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मिस्टर मीडिया: एक स्ट्रिंगर से लेकर चैनल हेड तक को यह समझ होनी चाहिए
पत्रकारिता विश्वविद्यालयों में भी इन पाठ्यक्रमों का गहराई से समावेश नहीं है
राजेश बादल 6 years ago
राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।
उस दिन राज्य सभा में कश्मीर पर चर्चा हो रही थी। गृहमंत्री इस राज्य की तीन दशक पुरानी समस्या पर चर्चा का उत्तर दे रहे थे। मैंने बारी-बारी से करीब-करीब सारे चैनल देखे। कुछ देर टुकड़ों में उन्होंने कुछ कथन दिखाए। कोई प्रायोजित कार्यक्रम पर चला गया, कोई क्रिकेट वर्ल्ड कप का रिकॉर्डेड प्रोग्राम दिखाने लगा और किसी में मुंबई की बरसात से जुड़ी खबरें प्रसारित हो रही थीं।
इन समाचारों से मेरा विरोध नहीं है। तर्क यह है कि जब अंतर्राष्ट्रीय आकार ले चुकी देश की सबसे गंभीर समस्या पर संसद में बहस हो रही हो, तो क्या पत्रकार उससे अपने आप को अलग कर सकते हैं? ध्यान रखिए कि संसद की कार्यवाही भारतीय लोकतंत्र की सबसे संवेदनशील प्रक्रिया होती है। उसकी तुलना क्रिकेट, बरसात, राशिफल शो या उत्पादों की बिक्री दिखाने से नहीं की जा सकती। संसद की प्रक्रिया एक बीट नहीं है। उसे बीट बना दिया है।
संसदीय लोकतंत्र हमारी जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा है। यह सांस की तरह हर भारतीय के भीतर धड़कना चाहिए। यदि पत्रकार यह जिम्मेदारी नहीं समझते तो विनम्रता से कहना चाहता हूं कि वे पत्रकार नहीं हैं। चाहे खेल पत्रकार हों या बिजनेस के, क्राइम के हों या फिर पॉलिटिकल, सभी को संसद के बारे में अच्छी जानकारी होनी चाहिए। एक स्ट्रिंगर से लेकर चैनल हेड तक को यह समझ होनी चाहिए।
हम भारतीय संसद को लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर कहते हैं तो फिर इस मंदिर के प्रति इतनी उदासीनता या उपेक्षा का भाव हमारे पत्रकारिता-कर्तव्य को निभाने के दौरान क्यों रहता है? कितने पत्रकार हैं, जो सदनों के प्रश्नोत्तर को गंभीरता से पढ़ते हैं और उन्हें अपनी रिपोर्टिंग या संपादकीय लेखों का अंग बनाते हैं। एक प्रश्न का उत्तर जुटाने के लिए लाखों रुपए हमारे टैक्स से खर्च होते हैं और हम इस पैसे को गटर में बह जाने देते हैं।
इसी तरह स्थाई समितियों, लोकलेखा समितियों, संयुक्त संसदीय समितियों, प्रवर समितियों और अन्य समितियों के कामकाज पर मीडिया कितना ध्यान देता है? क्या उनकी रिपोर्टें कभी अखबार के पन्नों या स्क्रीन पर परोसी जाती हैं? शायद दस फीसदी भी नहीं। करोड़ों रुपए इस तरह व्यय हो जाने देते हैं और उसकी जानकारी आम आदमी के लिए देने की ललक भी हमारे अंदर पैदा नहीं होती। यह कैसा पत्रकारिता धर्म है?
अफसोस की बात है कि भारत के बड़े-बड़े मीडिया शिक्षण संस्थानों में असेंबली और पार्लियामेंट्री पाठ्यक्रम नदारद हैं। यहां तक कि पत्रकारिता विश्वविद्यालयों में भी इन पाठ्यक्रमों का गहराई से समावेश नहीं है। मीडिया स्कूल अधकचरे पत्रकार क्यों पैदा कर रहे हैं? उनसे कोई जवाब तलब भी नहीं होता। आज सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में सवा सौ अच्छे संसदीय पत्रकार नहीं हैं।
इन दिनों संसद का बजट सत्र चल रहा है। हर पत्रकार रोज अपनी मार्कशीट में अंक भरता है। देख लीजिए कि संसद की कार्यवाही को हम कितने प्रतिशत स्थान दे रहे हैं। हम राजनेताओं को जिम्मेदार बनने की नसीहत तो देते हैं, लेकिन हम खुद कितने परिपक्व और जिम्मेदार हैं, कभी अपने अंदर भी झांक लीजिए मिस्टर मीडिया!
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