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'जन्मदिन पर याद करना बताता है, आज भी प्रासंगिक है राजेंद्र जी व मनोहर जी की पत्रकारिता'
भारतीय पत्रकारिता में राजेंद्र माथुर जी और मनोहर श्याम जोशी जी ने सैकड़ों पत्रकारों को तैयार किया और उन्हें लेखन के लिए व पत्रकारिता को नई दृष्टि देने के लिए प्रेरित किया।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago
भारतीय पत्रकारिता में राजेंद्र माथुर जी और मनोहर श्याम जोशी जी ने सैकड़ों पत्रकारों को तैयार किया और उन्हें लेखन के लिए व पत्रकारिता को नई दृष्टि देने के लिए प्रेरित किया, ताकि एक तरह से ऐसी फौज तैयार हो सके, जो अखबारों में या मीडिया के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके। एक भविष्य की पीढ़ी तैयार करने में राजेंद्र माथुर और मनोहर श्याम जोशी ऐसे दो संपादक रहे, जिनके साथ चूंकि मैंने भी काम किया है, इसलिए मैं विशेष रूप से उल्लेख कर रहा हूं, जिनकी वजह से बहुत लोगों ने पत्रकारिता की आचार संहिता को सीखा, समझा और उसे अपने काम में भी उपयोग में लाने की कोशिश की।
राजेंद्र माथुर जी का जन्मदिन 7 अगस्त को आता है और मनोहर श्याम जोशी जी का जन्मदिन 9 अगस्त को आता है। दोनों के बीच लगभग दो दिनों का अंतर का है। हिंदी पत्रकारिता में ही नहीं बल्कि भारतीय पत्रकारिता में भी उनसे लोग परिचित रहे हैं। मेरा हमेशा सुझाव रहा है कि हम अपने गुरु, अपने पूर्वजों का जब स्मरण करें तो ये जरूर याद करें कि क्या उन्होंने जो परम्परा बनायी, जो उन्होंने मानदंड स्थापित किए, उसका पालन हम लोग कर रहे हैं, या जो उनके बाद की पीढ़ी थी, उन्होंने इसे आगे बढ़ाया है।
हमारे बाद पत्रकारिता में जो लोग आए, वे इन दोनों को पढ़ करके, समझ करके, उनकी दिशा से उपयोग कैसे कर रहे हैं? खासकर इस समय एक ऐसा संक्रांतिकाल है, जब पत्रकारों की विश्वसनीयता को लेकर कहीं-कहीं प्रश्न उठते हैं। उनके पूर्वाग्रह को लेकर सवाल उठते हैं। पूरे मीडिया जगत पर एक अलग तरह का विभाजन सा भी दिखाई देता है। लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि पहले भी गड़बड़ रही है, आज भी यदि गड़बड़ है तो समाज के साथ, पूरी व्यवस्था के साथ उस गड़बड़ के बीच में पत्रकारिता में निश्चित रूप से कमियां हैं। हममें भी कमियां रही हैं। राजेंद्र माथुर जी और मनोहर श्याम जोशी जी जब भी मीटिंग करते थे, तो अपनी कमियों की चर्चा जरूर करते थे फिर चाहे वह किसी भी संस्थान में क्यों न रहे हों। वे चर्चा करते थे पत्रकारिता में क्या हो रहा है, उसकी समीक्षा करते समय वे कमियों को भी रेखांकित करते थे कि इसलिए कहना कि सबकुछ पहले अच्छा था और आज खराब है, ये सही नहीं है। इस दृष्टि से ये कहना कि कहां है ये वो पत्रकारिता, कहां है वो सब, सबकुछ नष्ट हो चुका है। ये निराशावादी कहने वाले मित्र भी हमारे हैं। हमसे वरिष्ठ भी हो सकते हैं, हमारे साथी भी हो सकते हैं, राजनीतिक में हो सकते हैं, कॉरपोरेट वर्ल्ड में हो सकते हैं, प्रबंधन में हो सकते हैं, जो कमियों को ज्यादा देखते हैं। उन्हें देखना चाहिए कि राजेंद्र माथुर के साथ ‘नईदुनिया’ या ‘नवभारत टाइम्स’ में ‘दिनमान टाइम्स’ के लिए भी वे नियमित कॉलम लिखते थे। उनके संबंध टाइम्स संस्थान में और भी अंग्रेजी पत्रकारों से भी रहे। और जब वे एडिटर गिल्ड्स में सचिव रहे या जब भी प्रेस कमिशन के समय में जो लोग उनके संपर्क में आए, देशभर में जब वे व्याख्यान देने जाते थे, तो लोग उनके संपर्क में आए।
इसी तरह मनोहर श्याम जोशी जी, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में रहे, ‘दिनमान’ में अंग्रेजी के साथ काम किया और इसके बाद एक साप्ताहिक में वर्षों तक संपादक रहे। दोनों संपादकों की विशेषता ये थी कि अंग्रेजी पर भी उनका उतना अधिकार रहा और इसीलिए राजेंद्र माथुर जी पूरी तरह से कभी अंग्रेजी पत्रकारिता में गए नहीं, पर ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ जैसे अखबारों के लिए लेख लिखे। गिरिलाल जैन और श्यामलाल जी जैसे संपादकों ने उनसे आग्रह करके लेख लिखवाए। लेकिन मनोहर श्याम जोशी के बारे में सबसे दिलचस्प बात ये रही कि हिंदी के साहित्यकार उन्हें ‘बुनियाद’ सीरियल या उसके पहले ‘हम लोग’ जैसे भारत का सोपेरा शुरू करने के लिए याद करते हैं। या फिर लोग उन्हें उन फिल्मों के लिए जिसमें उन्होंने लिखा, ‘नेता जी कहिन’ कॉलम और टेलीविजन के लिए लोग उन्हें ज्यादा याद करते हैं। सही बात ये है कि टेलीविजन में, आकाशवाणी में उन्होंने पत्रकारिता को एक दिशा देने में अहम भूमिका निभाई। राजनीतिक पत्रकारिता, साहित्यिक पत्रकारिता के लिए, सांस्कृतिक पत्रकारिता के लिए, सिनेमा, खेल कोई सा ऐसा क्षेत्र नहीं था, जिन पर इन दोनों संपादकों का अधिकार न रहा हो।
ये सही है कि राजेंद्र माथुर जी कभी फिल्मी-टेलीविजन की दुनिया में नहीं गए, जैसा जोशी जी को जाना पड़ा। वो मजबूरी या गलत कारण था जो कि ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ उनको छोड़ना पड़ा। लेकिन इसके बाद मनोहर श्याम जोशी जी ने मॉर्निंग नाम से कोई एक अखबार निकाला था, उसके बारे में जब मैं अपने अंग्रेजी के पत्रकार मित्रों से बात करता हूं तो वे कहते हैं कि उन्हें याद नहीं है कि ऐसा कोई अखबार निकला था। दरअसल, वो टैब्लॉयड था हिन्दुस्तान टाइम्स के साथ ही, पहला भारत का टैब्लॉयड अखबार था। बाद में वे उसे वीकेंड रिव्यू बनाया गया जैसा कि आप सभी जानते हैं ऐसे कई अखबार जब शुरू होते हैं तो अंग्रेजी के ही दूसरे अखबार से प्रतियोगिता करने लग जाते हैं। आज के समय में भी है। पर उस समय तो बिल्कुल ही नया था ये प्रयोग और ये काफी सफल भी था।
उस समय भारतीय जनता पार्टी की सरकार रही हो या फिर कांग्रेस की सरकार रही हो। उस समय इमरजेंसी के समय टैब्लॉयड अखबार निकालने जैसी हिम्मत मनोहर श्याम जोशी जैसे संपादक ही कर सकते थे। ऐसे ही राजेंद्र माथुर जी थे, उन्होंने ‘नईदुनिया’, इंदौर में रहकर जो पहचान बनाई और उसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर जो मान्यता स्वीकार्यता मिली, जो सम्मान मिला, वो अद्भुत है। उनके साथ जिन लोगों ने काम किया आज मैं नाम लेकर कह रहा हूं कि वे कई अखबारों में हैं, चाहे वो ‘नवभारत टाइम्स’ हो, चाहे वो ‘हिन्दुस्तान’ हो, ‘पत्रिका’ हो, ‘अमर उजाला’ हो, ‘लोकमत’ हो, ‘दैनिक भास्कर’ हो, ‘दैनिक जागरण’ हो यानी इस समय जितने देश के प्रमुख अखबार दिखाई दे रहे हैं, उनमें हैं। मध्य प्रदेश में तो कई अखबार ऐसे हैं, जो उस समय नहीं थे, वे बाद में आए और ऐसे लोग उनमें भी हैं। या फिर कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो लोग अपना अखबार निकालने लगे। जिन्हें राजेंद्र माथुर या मनोहर श्याम जोशी जी ने सिखाया था, जिन्होंने उनसे ट्रेनिंग ली थी, प्रूफ रीडिंग की, वे बाद में कहां से कहां पहुंच गए। यहां तक कि इनमें से तो कई लोग टेलीविजन के क्षेत्र में भी आ गए हैं।
राजेंद्र माथुर के जाने के बाद या मनोहर श्याम जोशी के न रहने पर उनके जन्मदिन पर उनको याद करना उसी तरह से है कि हम उस पत्रकारिता को कैसे फॉलो कर रहे हैं। मेरा मानना है कि हमारे खासकर हिंदी पत्रकारिता में जिन लोगों ने राजेंद्र माथुर और मनोहर श्याम जोशी जी जैसे लोगों के साथ में रहकर काम किया वे उसको आज भी निभा रहे हैं। उन अखबारों की शिकायतें न तो प्रेस परिषद आ पाती हैं और न ही अदालत जा पाती हैं, जिसके आधार पर ये कहा जा सके कि वो गैर जिम्मेदार पत्रकारिता कर रहे हैं। कई पत्रकार स्वतंत्र लेखन में गए और अब सोशल मीडिया में आ गए हैं। नईदुनिया से जुड़े लोग बाकायादा एक-दूसरे को वॉट्सऐप के जरिए सूचनाएं देते हैं। उन्होंने उनके ढंग से बताने की कोशिश करते हैं। राजेश बादल जी समाचार4मीडिया के लिए या अन्य संस्थानों के लिए लिखते रहते हैं। उनकी टिप्पणी से आप सहमत भी हो सकते हैं और असहमत भी, फिर चाहे वह मेरी टिप्पणी ही क्यों न हो। राजेंद्र माथुर और मनोहर श्याम जोशी जी की यही तो खूबी थी कि वे अपनी भी आलोचनाओं को स्वीकार करते थे, सुनते थे। यहां तक कि मनोहर श्याम जोशी जी के गुरु अज्ञेय जी भी राजेंद्र माथुर को अपने साथ जोड़ना चाहते थे। उस समय जब वे 1977 में ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादक बने, लेकिन अज्ञेय जी अपनी बातों को, असहमति को स्वीकार करते थे, सुनते थे। मैंने कभी उनके साथ काम नहीं किया। लेकिन कई बार उनके साथ संपर्क में रहने का, जब मैं जर्मनी में रेडियो में था, तो वे वहां भी आए, तो उन्होंने अपना कुछ लिखा, तो वे मुझे ही कहते थे कि इसमें आप को ऐसा कुछ लगे तो हटा सकते हैं, हालांकि ऐसा कुछ आवश्यकता नहीं होती थी। राजेंद्र माथुर और मनोहर श्याम जोशी दोनों ही अपना कुछ लिखने के बाद हम जैसे अपने साथी को देते थे, कि इसमें कुछ -छांट करना हो ता कर दीजिए, लेकिन कई बार लेख बहुत बड़ा होता था, लेकिन उसमें कांट छांट करने की जरूरत नहीं पड़ती थी। लेकिन पढ़ता कोई दूसरा व्यक्ति ही था।
पत्रकारों की एक लंबी फौज है, जो उनके मानदंडों को फॉलो करती है। अखबार में जहां मैंने भी कई वर्ष काम किया है, वहां भी कई ऐसे लोग हैं, जिन्होंने इन लोगों के साथ संपर्क में रहकर उनकी पत्रकारिता से काफी कुछ सीखा है। तो वो उन सीमाओं को ध्यान में रखते हैं। आज हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक शशि शेखर जी जिन्होंने भले ही उनके साथ काम न किया हो, लेकिन राजेंद्र माथुर की पत्रकारिता को वे मानदंड मानते हैं। उन्होंने राजेंद्र माथुर जी की पत्रकारिता को समझा है। इस समय जब निराशा का वातावरण है, तो बता देना चाहूंगा कि लोगों में आशावादिता जगाना भी उनकी पत्रकारिता का एक प्रमुख आधार था।
कहने का मतलब है कि डॉक्टर जिस तरह से आशा जगाता है, राजेंद्र माथुर जी और मनोहर श्याम जोशी जी ने मुझे तो कम से कम यही सिखाया और उन्होंने यह लिखा भी है। पत्रकारिता में हर युग में समस्याएं रही हैं। गणेश शंकर विद्यार्थी जी रहे हों या पराड़कर जी रहे हों। हमें आजादी से पहले की पत्रकारिता की तुलना नहीं करनी चाहिए। राजेंद्र माथुर जी का जन्मदिन सात अगस्त और मनोहर श्याम जोशी जी का जन्मदिन नौ अगस्त को पड़ता है और दोनों पर चर्चा करना मुझे हमेशा अच्छा लगता है। हमारे पुराने सहयोगी मधुसूदन आनंद जी ने भी राजेंद्र माथुर जी के साथ काम किया है। उन दोनों के साथ ऐसे तमाम लोग जुड़े जो विभिन्न शहरों और मीडिया संस्थानों में काम कर रहे हैं। राजेंद्र माथुर जी का मानना था कि आपकी लेखनी किसी के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं होनी चाहिए। ऐसा वे करते भी थे और इसके तमाम उदाहरण भी हैं। वह गलत को गलत व सही को सही बोलते व लिखते थे।
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