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भाषा के इस ‘फेर’ में ही आगे नहीं बढ़ पा रहा देश: पूरन डावर
जब तक हम यह सोचेंगे और जब तक हमें अच्छी अंग्रेजी ही प्रभावित करेगी...धारणा होगी कि अंग्रेजी बोलने वाला ही पढ़ा-लिखा होता है, तब तक हमें अंग्रेज़ी और विदेशी वस्तुएं ही अच्छी लगेंगी।
पूरन डावर 5 years ago
पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।
जब तक हम यह सोचेंगे और जब तक हमें अच्छी अंग्रेजी ही प्रभावित करेगी...धारणा होगी कि अंग्रेजी बोलने वाला ही पढ़ा-लिखा होता है, तब तक हमें अंग्रेज़ी और विदेशी वस्तुएं ही अच्छी लगेंगी। जब तक हम अंग्रेजी भाषा में विश्वास करते रहेंगे, तब तक हमारा मोह अंग्रेजी और विदेशी उत्पादों में ही होगा और हम आत्मनिर्भर नहीं हो सकते।
हम अंग्रेजी भाषा का विरोध नहीं करते न उसके ज्ञान से परहेज, लेकिन अंग्रेजी भाषा से विकसित कतई नहीं हो सकते। हम हिंदी बोलते हैं, हिंदी में सोचते हैं, हिंदी समझते हैं, लेकिन व्यावसायिक सम्मेलन हों, सरकारी काम हों, बैंकिंग हो, सारे काम अंग्रेजी में। यह कुछ लोगों को समझ आती है, कुछ को आधी-अधूरी और कुछ को कतई नहीं। विशेषज्ञ विषय से अधिक प्रभावित करने वाले, पढ़ा-लिखा प्रतिष्ठित करने वाले शब्दों के चयन में अधिक समय लगाते हैं। जो लोग उतनी अच्छी अंग्रेजी नहीं बोल पाते, उनके पास अच्छे सुझाव, अच्छे विचार होते हुए भी संकोच कर जाते हैं और विचार आ ही नहीं पाते। यही कारण है कि देश आगे नहीं बढ़ पा रहा। देश के विकास को रोकने में अंग्रेजी भी एक बड़ा कारण है, जो विरासत में ग़ुलामी से मिली और आज भी गुलाम रखे हुए है। विदेशी वस्तुओं पर निर्भरता उनके मोह में बनी हुई है।
वैसे तो विज्ञान के ज्ञान की भारत के ग्रंथों और वेदों में कोई कमी नहीं है। यदि जरूरत है तो आज हिंदी अनुवाद कोई मुश्किल नहीं है। विकसित देश जो आज इस मुकाम पर पहुंचे हैं। जैसे-फ्रांस, जर्मनी, जापान, चीन, क्या किसी देश में अंग्रेजी भारत से अच्छी बोली जाती है? कतई नहीं। भारत का आम पढ़ा-लिखा आदमी इन देशों से कहीं अच्छी अंग्रेजी बोलता है। यदि अंग्रेजी ही पैमाना होता तो हम पीछे क्यों। कारण यही है कि अंग्रेजी हमें पीछे धकेल रही है।
भारत तभी आत्मनिर्भर हो सकता है, लोकल पर वोकल हो सकता है, जब हम आसान भाषा में खुलकर बात करें। भाषा संयमित हो, लेकिन क्लिष्ट नहीं। जब हम विदेशी भाषा को बेहतर और मार्गदर्शक मानते रहेंगे, तब तक विदेशी उत्पाद ही हावी रहेंगे।
आइए, हिंदी में आसान भाषा में संवाद और खुलकर मंथन करें, देश भागने लगेगा। अंग्रेज़ी सहित जितनी भाषाओं का ज्ञान हो अच्छी बात है, लेकिन प्रयोग जरूरत पड़ने पर ही। मातृभाषा ही देश को आगे ले जा सकती है, अंग्रेजी झाड़ने के दिन स्वतंत्रता के साथ अंग्रेजों के साथ ही जाने चाहिए थे।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
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