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AI की एंट्री व साल 2023: चुनौतियों और संकट से भरे दौर में प्रवेश कर गई है मीडिया इंडस्ट्री

वर्ष 2023 वैश्विक स्तर पर विगत् दो वर्षों में हुई कोविड-19 महामारी की त्रासदी से उबरता हुआ साल रहा है

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago

सारंग उपाध्याय, पत्रकार व लेखक ।।

वर्ष 2023 वैश्विक स्तर पर विगत् दो वर्षों में हुई कोविड-19 महामारी की त्रासदी से उबरता हुआ साल रहा है। 2020 और विशेष रूप से 2021 में कोरोना से जूझते भारत में आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से बड़े परिवर्तन हुए हैं और इन परिवर्तनों की छाया साल-दर-साल दिखाई दी है। चाहे वह साल 2022 हो या 2023 या फिर नया साल 2024. दरअसल, हर क्षेत्र की तरह ही 2023 मीडिया के लिए भी ऐसे ही बदलावों भरा साल रहा है, जिस पर कोविड का साया रहा है। (ये और बात है कि अब भी कोरोना हमारे आसपास मौजूद है और खबरें इसकी बानगी हैं। सिंगापुर के बढ़ते केस कुछ अलग संकेत दे रहे हैं) सिकुड़ती हुई नौकरियां, बंद होते अखबार, घाटे और कर्जे की भेंट चढ़े मीडिया संस्थान, काम करने के बदलते तरीके, पब्लिक मीडिया, कॉन्टेंट से ज्यादा वीडियो सेंट्रिक होते यूजर्स, सोशल मीडिया पर एल्गोरिदम और डेटा चोरी का संकट, घर से काम करने का चलन यह सब चीजें ऐसी रहीं हैं, जिसने भारत में मीडिया इंडस्ट्री में व्यापक बदलाव किए हैं।

वर्ष 2023 में मीडिया क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती आर्टिफिशल इंटेलीजेंस रहा है। एआई के प्रवेश की आहट ने पूरी मीडिया इंडस्ट्री को प्रभावित किया है। 2022 के नवंबर माह में ओपन एआई के चैट जीपीटी लॉन्च करने के बाद ही मीडिया में रोजगार के संकट की आहट महसूस की जा सकती है। ओपन एआई, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, मेटा (OpenAI+ Microsoft, Google, Meta) सहित दिग्गज सॉफ्टवेयर टेक्नॉलॉजी कंपनियों द्वारा लगातार Artificial Intelligence के विविध आयामों और स्वरूपों पर काम किया जा रहा है। पूंजी के नए खिलाड़ियों के बीच रोबोटिक्स और मशीनी दुनिया के विस्तार को लेकर होड़ मची है। चैट जीपीटी, बार्ड सहित AI के कई मॉडल्स दुनिया को नये सिरे से गढ़ रहे है। विजुअल एआई (Visual AI), इंटरैक्टिव एआई (Interactive AI) हो, एनालिटिक एआई (Analytic AI) फंक्शनल एआई हो (Functional AI) के बढ़ते प्रयोग और प्रभाव ने विश्व के वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी और यहां तक की राजनीतिज्ञों को सतर्क कर दिया है जबकि मीडिया अछूता नहीं है।

बार्ड, चैट जीपीटी, क्‍विलबोट, अल्फाकोड, गिटहब, हाईपरराइट, सिंथेसिया, कोपायलट, स्टेबल डिफ्यूजन, मिडजर्नी जैसे बहुत सारे एआई प्रोग्राम ने मानों मीडिया प्लेटफॉर्म्स में क्रांति ला दी है। ये सारे ही ऐसे टूल्स हैं जिनकी ताकत हमें 2023 में ही दिखाई दी। उदाहरण वही मिडजर्नी है जिसने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप की गिरफ्तारी की फेक तस्वीरें पूरी दुनिया में फैला दीं। कमाल यह है कि इस तरह के एक नहीं कई एआई मॉडल्स आने वाले समय में मीडिया में दस्तक देने आ रहे हैं। डीप फेक का तिलस्म यहीं दुनिया के आगे बाधा खड़ी करेगा। देखा जाए तो वर्ष 2023 में एआई की चर्चा पूरी दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में होने वाले प्रभावों को लेकर रहीं। कई विमर्श रोजगार के संकट पर सिमटे तो कई डीप फेक, साइबर क्राइम और राजनीतिक प्रभाव व घटनाओं के मैनुप्लेशन को लेकर दर्ज हुई घटनाओं को लेकर।

इधर मैं तथ्यों के लंबे चौड़े हिस्सों पर ना जाते हुए बात केवल मीडिया में भी न्यूज मीडिया इंडस्ट्री पर एआई के प्रभावों की करूं तो आने वाले समय में भारतीय पत्रकारिता के सामने एआई दो बड़े संकट पैदा करेगा। पहला रोजगार का संकट तो दूसरा पत्रकारिता की नैतिकता और विश्सनीयता का संकट। पहले बात रोजगार के संकट की करें, तो विश्व की अलग-अलग एजेंसियां दावा करती रही हैं कि एआई से दुनियाभर में करोड़ों नौकरियां जाएंगी और इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। अलग-अलग क्षेत्रों, जैसे एजुकेशन, बैंकिंग, मैन्युफ्रैक्चरिंग, हेल्थकेयर में मोटा-मोटा आंकड़ा तकरीबन 8 करोड़ नौकरियां हैं, जो 2025 तक प्रभावित होंगी या कम हो चुकी होंगी जबकि इसके दूसरे छोर पर नए जॉब भी सृजित हो रहे होंगे।

इधर एआई से ज्यादा प्रभावित होने वाले सेक्टर में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से मीडिया भी शामिल है, मीडिया में भी न्यूज मीडिया के सामने अलग तरह की चुनौतियां होंगी। हालांकि मेरा निजी तौर पर मानना है कि परिवर्तनों से उपजे संकटों में समाधान की बात समानांतर रूप से चलती रही है। चुनौतियों के बीच विकल्प भी सामने आते रहे हैं, हालांकि न्यूज मीडिया के संदर्भ में आज हम ऐसे दौर में हैं जब इसी साल दुनिया का पहला पूरा का पूरा एआई बेस्ड चैनल न्यूज जीपीटी ही सामने आ गया। एक ऐसा चैनल जहां कोई रिपोर्टर काम नहीं करता। सारा काम एआई एल्गोरिदम से होता है। न्यूज सिलेक्शन से लेकर उसे पहुंचाने तक का काम एआई से हो रहा है। जाहिर है तब जबकि दुनिया की बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी वेबसाइट, अखबार व चैनल किसी ना किसी तरह से एआई का प्रयोग कर ही रहे हैं, ग्राफिक और वीडियो में इसका धड़ल्ले से उपयोग देखा जा रहा है।

दरअसल, यह उदाहरण भविष्य में हमारी अपनी दिशा और दशा तय करने के लिए पर्याप्त है। इस खबर की पृष्ठभूमि के बीच कि भारत में भी एक स्टार्टअप दुकान  ने अपने 90% स्टाफ को रिप्लेस कर एआई से काम कराना शुरू कर दिया। ऐसे में भविष्य के पहले संकट बेरोजगारी को तो आप आसानी से समझ सकते हैं। बरहाहल, कमाल यह भी है कि सभ्यतागत् विकास के ऐतिहासिक परिप्रेष्य में तकनीकी स्तर पर हुए परिवर्तनों में यह पहली बार है जब किसी तकनीक का सीधा टकराव मनुष्य की रचनात्मकता और मौलिकता से है और तकनीक उसमें जीतती नजर आ रही है। फोटोग्राफी, ग्राफिक्स, वीडियो, कान्टेंट, अनुवाद से लेकर रचनात्मक लेखन के हर हिस्से पर एआई की सीधी वक्र दृष्टि है।

लिहाजा पत्रकारों के सामने चुनौतियां नई भी हैं और बड़ी भी। मीडिया में 2023 में एआई की एंट्री से रोजगार के संकट के साथ ही बड़ा संकट पत्रकारिता में विश्वसनीयता और नैतिकता का बना है। इस समय हम प्रिडक्टिव एआई के बीच हैं लेकिन अंदाजा लगाएं कि जब एक्सपोनेंशियल ग्रोथ हासिल कर रहा यह टूल आगे बढ़ेगा तो क्या हेागा? आखिर जेनेरेटिव एआई आने वाले समय में पत्रकारों के सामने किस रूप में होगा? वर्तमान में हेडलाइन लगाने, कंटैंट में डेटा मदद और पैराग्राफ बनाने, संपादित करने वाला एआई आखिर किस स्वरूप में होगा? सोचिए जरा तब क्या होगा जब गूगल अपना AI Product Genesis सामने लाएगा।

वही जेनेसिस जिसकी इस साल मीडिया के गलियारों में पूरी दुनिया में चर्चा रही। बताते चलूं कि यह एक ऐसा प्रोडक्ट है जिसे डिजाइन ही पत्रकारों के लिए किया गया है। गूगल का एक ऐसा उत्पाद जो करेंट इंफॉर्मेशन को प्रोसेस कर न्यूज बना सकता है। दुनिया के बड़े मीडिया हाउस को लेकर गूगल इसकी तैयारी में है लिहाजा चुनौतियां पत्रकारिता की नैतिकता और विश्सनीयता से जुड़ी हैं। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि पत्रकारों के अनुभव, कुशलता, संवैधानिक मूल्यों की समझ, ग्राउंड रिपोर्टिंग का सच, सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति के संदर्भ में एक पत्रकार की कुशलता की तुलना दुनिया में किसी मशीन से नहीं हो सकती, उसमें भी सावैभौमिक सत्य मनुष्य के भीतर के उस विवेक और सत्य का जिससे बार-बार मनुष्यता के गुणों पर कसता है।

लेकिन फिर चुनौतियां तो हैं? फिर सवाल यह भी है कि भारतीय मीडिया अगर भविष्य में होने जा रहे परिवर्तनों को देख भी रहा है तो क्या उसके अनुसार खुद को ढालने, स्वयं को प्रशिक्षित करने और तालमेल बिठाकर पत्रकारिता के मूल्यों की रक्षा करने के लिए तैयार हो रहा है? और यदि तैयारी कर भी रहा है तो उसकी गति क्या उतनी ही तेज है जितनी सभ्यता के हर युग में तकनीक की रही है? फिलहाल तो यहां मीडिया का अगला मुकाबला कृत्रिम बुद्धिमता से है, जिसने सबसे पहले मनुष्य की रचनात्मकता और मौलिकता को ही चुनौती दी है जिसकी ग्रोथ कितनी फास्ट है उसे आप गूगल कर देख सकते हैं।

बहरहाल, भविष्य की चुनौतियों और संभावना के बीच समाचार4मीडिया और अपने पत्रकारिता के सभी साथियों को नववर्ष 2024 की शुभ और मंगलकामना।

(लेखक अमर उजाला डिजिटल में कार्यरत हैं और यह उनके निजी विचार हैं)


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