यूनिवर्सिटी में जब जब नारा लगेगा ‘हम देखेंगे’ न्यूज चैनल से आवाज आएगी ‘कीप वाचिंग’

वैसे तो हिंदुस्तान की परम्परा है कि बच्चे लड़ रहे हों तो बड़े बीच में नही पड़ते

प्रमिला दीक्षित by
Published - Wednesday, 08 January, 2020
Last Modified:
Wednesday, 08 January, 2020
Pramila Dixit

प्रमिला दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार।।

वैसे तो हिंदुस्तान की परम्परा है कि बच्चे लड़ रहे हों तो बड़े बीच में नही पड़ते। बच्चे लड़-भिड़कर एक हो जाते हैं, लेकिन बड़ों के बीच में पड़ने से परिवार का सौहार्द खत्म हो जाता है। लेकिन जब से मोहल्ले में टीआरपी लोभी डायरेक्टरों के शातिर सीरियलों की एंट्री हुई है, परिवार के लोग ही बच्चों को प्यादों की तरह इस्तेमाल करने लगे हैं। उन्हें सिखाते हैं हिंदुस्तान किसी के बाप का नहीं है, लेकिन धीमे से उनके मन में बीज बो जाते हैं कि यूनिवर्सिटी तुम्हारे बाप की ही है। प्रेमचंद के हीरा-मोती को दुलत्ती मारकर फैज के लिए लड़ मरने की प्रेरणा देते हैं। अब नौजवान ‘हम देखेंगे’ कहकर ही पिटे जा रहा है। अबे देखोगे तो तब जब आंख-कान दोनों खुले रखोगे। विडियो में कोई दूसरा ऑडियो भरकर आंखों के सामने ठेल देगा तो देखकर भी का कर लोगे?

वीसीआर में रोज नए कैसेट भरे जा रहे हैं। आप बाएं कान से सुनते हो? लीजिए आप ये विडियो लीजिए। आप राइट मैन हो? तो आपके लिए ये दो विडियो! आज़ादी के बाद से ये क्रांति-व्रांति चतुर आदमी के चोंचले होते हैं। हमाई ना मानो तो अन्ना से पूछ लो। जेएनयू इस वक्त यूनिवर्सिटी नहीं है। किसी का कंधा है, किसी का मौका, किसी की प्रयोगशाला! और यहां आम आदमी इत्ता कन्फ्यूज कि यार असल में मसला क्या है, फीस या सीएए?  क्यूंकि हो सकता है कि दोनों को लेकर लोग आपके पक्ष में ना हों, लेकिन किसी एक पर हो सकते हैं।

बॉलिवुड में कोई खास दिलचस्पी या किसी से दुश्मनी नहीं है, लेकिन बाय गॉड इंडस्ट्री में जिस वक्त जिसका सितारा बुलंद होता है, इतने निहायत प्रोफेशनल होते हैं कि निर्भया जैसे मौके पर भी बोलने से पहले सोचते हैं कि  वक्त, छवि, पैसे का कोई नफा-नुकसान तो नहीं हो रहा? इसलिए जब जेएनयू में छपाक एंट्री होती है तो संशय होता है। इसमें रीढ़ दिखाने जैसा कुछ नहीं है। रीढ़ तब दिखती, जब मुंह से कुछ शब्द फूटते। लेकिन चूंकि वो स्क्रिप्ट में था नहीं और लिखा हुआ पढ़ने के आदी लोग इतने अबोध हैं कि वो जानते ही नहीं वो किसी मसले में कहां खड़े हैं!

कुछ पत्रकार दीपिका के समर्थन में लिख रहे हैं ब्रेव! लगे हाथों अपने प्रोग्राम की टाइमिंग भी बताए दे रहे हैं कि इत्ते बजे हमारा प्रोग्राम भी देख लीजिए, आज ही आएगा, दीपिका की पिक्चर आने में तो अभी टाइम है! वैसे, ‘हम देखेंगे’ का सही मजा तो चैनल वाले ले रहे हैं। जब-जब यूनिवर्सिटी से आवाज आएगी ‘हम देखेंगे’,  चैनल दुहराएंगे ‘कीप वाचिंग’!

बाकी आईआईटी कानपुर अब नज्मों पर शोध करेगा तो जाहिर है पानी से चलने वाली कार अब जावेद अख्तर ही खोजेंगे। और कित्ती आजादी चाहिए बे, इत्ती आजादी लेकर जाओगे कहां?

(ये लेखिका के निजी विचार हैं।)

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उस सूरत में अपने आपको भी जवाब देना होगा मिस्टर मीडिया!

टेलिविजन चैनलों के राष्ट्रीय संगठन ने गुस्सा दिखाया है। सरकारी विज्ञापन बंद नहीं होने चाहिए।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 08 April, 2020
Last Modified:
Wednesday, 08 April, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

टेलिविजन चैनलों के राष्ट्रीय संगठन ने गुस्सा दिखाया है। सरकारी विज्ञापन बंद नहीं होने चाहिए। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सभी माध्यमों में कोरोना संकट के मद्देनजर सरकारी विज्ञापनों पर दो साल की रोक लगाने की मांग की थी। एनबीए के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने यह बयान जारी किया है। उनका कहना है कि चैनल और मीडिया के अनेक अवतार पहले ही मंदी की मार झेल रहे हैं। पत्रकार जान पर खेलकर अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। ऐसे में विज्ञापन बंद करने का सुझाव पार्टी अध्यक्ष को वापस लेना चाहिए।

मौटे तौर पर इस बात से कोई असहमत नहीं होगा कि इस मुश्किल घड़ी में पत्रकार खुद को ज़ोखिम में डालकर काम कर रहे हैं। वे अस्पतालों में जा रहे हैं। पुलिस की गालियां और डंडे खा रहे हैं। कहीं-कहीं अपने एक पक्षीय कवरेज के कारण दर्शकों का गुस्सा भी झेल रहे हैं। कुल मिलाकर पत्रकारों की वर्तमान पीढ़ी के लिए यकीनन यह संवेदनशील और चुनौती भरा दायित्व है। इससे पहले सुनामी, गुजरात और कश्मीर भूकंप तथा भोपाल गैस त्रासदी ऐसे हादसे थे, जिनकी कवरेज में हम लोगों की हालत ख़राब हो गई थी। लेकिन, कोरोना का कहर तो सबसे डरावना है। लब्बोलुआब यह कि विज्ञापन बंद करने की मांग से पक्के तौर पर कोई सहमत नहीं होगा।

मगर इससे दो सवाल उभरते हैं। पहला तो यह कि सरकार विज्ञापन देने में टीवी,अखबार, निजी रेडियो और डिजिटल प्लेटफॉर्म में भेदभाव क्यों करती है? वेबसाइट्स, न्यूज़ पोर्टल्स और डिजिटल माध्यमों के साथ न्याय नहीं हो रहा है। अगर एक टीवी चैनल को महीने में सरकार से एक करोड़ रुपए के विज्ञापन मिलते हैं तो न्यूज पोर्टल्स को कम से कम आधा यानी पचास लाख तो मिलना चाहिए। सोशल और डिजिटल माध्यम नई नस्लों के लिए सर्वाधिक अनुकूल और पसंदीदा माध्यम हैं। वे तुरंत असर या मार करते हैं। इस माध्यम की उपेक्षा सरकार क्यों करती है-समझ से परे है। इसी तरह अख़बार और रेडियो के मामले में धन का आनुपातिक संतुलन होना चाहिए।

दूसरा यह कि चैनलों के संगठन की यह बात सच नहीं है कि इन दिनों उनका व्यय बढ़ा है। खर्च तो उल्टा कम कम हुआ है। न्यूनतम संसाधनों में जब काम होता है तो खर्च भी कम होता है। कोई भी चैनल पहले और इन दिनों के ख़र्च का विवरण अपने एकाउंट्स विभाग से मांगे तो पता चल जाएगा। असल बात तो यह है कि कोरोना संकट दो महीने से चल रहा है। इस दरम्यान अनेक चैनलों ने अपने कर्मचारियों और पत्रकारों के वेतन तथा अन्य भत्तों में अनाप शनाप कटौती की है। वेतन भी टुकड़ों-टुकड़ों में दिया जा रहा है। कुछ चैनलों में तो अधिक सैलरी वाले प्रोफेशनल्स को विदाई दी जा रही है। असल में सरकारी संरक्षण तो उन पत्रकारों को मिलना चाहिए। सरकारी विज्ञापन पर पलना तो वैसे भी स्वस्थ्य और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए अच्छा नहीं माना जाता। प्रोफेशनल्स को नौकरी छोड़ने के लिए बाध्य करने से बड़ा जुर्म और क्या हो सकता है।

यह ध्यान में रखिए कि मंदी की मार झेलने वाले चैनलों को बाजार के विज्ञापनों का टोटा हो जाएगा और वे सरकारी पैसे की प्राणवायु पर जिंदा रहेंगे तो निष्पक्ष पत्रकारिता कैसे करेंगे? सरकार से उपकृत प्रबंधन व्यवस्था की ख़ामियां निकालने अथवा आलोचना करने का काम किस मुंह से करेगा। सरकार किसी भी दल की हो, अपनी आलोचना कभी पसंद नहीं करती। आप उसकी प्रशस्ति में गीत गाएं या ढोल बजाएं, उसे तो अच्छा ही लगेगा। उस सूरत में अपने आपको भी जवाब देना होगा मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: सरकार इस समय मीडिया से इतनी असुरक्षित-असहज क्यों महसूस कर रही है

ऐसे पुलिसवालों के खिलाफ कार्रवाई न हो तो सड़कों पर उतरने के लिए तैयार रहिए मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: चेतावनी है कि अब मजाक भी बनने लगे हैं एंकर

इस धर्म या कर्तव्य को निभाने से किसने रोका है मिस्टर मीडिया?

 

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'इन दिनों न्यूयॉर्क टाइम्स का हवाला देकर भारतीय मीडिया पर लगाया जा रहा है ये आरोप'

प्रतिपक्ष अतिवादी संगठनों के लोग ही नहीं मीडिया का एक वर्ग भी भारतीय मीडिया को सत्ता से आतंकित या भक्त होने का आरोप लगाते हैं। इसके लिए भी ‘महान’ न्यूयॉर्क टाइम्स का हवाला ऐसे दिया जाता है

Last Modified:
Sunday, 05 April, 2020
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आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार ।।

पश्चिम के प्रति मेरा कोई पूर्वाग्रह नहीं रहा, न ही वामपंथी विचारधारा का असर रहा। इसके विपरीत जर्मनी में तीन साल काम किया और भारत में रहकर भी विदेशी मीडिया के लिए कुछ काम करता रहा।  दुनिया के लगभग 40 देशों की यात्रा के अवसर भी मिले और यूरोप-अमेरिका की यात्राएं कई बार की। निकटस्थ परिजन भी उन देशों में हैं। दूसरी तरफ भारत देश की समस्याओं और चुनौतियों को निरंतर देखने समझने और अपना आक्रोश व्यक्त करने में भी कमी नहीं रही। फिर भी वियतनाम युद्ध और अफगानिस्तान में सोवितयत संघ के प्रभुत्व के वर्षों बाद भी अमेरिका की विफलता से अधिक कोरोना वायरस की महामारी से निपटने में यूरोप तथा अमेरिका की कमजोरियों एवं विफलताओं से यह संतोष करने में गौरव भी महसूस होता है कि भारत बहुत हद तक आत्म निर्भरता की तरफ आगे बढ़ रहा है। इस सन्दर्भ में दुर्भाग्य से पश्चिम के मीडिया को आदर्श और अवतार की तरह समझने वाले वर्ग को अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य यूरोपियन देशों के टीवी समाचार चैनलों तथा प्रमुख प्रकाशनों की कमजोरियों पर भी थोड़ा ध्यान देना चाहिये।

दूसरे विश्व युद्ध से लेकर भारत में इमरजेंसी के युग और उदार अर्थ व्यवस्था के वर्तमान दौर तक राजनीतिक सत्ताधारी या प्रतिपक्ष एवं प्रबुद्ध वर्ग या पश्चिम की चमक से प्रभावित मध्यम वर्ग का एक हिस्सा विदेशी मीडिया को बहुत महत्वपूर्ण मानता रहा है। आजादी से पहले मजबूरी थी और भारत के प्रमुख अंग्रेजी अखबार ब्रिटिश हाथों में थे। आजादी के बाद भी उनका असर बना रहा। इमरजेंसी में इंदिरा गांधी ने पश्चिम के प्रमुख मीडिया संस्थानों को पूर्वाग्रह तथा जासूसी के आरोपों में बहार कर दिया। वहीँ भारतीय मीडिया में सेंसर होने से लोग बीबीसी और अन्य विदेशी समाचार स्रोतों पर निर्भर रहने लगे। प्रतिपक्ष की आवाज बनने के कारण जनता पार्टी की 1977 की सरकार से मनमोहन सिंह की सरकार तक पश्चिम के मीडिया तथा भारत के दिल्ली केंद्रित अंग्रेजी मीडिया को जरूरत से ज्यादा अहमियत मिलती रही।

बहरहाल वर्तमान दौर में न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अमेरिकी प्रकाशन या बीबीसी जैसे पश्चिमी देशों के प्रसारण संस्थान भारत के मीडिया को सत्ता की कठपुतली और लोकतान्त्रिक सरकार द्वारा कोरोना संकट में गरीबों के पलायन में अव्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं में कमियों गड़बड़ियों, कभी सत्तारूढ़ हिन्दू पार्टी द्वारा मुस्लिमों के साथ ज्यादतियों, जम्मू कश्मीर में 370 हटाने और कुछ नेताओं के नजरबन्द रखने की खबरों और टिप्पणियों को अधिकाधिक उछाल रहे हैं। सबसे मजेदार बात यह है कि यह सामग्री भी वह यहीं सरकार से असंतुष्ट अथवा नक्सल और अतिवादी संगठनों से संपर्क सहानुभूति रखने वाले कुछ कथित पत्रकारों-अभियानकर्ताओं से जुटाते हैं। फिर वही लोग उन विदेशी मीडिया को उद्धृत करके भारत में उछालते हैं। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सर्वाधिक दुरुपयोग स्वार्थी एवं विदेशी तत्व ही उठाते हैं। भारत में यही लोग कभी यह नहीं देखते कि कोरोना में ब्रिटिश, इटली और अमेरकी  सरकार के निकम्मेपन और स्वास्थ्य सेवाओं की बुरी हालत पर बीबीसी टेलिविजन की वर्ल्ड सर्विस या अमेरिकी मीडिया में कितनी खबरें और प्रतिपक्ष के नेताओं-समाज के ठेकेदारों की कितनी टिप्पणियां आ रही हैं। इन दिनों घर बंदी के आदेशों का पालन करने के कारण मुझे भी सामान्य दिनों से अधिक लगातार ब्रिटिश, अमेरिकी, फ्रांस, रूस, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, जापान जैसे देशों के अंग्रेजी प्रसारण देखने सुनने का अवसर मिला है।

आश्चर्य तब होता है, जबकि लंदन और ब्रिटेन में कोरोना के भयंकर प्रकोप तथा निरंतर मौत की संख्या बढ़ने के बावजूद पिछले चार दिनों में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस टीवी पर स्पेन, अमेरिका, इटली की खबरों को प्रमुखता मिलती रही और लंदन का हाल संक्षेप में चौथे नंबर पर मिलता रहा। कहने को यह स्वायत्त संस्थान माना जाता है, लेकिन रूस या चीन की सरकारें तो इनकी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए यहां तक कहती हैं कि विश्व  इनका उपयोग गुप्तचर एजेंसियां करती रही हैं। कुछ अर्से पहले कांग्रेस के कई नेता भी यही आरोप ब्रिटिश-अमेरिकी मीडिया पर लगाते थे, लेकिन अब प्रतिपक्ष में उन्हें भारतीय मीडिया के बजाय पश्चिम का मीडिया अच्छा लगता है।

प्रतिपक्ष अतिवादी संगठनों के लोग ही नहीं मीडिया का एक वर्ग भी भारतीय मीडिया को सत्ता से आतंकित या भक्त होने का आरोप लगाते हैं। इसके लिए भी ‘महान’ न्यूयॉर्क टाइम्स का हवाला ऐसे दिया जाता है मानो वही देव वाणी है। चीन या पाकिस्तान में भारत विरोधी प्रचार को भी महत्व देने में संकोच नहीं किया जाता। कश्मीर को आजाद करने या नक्सलियों को सही ठहराने वाली लेखिका या पत्रकार को गद्दार न सही गलत कहने में भी मीडिया के एक प्रबुद्ध वर्ग को कष्ट होता है। इससे जुड़ा अहम मदद यह है कि क्या दिल्ली का अंग्रेजी मीडिया ही असली भारत की छवि दे सकता है। क्या लोकमत, मलयाला मनोरमा, सन्देश, इनाडु, कन्नड़ प्रभा, पंजाब केसरी, भास्कर, असम का पूर्वोदय, आनंद बाजार पत्रिका जैसे अखबार या भारतीय भाषाओँ के टीवी चैनल गंभीरता से जन समस्याओं को उठाकर केंद्र और राज्य सरकारों पर तीखी टिप्पणियां नहीं देते। यदि कोई गहराई से तथ्यों का अध्ययन करे, तो यह साबित होगा कि उन्होंने अधिक धारदार, खोजपूर्ण एवं निर्भीक पत्रकारिता की है।

मीडिया के पुरस्कारों की चयन समितियों में कई वर्षों से जुड़े होने के कारण और विभिन्न क्षेत्रों के सम्पादकों, पत्रकारों से संपर्क रहने से मुझे यही महसूस होता है कि वहां दिल्ली से अधिक कठिनाइयों और दबाव के बावजूद अधिक अच्छा काम हो रहा है। लेकिन क्या आपने देखा है दिल्ली का राष्ट्रीय मीडिया कहलाने वाले अंग्रेजी मीडिया ने ईमानदारी से उनके काम का श्रेय देते हुए महत्व दिया है। सरकारों के विज्ञापन का अधिकांश हिस्सा दिल्ली को मिल जाता है और सम्पूर्ण भारतीय भाषाओँ के मीडिया को चालीस प्रतिशत से कम हिस्सा मिलता है। यहां भी मुझे अमेरिका के स्थानीय क्षेत्रीय अखबारों की तारीफ करना आनश्यक लगता है। न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन से दूर उत्तर कॉर्लिना या केलिफोर्निया के अखबारों ने अश्वेतों तथा हिस्पैनिक लोगों की समस्याओं को उठाने, उनके अधिकार सुविधाएं दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

हाल के महीनों में चीन से कोरोना की महामारी फैलने पर भारत या पश्चिमी मीडिया ने बहुत कुछ लिखा, दिखाया, लेकिन चीन या रूस ने बहुत नियंत्रण के साथ सूचनाएं आगे जाने दी। फिर भी यदि चीन या पाकिस्तान में भारत विरोधी कुछ बाते मीडिया में सामने आई तो भारतीय अभियानकर्ता उसे जोर शोर से उठाने लगते हैं। आखिरकार आजादी के 73 साल बाद भी विदेशी सामान की तरह विदेशी मीडिया को श्रेष्ठ मानकर गुलामी मानसिकता का परिचय देते रहेंगे। लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब केवल बुराई देखना नहीं उसमें सुधार के लिए हरेक को अपना योगदान देने का है।

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मिस्टर मीडिया: सरकार इस समय मीडिया से इतनी असुरक्षित-असहज क्यों महसूस कर रही है

इन दिनों पत्रकारिता तलवार की नोक पर चलने जैसी हो गई है। ‘द वायर’ के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार ने एफआईआर दर्ज की है। स्पष्टीकरण के बावजूद यह रवैया बेहद आपत्तिजनक है।

राजेश बादल by
Published - Friday, 03 April, 2020
Last Modified:
Friday, 03 April, 2020
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

इन दिनों पत्रकारिता तलवार की नोक पर चलने जैसी हो गई है। ‘द वायर’ के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार ने एफआईआर दर्ज की है। स्पष्टीकरण के बावजूद यह रवैया बेहद आपत्तिजनक है। वायर ने अपनी त्रुटि ठीक कर आलेख दोबारा पब्लिश किया। इसके बावजूद उत्तरप्रदेश सरकार की यह कार्रवाई कोई भी जायज नहीं ठहरा सकता।

एडिटर्स गिल्ड की कार्रवाई सामयिक तथा स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता को संरक्षण देने वाली है। लेकिन बात केवल एडिटर्स गिल्ड के बयान से ही पूरी नहीं हो जाती। इसके आगे यह सवाल भी खड़ा होता है कि निर्वाचित प्रतिनिधि मीडिया के साथ इतने हिंसक और प्रतिशोध से भरे हुए क्यों हैं? अपवाद के तौर पर कोई आलेख में कोई तथ्यात्मक भूल हो सकती है, ठीक वैसे ही जैसे हमारे राजनेता संसद में और संसद से बाहर भी जबान फिसलने के कारण अनुचित और अससंदीय भाषा का इस्तेमाल करते हैं। अगर उनके शब्दों का अर्थ समझा जाए तो वे उन्हें हिरासत में लेने के लिए पर्याप्त होते हैं। लोकतंत्र के दो स्तंभों में आपसी समझ की कमी और एक दूसरे पर अविश्वास दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। यह स्थिति पत्रकारिता के लिए बेहद गंभीर नजर आती है।

इस घटना से पहले केंद्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय में गई। उसका कहना था कि मुल्क की सबसे बड़ी पंचायत मीडिया के सभी रूपों को निर्देश दे कि वे लॉकडाउन से जुड़ी खबरें संबंधित सरकारी अफसरों से पुष्टि के बाद ही प्रकाशित-प्रसारित करें। यह कदम भी खिन्न करता है। एडिटर्स गिल्ड ने इसका भी संज्ञान लिया है।

क्या इस तरह के मामलों में भी सुप्रीम कोर्ट की शरण लेना चाहिए। फिर तो यह जवाबी कार्रवाई का एक हथियार बहुत से लोगों को मिल जाएगा। देश में प्रशासनिक मशीनरी के अनेक हिस्से भी ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। फिर उन्हें भी अपना दायित्व बोध कराने के लिए आम नागरिक को सीधे सर्वोच्च न्यायालय क्यों नहीं जाना चाहिए। यह समझ से परे है कि अचानक सरकार मीडिया के समस्त अवतारों से इतनी असुरक्षित और असहज क्यों महसूस करने लगी है। जब समूची दुनिया एक अप्रत्याशित संकट से जूझ रही है तो पत्रकारिता ऐसे वातावरण में हुकूमत के प्रति शत्रुता का भाव क्यों दिखाएगी- यह समझने की बात है। लेकिन अगर कोई यह कुतर्क करे कि लॉकडाउन की विसंगतियों और व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए मीडिया न सुझाव दे और न उनके कामकाज में कोई मीन मेख निकाले तो यह कैसे संभव है। पत्रकारिता के अपने भी सरोकार होते हैं। जब देश मुसीबत में हो एक संपादक देश की चिंता पहले करेगा न कि सरकार की। सरकार की प्रशस्ति में गाल बजाने वाले बहुतेरे होते हैं लेकिन तंत्र की गड़बड़ियों को उजागर करने का काम सब नहीं करते। किसी भी राजनेता या इन्तचामियां को अपनी आलोचना सुनने का साहस और संयम भी होना चाहिए। ‘हुकूमते-ए-हिन्द’ को अपनी आलोचना से सबक लेना चाहिए। कबीर ने सदियों पहले यूं ही नही लिख दिया था कि निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छबाय, बिन पानी, साबुन बिना निर्मल करे सुभाय आर्थर आलोचकों को अपने करीब ही रखना चाहिए। वे बिना साबुन और पानी के स्वभाव को निर्मल कर देते हैं। सियासी जमात को यह बात ध्यान में रखना चाहिए।

दूसरी ओर पत्रकारिता में सिर उठा रही कुछ गैर जिम्मेदार प्रवृतियों को भी सावधान होना चाहिए। मैं इस स्तंभ के जरिए लगातार इस बात को रेखांकित कर रहा हूं कि गैर जिम्मेदारी और सरोकारों से पीछे हटने पर अवाम के दिलों से पत्रकार उतर जाएंगे। वैसे भी अरसे से हमारी साख पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इसलिए सोच में सिर्फ जम्हूरियत और जिम्मेदारी को रखें मिस्टर मीडिया!    

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‘विक्टिम कार्ड खेलना बंद कर इलाज कराइए। दिमाग का भी और कोरोना का भी’

इस बात को साफ तौर पर समझ लीजिए कि आपकी जिद के चलते इंदौर शहर की जनता खुद को दांव पर लगाने को तैयार नहीं है।

Last Modified:
Tuesday, 31 March, 2020
Corona

हेमंत शर्मा,  संस्थापक व संपादक, प्रजातंत्र।।

इस संपादकीय के बाद शायद ‘प्रजातंत्र’ को सांप्रदायिक करार दे दिया जाए। कुछ लोग यह भी कहेंगे कि देखिए, यही है आजकल की हिंदी पत्रकारिता का असली चेहरा, जिसमें मुसलमानों पर निशाना साधा जा रहा है। इन अखबारों को पढ़ना बंद कर दीजिए। जैसे हमने बरसों पोलियो के टीके नहीं लगवाए और जैसे महामारी के इस दौर में हम अपनी बीमारी छिपाकर घरेलू इलाज से उसे ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं, वही कीजिए।

जब पूरा शहर महामारी के मुहाने पर खड़ा है और सबसे ज्यादा बीमारी का कहर उन सघन मुस्लिम बस्तियों में है, जहां न तो पर्याप्त सुरक्षा है और न ही लोग बीमारी और बीमारों का पता बताने को तैयार हैं-इस बात को साफ तौर पर समझ लीजिए कि आपकी जिद के चलते इंदौर शहर की जनता खुद को दांव पर लगाने को तैयार नहीं है। इसमें वे मुस्लिम भी शामिल हैं, जो आपको समझा-समझाकर परेशान हो गए। आफत इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि पढ़े-लिखों से ज्यादा आपके दिमाग पर वे लोग असर डाल रहे हैं, जो कभी स्कूल नहीं गए और मजहब की घुट्‌टी पिला-पिलाकर जिन्होंने अपनी टपरी सजाई हुई है।

कल अलग-अलग जगहों से तीन विडियो मोबाइल पर आए थे। पहला उन मौलाना का था, जो इस बात पर बहस कर रहे थे कि मस्जिद में 15 लोग इकट्‌ठा हो जाएंगे तो क्या हो जाएगा? क्योंकि सरकारी अमले के आप लोग जो हमें रोकने आए हैं, आप भी तो 15 हैं। इस मौलाना की बुद्धि में सुराख कर कोई कैसे समझाए कि ये अपनी जान पर खेलकर आए हैं, ताकि तुम्हारी जान बचा सकें।

दूसरा विडियो उत्तर प्रदेश का था, जिसमें 15-20 लोग एक बंद कमरेनुमा जगह पर प्रतिबंध होने के बावजूद नमाज पढ़ रहे हैं। नमाज पढ़ने से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन जब प्रशासन कह रहा है इकट्‌ठा मत होइए, यह कानून का उल्लंघन है तो कानून को तोड़कर महामारी के दौर में सिर्फ मस्जिद जाकर ही इबादत करने को ईश्वर भी मंजूर नहीं करेगा। यहां सवाल सिर्फ उन लोगों का नहीं था, जो इकट्‌ठा हुए थे, बल्कि उन लोगों का है, जिन्हें इनमें से कोई भी वायरस दे सकता है। यहां एक छोटा बच्चा भी था और काफी जगह होने के बावजूद सब इतने नजदीक बैठे थे कि जैसे उस कमरे की चौखट पर पहले ही महामारी को फूंक मारकर बाहर बांध दिया गया हो। क्या आप देश के कानून से ऊपर हैं? और जब उसका पालन करवाया जाए तो आप कहने लगते हैं कि देखिए, ये जालिम सरकार कैसे मजलूमों पर कहर ढा रही है!

डंडे तो पड़ेंगे, फिर आप मुस्लिम हों या हिंदू। आपकी मूर्खता का खामियाजा बाकी सारे हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई नहीं भुगतेंगे। बुजुर्ग नहीं भुगतेंगे, बच्चे नहीं भुगतेंगे। अगर लॉकडाउन के बाद कुछ मूर्ख हिंदू जुलूस निकालेंगे तो उन्हें भी उतने ही डंडे पड़ेंगे, जितने आपको लॉकडाउन तोड़कर इकट्‌ठा होने पर पड़ने चाहिए।

तीसरा और सबसे ज्यादा दिल दहलाने वाला विडियो इंदौर का था और उस इलाके का था, जहां से सबसे ज्यादा कोरोना के मरीज मिल रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीम जब उनके घरों पर दस्तक दे रही थी तो आप उन पर थूक रहे थे, उन्हें गालियां दे रहे थे, उन्हें धमका रहे थे और इसका विडियो बना रहे थे, ताकि बाकी लोगों को यह संदेश मिल जाए कि इन टीमों के साथ क्या करना है। और जब पुलिस-प्रशासन सख्ती करेगा तो आप जोर-जोर से रोने लगेंगे कि पहले तो सिर्फ दिल्ली ही थी, अब ये भी…।

ये ‘विक्टिम कार्ड' खेलना बंद करिए। इलाज कराइए। दिमाग का भी और कोरोना का भी। कोरोना से पहले दिमाग का। क्योंकि पिछले कुछ सालों में जैसे-जैसे उनके पाजामे की लंबाई इंच-दर-इंच कम होती गई है, आपने मौलाना आजाद से लेकर जावेद अख्तर और डॉ. अब्दुल कलाम से लेकर मौलाना वहीदुद्दीन खान तक की नसीहतों को खुद से दूर कर लिया है और कठमुल्लों ने उल्टे उन्हें जाहिलों की श्रेणी में डाल दिया है। सबको छोड़िए, अपनी मुकद्दस किताब को एक बार फिर पढ़िए। वह विज्ञान की बात करती है, वह इंसानियत की बात करती है। और जब-जब अंधेरा घना हो, उससे बाहर कैसे निकला जाए इसकी बात करती है।

इस बात को भी साफ तौर पर समझ लीजिए कि बीमारी का धुआं आपके घर से निकलकर आसपास फैल रहा है। अभी तो दरवाजे बंद हैं, लेकिन जब ये आपकी गलतियों के कारण दूर दूसरों के घरों में घुसने लगेगा तो फिर हिंदू या मुस्लिम सब अपने दरवाजे खोलेंगे और यह धुआं बुझाने निकलेंगे।

याद रखिए… धुआं आंखों में सिर्फ पानी लाता है। बिना यह देखे कि आंखें हिंदू की हैं या मुसलमान की। लिहाजा, अपने तईं पूरी कोशिश कीजिए कि आप इस खूबसूरत दुनिया को बचाने में क्या भूमिका निभा सकते हैं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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कोरोना से जंग में मजूबती से अपनी भूमिका निभा रहे ये ‘धुरंधर’

आज के दौर में टेलिविजन और अन्य ‘ओवर द टॉप’ (OTT) प्लेटफॉर्म्स हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।

Last Modified:
Saturday, 28 March, 2020
corona

रित्विका नंदा व सुधीर मिश्रा

पार्टनर, ट्रस्ट लीगल एडवोकेट्स  एंड कंसल्टेंट्स ।।

आज के दौर में टेलिविजन और अन्य ‘ओवर द टॉप’ (OTT) प्लेटफॉर्म्स हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। जैसा कि सभी को पता है कि कोरोनावायरस (कोविड-19) जैसी महामारी से निपटने के लिए सरकार द्वारा 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा की गई है। ऐसे में नागरिकों के जिन अधिकारों को लेकर दशकों से चर्चा और उनकी वकालत होती रही है, उनमें कमी कर दी गई है और यह राष्ट्र के कल्याण के लिए एक सही कदम भी है। वर्तमान हालातों को छोड़कर देश के सामने ऐसी स्थिति कभी नहीं आई है, ऐसे में यह जरूरी है कि सभी लोगों को इंफॉर्मेशन, न्यूज और एंटरटेनमेंट मिल सके।

इस साल की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि इंटरनेट का इस्तेमाल संविधान के तहत लोगों का मौलिक अधिकार है। आज, ऐसा लगता है कि न्यूज और एंटरटेनमेंट को हासिल करने के अधिकार ने अन्य अधिकारों पर विजय हासिल कर ली है। यह समाज और समुदाय को साथ-साथ ले आया है और वर्तमान स्थिति से निपटने में समाज की सहायता कर रहा है। ऐसे नाजुक दौर में डॉक्टरों और अन्य प्राधिकरणों द्वारा दी जाने वाली आपातकालीन सेवाओं की भूमिका काफी बढ़ गई है और इस ‘जंग’ से बहादुरी के साथ लड़ने में मदद कर रही है।

ऐसे समय में मीडिया, ब्रॉडकास्टिंग और डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म्स की भूमिका को भी समझने और सराहे जाने की आवश्यकता है। ऐसे नाजुक दौर में जब लोगों को घरों में बंद रहने की सलाह दी गई है, किसी जमाने में ‘इडियट बॉक्स’ (idiot box) कहलाने वाला टीवी अब इडियट नहीं दिखाई दे रहा है। परिवार का हर सदस्य या तो खबरों के लिए या फिर मनोरंजन के लिए टेलिविजन की ओर रुख कर रहा है। इसके लिए हम कई लोगों को धन्यवाद देना चाहते हैं, जो दिन रात अपने काम में लगातार जुटे हुए हैं, ताकि न्यूज और एंटरटेनमेंट की निर्बाध रूप से आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। 

ऐसा ही एक डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म सिटी नेटवर्क्स (SITI Networks Limited) है, जो देश का सबसे बड़ा मल्टी सिस्टम ऑपरेटर है। सिटी नेटवर्क्स ‘एस्सेल’ ग्रुप का ही एक हिस्सा है, जो 580 से अधिक स्थानों और आसपास के क्षेत्रों में अपनी केबल सेवाएं प्रदान करता है और लगभग 8 मिलियन डिजिटल कस्टमर्स तक अपनी पहुंच बनाता है।

इस संबंध में ‘सिटी नेटवर्क्स लिमिटेड’ के चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर अनिल मल्होत्रा कहते हैं, ‘मानवता के लिए खतरा बने कोरोनावायरस के खिलाफ इस जंग में हमारे SITI कर्मचारी भी आगे आकर एक शांत हीरो की तरह डटे हुए हैं। हमारी फील्ड और सपोर्ट टीमें लोगों को सूचनाएं और एंटरटेनमेंट उपलब्ध कराकर घर पर रहने में मदद कर रही हैं।’

कई बार पुलिस और अन्य अधिकारियों से थोड़ा समर्थन मिलने के बावजूद हमारी टीमें यह सुनिश्चित करती हैं कि सेवाएं बनी रहें और चलती रहें। हालांकि इस लड़ाई में कोरोना वायरस के फैलते संक्रमण की चेन को तोड़ना जरूरी है, लेकिन यह भी जरूरी है कि यह चेन टूटी रहे। वहीं, लोग घरों में रहें इसके लिए हमारी सर्विस और टीम अपनी चेन को मजबूती प्रदान किए हुई है। मीडिया, ब्रॉडकास्टिंग और डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म्स जैसे सिटी (SITI) इस मुश्किल दौर में भी अपना प्लेटफॉर्म बंद नहीं कर रहे हैं, लेकिन इन पर दबाव बनाने के बजाय इनकी सराहना की जानी चाहिए।

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CM को खुला पत्र, कुशाभाऊ ठाकरे का नाम हटाना चंदूलाल जी का सम्मान नहीं

विश्वविद्यालय का नाम आदरणीय चंदूलाल चंद्राकर के नाम पर रखकर आप उनका सम्मान नहीं कर रहे, बल्कि एक महानायक को विवादों में ही डाल रहे हैं।

Last Modified:
Thursday, 26 March, 2020
chandu

सेवा में,

श्री भूपेश बघेल जी

मुख्यमंत्रीः छत्तीसगढ़ शासन, रायपुर

 

आदरणीय भूपेश जी,

 सादर नमस्कार,

                 आशा है आप स्वस्थ एवं सानंद हैं। यह पत्र विशेष प्रयोजन से लिख रहा हूं। मुझे समाचार पत्रों से पता चला कि आपके मंत्रिमंडल ने रायपुर स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय का नाम बदलकर अब चंदूलाल चंद्राकर पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय करने का निर्णय लिया है। राज्य के मुख्यमंत्री होने के नाते और लोकतंत्र में जनादेश प्राप्त राजनेता होने के नाते आपका निर्णय सिर माथे। लेकिन आपके इस फैसले पर मेरे मन में कई प्रश्न उठे हैं, जिन्हें आपसे साझा करना जागरूक नागरिक होने के नाते अपना कर्तव्य समझता हूं।

    मैंने 1994 से लेकर 2009 तक अपनी युवा अवस्था का एक लंबा समय पत्रकार होने के नाते छत्तीसगढ़ की सेवा में व्यतीत किया है। रायपुर और बिलासपुर में अनेक अखबारों के माध्यम से मैंने छत्तीसगढ़ महतारी की सेवा और उसके भूमिपुत्रों को न्याय दिलाने के लिए सतत लेखन किया है। मेरी पुस्तकों के विमोचन कार्यक्रमों में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, अजीत जोगी, डा. रमन सिंह, सत्यनारायण शर्मा, बृजमोहन अग्रवाल, चरणदास महंत, धर्मजीत सिंह,स्व. नंदकुमार पटेल, स्व.बी.आर. यादव जैसे नेता आते रहे हैं। आपसे भी विधायक और मंत्री के नाते मेरा व्यक्तिगत संवाद रहा है। आपके गांव भी आपके साथ एक आयोजन में जाने का अवसर मिला और क्षेत्र में आपकी लोकप्रियता, संघर्षशीलता का गवाह  रहा हूं।

योद्धा हैं आप-

   आपसे हुए अनेक संवादों में आपके व्यक्तित्व, उदारता और लोगों को साथ लेकर चलने की आपकी क्षमता तथा छत्तीसगढ़ राज्य के लिए आपके मन में पल रहे सुंदर सपनों को जानने-समझने का अवसर मिला। मैं आपकी संघर्षशीलता, अंतिम व्यक्ति के प्रति आपके अनुराग को प्रणाम करता हूं। आप सही मायने में योद्धा हैं, जिन्होंने स्व. नंदकुमार पटेल के छोड़े हुए काम को पूरा किया। सत्ता में आने के बाद आपका रवैया आपको एक अलग छवि दे रहा है, जिसके बारे में शायद ‘आपके सलाहकार’ आपको नहीं बताते हैं। आप राज्य के मुख्यमंत्री हो चुके हैं और मैं अदना सा लेखक हूं, सो आपसे मित्रता का दावा तो नहीं कर सकता। किंतु आपका शुभचिंतक होने के नाते मैं आपसे यह निवेदन करना चाहता हूं कि आप कटुता, बदले की भावना और निपटाने की राजनीति से बचें। यह कांग्रेस का रास्ता नहीं है, देश का रास्ता नहीं है और छत्तीसगढ़ का रास्ता तो बिल्कुल नहीं।

नाम में क्या रखा है-

   विश्वविद्यालय का नाम आदरणीय चंदूलाल चंद्राकर के नाम पर रखकर आप उनका सम्मान नहीं कर रहे, बल्कि एक महानायक को विवादों में ही डाल रहे हैं। चंदूलाल जी छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्नदृष्टा हैं। वे पांच बार दुर्ग क्षेत्र से लोकसभा के सांसद, दो बार केंद्रीय मंत्री, कांग्रेस के प्रवक्ता और राष्ट्रीय महासचिव जैसे पदों पर रहे हैं। वे छत्तीसगढ़ के पहले पत्रकार हैं जिन्हें ‘दैनिक हिंदुस्तान’ जैसे राष्ट्रीय अखबार का संपादक होने का अवसर मिला। ऐसे महत्त्वपूर्ण पत्रकार, राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता के नाम पर आप कुछ बड़ा कर सकते थे। एक बड़ी लकीर खींच सकते थे किंतु आपको चंदूलाल जी का सम्मान नहीं, एक अन्य सामाजिक कार्यकर्ता कुशाभाऊ ठाकरे का नाम हटाना ज्यादा प्रिय है। मुझे लगता है इससे आपने अपना कद छोटा ही किया है।

      मृत्यु के बाद कोई भी सामाजिक कार्यकर्ता पूरे समाज का होता है। राजनीतिक आस्थाओं के नाम पर उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। समाज के प्रति उसका प्रदेय सब स्वीकारते और मानते हैं। स्वयं चंदूलाल जी यह पसंद नहीं करते कि उनकी स्मृति में ऐसा काम हो, जिसके लिए किसी का नाम मिटाना पड़े।

     कुशाभाऊ जी एक सात्विक वृत्ति के राजनीतिक नायक थे, जिन्होंने छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की अहर्निश सेवा की। उनका नाम एक विश्वविद्यालय से हटाकर आप उसी अतिवाद को पोषित करेगें, जिसके तहत कुछ लोग जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का नाम बदलने की बात करते हैं। नाम बदलने की प्रतियोगिता हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी। यह देश की संस्कृति नहीं है। हमें यह भी सोचना चाहिए कि सत्ता आजन्म के लिए नहीं होती। काल के प्रवाह में पांच साल कुछ नहीं होते। कल अगर कोई अन्य दल सत्ता में आकर चंदूलाल जी का नाम इस विश्वविद्यालय से फिर हटाए तो क्या होगा ? हम अपने नायकों का सम्मान चाहते हैं या उनके नाम पर राजनीति यह आपको सोचना है। इस बहाने शिक्षा परिसरों को हम अखाड़ा बना ही रहे हैं, जो वस्तुतः अपराध ही है।

      मैं आपको सिर्फ स्मरण दिलाना चाहता हूं कि डा. रमन सिंह की सरकार ने तीन विश्वविद्यालय साथ में खोले थे स्वामी विवेकानंद टेक्नीकल विश्वविद्यालय, पं. सुंदरलाल शर्मा खुला विश्वविद्यालय और कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय। इनमें सुंदरलाल शर्मा आजन्म कांग्रेसी रहे, जिनसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी प्रभावित थे। इससे क्या डा. रमन सिंह का कद घट गया। चंदूलाल चंद्राकर जी के नाम पर जनसंपर्क विभाग के पुरस्कार दिए जाते रहे, पंद्रह साल राज्य में भाजपा की सरकार रही तो क्या भाजपा ने उनके नाम पर दिए जा रहे पुरस्कारों को बदल दिया। नायक मृत्यु के बाद राजनीति का नहीं, समाज का होता है। तत्कालीन रमन सरकार ने इसी भावना को पोषित किया। इसके साथ ही महाकवि गजानन माधव मुक्तिबोध की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए राजनांदगांव में डा. रमन सिंह ने जो कुछ किया, उसकी देश के अनेक साहित्यकारों ने सराहना की। क्या हम अपने नायकों को भी दलगत राजनीतिक का शिकार बन जाने देगें। मुझे लगता है यह उचित नहीं है। कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय में ठाकरे जी की प्रतिमा भी स्थापित है। अनेक वर्षों में सैकड़ों विद्यार्थी यहां से अपनी डिग्री लेकर जा चुके हैं। उनकी डिग्रियों पर उनके विश्वविद्यालय का नाम है। इस नाम से एक भावनात्मक लगाव है। मुझे लगता है कि इतिहास को इस तरह बदलना जरूरी नहीं है। एक नए विश्वविद्यालय के साथ जो अभी ठीक से अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं है, इस तरह के प्रयोग उसे कई नए संकटों में डाल सकते हैं। यह कहा जा रहा है कि कुछ पत्रकारों की मांग पर ऐसा किया गया, आप आदेश करें तो मैं देश भर के तमाम संपादकों के पत्र आपको भिजवा देता हूं जो इस नाम को बदलने का विरोध करेंगे। राजनीति में इस तरह के प्रपंचों को आप बेहतर समझते हैं, इस प्रायोजिकता का कोई मूल्य नहीं है। मूल्य है उन विचारों का जिससे आगे का रास्ता सुंदर और विवादहीन बनाया जा सकता है।

गांधी परिवार पर हमले के लिए अवसर-

    आपके ‘विद्वान सलाहकार’ आपको नहीं बताएंगे क्योंकि उनकी प्रेरणाभूमि भारत नहीं है, नेहरू और गांधी नहीं हैं। प्रतिहिंसा और विवाद पैदा करना उनकी राजनीति है। आज वे कांग्रेस के मंच पर आकर यही सब करना चाहते हैं, जिसके चलते उनकी समूची विचारधारा पुरातात्विक महत्त्व की चीज बन गयी है। वे आपको यह नहीं बताएंगें कि ऐसे कृत्यों से आप गांधी- नेहरू परिवार के अपमान के लिए नई जमीन तैयार कर रहे हैं। देश में अनेक संस्थाएं पं. जवाहरलाल नेहरू,श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री फिरोज गांधी, श्री राजीव गांधी, श्री संजय गांधी के नाम पर हैं। इस बहाने गांधी परिवार के राजनीतिक विरोधियों को इनकी गिनती करने और मृत्यु के बाद इन नायकों पर हमले करने का अवसर मिलता है। मेरा मानना है यह एक ऐसी गली में प्रवेश है, जहां से वापसी नहीं है। अपने राजनीतिक चिंतन का विस्तार करें, इन छोटे सवालों में आप जैसे व्यक्ति का उलझना ठीक नहीं है। छत्तीसगढ़ के अनेक नायकों के लिए आपको कुछ करना चाहिए पं. माधवराव सप्रे,कवि-पत्रकार-राजनेता श्रीकांत वर्मा,सरस्वती के संपादक रहे पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, रंगकर्मी सत्यदेव दुबे जैसे अनेक नायक हैं जिनकी स्मृति का संरक्षण जरूरी है। लेकिन यह काम किसी का नाम पोंछकर न हो।

सेवा के अवसर को यूं न गवाएं-

    महिमामय प्रभु ने बहुत भाग्य से आपको छत्तीसगढ़ महतारी की सेवा का अवसर दिया है। छत्तीसगढ़ को देश का अग्रणी राज्य बनाना और उसके सपनों में रंग भरने की जिम्मेदारी इतिहास ने आपको दी है। इस समूचे भूगोल की सेवा और इसके नागरिकों को न्याय दिलाना आपका कर्तव्य है। इन विवादित कदमों से बड़े लक्ष्यों को हासिल करने में कोई मदद नहीं मिलेगी। छत्तीसगढ़ के स्वभाव को आप मुझसे ज्यादा जानते हैं। यहां ‘अतिवाद की राजनीति’ के लिए कोई जगह नहीं है। राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री श्री अजीत जोगी अपनी तमाम योग्यताओं के बावजूद भी राज्य की जनता वह स्नेह नहीं पा सके, जिसके वे अधिकारी थे। आप सोचिए कि ऐसा क्यों हुआ ? राज्य की जनता ने डा. रमन सिंह को सेवा के लिए तीन कार्यकाल दिए। यह छत्तीसगढ़ है जहां लोग अपने जैसे लोगों को,सरल और सहज स्वभाव को स्वीकारते हैं। यहां नफरतें और कड़वाहटें लंबी नहीं चल सकतीं।

      इस माटी के प्रति मेरा सहज अनुराग मुझे यह कहने के लिए बाध्य कर रहा है कि आप राज्य के स्वभाव के विपरीत न चलें। प्रतिहिंसा, विवाद और वितंडावाद यहां के स्वभाव का हिस्सा नहीं है। अभी तीन दिन पहले बस्तर में सुरक्षाबलों के 17 लोग शहीद हुए हैं। करोना से सारा देश जूझ रहा है। ऐसे समय में बस्तर की शांति, छत्तीसगढ़ के नागरिकों का स्वास्थ्य आपकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। मुझे आपको कर्तव्यबोध कराने का साहस नहीं करना चाहिए किंतु आपके प्रति सद्भाव और मेरे प्रति आपका स्नेह मुझे यह हिम्मत दे रहा है। छत्तीसगढ़ महतारी की मुझ पर अपार कृपा रही है। बिलासपुर में बैठी मां महामाया, बस्तर की मां दंतेश्वरी, डोंगरगढ़ की मां बमलेश्वरी से मैं नवरात्रि के दिनों में यह प्रार्थना करता हूं वे आपको शक्ति, साहस दें कि आप अपना मार्ग प्रशस्त कर सकें। बेहतर होगा कि आप अपने मंत्रिमंडल द्वारा लिए इस फैसले को वापस लेकर सद्भाव की राजनीतिक परंपरा को अक्षुण्ण रखेंगें। भारतीय नववर्ष पर आपको सुखी और सार्थक जीवन के लिए मंगलकामनाएं।

जय जोहार!

 

सादर आपका शुभचिंतक

संजय द्विवेदी,

कार्यकारी संपादकः मीडिया विमर्श, भोपाल

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ऐसे पुलिसवालों के खिलाफ कार्रवाई न हो तो सड़कों पर उतरने के लिए तैयार रहिए मिस्टर मीडिया!

पिछले सप्ताह जब मैंने कोरोना केंद्रित यह स्तंभ लिखा था तो उस समय के कवरेज को देखते हुए कुछ आशंकाएं प्रकट की थीं। इस सप्ताह यह कॉलम लिखते हुए मैं संतोष का अनुभव कर रहा हूं।

Last Modified:
Tuesday, 24 March, 2020
rajeshsircorona

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

पिछले सप्ताह जब मैंने कोरोना केंद्रित यह स्तंभ लिखा था तो उस समय के कवरेज को देखते हुए कुछ आशंकाएं प्रकट की थीं। इस सप्ताह यह कॉलम लिखते हुए मैं संतोष का अनुभव कर रहा हूं। मीडिया के तमाम अवतारों पर जिम्मेदारी भरा और कमोबेश संतुलित कवरेज देखने को मिल रहा है। डराने वाला और अंध विश्वास फैलाने वाला कवरेज एकाध अपवाद छोड़कर नहीं दिखाई दिया। निस्संदेह सारे पत्रकार साथी इसके लिए शाबाशी के पात्र हैं।

अपवाद के तौर पर रविवार की शाम यकीनन परेशान करने वाली थी। प्रधानमंत्री ने अपने अपने घर में रहते हुए ताली-थाली बजाने की अपील की थी। हुआ उल्टा। कुछ अनपढ़ लोग समझ बैठे, मानो उन्होंने कोरोना का अंतिम संस्कार कर दिया है और संसार पर विजय प्राप्त कर ली है। जहां सारे दिन समूह में रहने से बचा गया, एक दूसरे के निकट संपर्क में आने से बचा गया, वहीं दूसरी ओर शाम पांच बजते ही झुंड के झुंड सड़कों पर नजर आने लगे, हर्षातिरेक में चिल्लाने लगे और नारेबाजी करने लगे। जैसे उन्होंने पाकिस्तान को जमींदोज कर दिया है। सारे दिन लॉक डाउन का मतलब धरा रह गया। सैकड़ों की तादाद में सड़कों पर नाचने वाले इन निपट मूर्खों का क्या किया जाए? दुर्भाग्य से अनेक चैनलों ने इन दृश्यों को प्रमुखता से स्थान दिया, मगर उतनी ही प्रमुखता से इन झुंडों की आलोचना नहीं की।  

लेकिन इस हालात में हिन्दुस्तान के सरकारी ऑल इंडिया रेडियो के अनेक केंद्रों का प्रसारण ठप्प हो जाना खतरनाक संकेत है। अगर रेडियो का स्टाफ नहीं पहुंचा और वहां रिकॉर्डेड प्रोग्राम तथा गाने सुनाए जा रहे हैं तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है। मत भूलिए कि आज भी करोड़ों लोग प्रतिदिन घंटों रेडियो सुनते हैं। जंग के दिनों में अथवा आपातकाल में सरकारी प्रसारण केंद्रों को लकवा लग जाना यकीनन तंत्र पर सवाल खड़े करता है। इसी तरह दूरदर्शन के अनेक प्रादेशिक केंद्रों का प्रसारण बाधित रहा। वे या तो रिकॉर्डेड कार्यक्रम दिखा रहे हैं अथवा दूरदर्शन न्यूज या संसद के चैनलों का प्रसारण दिखा रहे हैं। भारत सरकार के लिए यह सोचने का विषय है कि असाधारण परिस्थितियों में उसका अपना प्रसारण तंत्र अपाहिज न बने।

वैसे तो आपात सेवाओं में दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार ने मीडिया कर्मियों को छूट दी है, पर सोमवार को एक टीवी चैनल के वरिष्ठ प्रड्यूसर नवीन कुमार के साथ सफदरजंग एन्क्लेव क्षेत्र की पुलिस ने जो बरताव किया, उसे कतई जिम्मेदाराना नहीं ठहराया जा सकता। परिचय पत्र दिखाने के बावजूद उनका मोबाइल, पर्स और गाड़ी की चाबी छीन ली और गालियां देते हुए देर तक पीटा। आदम युग की यह बर्बरता पुलिस आखिर कब छोड़ेगी? उन्हें सभ्य और शालीन बनाने के लिए क्या किया जाए? माना जा सकता है कि जब अधिकांश सेवाओं के कर्मचारी घरों में बंद रहकर अपनी हिफाजत कर रहे हैं तो उन्हें यह अवसर भी नहीं मिल रहा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हें जल्लादी का लाइसेंस मिल गया है। इस सेवा का चुनाव उन्होंने स्वयं ही किया है। किसी ने बन्दूक की नोक पर उन्हें पुलिस में आने के लिए बाध्य नहीं किया है।  ऐसे अभद्र और गंवार पुलिसवालों के खिलाफ यदि कार्रवाई नहीं हो तो सड़कों पर उतरने के लिए तैयार रहिए मिस्टर मीडिया!

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अनजाने में हम डर और आतंक को भी पत्रकारिता का टूल तो नहीं बनाते जा रहे हैं मिस्टर मीडिया?

दुनिया दहशत में है। कोरोना काल बन गया है। मौत से अधिक मौत का डर है। भय के भूत की तरह। हर बड़े मुद्दे पर गैर जिम्मेदारी दिखाता हिंदी टीवी मीडिया

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 18 March, 2020
Last Modified:
Wednesday, 18 March, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

दुनिया दहशत में है। कोरोना काल बन गया है। मौत से अधिक मौत का डर है। भय के भूत की तरह। हर बड़े मुद्दे पर गैर जिम्मेदारी दिखाता हिंदी टीवी मीडिया। एक-दो चैनल छोड़ दें तो ज्यादातर कोरोना का कवरेज कोड़ा मारने जैसा कर रहे हैं। सूचनाएं इस अंदाज में परोसी जा रही हैं कि दर्शक का ब्लड प्रेशर बढ़ जाए। कमजोर दिल वालों को आघात का खतरा। अगर ऐसा ही कवरेज करना है तो एक सूचना पट्टी भी साथ में प्रदर्शित कर दें कि कमजोर दिल वाले कोरोना की खबरें नहीं देखें। समाचार देते समय बैकग्राउंड संगीत नहीं सुनाया जाता। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह स्थापित पैमाना है, लेकिन कोरोना की खबरें दिखाते समय सस्पेंस,सनसनी,साजिश भरा या भय संगीत क्यों सुनाया जाना चाहिए?

कोरोना की इस भयावह कवरेज में हिंदी चैनल्स की तुलना में अंग्रेजी चैनल्स ने अधिक जिम्मेदारी, संयम, विश्लेषण, गहराई तक जाकर विवेचन और दर्शकों को जागरूक करने का काम किया है। हिंदी चैनल्स पल पल आती जानकारियों को डर का तड़का लगाकर पेश कर रहे हैं तो अंग्रेजी चैनल्स उसी खबर को धैर्यपूर्वक और बचाव के तरीकों के साथ दे रहे हैं। संसार भर से आ रही सूचनाओं की बारीक पड़ताल करने की जरूरत तक नहीं समझी गई। इससे बेहतर तो अनेक भाषाई चैनल्स ने इन समाचारों को अपने दर्शकों के समक्ष रखा। तेलुगू,तमिल,बांग्ला,कन्नड़ और मराठी भाषी चैनल्स ने कोरोना पर बेहतर और लोगों को जागरूक करने वाली सामग्री प्रस्तुत की है।

कुछ चैनलों ने तो इस कठिन दौर को अंधविश्वास फैलाने का जरिया बना लिया है। एक चैनल ने दिखाया कि कोरोना से बचने के लिए गायत्री मंत्र का जाप करें तो दूसरे चैनल ने कहा कि मस्जिदों में मुस्लिमों को सच्चे दिल से नमाज पढ़नी चाहिए। तीसरे चैनल ने एक स्थान पर हो रहे यज्ञ और अनुष्ठान को कोरोना से बचाव का सर्वश्रेष्ठ उपाय साबित कर दिया। एक रीजनल चैनल ने गंडा-ताबीज का प्रमोशन शुरू कर दिया। यह क्या है? हिंदी पट्टी के दर्शकों को इतना अनपढ़ और बेवकूफ समझने की क्या वजह है? किसी जिम्मेदार चैनल संचालक और संपादक के पास कोई उत्तर है कि वे अपने प्रसारण संस्थान से इस तरह की खबरों का उत्पादन क्यों कर रहे हैं?

करीब पैंतालीस साल पहले रूसी उपग्रह स्काईलेब के अंतरिक्ष से टूटकर गिरने की खबरों पर उन दिनों अखबारों ने हौवा खड़ा कर दिया था। कुछ बरस पहले स्वाइन फ्लू का आतंक जैसे कहर बनकर छोटे परदे पर बरपा था। सवाल यह है कि कहीं अनजाने में हम डर और आतंक को भी पत्रकारिता का अनिवार्य टूल तो नहीं बनाते जा रहे हैं? इसे ध्यान में रखना होगा मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: चेतावनी है कि अब मजाक भी बनने लगे हैं एंकर

इस धर्म या कर्तव्य को निभाने से किसने रोका है मिस्टर मीडिया?

भारत के पत्रकार क्या इससे सबक लेंगे मिस्टर मीडिया!

इस मानसिक दिवालिएपन पर क्या कहा जाए, मिस्टर मीडिया!

 

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वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने बताया, कैसे संकट की घड़ी में मीडिया की साख पर उठ रहे सवाल

यह बात उन क्रांतिकारी समझने वाले चर्चित टीवी हस्तियों को भी स्वीकारना चाहिए, जो आजकल स्वयं मीडिया पर भरोसा नहीं करने और उन्हें छोड़कर सबको नाकारा साबित करने में लगे हुए हैं।

Last Modified:
Saturday, 14 March, 2020
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार ।।

कोरोना वायरस हो या साम्प्रदायिक उपद्रव, सत्ता की मारामारी हो या अर्थिक घोटाले. मीडिया की साख पर सवाल उठने लगते हैं। कोरोना के विश्व संकट के दौरान भारतीय मीडिया- प्रिंट, टीवी समाचार चैनल, डिजिटल चैनल ने जितनी जिम्मेदारी के साथ जागरूकता लाने तथा महामारी को फैलने से रोकने में क्या महत्वपूर्ण योगदान नहीं दिया है? कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन अधिकांश भारतीय मीडिया पश्चिम के मीडिया से अधिक सक्रिय और सहायक रहा है।

यह बात उन क्रांतिकारी समझने वाले चर्चित टीवी हस्तियों को भी स्वीकारना चाहिए, जो आजकल स्वयं मीडिया पर भरोसा नहीं करने और उन्हें छोड़कर सबको नाकारा साबित करने में लगे हुए हैं। सत्ताधारी और प्रतिपक्ष के भी कई नेता प्रवक्ता अपनी कमजोरी-बर्बादी के लिए मीडिया पर ही दोष मढ़ते रहे हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि वायरस संकट के दौर में संपन्न पश्चिमी देशों का मीडिया ही नहीं सरकारें अधिक नाकारा तथा विफल सिद्ध हो रही हैं। ताजा प्रमाण गुरुवार को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस साहेब का प्रेस वक्तव्य देख सकते हैं, जिसमें 500 से अधिक लोगों के संक्रमित होने के बावजूद वह यह भी सूचित कर गए कि अभी तो शुरुआत है, असली प्रकोप मई महीने तक दिखेगा, तब हम और कदम उठाएंगे। फिलहाल स्कूल भी बंद नहीं करेंगें, क्योंकि बच्चे खेलेंगे या बुजुर्ग दादा दादी नाना नानी के पास रहकर संक्रमित होंगे या उन्हें करेंगे। बस सावधानी के लिए हाथ बार बार धोते रहिये।

आजकल भारत के सन्दर्भ में राजनीतिक या आर्थिक मामलों पर खबरों तथा टिप्पणियों पर बीबीसी, गार्जियन, न्यूयार्क टाइम्स, एसीएनएन, इकोनॉमिस्ट इत्यादि की बड़ी चर्चा हो रही है। निश्चित रूप से वे अपने नजरिये और देश के हितों के लिए काम करते होंगे। फिर भी हमारे महारथियों को यह भी देखना चाहिए कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री या अमेरिकी राष्ट्रपति अपने ही मीडिया को अविश्वसनीय बताकर सार्वजानिक रूप से कितना अपमानित करते हैं।

आपातकाल में सेंसर के कारण राजनीतिक खबरों के लिए हमारे लोगों को पश्चिम के मीडिया पर मजबूरी में निर्भर होना स्वाभाविक था, लेकिन आज तो अधिकांश भारतीय मीडिया प्रिंट, टीवी समाचार चैनल  दुनिया के किसी भी देश से अधिक स्वतंत्र, निर्भीक और विशाल है। बाकी कसर कई नामी पत्रकारों, सामाजिक संगठनों के वेब पोर्टल, यू-टूयूब चैनल्स से पूरी हो रही है। प्रदेशों के कई भाषाई अखबार या टीवी पत्रकार समाज, समस्याओं, स्वास्थ्य, आर्थिक विषयों पर श्रेष्ठतम सामग्री दे रहे हैं। फिर पश्चिम के मीडिया के मुहं पर मोहित क्यों हो रहे हैं। संभव है राजनेताओं को विदेश में अपनी छवि बनाने या दूसरे कि बिगाड़ने में रूचि रहती हो, लेकिन समझदार विश्लेषकों को असली तथ्यों की जानकारी रहनी चाहिए। उनका ध्यान हाल के वर्षों में अमेरिका और ब्रिटेन के सरकारी गोपनीय दस्तावेज डि क्लासिफाइड होने से यह तथ्य उजागर हो चुका है कि अमेरिकी गुप्तचर संगठन सीआईए और ब्रिटिश जासूसी संस्था एमआई 6 न्यूयॉर्क टाइम्स, गार्जियन, बीबीसी के पत्रकारों, प्रबंधकों, मालिकों का इस्तेमाल करते रहे हैं।

सबसे अधिक चौकाने वाला तथ्य यह भी सामने आया कि कुछ वर्ष पहले बीबीसी में बड़े पैमाने पर भर्ती की जिम्मेदारी ही जासूसी संगठन एमआई 6 के वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी गई थी। अब आप समझ सकते हैं कि क्या उन अधिकारियों ने अपने काम के लिए अनुकूल लोग भी भर्ती नहीं कराए होंगे? इसी तरह जासूसी संगठन से सेवामुक्त होकर पत्रकार बनकर विदेशों में पहुंचने वाले कई जासूसों ने अपने ढंग से रिपोर्टिंग करने के साथ अपनी एजेंसी को भी गोपनीय सूचनाएं भेजने का काम किया है।

सीआईए के ही रिकॉर्ड का दस्तावेज साबित करता है कि संगठन ने 25 वर्षों के दौरान करीब 400 पत्रकारों का उपयोग जासूसी के लिए करवाया। वाटरगेट कांड को उजागर करने वाले एक पत्रकार कार्ल बेरनिस्तन ने स्वयं यह तथ्य लिखा भी था। दूसरी तरफ सीआईए के एक बड़े अधिकारी ने स्वयं वॉशिंगटन पोस्ट के मालिक फिलिप ग्राहम से कहा था कि हमें जासूसी के लिए कॉल गर्ल से कम खर्च पर पत्रकार मिल जाते हैं। सीआईए के दस्तावेज के अनुसार संगठन ने प्रमुख अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसियों को नियमित रूप से फंडिंग कर अपने ढंग से पत्रकारों से सूचनाएं लेने, गलत खबरें फैलाकर गड़बड़ियां कराने में कभी संकोच नहीं किया। यहां तक कि मित्र यूरोपीय देशों में भी राजनीतिक उठापटक में पत्रकारों का उपयोग किया गया। वैसे रूस और चीन के जासूसी संगठन भी पत्रकारों के भेस में जासूस भेजते रहे या स्थानीय लोगों को मोहरा बनाकर उपयोग करते रहे। सत्तर के दशक में भारत के दो बड़े संस्थानों के पत्रकारों के सीआईए एजेंट की तरह काम करने की जानकारी भारतीय गुप्तचर संस्था रॉ को मिली, तब उनसे लाल किले के गुप्त तहखाने में लंबी पूछताछ हुई। एक तो कुछ समय बाद अमेरिकी सम्पर्कों के बल पर भारत से निकलकर वहीँ बस गया और एक स्वयं अधिकाधिक जानकारी देकर अपने राजनीतिक-प्रशासनिक संपर्कों से जेल जाने से बच गया।

इस पृष्टभूमि को देखते हुए जम्मू कश्मीर की स्थिति, अनुच्छेद 370 की समाप्ति के कानून एसीएए या भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था पर पश्चिम के पूर्वाग्रहों वाली सूचनाओं तथा टिप्पणियों को अनावश्यक तरजीह क्यों दी जानी चाहिए?

सवाल यह भी है कि इंदिरा गांधी से लेकर इन्दर गुजराल और मनमोहन सिंह के सत्ता काल में उनके ही दिग्गज नेता विदेशी जासूसी संगठनों के षड्यंत्रों की बात करते थे, लेकिन अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार या रक्षा सौदों पर विदेशी दुष्प्रचार को अपना हथियार बनाने में संकोच नहीं करते। कांग्रेस  के ही नेता जयराम रमेश द्वारा कृष्ण मेनन की जीवनी पर आई नई किताब के तथ्यों के साथ सबसे बुजुर्ग राजनियक पूर्व विदेश सचिव महाराज कृष्ण रसगोत्रा ने हाल में एक कार्यक्रम में माना कि साठ के दशक में भी पश्चिम का मीडिया भारत के विरुद्ध झूठा प्रचार करता था। पत्रकार ही नहीं सेनाधिकारियों से लिखवाकर भारत को नुक्सान पहुंचाने की कोशिशें की गई। इसलिए उदार लोकतंत्र में सूचना-समाचार तंत्र के सारे देसी विदेशी दरवाजे खिड़कियां खुली रखते हुए कम से कम स्वदेशी मीडिया पर अधिक भरोसा कर दुष्प्रचार के वायरस से भी लोगों को बचाना चाहिए।

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मीडिया की नई चुनौतियों से प्रोफेसर केजी सुरेश ने कुछ यूं कराया रूबरू

भारतीय समाचार कक्ष भी धीरे ही सही, लेकिन स्थिरता के साथ विश्व की श्रेष्ठतम तकनीक अपनाने के लिए प्रयासरत हैं।

Last Modified:
Thursday, 12 March, 2020
KG Suresh

के.जी. सुरेश

पूर्व डीजी, आईआईएमसी

इतिहास मुख्य रूप से दो भागों में बंटा है - ईसा पूर्व और ईस्वी (ईसा के जन्म का वर्ष)। इसी तरह पिछले एक दशक में मीडिया में आए क्रांतिकारी बदलावों को देखते हुए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मीडिया के इतिहास को भी दो भागों में बांटा जा सकता है। ये दो वर्ग होंगे - गूगल पूर्व और गूगल के बाद। गूगल के बाद के मीडिया के दौर की देन हैं इंटरनेट और स्मार्ट फोन। प्रौद्योगिकी में आए बदलाव ने मीडिया संस्थानों के समाचार कक्ष का दृश्य भी बदल दिया। खबर बनने की पूरी प्रक्रिया ही बदल गई, जैसे खबर एकत्रित करना, बनाना और साझा करना... सब कुछ! दुनिया भर के न्यूजरूम आज बदलते परिदृश्य के गवाह बन रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और रोबोटिक्स मानवकर्मियों का स्थान ले रहे हैं।

भारतीय समाचार कक्ष भी धीरे ही सही, लेकिन स्थिरता के साथ विश्व की श्रेष्ठतम तकनीक अपनाने के लिए प्रयासरत हैं। थोड़े ही समय में हम सूचना युग से आगे बढ़कर कम समय में अधिक संप्रेषण और बातचीत के दौर तक पहुंच गए। अब वैश्विक मीडिया का फोकस पहुंच पर बहुत अधिक न होकर लोगों को जोड़ने पर है। मीडिया के समक्ष अब चुनौती पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों को आकर्षित करने की नहीं है, बल्कि उन्हें जोड़े रखने की है, क्योंकि लोग एक विषय-वस्तु पर केवल कुछ ही सेकंड का समय देते हैं।

इंटरनेट के बढ़ते उपयोग और ओवर द टॉप' (ओटीटी) प्लेटफॉर्म, जो सेटेलाइट, केबल और ब्रॉडकास्टर से परे इंटरनेट के माध्यम से मिलने वाला मीडिया है, के बढ़ते विकल्पों से भारतीय मीडिया भी तकनीकी प्रेमी हो गया है। मोबाइल जर्नलिज्म, डेटा जर्नलिज्म, एनिमेशन, कॉमिक्स और दृश्य प्रभाव आम माध्यम हो गए हैं। सिटीजन जर्नलिज्म, हैशटेग जर्नलिज्म और संकलित न्यूजरूम मीडिया वर्ग में आम बोलचाल की भाषा के लोकप्रिय शब्द बन चुके हैं। सोशल मीडिया ने मीडिया के माहौल को इतना लोकतांत्रिक बना दिया है, जैसा पहले कभी नहीं था और मीडिया घराने डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर अधिक समय दे रहे हैं। सरकार ने भी डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म क्षेत्र में 20 फीसदी एफडीआई की मंजूरी देते हुए मीडिया के बदलते परिदृश्य का स्वागत किया है। पहले देश में केवल प्रिंट मीडिया में एफडीआई था। फिलहाल, वैश्विक चलन के विपरीत भारत में प्रिंट मीडिया उत्तरोत्तर वृद्धि की राह पर है।

नवसाक्षरों के लिए अखबार सदा ही सशक्तीकरण का प्रतीक रहा है और रहेगा। सम्पादकीय सुदृढ़ता वाले संस्थानों के रहते प्रिंट मीडिया अपनी साख, विश्वसनीयता और प्रामाणिकता के बल पर बिना दिग्भ्रमित और पथपभ्रष्ट हुए लोगों के दिलों पर राज करता रहेगा।

बढ़ती साक्षरता दर और युवाओं द्वारा अपनी भाषाई पहचान को स्वीकार करने के चलते भारतीय भाषाई मीडिया में भी प्रगति स्पष्ट देखी जा सकती है। मीडिया का यह वृहद स्तरीय तकनीकी बदलाव भारत जैसे बहुभाषी, बहुसंस्कृतिवादी, इंद्रधनुषी विविधता वाले देश को कैसे प्रभावित कर रहा है, संपूर्ण जगत इसका साक्षी है। लेकिन एक बात तय है। भले ही कितना भी तकनीकी विकास हो जाए, प्रस्तुत कंटेंट या विषय-वस्तु ही सर्वोपरि रहेगा। अस्तित्व बचाने की इस दौड़ में जीत उसी की होगी, जिसका कंटेंट सर्वश्रेष्ठ होगा।

(साभार: राजस्थान पत्रिका)

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