'सर्वे करने वाली एजेंसियों के कार्यकर्ताओं के पास वो आंख नहीं, जो पत्रकार के लिए जरूरी है'

पांच प्रदेशों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव के परिणामों पर जानकारों और एजेंसियों ने अपने अपने आकलन जारी करना शुरू कर दिया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 10 March, 2021
Last Modified:
Wednesday, 10 March, 2021
vote54545

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

पांच प्रदेशों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव के परिणामों पर जानकारों और एजेंसियों ने अपने अपने आकलन जारी करना शुरू कर दिया है। इस तरह के आकलन अधिकतर मीडिया संस्थानों या चैनलों तथा समाचार-पत्रों की ओर से कराए जाते हैं।

स्वस्थ्य लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार और अन्य सियासी दलों के कामकाज पर इस तरह के पूर्वानुमानों पर किसी को एतराज नहीं होना चाहिए। आमतौर पर इस तरह के पूर्वानुमान सच के आसपास होते हैं। लेकिन कई बार ऐसा हुआ है कि चुनाव पूर्व सर्वेक्षण गलत भी निकले हैं। एक दो निर्वाचनों में तो वे अपने को उपहास का केंद्र बना बैठे हैं। पाठकों और दर्शकों के नजरिए से देखूं तो ये आकलन उनकी वैचारिक भूख शांत नहीं करते।

दरअसल, वे जानना चाहते हैं कि अगर कोई सत्तारूढ़ पार्टी दोबारा बहुमत के साथ लौट रही है तो उसके आंतरिक कारण क्या हैं ? और यदि उसकी लुटिया डूब रही है तो उसने पांच बरस में क्या गुड़ गोबर किया है। इस आधार पर यह आकलन बहुत ठोस जमीन पर खड़े नजर नही आते। जबसे इस देश में चैनल युग आया है, मुझे अनेक चुनावों में कवरेज के लिए देश भर में घूमने का अवसर मिला है। कई चैनलों के मुखिया के तौर पर काम करते हुए पूर्वानुमान लगाने वाली कुछ संस्थाओं के साथ काम करने का अनुभव भी मिला है।

मेरा मानना है कि इन एजेंसियों के सर्वेक्षण कार्यकर्ताओं के पास वह आंख नहीं होती, जो आमतौर पर एक पत्रकार के लिए आवश्यक होती है। वे बजट को ध्यान में रखकर अपनी सर्वे टीम का चुनाव करती हैं। इस वजह से उनमें या तो जनसंचार के अनुभवहीन छात्र शामिल हो जाते हैं अथवा ऐसे प्रोफेशनल जो किसी कारोबारी उत्पाद के लिए मार्केट सर्वेक्षण का काम करते हैं।

वह साबुन बनाने वाली कंपनी या नेपकिन वाली कंपनी के कार्यकर्ता भी हो सकते हैं। कभी-कभी तो यह हुआ है कि आकलन करने वाली एजेंसियां आवंटित बजट से मुनाफा बढ़ाने के लिए उतने कार्यकर्ताओं को तैनात नहीं करतीं, जितने उन्होंने अपने बजट-प्रस्ताव में दिए होते हैं। यह कार्यकर्ता किसी शहर में घर घर या अपेक्षित मतदाताओं से संपर्क नहीं करते। वे खुद ही सारे प्रपत्र भर देते हैं और दाखिल कर देते हैं। एक चैनल में मैंने और मेरे कुछ साथियों ने यह गड़बड़ पकड़ ली थी।

पंद्रह-सोलह साल पूर्व चुनाव के दिनों में हम विधायक का रिपोर्ट कार्ड दिखाने वाले थे। इसके लिए एक एजेंसी को अनुबंधित किया गया। उसकी प्रश्नावली में कुछ ऐसे सवाल थे जिनके उत्तर मैदान में जाने पर ही मिल सकते थे।

मगर एजेंसी के कार्यकर्ताओं ने नागपुर के किसी स्थान पर बैठकर सारे प्रपत्र भर दिए। उदाहरण के तौर पर एक सवाल था कि विधायक से कितने प्रतिशत लोग परिचित हैं या उसका नाम जानते हैं। प्रपत्र में भर दिया गया कि 95 फीसदी लोगों ने विधायक का नाम ही नहीं सुना। जब यह जानकारी प्रसारित हुई तो हम लोगों को ताज्जुब हुआ क्योंकि वह एक बेहद लोकप्रिय विधायक के बारे में था। जब संबंधित मतदाताओं से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उनके पास कोई आया ही नहीं। उसके बाद चैनल को लाखों  रुपये का भुगतान रोकना पड़ा।

कभी-कभी सर्वेक्षण करने वाली एजेंसी का अपना भी राजनीतिक रुझान होता है। मतदाता कुछ भी कहें ,वह निष्कर्ष वही निकालती है, जो वह चाहती है। मेरे एक छात्र ने बारह साल पहले एक एजेंसी इसीलिए छोड़ दी थी कि वह जिस इलाके से मेहनत करके अपनी रिपोर्ट लाया था, वह बदल दी गई। उसे बड़ा दुःख हुआ और उसने अपना इस्तीफा प्रस्तुत कर दिया। इन दिनों हम देखते हैं कि एजेंसी के अलावा मीडिया घरानों का भी अपना रुझान होता है। खासतौर पर मौजूदा दौर तो अत्यंत संवेदनशील है।

पत्रकार राजनीतिक खेमों में बंटे नजर आने लगे हैं। ऐसे में सर्वे करने वाली एजेंसियों को उसका ध्यान रखना पड़ता है। अगर उसने अपनी रिपोर्ट में हकीकत बयान कर दी, जो मीडिया समूह के रुझान के खिलाफ है तो उसका भुगतान लटक सकता है।

आज के आर्थिक दबाव में कोई एजेंसी यह एफोर्ड नहीं कर सकती। इस कम में राज नेताओं के अपने हित भी होते हैं।वे चुनाव जीतने के लिए सारे हथकंडे अपनाते हैं। यह छिपा नहीं है कि विधानसभा चुनाव में  नेता जीतने के लिए दस से बीस करोड़ रूपए खर्च करता है।

इस बजट में वह आकलन एजेंसियों या उनके कार्यकर्ताओं को लुभाने का प्रयास करता है। वह जानता है कि भारतीय मतदाता इन सर्वेक्षणों पर भरोसा करता है। वोटर सोचता है कि जब उसका उम्मीदवार जीत ही नहीं रहा या उसके दल की सरकार नहीं बन रही तो वोट क्यों बर्बाद किया जाए। इस तरह ये चुनाव पूर्व आकलन परिणामों की दिशा भी मोड़ने का काम कर जाते हैं।      

लोकतंत्र के नजरिए से इस तरह के पूर्वानुमानों का निर्दोष और निष्पक्ष होना बहुत आवश्यक है। ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल के बीच बड़ा फासला है। ऐसे में अगर मीडिया इस फासले का दुरुपयोग करता है तो वह किसी भी सूरत में मंजर नहीं किया जाना चाहिए। 

(साभार: अमर उजाला)

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

'भारत की सकारात्मक छवि और उपलब्धियों को भी दिखाएं CNN, BBC जैसे विदेशी मीडिया संस्थान'

न्यूज मीडिया में सनसनीखेज समाचार ही सबसे ज्यादा देखे व पढ़े जाते हैं, खासकर आजकल के डिजिटल युग में, जहां पर ज्यादातर नकारात्मक टिप्पणियां यानी निगेटिव बातें ही हेडलाइंस बनती हैं

Last Modified:
Sunday, 24 October, 2021
drbatra545454

डॉ. अनुराग बत्रा।।

न्यूज मीडिया में सनसनीखेज समाचार ही सबसे ज्यादा देखे व पढ़े जाते हैं, खासकर आजकल के डिजिटल युग में, जहां पर ज्यादातर नकारात्मक टिप्पणियां यानी निगेटिव बातें ही हेडलाइंस बनती हैं और उन्हीं से पेज व्यूज बढ़ने के साथ ही रेवेन्यू में इजाफा होता है। न्यूज संस्थानों और संपादकों की बात करें तो चाहे वो डिजिटल हो या टेलिविजन, तमाम विषयों पर स्टोरी कर रहे हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में पूरे देश में और यहां के लोगों में नकारात्मकता पर ज्यादा रोशनी डाली जाती है। ऐसे में फिर इसका उपयोग केवल बदनाम करने के लिए किया जाता है और यहां तक कि आतंकित करने के लिए भी किया जाता है, हर कोई एक लाइन में खड़ा नजर आता है। एक ऐसी रेखा जिसे मीडिया ने खींचने का फैसला किया है। 

लेकिन इससे पहले की मैं अपने द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे तर्कों की गहराई में उतरूं, मैं बता देना चाहता हूं कि मैं एक वैश्विक यात्री और नागरिक हूं। मैं बिना किसी झिझक के कह सकता हूं कि मैं अमेरिका से प्रभावित हूं। मुझे हॉलीवुड से उतना ही प्यार है, जितना कि मुझे भारतीय सिनेमा से। मैं अमेरिका में आइवी लीग विश्वविद्यालयों में अपने दोनों बच्चों के स्टूडियो को देखना चाहता हूं और इसकी संस्कृति, व्यापार और शेयर बाजारों से प्रभावित हूं। इस देश में इनोवेशन की संस्कृति है जो समस्याओं को हल करती है और बड़ी कंपनियों का निर्माण करती है और एंटरप्रिन्योरशिप को चलाती है, जैसा और कहीं नहीं है। मेरा जन्मदिन भी उसी दिन (27 अगस्त) होता है, जिस दिन दो बार अमेरिका के राष्ट्रपति रह चुके लिंडन बेन्स जॉनसन (Lyndon B Johnson) का होता है। मैं अमेरिका और हर अमेरिकी के लिए अपने प्यार के बारे में बता सकता हूं। लेकिन मुझे अमेरिका की एक चीज सबसे ज्यादा अच्छी लगती है और वह है मीडिया... वह भी मेरे बिजनेस की वजह से।

मैं खासतौर पर सबसे ज्यादा ‘सीएनएन’ (CNN) को पसंद करता हूं और जिस तरीके का वह कंटेंट देता है, चाहे वह न्यूज हो या ब्रैंड वह काफी विकसित और बेहतर पैकेज में होता है, जिसे मैं काफी पसंद करता हूं। ‘सीएनएन इंटरनेशनल‘ मेरा पसंदीदा चैनल है और मैं उसे रोजाना दो से चार घंटे देखता हूं और रविवार को यह समय छह घंटे से भी ज्यादा हो सकता है। इसके दो ऐसे शो हैं-फरीद जकारिया का ‘GPS’ और ब्रायन स्टेल्टर का ‘Reliable Sources’, जिन्हें मैं कभी मिस नहीं करता। यहां कि यदि मैं व्यस्त भी होता हूं तो मैं ये सुनिश्चित करता हूं कि ये रिकॉर्ड हो जाएं और दिन में देर भी हो जाए तो मैं इन्हें देख लूं। मैं जिससे मिलता हूं चाहे निजी अथवा बिजनेस के सिलसिले में, उन तमाम लोगों से भी मैं इन शो को देखने के लिए कहता हूं और ऐसे लोगों की गिनती शायद हजारों में है। वैश्विक राजनीति और वैश्विक मीडिया में रुचि रखने वाले तमाम भारतीयों की तरह मैं खाड़ी युद्ध के बाद से सीएनएन से जुड़ा हुआ हूं।

रिज खान जैसे दिग्गज का मैं कई वर्षों से प्रशंसक हूं और करीब 12 साल पहले मैंने रिज खान को एक्सचेंज4मीडिया न्यूज ब्रॉडकास्ट कॉन्फ्रेंस ‘न्यूजनेक्स्ट’ (NewsNxt) में आमंत्रित किया था। इसके अलावा न्यूज को लेकर मैं एक और संस्थान ‘बीबीसी’ (BBC) को काफी पसंद करता हूं और उसका सम्मान करता हूं। मैं टिम सेबस्टियन के शो ‘Hard Talk’ को देखते हुए बड़ा हुआ हूं और इसके नए होस्ट को देखना अभी तक जारी है। मुझे ‘एक्सचेंज4मीडिया’ में मैथ्यू अमरोलीवाला की मेजबानी करने का सौभाग्य मिला है और वह मुलाकात काफी शानदार थी। निजी तौर पर मैं ‘बीबीसी इंडिया’ की तत्कालीन बिजनेस हेड सुनीता राजन की शादी में भी शामिल हुआ था। हालांकि, टिम सेबस्टियन के साथ एक घंटे की बातचीत काफी बेहतरीन थी। ‘सीएनएन’ के बाद मुझे ‘बीबीसी’ काफी पसंद है। मैं सीएनएन और बीबीसी को लेकर अपनी पसंद, उनके प्रति मेरे सम्मान और मुझ पर उनके प्रभाव के बारे में बहुत सारी बात कर सकता हूं। दोनों टॉप न्यूज और लाइव इवेंट्स के अलावा घरेलू बाजार को लेकर भी अपना नजरिया रखते हैं। मुझे यह भी लगता है कि इन दो प्रमुख प्लेटफार्म्स के बीच कई बार कंटेंट की समरूपता (convergence) होती है, हालांकि, शैली और इसे प्रस्तुत करने का तरीका अलग रहता है।

लेकिन मैं यह सब आपके साथ क्यों शेयर कर रहा हूं? मैं आपको यह बताने के लिए यह सब शेयर कर रहा हूं कि जब मैं अपने विचार प्रस्तुत करता हूं तो उसका बैकग्राउंड होता है कि मैं सीएनएन और बीबीसी के साथ जुड़ता हूं- टीवी पर और अब डिजिटल रूप से- और जो कुछ वे कहते हैं, उससे मैं भलीभांति परिचित हूं। हालांकि उनका अपना एजेंडा, विश्वास और शायद कभी-कभी पूर्वाग्रह भी होता है, इसके बावजूद मैं उनका सम्मान करता हूं। मुझे उनके एंकर्स की उच्च क्वालिटी को लेकर भी काफी विश्वास है। मीडिया इंडस्ट्री में होने के नाते और इसके साथ ही उनके साथ निजी तौर पर मिलकर बातचीत करने के नाते मैं ये सब जानता हूं। इनमें से बहुत से मीडिया प्रोफेशनल्स भी भारतीय हैं अथवा भारतीय मूल के हैं। मेरे तर्क के बारे में यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है।

इस साल की शुरुआत में भारत में कोविड-19 महामारी के दूसरे चरण के दौरान, सीएनएन, बीबीसी समेत तमाम वैश्विक मीडिया संस्थानों ने भारत पर अपना ध्यान केंद्रित किया और कई खबरें कीं। उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग की और दिल दहला देने वाली स्टोरीज दिखाईं। इनमें जलती चिताएं, अंतिम संस्कार के लिए रखीं लाशें और शोक संतप्त रिश्तेदारों को दिखाया गया। वे भारत सरकार, यहां के समाज और लोगों की लगातार आलोचना कर रहे थे। उन्हें ऐसी पार्टियों का साथ मिल गया, जो सरकार की आलोचक हैं या मैं कहूं कि भारत को विभाजित करने वाली हैं, विपक्ष में हैं अथवा देश के सामने आने वाली प्रतिकूलताओं अथवा परेशानियों को और बढ़ाने वाली हैं। किसी भी तरह से देश में सब कुछ इतना डरावना नहीं था। केंद्र और राज्य सरकारें और भी बहुत कुछ कर सकती थीं, एक समाज के रूप में हम और बेहतर हो सकते थे और एक नागरिक के रूप में हम और मदद कर सकते थे।

पिछले दिनों कैबिनेट में हुए फेरबदल में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को महामारी से खराब तरीके से निपटने और उनके मंत्रालय की इस मामले में ढिलाई के लिए उन्हें बाहर कर दिया गया था। प्रधानमंत्री ने इस पर संज्ञान लिया और कार्रवाई की। नए मंत्री की नियुक्ति और प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की निगरानी से वैक्सीनेशन की गति तेज हो गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय और नए स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया, वैक्सीन और कोविड-19 के लिए गठित टास्क फोर्स के प्रमुख आरएस शर्मा, विभिन्न राज्य सरकारें, सिविल सोसायटीज, डॉक्टर, स्वास्थ्य कार्यकर्ता, गैर सरकारी संगठन, कॉर्पोरेट और सबसे महत्वपूर्ण कि देश के लोगों ने केंद्र सरकार के माध्यम से स्थिति को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने में मदद की और टीकाकरण की एक अरब खुराक को लोगों तक पहुंचाने का अविश्वसनीय सा मुकाम हासिल कर लिया। भारत के नागरिकों ने अपनी सरकार पर भरोसा किया और मेरे हिसाब से पीएम मोदी की विश्वसनीयता के आलोक में बाहर जाकर टीका लगावाया। 700 मिलियन से अधिक भारतीयों को टीके की एक खुराक मिली है और 300 मिलियन से अधिक लोगों का पूरी तरह से टीकाकरण हो गया है। हम अभी भी हार नहीं मान रहे हैं। हम एक नया और ऊंचा मील का पत्थर चुनेंगे और इसे हासिल करेंगे। यहां तक कि अप्रैल से प्रशासन बूस्टर खुराक शुरू करने पर भी विचार कर रहा है। कोविन की सफलता प्रशासन के कार्यक्रम की प्रगति में एक अविश्वसनीय उत्प्रेरक रही है। वैश्विक स्तर पर यह एक बड़ी उपलब्धि है।

हम अमेरिका और यूरोप समेत अन्य देशों में वैक्सीन को लेकर हिचकिचाहट और अपेक्षाकृत कम आंकड़ों को देखें, तो पता चलेगा कि  ये वही देश हैं जो भारत को उपदेश दे रहे हैं। सीएनएन और बीबीसी के नेतृत्व वाले मीडिया प्लेटफॉर्म्स जिन्होंने भारत को नीचा दिखाया है, उन्हें अब निश्चित रूप से यह महसूस करना चाहिए कि वे भारत की इतनी खराब इमेज बनाने के लिए काफी कठोर थे, क्योंकि उन्होंने जानबूझकर देश की वैश्विक विश्वसनीयता को कम किया है। हम अपने टीकाकरण कार्यक्रम के कारण आर्थिक सुधार की राह पर हैं। 

पीएम मोदी ने अपने संबोधन में इसका जिक्र किया है। उन्होंने जो कुछ हो रहा है, उसकी व्यापक रूपरेखा को सामने रखा और अर्थव्यवस्था को विकास की पटरी पर और गति से वापस लाने की योजना भी बनाई है।

निष्पक्ष न्यूज प्लेटफॉर्म्स के रूप में ‘सीएनएन’ और ‘बीबीसी’ को संभवतः अब भारत में स्टेकहोल्डर्स और आम नागरिकों से बात करनी चाहिए कि वे कैसा महसूस करते हैं। मुझे पता है कि भारत कोविड की तीसरी लहर की आशंका को देखते हुए खुद को तैयार करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है, फिर चाहे वह अस्पताल के बेड हों, स्वास्थ्य सेवा का बुनियादी ढांचा हो, ऑक्सीजन की उपलब्धता या अन्य व्यवस्थाएं हों। मुझे उम्मीद है कि ‘सीएनएन’ और ‘बीबीसी’ अब अपने कार्यक्रमों में टीकाकरण को तैयारी और सफलता के लिए भारत के प्रयासों को प्रमुखता से सामने लाएंगे। मुझे उम्मीद है कि ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ और ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ भारत में बड़े पैमाने पर हुए वैक्सीनेशन और इसकी बड़ी सफलता की तस्वीरें वैश्विक पटल पर सामने रखेंगे। मुझे उम्मीद है कि विदेशी मीडिया वैक्सीनेशन समेत तमाम क्षेत्रों में भारत सरकार की सफलता को दिखाएगा। देश की सामाजिक संस्थाओं (civil society), गैर सरकारी संगठनों, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और यहां तक कि मीडिया संस्थानों ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मैं वैक्सीन की दोनों डोज ले चुका हूं और यह उतना ही आसान था, जितना कि पास की कॉफी शॉप में कॉफी लेना।

मैं पिछले 20 वर्षों के अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि विदेशी मीडिया भारत की नकारात्मक छवि को उभारता है और विशेष रूप से यहां की उपलब्धियों को कम दिखाता है। एनडीए सरकार के पिछले करीब साढ़े साल के कार्यकाल में इसमें और इजाफा हुआ है। देश विरोधी तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले कई भारतीय पत्रकारों ने अपने निहित स्वार्थों के लिए मौजूदा सरकार और प्रधानमंत्री के खिलाफ प्रचार को और बढ़ाने का काम किया है। विदेशी मीडिया को इन विचारों को संतुलित तरीके से पेश करना चाहिए और भारत के विकास में सभी हितधारकों से बात करना चाहिए, चाहे वे राजनेता हों, नीति निर्माता हों, सरकारी अधिकारी, मीडिया और स्वतंत्र विश्लेषक हों। मेरा मानना है कि आलोचना के साथ-साथ भारत की सकारात्मकता को दिखाना भी उनका कर्तव्य है, जो यहां हो रही है। 
भारत आगे बढ़ रहा है और अगले तीन वर्षों में यह काफी तेज गति से आगे बढ़ेगा- और मैं वादा कर सकता हूं कि कोई भी पश्चिमी पत्रकार न तो समझ रहा है, न ही विश्लेषण कर रहा है और न ही उसमें इतना साहस है कि आंखें खोलकर देखे कि इस सरकार और पीएम के नेतृत्व में भारत ने कितनी प्रगति की है। यह भारत, यहां के नागरिकों, सरकार और पीएम को श्रेय देने का समय है। कृपया निष्पक्ष होने में संकोच न करें।

भारत में समावेशी मानवतावाद है। हम भारतीय हमेशा ही रचनात्मक, मेहनती, ईमानदारी व निस्वार्थ सेवा देने वाले रहे हैं। महामारी के दौरान पिछले 18 महीनों में हमने देशवासियों को अपने लोगों के समर्थन में दिल खोलकर पैसा खर्च करते व हर तरह से मदद करते देखा है। मैं विदेशी मीडिया में देखना चाहता हूं कि वह हमारी कमियों के साथ-साथ हमारे वैक्सीनेशन प्रोगाम की पूरी सफलता की कहानी को भी दिखाएं, संख्या दिखाएं, आंकड़े दिखाए और हमारी प्रगति को भी दिखाएं। ऐसा कुछ जो हर देश ने महामारी के दौरान अनुभव किया है और वह भी जिस पर अभी तक उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, जो हमारे हासिल किया है।

प्रधानमंत्री को आत्मनिर्भर अभियान के लिए धन्यवाद। दुनियाभर की परेशानियों को हल करने में अपना सहयोग देने के लिए हम भारतीय हमेशा ही मजबूती के साथ खड़े रहते हैं। एक भारतीय के तौर पर हम जानते हैं कि दुनिया में कहीं भी कुछ होता है, तो उसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर पड़ता है। देश में इतने बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान को लेकर भारत में दुनिया के लिए एक रोल मॉडल बनने की क्षमता है। साथ ही हमारे कई नेताओं, सरकारों और सामाजिक संस्थाओं में भी टीकाकरण अभियान में तेजी लाकर और दुनिया की मदद कर प्रेरणास्रोत बनने की क्षमता है।

इसलिए मैं वैश्विक मीडिया से कहना चाहता हूं कि भगवान के लिए जागिए और आगे बढ़कर यहां की सकारात्मकता को दिखाइए (smell the coffee)। टीकाकरण में भारत की सफलता को दुनिया के सामने लाने का समय आ गया है। दुनिया को बचाने में भारत अग्रणी भूमिका निभा सकता है। भारत को आगे करना मतलब दुनिया को आगे बढ़ाना है। बेहतर उपलब्धि के लिए हम भारतीयों के साथ-साथ यहां की सरकार को भी कुछ श्रेय दीजिए।

आखिर में मैं यह कहना चाहता हूं कि जब मैंने यह सब लिखा तो मुझे यह देखकर निराशा हुई कि ‘सीएनएन’ ने अपनी एक स्टोरी में शीर्षक दिया है, जिसमें कहा गया है, ‘भारत ने एक बिलियन लोगों को कोविड वैक्सीनेशन दिया है, लेकिन अभी भी लाखों लोग ऐसे हैं, जिन्हें पहली डोज लगनी बाकी है।’ यहां कहना चाहूंगा कि यदि अनिच्छा से किसी की तारीफ करना हो तो ही ऐसे किया जा सकता है।

(लेखक ‘बिजनेसवर्ल्ड’ समूह के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ समूह के को-फाउंडर व एडिटर-इन-चीफ हैं।)

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

ऐसे ही सामूहिक प्रयत्नों से हम इस लड़ाई में विजयी हो सकते हैं: प्रो. संजय द्विवेदी

हमारे शास्त्रों में कहा गया है, ‘त्याज्यम् न धैर्यम्, विधुरेऽपि काले’। अर्थात, कठिन से कठिन समय में भी हमें धैर्य नहीं खोना चाहिए।

Last Modified:
Friday, 22 October, 2021
Covid1945454

-प्रो. संजय द्विवेदी, महानिदेशक, भारतीय जन संचार संस्थान ।।

हमारे शास्त्रों में कहा गया है, ‘त्याज्यम् न धैर्यम्, विधुरेऽपि काले’। अर्थात, कठिन से कठिन समय में भी हमें धैर्य नहीं खोना चाहिए। किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए हम सही निर्णय लें, सही दिशा में प्रयास करें, तभी हम विजय हासिल कर सकते हैं। इसी मंत्र को सामने रखकर भारत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कोरोना वैक्सीन के 100 करोड़ डोज का आंकड़ा पूरा कर इतिहास रच दिया है। 100 साल में आई सबसे बड़ी महामारी का मुकाबला करने के लिए अब पूरे देश के पास 100 करोड़ वैक्सीन डोज का मजबूत सुरक्षा कवच है। ये उपलब्धि भारत की है, भारत के प्रत्येक नागरिक की है।

पिछले वर्ष जब देश में कोरोना के कुछ ही मरीज सामने आए थे, उसी समय भारत में कोरोना वायरस के खिलाफ प्रभावी वैक्‍सीन्‍स के लिए काम शुरू कर दिया गया था। हमारे वैज्ञानिकों ने दिन-रात एक करके बहुत कम समय में देशवासियों के लिए वैक्‍सीन्‍स विकसित की हैं। आज दुनिया की सबसे सस्ती वैक्सीन भारत में है। भारत की कोल्ड चेन व्यवस्था के अनुकूल वैक्सीन हमारे पास है। इस प्रयास में हमारे प्राइवेट सेक्‍टर ने नवाचार और उद्यमिता की भावना का बेहतरीन प्रदर्शन किया है। वैक्सीन्स की मंजूरी और नियामक प्रक्रिया को फास्ट ट्रैक पर रखने के साथ ही, वैज्ञानिक मदद को भी बढ़ाया गया है। यह एक टीम वर्क था, जिसके कारण भारत, दो मेड इन इंडिया वैक्सीन्स के साथ दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरू कर पाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीकाकरण के पहले चरण में ही गति के साथ इस बात पर जोर दिया कि ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों तक, जरूरतमंद लोगों तक वैक्सीन पहुंचे।

देश में 16 जनवरी से वैक्सीनेशन अभियान की शुरुआत हुई थी। शुरुआती 20 करोड़ वैक्सीन डोज देने में 131 दिन का समय लगा। अगले 20 करोड़ डोज 52 दिन में दिए गए। 40 से 60 करोड़ डोज देने में 39 दिन लगे। 60 करोड़ से 80 करोड़ डोज देने में सबसे कम, सिर्फ 24 दिन का समय लगा। इसके बाद 80 करोड़ से 100 करोड़ डोज देने में 31 दिन का वक्त लगा। अगर इसी रफ्तार से वैक्सीनेशन होता रहा, तो देश में 216 करोड़ वैक्सीन डोज लगने में करीब 175 दिन और लगेंगे। इसका मतलब है कि 5 अप्रैल, 2022 के आसपास ये आंकड़ा हम पार कर सकते हैं। हम भले ही 100 करोड़ डोज का आंकड़ा पार कर चुके हैं, लेकिन देश की 20 प्रतिशत आबादी ही अभी पूरी तरह वैक्सीनेट हुई है। 29 प्रतिशत आबादी को वैक्सीन की एक डोज दी जा चुकी है। ऐसे में मास्क फ्री होने के लिए हमें अभी इंतजार करना होगा। जब तक 85 प्रतिशत आबादी पूरी तरह वैक्सीनेट नहीं हो जाती, तब तक ऐसा करना खतरनाक हो सकता है। जिन देशों में मास्क से छूट दी गई है, वहां जनसंख्या घनत्व भारत की तुलना में काफी कम है। ऐसे में हमें अपनी जरुरतों के हिसाब से ही फैसला लेना चाहिए। एक रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी तक देश की 60 से 70 प्रतिशत आबादी पूरी तरह वैक्सीनेटेड हो जाएगी। इस वक्त तक भारत ‘हर्ड इम्यूनिटी’ को अचीव कर लेगा। इसके बाद लोगों को मास्क नहीं लगाने की पूरी तरह छूट मिल सकती है। यानी मास्क से पूरी तरह से आजादी के लिए हमें अभी कम से कम 6 से 8 महीने और इंतजार करना होगा।

सेवा परमो धर्म: के मंत्र पर चलते हुए हमारे डॉक्टर्स, हमारी नर्सेस, हमारे हैल्थ वर्कर्स, इतनी बड़ी आबादी की निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं। इन सभी प्रयासों के बीच, ये समय लापरवाह होने का नहीं है। ये समय ये मान लेने का नहीं है कि कोरोना चला गया या फिर अब कोरोना से कोई खतरा नहीं है। हाल के दिनों में हम सबने बहुत सी तस्वीरें, वीडियो देखे हैं, जिनमें साफ दिखता है कि कई लोगों ने अब सावधानी बरतना या तो बंद कर दिया है, या बहुत ढिलाई ले आए हैं। ये बिल्‍कुल ठीक नहीं है। अगर आप लापरवाही बरत रहे हैं, बिना मास्क के बाहर निकल रहे हैं, तो आप अपने आप को, अपने परिवार को, अपने बच्चों को, बुजुर्गों को उतने ही बड़े संकट में डाल रहे हैं। संत कबीरदास जी ने कहा है, ‘पकी खेती देखिके, गरब किया किसान। अजहूं झोला बहुत है, घर आवै तब जान’। अर्थात, कई बार हम पकी हुई फसल देखकर ही अति आत्मविश्वास से भर जाते हैं कि अब तो काम हो गया, लेकिन जब तक फसल घर न आ जाए तब तक काम पूरा नहीं मानना चाहिए। यानि जब तक सफलता पूरी न मिल जाए, लापरवाही नहीं करनी चाहिए।

कोविड-19 महामारी से सबसे बड़ा यह सबक मिलता है कि हमें मानवता और मानव हित के लिए पूरे विश्व के साथ मिलकर काम करना है और साथ-साथ ही आगे बढ़ना है। हमें एक-दूसरे से सीखना होगा और अपनी सर्वोत्तम प्रथाओं के बारे में एक-दूसरे का मार्गदर्शन भी करना होगा। इस महामारी की शुरुआत से ही भारत इस लड़ाई में अपने सभी अनुभवों, विशेषज्ञता और संसाधनों को वैश्विक समुदाय के साथ साझा करने के लिए प्रतिबद्ध रहा है और हमने तमाम बाधाओं के बावजूद इन अनुभवों को दुनिया के साथ ज्यादा से ज्यादा साझा करने की कोशिश भी की है। हम वैश्विक प्रथाओं से सीखने के लिए भी उत्सुक रहते हैं। भारत ने ‘कोविन प्लेटफॉर्म’ का निर्माण करके पूरी दुनिया को राह दिखाई है कि इतने बड़े पैमाने पर वैक्सीनेशन कैसे किया जाता है। पहाड़ हो या रेगिस्तान, जंगल हो या समंदर, 10 लोग हों या 10 लाख, हर क्षेत्र तक आज हम पूरी सुरक्षा के साथ वैक्सीन पहुंचा रहे हैं। इसके लिए देशभर में 1 लाख 30 हजार से ज्यादा टीकाकरण केंद्र स्थापित किए गए हैं।

इस महामारी ने दुनिया के हर देश, हर संस्था, हर समाज, हर परिवार, हर इंसान के सामर्थ्य को, उनकी सीमाओं को बार-बार परखा है। वहीं, इस महामारी ने विज्ञान, सरकार, समाज, संस्था और व्यक्ति के रूप में भी हमें अपनी क्षमताओं का विस्तार करने के लिए सतर्क किया है। पीपीई किट्स और टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर कोविड केयर और ट्रीटमेंट से जुड़े मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर का जो बड़ा नेटवर्क आज भारत में बना है, वो काम अब भी चल रहा है। देश के दूर-सुदूर इलाकों में अस्पतालों तक वेंटिलेटर्स, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स पहुंचाने का भी तेज गति से प्रयास किया गया है। बीते डेढ़ साल में देश ने इतनी बड़ी महामारी से मुकाबला आपसी सहयोग और एकजुट प्रयासों से ही किया है। सभी राज्य सरकारों ने एक दूसरे से सीखने का प्रयास किया है, एक दूसरे के प्रयोगों को समझने का प्रयास किया है, एक दूसरे को सहयोग करने की कोशिश की है। ऐसे ही सामूहिक प्रयत्नों से हम इस लड़ाई में विजयी हो सकते हैं।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

इस तरह किसी की यश हत्या से हमें बचना होगा मिस्टर मीडिया!

तो सियासत की तरह पत्रकार बिरादरी भी बेशर्मी की हद पार करने लगी। यह सिलसिला कहां जाकर रुकेगा, कोई नहीं जानता।

राजेश बादल by
Published - Thursday, 21 October, 2021
Last Modified:
Thursday, 21 October, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

तो सियासत की तरह पत्रकार बिरादरी भी बेशर्मी की हद पार करने लगी। यह सिलसिला कहां जाकर रुकेगा, कोई नहीं जानता। पर यह तय है कि हम लोगों की जमात में अब ऐसे पेशेवर भी दाखिल हो चुके हैं, जिन्हें चौराहों पर अपने पीटे जाने का भी कोई भय नहीं रहा है। एक बार सार्वजनिक रूप से अस्मत लुट जाए, फिर क्या रह जाता है? जिंदगी में यश की पूंजी बार-बार नहीं कमाई जा सकती।

बीते सप्ताह समाचार कवरेज की तीन वारदातों ने झकझोर दिया। एक चैनल पर निहायत ही गैरपेशेवर अंदाज में एक उत्साही एंकर ने खुल्लमखुल्ला अश्लील और अमर्यादित शब्द का उपयोग शो के सीधे प्रसारण में किया। उसने आपत्तिजनक भाषा के बाद रुकने और माफी मांगने की जरूरत भी नहीं समझी। दूसरे चैनल पर एक वरिष्ठ एंकर को महात्मा गांधी के पूरे नाम का सही उच्चारण करने में एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा और उस दौरान भी एक बार सही, नाम नहीं पढ़ पाने के लिए उसे दर्शकों से माफी मांगनी पड़ी।

तीसरी घटना पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के साथ बेहद अपमानजनक और शिष्टाचार के खिलाफ बर्ताव की है। एक मंत्री उन्हें देखने गया और अपने साथ एक फोटोग्राफर को ले गया। पूर्व प्रधानमंत्री खुद उस समय फोटोग्राफर को रोकने की स्थिति में नहीं थे। वे संभवतया दवा के असर के चलते नींद में थे। लेकिन उनके परिवारजनों ने उस फोटोग्राफर को कई बार रोका। इसके बावजूद वह फोटोग्राफर नहीं रुका और मर्यादा की सारी सीमाएं लांघते हुए तस्वीरें लेता रहा। मंत्री जी ने भी उसे रोकने की जरूरत नहीं समझी। बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती। वे तस्वीरें मीडिया में जारी कर दी गईं। बाद में परिवार के लोगों ने इस पर गंभीर एतराज किया। इसके बावजूद पत्रकारिता के किसी भी हिस्से से उस छायाकार की निंदा के स्वर नहीं सुनाई दिए।

तीनों श्रेणी की समाचार जानकारियां गंभीर अपराध से कम नहीं हैं। उन्हें कौन सजा देगा, इसका निर्धारण करने वाली एजेंसियां भी अभी तक चुप्पी साधे हुए हैं। इसके अलावा प्रेस काउंसिल तथा टीवी चैनल्स की संस्था ने भी इनका कोई संज्ञान नहीं लिया। इसका मतलब यह भी निकाला जाना चाहिए कि जिस तरह राजनीति का अपराधीकरण हमने मंजूर कर लिया है, उसी तरह की गुंडागर्दी पत्रकारिता का हिस्सा बनती जा रही है और किसी भी स्तर पर चिंता नहीं दिखाई दे रही है।

महान संपादक राजेंद्र माथुर पत्रकारिता में इस तरह की बढ़ती प्रवृति से प्रसन्न नहीं थे। वे मीडिया को किसी की यश हत्या करने की आदत को अच्छा नहीं मानते थे। वे कहा करते थे कि जीवन से ज्यादा चरित्र महत्वपूर्ण माना जाता है। जिंदगी क्या है। आदमी अपना मर जाना पसंद करेगा, लेकिन अपने यश का खत्म हो जाना कोई पसंद नहीं करेगा। यश का मर जाना, इंसान के अपने मर जाने से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है। किसी की यश हत्या आप इतनी आसानी से कैसे कर सकते हैं?

नौ फरवरी 1990 को उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था, ’मान लीजिए पत्रकार एक दस-बारह साल का बच्चा है। वह काला पेंट और ब्रश लेकर बगीचे में जाता है। वहां कुछ मूर्तियां भी हैं। वह शरारती बच्चा किसी मूर्ति के चेहरे पर कालिख पोत देता है। किसी पर मूंछ बना देता है। कोई मूर्ति काले रंग से अपने पर दाढ़ी लगी पाती है। किसी प्रतिमा को महिला से पुरुष बना देता है तो किसी को पुरुष से महिला बना देता है। इसके बाद उन मूर्तियों के पास लगातार कई दिन चाहने वाले और रिश्तेदार जुटते हैं। वे चौंकते हैं और मूर्तियों के जीवित संस्करणों से पूछते हैं कि अरे, यह कैसे हो गया? आप तो कभी मूंछ वाले नहीं थे। अखबार में तो मूंछ लगी है। दूसरे से कोई पूछता है कि आप तो पुरुष हैं। अखबार में तो महिला प्रकाशित हुआ है। वे बेचारे सफाई देते फिरते हैं कि यह तो पत्रकारों ने छाप दिया। ऐसे तो हम थे ही नहीं। कैसे पत्रकार हैं? कम से कम मुझसे पूछ तो लेते कि मेरे मूंछ हैं या नहीं। इसे आप गैर जिम्मेदार पत्रकारिता का नमूना मान सकते हैं।’ इस तरह किसी की यश हत्या से हमें बचना होगा मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

‘उधार का सिंदूर’ संसद टीवी की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाएगा मिस्टर मीडिया!

इतना पेशेवर दृष्टिकोण तो आज के संपादक भी नहीं रखते मिस्टर मीडिया!

सुप्रीम कोर्ट की चिंता संवैधानिक है मिस्टर मीडिया!

इस हकीकत को समझिए, फर्जी खबरों से मुकाबला करना आसान हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

'कई देशों में ऐसे निर्भीक पत्रकार हैं, जो नोबेल पुरस्कार से भी बड़े सम्मान के पात्र हैं'

फिलीपींस की महिला पत्रकार मारिया रेसा और रूस के पत्रकार दिमित्री मोरातोव को नोबल पुरस्कार देने से नोबेल कमेटी की प्रतिष्ठा बढ़ गई है

Last Modified:
Monday, 18 October, 2021
drvedpratap54545

डॉ. वेद प्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

फिलीपींस की महिला पत्रकार मारिया रेसा और रूस के पत्रकार दिमित्री मोरातोव को नोबल पुरस्कार देने से नोबेल कमेटी की प्रतिष्ठा बढ़ गई है, क्योंकि आज की दुनिया अभिव्यक्ति के भयंकर संकट से गुजर रही है। इन दोनों पत्रकारों ने अपने-अपने देश में शासकीय दमन के बावजूद सत्य का खांडा निर्भीकतापूर्वक खड़काया है। जिन देशों को हम दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे पुराना लोकतंत्र कहते हैं, ऐसे देश भी अभिव्यक्ति की आजादी के हिसाब से एकदम फिसड्डी-से दिखाई पड़ते हैं। ‘विश्व प्रेस आजादी तालिका’ के 180 देशों में फिलीपींस का स्थान 138 वां है और भारत का 142 वां ! यदि पत्रकारिता किसी देश की इतनी फिसड्डी हो तो उसके लोकतंत्र का हाल क्या होगा ? लोकतंत्र के तीन खंभे बताए जाते हैं।

विधानपालिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका ! मेरी राय में एक चौथा खंभा भी है। इसका नाम है— खबरपालिका, जो सबकी खबर ले और सबको खबर दे। पहले तीन खंभों के मुकाबले यह खंभा सबसे ज्यादा मजबूत है। हर शासक की कोशिश होती है कि इस खंभे को खोखला कर दिया जाए। शेष तीनों खंभे तो अक्सर पहले से काबू में ही रहते हैं लेकिन पत्रकारिता ने अमेरिका और ब्रिटेन जैसे लोकतांत्रिक देशों में भी उनके राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के दम फुला रखे हैं। यही काम मारिया ने फिलीपींस में और मोरातोव ने रूस में कर दिखाया है। फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिग्गो दुतर्ते ने मादक-द्रव्यों के विरुद्ध ऐसा जानलेवा अभियान चलाया कि उसके कारण सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए और जेलों में ठूंस दिए गए। इस नृशंस अत्याचार के खिलाफ मारिया ने अपने डिजिटल मंच ‘रेपलर’ से राष्ट्रपति की हवा खिसका दी थी। राष्ट्रपति ने मारिया के विरुद्ध भद्दे शब्दों का इस्तेमाल किया और उनकी हत्या की भी धमकी दी थी लेकिन वे अपनी टेक पर डटी रहीं। इसी प्रकार मोरातोव ने अपने अखबार ‘नोवाया गज्येता’ के जरिए राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन के अत्याचारों की पोल खोलकर रख दी।

रूस में तो अखबारों पर कम्युनिस्ट पार्टी का कठोर शिकंजा कसे रखने की पुरानी परंपरा थी। अब से 50-55 साल पहले जब मैं माॅस्को में ‘प्रावदा’ और ‘इजवेस्तिया’ पढ़ता था तो इन रूसी भाषा के ऊबाऊ अखबारों को देखकर मुझे तरस आता था लेकिन अब कम्युनिस्ट शासन खत्म होने के बावजूद पत्रकारिता की आजादी के हिसाब से रूस का स्थान दुनिया में 150 वाँ है। ऐसी दमघोंटू दशा में भी मोरातोव ने ‘नोवाया गज्येता’ के जरिए पूतिन की गद्दी हिला रखी थी। सरकारी भ्रष्टाचार और चेचन्या में किए गए पाशविक अत्याचारों की खबरें मोरातोव और उनके साथियों ने उजागर कीं। उनके छह साथी पत्रकारों को इसीलिए मौत के घाट उतरना पड़ा। इसीलिए नोबेल पुरस्कार स्वीकार करते हुए उन्होंने इन छह साथी पत्रकारों को श्रद्धांजलि दी और कहा कि यह पुरस्कार उन्हीं को समर्पित है। भारत समेत दुनिया के कई देशों में ऐसे निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकार अभी भी कई हैं, जो नोबेल पुरस्कार से भी बड़े सम्मान के पात्र हैं। उक्त दो पत्रकारों का सम्मान ऐसे सभी पत्रकारों का हौसला जरुर बढ़ाएगा। मारिया और मोरातोव को बधाई!

(साभार: https://www.drvaidik.in/)

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

कुछ ऐसा ही मॉडल तो चाहते थे गांधी जी: प्रो. संजय द्विवेदी

‘स्वच्छ भारत अभियान’ को जन आंदोलन बनाने में भारत के प्रत्येक व्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

Last Modified:
Monday, 18 October, 2021
Swacchbharat545445

- प्रो. संजय द्विवेदी, महानिदेशक, भारतीय जन संचार संस्थान

‘स्वच्छ भारत अभियान’ को जन आंदोलन बनाने में भारत के प्रत्येक व्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। समाज और राष्ट्र के निर्माण में स्वच्छता की बुनियादी भूमिका के बारे में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों को भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने विजन से एक सुनियोजित अभियान का रूप दिया है। गांधी जी कहते थे कि, ‘स्वराज सिर्फ साहसी और स्वच्छ जन ही ला सकते हैं।’ स्वच्छता और स्वराज के बीच के रिश्ते को लेकर गांधी जी इसलिए आश्वस्त थे, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि गंदगी अगर सबसे ज्यादा नुकसान किसी का करती है, तो वो गरीब है। गंदगी, गरीब से उसकी ताकत छीन लेती है। शारीरिक ताकत भी और मानसिक ताकत भी। गांधी जी जानते थे कि भारत को जब तक गंदगी में रखा जाएगा, तब तक भारतीय जनमानस में आत्मविश्वास पैदा नहीं हो पाएगा। जब तक जनता में आत्मविश्वास पैदा नहीं होता, तब तक वो आजादी के लिए खड़ी नहीं हो सकती। इसलिए दक्षिण अफ्रीका से लेकर चंपारण और साबरमती आश्रम तक, उन्होंने स्वच्छता को ही अपने आंदोलन का बड़ा माध्यम बनाया।

स्वच्छ भारत अभियान की यात्रा हर देशवासी को गर्व से भर देने वाली है। देश ने स्वच्छ भारत मिशन के माध्यम से जो हासिल किया है, वो हमें आश्वस्त करता है कि हर भारतवासी अपने कर्तव्यों के लिए कितना संवेदनशील है। जन आंदोलन की ये भावना स्वच्छ भारत मिशन की सफलता का आधार है। 2014 में देशवासियों ने भारत को खुले में शौच से मुक्त करने का संकल्प लिया था। 10 करोड़ से ज्यादा शौचालयों के निर्माण के साथ देशवासियों ने ये संकल्प पूरा किया है। करोड़ों माताएं, बहनें अब एक असहनीय पीड़ा से, अंधेरे के इंतजार से मुक्त हुई हैं। उन लाखों मासूमों का जीवन अब बच रहा है, जो भीषण बीमारियों की चपेट में आकर हमें छोड़ जाते थे। स्वच्छता की वजह से गरीब के इलाज पर होने वाला खर्च अब कम हुआ है। इस अभियान ने ग्रामीण इलाकों, आदिवासी अंचलों में लोगों को रोजगार के नए अवसर दिए हैं। पहले शहरों में कचरा सड़कों पर होता था, गलियों में होता था, लेकिन अब घरों से न केवल वेस्ट कलेक्शन पर बल दिया जा रहा है, बल्कि वेस्ट सेग्रीगेशन पर भी जोर है। बहुत से घरों में अब लोग गीले और सूखे कूड़े के लिए अलग अलग डस्टबिन रख रहे हैं। घर ही नहीं, घर के बाहर भी अगर कहीं गंदगी दिखती है, तो लोग स्वच्छता ऐप से उसे रिपोर्ट करते हैं और दूसरे लोगों को जागरूक भी करते हैं।

स्वच्छ भारत अभियान से हमारी सामाजिक चेतना, समाज के रूप में हमारे आचार-व्यवहार में भी स्थाई परिवर्तन आया है। बार-बार हाथ धोना हो, हर कहीं थूकने से बचना हो, कचरे को सही जगह फेंकना हो, ये तमाम बातें सहज रूप से, बड़ी तेजी से सामान्य भारतीय तक हम पहुंचा पाए हैं। हर तरफ गंदगी देखकर भी सहजता से रहना, इस भावना से अब देश बाहर आ रहा है। अब घर पर या सड़क पर गंदगी फैलाने वालों को एक बार टोका जरूर जाता है। देश के बच्चे-बच्चे में पर्सनल और सोशल हाइजीन को को लेकर जो चेतना पैदा हुई है, उसका बहुत बड़ा लाभ कोरोना के विरुद्ध लड़ाई में भी हमें मिल रहा है।

आज भारत हर दिन करीब एक लाख टन वेस्ट प्रोसेस कर रहा है। 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर ये अभियान शुरू किया गया था, तब देश में हर दिन पैदा होने वाले वेस्ट का 20 प्रतिशत से भी कम प्रोसेस होता था। आज हम करीब-करीब 70 प्रतिशत डेली वेस्ट प्रोसेस कर रहे हैं। लेकिन अब हमें इसे 100 प्रतिशत तक लेकर जाना है और ये काम केवल वेस्ट डिस्पोजल के जरिए नहीं होगा, बल्कि 'वेस्ट टू वेल्थ क्रिएशन' के जरिए होगा। इसके लिए भारत ने हर शहर में 100 प्रतिशत वेस्ट सेग्रीगेशन के साथ-साथ इससे जुड़ी आधुनिक मैटेरियल रिकवरी फेसिलिटीज बनाने का लक्ष्य तय किया है। इन आधुनिक फेसिलिटीज में कूड़े-कचरे को छांटा जाएगा, रीसायकिल हो पाने वाली चीजों को प्रोसेस किया जाएगा। इसके साथ ही, शहरों में बने कूड़े के पहाड़ों को प्रोसेस करके पूरी तरह समाप्त किया जाएगा।

हमें यह याद रखना है कि स्वच्छता, एक दिन का, एक पखवाड़े का, एक साल का या कुछ लोगों का ही काम नहीं है। स्वच्छता हर किसी का, हर दिन, हर पखवाड़े, हर साल, पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाला महाअभियान है। स्वच्छता जीवनशैली है, जीवन मंत्र है। जैसे सुबह उठते ही दांतों को साफ करने की आदत होती है, वैसे ही साफ-सफाई को हमें अपने जीवन का हिस्सा बनाना होगा। स्वच्छ भारत अभियान जीवनरक्षक भी सिद्ध हो रहा है और जीवन स्तर को ऊपर उठाने का काम भी कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है कि स्वच्छ भारत अभियान ने अपनी कार्यक्रम अवधि के दौरान ही 3 लाख लोगों का जीवन बचाया है। दीर्घकाल में इससे प्रति वर्ष डेढ़ लाख लोगों का जीवन बचेगा। यूनीसेफ के एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2014 से 2019 के बीच में स्वच्छ भारत से भारत की अर्थव्यवस्था पर 20 लाख करोड़ रुपए से अधिक का सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इससे 75 लाख से अधिक रोजगार के अवसर भारत में बने हैं, जिनमें से अधिकतर गांवों के लोगों को मिले हैं। इससे बच्चों की शिक्षा के स्तर पर, हमारी उत्पादन क्षमता पर, उद्यमशीलता पर सकारात्मक असर पड़ा है।

देश में बेटियों और बहनों की सुरक्षा और सशक्तिकरण की स्थिति में अद्भुत बदलाव आया है। गांव, गरीब और महिलाओं के स्वावलंबन और सशक्तिकरण को प्रोत्साहित करने वाला ऐसा ही मॉडल तो महात्मा गांधी चाहते थे। स्वच्छता, पर्यावरण सुरक्षा और जीव सुरक्षा-ये तीनों महात्मा गांधी के प्रिय विषय थे। प्लास्टिक इन तीनों के लिए बहुत बड़ा खतरा है। हमें वर्ष 2022 तक देश को सिंगल यूज प्लास्टिक से मुक्त करने का लक्ष्य हासिल करना है। देशभर में करोड़ों लोगों ने सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग न करने का संकल्प लिया है। यानी वो प्लास्टिक जिसका हम एक बार उपयोग करते हैं और फिर फेंक देते हैं, ऐसे प्ला‍स्टिक से हमें देश को मुक्त‍ करना है। इससे पर्यावरण का भी भला होगा, हमारे शहरों की सड़कों और सीवेज को ब्लॉक करने वाली बड़ी समस्या का समाधान भी होगा और हमारे पशुधन की और समुद्री जीवन की भी रक्षा होगी।

स्वच्छता को प्रभावी और स्थाई बनाने के लिए जरूरी है कि यह सभी नागरिकों की आदत, स्वभाव और व्यवहार का हिस्सा बने। जीने का तरीका स्वच्छता पर आधारित हो, सोचने का तरीका स्वच्छता पर केंद्रित हो। बहुत से लोग व्यक्तिगत सफाई, अपने घर और परिसर की सफाई पर बहुत ध्यान देते हैं, लेकिन सार्वजनिक और सामुदायिक सफाई के प्रति उदासीन रहते हैं। इस मानसिकता में बदलाव जरूरी है। सर्वत्र स्वच्छता ही प्रभावी स्वच्छता होती है। स्वच्छता की जड़ों को मजबूत बनाने के लिए स्वच्छता की संस्कृति को नागरिकों के जीवन का अभिन्न अंग बनाना होगा। स्वच्छता को लेकर लोगों में गर्व की भावना होनी चाहिए। इसके लिए जागरूकता बढ़ाने के प्रयासों पर और अधिक बल देना होगा। सभी विद्यालयों और उच्च-शिक्षण संस्थानों में स्वच्छता को पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण विषय बनाना चाहिए। सभी शिक्षण तथा सांस्कृतिक संस्थानों द्वारा स्वच्छता की मुहिम को और मजबूत बनाने के लिए रोचक और प्रेरक समारोह आयोजित करने चाहिए।

स्वच्छ भारत का वास्तविक अर्थ है साफ-सुथरा भारत। संकल्प और दृढ़-निश्चय की भावना से भारत इस क्षेत्र में अग्रसर हुआ है। स्वच्छ भारत, हमारी आंखों के सामने घटित हो रही क्रांतिकारी घटना है। सामूहिक एकजुटता के साधन के रूप में, एक जन आंदोलन के रूप में और एक राष्ट्रीय लक्ष्य जिसके लिए लगभग पूरी प्रतिबद्धता दिखाई दे रही है, स्वच्छ भारत हमारे स्वतंत्रता आंदोलन की भावना का प्रतिबिंब है। आज पूरी दुनिया स्वच्छ भारत अभियान के हमारे इस मॉडल से सीखना चाहती है, उसको अपनाना चाहती है। स्वच्छ भारत अभियान में हासिल हमारी सफलताएं, स्वच्छता के क्षेत्र में हमारी उपलब्धियां, हमारी पद्धतियां और हमारी व्यवस्थाएं आज पूरे विश्व के लिए प्रेरणादायक हैं। भारत अपनी नई योजनाओं और पर्यावरण के लिए प्रतिबद्धता के माध्यम से दुनिया को कई चुनौतियों से लड़ने में मदद कर रहा है। महात्मा गांधी कहा करते थे कि हम उन भावी पीढ़ियों के लिए भी जिम्मेदार हैं, जिन्हें हम नहीं देख पाएंगे। आज हमारी पीढ़ी के सामने यह अवसर है कि हम अगली पीढ़ियों के लिए एक पूर्णतः स्वच्छ भारत का निर्माण करें। ‘स्वच्छ भारत’ की नींव पर ही ‘स्वस्थ भारत’ और ‘समृद्ध भारत’ का निर्माण होगा।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

ZEE-इनवेस्को विवाद में ‘संरक्षक’ की भूमिका निभा रहे हैं पुनीत गोयनका: डॉ.अनुराग बत्रा

मुझे विश्वास है कि इस लेख में मैंने जो कुछ भी लिखा है, वह इस बारे में मेरे गहरे ज्ञान और समझ से आया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 13 October, 2021
Last Modified:
Wednesday, 13 October, 2021
PunitGoenka54484

डॉ.अनुराग बत्रा ।।

मैं लगभग तीन सप्ताह से इस विषय पर लिखना चाहता था, लेकिन मैंने संतुलित दृष्टिकोण बनाए रखने के लिए इस दौरान कुछ नहीं लिखा। मैं इस परिप्रेक्ष्य में अपनी बात रखने के लिए स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट होने की प्रतीक्षा कर रहा था। हालांकि, हर दिन नए और असंगत तथ्य सामने आने के कारण मैं आज इसे लिखने से खुद को रोक नहीं पाया। मैं 21 वर्षों से मीडिया का विद्यार्थी रहा हूं। गतिशील भारतीय मीडिया के बारे में सीखना, अवलोकन करना और लिखना मेरा जुनून और पेशा दोनों रहा है।

मैंने वर्ष 2000 में ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) समूह की सह-स्थापना की और करीब आठ साल पहले ‘बिजनेस वर्ल्ड’ (BW Businessworld) का अधिग्रहण (acquired) किया। मेरे करियर का अधिकांश समय भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग का बारीकी से अध्ययन करने पर केंद्रित रहा है। मुझे सभी प्रमुख हितधारकों (stakeholders) के साथ बातचीत के माध्यम से इस बिजनेस की प्रकृति को जानने और समझने का सौभाग्य मिला है। मीडिया मालिकों, सीईओ और बड़े निवेशकों के साथ मेरा करीबी जुड़ाव, पेशेवर संबंध और गहरी दोस्ती रही है। इसलिए, मुझे विश्वास है कि इस लेख में मैंने जो कुछ भी लिखा है, वह इस बारे में मेरे गहरे ज्ञान और समझ से आया है।

इस समय नवरात्रि चल रही हैं और आज अष्टमी है, जो हिंदुओं के लिए काफी शुभ दिन है। एक आस्थावान व्यक्ति के रूप में मैं अपने देवताओं की ‘त्रिमूर्ति’ में विश्वास करता हूं यानी भगवान ब्रह्मा-निर्माता, भगवान विष्णु-पालनकर्ता और भगवान शिव-संहारक हैं। मेरे हिसाब से ‘जी’ और उसके निवेशकों के बीच चल रहा विवाद इस ‘त्रिमूर्ति’ के साथ अपने सांसारिक तरीके से तुलना करता है। 

इस विवाद में मैं ‘एस्सेल ग्रुप’ (Essel Group) के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा को ‘जी’ का रचयिता (creator), उनके बेटे और एक दशक से ज्यादा समय से ‘जी’ के एमडी व सीईओ पुनीत गोयनका को इस समूह द्वारा बनाई गई शानदार शेयरधारक संपत्ति के संरक्षक (preserver) के रूप में और शेयरधारकों में से एक इनवेस्को (Invesco) को शेयरधारक मूल्य के विध्वंसक (destroyer) के रूप में देखता हूं।

इस बारे में कुछ तथ्य आपके सामने हैं-

कल रात एक चौंकाने वाला रहस्योद्घाटन हुआ कि ‘इनवेस्को डेवलपिंग मार्केट फंड्स’ ने 'जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ को पहले एक बड़े भारतीय समूह के साथ कंपनी का विलय करने की पेशकश की थी। इस तरह की डील में ‘जी’ का काफी कम मूल्यांकन किया गया था, यह तथ्य बाद में ‘सोनी‘ के साथ सौदे में मीडिया दिग्गज को दिए गए मूल्यांकन से साबित हुआ।

आखिर इनवेस्को ऐसा ‘तांडव’ क्यों कर रहा था? हालांकि इस बारे में कोई यह तर्क दे सकता है कि नए सिरे से निर्माण करने के लिए रचनात्मक विनाश करने की आवश्यकता है। लेकिन इस तरह के विनाश से सिर्फ नए शेयरधारकों के लिए मूल्य निर्मित होंगे, जबकि मौजूदा शेयरधारकों को नुकसान उठाना पड़ेगा।

इस पूरे मामले में एक सवाल यह भी उठता है कि ‘जी’ के शेयरों की कीमतों को किस दबाव में कम रखा जा रहा है, जबकि वास्तव में इसका वित्तीय प्रदर्शन लगातार अच्छा बना रहता है, जो पिछले समय में दोगुना तक बढ़ गया है। इसी के मद्देनजर इनवेस्को की मंशा पर लगातार सवाल उठ रहे हैं कि उसके पीछे किसका हाथ है? शेयर की कीमतों को कम करने के पीछे क्या कारण हैं? क्या उसे किसी से मदद मिल रही है?

इन सब सवालों के बीच इन तथ्यों को ध्यान में रखने की जरूरत है- 

  • डील की शुरुआत इनवेस्को ने की थी, ‘जी’ ने नहीं।
  • इस डील में पेशकश की गई थी कि उपरोक्त विलय के पूरा होने पर रणनीतिक समूह के पास विलय की गई इकाई में बहुमत हिस्सेदारी होगी और पुनीत गोयनका को एमडी और सीईओ के रूप में नियुक्त किया जाएगा। अब बेहतर डील होने के बाद इस बात से क्यों पलटा जा रहा है, क्या डील में शेयरहोल्डर्स को ज्यादा वैल्यू देने की पेशकश की गई थी?
  • उस डील ने नई विलय की गई इकाई में प्रमोटर समूह को 7-8 प्रतिशत शेयरों की गारंटी दी थी। ऐसे में इनवेस्को सोनी डील के साथ प्रमोटर्स के संरक्षण को कमजोर पड़ने को लेकर क्यों सवाल उठा रहा है?
  • यह सर्वविदित है कि पुनीत गोयनका ‘जी’ में बड़ी योजनाओं के मामले में डॉ. सुभाष चंद्रा का प्रतिनिधित्व करते हैं और कंपनी वर्षों से अच्छा प्रदर्शन कर रही है।  ऐसा लगता है कि चूंकि वह इस विशेष निवेशक के पसंदीदा सौदे के साथ आगे नहीं बढ़ रहे हैं, इसलिए इनवेस्को का इरादा उन्हें हटाने और कई नए निदेशकों को बोर्ड में लाने का प्रस्ताव इस सौदे को घुमाना है।
  • प्रश्न यह उठता है कि इनवेस्को इस सार्वजनिक कॉर्पोरेट विवाद के लिए चालक के रूप में एक अन्य बड़े व्यापारिक समूह के साथ सौदे का खुलासा करने में विफल क्यों रहा। ऐसा लगता है कि इनवेस्को द्वारा लगाए जा रहे आरोप उनके निहित संकीर्ण हितों को छिपाने का प्रयास है।
  • बोर्ड एक इकाई के रूप में कार्य करता है और इसमें इनवेस्को के नामांकित व्यक्ति भी शामिल हैं। तो वर्षों से बोर्ड की बैठकों के दौरान उनके नामांकित व्यक्तियों की टिप्पणियों के अभाव में, क्या इनवेस्को का सिर्फ भारतीय प्रमोटरों के नामांकित व्यक्तियों को लक्षित करना औचित्य की कसौटी पर खरा उतरता है?

सही नेतृत्व

मैंने जो तथ्य बताए हैं उसके आधार पर मुझे उम्मीद है कि ये स्थिति को एक अलग दृष्टिकोण देते हैं। मेरा यह भी मानना है कि इस मामले पर अपने विचार रखना महत्वपूर्ण है। मेरा विचार है कि पुनीत गोयनका विलय होने वाली इकाई के एमडी और सीईओ बने रहें। इसकी पीछे मेरे ये आठ कारण हैं:

1:- पुनीत अपने पिता डॉ सुभाष चंद्र के लिए एक आदर्श संतान हैं। पुनीत गोयनका के साथ काम करने वाला कोई भी व्यक्ति आपको बताएगा कि डॉ. सुभाष चंद्र जहां श्रेष्ठ रचनाकार, एक दयालु व्यक्ति और काफी मानवीय दृष्टिकोण वाले हैं, पुनीत, अपने पिता के इन गुणों के साथ ही बहुत ही तार्किक, निष्पक्ष और व्यावसायिक दृष्टिकोण रखते हैं।

2:- एमडी और सीईओ के रूप में वह कंपनी के प्रदर्शन को बढ़ाने में बेहद सफल रहे हैं और लगातार बेहतर परिणाम दे रहे हैं।

3:- विशेष रूप से यह बताना महत्वपूर्ण है कि वह प्रत्येक एम्प्लॉयी-चाहे वह कनिष्ठ हो या वरिष्ठ, सभी से काफी प्यार करते हैं। यह एक संगठन की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है।

4:- वह हमेशा ही शीर्ष टैलेंट को पहचानते हैं और यही एक क्वॉलिटी नहीं है, जो उनके पास है। एक संगठन के तौर पर ‘जी’ को आगे बढ़ाने, स्थिरता और विकास सुनिश्चित करने के लिए सही समय पर सही प्रतिभा को पहचानना एक महत्वपूर्ण कारक है।

5:- एक्सचेंज4मीडिया में हमने पुनीत गोयनका के इन गुणों को देखा है और दिग्गज जूरी ने उन्हें नौ साल पहले 'इम्पैक्ट पर्सन ऑफ द ईयर' के रूप में चुना। एक विजेता के रूप में वह उदय शंकर जैसे अन्य समकालीन दिग्गजों के बीच खड़े हैं।

6:- पुनीत गोयनका ने दिखाया है कि वह शेयरधारकों का सबसे अच्छा हित देखते हैं। इस लड़ाई में भी जिस तरह से उन्होंने संयमित तरीके से अपने आप को पेश किया है, वह बाकई में काबिले तारीफ है।

7:- पूरा मीडिया और मनोरंजन जगत खुले तौर पर और पूरे दिल से उनके द्वारा दिए गए सम्मान और स्नेह को प्रदर्शित करता है।

8:- सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पुनीत टेक्नोलॉजी और कंटेंट दोनों को गहराई से समझते हैं। न केवल यह एक बेहतरीन संयोजन है, बल्कि यह आज के विकसित मीडिया और मनोरंजन परिदृश्य में सबसे अच्छा कौशल भी है, खासकर जब उनमें लीडरशिप के तमाम अन्य गुण मौजूद हैं। 

अगर मुझे खुदरा निवेशक (retail investor) के रूप में विलय की गई इकाई में शेयर खरीदना पड़ा, तो यह तभी हो सकता है जब डॉ सुभाष चंद्रा के नेतृत्व वाले प्रमोटर समूह की पर्याप्त हिस्सेदारी का प्रतिनिधित्व करते हुए पुनीत गोयनका कंपनी के लीडर बने रहें। इन 25 वर्षों में डॉ. चंद्रा ने जो रचना की, वह एक उत्कृष्ट कृति है,जिसे इस डिजिटल युग में पुनीत गोयनका द्वारा फिर से बनाया जा सकता है। उन्होंने अपने पिता को ‘जी’ का निर्माण करते देखा है और उनसे सीखा है, जबकि साथ ही वह अपनी शैली, दृष्टि और परिवर्तनकारी क्षमताओं को पेश करते हैं। मेरी नजर में वह बेजोड़ हैं और वह वास्तव में संरक्षक हैं।

(लेखक बिजनेसवर्ल्ड समूह के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और एक्सचेंज4मीडिया समूह के को-फाउंडर व एडिटर-इन-चीफ हैं।)

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

‘उधार का सिंदूर’ संसद टीवी की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाएगा मिस्टर मीडिया!

भारतीय संसद का नया टेलिविजन चैनल शुरू हो चुका है। करीब एक दशक तक ‘राज्यसभा टीवी‘ और डेढ़ दशक तक ‘लोकसभा टीवी‘ पर लगभग एक हजार करोड़ रुपये खर्च करने के बाद उन्हें ‘स्वर्ग की सीढ़ी’ दिखा दी गई।

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 12 October, 2021
Last Modified:
Tuesday, 12 October, 2021
Sansad TV

राजेश बादल,  वरिष्ठ पत्रकार।।

भारतीय संसद का नया टेलिविजन चैनल शुरू हो चुका है। करीब एक दशक तक ‘राज्यसभा टीवी‘ और डेढ़ दशक तक ‘लोकसभा टीवी‘ पर लगभग एक हजार करोड़ रुपये खर्च करने के बाद उन्हें ‘स्वर्ग की सीढ़ी’ दिखा दी गई। अब ‘संसद टीवी‘ ने कोरी स्लेट पर इबारत लिखनी शुरू कर दी है। इन दोनों चैनलों के रहते भारत उन-गिने चुने देशों में शुमार था, जिसके दोनों सदनों के अपने चैनल थे।

सिफर से किसी भी नए काम की शुरुआत आसान नहीं होती। नए चैनल के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती है। इस चैनल को पूर्व के दोनों चैनलों से बड़ी लकीर खींचनी होगी। यह नामुमकिन तो नहीं, पर बेहद कठिन जरूर है। अपने अनुभव से कह सकता हूं कि संसद में फाइलों के जंगल और कायदे कानूनों के जाल से निकलकर चैनल को दौड़ाना अत्यंत टेढ़ी खीर है। चैनल के नियंताओं को यकीनन इसका अंदाजा होना चाहिए। शायद इसलिए उन्होंने ‘कब्र में दफन‘ हो चुके चैनलों की खाक को माथे से लगाना शुरू कर दिया है।

अपनी बात स्पष्ट करता हूं। आप लोगों ने नई बोतल में पुरानी शराब वाली कहावत अवश्य सुनी होगी। ‘संसद टीवी‘ के यूट्यूब तथा अन्य डिजिटल अवतारों पर दोनों ‘स्वर्गीय चैनलों‘ के कार्यक्रमों की कुल दर्शक तथा सबस्क्राइबर्स की संख्या भी ‘संसद टीवी‘ में जोड़ दी गई है। यानी जो चैनल अलग लाइसेंस के साथ अवतरित हुए थे, वे अब मर चुके हैं, मगर उनके कार्यक्रम ‘संसद टीवी‘ के खाते में धड़क रहे हैं।

जो चैनल आज पैदा हुआ है, उसके कार्यक्रम पुराने चैनलों के लिए बनाए गए हैं तो उन चैनलों के लाइक्स, दर्शक संख्या और सबस्क्राइबर्स की संख्या का कोई नया चैनल कैसे इस्तेमाल कर सकता है? मान लिया जाए कि वे कार्यक्रम संसद के ‘मृत चैनलों‘ की संपत्ति हैं तो 2021 में जन्म लेने वाला चैनल अपने खाते में 2010 से 2020 तक के कार्यक्रमों की लाइक्स, टिप्पणियां और सबस्क्राइबर्स की संख्या कैसे जोड़ सकता है? कोई निजी प्रसारण कंपनी ऐसा करती तो शायद उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो जाती। लेकिन चूंकि मामला संसद का है तो बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे?

तनिक सख्त भाषा का इस्तेमाल करना चाहूं तो कह सकता हूं कि यह दर्शकों के साथ कंटेंट की धोखाधड़ी से अलग मामला नहीं है। बेहतर होता कि ‘संसद टीवी‘ का आलाकमान अपनी कमाई हुई पूंजी से यश पाने की कोशिश करता। उधार का सिंदूर उसकी प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाएगा। आज दर्शक इतने अक्लमंद हैं कि वे समझते हैं कि जो कार्यक्रम उन्हें परोसे जा रहे हैं, वे साल भर से लेकर दस साल तक पुराने हैं और अगर वही पुराने कार्यक्रम दिखाने इतने जरूरी हैं तो फिर ‘संसद टीवी‘ की जरूरत ही क्या थी? संसद के इस भव्य और गरिमापूर्ण नए नवेले चैनल से यह उम्मीद तो नहीं ही थी।

यह ठीक वैसा ही है कि एक अखबार चलाने वाली कंपनी पुराना अखबार बंद कर दे और जब नया टाइटल लेकर नया समाचारपत्र प्रारंभ करे तो पुराने अखबार के साल भी उसमें जोड़ दे। वैसे जानकारी के लिए बता दूं कि आजकल दर्शक बढ़ाने, लाइक्स और सबस्काइबर्स बढ़ाने का उद्योग भी खूब फल-फूल रहा है। अभी इस कारोबार पर लगाम लगाने की भी जरूरत है। क्या इस तरफ कोई ध्यान देगा मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

इतना पेशेवर दृष्टिकोण तो आज के संपादक भी नहीं रखते मिस्टर मीडिया!

सुप्रीम कोर्ट की चिंता संवैधानिक है मिस्टर मीडिया!

इस हकीकत को समझिए, फर्जी खबरों से मुकाबला करना आसान हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

मुश्किल दौर में है अफगानी मीडिया, भारतीय पत्रकारों को आगे आना होगा मिस्टर मीडिया! 

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

साल भर से सत्याग्रह कर रहे किसानों पर व्यवस्था का गुस्सा फूटने लगा: राजेश बादल

तो वह नौबत आ ही गई। गांधी मार्ग पर चलते हुए साल भर से सत्याग्रह कर रहे किसानों पर व्यवस्था का गुस्सा फूटने लगा।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 05 October, 2021
Last Modified:
Tuesday, 05 October, 2021
crime4587

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

तो वह नौबत आ ही गई। गांधी मार्ग पर चलते हुए साल भर से सत्याग्रह कर रहे किसानों पर व्यवस्था का गुस्सा फूटने लगा। कोई आंदोलन लंबे समय तक अहिंसक और शांतिपूर्वक तरीके से संचालित भी हो सकता है, किसान आंदोलन उसकी एक मिसाल है।

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने जिस ढंग से इस किसान आंदोलन के बारे में अराजक और असंसदीय टिप्पणी की है, उसकी निंदा करने के अलावा और क्या हो सकता है। एक बैठक में उन्होंने कहा कि किसानों पर डंडे उठाने वाले कार्यकर्ता हर जिले में होने चाहिए। ऐसे पांच-सात सौ लोग जैसे को तैसा जवाब दे सकते हैं। एक निर्वाचित और संविधान की शपथ लेकर मुख्यमंत्री के पद पर बैठे राजनेता की यह टिप्पणी बताती है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी अब राज्य सरकार के गले की फांस बन गए हैं।

पिछले चुनाव में उन्होंने विपक्ष के साथ मिलकर जैसे-तैसे सरकार बनाई थी, लेकिन अब किसान आंदोलन के कारण खिसक रहे जनाधार ने उन्हें इस तरह का धमकी भरा बयान देने के लिए बाध्य कर दिया है।

प्रश्न यह है कि क्या किसी भी सभ्य लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को हिंसा और टकराव का खुलेआम समर्थन करना चाहिए? जिन वर्गो के हितों की हिफाजत के लिए अवाम उन्हें चुनकर भेजती है, उनमें किसान बहुसंख्यक है। 

यह देश सदियों से किसानों को अन्नदाता तो मानता रहा है, लेकिन उनके आर्थिक और सामाजिक कल्याण की उपेक्षा भी करता रहा है। आजादी के पहले से ही यह सिलसिला जारी है। किसानों को कई बार खेतीबाड़ी छोड़कर सड़कों पर उतरना पड़ा है। उन पर पुलिस की गोलियां भी बरसीं मगर कृषि के लिए रियायतें और उत्पादन का वाजिब मूल्य कभी नहीं मिला, चाहे किसी भी राजनीतिक दल की सरकार रही हो। 

एक कृषि प्रधान देश के लिए इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि किसान सबका पेट भरने की चिंता अपने धर्म पालन की तरह करें और समाज उनके सरोकारों को रद्दी की टोकरी में फेंक दे।

हरियाणा के मुख्यमंत्री धरने पर बैठे किसानों के मुकाबले बेशक जिले-जिले में कार्यकर्ताओं की हथियारबंद फौज उतार दें, पर क्या वे भूल सकते हैं कि आंदोलनकारी लाखों किसान भी उन्हें वोट देते आए हैं और वे भारतीय प्रजातंत्र का अभिन्न अंग भी हैं।

आत्मरक्षा का अधिकार तो भारतीय दंड विधान भी देता है। कल्पना करें कि उन पांच-सात सौ लोगों की सेना से लड़ने के लिए हर किसान ने अगर एक-एक डंडा उठा लिया तो सरकार के लिए कानून-व्यवस्था की स्थिति संभालना कठिन हो जाएगा।

पाकिस्तान में तानाशाह जनरल अयूब खान को ऐसे ही जनआंदोलन के सामने अपनी सत्ता छोड़कर भागना पड़ा था। भारत में भी जनता के व्यापक प्रतिरोध का परिणाम हम 1977 में देख चुके हैं।   

क्या यह संयोग मात्र है कि चौबीस घंटे के भीतर हरियाणा के पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में एक शर्मनाक घटना घट गई। जिस अंदाज में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री ने खुलेआम सत्याग्रह कर रहे किसानों को धमकाया और अपने आपराधिक अतीत का हवाला दिया, उसने किसानों के खिलाफ सीधी कार्रवाई के लिए समर्थकों को उकसाया। मंत्री ने साफ-साफ कहा था कि वे केवल मंत्री, सांसद या विधायक ही नहीं हैं। जो लोग उन्हें जानते हैं, उन्हें अतीत के बारे में भी पता होना चाहिए। यह बाहुबली मंत्री की साफ-साफ धमकी थी।

पिता से प्रोत्साहित बेटा और चार कदम आगे निकला। उसने गुस्से में जिस तरह किसानों को अपनी गाड़ी से रौंदा, वह भयावह और विचलित करने वाला है। इससे गुस्साए किसान भी हिंसा पर उतर आए। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क दे रहे हैं, लेकिन यह सच है कि जनप्रतिनिधियों के बयान किसानों की भावनाओं को आहत करने वाले थे।

दो पड़ोसी प्रदेशों में एक मुख्यमंत्री और एक केंद्रीय मंत्री का रवैया इस बात का प्रमाण है कि हुकूमतं अब किसान आंदोलन को हरसंभव ढंग से कुचलने पर आमादा हैं। वे किसानों के साथ अपराधियों की तरह सुलूक कर रही हैं। इसके अलावा लखीमपुर खीरी की यह घटना एक आशंका और खड़ी करती है। एक मंत्री पुत्र का आचरण यह साबित करता है कि भारतीय लोकतंत्र अब जो नई नस्लें तैयार कर रहा है, वे मुल्क को मध्ययुगीन सामंती बर्बरता के युग में ले जाना चाहती हैं। इस तरह की हैवानियत यकीनन हताशा और कुंठा का नतीजा है।

उत्तर प्रदेश आने वाले दिनों में विधानसभा चुनावों का सामना करने जा रहा है। लखीमपुर खीरी की घटना के बाद सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या बंदूक की नोंक पर नागरिकों से उनके अधिकार तो नहीं छीने जा रहे हैं। 

हमें याद रखना चाहिए कि स्वतंत्रता से पहले महात्मा गांधी के अहिंसक और सविनय अवज्ञा आंदोलनों से तत्कालीन हुकूमत बौखला उठी थी। फिर उसने दमनचक्र चलाया था। उस भयावह दौर में तात्कालिक नुकसान भले ही सत्याग्रहियों या स्वतंत्रता सेनानियों को उठाना पड़ा हो, मगर जीत अंतत: सच की हुई थी। सच सिर चढ़कर बोलता है और झूठ के पांव नहीं होते। यह बात सियासी नुमाइंदों को ध्यान में रखनी चाहिए।

(साभार: लोकमत)

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

इतना पेशेवर दृष्टिकोण तो आज के संपादक भी नहीं रखते मिस्टर मीडिया!

अनुभव से बड़ा कोई ज्ञान नहीं है। जब कोई उमरदराज बूढ़ा इस लोक से जाता है तो अपने साथ एक विशाल पुस्तकालय ले जाता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 02 October, 2021
Last Modified:
Saturday, 02 October, 2021
gandhi454874

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

अनुभव से बड़ा कोई ज्ञान नहीं है। जब कोई उमरदराज बूढ़ा इस लोक से जाता है तो अपने साथ एक विशाल पुस्तकालय ले जाता है। इसी कारण कहा जाता है- जो बुजुर्ग दें, उसे सहेज कर रखना चाहिए। न जाने कब काम आ जाए। जो कौम अपने पूर्वजों को भूलने का अपराध करती है, उसके लिए हर सजा कम है। हम पत्रकारों ने इस कारण अपने पूर्वज शिखर पत्रकार गांधी को भूलने का अपराध किया है। उसके लिए कटघरे में खड़े हैं। कम से कम मैं तो यही महसूस करता हूं। आज उनके जन्मदिन पर गांधी की निर्भीक पत्रकारिता को याद करना जरूरी है। 

जब हम गांधी के संप्रेषण की बात करते हैं तो एक दुर्लभ संयोग देखते हैं। वो जितने बेहतर अंदाज में माइक पर या सभा में अपने विचारों को सुनने वालों तक पहुंचाते थे, उससे कहीं शानदार ढंग से वो पत्रकार या संपादक के रूप में लिखकर अपने भावों को बयान करते थे। करीब करीब सत्ताईस-अट्ठाईस साल तक गांधीजी संपादक के रूप में जिस तरह से  विचार व्यक्त करते रहे, वे वास्तव में आज के समाज तक पहुंचे ही नहीं। हम उन्हें स्वराज दिलाने वाले महानायक के रूप में जानते हैं, लेकिन पत्रकार के रूप में उनकी भूमिका पर ज्यादा चर्चा नहीं होती। आजादी से पहले पत्रकारिता मिशन थी और इसका मकसद सिर्फ आजादी था। इसलिए भारतीय इतिहास के अनेक महापुरुषों की संप्रेषण शैली और पत्रकारिता पर आज ज्यादा चर्चा नहीं होती। इन महापुरुषों को केवल स्वतंत्रता सेनानी मानकर हम उनके समग्र मूल्यांकन पर क्यों ध्यान नहीं दे पाए- यह बात मेरी समझ में कभी नहीं आई।

गांधी को याद करते समय एक तो राष्ट्रपिता जैसा कुछ भाव मन में आता है। दो अक्टूबर और तीस जनवरी पर रस्म अदायगी होती है। इसके बाद अगले अवसर तक के लिए हमारी आंख लग जाती है। अगली तारीख आती है। हम फिर जाग जाते हैं। दरअसल गांधी का चेहरा जब भी जेहन में उभरता है तो वह आजादी दिलाने वाले महापुरुष का होता है। इसलिए गांधी के अन्य रूप हमें याद ही नहीं आते। खास तौर पर गांधी का पत्रकार वाला रूप। सिर्फ  इक्कीस साल की उमर में लंदन के ‘द वेजिटेरियन’ में प्रकाशित नौ लेखों की श्रृंखला से तहलका मचा देता है और तेईस साल का होने तक वह नियमित पत्रकार बन जाता है।  

गांधी जब दक्षिण अफ्रीका पहुंचे तो भरपूर नौजवान थे। वहां अदालत में पहला मुकदमा लड़ते हैं। तीसरे दिन ही गोरे अदालत में उनका अपमान करते हैं। विरोध में वे तमाम अखबारों में अपने लेखों की झड़ी लगा देते हैं। माहौल गांधी के पक्ष में बन जाता है। लंदन से ‘इंडिया’ नामक अखबार का प्रकाशन शुरू कराते हैं और दक्षिण अफ्रीका से उसके संवाददाता की तरह लंबे समय तक काम करते हैं।

एक सौ अठारह साल पहले दक्षिण अफ्रीका से 1903 में ‘इंडियन ओपिनियन’ का प्रकाशन शुरू करते हैं। अंग्रेजी में ही नहीं, हिंदी, गुजराती और तमिल में भी उसके संस्करण प्रकाशित होते हैं। उसका कोई अंक महात्मा गांधी की रिपोर्ट के बिना नहीं छपता। हर महीने गांधी अपनी जेब से 1200 रुपए खर्च करते हैं। भारत आने तक वे अपनी जेब से 26000 रुपए इस समाचार पत्र में लगा चुके थे। अपने लेखन के बारे में उन्होंने कहा, ‘मैंने एक भी शब्द बिना विचारे, बिना तौले या किसी को खुश करने के लिए नहीं लिखा। सन 1915 में वे हिन्दुस्तान आते हैं। भारत भर में घूमते हैं। देश की समझने का प्रयास करते हैं और फिर लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए पत्रकार बनते हैं। सन 1919 में यानी करीब एक सौ दो साल पहले गुजराती में ‘नवजीवन’ अखबार शुरू करते हैं। ‘यंग इंडिया’ के संपादक बनते हैं और उद्वेलित करने वाले विचारों की नदी बहा देते हैं। ‘यंग इंडिया’ का संपादक बनते ही पहला पत्र अखबार में उन लोगों को लिखते हैं, जो उनसे असहमत होते थे या उनका विरोध करते थे। दूसरा पत्र वे उन गोरों को लिखते हैं, जिसमें वे उन्हें भारत की आजादी के लिए सहमत करने वाले तर्क देते हैं। दोनों अखबार करीब करीब तेरह-चौदह साल निकलते रहे। इनमें प्रकाशित गांधी के विचार पढ़ जाइए। आज के भारत की समस्त चुनौतियों और समस्याओं का हल  उसमें है।

गांधी की संपादकीय दृढ़ता और साहस आज के पत्रकारों और संपादकों के लिए मिसाल है। सात मई, 1944 को यंग इंडिया में उन्होंने लोकतंत्र के समर्थन में लिखा था कि लोकतंत्र से अच्छी प्रणाली कोई दूसरी नहीं है। इतनी बड़ी आबादी के कारण हो सकता है कि उसमें कुछ दोष हों, लेकिन हमें उन दोषों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। यंग इंडिया की पत्रकारिता के लिए ही गांधी जी पहली बार जेल गए थे।  

एक उदाहरण- सन1919 में एक एक्ट लागू हुआ। इसके मुताबिक प्रकाशित होने वाली हर सामग्री की पूर्व अनुमति गोरी हुकूमत ने जरूरी बना दी थी। विरोध में गांधी ‘सत्याग्रह’ का  प्रकाशन करते हैं। अखबार के प्रकाशन की अनुमति भी वे नहीं लेते। पहले अंक में ही लिखते हैं कि सत्याग्रह का प्रकाशन तब तक होता रहेगा, जब तक कि एक्ट वापस नहीं लिया जाता। यह साहस दिखाने वाले सिर्फ गांधी ही हो सकते थे। इसके बाद 1933 में उनकी पहल पर हरिजन कल्याण के लिए नया अखबार निकलता है। यह पहले अंग्रेजी फिर हिंदी में निकला। उनका इस समाचार पत्र के लिए उद्देश्य एकदम साफ था- सेवा। आज विचारों की खुराक हमें कहां मिलती है। न के बराबर। गांधी ने उस समय कहा था कि एक विचार पत्र होना चाहिए। यही वह समय है, जब गांधी साबरमती आश्रम हमेशा के लिए छोड़ देते हैं। कहते हैं, जब तक मुल्क आजाद नही होगा, साबरमती आश्रम नहीं लौटेंगे।

सरकार के दबाव और सेंसरशिप के विरोध में वे लिखते हैं- एक एक पंक्ति अगर दिल्ली में बैठे प्रेस सलाहकार को भेजना पड़े तो मैं स्वतंत्रतापूर्वक काम नही कर सकता। प्रेस की आजादी तो विशेषाधिकार है। गांधी के तेवर से सरकार परेशान हो चुकी थी। जब उन्होंने 1942 में अंग्रेजों! भारत छोड़ों आन्दोलन छेड़ा तो ‘हरिजन’ बंद करना पड़ा। गांधी जेल गए और इधर हरिजन पर ताला पड़ गया। बरतानवी सरकार ने एक-एक प्रति जला दी या जब्त कर ली। दो बरस बाद गांधी जी जेल से छूटे तो हरिजन का प्रकाशन फिर प्रारंभ कर दिया। सेवाग्राम से ही उन्होंने ‘सर्वोदय’ का प्रकाशन शुरू किया। यह उनके अंत समय तक जारी रहा। गांधी ने अपने को हमेशा पूर्णकालिक पत्रकार ही माना। उनका कहना था कि मैं पूर्णकालिक पत्रकार हूं, लेकिन इस समय सबसे बड़ा काम देश की आजादी है। इसके बाद मेरा काम पत्रकारिता है। उन्होंने साफ साफ कहा था, संपादक को कोई भी परिणाम भुगतना पड़े, लेकिन अपने विचार खुलकर व्यक्त करना चाहिए। अखबार के बारे में उनकी स्पष्ट धारणा थी कि प्रकाशन के बाद वह संपादक और मालिक का समाचारपत्र नहीं रह जाता। वह पाठक का हो जाता है। एक संपादक-पत्रकार के रूप में इतना पेशेवर दृष्टिकोण तो आज के संपादक भी नहीं रखते। इस राष्ट्र-राज्य को इस युगपुरुष के प्रति कृतज्ञ क्यों नहीं होना चाहिए मिस्टर मीडिया?

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

सुप्रीम कोर्ट की चिंता संवैधानिक है मिस्टर मीडिया!

इस हकीकत को समझिए, फर्जी खबरों से मुकाबला करना आसान हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

मुश्किल दौर में है अफगानी मीडिया, भारतीय पत्रकारों को आगे आना होगा मिस्टर मीडिया! 

टकराव की स्थिति में पत्रकारिता और सरकार दोनों को नुकसान होगा मिस्टर मीडिया!

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

खुशदीप सहगल का यूट्यूबर्स से बड़ा सवाल, इस तरह कब तक व्युअरशिप की रोटियां सेंकोगे?

यूट्यूबर्स की दुनिया भी गजब है। व्यूज पाने की ललक यहां भी सनक की हद तक है। कुछ वैसी ही जैसे कि मेनस्ट्रीम मीडिया में टीआरपी और डिजिटल में हिट्स या विजिट्स के लिए होती है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 27 September, 2021
Last Modified:
Monday, 27 September, 2021
Khushdeep Sehgal

यूट्यूबर्स की दुनिया भी गजब है। व्यूज पाने की ललक यहां भी सनक की हद तक है। कुछ वैसी ही जैसे कि मेनस्ट्रीम मीडिया में टीआरपी  और डिजिटल में हिट्स या विजिट्स के लिए होती है। यहां सेल्फ रेगुलेशन जैसी कोई व्यवस्था नहीं, इसलिए खुला खेल फर्रूखाबादी है। किसी का जब चाहे मानमर्दन कर दो, किसी को जो मर्जी कह दो, कोई रोकने वाला नहीं। इस तरह से व्यूज बड़ी संख्या में आ जाएं तो फिर तो खुद को तोप समझना लाजमी है। फिर दूसरों के कंधे पर बंदूक चलाने का ये शौक दुस्साहस की सीमा भी पार कर जाता है।

दरअसल देश में पॉलिटिकल डिवाइड इतना बढ़ गया है, इतने खांचे बंट गए हैं कि हर एक ने अपना कम्फर्ट जोन ढूंढ लिया है। राजनीति के इस तरफ या उस तरफ। दोनों तरफ देश के करोड़ों नागरिक भी हैं। नागरिक क्यों देश के अधिकांश पत्रकार भी खेमाबंद हैं। ये खेमाबंदी इतनी स्पष्ट है कि ये खेमे दिन के 24 घंटे दूसरे खेमे के कपड़े उतारने में लगे हैं। यूट्यूबर्स भी इससे अलग नहीं।

देश में एक और चलन दिख रहा है। अब नेताओं की जगह चर्चित पत्रकारों को अधिक निशाना बनाया जा रहा है। ऐसा माहौल बना है तो पत्रकारों के साथ उनके संस्थानों को अन्तर्मन में झांकना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ?

लेकिन साथ ही मेरा कुकुरमुत्तों की तरह उग आए यूट्यूबर्स से पूछना है कि वो किस मुंह से अपने चौबारों पर चढ़ कर चिल्लाते रहते हैं कि फलाने या फलानी एंकर की फुलटू बेइज्जती हो गई। माफ कीजिए इन यूट्यूबर्स के लिए उनकी दुकानें चलने के लिए वही लोग मसाला हैं, जिनके पीछे ये दिन-रात पड़े रहते हैं। ये पत्रकार मान लीजिए किसी राजनीतिक विचारधारा विशेष के हैं, फिर भी उनका नाम जो बना है उसमें भी उनकी मेहनत का भी बड़ा हाथ है। ऐसे ही नहीं वो इस मुकाम तक पहुंच गए।

ये निशाना साधने वाले यूट्यूबर्स खुद भी गिरेबान में झांके, उन्होंने खुद कौन से तीर मारे हैं जो उन्हें दूसरों का मान मर्दन का अधिकार मिल गया। इन बड़े नामों के इस्तेमाल से कब तक व्युअरशिप की रोटियां सेंकोगे। दम है तो इनके नाम का इस्तेमाल किए बिना अच्छे, सार्थक, सकारात्मक कंटेट पर बड़ी इमारत बना कर दिखाइए।

काफी हद तक यूट्यूब चलाने वाले कुछ चर्चित पत्रकार भी ऐसी स्थिति बनने के लिए कैटेलिस्ट्स का काम कर रहे हैं। वो अपनी तरह की ब्रैंडेड पत्रकारिता को खाद पानी देने वाला मसाला ढूंढकर उसे ही परोसते रहते हैं। स्क्रीन पर हर वक्त दिखते रहने के शौक के साथ वही चंद नेताओं के साथ सियासी जुगाली, ग्राउंड रिपोर्टिंग के नाम मनमुताबिक पॉकेट्स में जाकर अपने एजेंडे को सूट करने वाली लोगों की बातचीत...इसके अलावा क्या।

इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि देश का हर वक्त चुनाव मोड में रहना...सत्तापक्ष अपनी दिनरात स्तुति करने वाले पत्रकारों से बहुत खुश रहता हो लेकिन वो जान ले कि स्वस्थ आलोचना को दरकिनार करना, जिस डाल पर बैठे हो उसी को काटना होता है।

ऐसे में निष्पक्ष, सच्चा कंटेट सामने लाना समुद्र से मोती निकालने समान हो गया है। राजनीति से इतर देखा जाए तो दुनिया में और भी बहुत कुछ है। देश की आबादी जल्दी ही डेढ़ अरब के आंकड़े को छूने वाली है तो यकीनन इतनी ही उनसे जुड़ी कहानियां भी होंगी लेकिन उन्हें सामने लाने में मेहनत कौन करे। इसके मुकाबले राजनीतिक बकर-बकर में कोई लागत नहीं।

कंटेट कैसा मिले, इसके लिए व्यूअर्स खुद भी जिम्मेदार हैं। वो हर वक्त राजनीतिक नकारात्मकता में ही डूबे रहना चाहते हैं या इसके बाहर की बहुत बड़ी सकारात्मक दुनिया में भी झांकना चाहते हैं। वो ये भी देखें कि जिन यूट्यूब चैनल्स पर वो जाते हैं, सब्सक्राइब करते हैं, उनके कर्ताधर्ताओं का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड क्या है, सिर्फ़ भड़काऊ हैडिंग, फोटो से व्यूज लेने वालों को कितना बढ़ावा देना है ये आपके ही हाथ में है...

यूनिक कंटेंट की साख रातोंरात नहीं बन जाती, उसके लिए बार बार लगातार परफॉर्म करके दिखाना होगा, बिना भड़काए, बिना किसी बड़े नाम वाले के कंधे पर बंदूक चलाए। ‘देशनामा’ की कोशिश इसी दिशा में बढ़ने की है, देखना है कि ये छोटा सा कदम कितनी दूर तक जा पाता है।

(वरिष्ठ पत्रकार खुशदीप सहगल की फेसबुक वॉल से साभार)

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए