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वरिष्ठ पत्रकार निर्मलेंदु ने उठाया सवाल, मोहम्मद रफी को भारत रत्न से क्यों नहीं नवाजा गया?
रफी साब की आवाज अवामी अमानत है और मैं निर्मलेंदु खुशनसीब हूं कि मैं रफी साब सरीखी शख्सियत पर किताब लिखने की गुस्ताखी कर चुका हूं।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago
निर्मलेंदु साहा, वरिष्ठ पत्रकार ।।
रफी साब की आवाज अवामी अमानत है और मैं निर्मलेंदु खुशनसीब हूं कि मैं रफी साब सरीखी शख्सियत पर किताब लिखने की गुस्ताखी कर चुका हूं। यह किताब लगभग 2400 पेज की है। इस किताब को लिखने के पीछे मेरा उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ ये ही है कि रफी साब को भारत रत्न से क्यों नहीं नवाजा गया ?
पूरी दुनिया का दर्द समेट कर जब खुदा को यह समझ में नहीं आ रहा था कि इस दर्द को किसे सौंपूं, जो इस दर्द को महफूज रख सके। वह जो दूसरों के दर्द को हर सके, बांट सके और दुखी लोगों को कुछ देर के लिए सुकून पहुंचा सके, जो दूसरों के चेहरे पर हंसी ला सके, देश की हिफाजत के लिए लोगों को प्रेरित कर सके और मां बाप का गुणगान यह गीत गाकर कर सके कि ‘...ले लो ले लो दुआएं मां बाप की।‘ जो नेकी के रास्ते पर चलते हुए दूसरों को नेक सलाह दे सके और अपनी मीठी और करिश्माई आवाज से लोगों को दीवाना बना सके। ऐसे में उनकी नजर अचानक कोटला सुल्तान सिंह के उस सात साल के बच्चे पर पड़ी, जो कि एक फकीर के पीछे-पीछे जा रहा था। यह रोज का किस्सा था। फकीर गाता और वह बच्चा भी पीछे पीछे जाता और उस फकीर के गीतों को गुनगुनाता।
फकीर गाता और वह नन्हा गायक उसकी नकल करता। भगवान ने देखा कि उस बच्चे के रोने में भी एक कशिश थी। हंसता तो बहारें फूल बरसाने लगते। उन्होंने महसूस किया कि यह खुदा का नेक बंदा है और यही शख्स न केवल इस बोझ को ढो सकता है, बल्कि दूसरों के गमों को भी हर सकता है। बस क्या था, भगवान ने उस बच्चे की आवाज में उस दर्द को मिला दिया। धीरे-धीरे वह बच्चा बड़ा हुआ और एक दिन वह बच्चा मोहम्मद रफी के नाम से मशहूर हो गया। उन्होंने सही ही गाया था कि ‘...मुझको मेरे बाद जमाना ढूंढेग, दिल का सूना साज तराना ढूंढेगा।’ जी हां, उन्होंने सच ही कहा था, क्योंकि आज भी हम उनके गाये गीतों का आनंद उठाते रहते हैं।
किसी भी गायक के लिए दर्द भरे गीतों, जैसे- ‘टूटे हुए ख्वाबों में...’ या ‘आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले...’ को बेहद ही खुशनुमा अंदाज में गाना संभव ही नहीं है, लेकिन रफी साब की बात ही निराली है। दरअसल, 1950 के बाद राग रागीनियों से खेलना, जैसे- ‘मधुबन में राधिका नाचे रे...’ ‘रंग और नूर की बारात किसे पेश करूं...’, ‘तुम जो मिल गये हो तो ऐसा लगता है...’, ‘जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा...’; ‘वादियां मेरा दामन...’ आदि गीतों को गाना उनके लिए नयी बात नहीं थी। उनके लिए पचास और साठ के दशक में इस तरह का गायन एक तरह का खेल हो गया था। एक सच तो ये भी है कि ईश्वर ने उन्हें बेस्ट वॉयस क्वॉलिटी और क्रिस्टल क्लियर सुर बतौर पैदाइशी तोहफे में दे रखी थी।
शास्त्रीय गायन, जैसे- ‘राधिके तूने बंसरी चुराई बंसरी चुराई क्या...’; ‘मधुबन में राधिका नाचे रे…’ में भी वह निपुण थे। शायद यही वजह है कि वह कोई भी गाना आसानी से गा लेते थे, चाहे वह हाई स्केल का गीत ‘मन तड़पत हरि दर्शन को...’ हो या लो स्केल का गीत ‘कोई सागर दिल को बहलाता नहीं...’ दोनों रेंज में वह माहिर थे। विदाई गीत में भी वह माहिर थे, जैसे- ‘बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले।’
जिनकी आवाज को भगवान की आवाज कहा जाता है, जिस आवाज का जमाना दीवाना है, उस आवाज के बारे में कुछ भी कहना सूरज को दीया दिखाने के बराबर ही है। के एल सहगल, जिन्हें पार्श्व गायकों में भीष्म पितामह माना जाता है, उन्होंने रफी साब को आशीर्वाद देते हुए कभी कहा था, ‘तू एक दिन बहुत बड़ा गायक बनेगा।‘ हां, उनकी बात सच साबित हुई है।
ए आर रहमान ने रफी साब के बारे में एक सवाल के जवाब में यही कहा था कि रफी साब की आवाज उस दौर की रूह है। आत्मा है। उस दौर का मतलब है, 50, 60 और 70 का दशक। दरअसल, इस दौर में हमारे दिमाग में रफी साब की आवाज जब भजन के रूप में गूंजती है और जब वे गाते हैं- ‘सुख के सब साथी, दुख में न कोय...’ तब सुबह-सुबह मन खुशी के मारे झूमने लगता इै। हम सब जानते हैं कि इंसान अपने काम से और अपने फन से जिंदा रहता है और इसीलिए यह दावे के साथ हम कह सकते हैं कि रफी साब भी कयामत तक जिंदा रहेंगे, क्योंकि उन्हें सुनने वाले लोग आज भी जिंदा हैं। अगर यह कहें कि हीरा खो गया है, तो शायद गलत नहीं होगा, क्योंकि वह बहत दूर से इस पृथ्वी पर आये और इस गीत को गाकर चले गये ‘...बड़ी दूर से आये हैं, प्यार का तोहफा लाये हैं’ जी हां, इसमें कोई दो राय नहीं कि वे बड़ी दूर से आये हैं और बड़ी दूर चले भी गये हैं। दरअसल, गीता में ये ही कहा गया है कि ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।’
अर्थात... कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फलों में कभी नहीं और शायद इसीलिए रफी साब भी कर्म करने में ही विश्वास करते थे। ना काहू से शत्रुता और न ही किसी से दोस्ती। रात में भी यदि उन्हें रिकॉर्डिंग के लिए बुलाया जाता, तो वे कभी किसी को मना नहीं करते थे। दरअसल, कर्म के इसी सिद्धांत पर जब वे चलते रहे, तो उनसे इसी तरह के गीत गवाये जाते कि ‘जहां डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा, वह भारत देश है मेरा…’
रफी साब की तारीफ तो सब करते हैं, लेकिन उन्हें भारत रत्न दिलाने की मुहिम कोई नहीं छेड़ता। ऐसे में हम सभी रफियन का, यानी रफी साब के भक्तों का ये ही परम कर्तव्य बन जाता है कि हम सब मिलकर एक मिशन के तहत भारत सरकार खासकर राष्ट्रपति और मोदी जी को पत्र जरूर लिखें कि रफी साब को भारत रत्न से नवाज जाए। दरअसल, मेरी समझ से यही रफी साब के चाहने वालों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी। हम सब रफियन उन्हें भारत रत्न दिलवाने के लिए इंतजार करेंगे कयामत तक... जी हां, हम इतजार करेंगे कयामत तक।
एक कटु सच यह भी है कि भारत में भारत रत्न के लिए जो लोग विशेष होते हैं, उन्हें भारत रत्न जल्दी मिल जाता है, जो कि भारत रत्न कितने लोगों को मिला, अब तक की लिस्ट देखकर आसानी से समझ में आ जाएगा। इसलिए मेरा मानना ये ही है कि सुर के सरताज और सुर सम्राट मोहम्मद रफी साब को भारत रत्न मिलना ही चाहिए।
दरअसल, मुकेशजी, रफीजी और किशोरदा ये वे नाम हैं, जिन्होंने हिंदुस्तान के संगीत को एक नयी उंचाई दी, जो कि हमारी कल्पना से परे है। मुकेश ‘दोस्त दोस्त न रहा…’ और ‘जीना यहां मरना यहां...’ गा कर अमर हो गये। किशोर कुमार ने राजेश खन्ना से दोस्ती गाठ ली और हिट हो गये- ‘मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू…’ गाकर। ये गीत इनके गाने उनके जमाने के ही नहीं, बल्कि आज के जमाने के गानों को भी टक्कर देते हैं। आज भी अगर कोई मजनूं गम में होता है, तो सबसे पहले इनके गाने ही सुनते हैं। इन तीनो ने एक से बढ़कर एक गाने गाये हैं। इन तीनो में से किसी एक का नाम लेना मतलब बाकी कलाकारों की कलाकारी पर सवाल उठाने के समान होगा और इसीलिए इनकी गायन शैली पर शक करने की हममें हिम्मत ही नहीं है।
अब सवाल ये भी उठता है कि रफी साब बड़े गायक थे अथवा लता दीदी, किशोर कुमार, मुकेश या कोई अन्य। हालांकि इस विषय पर लोगों की अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन इस बात पर शायद ही कोई विवाद हो कि गायकों में तो क्या, सम्पूर्ण फिल्मी हस्तियों में साम्प्रदायिक सद्भाव, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय अखंडता का सबसे बड़ा प्रतीक अगर कोई है, तो वह हैं मोहम्मद रफी। इन दो गीतों ने ‘जहां डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा...’ और ‘तू हिंदू बनेगा ना मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा…’ यह साबित कर दिया था कि रफी साब हैं। लेकिन दुख तो इस बात का है कि धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करनेवाली सरकार और साम्प्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देने का दावा करने वाले राजनीतिक दलों एवं सरकारी-गैर सरकारी संगठनों ने इस इंसान की खुलेआम अनदेखी कर दी। इन सियासतदां लोगों से एक सवाल पूछने का मन करता है कि साम्प्रदायिक एकता एवं धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक के रूप में उनके पास कौन-कौन से नाम हैं और क्या रफी साब का योगदान एवं भारतीय जनमानस पर उनका प्रभाव अन्य नामों से किसी तरह से कम है और अगर ऐसा नहीं है, तो आखिर हर गली, हर चौराहे, हर संस्थान एवं हर प्रतिष्ठान को किसी-न-किसी के नाम से जोड़ देनेवाले इस देश में कोई स्मारक, कोई पुस्तकालय या कोई संस्थान मोहम्मद रफी के नाम से स्थापित करने के बारे में किसी भी सरकार ने अभी तक पहल क्यों नहीं की? केवल इसलिए, क्योंकि वे...
रफी साब ने अपने जीवन में कुल कितने गाने गाये, इस पर आज भी विवाद है। 1970 के दशक में गिनीज बुक आफ विश्व रेकॉर्ड्स ने लिखा कि सबसे अधिक गाने रिकॉर्ड करने का श्रेय लता मंगेशकर को प्राप्त है, जिन्होंने कुल 25 हजार गाने रिकॉर्ड गाये हैं। रफी साब ने इसका खंडन करते हुए गिनीज बुक को एक चिट्ठी लिखी। इसके बाद के संस्करणों में गिनीज बुक ने दोनों गायकों के दावे साथ-साथ प्रदर्शित किये और मुहम्मद रफी को 1944 और 1980 के बीच 28 हजार गाने रिकॉर्ड करने का श्रेय दिया गया। मतलब ये ही हुआ कि रफी साब ने 26000 गीत गाने का क्लेम किया, लेकिन गिनीज बुक ने 28000 गाने रफी साब के नाम रिकॉर्ड हुए हैं... ऐसा लिख कर जवाब दिया। यानी दो हजार ज्यादा गाने रफी साब ने गाये। इसके बाद हुई खोज में विश्वास नेरुरकर ने पाया कि लता दीदी ने वास्तव में 1989 तक केवल 5,044 गाने गाये थे। वैसे कुछ और शोधकर्ताओं ने भी इस तथ्य को सही माना है।
हालांकि वेटरन राइटर राजू भारतन ने पाया कि 1948 और 1987 के बीच केवल 35 हजार हिन्दी गाने रिकॉर्ड हुए थे। ऐसे में रफी ने 26 हजार गाने गाये, इस बात पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन कुछ स्रोत अब भी इस संख्या को उद्धृत करते हैं। इस शोध के बाद 1992 में गिनीज बुक ने गायन का उपरोक्त रिकॉर्ड ही बुक से निकाल दिया।
भारत रत्न का मतलब क्या है, उससे रूबरू होते हैं। भारत रत्न, भारत सरकार की ओर से 1954 में संस्थापित भारत रत्न देश के सर्वोच्च और प्रतिष्ठित नागरिक पुरस्कारों में से एक है। इस पुरस्कार की प्रधानता में गिनती सातवें स्थान पर की जाती है। इस पुरस्कार को देश के विशेष सेवा क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रदान किया जाता है। भारत रत्न योग्यता पर आधारित पुरस्कार है और यह पुरस्कार विजेताओं को पद, जाति, लिंग या व्यवसाय जैसे किसी भी भेदभाव के बिना प्रदान किया जाता है। ये ही कानून है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस कानून का पालन हो रहा है?
भारत रत्न योग्यता पर आधारित पुरस्कार है और यह पुरस्कार विजेताओं को पद, जाति, लिंग या व्यवसाय जैसे किसी भी भेदभाव के बिना प्रदान किया जाता है। ये ही कानून है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस कानून का पालन हो रहा है?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
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