिन पाठक को उसका बोझ महसूस नहीं होता था। ‘द प्रोडिगल डॉटर’ 1982 में प्रकाशित हुआ। यह एबेल की बेटी फ्लोरेंटिना की कहानी को आगे बढ़ाता है और यह दिखाता है कि आर्चर सिर्फ किरदार नहीं बल्कि पूरे परिवारों और पीढ़ियों की कहानियां लिखते थे।

पांच दशक में 50 किताबें: जेफ्री आर्चर ने कभी लिखना बंद नहीं किया। पांच दशकों में उन्होंने 50 किताबें लिखीं। इनमें ‘शैल वी टेल द प्रेसिडेंट?’, ‘द फोर्थ एस्टेट’, ‘ए मैटर ऑफ ऑनर’, ‘ऑनर अमंग थीव्स’ और ‘ऐज़ द क्रो फ्लाइज’ शामिल हैं। उनकी शॉर्ट स्टोरी कलेक्शन ‘अ क्विवर फुल ऑफ एरोज’, ‘अ ट्विस्ट इन द टेल’ और ‘देयरबाय हैंग्स अ टेल’ भी चर्चित रहीं। डॉ. गोयल ने बताया कि उन्होंने आर्चर की इन किताबों को लंबे समय तक पढ़ा है।

उनकी किताब ‘द प्रिजन डायरीज- हेल, पर्गेटरी, हेवन’ भी खास रही। यह किताब 2001 में झूठी गवाही और न्याय की प्रक्रिया को बिगाड़ने के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद जेल में बिताए गए दो वर्षों के अनुभवों पर आधारित थी। डॉ. गोयल के अनुसार, यह उनकी सबसे प्रभावशाली गैर-फिक्शन किताबों में से एक है। इसके बाद आर्चर ने ‘क्लिफ्टन क्रॉनिकल्स’ के सात खंड लिखे, जो 2011 से 2016 के बीच आए। इसकी शुरुआत ‘ओनली टाइम विल टेल’ से हुई। उन्होंने ‘विलियम वारविक’ सीरीज की आठ किताबें भी लिखीं।

2011 में ‘ओनली टाइम विल टेल’ के लिए उन्होंने भारत का दौरा किया था। उनका वर्ल्ड टूर लंदन से नहीं बल्कि बेंगलुरु से शुरू हुआ था। डॉ. गोयल भी उस कार्यक्रम में मौजूद थे और उनके पास आज भी आर्चर द्वारा हस्ताक्षर की गई किताब है। भारत में उन्हें सुनने के लिए 2,000 से 3,000 लोग पहुंचे थे, जबकि अमेरिका में यह संख्या 200 से 300 थी। डॉ. गोयल के मुताबिक, आर्चर इसे कभी नहीं भूले।

आखिरी उपन्यास ‘एडम एंड ईव’: जेफ्री आर्चर का अंतिम उपन्यास ‘एडम एंड ईव’ 6 अक्टूबर को प्रकाशित होना था। यह किताब भी अलग सामाजिक वर्गों से आने वाले एक ही दिन जन्मे दो लोगों की कहानी पर आधारित है और इसे ‘केन एंड एबेल’ के साथ एक तरह से जोड़कर देखा गया है।

 लेखन की अलग शैली: डॉ. गोयल के मुताबिक, जेफ्री आर्चर की सबसे बड़ी ताकत उनका गद्य नहीं बल्कि कहानी कहने का तरीका था। वह खुद भी यह मानते थे कि वह ग्राहम ग्रीन या जॉन ले कैरे नहीं हैं।  फ्रेडरिक फोर्साइथ के मुकाबले आर्चर लोगों और उनके रिश्तों पर ज्यादा ध्यान देते थे। फोर्साइथ तथ्यों और प्रक्रियाओं पर जोर देते थे, जबकि आर्चर लोगों की भावनाओं और बदले की कहानी को केंद्र में रखते थे। सिडनी शेल्डन से तुलना करते हुए डॉ. गोयल कहते हैं कि दोनों की किताबें पाठकों को बांधे रखती थीं, लेकिन शेल्डन की दुनिया हॉलीवुड, सेक्स और ग्लैमर से जुड़ी थी, जबकि आर्चर की दुनिया सत्ता और बदले की थी।

केन फोलेट और जॉन ग्रिशम से अलग आर्चर अध्यायों को बेहद सटीक तरीके से गढ़ते थे। वह अपनी हर किताब को 14 से 17 बार तक दोबारा लिखते थे। हर ड्राफ्ट में वह उन वाक्यों को हटाते थे, जो कहानी को आगे नहीं बढ़ाते थे। उनकी संपादक केट एल्टन ने उन्हें बेहद मेहनती और हर शब्द को बेहतर बनाने के लिए लगातार ड्राफ्ट तैयार करने वाला लेखक बताया था।

डॉ. गोयल के अनुसार, आर्चर का हास्य भी उनकी कहानी की संरचना का हिस्सा था। वह सीधे चुटकुला नहीं सुनाते थे, बल्कि कहानी के जरिए हास्य पैदा करते थे। किसी ऐसे किरदार को, जिसे पाठक ने शुरुआत में नजरअंदाज कर दिया हो, कहानी के बाद के हिस्से में महत्वपूर्ण भूमिका दे देना उनकी खास शैली थी।

उनका लेखन ऐसा लगता था, जैसे वह पाठक के सामने बैठकर कहानी सुना रहे हों और उसका ध्यान एक पल के लिए भी भटकने न दें। डॉ. गोयल कहते हैं कि वह अपने लेखन में आर्चर की इस शैली को अपनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन खुद को उनके सामने बहुत छोटा मानते हैं। अब जब वह फिक्शन लिखने की कोशिश कर रहे हैं, तो जेफ्री आर्चर उनके लिए प्रेरणा हैं। भारत में जेफ्री आर्चर की लोकप्रियता खास तौर पर रही। डॉ. गोयल के मुताबिक, भारत कहानी सुनाने वालों का देश है और यहां के पाठकों को कहानी में आने वाला रोमांचक मोड़ पसंद है। जेफ्री आर्चर की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। एक ऐसी कहानी, जिसमें हर मोड़ पर पाठक के लिए कुछ नया था।

(डॉ. संदीप गोयल अंग्रेजी साहित्य में गोल्ड मेडलिस्ट हैं। उन्हें पढ़ने का बहुत शौक है।) 

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AAAI अध्यक्ष के तौर पर डॉ. संदीप गोयल का एजेंडा क्या होना चाहिए?

डॉ. संदीप गोयल को बधाई और उन्हें शुभकामनाएं कि वह भारत में विज्ञापन एजेंसियों की शीर्ष संस्था के रूप में AAAI की प्रतिष्ठा को आगे भी बनाए रखें।

Last Modified:
Monday, 05 October, 2026
Pradeep854

प्रदीप मेनन. एम, को-फाउंडर, हेड - ब्रैंडिंग व स्ट्रैटजी, ब्लैकस्वान इंडिया

भारतीय विज्ञापन जगत के इतिहास में यह एक सही समय है, जब डॉ. संदीप गोयल को ऐडवर्टाइजिंग एजेंसिज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAAI) का नया अध्यक्ष चुना गया है। डॉ. संदीप गोयल को बधाई और उन्हें शुभकामनाएं कि वह भारत में विज्ञापन एजेंसियों की शीर्ष संस्था के रूप में AAAI की प्रतिष्ठा को आगे भी बनाए रखें।

यह दिलचस्प बात है कि नए अध्यक्ष को उद्योग के दोनों पक्षों यानी क्लाइंट और एजेंसी, दोनों तरफ काम करने का लंबा अनुभव है। क्लाइंट साइड और विज्ञापन एजेंसी, दोनों क्षेत्रों में अपने वर्षों के अनुभव के कारण मुझे पूरा भरोसा है कि वह आज की तकनीक आधारित विज्ञापन की दुनिया में स्वतंत्र एजेंसियों पर पड़ने वाले भारी दबाव को समझते होंगे।

अगर वह भारत सरकार के सामने विज्ञापन में AI से तैयार कंटेंट के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट कानून बनाने की जरूरत का मुद्दा उठाने की पहल कर सकें, तो इससे पूरे उद्योग को, चाहे क्लाइंट हों या एजेंसियां, काफी मदद मिल सकती है। अगर AI से तैयार कंटेंट के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट कानून हों और यह साफ हो कि क्लाइंट और एजेंसियां इसके इस्तेमाल के दौरान क्या कर सकती हैं और क्या नहीं, तो इस मुद्दे को लेकर काफी भ्रम दूर किया जा सकता है।

एक और क्षेत्र है, जहां मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि AAAI अपनी भूमिका निभा सकता है। वह है भविष्य के विज्ञापन जगत के लिए नई प्रतिभाओं को तैयार करना और उन्हें आगे बढ़ाना।

विज्ञापन उद्योग में काम कर चुके लोग इस बात से सहमत होंगे कि अगर आपको इस क्षेत्र में काम करना है तो सिर्फ मार्केटिंग की थ्योरी सीखना पर्याप्त नहीं है। आपको पढ़ना होगा, फिल्में देखनी होंगी, अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों को समझना होगा और आपके आसपास जो कुछ भी हो रहा है, उसके बारे में लगभग हर चीज की जानकारी रखनी होगी।

मैनेजमेंट या विज्ञापन संस्थानों से पढ़ाई पूरी करके निकलने वाले छात्रों के लिए एक ऐसी फिनिशिंग स्कूल की व्यवस्था, जहां उन्हें इंडस्ट्री का अनुभव भी मिले, इस दिशा में बड़ा बदलाव ला सकती है। AAAI की ओर से एक ऐसा टैलेंट पूल भी तैयार किया जा सकता है, जिसे ऑनलाइन उपलब्ध कराया जाए और कोई भी विज्ञापन एजेंसी वहां से इंडस्ट्री के लिए तैयार प्रतिभाओं को नियुक्त कर सके।

आज विज्ञापन कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक प्रतिभाओं की कमी है। हालांकि पूरे भारत में कई कॉलेज विज्ञापन और मार्केटिंग से जुड़े कई कोर्स कराते हैं, लेकिन यह सच है कि इन कोर्स से निकलने वाले छात्र सीधे इंडस्ट्री में काम करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं होते।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि दूसरी इंडस्ट्रीज के मुकाबले विज्ञापन में हमारे पास इंटर्न के साथ ट्रायल और एरर करने का समय नहीं होता। इसकी वजह यह है कि क्लाइंट की ओर से हमारी गलतियों को लेकर सहनशीलता लगभग शून्य होती है।

अंत में, अगर नए अध्यक्ष विज्ञापन कानूनों के बारे में क्लाइंट और विज्ञापन एजेंसियों के बीच जानकारी बढ़ाने के लिए कदम उठा सकें, तो इससे एक संस्था के रूप में AAAI की प्रतिष्ठा और मजबूत होगी। कई क्लाइंट को तो यह भी पता नहीं होता कि ऐडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया (ASCI) की एक वेबसाइट है, जहां उपभोक्ता विज्ञापनों के खिलाफ शिकायत कर सकते हैं।

इसके लिए AAAI, विज्ञापन एजेंसियों और क्लाइंट के बीच संवाद को बेहतर बनाने की जरूरत है। हर विज्ञापन एजेंसी, चाहे वह छोटी हो या बड़ी, उत्तर भारत की हो या दक्षिण भारत की, उसे यह महसूस होना चाहिए कि वह AAAI का हिस्सा है और उसे यह भरोसा होना चाहिए कि AAAI उनके समर्थन के लिए मौजूद है।

जैसा कि मैंने इस लेख की शुरुआत में कहा है, मुझे पूरा विश्वास है कि डॉ. संदीप गोयल, एजेंसी और क्लाइंट दोनों पक्षों में अलग-अलग भूमिकाओं में काम करने के अपने व्यापक अनुभव के साथ, विज्ञापन जगत की शीर्ष संस्था AAAI में एक नई और सकारात्मक ऊर्जा लेकर आएंगे।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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हिंदी दिवस समारोह में बोले प्रो. संजय द्विवेदी: भाषा को ज्ञान और तकनीक से जोड़ने पर जोर

केनरा बैंक के हिंदी दिवस समारोह में प्रो. संजय द्विवेदी ने हिंदी को वैश्विक भाषा बताते हुए कहा कि डिजिटल माध्यम, सोशल मीडिया, सिनेमा और नई तकनीक ने इसके विस्तार को गति दी है।

Last Modified:
Monday, 05 October, 2026
sanjaydwivedi

केनरा बैंक, भोपाल के अंचल कार्यालय में आयोजित हिंदी दिवस समारोह में भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के पूर्व महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी (Prof. Sanjay Dwivedi) ने हिंदी के बढ़ते वैश्विक प्रभाव पर बात की। उन्होंने कहा कि हिंदी विश्व भाषा बन चुकी है और कई देशों में इसे देखा, सुना और पढ़ा जा रहा है।

मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रो. द्विवेदी ने कहा कि डिजिटल माध्यमों (Digital Platforms), सोशल मीडिया (Social Media), सिनेमा और नई तकनीक ने हिंदी के वैश्विक विस्तार को गति दी है। उनके अनुसार, भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, स्मृति और पहचान से भी जुड़ी होती है।

उन्होंने कहा कि हिंदी ने भारत की विविधताओं को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हिंदी को केवल सरकारी कामकाज तक सीमित रखने के बजाय ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, व्यापार और रोजगार की भाषा के रूप में आगे बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने नई पीढ़ी को हिंदी, आधुनिक तकनीक और वैश्विक ज्ञान से जोड़ने को समय की आवश्यकता बताया।

प्रो. द्विवेदी ने यह भी कहा कि हिंदी का विकास दूसरी भारतीय भाषाओं के विरोध में नहीं, बल्कि उनके साथ मिलकर होना चाहिए। कार्यक्रम की अध्यक्षता बैंक के अंचल प्रमुख सत्य प्रकाश सिंह (Satya Prakash Singh) ने की।

उन्होंने कहा कि राजभाषा हिंदी का प्रभावी प्रयोग बैंकिंग सेवाओं को सहज, सरल और जनसुलभ बनाने में मदद करता है। ग्राहकों से उनकी भाषा में संवाद करने से बैंक और ग्राहकों के बीच जुड़ाव बढ़ता है।

सिंह ने बैंक कर्मचारियों से हिंदी को दैनिक कार्य-व्यवहार की सहज भाषा के रूप में अपनाने का आह्वान किया। कार्यक्रम में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह (Amit Shah) के हिंदी दिवस संदेश का वाचन भी किया गया।

संचालन राजभाषा अधिकारी खुशबू गुप्ता (Khushboo Gupta) ने किया, जबकि स्वागत भाषण उप महाप्रबंधक किरीट नागर (Kirit Nagar) ने दिया। इस मौके पर विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कृत किया गया।

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AI एजेंट क्या है? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

AI एजेंट का मतलब हुआ कि वो काम जो आप करते आए हैं, वो AI कर सकता है। आपको मुंबई की फ्लाइट बुक करनी है तो आप ChatGPT से पूछते हैं कि कौन-सी फ्लाइट बुक कर सकते हैं?

Last Modified:
Monday, 05 October, 2026
milindkhandekarhisabkitab

मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।

AI (आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस) का इस्तेमाल हम अब भी गूगल की तरह कर रहे हैं। गूगल सर्च करने के बजाय हम ChatGPT से पूछते हैं, वो जवाब देता है और बात खत्म हो जाती है। अब AI एजेंट के ज़रिए बात दूर तक पहुंच गई है। AI सिर्फ जवाब नहीं दे रहा है, वो काम भी कर रहा है। यह अवसर भी है और आपदा भी। अवसर अपने काम करवा लेने का है, लेकिन अगर AI एजेंट बेकाबू हो जाएं तो यह आपदा में बदल सकता है।

AI एजेंट का मतलब हुआ कि वो काम जो आप करते आए हैं, वो AI कर सकता है। आपको मुंबई की फ्लाइट बुक करनी है तो आप ChatGPT से पूछते हैं कि कौन-सी फ्लाइट बुक कर सकते हैं? कितना किराया लगेगा? बुकिंग फिर भी आपको करना है।

Meta ने Muse AI एजेंट लॉन्च किया है, जबकि OpenAI ने Dots। ये एजेंट बुकिंग भी कर देंगे। हर किसी के पास तो पर्सनल असिस्टेंट होता नहीं है, ये एजेंट आपके असिस्टेंट की तरह काम कर सकते हैं। आपके लिए ऑनलाइन खाना ऑर्डर कर सकते हैं, राशन मंगा सकते हैं। ऑर्डर करने से पहले आपसे बस अनुमति मांगेंगे। भारत में ये ऐप अभी सबके लिए उपलब्ध नहीं है, लेकिन आने वाले समय में आप इस्तेमाल कर सकेंगे।

यहां तक तो सब ठीक है, लेकिन यही एजेंट आपदा का कारण बन सकते हैं। ChatGPT पर आप फ़ोटो अपलोड करते हैं तो यह भरोसा होता है कि कोई और नहीं देखेगा, लेकिन OpenAI हमारे फ़ोटो या डेटा को पहचान छिपाकर ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल करता है। कंपनी ने माना है कि AI एजेंट ने 53 फ़ोटो ट्रेनिंग के दौरान बाहर दूसरी वेबसाइट पर अपलोड कर दिए। यहां चिंता हमारी प्राइवेसी को लेकर है।

दूसरी बात OpenAI ने बताई है कि AI एजेंट ने खुद से सरकारी, यूनिवर्सिटी वेबसाइट को हैक करने की कोशिश की है। मान लीजिए एजेंट को काम दिया गया कि यह जानकारी लेकर आओ और उसे वो जानकारी वेबसाइट पर नहीं मिली तो एजेंट ने वेबसाइट हैक करने की कोशिश की है। मकसद बैकएंड पर जाकर जानकारी हासिल करने का था। AI एजेंट ने वो हथकंडे अपनाए, जिसकी अनुमति उसे नहीं दी गई थी।

मतलब आपको जापान जाना था, लेकिन AI एजेंट चीन पहुंचा सकता है। AI मानवता के लिए ख़तरा बनेगा, इस डर की जड़ में एजेंट है। एजेंट कोई एक-दो नहीं होते हैं, उनका झुंड एक साथ काम करता है। अमेरिका की बड़ी AI कंपनियों ने पिछले हफ़्ते राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं कि वो अपने काम की निगरानी के लिए बाहर से एक्सपर्ट नियुक्त करेंगे। कोई गड़बड़ी होती है तो तुरंत रिपोर्ट करेंगे। यह सारे कदम उठाए जा रहे हैं ताकि AI अवसर बनें, आपदा नहीं।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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आदिवासी इलाकों में घाव कुरेदने के बजाय विकास का विश्वास देखने की जरूरत: आलोक मेहता

आदिवासी क्षेत्रों ने दशकों तक दोहरी मार झेली है। एक ओर गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार और प्रशासन की पहुंच जैसी समस्याएं थीं। दूसरी ओर नक्सल हिंसा थी।

Last Modified:
Monday, 05 October, 2026
aalokmehta

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

कांग्रेस और प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पिछले दिनों मध्य प्रदेश के बालाघाट ज़िले के जगला गाँव (बिरसा ब्लॉक) के दौरे में आदिवासियों से बातचीत के दौरान बैगा आदिवासी बहुल इलाकों में बीमारी, गंभीर कुपोषण, मलेरिया और दूषित पानी के कारण बच्चों की हुई मौतों पर गहरा दुख जताया और इसे सरकार की 100% विफलता बताया।

उन्होंने आरोप लगाया कि 'ऐसा लगता है जैसे देश के बीचों-बीच रहने वाले आदिवासी परिवारों को पूरी तरह से अकेला छोड़ दिया गया है, और न तो केंद्र सरकार और न ही मध्य प्रदेश सरकार उनके साथ खड़ी है।' क्या आदिवासी समाज की पूरी कहानी केवल किसी दुखद घटना, गरीबी, कुपोषण अथवा सरकारी विफलता की कहानी है? क्या पिछले वर्षों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और दूसरे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के क्षेत्र में हुए बदलावों की भी चर्चा नहीं होनी चाहिए? और खासकर 2026 में जब भारत सरकार ही नहीं, दुनिया देश को नक्सल-मुक्त बनाने के अभियान की सफलता की तारीफ़ कर रही है।

आदिवासी क्षेत्रों ने दशकों तक दोहरी मार झेली है। एक ओर गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार और प्रशासन की पहुंच जैसी समस्याएं थीं। दूसरी ओर नक्सल हिंसा थी। नक्सलवाद ने सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं इलाकों को पहुंचाया, जिनके नाम पर उसकी राजनीति की जाती थी।

इसे संयोग ही कहा जाएगा कि जिस समय राहुल गांधी आदिवासियों की अनदेखी पर राजनीति कर भोले-भाले लोगों को भड़का रहे थे, उन्हीं दिनों मैं आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ की यात्रा कर रहा था। वह भी एक पत्रकार यशवंत धोटे द्वारा 15 वर्ष पहले शुरू किए गए दैनिक 'नव प्रदेश' द्वारा समाज के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सेवा करने वाले युवाओं, महिलाओं, बुजुर्गों के सम्मान के लिए आयोजित समारोह को देखने के लिए।

आयोजन राजधानी रायपुर से दूर बेमेतरा में हुआ, जहाँ आदिवासी बच्चियों, महिलाओं, पुरुषों ने गीत, संगीत, नृत्य से सबके साथ मुझे भी बहुत प्रसन्न और प्रभावित किया। समारोह के पहले और बाद में सामान्य लोगों, भाजपा और कांग्रेस से जुड़े कुछ नेताओं से बातचीत में अहसास हुआ कि छत्तीसगढ़ में सचमुच नया विश्वास आ रहा है। अब उन्हें माओवादियों की बंदूकों का डर नहीं, जल्दी से जल्दी अच्छी सड़कें, शिक्षा और स्वास्थ्य तथा अपने बनाए कुटीर उद्योग के सामान को दूर तक पहुंचाकर आमदनी बढ़ाने की चाह है।

पत्रकार के नाते मैं 1976 से समय-समय पर छत्तीसगढ़ जाता रहा हूँ। उन दिनों बस से बस्तर तक की कठिन यात्राएं भी की हैं। बस्तर के गाँव के हाट बाजार में 20 मील दूर से केवल नमक खरीदने के लिए आने वाले आदिवासियों से स्थानीय व्यक्ति से उनकी भाषा समझकर बात की थी। तब आदिवासियों ने बताया था कि वे किसी तरह पेड़-पत्तों और लाल-काले चींटों को खाने के लिए यह नमक लेने आते हैं।

फिर कुछ वर्ष बाद नक्सल माओवादी हिंसा ने इस इलाके को प्रभावित किया। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दो-तीन यात्राओं के दौरान रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग ही नहीं, बस्तर, जगदलपुर और दंतेवाड़ा में आदिवासियों की जिंदगी में भारी बदलाव और आर्थिक विकास, आत्मनिर्भरता का विश्वास देखने को मिला।

कांग्रेस राज में राजनीतिक उदारता, मानव अधिकारों के नाम पर माओवादी नक्सली तत्वों और उनकी सहायता करने वाले शिक्षित लोगों को छूट दी गई, जिससे सड़क बनाने वाले मजदूरों को धमकाया गया। स्कूल भवनों को उड़ाया गया। पुलों को निशाना बनाया गया। मोबाइल टावरों और सरकारी संस्थानों को नुकसान पहुंचाया गया। पुलिस, सुरक्षा बलों, जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों की हत्या हुई।

इसलिए आज जब सुरक्षा के हालात बदल रहे हैं, तब राहुल गांधी द्वारा केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि सरकार ने क्या नहीं किया। यह भी बताना चाहिए कि अब क्या संभव हो रहा है? आखिरकार पड़ोसी तेलंगाना, आंध्र और झारखंड में गैर-भाजपा सरकारें हैं। वे भी नक्सल प्रभावित रहे और अब केंद्र की मोदी सरकार के सहयोग से आदिवासी इलाकों में विकास के कार्य कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्षों में नक्सलवाद को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। उनकी सरकार ने सुरक्षा अभियान के साथ सड़क, मोबाइल कनेक्टिविटी, बैंकिंग, शिक्षा और सरकारी योजनाओं की पहुंच को भी रणनीति का हिस्सा बनाया। कभी हिंसा और पिछड़ेपन से प्रभावित क्षेत्रों में अब बड़े पैमाने पर प्रगति हो रही है। उन्होंने विशेष रूप से 12,000 किलोमीटर से अधिक सड़कों, मोबाइल टावरों, बैंकिंग, डाक और संचार नेटवर्क का विस्तार हो रहा है। उन्होंने बस्तर ओलंपिक्स को भी उस बदलाव का प्रतीक बताया, जिसमें युवाओं की आकांक्षाएं हिंसा के पुराने भय की जगह ले रही हैं।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय स्वयं आदिवासी समाज से आते हैं। इसलिए उनके सामने अवसर भी बड़ा है और जिम्मेदारी भी। इस यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री साय, पूर्व मुख्यमंत्री और विधानसभा के अध्यक्ष डॉक्टर रमन सिंह से भी आदिवासी इलाकों की चुनौतियों और विकास कार्यों पर थोड़ी अनौपचारिक चर्चा हुई। यह भी महत्वपूर्ण है कि छत्तीसगढ़ और ओडिशा में पहली बार आदिवासी मुख्यमंत्री बने हैं। गैर-राजनीतिक लोगों से भी कुछ बातचीत हुई। हाँ, तब सांसद और केंद्रीय मंत्री विष्णुदेव साय ने डॉक्टर अमन सिंह के साथ आदिवासी इलाकों में जमीनी संघर्ष और हर संभव विकास के काम भी किए हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की नक्सल विरोधी नीति ने सुरक्षा अभियान को निर्णायक रूप दिया और मई 2026 में अमित शाह ने बस्तर में नक्सल-मुक्ति की घोषणा की। नक्सलवाद समाप्त होने के बाद बस्तर को देश के सबसे पिछड़े और हिंसा प्रभावित क्षेत्र की पहचान से निकालकर विकास के नए मॉडल में बदलना एक ऐतिहासिक चुनौती है।

सड़क, बिजली, मोबाइल नेटवर्क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, वन उपज, पर्यटन, स्थानीय रोजगार और कौशल विकास—इन सभी क्षेत्रों में समानांतर काम हो रहा है। बस्तर की अर्थव्यवस्था में आदिवासी समुदाय की भागीदारी बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है। सरकार द्वारा वन उपज, कृषि, डेयरी और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की योजनाएं तभी सफल मानी जाएंगी, जब उनका वास्तविक आर्थिक लाभ गांव के परिवारों तक पहुंचे। केंद्र की ओर से भी बस्तर में सहकारी डेयरी, ‘सेवा डेरा’, ‘बस्तर ओलंपिक्स’ और ‘बस्तर पंडुम’ जैसे कार्यक्रमों को विकास एवं सामाजिक भागीदारी से जोड़ा गया है। आदिवासी युवाओं के सामने पहली बार अलग भविष्य दिख रहा है।

नक्सलवाद की सबसे बड़ी मानवीय कीमत युवा पीढ़ी ने चुकाई। युवाओं को आईटीआई, कौशल प्रशिक्षण, खेल, पर्यटन, कृषि-प्रसंस्करण, वन उत्पाद आधारित उद्योग, छोटे कारोबार और सरकारी योजनाओं से जोड़ना होगा। आदिवासी समाज को केवल पीड़ित समुदाय के रूप में प्रस्तुत करना भी उचित नहीं है। आदिवासी समाज आज परिवर्तन चाहता है।

वह अपने बच्चों के लिए सरकारी नौकरी ही नहीं, निजी क्षेत्र और उद्यमिता के अवसर भी चाहता है। और सबसे महत्वपूर्ण—वह भयमुक्त जीवन चाहता है। नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई का अंतिम लक्ष्य केवल बंदूकें शांत करना नहीं, बल्कि आदिवासी परिवारों के जीवन में स्थायी शांति, सम्मान, शिक्षा, स्वास्थ्य और समृद्धि लाना होना चाहिए। यही वह कसौटी है, जिस पर आने वाले वर्षों में मोदी सरकार, राज्य सरकारों और विपक्ष—सभी को परखा जाएगा।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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AAAI की कमान संभालने के बाद डॉ. संदीप गोयल के सामने उम्मीदों और बदलाव की बड़ी चुनौती

विज्ञापन उद्योग इस समय पिछले कई दशकों के सबसे बड़े बदलावों में से एक का सामना कर रहा है। यदि कोई व्यक्ति AAAI में बदलाव ला सकता है और अग्रिम पंक्ति से नेतृत्व कर सकता है, तो वह संदीप गोयल हैं।

Last Modified:
Thursday, 01 October, 2026
Dr Sandeep Goyal aaai

डॉ. अनुराग बत्रा।।

एडवरटाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAAI) को नया अध्यक्ष मिल गया है। लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड को लेकर हुई चर्चाओं और विवादों के बाद अब संगठन की कमान डॉ. संदीप गोयल के हाथों में है। हालांकि उनकी नियुक्ति का सबसे दिलचस्प पहलू केवल यह नहीं है कि अध्यक्ष कौन बना है, बल्कि यह भी है कि उन्होंने ऐसे समय में जिम्मेदारी संभाली है जब एडवरटाइजिंग इंडस्ट्री बड़े बदलावों के दौर से गुजर रही है।

डॉ. संदीप गोयल को विज्ञापन जगत का ऐसा प्रोफेशनल माना जाता है, जो विज्ञापन, उद्यमिता, प्रौद्योगिकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की गहरी समझ रखते हैं। विभिन्न उद्योगों, विचारों और लोगों से उनके व्यापक संबंध हैं। साथ ही नीतिनिर्माताओं और सरकार से उनकी मजबूत पहुंच भी उनकी बड़ी ताकत मानी जाती है। उन्हें रचनात्मक और उद्यमशील सोच वाले लीडर के रूप में देखा जाता है।

अपनी नई भूमिका में गोयल यदि रचनात्मक और व्यवसायिक दोनों पक्षों से युवा नेतृत्व को आगे लाने का प्रयास करते हैं तो यह इंडस्ट्री के लिए महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति AAAI में बदलाव ला सकता है और अग्रिम पंक्ति से नेतृत्व कर सकता है, तो वह संदीप गोयल हैं।

विज्ञापन उद्योग इस समय पिछले कई दशकों के सबसे बड़े बदलावों में से एक का सामना कर रहा है। AI विचारों के निर्माण, कंटेंट प्रोडक्शन और कैंपेन प्लानिंग के तरीकों को बदल रहा है। उपभोक्ताओं का ध्यान कई प्लेटफॉर्म्स में बंट चुका है। मीडिया लगातार अधिक जटिल होता जा रहा है। इंडस्ट्री में आने वाले युवा पेशेवर करियर को पहले से अलग नजरिए से देख रहे हैं और एजेंसियां भी यह समझने की कोशिश कर रही हैं कि उनके विकास का अगला चरण कहां से आएगा।

ऐसे में संदीप गोयल को ऐसा उद्योग नहीं मिला है जो सामान्य ढंग से आगे बढ़ रहा हो, बल्कि उन्हें ऐसा उद्योग मिला है जो दिशा की तलाश में है। उनकी पहली चुनौती उम्मीदों को संभालना होगी।

AAAI से बाहर रहते हुए गोयल अक्सर उद्योग से जुड़े मुद्दों पर खुलकर बोलते रहे हैं। वह सवाल उठाते थे, नई सोच पेश करते थे और बदलाव के सुझाव देते थे। अब स्थिति अलग है। अब वह बाहर से टिप्पणी करने वाले व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि संगठन के मुखिया हैं। ऐसे में उद्योग उनसे उनके विचारों को कार्रवाई में बदलने की उम्मीद करेगा।

हालांकि यह काम 12 महीनों में पूरा नहीं हो सकता। किसी भी उद्योग संगठन की सबसे बड़ी गलतियों में से एक यह होती है कि वह नए नेतृत्व का मूल्यांकन केवल एक साल की उपलब्धियों के आधार पर करने लगे। संरचनात्मक बदलावों में समय लगता है। इसलिए गोयल और उनकी टीम को अपनी योजनाओं को लागू करने, सहमति बनाने और परिणाम दिखाने के लिए कम से कम दो साल का समय मिलना चाहिए। संगठन को निरंतरता की जरूरत है, न कि ऐसी व्यवस्था की जिसमें हर नई टीम पुराने विचारों को अधूरा छोड़कर नए सिरे से शुरुआत कर दे।

गोयल की सबसे पहली प्राथमिकता तकनीक और AI होगी। AI अब ऐसा विषय नहीं है जिस पर केवल चर्चा की जाए। यह पहले ही क्रिएटिव प्रोसेस, प्रोडक्शन, मीडिया प्लानिंग, रिसर्च और क्लाइंट की अपेक्षाओं को प्रभावित कर रहा है। अब सवाल यह नहीं है कि AI विज्ञापन उद्योग को प्रभावित करेगा या नहीं, बल्कि यह है कि एजेंसियां इसका उपयोग किस प्रकार करें ताकि मानवीय सोच और रचनात्मकता की मूल भावना बरकरार रहे।

इसी संदर्भ में AAAI महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। संगठन केवल AI पर चर्चा करने तक सीमित रहने के बजाय ऐसे व्यावहारिक प्रशिक्षण और सीखने के मंच तैयार कर सकता है, जहां इंडस्ट्री के विभिन्न क्षेत्रों के लोग समझ सकें कि AI उनके काम को किस प्रकार प्रभावित करेगा। क्रिएटिव पेशेवरों, मीडिया प्लानर्स, अकाउंट मैनेजमेंट टीम और प्रोडक्शन से जुड़े लोगों की जरूरतें अलग-अलग हैं। वहीं छोटी एजेंसियों की चुनौतियां बड़ी नेटवर्क एजेंसियों से भिन्न हो सकती हैं।

दूसरी बड़ी चुनौती टैलेंट को लेकर है। विज्ञापन उद्योग हमेशा युवाओं को आकर्षित करता रहा है, क्योंकि यहां विचारों, उत्साह और प्रयोग की संस्कृति रही है। लेकिन आज की युवा पीढ़ी के सामने करियर के कई नए विकल्प मौजूद हैं। टेक्नोलॉजी कंपनियां, स्टार्टअप, कंटेंट बिजनेस, कंसल्टिंग फर्म और डिजिटल प्लेटफॉर्म भी उसी प्रतिभा को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं।

ऐसे में AAAI को उद्योग को अगली पीढ़ी के लिए अधिक आकर्षक बनाना होगा। इसका मतलब केवल युवाओं को सेमिनारों में बुलाना नहीं है, बल्कि उन्हें संगठन का सक्रिय हिस्सा बनाना है। यदि जेन-जी इंडस्ट्री की सबसे महत्वपूर्ण ताकतों में से एक है तो AAAI में भी ऐसे लोगों की मौजूदगी बढ़नी चाहिए जो उनकी सोच, संवाद शैली और सूचना उपभोग की आदतों को समझते हों। इंडस्ट्री को पीढ़ियों के बीच एक मजबूत पुल की जरूरत है। अनुभव महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल अनुभव ही भविष्य तय नहीं कर सकता।

ज्ञान और वैश्विक दृष्टिकोण भी काफी महत्वपूर्ण है। भारतीय विज्ञापन उद्योग वर्षों से अपनी रचनात्मक क्षमता का प्रदर्शन वैश्विक मंचों पर करता रहा है, लेकिन केवल पुरस्कारों के सहारे अंतरराष्ट्रीय पहचान को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इंडस्ट्री को नए बिजनेस मॉडल, तकनीक, उपभोक्ता व्यवहार और उभरते संचार तरीकों से लगातार जुड़ना होगा।

इसलिए AAAI वैश्विक पेशेवरों, शिक्षाविदों, मार्केटर्स और तकनीकी विशेषज्ञों को जोड़ने वाले अधिक ज्ञान-आधारित मंच विकसित कर सकता है। इसका उद्देश्य केवल एक और अवॉर्ड समारोह या ऐसा उद्योग आयोजन नहीं होना चाहिए, जहां लोग उन्हीं लोगों से मिलें जिन्हें वे पहले से जानते हैं। उद्देश्य भारतीय विज्ञापन उद्योग तक नई सोच और नए विचार पहुंचाना होना चाहिए।

गोवाफेस्ट (Goafest) निश्चित रूप से AAAI की एक महत्वपूर्ण संपत्ति बना रहेगा, लेकिन संगठन को गोवाफेस्ट से आगे भी सोचना होगा। कोई भी उद्योग संगठन साल में केवल कुछ दिनों के लिए प्रासंगिक नहीं रह सकता। उसे पूरे वर्ष उद्योग के लिए उपयोगी बने रहना होगा।

विज्ञापन उद्योग का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। अब एजेंसियां अकेले काम नहीं करतीं। वे मीडिया कंपनियों, टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म्स, प्रोडक्शन हाउस, इन्फ्लुएंसर्स, कंटेंट क्रिएटर्स, डेटा कंपनियों और व्यापक मार्केटिंग इकोसिस्टम के साथ मिलकर काम करती हैं। ऐसे में AAAI के पास पूरे उद्योग की मजबूत आवाज बनने का अवसर है।

विज्ञापन उद्योग के पास रचनात्मक और संवाद की अपार शक्ति है। यदि इस शक्ति का उपयोग सामाजिक मुद्दों के लिए किया जाए तो यह पेशे को केवल उत्पाद और सेवाएं बेचने तक सीमित नहीं रखेगा, बल्कि उसे एक व्यापक उद्देश्य भी देगा।

गोयल की सबसे बड़ी चुनौती इंडस्ट्री के भीतर अपेक्षाओं और विभिन्न हितों के बीच संतुलन बनाना होगी। AAAI में अलग-अलग आकार की एजेंसियां, अलग-अलग बिजनेस मॉडल और अलग-अलग प्राथमिकताओं वाले सदस्य शामिल हैं। जो मुद्दे किसी बड़ी बहुराष्ट्रीय एजेंसी के लिए महत्वपूर्ण हैं, वे जरूरी नहीं कि किसी छोटी स्वतंत्र एजेंसी के लिए भी उतने ही महत्वपूर्ण हों। डिजिटल-फर्स्ट एजेंसियों की चिंताएं पारंपरिक एजेंसियों से अलग हो सकती हैं। मुंबई और दिल्ली की उद्योगगत परिस्थितियां बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद या अन्य बाजारों से भिन्न हो सकती हैं।

इसलिए AAAI अध्यक्ष को केवल बदलाव लाने वाला नेता ही नहीं, बल्कि सहमति बनाने वाला नेतृत्वकर्ता भी बनना होगा। हालांकि, गोयल को बहुत कम समय में बहुत अधिक करने के प्रलोभन से बचना चाहिए। सही ढंग से लागू किया गया पांच सूत्रीय एजेंडा, उन 20 घोषणाओं से कहीं अधिक प्रभावी होगा जो केवल कॉन्फ्रेंस रूम तक सीमित रह जाएं।

विज्ञापन इंडस्ट्री को बदलाव पर चर्चा का एक और वर्ष नहीं चाहिए। उसे बदलाव के स्पष्ट परिणाम चाहिए। इंडस्ट्री को बेहतर कौशल, मजबूत वैश्विक एक्सपोजर, युवा नेतृत्व, AI की बेहतर समझ और पारंपरिक विज्ञापन से आगे बढ़कर नए अवसरों की जरूरत है। साथ ही उसे ऐसे संगठन की आवश्यकता है जो केवल स्थापित नेतृत्व के लिए नहीं, बल्कि उन पेशेवरों के लिए भी प्रासंगिक हो जो आने वाले दस वर्षों में उद्योग का भविष्य तय करेंगे।

डॉ. संदीप गोयल ने बाहर रहकर पर्याप्त समय तक सवाल उठाए हैं। अब उनके पास उन सवालों के जवाब खोजने का मंच है। अतीत के विवादों और चर्चाओं को पीछे छोड़ते हुए नए अध्यक्ष को केवल एक साल नहीं, बल्कि उससे आगे की सोच के साथ काम करने का अवसर मिलना चाहिए।

अब कमान पूरी तरह उनके हाथों में है। इंडस्ट्री केवल यह नहीं देखेगी कि वह कितनी तेजी से आगे बढ़ते हैं, बल्कि यह भी देखेगी कि वह AAAI को किस दिशा में लेकर जाते हैं।

(डॉ. अनुराग बत्रा BW Businessworld के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ और एक्सचेंज4मीडिया के फाउंडर हैं।)

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