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हिंदी को व्यावसायिक बनाती इलेक्ट्रॉनिक मीडिया
एक धारणा के मुताबिक अंग्रेजी को ही व्यवसाय की भाषा कहा जाता है। वैश्वीकरण के दौर में जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने व्यवसाय को विस्तार दिया है
समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago
आलोक राजा
एक धारणा के मुताबिक अंग्रेजी को ही व्यवसाय की भाषा कहा जाता है। वैश्वीकरण के दौर में जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने व्यवसाय को विस्तार दिया है, वहीं अंग्रेजी की महत्वता को और अधिक बल मिला है। परन्तु हमारे देश की अर्थव्यवस्था में एंटरटेनमेंट और मीडिया ने हिंदी को नई दिशा देकर व्यापारिक बनाने में खासी भूमिका अदा की है। हिंदी को किताबी साहित्य से बाहर निकालकर उसे बाजार की भाषा बनाने में अगर सबसे बड़ा योगदान किसी का है तो वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का है।
यह सवाल हिंदी साहित्यकारों एवं लेखकों के बीच में काफी चर्चित रहता है कि क्यों हिंदी के पाठकों में बढ़ोत्तरी अंग्रेजी के पाठकों की तरह नहीं होती है? लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जहां एक तरफ हिंदी भाषा को सरल, सहज एवं आम-जन की भाषा बनाकर परोसा है, वहीँ दूसरी तरफ लोगों को हिंदी पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया है। ऐसे में हिंदी की दुनिया को दुनिया के सामने बेहतर तरीके से प्रस्तुत करने में भी मदद मिली है। हिंदी धारावाहिक, हिंदी फिल्मों और हिंदी की किताबों को चर्चित करने के लिए भी आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मार्केटिंग इफैक्ट को हम इस तरह समझ सकते हैं कि बॉलीवुड की फिल्में भी बड़े पर्दे पर उतरने से पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से प्रमोशन करती हैं।
विदित है कि कोई भाषा केवल उसी स्थिति में विस्तार प्राप्त कर पाती है जब उसे व्यावसायिक बनाया जा सके और जब उस भाषा में रोजगार की संभावनाएं पैदा हो सकें। अगर किसी भाषा में आर्थिक गतिविधि कर पाना संभव न हो तो ऐसी भाषा सिर्फ एक संकुल तक सिमट कर ही रह जाती है और सिर्फ भावनाओं के सम्प्रेषण तक ही उसे सीमित रह जाना पड़ता है। आज जब हम संस्कृत भाषा की बात करते हैं तो भले ही संस्कृत को संस्कृति की भाषा कहा जाता हो लेकिन व्यवसायीकरण के दौर में संस्कृत आमजन की भाषा नहीं बन पायी है जिसका बहुत बड़ा कारण इसका व्यावसायिक न हो पाना है।
वहीँ अंग्रेजी, फ्रेंच और जर्मन जैसी भाषाओँ को विश्व में खासी अहमियत मिली है क्योंकि ये भाषाएं आर्थिक रूप से संपन्न देशों की भाषाएं हैं। लेकिन हिंदी को व्यवसाय की भाषा बना पाना संभव है। जिस तरह आज मीडिया में हिंदी का प्रयोग किया जाता है और उसे चमक दमक वाली भाषा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है उससे वह बाजार की भाषा बनने में काफी हद तक सफल हुई है। हिंदी के साहित्यकार ऐसा मानते हों कि आधुनिक हिंदी को बाजार ने तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया है। इस तथ्य में भले ही सच्चाई हो, लेकिन हमें यह समझना पड़ेगा कि बहु-भाषीय देश भारत में किसी भी क्लिष्ट भाषा को बाजार की भाषा नहीं बनाया जा सकता है। बाजार की भाषा बनाने के लिए भाषा का सहज, सरल और आम होना बेहद जरूरी होता है और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने हिंदी को आम व सरल रूप में प्रस्तुत किया है।
इसी का ही परिणाम है की आज बड़े अंग्रेजी के चैनल भी अपने दर्शकों की संख्या बढ़ाने के लिए हिंदी में उतर रहे हैं। यहां तक कि हॉलीवुड की फिल्मों को हिंदी में डब किया जाने लगा है। हमारे देश में हिंदी को विस्तार इस कदर मिल चुका है कि राजनीति की भाषा के रूप में हिंदी अब पूरी तरह स्थापित हो चुकी है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदी के पत्रकारों को रेमैन मेग्सेसे अवॉर्ड भी मिलने लगे हैं। यानि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस योगदान को सराहा जाना चाहिए की इसने हिंदी के व्यावसायिक रूप को गढ़ने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई है।
(लेखक, ‘भारत समाचार’ न्यूज चैनल में सीनियर एंकर के तौर पर कार्यरत हैं और यह उनके निजी विचार हैं)
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