यूनिवर्सिटी में जब जब नारा लगेगा ‘हम देखेंगे’ न्यूज चैनल से आवाज आएगी ‘कीप वाचिंग’

वैसे तो हिंदुस्तान की परम्परा है कि बच्चे लड़ रहे हों तो बड़े बीच में नही पड़ते

प्रमिला दीक्षित by
Published - Wednesday, 08 January, 2020
Last Modified:
Wednesday, 08 January, 2020
Pramila Dixit


प्रमिला दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार।।

वैसे तो हिंदुस्तान की परम्परा है कि बच्चे लड़ रहे हों तो बड़े बीच में नही पड़ते। बच्चे लड़-भिड़कर एक हो जाते हैं, लेकिन बड़ों के बीच में पड़ने से परिवार का सौहार्द खत्म हो जाता है। लेकिन जब से मोहल्ले में टीआरपी लोभी डायरेक्टरों के शातिर सीरियलों की एंट्री हुई है, परिवार के लोग ही बच्चों को प्यादों की तरह इस्तेमाल करने लगे हैं। उन्हें सिखाते हैं हिंदुस्तान किसी के बाप का नहीं है, लेकिन धीमे से उनके मन में बीज बो जाते हैं कि यूनिवर्सिटी तुम्हारे बाप की ही है। प्रेमचंद के हीरा-मोती को दुलत्ती मारकर फैज के लिए लड़ मरने की प्रेरणा देते हैं। अब नौजवान ‘हम देखेंगे’ कहकर ही पिटे जा रहा है। अबे देखोगे तो तब जब आंख-कान दोनों खुले रखोगे। विडियो में कोई दूसरा ऑडियो भरकर आंखों के सामने ठेल देगा तो देखकर भी का कर लोगे?

वीसीआर में रोज नए कैसेट भरे जा रहे हैं। आप बाएं कान से सुनते हो? लीजिए आप ये विडियो लीजिए। आप राइट मैन हो? तो आपके लिए ये दो विडियो! आज़ादी के बाद से ये क्रांति-व्रांति चतुर आदमी के चोंचले होते हैं। हमाई ना मानो तो अन्ना से पूछ लो। जेएनयू इस वक्त यूनिवर्सिटी नहीं है। किसी का कंधा है, किसी का मौका, किसी की प्रयोगशाला! और यहां आम आदमी इत्ता कन्फ्यूज कि यार असल में मसला क्या है, फीस या सीएए?  क्यूंकि हो सकता है कि दोनों को लेकर लोग आपके पक्ष में ना हों, लेकिन किसी एक पर हो सकते हैं।

बॉलिवुड में कोई खास दिलचस्पी या किसी से दुश्मनी नहीं है, लेकिन बाय गॉड इंडस्ट्री में जिस वक्त जिसका सितारा बुलंद होता है, इतने निहायत प्रोफेशनल होते हैं कि निर्भया जैसे मौके पर भी बोलने से पहले सोचते हैं कि  वक्त, छवि, पैसे का कोई नफा-नुकसान तो नहीं हो रहा? इसलिए जब जेएनयू में छपाक एंट्री होती है तो संशय होता है। इसमें रीढ़ दिखाने जैसा कुछ नहीं है। रीढ़ तब दिखती, जब मुंह से कुछ शब्द फूटते। लेकिन चूंकि वो स्क्रिप्ट में था नहीं और लिखा हुआ पढ़ने के आदी लोग इतने अबोध हैं कि वो जानते ही नहीं वो किसी मसले में कहां खड़े हैं!

कुछ पत्रकार दीपिका के समर्थन में लिख रहे हैं ब्रेव! लगे हाथों अपने प्रोग्राम की टाइमिंग भी बताए दे रहे हैं कि इत्ते बजे हमारा प्रोग्राम भी देख लीजिए, आज ही आएगा, दीपिका की पिक्चर आने में तो अभी टाइम है! वैसे, ‘हम देखेंगे’ का सही मजा तो चैनल वाले ले रहे हैं। जब-जब यूनिवर्सिटी से आवाज आएगी ‘हम देखेंगे’,  चैनल दुहराएंगे ‘कीप वाचिंग’!

बाकी आईआईटी कानपुर अब नज्मों पर शोध करेगा तो जाहिर है पानी से चलने वाली कार अब जावेद अख्तर ही खोजेंगे। और कित्ती आजादी चाहिए बे, इत्ती आजादी लेकर जाओगे कहां?

(ये लेखिका के निजी विचार हैं।)

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AAAI की कमान संभालने के बाद डॉ. संदीप गोयल के सामने उम्मीदों और बदलाव की बड़ी चुनौती

विज्ञापन उद्योग इस समय पिछले कई दशकों के सबसे बड़े बदलावों में से एक का सामना कर रहा है। यदि कोई व्यक्ति AAAI में बदलाव ला सकता है और अग्रिम पंक्ति से नेतृत्व कर सकता है, तो वह संदीप गोयल हैं।

Samachar4media Bureau by
Published - Thursday, 01 October, 2026
Last Modified:
Thursday, 01 October, 2026
Dr Sandeep Goyal aaai

डॉ. अनुराग बत्रा।।

एडवरटाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAAI) को नया अध्यक्ष मिल गया है। लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड को लेकर हुई चर्चाओं और विवादों के बाद अब संगठन की कमान डॉ. संदीप गोयल के हाथों में है। हालांकि उनकी नियुक्ति का सबसे दिलचस्प पहलू केवल यह नहीं है कि अध्यक्ष कौन बना है, बल्कि यह भी है कि उन्होंने ऐसे समय में जिम्मेदारी संभाली है जब एडवरटाइजिंग इंडस्ट्री बड़े बदलावों के दौर से गुजर रही है।

डॉ. संदीप गोयल को विज्ञापन जगत का ऐसा प्रोफेशनल माना जाता है, जो विज्ञापन, उद्यमिता, प्रौद्योगिकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की गहरी समझ रखते हैं। विभिन्न उद्योगों, विचारों और लोगों से उनके व्यापक संबंध हैं। साथ ही नीतिनिर्माताओं और सरकार से उनकी मजबूत पहुंच भी उनकी बड़ी ताकत मानी जाती है। उन्हें रचनात्मक और उद्यमशील सोच वाले लीडर के रूप में देखा जाता है।

अपनी नई भूमिका में गोयल यदि रचनात्मक और व्यवसायिक दोनों पक्षों से युवा नेतृत्व को आगे लाने का प्रयास करते हैं तो यह इंडस्ट्री के लिए महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति AAAI में बदलाव ला सकता है और अग्रिम पंक्ति से नेतृत्व कर सकता है, तो वह संदीप गोयल हैं।

विज्ञापन उद्योग इस समय पिछले कई दशकों के सबसे बड़े बदलावों में से एक का सामना कर रहा है। AI विचारों के निर्माण, कंटेंट प्रोडक्शन और कैंपेन प्लानिंग के तरीकों को बदल रहा है। उपभोक्ताओं का ध्यान कई प्लेटफॉर्म्स में बंट चुका है। मीडिया लगातार अधिक जटिल होता जा रहा है। इंडस्ट्री में आने वाले युवा पेशेवर करियर को पहले से अलग नजरिए से देख रहे हैं और एजेंसियां भी यह समझने की कोशिश कर रही हैं कि उनके विकास का अगला चरण कहां से आएगा।

ऐसे में संदीप गोयल को ऐसा उद्योग नहीं मिला है जो सामान्य ढंग से आगे बढ़ रहा हो, बल्कि उन्हें ऐसा उद्योग मिला है जो दिशा की तलाश में है। उनकी पहली चुनौती उम्मीदों को संभालना होगी।

AAAI से बाहर रहते हुए गोयल अक्सर उद्योग से जुड़े मुद्दों पर खुलकर बोलते रहे हैं। वह सवाल उठाते थे, नई सोच पेश करते थे और बदलाव के सुझाव देते थे। अब स्थिति अलग है। अब वह बाहर से टिप्पणी करने वाले व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि संगठन के मुखिया हैं। ऐसे में उद्योग उनसे उनके विचारों को कार्रवाई में बदलने की उम्मीद करेगा।

हालांकि यह काम 12 महीनों में पूरा नहीं हो सकता। किसी भी उद्योग संगठन की सबसे बड़ी गलतियों में से एक यह होती है कि वह नए नेतृत्व का मूल्यांकन केवल एक साल की उपलब्धियों के आधार पर करने लगे। संरचनात्मक बदलावों में समय लगता है। इसलिए गोयल और उनकी टीम को अपनी योजनाओं को लागू करने, सहमति बनाने और परिणाम दिखाने के लिए कम से कम दो साल का समय मिलना चाहिए। संगठन को निरंतरता की जरूरत है, न कि ऐसी व्यवस्था की जिसमें हर नई टीम पुराने विचारों को अधूरा छोड़कर नए सिरे से शुरुआत कर दे।

गोयल की सबसे पहली प्राथमिकता तकनीक और AI होगी। AI अब ऐसा विषय नहीं है जिस पर केवल चर्चा की जाए। यह पहले ही क्रिएटिव प्रोसेस, प्रोडक्शन, मीडिया प्लानिंग, रिसर्च और क्लाइंट की अपेक्षाओं को प्रभावित कर रहा है। अब सवाल यह नहीं है कि AI विज्ञापन उद्योग को प्रभावित करेगा या नहीं, बल्कि यह है कि एजेंसियां इसका उपयोग किस प्रकार करें ताकि मानवीय सोच और रचनात्मकता की मूल भावना बरकरार रहे।

इसी संदर्भ में AAAI महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। संगठन केवल AI पर चर्चा करने तक सीमित रहने के बजाय ऐसे व्यावहारिक प्रशिक्षण और सीखने के मंच तैयार कर सकता है, जहां इंडस्ट्री के विभिन्न क्षेत्रों के लोग समझ सकें कि AI उनके काम को किस प्रकार प्रभावित करेगा। क्रिएटिव पेशेवरों, मीडिया प्लानर्स, अकाउंट मैनेजमेंट टीम और प्रोडक्शन से जुड़े लोगों की जरूरतें अलग-अलग हैं। वहीं छोटी एजेंसियों की चुनौतियां बड़ी नेटवर्क एजेंसियों से भिन्न हो सकती हैं।

दूसरी बड़ी चुनौती टैलेंट को लेकर है। विज्ञापन उद्योग हमेशा युवाओं को आकर्षित करता रहा है, क्योंकि यहां विचारों, उत्साह और प्रयोग की संस्कृति रही है। लेकिन आज की युवा पीढ़ी के सामने करियर के कई नए विकल्प मौजूद हैं। टेक्नोलॉजी कंपनियां, स्टार्टअप, कंटेंट बिजनेस, कंसल्टिंग फर्म और डिजिटल प्लेटफॉर्म भी उसी प्रतिभा को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं।

ऐसे में AAAI को उद्योग को अगली पीढ़ी के लिए अधिक आकर्षक बनाना होगा। इसका मतलब केवल युवाओं को सेमिनारों में बुलाना नहीं है, बल्कि उन्हें संगठन का सक्रिय हिस्सा बनाना है। यदि जेन-जी इंडस्ट्री की सबसे महत्वपूर्ण ताकतों में से एक है तो AAAI में भी ऐसे लोगों की मौजूदगी बढ़नी चाहिए जो उनकी सोच, संवाद शैली और सूचना उपभोग की आदतों को समझते हों। इंडस्ट्री को पीढ़ियों के बीच एक मजबूत पुल की जरूरत है। अनुभव महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल अनुभव ही भविष्य तय नहीं कर सकता।

ज्ञान और वैश्विक दृष्टिकोण भी काफी महत्वपूर्ण है। भारतीय विज्ञापन उद्योग वर्षों से अपनी रचनात्मक क्षमता का प्रदर्शन वैश्विक मंचों पर करता रहा है, लेकिन केवल पुरस्कारों के सहारे अंतरराष्ट्रीय पहचान को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इंडस्ट्री को नए बिजनेस मॉडल, तकनीक, उपभोक्ता व्यवहार और उभरते संचार तरीकों से लगातार जुड़ना होगा।

इसलिए AAAI वैश्विक पेशेवरों, शिक्षाविदों, मार्केटर्स और तकनीकी विशेषज्ञों को जोड़ने वाले अधिक ज्ञान-आधारित मंच विकसित कर सकता है। इसका उद्देश्य केवल एक और अवॉर्ड समारोह या ऐसा उद्योग आयोजन नहीं होना चाहिए, जहां लोग उन्हीं लोगों से मिलें जिन्हें वे पहले से जानते हैं। उद्देश्य भारतीय विज्ञापन उद्योग तक नई सोच और नए विचार पहुंचाना होना चाहिए।

गोवाफेस्ट (Goafest) निश्चित रूप से AAAI की एक महत्वपूर्ण संपत्ति बना रहेगा, लेकिन संगठन को गोवाफेस्ट से आगे भी सोचना होगा। कोई भी उद्योग संगठन साल में केवल कुछ दिनों के लिए प्रासंगिक नहीं रह सकता। उसे पूरे वर्ष उद्योग के लिए उपयोगी बने रहना होगा।

विज्ञापन उद्योग का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। अब एजेंसियां अकेले काम नहीं करतीं। वे मीडिया कंपनियों, टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म्स, प्रोडक्शन हाउस, इन्फ्लुएंसर्स, कंटेंट क्रिएटर्स, डेटा कंपनियों और व्यापक मार्केटिंग इकोसिस्टम के साथ मिलकर काम करती हैं। ऐसे में AAAI के पास पूरे उद्योग की मजबूत आवाज बनने का अवसर है।

विज्ञापन उद्योग के पास रचनात्मक और संवाद की अपार शक्ति है। यदि इस शक्ति का उपयोग सामाजिक मुद्दों के लिए किया जाए तो यह पेशे को केवल उत्पाद और सेवाएं बेचने तक सीमित नहीं रखेगा, बल्कि उसे एक व्यापक उद्देश्य भी देगा।

गोयल की सबसे बड़ी चुनौती इंडस्ट्री के भीतर अपेक्षाओं और विभिन्न हितों के बीच संतुलन बनाना होगी। AAAI में अलग-अलग आकार की एजेंसियां, अलग-अलग बिजनेस मॉडल और अलग-अलग प्राथमिकताओं वाले सदस्य शामिल हैं। जो मुद्दे किसी बड़ी बहुराष्ट्रीय एजेंसी के लिए महत्वपूर्ण हैं, वे जरूरी नहीं कि किसी छोटी स्वतंत्र एजेंसी के लिए भी उतने ही महत्वपूर्ण हों। डिजिटल-फर्स्ट एजेंसियों की चिंताएं पारंपरिक एजेंसियों से अलग हो सकती हैं। मुंबई और दिल्ली की उद्योगगत परिस्थितियां बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद या अन्य बाजारों से भिन्न हो सकती हैं।

इसलिए AAAI अध्यक्ष को केवल बदलाव लाने वाला नेता ही नहीं, बल्कि सहमति बनाने वाला नेतृत्वकर्ता भी बनना होगा। हालांकि, गोयल को बहुत कम समय में बहुत अधिक करने के प्रलोभन से बचना चाहिए। सही ढंग से लागू किया गया पांच सूत्रीय एजेंडा, उन 20 घोषणाओं से कहीं अधिक प्रभावी होगा जो केवल कॉन्फ्रेंस रूम तक सीमित रह जाएं।

विज्ञापन इंडस्ट्री को बदलाव पर चर्चा का एक और वर्ष नहीं चाहिए। उसे बदलाव के स्पष्ट परिणाम चाहिए। इंडस्ट्री को बेहतर कौशल, मजबूत वैश्विक एक्सपोजर, युवा नेतृत्व, AI की बेहतर समझ और पारंपरिक विज्ञापन से आगे बढ़कर नए अवसरों की जरूरत है। साथ ही उसे ऐसे संगठन की आवश्यकता है जो केवल स्थापित नेतृत्व के लिए नहीं, बल्कि उन पेशेवरों के लिए भी प्रासंगिक हो जो आने वाले दस वर्षों में उद्योग का भविष्य तय करेंगे।

डॉ. संदीप गोयल ने बाहर रहकर पर्याप्त समय तक सवाल उठाए हैं। अब उनके पास उन सवालों के जवाब खोजने का मंच है। अतीत के विवादों और चर्चाओं को पीछे छोड़ते हुए नए अध्यक्ष को केवल एक साल नहीं, बल्कि उससे आगे की सोच के साथ काम करने का अवसर मिलना चाहिए।

अब कमान पूरी तरह उनके हाथों में है। इंडस्ट्री केवल यह नहीं देखेगी कि वह कितनी तेजी से आगे बढ़ते हैं, बल्कि यह भी देखेगी कि वह AAAI को किस दिशा में लेकर जाते हैं।

(डॉ. अनुराग बत्रा BW Businessworld के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ और एक्सचेंज4मीडिया के फाउंडर हैं।)

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‘क्लाइंट सर्विसिंग’ से आगे बढ़कर ‘ब्रैंड सर्विसिंग’ पर ध्यान देने का समय

‘क्लाइंट सर्विसिंग’ शब्द विज्ञापन एजेंसियों की भाषा का हिस्सा लंबे समय से रहा है। लेकिन अब शायद यह सोचने का समय है कि आखिर इन शब्दों का मतलब हमारे काम में क्या रह गया है।

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Published - Wednesday, 30 September, 2026
Last Modified:
Wednesday, 30 September, 2026
ParamjeetSodhi

प्रेमजीत सोढ़ी, ग्लोबल एनालिटिक्स लीड, WPP मीडिया ।।

‘क्लाइंट सर्विसिंग’ शब्द विज्ञापन एजेंसियों की भाषा का हिस्सा लंबे समय से रहा है। लेकिन अब शायद यह सोचने का समय है कि आखिर इन शब्दों का मतलब हमारे काम में क्या रह गया है।

साफ कर दूं, मैं यहां क्लाइंट सर्विसिंग के काम की बात नहीं कर रहा हूं। बात उस सोच की है जो पूरी एजेंसी में फैल सकती है कि हमारा काम क्लाइंट को खुश रखना है। जबकि मेरा मानना है कि हमारा असली काम ब्रैंड की सेवा करना है।

एजेंसी और क्लाइंट के बीच का रिश्ता इसे आसान नहीं बनाता। हर कुछ साल में पिच की संभावना पूरे रिश्ते पर दबाव बनाए रखती है। मैंने कई बार यह बात सुनी है कि ‘आपका मूल्यांकन आपके पिछले कैंपेन से होता है।’ जब बिजनेस बचाए रखने का मतलब क्लाइंट को खुश रखने से जुड़ जाता है, तो असहमति जताना या क्लाइंट की सोच को चुनौती देना जोखिम भरा लगने लगता है।

यहां क्लाइंट की नीयत पर सवाल नहीं है। ज्यादातर क्लाइंट अपने ब्रैंड के लिए सही काम करना चाहते हैं। लेकिन वे अपने ब्रैंड को कंपनी के अंदर से देखते हैं। वहीं एजेंसी की सबसे बड़ी ताकतों में से एक बाहर से देखने का नजरिया है। कई बार यह नजरिया किसी अलग दिशा की ओर इशारा कर सकता है। जब क्लाइंट को खुश रखने की सोच हावी हो जाती है, तो सबसे पहले यही नजरिया खो जाता है।

क्लाइंट को वेंडर चाहिए या पार्टनर?

क्लाइंट को भी इस बारे में खुद से सवाल करना चाहिए कि उसे एजेंसी से पार्टनर चाहिए या वेंडर? वेंडर वही देता है जो उससे कहा जाता है। लेकिन एक पार्टनर को जरूरत पड़ने पर यह कहने के लिए भी तैयार रहना चाहिए कि उसके हिसाब से क्लाइंट गलत चीज मांग रहा है।

आप एजेंसी से रणनीतिक पार्टनर बनने की उम्मीद नहीं कर सकते और जब भी वह आपकी सोच पर सवाल उठाए, तो उसे इसकी कीमत चुकानी पड़े। एक बेहतरीन कैंपेन तक पहुंचने का रास्ता कई बार असहज बातचीत से होकर गुजरता है।

यहां एक अजीब विरोधाभास है। क्लाइंट किसी वेंडर को रखकर उससे पार्टनर जैसी भूमिका की उम्मीद नहीं कर सकता। वहीं एजेंसी भी पार्टनरशिप का वादा करके सिर्फ सर्विस डेस्क की तरह काम नहीं कर सकती।

शायद क्लाइंट को वही एजेंसी मिलती है जैसा रिश्ता वह स्वीकार करता है। लेकिन एजेंसी को भी वही क्लाइंट रिलेशनशिप मिलते हैं जिन्हें वह स्वीकार करने के लिए तैयार होती है। अब इस संतुलन को बनाना और मुश्किल होने वाला है, क्योंकि क्लाइंट को खुश रखने का दबाव लगातार बढ़ रहा है।

क्लाइंट को खुश रखने का दबाव क्यों बढ़ रहा है?

क्लाइंट अब कई क्षमताएं अपने पास ही विकसित कर रहे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म सीधे विज्ञापनदाताओं के साथ रिश्ते बना रहे हैं। कई विशेषज्ञ कंपनियां एजेंसी के पारंपरिक काम के कुछ हिस्से अपने हाथ में ले रही हैं। वहीं एआई ने एजेंसियों के कई कामों को तेज, सस्ता और एजेंसी के बाहर भी आसानी से उपलब्ध बना दिया है। इनमें से हर बदलाव अपने आप में संभाला जा सकता है। लेकिन जब ये सभी बदलाव एक साथ आते हैं, तो वे यह बदल रहे हैं कि आखिर एक एजेंसी की जरूरत क्यों है।

ये बदलाव पारंपरिक एजेंसी मॉडल के लिए बड़े दबाव पैदा कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि इससे क्लाइंट को खुश रखने की सोच और मजबूत हो सकती है। जब आमदनी पर दबाव हो और काम का कुछ हिस्सा कहीं और जा सकता हो, तब क्लाइंट के सामने असहज सवाल उठाना और भी मुश्किल हो जाता है।

लेकिन इससे एक खतरनाक चक्र बन सकता है। एजेंसी जितना असुरक्षित महसूस करती है, उतना ही ज्यादा वह हर बात मानने लगती है। जितना ज्यादा वह हर बात मानती है, उतनी ही कम रणनीतिक वैल्यू देती है। और जितनी कम रणनीतिक वैल्यू होती है, उसे बदलना उतना ही आसान हो जाता है। इसलिए छोटी अवधि में सबसे सुरक्षित व्यवहार दिखने वाली चीज लंबे समय में सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती है। तो एजेंसी इस चक्र से कैसे बाहर निकले? क्लाइंट की सोच को चुनौती देने का अधिकार कमाकर। 

चुनौती देने का अधिकार कमाना जरूरी है

इसका मतलब यह नहीं है कि एजेंसी हर बात पर सिर्फ असहमति जताए। एजेंसी की राय अपने आप क्लाइंट की राय से बेहतर नहीं हो जाती। क्लाइंट अपने कारोबार को अच्छी तरह समझता है। प्लेटफॉर्म अपने इकोसिस्टम की गहरी जानकारी रखते हैं। वहीं एजेंसी अलग-अलग ब्रैंड, बाजार और प्लेटफॉर्म को बाहर से देखने का अनुभव लेकर आती है। हर पक्ष किसी समस्या को अलग नजरिए से देखता है।

अगर क्लाइंट कुछ और सोचता है, प्लेटफॉर्म कुछ अलग सलाह देता है और एजेंसी तीसरा रास्ता सुझाती है, तो यह सिर्फ राय की लड़ाई नहीं बननी चाहिए। इसका फैसला आंकड़ों और सबूतों से होना चाहिए। रणनीति बनाते समय ही उसकी सफलता को मापने का तरीका तय होना चाहिए, ताकि जब तीनों पक्षों की राय अलग हो तो यह देखा जा सके कि आंकड़े किस राय का समर्थन करते हैं। लेकिन सबूत जुटाना सस्ता नहीं है। डेटा, टेक्नोलॉजी, एनालिटिक्स और विशेषज्ञ लोगों पर पैसा खर्च होता है। क्लाइंट एजेंसी की कमाई पर लगातार दबाव डालकर उससे इन क्षमताओं में ज्यादा निवेश की उम्मीद नहीं कर सकते।

दूसरी तरफ एजेंसियां भी इससे बच नहीं सकतीं। अगर भविष्य में उनकी असली वैल्यू रणनीति और मापने की क्षमता में है, तो उन्हें अपने संसाधन भी वहीं लगाने होंगे। यानी चुनौती को विश्वसनीय बनाने के लिए दोनों पक्षों को निवेश करना होगा।

असल काम में यह कैसे दिखेगा?

इन बातों का कोई मतलब नहीं है अगर इससे मीटिंग में होने वाली बातचीत नहीं बदलती। असली लक्ष्य ब्रैंड की ग्रोथ है और इसलिए ध्यान नतीजों पर होना चाहिए। हर सिफारिश को इस कसौटी पर परखा जाना चाहिए कि उसका नतीजों पर क्या असर पड़ेगा। यह सिर्फ राय के आधार पर नहीं, बल्कि आंकड़ों के आधार पर होना चाहिए।

और यह काम सिर्फ ब्रीफ मिलने के बाद शुरू नहीं होना चाहिए। ब्रैंड की चुनौतियों, अलग-अलग बाजारों की रणनीति और ऑडियंस को लेकर एजेंसी के पास लगातार अपनी स्पष्ट सोच होनी चाहिए और यह सोच मापने योग्य आंकड़ों पर आधारित होनी चाहिए। ऐसी बातचीत, जो सबूतों के आधार पर हो और ब्रैंड के मेट्रिक्स को बेहतर बनाने पर केंद्रित हो, ज्यादा उपयोगी होती है। इसका मतलब यह नहीं है कि बहस या असहज बातचीत खत्म हो जाएगी। फर्क सिर्फ इतना है कि बातचीत व्यक्तिगत होने के बजाय काम और नतीजों पर केंद्रित होगी।

क्लाइंट सर्विसिंग से ब्रैंड सर्विसिंग तक

एजेंसी का काम कोई तैयार सामान नहीं है जिसे शेल्फ से उठाकर क्लाइंट को दे दिया जाए। यह काम क्लाइंट और एजेंसी मिलकर तैयार करते हैं। क्लाइंट को एजेंसी को अपनी सोच को चुनौती देने की जगह देनी होगी और एजेंसी को उस चुनौती का अधिकार अपनी क्षमता और सबूतों के आधार पर हासिल करना होगा।

बातचीत की गुणवत्ता मायने रखती है और इसे संयोग पर छोड़ने के बजाय इसके लिए सही माहौल बनाना जरूरी है। इसलिए शायद दोनों पक्षों को खुद से एक असहज सवाल पूछना चाहिए। क्लाइंट: क्या आप सच में ऐसा रणनीतिक पार्टनर चाहते हैं जो जरूरत पड़ने पर आपसे असहमत भी हो? एजेंसी: क्या आप ब्रैंड के लिए सही समझी जाने वाली बात कहने के लिए असहज बातचीत का जोखिम उठाने को तैयार हैं? अगर उद्देश्य सिर्फ क्लाइंट को खुश रखना है, तो सबसे सुरक्षित जवाब हमेशा ‘हां’ होगा। लेकिन अगर उद्देश्य ब्रैंड की सेवा करना है, तो कई बार एजेंसी को ‘नहीं’ कहने के लिए भी तैयार रहना होगा। जो एजेंसियां इस ‘नहीं’ को सिर्फ कभी-कभार की हिम्मत के बजाय ठोस डेटा, रणनीति और मापने की व्यवस्था के आधार पर विश्वसनीय बना पाती हैं, वे उस समय भी जरूरी बनी रहेंगी जब क्लाइंट को खुश रखने का दबाव सबसे ज्यादा होगा।

(प्रेमजीत सोढ़ी न्यूयॉर्क में डब्ल्यूपीपी मीडिया में ग्लोबल एनालिटिक्स लीड हैं। वे ऐसे मापन सिस्टम तैयार करते हैं जो मीडिया को बिजनेस नतीजों से जोड़ते हैं। यह लेख इस विषय पर उनके व्यक्तिगत विचारों को दर्शाता है।)

 

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World News Day: पत्रकारिता में नाम कमाने से पहले भरोसा कमाइए

लगभग तीन दशक बाद भी जब मैं पत्रकारिता को देखता हूं, तो मुझे लगता है कि माध्यम बदल गए हैं, स्क्रीन बदल गई हैं, खबर की गति बदल गई है, लेकिन एक चीज आज भी नहीं बदली है—वह है विश्वसनीयता।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 28 September, 2026
Last Modified:
Monday, 28 September, 2026
Shamsher Singh World News Day

शमशेर सिंह, मैनेजिंग एडिटर (टाइम्स नेटवर्क)।।

मीडिया में कई साल बिताने के बाद आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं, तो लगता है कि मैंने खबरों से ज्यादा लोगों को पढ़ना और परिस्थितियों को समझना सीखा है। मैंने ऐसे दौर भी देखे हैं, जब खबर के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता था और आज का दौर भी देख रहा हूं, जब खबर सेकेंडों में हमारे हाथ में होती है।

लेकिन इन दोनों दौरों के बीच एक चीज बिल्कुल नहीं बदली। अच्छी पत्रकारिता के लिए आंख, कान और विवेक होना चाहिए। सनसनी नहीं सच्चाई, वायरल नहीं विश्वसनीयता, शोर नहीं सवाल, दावे नहीं दस्तावेज, रफ्तार नहीं पड़ताल, सबसे पहले नहीं, सबसे ज्यादा सही—World News Day पर यही हमारा मूल मंत्र होना चाहिए। हमारा लक्ष्य सिर्फ खबर देना नहीं, भरोसा कायम करना है।

क्योंकि आने वाले दिनों में पत्रकारिता शायद सिर्फ यह बताने वाली नहीं होगी कि क्या हुआ। वह ऐसी होगी—“मैंने इसे अपनी आंखों से देखा है, मैंने इसकी पड़ताल की है, हर पहलू को समझा है, सवाल पूछे हैं, तथ्यों को जांचा है और अब मैं आपको बता रहा हूं कि सच क्या है।” और आज की तारीख में एक पत्रकार के लिए शायद इससे ज्यादा ताकतवर वाक्य कोई और नहीं हो सकता। क्योंकि आज खबर से ज्यादा जरूरी हो गया है भरोसा।

भले ही सोशल मीडिया, मोबाइल और AI ने पत्रकारिता की तकनीक बदल दी है और खबर की रफ्तार कई गुना बढ़ी है, लेकिन पत्रकारिता की मूल जिम्मेदारी आज भी वही है—सच को तलाशना, उसे परखना और भरोसे के साथ लोगों तक पहुंचाना।

World News Day हमें इसी बुनियादी सवाल की ओर लौटाता है। आज जब हर तरफ सूचनाओं की बाढ़ है और रफ्तार बहुत तेज है, ऐसे में भरोसेमंद खबर की पहचान क्या है? याद रहे, पत्रकारिता का काम सिर्फ सबसे पहले खबर बताना नहीं है, बल्कि 5W को फॉलो करना है। साथ ही यह देखना भी जरूरी है कि इसके पीछे क्या सबूत है? दूसरा पक्ष क्या कहता है? और सबसे महत्वपूर्ण, इस पूरी कहानी का वह हिस्सा क्या है, जो अभी सामने नहीं आया है?

मेरे ऐसे न जाने कितने अनुभव होंगे, जब कोई वीडियो या तस्वीर पूरी कहानी नहीं होती। वायरल वीडियो घटना के सिर्फ कुछ सेकेंड दिखाता है। एक बयान पूरी जानकारी नहीं होता। प्रेस रिलीज सभी सवालों के जवाब नहीं देती। और यहीं से हमारी भूमिका शुरू होती है। घटनास्थल तक जाना, लोगों से मिलना, तथ्य जुटाना और उनकी पड़ताल करना—यही खबर और पत्रकारिता के बीच का अंतर है।

सही मायने में कहें तो अब यह पहले से ज्यादा कठिन हो गया है। क्योंकि अब सिर्फ फेक न्यूज की चुनौती नहीं है। हमारे सामने half-truth, manipulated videos, पुराने वीडियो को नए संदर्भ में पेश करना, AI-generated images और बिना सत्यापन के वायरल दावों जैसी कई चुनौतियां हैं। AI कुछ सेकेंड में तस्वीर बना सकता है, वीडियो तैयार कर सकता है, आवाज बदल सकता है और पूरी कहानी लिख सकता है।

World News Day पर हमें खुद से भी एक सवाल पूछना चाहिए कि क्या हम अपनी खबरों की पूरी पड़ताल कर रहे हैं? साथ ही दर्शकों से भी सवाल है कि क्या हम हर वायरल पोस्ट को खबर मानने से पहले उसका स्रोत देखते हैं?

लगभग तीन दशक बाद भी जब मैं पत्रकारिता को देखता हूं, तो मुझे लगता है कि माध्यम बदल गए हैं, स्क्रीन बदल गई हैं, खबर की गति बदल गई है, लेकिन एक चीज आज भी नहीं बदली है—वह है विश्वसनीयता। World News Day पर सबसे बड़ा संदेश शायद यही है—Be first if you can, But be right when it matters. क्योंकि पत्रकार की सबसे बड़ी पूंजी उसकी कोई बड़ी खबर नहीं होती। उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है—दर्शक और पाठक का भरोसा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं) 

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लोकतंत्र केवल वोट देकर ही नहीं बचता, गलत खबरें फॉरवर्ड न करके भी इसे बचाया जा सकता है

World News Day पर शायद यही याद रखना सबसे जरूरी है कि तकनीक और माध्यम बदल सकते हैं, लेकिन पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी आज भी भरोसा है।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 28 September, 2026
Last Modified:
Monday, 28 September, 2026
Sumit Awasthi

सुमित अवस्थी, सीनियर कंसल्टिंग एडिटर, टाइम्स नाउ नवभारत।।

World News Day हमें याद दिलाता है कि खबर सिर्फ सूचना नहीं होती, वह समाज को देखने और समझने का एक माध्यम भी है। लेकिन जिस दौर में हर पल हमारे मोबाइल पर सैकड़ों खबरें दस्तक दे रही हों, वहां असली चुनौती खबरों की कमी नहीं, बल्कि भरोसेमंद खबर की पहचान है। तकनीक ने सूचना को हमारी उंगलियों तक पहुंचा दिया है, लेकिन सही और गलत के बीच फर्क करने की जिम्मेदारी अब पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

एक समय था जब सुबह का अखबार खबरों का सबसे बड़ा माध्यम हुआ करता था। फिर रेडियो, टेलीविजन और 24 घंटे के समाचार चैनलों का दौर आया। अब खबर हमारे मोबाइल की स्क्रीन पर हर पल मौजूद है। इस बदलाव ने आज के युवा को सिर्फ खबरों का दर्शक नहीं, बल्कि उनका सक्रिय हिस्सा बना दिया है। वह खबर देखता है, प्रतिक्रिया देता है, उसे साझा करता है और कई बार खुद खबर का हिस्सा भी बन जाता है।

किसी छोटे शहर की समस्या का वीडियो सोशल मीडिया के जरिए देशभर में पहुंच सकता है। किसी छात्र या आम नागरिक की आवाज लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। इसने लोकतंत्र में भागीदारी के नए रास्ते खोले हैं। लेकिन पहुंच और विश्वसनीयता एक ही चीज नहीं हैं।

लाखों व्यूज किसी खबर की सच्चाई का प्रमाण नहीं हैं। कई बार पूरी तरह झूठ से ज्यादा खतरनाक आधा सच होता है – पुराने वीडियो को नए संदर्भ में दिखाना, किसी बयान का सिर्फ एक हिस्सा सामने रखना या सही तस्वीर के साथ गलत जानकारी जोड़ देना। इसलिए खबर को सिर्फ देखना नहीं, उसके स्रोत और संदर्भ को समझना भी जरूरी है।

इस बदलती दुनिया में महिलाओं की आवाज़ को भी बराबर महत्व देना होगा। डिजिटल माध्यमों ने महिलाओं को अपने अनुभव साझा करने, सवाल उठाने और सार्वजनिक बहस में अपनी जगह बनाने का अवसर दिया है। लेकिन ट्रोलिंग, ऑनलाइन उत्पीड़न, चरित्र पर सवाल और victim blaming जैसी चुनौतियां आज भी मौजूद हैं। महिलाओं को सिर्फ बोलने का मंच देना पर्याप्त नहीं; ऐसा वातावरण भी जरूरी है जहां उनकी बात बिना पूर्वाग्रह के सुनी और गंभीरता से ली जाए।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने सूचना की इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। तस्वीर, आवाज और वीडियो को इस तरह बदला जा सकता है कि वास्तविक और कृत्रिम के बीच अंतर करना कठिन हो जाए। इसलिए युवाओं के लिए तकनीक को समझना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उसके सामने सवाल खड़े करना भी है। AI उपयोगी सहायक हो सकता है, लेकिन उसकी हर जानकारी को अंतिम सत्य मान लेना उचित नहीं।

यह जिम्मेदारी केवल नागरिकों की नहीं है। मीडिया को भी अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी होगी। पत्रकारिता का काम किसी सत्ता या राजनीतिक पक्ष का प्रवक्ता बनना नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच करना, जरूरी सवाल पूछना और नागरिकों को अपनी राय बनाने के लिए पर्याप्त जानकारी देना है। खबर और राय के बीच अंतर बनाए रखना भी इसी जिम्मेदारी का हिस्सा है।

लोकतंत्र केवल संसद या चुनाव के दिन नहीं बचता। वह हमारी रोजमर्रा की सूचना की आदतों में भी दिखाई देता है – किसी खबर को आगे भेजने से पहले रुकना, स्रोत देखना, दूसरा पक्ष सुनना और नए तथ्य सामने आने पर अपनी राय बदलने का साहस रखना।

आज का युवा केवल देश का भविष्य नहीं, उसका वर्तमान भी है। उसके हाथ में मोबाइल है, कैमरा है, अपनी बात कहने का मंच है और AI जैसी तकनीक भी।

World News Day पर शायद यही याद रखना सबसे जरूरी है कि तकनीक और माध्यम बदल सकते हैं, लेकिन पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी आज भी भरोसा है। और उस भरोसे को कायम रखने की जिम्मेदारी पत्रकारों के साथ-साथ हर उस नागरिक की भी है, जो हर दिन तय करता है कि वह क्या देखेगा, क्या मानेगा और क्या आगे बढ़ाएगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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तकनीक बदली, प्लेटफॉर्म बदले, लेकिन भरोसेमंद जानकारी की जरूरत आज भी कायम

विश्व समाचार दिवस यह सोचने का अवसर भी है कि खबरें हमारे जीवन में कितनी जरूरी हैं और तेजी से बदलती दुनिया में भरोसेमंद जानकारी का महत्व कितना बढ़ गया है।

pankaj sharma by
Published - Monday, 28 September, 2026
Last Modified:
Monday, 28 September, 2026
World News Day

पंकज शर्मा, समाचार4मीडिया।।

28 सितंबर को हर साल विश्व समाचार दिवस यानी वर्ल्ड न्यूज डे मनाया जाता है। यह सिर्फ पत्रकारिता या न्यूज इंडस्ट्री के लिए एक खास दिन नहीं है, बल्कि यह सोचने का अवसर भी है कि खबरें हमारे जीवन में कितनी जरूरी हैं और तेजी से बदलती दुनिया में भरोसेमंद जानकारी का महत्व कितना बढ़ गया है।

एक समय था जब खबर का मतलब सुबह का अखबार, रेडियो का न्यूज बुलेटिन या शाम का टेलीविजन समाचार हुआ करता था। आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। स्मार्टफोन पर कुछ सेकंड में दुनिया के किसी भी हिस्से की खबर हमारे सामने आ जाती है। वेबसाइट, न्यूज ऐप, सोशल मीडिया, वीडियो, पॉडकास्ट और न्यूजलेटर ने खबरों तक पहुंच को पहले से कहीं आसान बना दिया है। माध्यम बदला है, लेकिन अपने आसपास और दुनिया में क्या हो रहा है, यह जानने की हमारी जरूरत नहीं बदली।

हालांकि खबरों की इस तेज रफ्तार ने पत्रकारिता के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी की हैं। सबसे पहले खबर देने की होड़ में कई बार यह खतरा रहता है कि तेजी, सटीकता से आगे निकल जाए। सोशल मीडिया पर कोई पोस्ट या वीडियो कुछ ही मिनटों में वायरल हो सकता है, लेकिन वायरल होना उसके सही होने की गारंटी नहीं है। ऐसे माहौल में पत्रकारिता की असली जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

एक अच्छी खबर सिर्फ सूचना नहीं देती, बल्कि उसके पीछे की पड़ताल, संदर्भ और जरूरी सवाल भी सामने रखती है। किसी खबर को प्रकाशित करने से पहले स्रोतों की पुष्टि करना, तथ्यों की जांच करना और गलती होने पर उसे सुधारना पत्रकारिता की बुनियादी जिम्मेदारियां हैं।

आज पत्रकारिता के सामने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की चुनौती भी है और अवसर भी। एआई खबरों के विश्लेषण, अनुवाद, रिसर्च और कंटेंट तैयार करने की प्रक्रिया को बदल सकता है। लेकिन तकनीक अपने आप भरोसा पैदा नहीं कर सकती। एआई के दौर में बदली हुई तस्वीरों, डीपफेक और भ्रामक सूचनाओं के बीच यह और जरूरी हो गया है कि पाठक को पता हो कि सूचना कहां से आई है और उसकी पुष्टि कैसे हुई।

पत्रकारिता के इतिहास में कई बार यह कहा गया कि नया माध्यम पुराने माध्यम को खत्म कर देगा। रेडियो के दौर से लेकर टेलीविजन, इंटरनेट और अब एआई तक ऐसी आशंकाएं सामने आती रही हैं। लेकिन हर बार माध्यम बदला और पत्रकारिता ने खुद को नए रूप में ढाला। भविष्य में भी यही होगा। कुछ पुराने फॉर्मेट कमजोर पड़ सकते हैं, नए फॉर्मेट सामने आ सकते हैं, लेकिन विश्वसनीय जानकारी की जरूरत बनी रहेगी।

मेरे लिए विश्व समाचार दिवस का सबसे बड़ा संदेश यही है कि पत्रकारिता की पहचान सिर्फ उसकी गति, पहुंच या लोकप्रियता से नहीं होनी चाहिए। उसकी सबसे बड़ी पूंजी भरोसा है। खबर कितनी जल्दी पहुंची, यह महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है कि वह कितनी सही, उपयोगी और संदर्भपूर्ण है।

खबरों की दुनिया आने वाले वर्षों में और ज्यादा डिजिटल, व्यक्तिगत और तकनीक आधारित होगी। ऐसे में चुनौती खबरों की कमी की नहीं, बल्कि सही और भरोसेमंद खबर पहचानने की होगी। माध्यम बदलते रहेंगे, लेकिन पत्रकारिता की बुनियाद वही रहेगी यानी तथ्य, सवाल, संदर्भ और जनता का भरोसा। शायद यही विश्व समाचार दिवस को याद करने की सबसे सार्थक वजह भी है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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World News Day: खबरों के बिना जिंदगी की कल्पना मुश्किल, भरोसा अब सबसे बड़ी जरूरत

वर्ल्ड न्यूज डे पर BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ व एक्सचेंज4मीडिया समूह के फाउंडर डॉ. अनुराग बत्रा ने बदलती न्यूज की दुनिया और हमारे जीवन में इसकी भूमिका पर अपने विचार साझा किए हैं।

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Published - Monday, 28 September, 2026
Last Modified:
Monday, 28 September, 2026
Dr Annurag Batra

हर साल 28 सितंबर को वर्ल्ड न्यूज डे मनाया जाता है। इस मौके पर BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ व एक्सचेंज4मीडिया समूह के फाउंडर डॉ. अनुराग बत्रा ने बदलती न्यूज की दुनिया और हमारे जीवन में इसकी भूमिका पर अपने विचार साझा किए हैं। उन्होंने कहा कि आज भले ही लोग बहुत ज्यादा खबरों, नोटिफिकेशन और अलग-अलग राय से परेशान होने की बात करें, लेकिन सुबह उठते ही ज्यादातर लोग यह जानना चाहते हैं कि जब वे सो रहे थे, तब दुनिया में क्या हुआ।

एक समय था जब खबरें तय समय पर मिला करती थीं। सुबह घर के दरवाजे पर अखबार आता था और एक निश्चित समय पर रेडियो से न्यूज बुलेटिन सुनने को मिलता था। लोग चाय के साथ अखबार पढ़ते थे और रेडियो से दिन की प्रमुख खबरें सुनते थे। लेकिन आज न्यूज 24 घंटे उपलब्ध है। मोबाइल पर एक नोटिफिकेशन दुनिया के दूसरे हिस्से में हुई घटना की जानकारी भी कुछ ही पलों में दे देता है। जो कभी सुबह की एक आदत हुआ करती थी, वह अब लगातार चलने वाली जानकारी की धारा बन गई है।

न्यूज प्लेटफॉर्म की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। अखबार प्रिंट से डिजिटल तक पहुंचे हैं, टेलीविजन चैनल चौबीसों घंटे न्यूज दिखा रहे हैं और डिजिटल पब्लिकेशन, न्यूज ऐप, पॉडकास्ट, न्यूजलेटर व सोशल मीडिया ने न्यूज की पूरी दुनिया बदल दी है। स्मार्टफोन ने अखबार, टेलीविजन, रेडियो और न्यूज स्टैंड, इन सभी को एक ही जगह ला दिया है। हालांकि इतना बदलाव आने के बावजूद खबर जानने की हमारी मूल जरूरत नहीं बदली है।

डॉ. अनुराग बत्रा के मुताबिक, न्यूज देखने और पढ़ने वाले दर्शकों की आदतों में जरूर बड़ा बदलाव आया है। पहले सुबह के न्यूज एजेंडे में अखबार की बड़ी भूमिका होती थी, जबकि आज लोग एक ही खबर को अलग-अलग तरीकों से देखते हैं। नई पीढ़ी छोटी वीडियो, पॉडकास्ट या सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए खबर जानना पसंद कर सकती है। जेनरेशन जेड और जेनरेशन अल्फा ऐसी दुनिया में बड़ी हो रही हैं, जहां जानकारी तुरंत, विजुअल, इंटरैक्टिव और व्यक्तिगत जरूरत के मुताबिक उपलब्ध है। इसलिए न्यूज वही रहते हुए भी उसकी प्रस्तुति बदल गई है और न्यूज संगठनों को भी इसके साथ बदलना पड़ा है।

न्यूज अब अलग-अलग क्षेत्रों में भी बंट गई है। राजनीतिक, बिजनेस और वित्तीय खबरों के साथ खेल, मनोरंजन, टेक्नोलॉजी, लाइफस्टाइल, सामान्य और अंतरराष्ट्रीय खबरों के लिए भी अलग-अलग प्लेटफॉर्म और विकल्प मौजूद हैं। इससे लोगों के पास ज्यादा विकल्प आए हैं, लेकिन इसके साथ यह भी आसान हो गया है कि लोग केवल उन्हीं विषयों और विचारों से जुड़ी खबरें देखें, जिनमें उनकी रुचि है।

आज न्यूज के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक सबसे पहले खबर देने की होड़ भी है। 24 घंटे चलने वाले न्यूज माहौल में तेजी महत्वपूर्ण हो गई है। हर प्लेटफॉर्म सबसे पहले खबर देने की कोशिश करता है, लेकिन सबसे पहले खबर देना हमेशा सही होने की गारंटी नहीं है। जल्दबाजी में प्रकाशित खबर, बिना पुष्टि की गई सोशल मीडिया पोस्ट या अधूरी जानकारी कुछ ही समय में कई प्लेटफॉर्म पर फैल सकती है और उसे सच मान लिया जा सकता है। ऐसे समय में पत्रकारिता के मूल सिद्धांत और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं—तथ्यों की जांच, स्रोत की पुष्टि, सही संदर्भ देना, जानकारी और राय को अलग रखना और गलती होने पर उसे सुधारने की जिम्मेदारी लेना।

डॉ. अनुराग बत्रा का कहना है कि न्यूज का भविष्य केवल टेक्नोलॉजी से तय नहीं होगा, बल्कि भरोसे से तय होगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आने वाले समय में न्यूज जुटाने, उसका विश्लेषण करने, अनुवाद, निर्माण और वितरण के तरीके को प्रभावित करेगा। न्यूज और ज्यादा व्यक्तिगत हो सकती है तथा वीडियो, ऑडियो और वॉयस जैसे फॉर्मेट की भूमिका भी बढ़ सकती है। हालांकि टेक्नोलॉजी अपने आप विश्वसनीयता पैदा नहीं कर सकती। विश्वसनीयता हासिल करनी पड़ती है।

एआई से तैयार कंटेंट, बदली हुई तस्वीरों, डीपफेक और गलत सूचनाओं के बढ़ते प्रभाव के बीच विश्वसनीय न्यूज संगठनों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है। आने वाले समय में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि किसी न्यूज संगठन ने कितनी जल्दी खबर दी, बल्कि यह भी होगा कि जो जानकारी दी गई है, उस पर कितना भरोसा किया जा सकता है।

आने वाले पांच या दस साल में न्यूज किस रूप में होगी, यह कहना मुश्किल है। अखबारों का आकार छोटा हो सकता है, टेलीविजन न्यूज के फॉर्मेट बदल सकते हैं और संभव है कि भविष्य में स्मार्टफोन की जगह कोई दूसरी डिवाइस ले ले। नए प्लेटफॉर्म भी सामने आ सकते हैं, जिनकी आज हम कल्पना तक नहीं कर सकते। लेकिन लोगों की अपने आसपास की दुनिया के बारे में जानने की जरूरत बनी रहेगी। लोग अपने देश, अर्थव्यवस्था, खेल, कारोबार और दुनिया में हो रही घटनाओं को समझना चाहते रहेंगे। माध्यम बदल सकता है, लेकिन न्यूज जानने की आदत नहीं बदलेगी।

वर्ल्ड न्यूज डे का संदेश सिर्फ न्यूज इंडस्ट्री या पत्रकारों को याद करने तक सीमित नहीं है। यह लोगों तक जानकारी पहुंचाने की जिम्मेदारी की भी याद दिलाता है। न्यूज तेज, रंगीन, विजुअल और टेक्नोलॉजी से भरपूर हो सकती है, लेकिन इसकी बुनियाद ईमानदारी, पारदर्शिता और जिम्मेदारी पर होनी चाहिए। किसी न्यूज संगठन की पहचान सिर्फ इस बात से नहीं बनती कि वह कितनी खबरें प्रकाशित करता है, कितने नोटिफिकेशन भेजता है या कितने क्लिक हासिल करता है। उसकी असली पहचान समय के साथ बनी विश्वसनीयता और भरोसे से बनती है।

न्यूज की दुनिया लगातार बदलती रहेगी। कुछ प्लेटफॉर्म खत्म होंगे, नए प्लेटफॉर्म सामने आएंगे और दर्शकों की आदतें भी बदलती रहेंगी। लेकिन न्यूज के पूरी तरह खत्म होने की संभावना नहीं है। क्योंकि कभी-कभी बिना खबर के रहना अच्छी बात हो सकती है, लेकिन खबरों के बिना पूरी दुनिया की कल्पना करना मुश्किल है।

वर्ल्ड न्यूज डे पर शायद आने वाले दशक का बड़ा सवाल यह नहीं है कि हमारे पास कितनी ज्यादा खबरें होंगी। खबरें निश्चित रूप से और बढ़ेंगी। असली सवाल यह होगा कि जानकारी से भरी इस दुनिया में हम किस पर भरोसा करेंगे कि वह हमें बताए कि वास्तव में खबर क्या है।

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पत्रकार का काम है, पहले नहीं बल्कि तथ्यात्मक होना : संकेत उपाध्याय

समाधान-केंद्रित सोच अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत है। पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता को जवाबदेह बनाना है। किसी समस्या को सामने लाने के साथ उसे हल करने की कोशिश भी होनी चाहिए।

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Published - Monday, 28 September, 2026
Last Modified:
Monday, 28 September, 2026
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संकेत उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार।

विश्व समाचार दिवस पर पत्रकारिता की मृत्यु की खबरें खुद लिखी जाती रही हैं। पहले भी पत्रकारिता को मृत घोषित किया जा चुका है। कहा गया कि रेडियो प्रिंट को खत्म कर देगा। फिर लगा कि टेलीविजन रेडियो को खत्म कर देगा। इंटरनेट के आने पर कहा गया कि न्यूज़रूम का अंत हो जाएगा। अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को पत्रकारिता की नई अंतिम सूचना माना जा रहा है। लेकिन पत्रकारिता हर बार बची रही। माध्यम बदलते रहे। जो पत्रकार समय के साथ नहीं बदले, वे जरूर पीछे छूट गए।

अब पत्रकारिता का हर रूप अपना दर्शक और पाठक पाएगा। यह इस दौर का उपहार है। लेकिन यही एक जाल भी है। हम ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां अपनी सोच की पुष्टि करने वाली खबरों के लिए तुरंत पुरस्कार मिलता है। एक पक्ष चुनिए, अपने समूह को वही सुनाइए जो वह सुनना चाहता है और आंकड़ों को बढ़ते देखिए। यह कमाई का रास्ता भी है। इसलिए पत्रकारों के लिए किसी एक पक्ष को करियर की रणनीति बना लेना आसान और आकर्षक हो गया है।

हर मुद्दे को केवल दोनों पक्षों में बांटकर देखने वालों की पकड़ अब कम होगी। पत्रकारिता हमेशा किसी न किसी दृष्टिकोण से जुड़ी रही है और आगे भी रहेगी। पत्रकार एक निश्चित नजरिए से रिपोर्ट करता है। सूचना को अवलोकन तक पहुंचना ही होता है। यही हमें केवल संदेश पहुंचाने वाले डाकिए से अलग करता है। लेकिन अवलोकन और राय को अंतिम सत्य नहीं बनाया जा सकता। जिन तथ्यों पर वे आधारित हैं, उनका तथ्यात्मक होना जरूरी है।

दर्शक और पाठक अब ज्यादा चाहते हैं-ज्यादा दृष्टिकोण, ज्यादा जानकारी और ज्यादा संदर्भ। पत्रकार की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इतनी समझदारी के साथ यह सब दे सके कि उसमें आत्ममुग्धता न आ जाए। एक पीढ़ी ने खबरों को जरूरत से ज्यादा बौद्धिक बना दिया और अंततः खुद को अप्रासंगिक कर लिया। ‘मैं जो कह रहा हूं वही सही है’ और ‘मैं दूसरे विचार के लिए भी खुला रहूं’ के बीच एक बेहद महीन रेखा है। इसे पार करते ही आप रिपोर्टिंग करना बंद कर देते हैं और उपदेश देने लगते हैं।

डिजिटल अब कोई अतिरिक्त काम नहीं है। पत्रकारिता के हर रूप को अब डिजिटल दुनिया के साथ ही चलना होगा। खबर के कोण, खबर की प्रस्तुति और खबर की समझ को एल्गोरिदम और एसईओ के साथ जोड़ना होगा। ज्यादातर पत्रकार इस बदलाव को स्वीकार कर चुके हैं। जो अब भी नहीं कर पाए हैं, वे अपनी ही विदाई लिख रहे हैं। पत्रकारिता खत्म नहीं होगी। माध्यम बदलेंगे। जो पत्रकार नहीं बदलेंगे, वे पीछे छूट जाएंगे।

समाधान-केंद्रित सोच अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत है। पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता को जवाबदेह बनाना है। किसी समस्या को सामने लाने के साथ उसे हल करने की कोशिश भी होनी चाहिए। दुर्भाग्य से हम अक्सर इसके उलट करते हैं-समस्या बताने के साथ समस्या पैदा करने वाली सोच भी सामने आ जाती है। समाधान-केंद्रित पत्रकारिता को आगे ज्यादा जगह मिलेगी। यह समस्या है। इसके ये संभावित समाधान हैं। अब समाधान पर बहस कीजिए, घाव पर नहीं।

और आखिरी बात, सबसे बड़ा जोखिम-कंटेंट निर्माण और पत्रकारिता के बीच की रेखा। मोबाइल कैमरा रखने वाला हर व्यक्ति कंटेंट बना सकता है। लेकिन वह पत्रकार नहीं है। वह सिर्फ मोबाइल कैमरा रखने वाला व्यक्ति है।

आधुनिक पत्रकारिता में बहुत लोगों ने क्रम ही उलट दिया है-पहले लोकप्रियता, बाद में जानकारी। पत्रकार की लोकप्रियता के लिए सबसे पहली शर्त उसका सही होना है। कंटेंट की दुनिया में किसी और से यह शर्त पूरी करने की अपेक्षा नहीं की जाती। यही पत्रकार का काम है। सबसे पहले नहीं, बल्कि तथ्यात्मक होना। सबसे ज्यादा तेज नहीं, बल्कि उपयोगी होना।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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पत्रकारिता को फिर तलाशनी होगी अपनी खोई हुई विश्वसनीयता: सुहेल सेठ

स्तंभकार, लेखक, मार्केटिंग कंसल्टेंट और मैनेजमेंट गुरु सुहेल सेठ का मानना है कि पत्रकारिता के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती उसकी विश्वसनीयता को लेकर है।

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Published - Monday, 28 September, 2026
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Monday, 28 September, 2026
Sunil Seth WND

सुहेल सेठ, स्तंभकार, लेखक, मार्केटिंग कंसल्टेंट और मैनेजमेंट गुरु।।

विश्व समाचार दिवस (World News Day) सिर्फ पत्रकारिता का जश्न मनाने का दिन नहीं है, बल्कि यह सोचने का भी अवसर है कि आज पत्रकारिता किस दौर से गुजर रही है और उसका भविष्य किस दिशा में जा रहा है। स्तंभकार, लेखक, मार्केटिंग कंसल्टेंट और मैनेजमेंट गुरु सुहेल सेठ का मानना है कि पत्रकारिता के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती उसकी विश्वसनीयता को लेकर है।

सुहेल सेठ लिखते हैं कि उन्होंने करीब चार दशक ऐसे माहौल में बिताए हैं, जहां न्यूजरूम, ग्रीन रूम और सत्ता के गलियारों में पत्रकारों की अहम भूमिका रही है। कभी पत्रकारों का प्रभाव उनकी पहुंच की वजह से नहीं, बल्कि उनकी विश्वसनीयता की वजह से था। आज यही विश्वसनीयता पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।

पत्रकारिता का असली उद्देश्य कहीं पीछे छूट गया: सुहेल सेठ के मुताबिक, पत्रकारिता का उद्देश्य कभी लोगों का मनोरंजन करना या उन्हें खुश करना नहीं था। उसका काम समाज की अंतरात्मा की तरह काम करना था। पत्रकारिता को ऐसे सवाल पूछने थे, जिन्हें सरकारें पूछे जाने से बचना चाहती थीं, ऐसी सच्चाइयों को सामने लाना था जिन्हें बड़ी कंपनियां छिपाना चाहती थीं और ऐसी कहानियां बतानी थीं, जिन्हें ताकतवर लोग सामने नहीं आने देना चाहते थे।

लेकिन 24 घंटे चलने वाले न्यूज चक्र और एल्गोरिदम के दौर में पत्रकारिता ने कई बार दृश्यता को महत्व से जोड़ दिया। अब किसी खबर की गहराई से ज्यादा उसकी तेजी और वायरल होने की क्षमता पर ध्यान दिया जाने लगा है। छह महीने की मेहनत से तैयार की गई खोजी रिपोर्ट का मुकाबला 15 सेकंड की उस वीडियो से होने लगा है, जिसमें कोई मंत्री मंच से गिर जाता है।

सुविधा के कारण कमजोर हुई विश्वसनीयता: सुहेल सेठ का कहना है कि पत्रकारिता का विश्वसनीयता संकट सिर्फ बाहरी वजहों से पैदा नहीं हुआ है। इसमें पत्रकारिता की अपनी भूमिका भी रही है। गलत सूचनाओं के अभियान, अत्यधिक राजनीतिक ध्रुवीकरण वाले स्वामित्व ढांचे और गुस्से को बढ़ावा देने वाले एल्गोरिदम ने स्थिति को मुश्किल बनाया है। लेकिन पत्रकारिता में कठोर तथ्यों की जांच और पूरी तैयारी से पीछे हटने का भी असर पड़ा है।

जब सही खबर से ज्यादा तेजी से ब्रेकिंग न्यूज देने की होड़ महत्वपूर्ण हो जाए, जब पूरी खबर से ज्यादा एक्सक्लूसिव की कीमत बढ़ जाए और जब एंकर जानकारी देने के बजाय गुस्से और बहस को प्राथमिकता देने लगें, तो इससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।

सुहेल सेठ के अनुसार, टेलीविजन डिबेट कई बार एक तरह के मंचन में बदल गई हैं, जहां प्राइम टाइम में ऊंची आवाज और टकराव गहन विश्लेषण की जगह लेते दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि यह पत्रकारिता नहीं है, बल्कि पत्रकारिता के रूप में पेश किया जा रहा मनोरंजन है। दर्शक भी इस अंतर को समझने लगे हैं।

बदलाव जरूरी है, लेकिन पत्रकारिता की आत्मा बची रहनी चाहिए: इसके बावजूद सुहेल सेठ पत्रकारिता के भविष्य को लेकर पूरी तरह निराश नहीं हैं। उनका मानना है कि प्रिंट से डिजिटल, गेटकीपर से भागीदार और एकतरफा संवाद से बातचीत तक पत्रकारिता का बदलाव जरूरी था। चुनौती यह है कि इस बदलाव के दौरान पत्रकारिता की मूल भावना बची रहे।

उनके मुताबिक, भारत में स्वतंत्र डिजिटल न्यूजरूम ने हाल के वर्षों में कई बेहतरीन खोजी रिपोर्टिंग के उदाहरण पेश किए हैं। पूर्व संपादकों द्वारा लिखे जाने वाले सबस्टैक न्यूजलेटर ने पाठकों के साथ उस तरह की नजदीकी दोबारा स्थापित की है, जो बड़े मीडिया संस्थानों से काफी पहले दूर हो गई थी। वहीं, पॉडकास्ट ने टेलीविजन की बेहद छोटी अवधि वाली ध्यान क्षमता से अलग पत्रकारिता में विस्तार और बारीकी के लिए जगह बनाई है। सुहेल सेठ के अनुसार, यह पत्रकारिता के खत्म होने का संकेत नहीं है, बल्कि पत्रकारिता के नए तरीके तलाशने का दौर है।

एआई के दौर में भरोसे की चुनौती: आज पत्रकारिता के सामने एक नई और बड़ी चुनौती आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की भी है। एआई कुछ ही समय में ऐसी हजारों खबरें तैयार कर सकता है, जो देखने में विश्वसनीय लगें। ऐसे दौर में असली और कृत्रिम सामग्री के बीच अंतर करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। सुहेल सेठ का कहना है कि अगर पत्रकारिता का काम हमेशा से सही सूचना को शोर से अलग करना रहा है, तो अब यह काम कहीं अधिक कठिन हो गया है, क्योंकि शोर भी अब सूचना जैसा दिखाई देने लगा है।

ऐसे समय में मानवीय समझ, संदर्भ और निर्णय क्षमता रखने वाले पत्रकार की अहमियत कम नहीं, बल्कि और बढ़ जाती है। तकनीक सामग्री तैयार कर सकती है, लेकिन अंतरात्मा नहीं। किसी बाढ़ प्रभावित गांव में जाकर यह तय करना कि सबसे पहले किस कहानी को सामने लाया जाना चाहिए, यह मानवीय संवेदना और समझ का काम है।

पत्रकारिता को फिर असुविधाजनक सवाल पूछने होंगे: सुहेल सेठ के मुताबिक, पत्रकारिता को फिर से उन सच्चाइयों को सामने लाने की आदत विकसित करनी होगी, जिन्हें सामने लाना असुविधाजनक हो सकता है। उसे व्यावसायिक, राजनीतिक और एल्गोरिदम के दबाव में जटिल मुद्दों को छोटे-छोटे नारों में बदलने से बचना होगा।

न्यूजरूम को फिर से तथ्य जांच, विश्वसनीय स्रोतों और धैर्य जैसी उन प्रक्रियाओं में निवेश करना होगा, जो भले ही आकर्षक न हों, लेकिन पत्रकारिता की बुनियाद हैं। वहीं, पाठकों को भी अच्छी और गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता के लिए भुगतान करने के लिए तैयार रहना होगा, क्योंकि गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता के लिए संसाधनों की जरूरत होती है।

मीडिया मालिकों को यह समझना होगा कि एक बार खर्च हो चुका भरोसा दोबारा हासिल करना सबसे मुश्किल कामों में से एक है। संपादकों को याद रखना होगा कि साहस केवल युद्ध क्षेत्रों में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि सत्ता पर रिपोर्टिंग करने वाले हर पत्रकार के लिए यह रोज की जरूरत है। सुहेल सेठ कहते हैं कि पत्रकारों को यह भी याद रखना चाहिए कि उन्होंने इस पेशे को क्यों चुना था। उनके मुताबिक, ज्यादातर लोगों ने पत्रकारिता को पैसे के लिए नहीं चुना था, बल्कि सच तक पहुंचने और उसे सामने लाने के लिए चुना था।

पत्रकारिता का भविष्य उसकी तकनीक नहीं, उसकी विश्वसनीयता तय करेगी: विश्व समाचार दिवस को आत्मसंतुष्टि का अवसर नहीं, बल्कि खुद को आईना दिखाने का दिन होना चाहिए। सुहेल सेठ के अनुसार, पत्रकारिता का भविष्य इस बात से तय नहीं होगा कि वह किन प्लेटफॉर्म पर मौजूद है या उसके पास कौन सी तकनीक है। असली सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता उस साहस और विश्वसनीयता को फिर हासिल कर पाती है, जिसने कभी उसे समाज के लिए अनिवार्य बनाया था।

दुनिया को सिर्फ और ज्यादा खबरों की जरूरत नहीं है। उसे ऐसे सच की जरूरत है, जिसे साहस के साथ बताया जाए, ईमानदारी के साथ परखा जाए और बिना किसी डर या पक्षपात के लोगों तक पहुंचाया जाए। यही तय करेगा कि पत्रकारिता भविष्य में भी समाज के चौथे स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका निभाती है या केवल मनोरंजन का एक और रूप बनकर रह जाती है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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विश्व समाचार दिवस: पत्रकारिता कई बार खत्म हुई, लेकिन हर बार और मजबूत होकर लौटी

विश्व समाचार दिवस पर एक बात बिना किसी शर्त के कही जा सकती है- पत्रकारिता जिंदा है। पत्रकारिता को कई बार खत्म घोषित किया गया है। लेकिन हर बार यह उन भविष्यवाणियों को गलत साबित करके आगे बढ़ी है।

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Monday, 28 September, 2026
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डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।

विश्व समाचार दिवस पर एक बात बिना किसी शर्त के कही जा सकती है- पत्रकारिता जिंदा है। पत्रकारिता को कई बार खत्म घोषित किया गया है। लेकिन हर बार यह उन भविष्यवाणियों को गलत साबित करके आगे बढ़ी है।

कहा गया कि रेडियो के आने से अखबारों का महत्व कम हो जाएगा। फिर कहा गया कि टेलीविजन रेडियो को अप्रासंगिक बना देगा। इंटरनेट के आने पर कहा गया कि प्रिंट खत्म हो जाएगा। सोशल मीडिया के दौर में कहा गया कि न्यूज रूम की जरूरत ही नहीं रहेगी। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को पत्रकारिता के लिए अगली बड़ी चुनौती बताया जा रहा है।

प्लेटफॉर्म बदलता है। भविष्यवाणी फिर लौट आती है। लेकिन पत्रकारिता खुद को बदल लेती है। क्योंकि इसकी मूल जरूरत आज भी वही है- किसी को यह पता लगाना और बताना ही होगा कि वास्तव में हुआ क्या है।

यही चीज पत्रकारिता को हमारे आसपास मौजूद जानकारी के विशाल प्रवाह से अलग करती है। पत्रकारिता का मतलब है रिपोर्टिंग, जानकारी की पुष्टि, सवाल पूछना, जांच-पड़ताल, संदर्भ देना और सबसे महत्वपूर्ण- जो प्रकाशित किया गया है, उसकी जिम्मेदारी लेना। भारतीय पत्रकारिता हर दिन इसका उदाहरण देती है।

देश की कई महत्वपूर्ण खबरें इसलिए सामने आईं क्योंकि पत्रकारों ने दस्तावेजों की पड़ताल करने, सूत्रों से जानकारी जुटाने और मुश्किल सवाल पूछने में कई हफ्ते या महीने लगाए। विदेशी खातों, राजनीतिक फंडिंग, कॉरपोरेट गवर्नेंस, वित्तीय गड़बड़ियों, सरकारी नीतियों और संस्थानों के फैसलों से जुड़ी जांचों ने बार-बार दिखाया है कि गंभीर और गहराई से की गई रिपोर्टिंग उन तथ्यों को सामने ला सकती है, जो वरना छिपे रह जाते। लेकिन पत्रकारिता की अहमियत सिर्फ उस जांच से तय नहीं होनी चाहिए, जो अखबार के पहले पन्ने पर सबसे बड़ी खबर बन जाए।

इसकी असली ताकत भारतभर में काम कर रहे हजारों पत्रकारों के रोजमर्रा के काम में भी है। वे अदालतों में बैठते हैं, संसद और विधानसभा की गतिविधियों पर नजर रखते हैं, गांवों से रिपोर्ट करते हैं, कंपनियों और बाजारों की खबरें देखते हैं, अस्पतालों और विश्वविद्यालयों को कवर करते हैं, स्थानीय प्रशासन से सवाल पूछते हैं और उन जगहों तक जाते हैं, जो अक्सर राष्ट्रीय न्यूज साइकल का हिस्सा नहीं बन पातीं। वे दूरदराज के इलाकों से चुनावों की रिपोर्टिंग करते हैं, जमीन से प्राकृतिक आपदाओं की खबर देते हैं और उन आम भारतीयों की कहानियां सामने लाते हैं, जिनकी आवाज शायद ही कभी सुनी जाती है।

इनमें से बहुत सा काम कभी वायरल नहीं होता। फिर भी उसका महत्व कम नहीं होता। दरअसल, कई बार सबसे उपयोगी पत्रकारिता वही होती है, जिसे वायरल होने के लिए तैयार नहीं किया गया होता। उसकी अहमियत इस बात में होती है कि वह सटीक, लगातार और तथ्यों पर आधारित है।

भारतीय पत्रकारिता की कमियां भी हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय पत्रकारिता आलोचना से परे है। न्यूज इकोसिस्टम के कुछ हिस्से रफ्तार, तमाशे और एंगेजमेंट के आंकड़ों से जरूरत से ज्यादा प्रभावित हो गए हैं। टीवी डिबेट कई बार उन खबरों से भी ज्यादा शोर वाली हो जाती हैं, जिन्हें समझाने के लिए उन्हें किया जाना चाहिए।

क्लिकबेट कई बार गहराई वाली पत्रकारिता पर भारी पड़ जाता है। राय और रिपोर्टिंग के बीच का अंतर भी हमेशा साफ नहीं रखा जाता। और सबसे पहले खबर देने की होड़ में कई बार सही खबर देने की ज्यादा महत्वपूर्ण जिम्मेदारी पीछे छूट जाती है।

एक आत्मविश्वासी मीडिया इंडस्ट्री में इन कमियों को स्वीकार करने की क्षमता होनी चाहिए। लेकिन पत्रकारिता की आलोचना को पत्रकारिता का अंतिम संस्कार नहीं बना देना चाहिए। अगर कुछ है तो आज का सूचना का माहौल पेशेवर पत्रकारिता को पहले से ज्यादा जरूरी बनाता है।

हम ऐसे दौर में रह रहे हैं, जहां स्मार्टफोन रखने वाला लगभग कोई भी व्यक्ति लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकता है। अफवाह कुछ ही मिनटों में पूरी दुनिया में फैल सकती है। जनरेटिव AI कुछ ही पलों में भरोसेमंद दिखने वाला टेक्स्ट, फोटो, आवाज और वीडियो बना सकता है।

आज जानकारी की कमी नहीं है। कमी भरोसे की है। और आने वाले वर्षों में शायद यही पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। दर्शकों और पाठकों को सिर्फ यह जानना नहीं होगा कि वे जो देख रहे हैं, वह क्या है। उन्हें यह भी जानना होगा कि क्या इसकी पुष्टि हुई है? इसे किसने जांचा? इसके पीछे क्या सबूत हैं? क्या दूसरे पक्ष की बात भी सुनी गई है? क्या कोई व्यक्ति अपने नाम और प्रतिष्ठा के साथ उस जानकारी की जिम्मेदारी लेने को तैयार है? ये पत्रकारिता के मूल सवाल हैं।

भविष्य का न्यूज रूम सिर्फ ज्यादा कंटेंट से नहीं जीतेगा। भविष्य का न्यूज रूम सिर्फ ज्यादा कंटेंट बनाकर या कुछ सेकंड पहले खबर प्रकाशित करके सफल नहीं होगा। उसकी असली ताकत विश्वसनीयता, ओरिजिनल रिपोर्टिंग, विशेषज्ञता, जानकारी की पुष्टि और सही संदर्भ देने में होगी।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस निश्चित तौर पर न्यूज रूम को बदल देगा। यह रिसर्च, अनुवाद, प्रोडक्शन और खबरों के वितरण में मदद करेगा। बिजनेस मॉडल बदलेंगे। फॉर्मेट बदलेंगे। कुछ संस्थान खत्म होंगे और नए संस्थान सामने आएंगे। लेकिन इसका मतलब जरूरी नहीं कि पत्रकारिता खत्म हो रही है। यह वही काम है जो पत्रकारिता हमेशा से करती आई है- बदलते समय के साथ खुद को ढालना।

बहुत लंबे समय से हम किसी खास फॉर्मेट के कमजोर होने को पूरे पेशे के कमजोर होने से जोड़ते रहे हैं। अखबार बदलेंगे। टेलीविजन बदलेगा। डिजिटल प्लेटफॉर्म भी आगे बदलेंगे। लेकिन पत्रकारिता उस प्लेटफॉर्म से कहीं बड़ी है, जिस पर वह मौजूद है।

पत्रकारिता इसलिए मौजूद है क्योंकि समाज को ऐसे लोगों की जरूरत है जो वहां जाएं जहां दूसरे नहीं जाना चाहते, वे सवाल पूछें जिन्हें दूसरे पूछना नहीं चाहते, सबूतों की जांच करें, सत्ता को सवालों के घेरे में लाएं और नागरिकों को बताएं कि उन्होंने क्या पाया।

जब तक सरकारें शासन करती रहेंगी, कंपनियों के पास प्रभाव रहेगा, संस्थान फैसले लेते रहेंगे और लोग अपने आसपास की दुनिया को समझना चाहेंगे, तब तक पत्रकारिता की जरूरत बनी रहेगी। इसलिए विश्व समाचार दिवस पर शायद हमें यह पूछना बंद कर देना चाहिए कि पत्रकारिता बचेगी या नहीं। वह बच चुकी है और ऐसा एक बार नहीं, बार-बार हुआ है।

 

 

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विश्व समाचार दिवस: पत्रकारिता की पहली जिम्मेदारी सत्ता नहीं, सच के प्रति होनी चाहिए

पत्रकारिता में तीन दशक से ज्यादा समय बिताने के बाद, मैंने इस पेशे को बहुत तेजी से बदलते देखा है। अगले दिन सुबह अखबार में खबर आने के दौर से लेकर अब रियल टाइम में ब्रेकिंग न्यूज तक का सफर देखा है।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 28 September, 2026
Last Modified:
Monday, 28 September, 2026
RajdeepSardesai5421

राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार ।।

मेरा नजरिया-

पत्रकारिता में तीन दशक से ज्यादा समय बिताने के बाद, मैंने इस पेशे को बहुत तेजी से बदलते देखा है। अगले दिन सुबह अखबार में खबर आने के दौर से लेकर अब रियल टाइम में ब्रेकिंग न्यूज तक का सफर देखा है। लेकिन एक चीज नहीं बदली है- हमारी पहली जिम्मेदारी सच के प्रति होनी चाहिए, उन लोगों के प्रति नहीं जिनके हाथ में सत्ता है।

कहीं न कहीं पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा अब एक्सेस, दिखने, तेजी और अगला वायरल मोमेंट हासिल करने के इर्द-गिर्द घूमने लगा है। शायद अब समय आ गया है कि हम एक बार फिर अपने नैतिक मूल्यों और पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों की तरफ लौटें।

मेरे लिए पत्रकारिता हमेशा से ऐसे असहज सवाल पूछने का नाम रही है, जिन्हें पूछना कोई नहीं चाहता। ऐसे दरवाजे पर दस्तक देने का नाम रही है, जिसे ताकतवर लोग बंद रखना चाहते हैं। और ऐसी खबर सामने लाने का नाम रही है, जब आपको पता हो कि इसके कुछ नतीजे भी हो सकते हैं। और यह सब बिना डर और बिना किसी पक्षपात के करना ही पत्रकारिता है।

भारत जैसे विशाल और विविध देश में पत्रकारिता सिर्फ नोएडा के टीवी स्टूडियो या लुटियंस दिल्ली के गलियारों में क्या हो रहा है, तक सीमित नहीं हो सकती। स्टूडियो की रोशनी से बाहर भी एक पूरा भारत है- वह किसान जो फसल खराब होने से परेशान है, वह युवा जो नौकरी तलाश रहा है, वह आदिवासी समुदाय जो अपनी जमीन बचाने की लड़ाई लड़ रहा है, वह प्रवासी मजदूर जो अपने घर से दूर है और वह छोटे शहर का मतदाता जिसकी आवाज शायद ही कभी राष्ट्रीय न्यूज साइकल का हिस्सा बनती है। अगर हम उनके बीच जाकर उनकी बात नहीं सुनते, तो हम वास्तव में भारत की रिपोर्टिंग नहीं कर रहे हैं। हम सिर्फ भारत के उस हिस्से की रिपोर्टिंग कर रहे हैं, जो हमें दिखाई देता है।

इस हफ्ते द इंडियन एक्सप्रेस की जांच-पड़ताल वाली रिपोर्ट इस बात की याद दिलाती है कि जब पत्रकार शोर से दूर होकर गहराई से पड़ताल करते हैं और तथ्यों का पीछा करते हैं, तो पत्रकारिता क्या हासिल कर सकती है। और वह यह दिखाता है कि गंभीर और मेहनत से की गई पत्रकारिता आज भी मायने रखती है और महत्वपूर्ण बात यह है कि आज भी उसके लिए दर्शक और पाठक मौजूद हैं।

इतने वर्षों के बाद भी मेरा मानना है कि अच्छी पत्रकारिता कमरे में सबसे ऊंची आवाज बनने का नाम नहीं है।  यह उस कमरे में जाने की हिम्मत रखने का नाम है, जहां कोई आपको जाने नहीं देना चाहता। उस सवाल को पूछने का नाम है, जिसे कोई सुनना नहीं चाहता। और फिर उस जवाब को प्रकाशित करने का साहस रखने का नाम है।यही पत्रकारिता की असली ताकत है।

 

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