‘यह केवल मेरा नहीं, हिंदी भाषा से जुड़े अनेक लोगों का दर्द है’

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी क्या अप्रसन्न होंगे? बात उनकी सरकार और व्यवस्था की है। हां, उनके वरिष्ठ सहयोगियों के पास यह जानकारी नहीं होने से कुछ नाराजगी होगी।

आलोक मेहता by
Published - Monday, 14 September, 2020
Last Modified:
Monday, 14 September, 2020
Hindi Diwas

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी क्या अप्रसन्न होंगे? बात उनकी सरकार और व्यवस्था की है। हां, उनके वरिष्ठ सहयोगियों के पास यह जानकारी नहीं होने से कुछ नाराजगी होगी। फिर भी, पूरा विश्वास है कि किसी भी माध्यम से उन्हें इस तथ्य की जानकारी मिलने पर वह चिंता के साथ बदलाव के लिए कोई उपयुक्त निर्देश दे सकते हैं। उन्होंने अपने सत्ता काल में कई क्रांतिकारी कदम उठाए हैं, फिर यह तो छोटा सा सुधार है। लेकिन भारत माता की राष्ट्रभाषा की प्रतिष्ठा और उसकी मान्यता से जुड़ा कार्य है। यही नहीं, इससे उनकी और सरकार की योजनाओं, कार्यक्रमों और बातों को करोड़ों हिंदीभाषियों को सही रूप में पहुंचाने में सहायता मिलेगी। यदि सरकार में बैठे कोई मंत्री, पार्टी के नेता और खासकर अफसर नाराज हों, तो मुझे कोपभाजन बनने की चिंता नहीं है।

अवसर भी है-सरकार के वर्षों से चलाए जा रहे हिंदी दिवस (14 सितंबर)-हिंदी सप्ताह-हिंदी पखवाड़े का। कोविड काल में अधिक सार्वजनिक कार्यक्रम भी नहीं होंगे। विज्ञापन, बोर्ड, बैनर, यात्रा और खान-पान आदि के सरकारी खर्च भी शायद कम होंगे, लेकिन डिजिटल युग में एक बार फिर हिंदी के गौरव, संस्कृति, विश्वव्यापी प्रसार पर बोला, लिखा, पढ़ा जाएगा, इसलिए पहले थोड़ी कड़वी बात। ऐसा नहीं है कि इस 'महामारी काल के एकांतवास' दौर के कारण मैं सरकारी तंत्र पर अपनी भड़ास निकाल रहा हूं। सरकार और पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि संवाददाता और संपादक रहते पिछले करीब तीस-पैंतीस वर्षों से समय-समय पर खुद या अपने सहयोगी के माध्यम से यह मुद्दा उठाता रहा हूं। आप इस लंबी भूमिका के लिए क्षमा करें, क्योंकि यह केवल मेरा निजी नहीं, हिंदी भाषा से जुड़े अनेकानेक लोगों का दर्द है।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि भारत के सबसे बड़े सूचना तंत्र-आकाशवाणी से करोड़ों लोगों तक पहुंचने वाले अधिकतम (बचाव के के लिए 99 प्रतिशत समझ लें) समाचार पहले अंग्रेजी में तैयार होते हैं और फिर हिंदी में अनुवाद के बाद प्रसारित होते हैं। प्रधानमंत्री के भाषण ही नहीं, ‘मन की बात’ की खबर पहले अंग्रेजी में बनती है और फिर उसका अनुवाद हिंदी समाचार उद्घोषक को थमाया जाता है। यह तो दुनिया जानती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवश्यक होने पर ही अंग्रेजी में बोलते हैं। ‘मन की बात’ के अलावा भी भारत के सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिंदी में भाषण देते हैं, बातचीत करते हैं। हिंदीतर राज्यों में भारतीय भाषा के कुछ वाक्यों के बाद किसी सहयोगी से स्थानीय भाषा में अनुवाद की व्यवस्था करवा देते हैं। फिर भी ऐसा सरकारी शिकंजा क्यों है कि उनकी बात खबर के रूप में अंग्रेजी से अनुवाद के बात जनता जनार्दन तक पहुंचाई जाए?

यह भी माना जा सकता है कि आकाशवाणी वाले अच्छे योग्य अनुवादक से भी यह काम करवाते हों। मुझे पूर्णकलिक अथवा दैनिक भुगतान पर काम करने वालों को कोई नुकसान पहुंचाने की भी इच्छा नहीं है। फिर मित्र सूचना प्रसारण मंत्री यह भी कह सकते हैं कि आकाशवाणी-दूरदर्शन स्वायत्त प्रसार भारती के अंतर्गत हैं। मेरा निवेदन है कि संसद में उत्तर तो आप या प्रधानमंत्री को ही देना होता है। प्रसार भारती का खर्च सरकार और संसद से स्वीकृत होता है। फिर हिंदी में कही गई बात को मूल रूप में पहुंचाने पर कोई हस्तक्षेप कैसे कहेगा? समस्या यह है कि आकाशवाणी में भी शीर्ष पद पर कई आईएएस अधिकारी आते रहे हैं और उन्हें अपनी सुविधा के लिए अंग्रेजी जरूरी लगती है।

आकाशवाणी में अथवा ऐसे किसी भी संस्थान में सूचना-समाचारों के आदान-प्रदान के लिए व्यवस्था रहती है। आकाशवाणी के समाचार विभाग में इसे ‘समाचार पूल’ कहा जाता है। दशकों से इसमें अंग्रेजी का वर्चस्व रहा, क्योंकि हिंदी के साथ अन्य भाषाओँ में भी अनुवाद होते हैं। हम जैसे पत्रकारों के लिखने या आकाशवाणी में भी रहे कई श्रेष्ठ हिंदीभाषी लोगों के आग्रह पर 1993 के आस-पास अलग से ‘हिंदी समाचार पूल’ भी बना, ताकि अंग्रेजी से अधिक मूल भाषा में काम हो। रिकॉर्ड में कहने को यह आज भी है, लेकिन व्यवहार में दूसरे दर्जे वाली स्थिति है।

2014 से पहले मनमोहन राज में तो बेचारी हिंदी की कोई परवाह नहीं हो पाई। उन्हें कभी-कभार मजबूरी में हिंदी का भाषण उर्दू या गुरुमुखी लिपि में लिखवाकर पढ़ना पड़ता था। उनके सत्ता काल में मैंने एक वरिष्ठ संवाददाता से आकाशवाणी की इसी व्यवस्था पर पूरी छानबीन के बाद रिपोर्ट बनवाकर छापी। किसी हिंदी प्रेमी की लिखापढ़ी पर मंत्रालय से आकाशवाणी तक फाइल चली और महीनों बाद इस उत्तर के साथ बंद कर दी गई कि खबर अपुष्ट होगी। ऐसा कुछ नहीं है। अब इस पर कोई सीबीआई जांच की मांग करने से रहा। अब भाजपा की सरकार का दूसरा कार्यकाल आ गया और नई शिक्षा नीति में हिंदी और भारतीय भाषाओँ के महत्व को प्राथमिकता मिलने से हमें खुशी हुई है। इसलिए मुझे प्रसारण क्षेत्र की ताजी स्थिति पता करने की इच्छा हुई तो पता चला 73 साल में यह डिब्बा वहीँ अटका है। यह भी याद दिलाना ठीक होगा कि भारत के इसी प्रसारण तंत्र से अज्ञेय, मनोहर श्याम जोशी सहित दिग्गज साहित्यकार, कवि जुड़े रहे हैं। उनका हिंदी-अंग्रेजी दोनों पर अधिकार था और उनके मूल रूप में लिखे पर कोई अधिकारी उंगली नहीं उठा सकता था।

बहरहाल, अब पराकाष्ठा यह है कि महत्वपूर्ण अवसरों पर देश-विदेश में दिए गए भाषण के समाचार के लिए अंग्रेजी पर निर्भरता है। अकेले आकाशवाणी की ही नहीं, कई मंत्रालयों, सार्वजनिक संस्थानों में यही व्यवस्था है। आप कह सकते हैं कि निजी समाचार संस्थानों में भी ऐसा रहा या आज भी होगा। लेकिन, राष्ट्र भाषा के लिए सरकारी तंत्र में सुधार की बात क्यों नहीं सोची जाती। अनुवाद का आलम यह है कि सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत बजट की हिंदी प्रति उपलब्ध करना अनिवार्य है। गोपनीयता के कारण हिंदी की प्रति बजट भाषण के बाद दी जाती है। यदि किसी महानतम हिंदी संपादक, पत्रकार, लेखक को केवल हिंदी की प्रति देकर खबर और टिप्पणी लिखने को दे दी जाए, तो वह पसीने-पसीने हो जाएगा, क्योंकि अनुवाद की जटिलता में वह समझ ही नहीं सकेगा। अब भी सरकारी तंत्र में आर्थिक विषयों के हिंदी समाचार में हर पंक्ति के लिए हिंदी के ही शब्द कोष से अर्थ समझाना होगा। इसीलिए आकाशवाणी हो या अखबार-पत्रिका या टीवी चैनल, साथ में अंग्रेजी की प्रति रखकर सरल भाषा में जनता तक पहुंचाने का प्रयास होता है |

भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय में भी लगभग यही स्थिति वर्षों से है। एक समय था, जब संवाददताता किसी सूचना अधिकारी या प्रमुख अधिकारी से संपर्क कर भाषण की प्रति मांग लेते थे। डिजिटल युग में तो सूचना केंद्र के सबसे निचले स्तर के बाबू साहब या साहिबा किसी संवाददाता या संपादक के फोन पर भी सीधा जवाब देते हैं-आपको वेबसाइट देखना नहीं आता हो तो कहीं से सीखिए। वहां जो सामग्री हो, उसको ले लीजिये। इतना बड़ा तमाचा उस दफ्तर में हमें आपातकाल में भी नहीं लगा, इसलिए वहां शिकायत कौन सुनेगा?  कोरोना काल नहीं, यह पिछले वर्षों के अनुभव हैं। मोदी राज में संयुक्त राष्ट्र संगठन में कम से कम संक्षिप्त सूचनाएं हिंदी अनुदित मिलने का इंतजाम हो गया।  भारत में यूरोप, अमेरिका, जापान जैसे देश या उनकी कंपनियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आने के बाद हिंदी में सामग्री देने के प्रयास करने लगी हैं, लेकिन भारत सरकार के अफसर और बाबू आज भी अंग्रेजी के चरणों में नतमस्तक है। आशा तो बनी रहनी चाहिए कि देर-सवेर देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या उनकी सरकार द्वारा मूलतः हिंदी में कही गई बातें अंग्रेजी की झूठन बनाकर नहीं प्रसारित-प्रचारित की जाएगी। हिंदी सप्ताह-पखवाड़ा बंद कर,  वर्ष का हर दिन हिंदी और भारतीय भाषा का समझने की शुभकामनाएं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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यह असाधारण नहीं, बल्कि भीषण और भयावह है। आजादी के बाद सबसे बड़ी आफत और आपदा।

राजेश बादल by
Published - Thursday, 22 April, 2021
Last Modified:
Thursday, 22 April, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

यह असाधारण नहीं, बल्कि भीषण और भयावह है। आजादी के बाद सबसे बड़ी आफत और आपदा। पैंतालीस साल की पत्रकारिता में मैंने कभी नहीं देखा। चंद रोज पहले अपने जमाने के मशहूर संपादक रहे कमल दीक्षित ने मुझसे कहा था-साठ साल की पत्रकारिता में ऐसी घड़ी नहीं आई। दीक्षित जी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन कोई बीस साल से उन्होंने सरोकारों की पत्रकारिता करने के लिए मूल्यानुगत मीडिया के जरिये आंदोलन छेड़ दिया था। इस लोक से विदा होने के कुछ दिन पहले उदयपुर से फोन पर उन्होंने एक मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था, ‘कभी अवसर आए तो देश में प्रेस क्लबों की अवधारणा पर बहस छेड़ना।’ मैंने हामी भरी थी।

वाकई एक वाजिब सवाल है। इस देश में करीब-करीब प्रत्येक जिले में एक या दो प्रेस क्लब अस्तित्व में हैं। वे साल भर क्या करते हैं? किसी दिग्गज पत्रकार का निधन हो जाए तो शोकसभा करना, शहर में कोई वीआईपी आ जाए तो उसे चाय पर बुला कर मीट द प्रेस कर लेना और फुर्सत मिल जाए तो आपस में बैठकर चुनाव के नाम पर पदों को बांट लेना। इसके अलावा सारे देश में तो नहीं, लेकिन दिल्ली-मुंबई और कुछ प्रदेशों की राजधानियों में अपने भवन बनाकर बार और रेस्टोरेंट का लाइसेंस लेकर शाम की महफिलें आयोजित करना भी उनका एक कर्तव्य है। दिल्ली में तो एक पत्रिका भी क्लब प्रकाशित करता है, जो एक रचनात्मक पहल है। कुछ अन्य गतिविधियां भी इस क्लब ने आयोजित की हैं।

तो प्रेस क्लब और क्या करें और क्यों करें? क्या सोच विचार के स्तर पर भी उनकी कोई राष्ट्रीय,राजनीतिक अथवा सामाजिक भूमिका होनी चाहिए? इस मसले पर विद्वान पत्रकारों और संपादकों के बीच दो तरह के मत हैं। एक धारा कहती है कि ये क्लब हैं, इसलिए वे शहर के अन्य क्लबों की तरह ही चलते रहने चाहिए। उनमें पत्रकारिता के सरोकार, मूल्य, विचार, अधिकार और अभिव्यक्ति के लिए संघर्ष करने जैसे उपक्रमों के लिए कोई स्थान नहीं रहना चाहिए। दूसरी धारा कहती है कि अगर इन्हें किसी बार-रेस्टोरेंट या आम क्लबों के ढर्रे पर ही चलाना है तो फिर उनके होने का अर्थ ही क्या है? पत्रकार किसी भी क्लब की मेंबरशिप ले सकते हैं। बिना वैचारिक आधार के ऐसे किसी भी संगठन का कोई औचित्य नहीं है।

मैं इस मामले में दूसरी धारा के प्रवाह में शामिल होना चाहूंगा। अभिव्यक्ति भारत के हर नागरिक का संवैधानिक हक है। पत्रकारिता के संदर्भ में आप उसे इस पेशे की रीढ़ कह सकते हैं। देश-दुनिया के लिए संवेदनशील और सजग पत्रकारिता की सजग हाजिरी बेहद जरूरी है। इस नाते प्रेस क्लबों को आप इससे अलग करके नहीं देख सकते। क्या कोई पत्रकार कह सकता है कि किसी भी प्रेस क्लब को कोरोना के इस त्रासद दौर में अपने सोच की पुड़िया बनाकर रख देनी चाहिए। माफ कीजिए। इस नाते हिंदुस्तान का कोई प्रेस क्लब कोविड काल में अपनी भूमिका के साथ न्याय नहीं कर पाया है। आग के शोलों के बीच जलते हुए आप उस तपिश को बीयर या शराब के ग्लास से शांत नहीं कर सकते। आपको अपना सर्वश्रेष्ठ देना होगा। उस समाज को, जिससे आपने बहुत कुछ पाया है। कृपया अपनी जिम्मेदारी तलाश कीजिए मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

अवसाद की खबरों में आशा की भाषा कहां है मिस्टर मीडिया?

आत्मघाती पत्रकारिता से बचने का उपाय तत्काल खोजना आवश्यक है मिस्टर मीडिया!

भारतीय संसदीय पत्रकारिता के नजरिये से यह एक बड़ा नुकसान है मिस्टर मीडिया!

भारतीय पत्रकारिता को यह तथ्य समझने की आवश्यकता है मिस्टर मीडिया!

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एक सामाजिक नायक का अदृश्य होना

वह तीन महीने पहले जनवरी की एक ठंडी रात थी। हम लोग आदिवासी इलाकों में कोरोना का दुष्प्रभाव और सामुदायिक भाव से उसके मुकाबले पर दो डॉक्युमेंट्री बनाने के लिए

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Thursday, 22 April, 2021
SOCIALWORKER66

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

अलविदा यूसुफ भाई !

वह तीन महीने पहले जनवरी की एक ठंडी रात थी। हम लोग आदिवासी इलाकों में कोरोना का दुष्प्रभाव और सामुदायिक भाव से उसके मुकाबले पर दो डॉक्युमेंट्री बनाने के लिए मध्यप्रदेश वाले बुंदेलखंड के पिछड़े जिले पन्ना जा रहे थे। विकास संवाद के सौजन्य से युसूफ भाई और उनकी टीम से संपर्क हुआ था। युसूफ भाई पच्चीस-तीस साल से इस बेहद गरीब इलाके में लोगों के उत्थान के लिए काम कर रहे थे। रात बारह साढ़े बारह बजे दमोह से पन्ना के रास्ते में घने जंगल में हम रास्ता भटक गए। वह नेशनल पार्क का क्षेत्र था। युसूफ भाई को फोन किया। उन्होंने पूछा, कोई भी आसपास का पहचान का चिह्न बताइए। वहीं एक बोर्ड मिला। उस पर कुछ लिखा था। हमने वह बता दिया। फिर क्या था यूसुफ भाई ने अनुमान लगा लिया और तब तक फोन पर ही रास्ता बताते रहे, जब तक पन्ना नहीं आ गया। हम उनके भौगोलिक ज्ञान पर हैरान थे। होटल पर यूसुफ भाई और उनकी पूरी टीम खड़ी थी। गरमा गरम भोजन और गरम दूध। रात एक बजे वह भी पन्ना जैसे जिले में। बहरहाल हम फिर तीन बजे तक अगले दिन फिल्म शूट करने पर काम करते रहे।

सुबह सुबह यूसुफ भाई और उनके साथी होटल में थे। हम कोटा-गुंजापुर गांव जा रहे थे। नेशनल पार्क में घने जंगलों के बीच बसा था गांव। जब कोरोना के कारण लॉकडाउन लगा तो सैकड़ों गांव सारे संसार से कट गए थे। यह गांव भी उनमें से एक था। युसूफ भाई यहां कुपोषित बच्चों को स्वस्थ्य बनाने के लिए विकास संवाद के दस्तक मिशन के जरिए पहले से ही काम कर रहे थे। लेकिन कोरोना ने गांव से सब कुछ छीन लिया था। रोज की सब्जी-भाजी से लेकर दवा और कपड़े-किराना तक। युसूफ ने सबसे पहले लोगों को निस्तार के पानी की बरबादी रोकने के लिए प्रेरित किया। निस्तार का पानी याने नहाने, बर्तन-कपड़े धोने से लेकर छोटे छोटे काम में आने वाला पानी। उस पानी को एक नाली के जरिए आंगन में या घर के पीछे-आगे की फालतू जगह तक पहुंचाया। फिर वहां देसी बीज बांटे। देखते ही देखते घर घर में सब्जी बाड़ी लग गई। हर घर अपने काम के लायक सब्जियां उगाने लगा। यही नहीं, वे आपस में सब्जी विनिमय का काम करने लगे। कोई एक टमाटर उगा रहा है तो पड़ोसी को दे रहा है तो दूसरा गोभी दे रहा है, तीसरा मूली उगा रहा है तो चौथा मिर्च और धनिया। इस तरह सारा गांव सामुदायिक रिश्ते की पुरानी डोर में बंध गया। कोई भी पैसा नहीं ले दे रहा था। यूसुफ भाई इसे देखकर बच्चों की तरह खुश होते। हमारे सामने करीब करीब हर घर की महिला या पुरुष ने यूसुफ भाई का अभिवादन किया। इसके बाद तो गांव वालों ने अपनी दास्तान खुद बयान कर दी। उन्होंने उत्साह से अपनी सब्जीबाड़ी दिखाई। मुश्किल यह थी कि पहले पानी बहुत दूर से किसी नाले या झरने से लाना पड़ता था। यूसुफ ने उनका यह काम भी दस्तक देते हुए आसान कर दिया। गांव के लोगों को सामूहिक श्रमदान के लिए प्रेरित किया। उनसे सूखे कुएं गहरे करवाए और पानी के नए स्रोत ( झिर) खोज निकाले। देखते ही देखते कुएं लबालब हो गए। चार-पांच फिट पर पानी हिलोरें ले रहा था। इसके बाद गांव के सूखे पड़े तालाब को गहरा कराया और उसकी तलहटी में जमा जल ऊपर आ गया। गांववालों के चेहरे खिल उठे। एक पुरुष ने कहा, ‘हम तो अनपढ़ ठहरे। हमें ये तरीके पता ही नहीं थे। नाहक इतने साल परेशान हुए। 

एक महिला रूपकला (अगर मुझे ठीक नाम याद है) ने बताया कि महिलाओं के कपड़े पास के कस्बे या पन्ना से सिलाई और खरीदे जाते थे। युसूफ भाई ने दस्तक केंद्र के जरिए मशीन दिलाई। सिलाई सिखवाई और गांव की संकोची, घूंघट की ओट में रहने वाली महिलाओं के लिए फूलवती जैसे फरिश्ता बन गई। गांव में जवान लोग कम ही दिख रहे थे। बताया गया कि मजदूरी के लिए मुंबई या दिल्ली में हैं और वहां भी लॉकडाउन में फंस गए हैं। तो युसूफ भाई ने उन्हें मोबाइल दिलाए, सोलर लाइट लगवाई और महिलाओं की पतियों से, पिताओं के बेटों से और बच्चों की अपने पिता से रोज बातचीत का साधन उपलब्ध कराया। जब हम गए तो कई सोलर पैनलों के साथ मोबाइल चार्ज हो रहे थे। यह भी नए भारत की एक तस्वीर थी। शूटिंग से मुक्त हुए तो युसूफ भाई का एक और रूप सामने आया। वे गांव की महिलाओं और पुरुषों के साथ मिलकर हम सब लोगों के लिए भोजन तैयार कर रहे थे। कंडे की आग पर बाटी और देसी हरे बैंगन का भरता। साथ में लहसुन, हरी मिर्च और हरी धनिया की चटनी। संसार की मंहगी से मंहगी भोजन प्लेट उस स्वाद का मुकाबला नहीं कर सकती। भोजन की यह सामग्री यूसुफ भाई की ओर से उपलब्ध कराए गए देसी बीजों से तैयार हुई थी। आज भी वह स्वाद खुशबू के साथ जीभ से लार टपकाने लगता है।

अगले दिन हम एक और गांव विक्रमपुर गए। वहां भी एक एक ग्रामवासी की आंखों में यूसुफ के लिए ठीक वही लाड़ देखा, जो कोई पिता अपने बच्चे से करता है या कोई मां अपने बेटे से करती है। इस गांव की कस्तूरी देवी जन्म से विकलांग थी। अस्सी साल की यह बुजुर्ग घिसटकर चलती थी। यूसुफ ने उसे व्हीलचेयर दिलाई। लॉकडाउन लगा तो उसके भूखों मरने की नौबत आ गई। तीन दिन तक उसने रोटी और नमक खाया। फिर आटा भी खत्म और सब्जी भाजी भी चुक गई। यूसुफ ने इस गांव में भी यही प्रयोग किया। कस्तूरी देवी की पड़ोसिन तुलसा बाई अपने आंगन में लगाए सब्जीबाग से सब्जियां कस्तूरी को पहुंचाने लगीं। गांव को लॉकडाउन में कोई दिक्कत नहीं हुई। सारे लोग यूसुफ मियां के कृतज्ञ थे।

शाम को हम पन्ना लौट आए थे। हमने यूसुफ का ऑफिस देखा। उसकी टीम के सभी लोग उत्साह और ऊर्जा से भरे हुए। सभी पोस्ट ग्रेजुएट और सामाजिक सरोकारों के लिए संवेदनशील। उस ऑफिस की चाय मुझे हमेशा याद रहेगी। चाय पीते पीते युसूफ ने बताया कि पन्ना की उथली हीरा खदानें सारी दुनिया भर में मशहूर हैं लेकिन उनमें काम करने वालों की दर्द भरी कहानी कम लोग ही जानते हैं। उनके फेफड़ों में मिट्टी की सफाई करते समय धूल भर जाती है। उन्हें सिलिकोसिस हो जाता है और चालीस की उमर तक वे यह लोक छोड़ देते हैं। मुझे याद आया कि करीब तीस बरस पहले मंदसौर की स्लेट पेंसिल कारख़ानों में काम करने वालों पर इसी सिलिकोसिस के कहर पर एक फिल्म बनाई थी। वहां तो एक गांव केवल विधवाओं का गांव था। उनके पति खदानों में काम करते हुए सिलिकोसिस का शिकार हो गए थे।

(चित्र यूसुफ भाई के साथ विक्रमपुर में )

बहरहाल ! तो पन्ना के इन श्रमिकों के लिए यूसुफ ने यह लड़ाई लड़ी और जीती। उस पर भी हम फिल्म बनाते, लेकिन इस बार तो हमारा विषय यह नहीं था। हमने यूसुफ भाई से अगली बार का वादा किया और सतना जिले के आदिवासी गांवों के लिए निकल पड़े। इस पूरी यात्रा में मुझे युसूफ भाई एक नायक के रूप में याद आते रहे।

फिल्म पूरी हो चुकी थी। बीच-बीच में उनसे बात भी होती रहती थी। कभी किसी का नाम पूछने के लिए तो कभी कोई आंकड़ा जानने के लिए। इधर सवाल होता और उधर से वॉट्सऐप पर पलक झपकते उत्तर आ जाता। यह फिल्म दरअसल जर्मनी में दिखाई जानी थी। इसलिए यूसुफ भाई अत्यधिक गंभीर थे। कहते थे, ‘सर! एक भी जानकारी गलत नहीं जानी चाहिए। मैं किसी प्रचार की चाहत के कारण यह काम नहीं करता।’

इसके बाद अभी तीन दिन पहले एक दिन फेसबुक पर सुबह-सुबह मनहूस खबर मिली। यूसुफ भाई गांवों को कोरोना से जंग जीतने का मंत्र देते-देते खुद उसके शिकार बन गए। इस गुमनाम नायक को बचाने की कोशिशें हुईं मगर नाकाम रहीं। बारह अप्रैल को कोरोना की जकड़न में आए और अठारह को उससे मुक्त हो गए।

उफ! क्या विडंबना है? इंसान अपने जाने के बाद परिवार को व्यवस्थित करने की योजना बनाने का काम भी पूरा नहीं कर पाता। यूसुफ भाई अपने उस आखिरी सफर पर चले गए, जहां से लौटकर कोई नहीं आता। मुझसे उमर में कई बरस छोटे थे, लेकिन बहुत बड़े काम कर गए यूसुफ भाई। किसी कवि के इस सवाल का उत्तर किसी के पास नहीं है। मैं पूछता हूं तुझसे, बोल मां वसुन्धरे, तू अनमोल रत्न इस तरह लीलती है किसलिए?

विकास संवाद के लिए यकीनन यह बहुत बड़ा सदमा है। सचिन जैन, राकेश मालवीय और उनकी टीम को अब और कई गुना तेजी से काम करना होगा। यही यूसुफ भाई को असली श्रद्धांजलि होगी। वे तो अपनी यह फिल्म नहीं देख सके, लेकिन उनकी यह फिल्म जर्मनी में दिखाई जा रही है। अलविदा युसूफ भाई!

 

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यह समय परखने का नहीं, साथ चलने का है: मनोज कुमार

कोरोना महामारी को लेकर आज जो भयावह स्थिति बनी हुई है, वह किसी के भी अनुमान को झुठला रही है।

Last Modified:
Tuesday, 20 April, 2021
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मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

कोरोना महामारी को लेकर आज जो भयावह स्थिति बनी हुई है, वह किसी के भी अनुमान को झुठला रही है। एक साल पहले कोरोना ने जो तांडव किया था, उससे हम सहम गए थे लेकिन बीच के कुछ समय कोरोना का प्रकोप कम रहने के बाद हम सब लगभग बेफिक्र हो गए। इसके बाद ‘मंगल टीका’ आने के बाद तो जैसे हम लापरवाह हो गए। हमने मान लिया कि टीका लग जाने के बाद हमें संजीवनी मिल गई है और अब कोरोना हम पर बेअसर होगा। पहले टीका लगवाने में आना-कानी और बाद में  टीका लग जाने के बाद मनमानी। यह इस समय का कड़ुवा सच है। सच तो यह भी है कि यह समय किसी को परखने का नहीं है बल्कि एक-दूसरे का हाथ थाम कर साथ चलने का है। लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे हैं। हम व्याकुल हैं, परेशान हैं और हम उस पूरी व्यवस्था को परखने में लगे हुए हैं जिसके हम भी हिस्सेदार हैं। यह मान लेना चाहिए। सोशल मीडिया में व्यवस्था को कोसने का जो स्वांग हम रच रहे हैं, हकीकत में हम खुद को धोखा दे रहे हैं। हम यह जानते हैं कि जिस आक्रामक ढंग से कोरोना का आक्रमण हुआ है, उससे निपटने में सारी मशीनरी फेल हो जाती है। फिर हमें भी इसकी कमान दे दी जाए तो हम भी उसी फेलुअर की कतार में खड़े नजर आएंगे। एक वर्ष पहले जब कोरोना ने हमें निगलना शुरू किया था, तब हमारे भीतर का आध्यात्म जाग गया था। हम निर्विकार हो चले थे। हमें लगने लगा था कि एक-दूसरे की मदद में ही जीवन का सार है लेकिन जैसे-जैसे कोरोना उतार पर आया, वही आपाधापी की जिंदगी शुरू हो गई। एक-दूसरे को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने की जद्दोजहद शुरू हो गई।

आज जब हालात एक बार फिर बेकाबू हो चला है तब हमारे निशाने पर सरकार और सरकारी तंत्र है। यह स्वाभाविक भी है। दवा, ऑक्सीजन, बिस्तर की कमी बड़े संकट के रूप में हमारे सामने हैं। इसके अभाव में लोग मरने को मजबूर है तो सरकार पर गुस्सा आना गलत नहीं है। सरकार से समाज की अपेक्षा गलत नहीं है लेकिन क्या आलोचना से स्थिति बेहतर हो सकेगी? शायद नहीं। समय-समय पर तर्क और तथ्यों के साथ तंत्र की कमजोरी उजागर करना हमारी जवाबदारी है। ऐसा जब हम करते हैं तो सरकार की आलोचना नहीं होती बल्कि हम सरकार के साथ चलते हुए सचेत करते हैं। बिगडैल और बेकाबू तंत्र की कमजोरी सामने आते ही सरकार चौकस हो जाती है। शायद ऐसा करने से समाज में एक तरफ सकरात्मकता का भाव उत्पन्न होता है तो दूसरी तरफ हम एक जिम्मेदार समाज का निर्माण करते हैं।

चुनाव में बेधड़क जमा होती भीड़ के लिए हम सयापा करते रहे लेकिन अपने-अपने घरों से निकल कर कितने लोगों ने भीड़ को वहां जाने से रोका? भीड़ राजनीतिक दलों की ताकत होती है लेकिन इस भीड़ को नियंत्रण करने के लिए हमारी कोशिश क्या रही? कोरोना के आने से लेकर अब तक के बीच में जिस तरह सभा-संगत, प्रदर्शनी और मेले-ठेले सजते रहे, उनका कितनों ने विरोध किया? तब हम सबको लग रहा था कि कोरोना खत्म हो गया है। जीवन अब पटरी पर है और जीवन है तो जीवन में उत्सव भी होना चाहिए। आज हमारे सामने यक्ष प्रश्र यह है कि सरकार ने बीते साल भर में कोई इंतजाम क्यों नहीं किया? बात में दम तो है लेकिन हमने सरकार इस इंतजाम को पुख्ता करने के लिए कभी याद दिलाया? आज कोरोना का यह भयावह चेहरा नहीं आता तो सबकुछ ठीक था लेकिन आज सब खराब है। बात खरी है लेकिन चुभेगी।

लगातार ड्यूटी करते पुलिस वाले, नगर निगम के कर्मचारी, डॉक्टर, नर्स और इनके साथ जुड़े लोग पस्त हो चुके हैं लेकिन वे अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद हैं। इसके बाद भी छोटी सी चूक पर हम उनके साथ दो-दो हाथ करने के लिए खड़े हो जाते हैं। निश्चित रूप से काम करते करते कुछेक गलतियां हो सकती हैं तो इसका यह अर्थ नहीं कि हम उनके इतने लम्बे समय से किए जा रहे सेवा कार्य को भुला दें। एक डॉक्टर आहत होकर इस्तीफा देने के लिए मजबूर हो जाता है, यह बात जोर-शोर से उठती है और उठनी भी चाहिए लेकिन इसके बाद इन डॉक्टरों को और मेडिकल स्टॉफ को सुरक्षा मिले, इस पर हम कोई बातचीत नहीं करते हैं? पूरे प्रदेश में दो या तीन पुलिस की ज्यादती की आधा-अधूरा वीडियो वॉयरल होता है और हम मान लेते हैं कि पुलिस अत्याचार कर रही है। कभी इस बात की चिंता की कि पुलिस वाले कितने तकलीफों के बीच अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे हैं। खासतौर पर छोटे पुलिस कर्मचारी। कोरोना के शुरूआती दौर में पुलिस के सहयोग और सेवा कार्य की अनेक खबरें आती रही लेकिन इस बार ये खबरें क्यों गायब है? क्या पुलिस ने सेवा कार्य बंद कर दिया है या जानबूझकर उन्हें अनदेखा किया जा रहा है। कोरोना किसी भी तरह से, कहीं से फैल सकता है लेकिन इस बात की परवाह किए बिना आपकी और हमारी चिंता में नगर निगम के कर्मचारी सेवा कार्य में जुटे हुए हैं। क्या इन सबकी सेवा भावना को आप अनदेखा कर सकते हैं। शायद नहीं।

यह समय हमेशा नहीं रहने वाला है। लेकिन हमने समय रहते अपनी जिम्मेदारी नहीं समझा तो यह दुख हमेशा हमें सालता रहेगा। आप सिर्फ इतना करें कि आप और आपके नातेदार, दोस्तों और परिचय में आने वालों को अपने अपने घर पर रोक लें। सड़कों पर भीड़ कम होगी तो तंत्र पर दबाब कम होगा और दबाव कम होगा तो परिणाम का प्रतिशत बड़ा होगा। क्यों ना हम सोशल मीडिया की ताकत का उपयोग कर लोगों को जागरूक बनाने में करें क्योंकि आलोचना से आपके मन को तसल्ली मिल सकती है लेकिन संकट मुंहबाये खड़ा रहेगा। यह संकट कब और किसके हिस्से में आएगा, कोई नहीं कह सकता। इससे अच्छा है कि संकट को हरने के लिए सोशल मीडिया संकटमोचक बने। कोरोना से बचने के छोटे उपाय मास्क पहनों, हाथ धोएं और आपस में दूरी बनाकर रखें। नमस्ते तो हमारी संस्कृति है। समय को आपकी हमारी जरूरत है। साथ चलिए क्योंकि कमियां गिनाने के लिए खूब वक्त  मिलेगा, पहले हम दुश्मन से दो-दो हाथ कर लें।    

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'उम्मीद है, उमाकांत लखेड़ा के नेतृत्व में प्रेस क्लब अपनी रचनात्मक सार्थकता सिद्ध करेगा'

अरसे बाद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया को एक खांटी पेशेवर पत्रकार अध्यक्ष के रूप में मिला है। भाई उमाकांत लखेड़ा मेरे बहुत पुराने मित्र और भाई जैसे हैं।

Last Modified:
Tuesday, 13 April, 2021
UmakantLakhera2

अरसे बाद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया को एक खांटी पेशेवर पत्रकार अध्यक्ष के रूप में मिला है। भाई उमाकांत लखेड़ा मेरे बहुत पुराने मित्र और भाई जैसे हैं। लेकिन मैं इसलिए उनकी जीत से प्रसन्न नही हूं कि वे मेरे मित्र हैं, बल्कि इसलिए कि उनके नेतृत्व में प्रेस क्लब उन ऊंचाइयों को छुएगा, जिसके लिए उसकी स्थापना हुई थी। उमा कांत जी पत्रकारिता के सरोकारों और प्रतिबद्धताओं को लेकर कोई समझौता नहीं करने वाले साथी हैं। मूल्यों की कसौटी पर कोई मसला खरा साबित हो जाए तो फिर उनका कैसा भी नुकसान हो जाए, वे परवाह नहीं करते। हम लोग अनेक चैनलों में वैचारिक बहसों में शामिल होते रहे हैं। मैने पाया है कि आज की पत्रकारिता में जिस तरह के पत्रकारों की कमी होती जा रही है, वे उनमें से एक हैं। राज्यसभा टीवी का संपादक रहते हुए मैनें उन्हें कई बार चर्चाओं में आमंत्रित किया। यह संतोष की बात रही कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र के बारे में उनके विचारों को सदैव दर्शकों ने पसंद किया है।

यह 1985 की बात है। उन दिनों मैं नवभारत टाइम्स, जयपुर में मुख्य उप संपादक था, तो उमाकांत लखेड़ा जी उत्तराखंड से लेख भेजा करते थे। राजेंद्र माथुर हमारे प्रधान संपादक थे और वे अक्सर उमा जी के लेख अपनी टिप्पणी के साथ हमारे पास भेज देते थे। वे लेख बेहद साहसिक, निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकारिता की आवाज होते थे।

उमा जी ने शराब माफिया और सियासत के गठजोड़ को बेनकाब किया तो चिपको आंदोलन के पर्यावरणीय सरोकारों को पुरजोर ढंग से उठाया। मैने अधिकतर लेख वे संपादकीय पन्ने पर प्रकाशित किए। तब तक वे पूर्णकालिक पत्रकारिता में नहीं आए थे। इसी बीच विश्वमानव, दैनिक जागरण, सहारा और हिन्दुस्तान होते हुए वे हिंदी पत्रकारिता की मुख्य धारा में शामिल हो गए। उन दिनों  बिहार के बाहुबली शहाबुद्दीन की मांद में जाकर उसके खिलाफ लिखने का साहस उमाकांत लखेड़ा ही कर सकते थे। कारगिल जंग के दौरान हाड़ कंपाने वाली ठंड में उनकी रिपोर्टिंग गर्मी भरती थी। पोखरण में भारतीय सेना की एक मारक मिसाइल जब अपना लक्ष्य भेद नहीं पाई तो लखेड़ा जी ने फौज की कार्यप्रणाली की बखिया उधेड़ दी। यूपीए के शासन काल में अध्यक्ष सोनिया गांधी के लिए जब आली शान कार्यालय बनाया जा रहा था तो उसके औचित्य पर उमाकांत जी ने ही सवाल सबसे पहले उठाए। यह रपट हिन्दुस्तान में ही छपी, जिसकी मालकिन शोभना भरतिया थीं और वे भी कांग्रेस की संसद थीं। इस रिपोर्ट के छपने के बाद जाहिर है वह दफ्तर दफन हो गया। ऐसे अनगिनत किस्से हैं।

अच्छी बात यह है कि ऐसे अनेक अवसर आए जब बीजेपी के लोगों ने उन्हें कांग्रेसी माना और कांग्रेसियों ने उन्हें भाजपाई समर्थक माना। कभी उन्हें जनवादी पत्रकारिता के कारण वामपंथी समझा गया तो कभी समाजवादी। मेरे साथ भी पिछले पैंतालीस बरस में कई बार ऐसा हुआ है। एक अच्छे पत्रकार की यही पहचान है कि वह निष्पक्ष रहे और किसी सियासी वैचारिक धारा से न जुड़े। 

उम्मीद करता हूं कि प्रेस क्लब ऑफ इंडिया अब अपनी रचनात्मक सार्थकता सिद्ध करेगा। इन दिनों इस क्लब की छवि एक बार कम भोजनालय की होती जा रही है। बेशक कुछ अच्छे कदम भी बीते दिनों उठाए गए हैं। मगर भाई उमा जी इसे एक नाविक की तरह छबियो के झंझावात से निकालकर एक पेशेवर स्वरूप प्रदान करेंगे। उनकी टीम में उपाध्यक्ष शाहिद भाई तथा महासचिव विनय कुमार जैसे अनुभवी चेहरे हैं। इस टीम को मेरी शुभकामनाएं और सभी विजयी प्रत्याशियों को मुबारकबाद।

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‘आज के मीडिया को कैसे देखा जाए? इसका जवाब बाबा साहेब के इस अखबार से समझना होगा’

आंबेडकर ने 65 वर्ष 7 महीने और 22 दिन की अपनी जिंदगी में करीब 36 वर्ष तक पत्रकारिता की।

Last Modified:
Monday, 19 April, 2021
babaSaheb

 - प्रो. संजय द्विवेदी, महानिदेशक, भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली

‘अगर कोई इंसान, हिन्दुस्तान के कुदरती तत्वों और मानव समाज को एक दर्शक के नजरिए से फिल्म की तरह देखता है, तो ये मुल्क नाइंसाफी की पनाहगाह के सिवा कुछ नहीं दिखेगा।’ बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने आज से 100 वर्ष पूर्व 31 जनवरी 1920 को अपने अखबार 'मूकनायक' के पहले संस्करण के लिए जो लेख लिखा था, यह उसका पहला वाक्य है। अपनी पुस्तक ‘पत्रकारिता के युग निर्माता : भीमराव आंबेडकर’ में लेखक सूर्यनारायण रणसुभे ने इसलिए कहा भी है- कि ’जाने-अनजाने बाबा साहेब ने इसी दिन से दीन-दलित, शोषित और हजारों वर्षों से उपेक्षित मूक जनता के नायकत्व को स्वीकार किया था।’

आज के मीडिया को कैसे देखा जाए? यदि इस सवाल का जवाब ढूंढना है, तो 'मूकनायक' के माध्यम से इसे समझना बेहद आसान है। इस संबंध में मूकनायक के प्रवेशांक के संपादकीय में आंबेडकर ने जो लिखा था, उस पर ध्यान देना बेहद आवश्यक है। आंबेडकर लिखते हैं कि 'मुंबई जैसे इलाके से निकलने वाले बहुत से समाचार पत्रों को देखकर तो यही लगता है कि उनके बहुत से पन्ने किसी जाति विशेष के हितों को देखने वाले हैं। उन्हें अन्य जाति के हितों की परवाह ही नहीं है। कभी-कभी वे दूसरी जातियों के लिए अहितकारक भी नजर आते हैं। ऐसे समाचार पत्र वालों को हमारा यही इशारा है कि कोई भी जाति यदि अवनत होती है, तो उसका असर दूसरी जातियों पर भी होता है।

समाज एक नाव की तरह है। जिस तरह से इंजन वाली नाव से यात्रा करने वाले यदि जानबूझकर दूसरों का नुकसान करें, तो अपने इस विनाशक स्वभाव की वजह से उसे भी अंत में जल समाधि लेनी ही पड़ती है। इसी तरह से एक जाति का नुकसान करने से अप्रत्यक्ष नुकसान उस जाति का भी होता है जो दूसरे का नुकसान करती है।’

बाबा साहेब ने जो लिखा, उसको आज के दौर के मीडिया के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो स्थितियां करीब-करीब कुछ वैसी ही दिखाई देती हैं। आज का मीडिया हमें कुछ उस तरह ही काम करता दिखाई देता है, जिसको पहचानते हुए बाबा साहेब ने 'मूकनायक' की शुरुआत की थी। इस समाचार पत्र के नाम में ही आंबेडकर का व्यक्तित्व छिपा हुआ है। मेरा मानना है कि वे 'मूक' समाज को आवाज देकर ही उनके 'नायक' बने। बाबा साहेब ने कई मीडिया प्रकाशनों की शुरुआत की। उनका संपादन किया। सलाहकार के तौर पर काम किया और मालिक के तौर पर उनकी रखवाली की। ‘मूकनायक’ के प्रकाशन के समय बाबा साहेब की आयु मात्र 29 वर्ष थी। और वे तीन वर्ष पूर्व ही यानी 1917 में अमेरिका से उच्च शिक्षा ग्रहण कर लौटे थे। अक्सर लोग ये प्रश्न करते हैं कि कि एक उच्च शिक्षित युवक ने अपना समाचार-पत्र मराठी भाषा में क्यों प्रकाशित किया? वह अंग्रेजी भाषा में भी समाचार-पत्र का प्रकाशन कर सकते थे। ऐसा करके वह सवर्ण समाज के बीच प्रसिद्धी पा सकते थे और अंग्रेज सरकार तक दलितों की स्थिति प्रभावी ढंग से रख सकते थे। लेकिन बाबा साहेब ने ‘मूकनायक’ का प्रकाशन वर्षों के शोषण और हीनभावना की ग्रंथि से ग्रसित दलित समाज के आत्म-गौरव को जगाने के लिए किया गया था। जो समाज शिक्षा से दूर था, जिसके लिए अपनी मातृभाषा मराठी में लिखना और पढ़ना भी कठिन था, उनके बीच जाकर ‘अंग्रेजी मूकनायक’ आखिर क्या जागृति लाता? इसलिए आंबेडकर ने मराठी भाषा में ही समाचार पत्रों का प्रकाशन किया।

अगर हम उनकी पहुंच की और उनके द्वारा चलाए गए सामाजिक आंदोलनों की बात करें, तो बाबा साहेब अपने समय में संभवत: सब से ज्यादा दौरा करने वाले नेता थे। सबसे खास बात यह है कि उन्हें ये काम अकेले अपने बूते ही करने पड़ते थे। न तो उन के पास सामाजिक समर्थन था, न ही आंबेडकर को उस तरह का आर्थिक सहयोग मिलता था, जैसा कांग्रेस पार्टी को हासिल था। इसके विपरीत, आंबेडकर का आंदोलन गरीब जनता का आंदोलन था। उनके समर्थक वो लोग थे, जो समाज के हाशिए पर पड़े थे, जो तमाम अधिकारों से महरूम थे, जो जमीन के नाम पर या किसी जमींदार के बंधुआ थे। आंबेडकर का समर्थक, हिन्दुस्तान का वो समुदाय था, जो आर्थिक रूप से सब से कमजोर था। इसका नतीजा ये हुआ कि आंबेडकर को सामाजिक आंदोलनों के बोझ को सिर से पांव तक केवल अपने कंधों पर उठाना पड़ा। उन्हें इस के लिए बाहर से कुछ खास समर्थन हासिल नहीं हुआ। और ये बात उस दौर के मीडिया को बखूबी नजर आती थी। आंबेडकर के कामों को घरेलू ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी जाना जाता था। हमें हिन्दुस्तान के मीडिया में आंबेडकर की मौजूदगी और उनके संपादकीय कामों की जानकारी तो है, लेकिन ये बात ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम कि उन्हें विदेशी मीडिया में भी व्यापक रूप से कवरेज मिलती थी। बहुत से मशहूर अंतरराष्ट्रीय अखबार, आंबेडकर के छुआछूत के खिलाफ अभियानों और महात्मा गांधी से उनके संघर्षों में काफी दिलचस्पी रखते थे। लंदन का 'द टाइम्स', ऑस्ट्रेलिया का 'डेली मर्करी' और 'न्यूयॉर्क टाइम्स', 'न्यूयॉर्क एम्सटर्डम न्यूज', 'बाल्टीमोर अफ्रो-अमरीकन', 'द नॉरफॉक जर्नल' जैसे अखबार अपने यहां आंबेडकर के विचारों और अभियानों को प्रमुखता से प्रकाशित करते थे। भारतीय संविधान के निर्माण में आंबेडकर की भूमिका हो या फिर संसद की परिचर्चाओं में आंबेडकर के भाषण, या फिर नेहरू सरकार से आंबेडकर के इस्तीफे की खबर। इन सब पर दुनिया बारीकी से नजर रखती थी। बाबा साहेब ने अपने सामाजिक आंदोलन को मीडिया के माध्यम से भी चलाया।

मूकनायक का प्रकाशन बंद होने के बाद, आंबेडकर एक बार फिर से पत्रकारिता के क्षेत्र में कूदे, जब उन्होंने 3 अप्रैल 1927 को 'बहिष्कृत भारत' के नाम से नई पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। ये वही दौर था, जब आंबेडकर का महाद आंदोलन जोर पकड़ रहा था। बहिष्कृत भारत का प्रकाशन 15 नवंबर 1929 तक होता रहा। कुल मिलाकर इसके 43 संस्करण प्रकाशित हुए। हालांकि, बहिष्कृत भारत का प्रकाशन भी आर्थिक दिक्कतों की वजह से बंद करना पड़ा। मूकनायक और बहिष्कृत भारत के हर संस्करण की कीमत महज डेढ़ आने हुआ करती थी, जबकि इसकी सालाना कीमत डाक के खर्च को मिलाकर केवल 3 रुपए थी। इसी दौरान समता नाम के एक और पत्र का प्रकाशन आरंभ हुआ, जिससे बहिष्कृत भारत को नई जिंदगी मिली। उसे 24 नवंबर 1930 से 'जनता' के नए नाम से प्रकाशित किया जाने लगा। जनता, भारत में दलितों के सबसे लंबे समय तक प्रकाशित होने वाले अखबारों में से है, जो 25 वर्ष तक छपता रहा था। जनता का नाम बाद में बदलकर, 'प्रबुद्ध भारत' कर दिया गया था। ये सन् 1956 से 1961 का वही दौर था, जब आंबेडकर के आंदोलन को नई धार मिली थी।

आंबेडकर ने 65 वर्ष 7 महीने और 22 दिन की अपनी जिंदगी में करीब 36 वर्ष तक पत्रकारिता की। ‘मूकनायक’ से लेकर ‘प्रबुद्ध भारत’ तक की उनकी यात्रा, उनकी जीवन-यात्रा, चिंतन-यात्रा और संघर्ष-यात्रा का भी प्रतीक है। मेरा मानना है कि ‘मूकनायक’... ‘प्रबुद्ध भारत’ में ही अपनी और पूरे भारतीय समाज की मुक्ति देखता है। आंबेडकर की पत्रकारिता का संघर्ष ‘मूकनायक’ के माध्यम से मूक लोगों की आवाज बनने से शुरू होकर, ‘प्रबुद्ध भारत’ के निर्माण के स्वप्न के साथ विराम लेता है।

मीडिया के पराभव काल की मौजूदा परिस्थितियों में आंबेडकर का जीवन हमें युग परिवर्तन का बोध कराता है। पत्रकारिता में मूल्यविहीनता के सैलाब के बीच अगर बाबा साहेब को याद किया जाए, तो इस बात पर भरोसा करना बहुत कठिन हो जाता है कि पत्रकारिता जैसे क्षेत्र में कोई हाड़मांस का इंसान ध्येयनिष्ठा के साथ अपने पत्रकारीय जीवन की यात्रा को जीवंत दर्शन में भी तब्दील कर सकता है। इस संदर्भ में वरिष्ठ विचारक और चिंतक दत्तोपन्त ठेंगड़ी ने अपनी पुस्तक ‘डॉ. आंबेडकर और सामाजिक क्रांति की यात्रा’ में लिखा है, कि ‘भारतीय समाचार-पत्र जगत की उज्ज्वल परंपरा है। परंतु आज चिंता की बात यह है कि संपूर्ण समाज का सर्वांगीण विचार करने वाला, सामाजिक उत्तरदायित्व को मानने वाला, समाचार पत्र को लोकशिक्षण का माध्यम मानकर तथा एक व्रत के रूप में उपयोग करने वाला आंबेडकर जैसा पत्रकार मिलना दुर्लभ हो रहा है।’

आंबेडकर की पत्रकारिता हमें ये सिखाती है कि जाति, वर्ण, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र, लिंग, वर्ग जैसी शोषणकारी प्रवृत्तियों के प्रति समाज को आगाह कर उसे इन सारे पूर्वाग्रहों और मनोग्रंथियों से मुक्त करने की कोशिश ईमानदारी से की जानी चाहिए और यही मीडिया का मूल मंत्र होना चाहिए। पत्रकारों की अपनी निजी राय हो सकती है, लेकिन खबर बनाते या दिखाते समय उन्हें अपनी राय से दूर रहना चाहिए, क्योंकि रिपोर्टिंग उनके एजेंडे का आईना नहीं है, बल्कि अपने पाठकों के साथ पेशेवर करार का हिस्सा है। हमारे देश का मीडिया बहुत समय पहले से ही अपनी इस पेशेवर भूमिका से हटकर कुछ और ही दिखाने या लिखने लगा है। 100 साल पहले बाबा साहेब ने एक अस्पृश्य समाज की आवाज को देश के सामने लाने के लिए 'मूकनायक' की शुरुआत की थी, और आज देश को फिर ऐसे ही 'नायक' की जरूरत है, जो जनता के मुद्दों को उठाये, जनता की आवाज को बुलंद करे, जिसे व्यवस्थावादी मीडिया ने 'मूक' कर दिया है।

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अवसाद की खबरों में आशा की भाषा कहां है मिस्टर मीडिया?

बीते दिनों अखबारों के पन्नों, टेलिविजन और सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर कवरेज में कोरोना का खौफ दिखाई देने लगा है।

राजेश बादल by
Published - Saturday, 10 April, 2021
Last Modified:
Saturday, 10 April, 2021
rajeshbadal8451

यकीनन बेहद मुश्किल दौर है। देश और दुनिया के लिए। हर उम्र के लोग, हर पेशे के लोग, हर तरह की जीवन शैली वाले लोग अब घबरा उठे हैं। इस माहौल में संयम और संतुलन बरतना सबके लिए आसान नहीं है। आम आदमी की कराह चरम पर है और उसके आई क्यू के मद्देनजर परेशान होने की वजह समझ में आती है। लेकिन उसकी जिंदगी में जो कहर बरपा है, वह खौफनाक है। रिश्तों को चरमराते और रोजगार गंवाते वह बेबस और असहाय सा देख रहा है। इसलिए अब अगर उसकी अभिव्यक्ति संयम के सारे बांध तोड़कर निकले तो असामान्य नहीं लगना चाहिए। ऐसी आपात घड़ी में समाज और देश के व्यवस्थापकों, संचालकों, नियामकों, राजनेताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और संपादकों के धीरज तथा सब्र की परीक्षा होती है कि वे किस तरह देश को दिशा देने का काम करते हैं। यह बहुत विकराल चुनौती है।

बीते दिनों अखबारों के पन्नों, टेलिविजन और सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर कवरेज में कोरोना का खौफ दिखाई देने लगा है। एक तरफ हमारे सियासतदान भाषा का संयम तोड़ रहे हैं तो अभिव्यक्ति के प्रहरी पत्रकार भी अपना आपा खो रहे हैं। एक भी गलत शब्द के इस्तेमाल से सुनने वाले, देखने वाले और पढ़ने वाले के दिलो-दिमाग पर गहरा असर पड़ता है। मेरे एक परिचित के संबंधी ने किसी चैनल पर कोरोना के बारे में इतने भयानक अंदाज में खबरें देखीं कि वे अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार हो गए। अब वे अस्पताल में दाखिल हैं। उन्हें कोरोना नहीं हुआ है, लेकिन वे किसी कोरोना-मरीज से बेहतर हालत में नहीं हैं। एक अन्य मित्र सुबह अखबार आते ही सबसे पहले कोरोना से बिगड़ रही हालत की सूचनाएं पढ़ते हैं। फिर दिन भर दोस्तों और शुभचिंतकों को फोन करते हैं और अपने डर के खतरनाक स्वरूप का विस्तार करते हैं। इस तरह समाज में दहशत की अनेक नई लहरें पैदा हो जाती हैं।  

समय आ गया है, जब प्रेस काउंसिल, एडिटर्स गिल्ड, देश भर में बिखरे पत्रकार संगठन, नेशनल ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन और केंद्र तथा राज्यों के सूचना केंद्रों, जन संपर्क विभागों को अत्यंत गंभीर और संवेदनशील कदम उठाने चाहिए। यह किसी जंग से कमतर स्थितियां नहीं हैं। मिलकर एक इमरजेंसी-एक्शन प्लान बनाकर उस पर अमल करना जरूरी है। कोई नहीं जानता कि यह भयावह सिलसिला कब तक चलेगा?

हालांकि सामाजिक स्तर पर एक पहल भी हुई है, जिसे सलाम करने को जी चाहता है। राष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाले स्वयं सेवी संगठन विकास संवाद ने यूनिसेफ के सहयोग से चार महीने की मशक्कत के बाद एक मीडिया मेन्युअल जारी किया है। इस शानदार दस्तावेज में मीडिया को सलाह दी गई है कि वह शांत होकर इस तरीके से समाचारों को पेश करे कि समाज में घबराहट नहीं फैले और कोरोना से लड़ने का हौसला पैदा हो। इतना ही नहीं, शब्दों और दृश्यों के चुनाव में बेहद सतर्कता बरतें।

यह दस्तावेज इस बात की सिफारिश करता है कि हर हाल में अफवाहों को सख्ती से कुचला जाए। बीते एक साल में कोरोना काल के दरम्यान अनेक खबरें प्रसारित हुईं, जो बाद में गलत साबित हुईं। इस दस्तावेज ने कुछ उदाहरण भी दिए हैं। नौ अप्रैल को एम्स भोपाल के सौ से अधिक डॉक्टरों के कोरोना पीड़ित होने की खबर मीडिया में आई। यह सच नहीं थी। शाम को एम्स प्रशासन ने खंडन जारी किया कि यह खबर सच नहीं थी। अब इस गैर जिम्मेदारी का क्या किया जाए। इस झूठे समाचार से एम्स में दिन भर अफरा तफरी का माहौल रहा और कोरोना मरीजों के इलाज पर भी प्रतिकूल असर पड़ा। समाज में ऐसी झूठी खबरों से आक्रोश क्यों नहीं होना चाहिए। मीडिया मैन्युअल इसी व्यवहार का परिणाम है और इसका अर्थ यह है कि मीडिया की भूमिका के बारे में अब समाज की ओर से प्रतिरोध शुरू हो गया है। आपातकाल का सन्देश समय की स्लेट पर साफ साफ लिखा है। इस इबारत को पढ़ना और उसके बाद अमल करना जरूरी है। इसमें कोताही या देरी बाद में हाथ मलने का सबब न बन जाए मिस्टर मीडिया!

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ये ग्रह स्थिति बनाती है व्यक्ति को सफल पत्रकार: आचार्य प्रवीण चौहान (ज्योतिषाचार्य)

जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन का क्रेज लोगों में 100 साल से भी ज्यादा समय से बना हुआ है और करियर के लिहाज से यह क्षेत्र कभी भी आउटडेटेड होने वाला नहीं है।

Last Modified:
Friday, 09 April, 2021
Acharya Praveen Chauhan

आजकल कई लोग मीडिया जगत में जाने के लिए काफी उत्सुक रहते है। जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन का क्रेज लोगों में 100 साल से भी ज्यादा समय से बना हुआ है और करियर के लिहाज से यह क्षेत्र कभी भी आउटडेटेड होने वाला नहीं है। 21वीं सदी में करियर विकल्प के रूप में मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म में काफी बदलाव आया है। आज के दौर में मास कम्युनिकेशन काफी विविधता वाला क्षेत्र है, जो तकरीबन हर इंडस्ट्री के साथ जुड़ा हुआ है। आज, लगभग हर संस्थान बड़े पैमाने पर मीडिया के प्रति उत्साही लोगों द्वारा दी जाने वाली सेवाओं का लाभ उठा रहा है। यदि आप उत्साही हैं, क्रिएटिव हैं और लोगों के लिए कुछ करना चाहते हैं तो मास कम्युनिकेशन का फील्ड आपके लिए सही विकल्प है। अब सवाल उठता है कि आप मीडिया जगत में किस तरह ऊंचाइयों तक पहुंच सकते हैं और अपना नाम कमा सकते हैं। 

ज्योतिष एक ऐसा विषय है जिसके द्वारा उचित करियर चुनने मे मार्गदर्शन लिया जा सकता है। यदि आप प्रिंट जर्नलिज्म, इलेक्ट्रॉनिक जर्नलिज्म, पब्लिक रिलेशंस, विज्ञापन, फिल्म्स, रेडियो जर्नलिज्म, न्यूज एंकरिंग में करियर की योजना बना रहे हैं, तो जानते हैं कि पत्रकारिता में जाने के लिए आपका कौन सा ग्रह सबसे सबसे ज्यादा शक्तिशाली होना चाहिए? ग्रहों का विभिन्न राशियों में स्थित होना भी व्यवसाय का चयन करने में सहायता करता है।

1: जन्मकुंडली के भाव: तीसरा पांचवा और दसवां भाव

आपकी जन्मकुंडली में तीसरा भाव (third house) कम्युनिकेशन की मौजूदगी को प्रदर्शित करता है। यह बोलने और शब्दों के चयन की कला को दर्शाता है। इस प्रकार, तीसरा भाव जनसंचार के सभी उपकरणों जैसे टेलिविजन, समाचार पत्र और रेडियो के बारे में जानकारी देता है, जिसमें बेहतरीन कम्युनिकेशन और बोलने के कौशल की आवश्यकता होती है। वही कुंडली का पांचवा भाव शिक्षा को दर्शाता है और यह व्यक्ति को अच्छे से बोलने की क्षमता प्रदान करता है। जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए दोनों की बहुत जरूरत होती है। साथ ही जन्मकुंडली का दसवां भाव जातक के कारोबार का है। मात्र गुण होना ही पर्याप्त नहीं हैं, उन्हें एक आकर्षक करियर में तब्दील करना चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में आपकी जन्मकुंडली के दसवें भाव की मजबूती जरूरी है, जो यह निर्धारित करती है। ऐसे में अवसरों का लाभ उठाने और करियर को नई दिशा देने के लिए आपकी जन्मकुंडली में इन तीनों भावो का शक्तिशाली होना जरूरी है। 

2: महत्वूपर्ण ग्रह: मंगल, बुध और बृहस्पति

व्यक्ति की पहचान उसकी वाणी के द्वारा होती हैं। बुध को ज्योतिष शास्त्र में वाणी का कारक माना जाता है। साथ ही बुध ग्रह पेन (pen) का प्रतीक माना गया है, वहीं मंगल ग्रह का ज्योतिष में अलग ही महत्व है। इस मंगल को मेष और वृश्चिक राशियों का स्वामी और पराक्रम व ऊर्जा का कारक माना जाता है। और ये ग्रह स्याही (ink) को दर्शाता है। कुंडली में मंगल और बुध का संयोजन ठीक उसी तरह है, जैसे पेन और स्याही का होता है। यह संयोजन अभिव्यक्ति और विचारों को प्रेरित करता है, जो किसी पत्रकार के दो प्रमुख गुण होते हैं।

वैदिक ज्योतिष के नौ ग्रहों में बृहस्पति को ही ‘गुरु’ की उपाधि मिली है। जातक के शिक्षा तथा विकास के लिए कुंडली में बृहस्पति (Jupiter) का स्थान देखा जाता है। पत्रकारिता के क्षेत्र में बृहस्पति संपादन कार्य को दर्शाता है। यदि आपकी जन्मकुंडली में मंगल, बुध और बृहस्पति शुभ स्थिति मे मौजूद हैं तो यह स्थिति पत्रकारिता के क्षेत्र मे सफलता दिलाने मे सक्षम है।

3: ग्रहों की स्थिति व योग:

ग्रह और भावों के साथ ही कुछ ऐसी ग्रह स्थिति, ज्योतिषीय योग होते हैं, जो पत्रकारिता के क्षेत्र में सफलता का कारण बनते है जो निम्न प्रकार हैं:

ऐसा देखा गया है  कि मिथुन, कन्या, वृषभ, तुला, मकर और मीन लग्न के लोग लेखन कार्य से जुड़े होते हैं। ज्यादातर बड़े लेखक इन्हीं लग्नों में जन्मे हैं। पत्रकार अच्छा व्यवहार विश्लेषक वक्ता होता है, वाणी प्रभावशाली होती है। जब कुंडली में द्वितीय भाव में बुध उच्च राशि में हो तो जातक अच्छा पत्रकार बनता है। बुध दशम भाव में गुरु के साथ हो, द्वितीय भाव में चन्द्र हो तो ऐसा जातक समाचार पत्रों, पत्रिका का संपादन या प्रकाशन का कार्य करता है। सफल एंकर बनने के लिए शुक्र, बुध, चंद्रमा व गुरु का महत्व सर्वोपरि है। जन्मकुंडली में यदि सरस्वती का योग बन जाए तो आप उच्चकोटि के लेखक हो सकते हैं। संपादन कार्य में कल्पनाशक्ति की आवश्यकता रहती है। इसलिए कल्पनाकारक चंद्रमा की शुभ स्थिति भी वांछित है। हालांकि, सफलता पाने के लिए कड़ी मेहनत और लगन बहुत जरूरी है, लेकिन जन्म कुंडली में ग्रहों की स्थिति व स्थान भी आपके करियर को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 

(नोट- यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक दिल्ली के प्रसिद्ध ज्योतिषी और हस्तरेखा विशेषज्ञ हैं। इनसे info@astropraveen.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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राजेंद्र माथुर की पुण्यतिथि पर संस्मरण: कलम के महानायक का साथ

वह राजेंद्र माथुर का पहला तार था। छतरपुर जैसे छोटे से कस्बे में किसी नौजवान पत्रकार को ‘नईदुनिया’ के प्रधान संपादक का तार।

Last Modified:
Friday, 09 April, 2021
rajendramathur5558

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

वह राजेंद्र माथुर का पहला तार था। छतरपुर जैसे छोटे से कस्बे में किसी नौजवान पत्रकार को ‘नईदुनिया’ के प्रधान संपादक का तार। साइकिल उठाकर पूरे शहर के परिचितों को दिखाता फिरा। वो 1977 के चुनाव के दिन थे। ‘नईदुनिया’ ने एक लेख मांगा था। मेरे जैसे कस्बाई और देहाती पत्रकार के लिए यकीनन गर्व की बात थी। उन दिनों की ‘नईदुनिया’ देश की हिंदी पत्रकारिता का सर्वश्रेष्ठ नाम था। आलेख भेजा। छपा। ‘नईदुनिया’ और राजेंद्र माथुर से रिश्ते की शुरुआत। मैं लिखता। माथुर साहब हर दूसरे तीसरे आलेख पर अपनी राय देते। वे पत्र खुद लिखा करते थे। इन पत्रों ने लगातार मेरा हौसला बढ़ाया। आम पत्रकारों की तरह मैं भी ‘नईदुनिया’ का संवाददाता बनना चाहता था, लेकिन ‘नईदुनिया’ की नीति हर जिले में संवाददाता बनाने की नहीं थी। मैं आग्रह करता रहा। ‘नईदुनिया’ ठुकराती रही। अलबत्ता आलेख जरूर छपते रहे। मेरे लिए यही बहुत था। एक दिन माथुर साहब का तार मिला। इंदौर मिलने आइए। आने जाने का किराया दे देंगे। मैं उस अलौकिक अखबार के दफ्तर में था, जिस अखबार का संवाददाता न बन सका, उसका उप संपादक बनने का प्रस्ताव। लॉटरी खुल गई। राजेंद्र माथुर से रिश्ते का एक नया रूप।

पत्रकार के तौर पर बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाके से अंग्रेजी में लिखने का अवसर कम ही आता था। यू.एन.आई और पी.टी.आई के साथ काम करते हुए स्थानीय खबरें ही भेजीं थीं। माथुरजी ने जॉइन करते ही संपादकीय पन्ने के लिए एक आलेख अनुवाद के लिए दिया। अगर मुझे याद है तो वो आलेख कुलदीप नैयर का था। शायद वे मेरी अंग्रेजी जांचना चाहते थे। जाहिर था- मैं उनकी अपेक्षा पर खरा नहीं उतरा। इसके बाद उनका आदेश था- रोज सुबह घर आओ। मैं अंग्रेजी अनुवाद सिखाऊंगा। अगले दिन से सुबह किराए पर साइकिल लेकर पांच किलोमीटर दूर उनके घर जाता और वे मुझे अंग्रेजी पढ़ाते। राजेंद्र माथुर का यह नया रूप मेरे सामने था। दिन गुजरते रहे। वे अखबार की हर विधा में मुझे पारंगत देखना चाहते थे। शायद मैं कुछ कर भी पाया। इसी बीच वे ‘‘नवभारत टाइम्स’’ के प्रधान संपादक बन कर दिल्ली जा पहुंचे। मैं उनके पैरों की धूल भी न था, मगर कुछ साल बाद ‘नईदुनिया’ प्रबंधन ने मुझ पर भरोसा किया। मैं सह संपादक के रूप में उसी कुर्सी पर बैठकर कमोबेश वही सारे काम कर रहा था, जिस पर माथुर साहब बैठते थे। रोज मैं उस लकड़ी की कुर्सी पर बैठने से पहले प्रणाम करता था।

सिलसिला चलता रहा। माथुर साहब जब इंदौर आते, मैं उनसे मिलने पहुंच जाता। वे बड़े उत्साह से ‘‘नवभारत टाइम्स’’ में हो रहे बदलावों का जिक्र किया करते थे। एक दिन (शायद 28 जुलाई 1985 ) दिल्ली से उनका फोन ‘नईदुनिया’ के दफ्तर आया। मैं उन दिनों तक अखबार की अनेक जिम्मेदारियां संभाल रहा था। माथुर जी ने कहा- एक सप्ताह के भीतर जयपुर पहुंचो। ‘नवभारत टाइम्स’ जयपुर संस्करण शुरू करने जा रहा था। माथुर साहब एक नए अंदाज और अवतार में थे। मैंने मुख्य उप संपादक के रूप में जयपुर जॉइन किया। इसके बाद अगले पांच-छह साल उनके मार्गदर्शन में काम किया। राजेन्द्र माथुर और सुरेन्द्र प्रताप सिंह की जोड़ी ने देश की हिंदी पत्रकारिता को ऐसे सुनहरे दिन दिखाए, जो उस दौर के हिन्दुस्तान में लोगों को चमत्कृत कर रही थी। आज तो सिर्फ उन दिनों की यादों की तड़प बाकी है। राजेंद्र माथुर के साथ काम करने का अनुभव अनमोल मोती की तरह मेरे पास है। वे जितने अच्छे पत्रकार थे, उससे अच्छे लेखक। जितने अच्छे लेखक थे, उससे अच्छे संपादक। जितने अच्छे संपादक थे, उससे अच्छे इंसान। किसी भी देश को ऐसे देवदूत बार-बार नहीं मिलते।

कुछ साल पहले मैं एक पत्रकारिता संस्थान में गया। छात्रों से बातचीत के दौरान मैंने उनसे राजेंद्र माथुर के बारे में पूछा। अफसोस! कम छात्र ही थे जो माथुर जी के बारे में ठीक-ठाक जानकारी रखते थे। मेरे लिए यह एक सदमें से कम नहीं था। कहीं न कहीं बड़ी गलती हुई है। नई पीढ़ी अगर माथुर साहब का लिखा नहीं पढ़ रही है, उन्हें नहीं जान रही है तो हम लोग भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। एक तो उनके लेखन को सामने लाने में देरी हुई। दूसरे पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों में राजेंद्र माथुर को जो जगह मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल पाई। तीसरा टेलिविजन पत्रकारिता ने माथुर साहब को कहीं गुम कर दिया। यह गलती अब भी ठीक की जा सकती है। यह सोचकर मैंने तय किया कि अगर नई पीढी के पत्रकार माथुर जी का लेखन नहीं पढ़ना चाहते तो कम से कम उनके बारे में न्यूनतम जानकारी तो रखें। मैंने राजेंद्र माथुर पर वृतचित्र बनाने का फैसला किया। यह 2005 की बात है। फैसला तो कर लिया, लेकिन जो हमारे बीच से करीब दो दशक पहले जा चुका हो, उस पर फिल्म बनाना आसान नहीं था और फिर माथुर जी जैसा संपादक, जिन्होंने अपने बारे में कभी प्रचार-प्रसार का सहारा नहीं लिया हो। हम लोग तो फिर भी अपनी कुछ तस्वीरें, वीडियो इत्यादि सुरक्षित करते रहते हैं। बहुत कुछ सामग्री मेरे पास थी, लेकिन उनकी आवाज, उनके विजुअल्स खोजना आसान नहीं था। तीन साल भटकता रहा। कई बार लगता- फिल्म नहीं बन पाएगी। फिर अन्दर से ताकत जुटाता और खोज में लग जाता। श्रीमती मोहिनी माथुर ने फिल्म के लिए बहुत सहयोग किया। आलोक मेहता जी ने अपने खजाने से माथुर जी के बारे में कुछ दुर्लभ सामग्री निकाली। इस तरह तीन-चार साल में फिल्म तैयार हो ही गई। जो भी मेरी अपनी बचत थी, उसका इससे बेहतर कोई और इस्तेमाल नहीं हो सकता था। इसका पहला शो उस समय के अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल की पहल पर 2010 में इंदौर प्रेस क्लब में हो चुका है। माथुर जी इसके अध्यक्ष रहे थे। उनके नाम पर सभागार भी वहां है। फिल्म का शो इसी ऑडिटोरियम में हुआ। इसके बाद यह फिल्म देश के करीब एक दर्जन राज्यों के पत्रकारों, मीडिया के छात्रों और विश्वविद्यालयों के बीच दिखाई जा चुकी है। अभी भी दिखाई जा रही है।

इन्ही दिनों मुझे संसद के दूसरे राज्यसभा टेलीविजन चैनल को शुरू करने की जिम्मेदारी मिली। मैंने कार्यकारी संपादक के पद पर जॉइन किया। उसके बाद कार्यकारी निदेशक के तौर पर काम  किया। उन्हीं दिनों मैंने आधा घंटे की एक फिल्म ‘उनकी नजर उनका शहर’ श्रृंखला के तहत तैयार की। जब तक मैं वहां रहा, माथुरजी की हर जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर यह फिल्म दिखाई जाती रही। अब तो यह चैनल ही अंतिम सांसें गिन रहा है। इन दिनों मैं राजेंद्र माथुर जी पर एक ग्रन्थ तैयार कर रहा हूं। इसमें माथुर जी के कुछ अब तक अप्रकाशित आलेख, उनका जीवनवृत, उनका इतिहास बोध, उनके समकालीन संपादकों के आलेख और कुछ दुर्लभ चित्र तथा दस्तावेज शामिल किए जाएंगे। पत्रकारिता के छात्रों और पत्रकारों के लिए यह एक संग्रहणीय ग्रन्थ हो सकता है। आजाद भारत के इतिहास में इतना विलक्षण संपादक दूसरा नहीं हुआ। उनके साथ संपर्क के चौदह साल मेरे लिए अनमोल धरोहर हैं। मेरी सादर विनम्र श्रद्धांजलि।

यहां पेश है उन पर केंद्रित फिल्म। मेरी प्रार्थना है कि एक बार अवश्य यह फिल्म देखिए-

भारत के महान हिंदी संपादक राजेंद्र माथुर की नौ अप्रैल को तीसवीं पुण्यतिथि है। कोरोना के प्रकोप और पांच राज्यों में चुनाव के शोर में उनकी याद हिंदी पत्रकार शायद न करें। फिर भी मेरा फर्ज है कि याद दिलाऊं कि हिन्दुस्तान में एक ऐसा विलक्षण संपादक भी हुआ था। श्रद्धांजलि स्वरूप मेरी फिल्म। ऊपर इसके पहले भाग और नीचे दूसरे भाग-  

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लोग हैरान हैं, कोरोना का कहर वहां ज्यादा है, जहां चुनाव नहीं हो रहे हैं: राजेश बादल

दिन प्रतिदिन आ रहे आंकड़े बेहद खौफनाक और डराने वाले हैं। सालभर बाद कोरोना ज्यादा दैत्याकार और विकराल आकार लेता जा रहा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 07 April, 2021
Last Modified:
Wednesday, 07 April, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

भयावह दौर में बढ़ती सामाजिक चुनौतियां

दिन प्रतिदिन आ रहे आंकड़े बेहद खौफनाक और डराने वाले हैं। सालभर बाद कोरोना ज्यादा दैत्याकार और विकराल आकार लेता जा रहा है। प्रारंभिक महीने तो किसी वैज्ञानिक शोध और व्यवस्थित उपचार के बिना बीते। विश्व बैंक, चीन और अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच जारी आरोप प्रत्यारोप ने समूचे संसार को एक तरह से दुविधा में डाल कर रखा। न चिकित्सा की कोई वैज्ञानिक पद्धति विकसित हो पाई और न दुनियाभर के डॉक्टर्स में कोई आम सहमति बन सकी। शुरुआत में इसे चीन की प्रयोगशाला का घातक हथियार माना गया। इसके बाद इसे संक्रामक माना गया तो कभी इसके उलट तथ्य प्रतिपादित किए गए। कभी कहा गया कि यह तेज गर्मी में दम तोड़ देगा, तो फिर बाद में बताया गया कि तीखी सर्दियों की मार कोरोना नहीं झेल पाएगा। हालांकि चार छह महीने के बाद एक दौर ऐसा भी आया, जब लगा कि हालात नियंत्रण में आ रहे हैं। जिंदगी की गाड़ी पटरी पर लौटने लगी है। लोग राहत की सांस भी नहीं ले पाए कि आक्रमण फिर तेज हो गया। पर यह भी एक किस्म का भ्रम ही था।

पिछले एक महीने में तो इस संक्रामक बीमारी का जिस तरह विस्तार हुआ है, उसने सारी मानव बिरादरी को हिला दिया है। रोज मिलने वाली जानकारियों पर तो एकबारगी भरोसा करने को जी नहीं करता। मानवता के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा दूसरा उदहारण होगा, जिसमें आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक ताने बाने को चरमराते देखा गया हो। कोई भी देश या समाज अपनी बदहाली, गरीबी, बेरोजगारी या व्यवस्था के टूटने पर दोबारा नए सिरे से अपनी जीवन रचना कर सकता है, लेकिन अगर सामाजिक मूल्य और सोच की शैली विकलांग हो जाए तो सदियों तक उसका असर रहता है। मौजूदा सिलसिले की यही कड़वी हकीकत है। खासकर भारत के सन्दर्भ में कहना अनुचित नहीं होगा कि बड़े से बड़े झंझावातों में अविचल रहने वाला हिन्दुस्तान अपने नागरिकों के बीच रिश्तों को अत्यंत क्रूर और विकट होते देख रहा है। क्या यह सच नहीं है कि कोरोना ने सामाजिक बिखराव की एक और कलंकित कथा लिख दी है।

एक बरस के दरम्यान हमने श्रमिकों और उनके मालिकों के बीच संबंधों को दरकते देखा। पति पत्नी, बेटा-बहू भाई बहन, चाचा-ताऊ, मामा,मौसा फूफा जैसे रिश्तों की चटकन देखी। भारतीय समाज में एक कहावत प्रचलित है कि किसी के सुख या मंगल काम में चाहे नहीं शामिल हों, मगर मातम के मौके पर हर हाल में शामिल होना चाहिए। कोरोना काल तो जैसे मृत्यु के बाद होने वाले संस्कारों में शामिल नहीं होने का सन्देश लेकर आया। लोग अपने दिल के बेहद निकट लोगों के अंतिम दर्शन तक नहीं कर पाए। आजादी के बाद सबसे बड़ा विस्थापन-पलायन हुआ। इस पलायन ने रोजी-रोटी का संकट तो बढ़ाया ही, आपसी संबंधों में भी जहर घोल दिया। क्या इस तथ्य से कोई इनकार कर सकता है कि कोरोना काल में रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा बन कर उभरा है। जो परिवार वर्षों बाद महानगरों से भागकर अपने गांवों में पहुंचे हैं, वे अपनी जड़ों में नई जमीन को तलाश रहे है और उस गांव, कस्बे के पास अपने बेटे को देने के लिए दो जून की रोटी भी नहीं है। भारतीय पाठ्य पुस्तकों में ज्ञान दिया जाता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, लेकिन हकीकत तो यह है कि हम अब असामाजिक प्राणी होते जा रहे हैं। 

यह निराशावाद नहीं है। इस कालखंड का भी अंत होगा। सालभर में अनेक दर्दनाक कथाओं के बीच मानवता की उजली कहानियां भी सामने आई हैं। संवेदनहीनता के बीच कुछ फरिश्ते भी प्रकट होते रहे हैं। पर यह तो सरकारों को ही तय करना होगा कि ऐसी विषम परिस्थितियों के बीच अपनी आबादी की हिफाजत कैसे की जाए। यह उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। आज गांवों, कस्बों, जिलों और महानगरों में तरह-तरह की विरोधाभासी खबरों के चलते निर्वाचित हुकूमतों की साख पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।

आम आदमी की समझ से परे है कि नाइट कर्फ्यू का औचित्य क्या है? रात दस ग्यारह बजे के बाद तो वैसे ही यातायात सिकुड़ जाता है, फिर उस समय निकलने पर पाबंदी का क्या अर्थ है। रविवार को लॉकडाउन रखने का भी कारण स्पष्ट नहीं है। कोरोना इतना विवेकशील वायरस तो नहीं है जो दिन और समय का फर्क करते हुए अपना आकार बढ़ाए। यह सरकारी प्रपंच नहीं तो और क्या है कि खुद राजनेताओं और उनके दलीय कार्यक्रमों में पुछल्ले नेता कोरोना से बचाव के दिशा निर्देशों की धज्जियां उड़ाते दिख रहे हैं। पाबंदियों के निर्देश जितने लंबे नहीं होते, उससे अधिक सूची तो उनमें छूट देने वाले प्रशासनिक निर्देशों की होती है। जिन प्रदेशों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उनमें तो लगता है किसी को कोरोना की चिंता नहीं है। न भीड़ को, न उम्मीदवारों को न सियासी पार्टियों को और न सितारा शिखर पुरुषों को। लोग हैरान हैं कि यह कैसा वायरस है, जो उन प्रदेशों में ज्यादा कहर ढा रहा है, जहां चुनाव नही हो रहे हैं। यह मात्र संयोग है कि गैर बीजेपी शासित राज्यों में लगातार स्थिति बिगड़ती जा रही है और जहां बीजेपी की सरकार है, वहां सब कुछ काबू में दिखाई देता है। इंदौर और भोपाल जैसे शहर जो अपनी जागरूकता के लिए विख्यात हैं, वहां कोरोना से बचने के लिए आम आदमी ही लापरवाह नजर आते हैं।

इसी तरह चिकित्सा तंत्र एक कसैली मंडी में बदलता दिखाई दे रहा है। इलाज के लिए कोई कीमतों का निर्धारण नहीं है। अस्पताल मनमानी फीस ले रहे हैं। गंभीर रूप से पीड़ितों को छोड़ दें तो अस्पतालों के पास गले की एंटीबायोटिक और विटामिन की गोलियां देने के सिवा कोई उपचार विधि स्पष्ट नहीं है। कुछ अस्पताल तो फाइव स्टार होटल से बाकायदा खाना ऑर्डर करते हैं और उसका चार गुना बिल में वसूलते हैं। क्या उन पर अंकुश लगाने का कोई फार्मूला सरकारों के पास है?

(साभार: लोकमत समाचार)

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विकास में पैसा लगता नहीं, बनता है: पूरन डावर

यदि खबरें ठीक हैं तो निश्चय ही अच्छे दिन आने वाले हैं। सरकार की नीतियों और सोच को नमन। गड्डों को भरना, अच्छे बसअड्डे, रेलवे स्टेशन, रोड व्यवस्था और क्या चाहिये।

पूरन डावर by
Published - Friday, 26 March, 2021
Last Modified:
Friday, 26 March, 2021
pooran5410

यदि खबरें ठीक हैं तो निश्चय ही अच्छे दिन आने वाले हैं। सरकार की नीतियों और सोच को नमन। गड्डों को भरना, अच्छे बसअड्डे, रेलवे स्टेशन, रोड व्यवस्था और क्या चाहिये। रोड पर बिल्डर खर्च करें, हमारे टैक्स का पैसा न लगे, बसअड्डों पर पूरी सुविधा हो, पैसा भी सरकार का न लगे, यही तो विकसित देशों में होता है।  विकास में पैसा लगता नहीं, बनता है।

अधिक विकास-अधिक समृद्ध, भारत जितना निजीकरण होगा उतनी ही अच्छी सुविधा। रेलवे स्टेशन यदि निजी हाथों में हों तो मेट्रो स्टेशन से कम नहीं। रेस्टोरेंट भी, शॉपिंग भी, एयर कंडिशन का मजा भी... जो दिखता है वो बिकता है। देश की अर्थव्यवस्था भी तेजी से भागती है। स्टेशन पर समय से पहले पहुंच गए तो कॉफी भी पी रहे हैं, शॉपिंग भी कर रहे हैं।

बस स्टैंड जब निजी उपक्रम बनाएंगे, तो किसी मॉल से कम नही होंगे। साफ सुथरे होंगे। व्यवस्थित होंगे। बसें सरकारी भी होंगी, प्राइवेट भी। शर्म आती है आगरा का आईएसबीटी देखकर। लगता है किसी गांव में है अंतरराष्ट्रीय शहर में नहीं।

अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए सर्वाधिक महत्व है घाटे की घरों को बंद करना। उसके दो उपाय हैं, या बंद या निजीकरण। निजीकरण से एक नहीं, दो नहीं, तीन लाभ होते हैं। पहला सरकार का घाटा बंद, दूसरा बंद करने से सुविधा-सेवा समाप्त और लागत का डूब जाना। निजीकरण से लागत जो लग चुका है उसका कुछ हिस्सा मिल जाता। निजी उपक्रमों की गुणवत्ता कई गुनी होती है। निजी संस्थान जो कमाते हैं, उस पर टैक्स भी मिलता है। निजी उपक्रम अच्छी सेवा देकर, पैसा बनाते हैं। यदि उल्लंघन करते हैं तो सरकार है, अदालतें है सरकारी उपक्रम के विरुद्द आप कुछ नहीं कर पाते। सीमित सोच के व्यक्ति सिर्फ व्यक्तिगत आरोप लगा सकते हैं, बेच दिया-बेच दिया कर सकते हैं।  

सरकार का कार्य मूलभूत सेवाएं उपलब्ध कराना है। सुरक्षा देना है, कानून व्यवस्था बनाना, जो अब तक हो रहा था वह कतई गलत नही था। निजी उपक्रम तब तक नहीं आते जब तक लाभदायक न हों। सरकार को सेवा देनी ही है, लेकिन जब घाटे का बोझ बढ़ जाता है और समय के साथ निजी उपक्रम के लिये व्यवहार्य भी हो जाता है। ‘बेच दिया-बेच दिया’ से हास्यास्पद सोच कोई हो नहीं सकती।

बैंक निजी होतीं, तो माल्या को भगा दिया या चौकसी को भगा दिया, बड़े आदमी के कर्जे नफा कर दिया। बैंकिंग एक व्यवसाय है ब्याज कमाते हैं, तो जोखिम भी होगा। हर व्यवसाय में जोखिम होता है, जोखिम न हो तो सभी व्यवसाय कर लें। बैंक जब करोड़ों ब्याज कमाती हैं, तो कुछ एनपीए भी होंगे। हर व्यवसाय में लेनदारियां मरती हैं। सरकारी बैंक होते हैं, तो राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना होती है। एनपीए भी बढ़ते हैं। सरकार पर माफ करने के आरोप लगते रहते हैं। राजनीति हस्तक्षेप से गलत सेटलमेंट होते भी हैं। आरोप लगता है जनता के टैक्स का पैसा लेकर भाग गये और सरकार ने कुछ नहीं किया। लिहाजा एकमात्र उपाय है- निजीकरण। जब राष्ट्रीयकरण हुआ था, तो उस समय देश की आवश्यकता थी। आज उससे निकलने की आवश्यकता है। आज बैंकिंग परिपक्व हो चुकी है। सरकार को केवल छोटे-छोटे ऋण और किसानों के लिए सहकारी बैंक की ही व्यवस्था करनी चाहिए।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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