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उत्तर प्रदेश: बीत गए तीन साल, अब तो 'महाराज' करो कुछ 'बेमिसाल'
केवल सरकार की अच्छी मंशा से जनता कुछ समय तो संतुष्ट हो सकती है, मोदीजी के नाम पर प्रदेश को भारी बहुमत से भाजपा सरकार दे सकती है, लेकिन अब प्रदेश सरकार को अपने कार्यों से इस मंशा को सिद्ध करना ही होगा
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
पूरन डावर
प्रखर चिंतक एवं विश्लेषक ।।
उत्तर प्रदेश सरकार के तीन वर्ष का कार्यकाल संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। यदि यह कहा जाये कि विकास की दृष्टि से अब तक के कार्यकालों में पीछे रहा है, तो यह कतई गलत नहीं होगा। विकास के नाम पर एक भी बड़ा कार्य दिखाया नहीं जा सकता। इस सरकार द्वारा आते ही 30 जून को गड्ढामुक्ति की घोषणा की गई। उस दौरान एक विश्वास की लहर दौड़ गयी थी, लेकिन तीन साल में गड्ढामुक्ति के नाम का कार्य शुरू भी नहीं हुआ। घोषणाएं कभी ब्रज क्षेत्र के विकास की होती हैं, कभी पूर्वांचल की तो कभी बुंदेलखंड की, लेकिन विकास कार्य शुरू नहीं हुआ है।
मायावती के कार्यकाल में यमुना एक्सप्रेस वे, अखिलेश यादव के कार्यकाल में लखनऊ एक्सप्रेस वे, पूर्वांचल एक्सप्रेस वे की योजना,रिंग रोड, ताजमहल का VIP रोड, मुगल म्यूजियम, कैफे स्ट्रीट जैसी अनेक योजनाएं बनीं। मायावती के पहले कार्यकाल में यमुना पर हेरिटिज कॉरिडोर की योजना शुरू हुयी, लेकिन राजनीति और कुछ तथाकथित पर्यावारणविदों की भेंट चढ़ गयी। लखनऊ का बड़ा विकास भी मायावती और अखिलेश के समय हुआ। यह बात अलग है कि इन योजनाओं में भ्रष्टाचार के आरोप लगे। जनता का सीधा सरोकार इन भ्रष्टाचारों से नहीं है और जिस भ्रष्टाचार से है, उसमें उत्तर प्रदेश में कतई कमी नहीं आयी। गुजरात मॉडल का बढ़-चढ़कर प्रचार किया गया, लेकिन एक भी मॉडल अपनाया नहीं गया।
न प्रदेश में मास्टर प्लान लागू करने की नीति है, न जोनल प्लान की। जनता के पास अवैध निर्माण के अतिरिक्त कोई रास्ता ही नहीं है। एक तरफ जमीन का संकट है। प्रदेश में उद्योगों या अन्य योजनाओं के लिए जमीन नहीं है, दूसरी तरफ हजारों एकड़ भूमि बीस-बीस सालों से अधिग्रहण की कागजी योजनाओं के कारण सड़ रही है। यह न अधिग्रहीत की जाती है और न अवमुक्त की जाती है। ऐसे में न सरकार प्रयोग कर पाती है और न भूस्वामी।
न एक भी वॉटर फ्रंट बना और न एक भी हवाई अड्डा। न पर्यावरण की कोई स्पष्ट नीति है और न कूड़ा निस्तारण की कोई ठोस व्यवस्था। स्मार्ट सिटीज की दुर्दशा जो उत्तर प्रदेश में है, वह कहीं हो नहीं सकती। आगरा में रिंग रोड के सहारे नए शहर के प्लान बने, लेकिन आज उनका कोई अत-पता नहीं है। इन्वेस्टमेंट समिट अवश्य हो रहे हैं, सब्सिडी की घोषणाएं हो रही हैं। उद्योगों को सब्सिडी की नहीं, स्वस्थ वातावरण की ज़रूरत है। सिंगल विंडो अभी दूर की कौड़ी है।
उल्लेखनीय है कि आगरा को टोरेंट की अद्वितीय विद्युत सेवा भी मायावती के कार्यकाल में मिली। भाजपा शहर की विद्युत व्यवस्था निजी हाथों में नहीं दे सकी। न सरकारी व्यवस्था में सुधार आया और न बिजली चोरी में कमी। 2.40 रुपए की बिजली 9 रुपए में बेचकर भी भयंकर घाटे में, ऊपर से 12% की वृद्धि। हम पिछले भ्रष्टतम कार्यकालों का समर्थन नहीं कर रहे, बल्कि उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार को वास्तविकता दिखा रहे हैं। गरीबों के लिए बनी प्रधानमंत्री आवास योजना में भी उत्तर प्रदेश सबसे पीछे। भुखमरी के शिकार लोगों के लिए अन्नपूर्णा योजना की योगीजी ने घोषणा की थी, जिसका कोई अता-पता नहीं है।
जो दिखता है, वह बिकता है। अभी दो वर्ष हैं। सरकार से जो अपेक्षाएं हैं, वो पूरी करनी होंगी। केवल सरकार की अच्छी मंशा से जनता कुछ समय तो संतुष्ट हो सकती है, मोदीजी के नाम पर प्रदेश को भारी बहुमत से भाजपा सरकार दे सकती है, लेकिन अब प्रदेश सरकार को इस मंशा को अपने कार्यों से सिद्ध करना ही होगा। सड़कें गड्ढामुक्त करनी होंगी। ऐसी कि दिव्यांग को भी स्वतः बोध हो जाए और लाठी गड्ढे में न गिरे। यदि सड़कें गड्ढा मुक्त होंगी तो प्रचार की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, बात अमेरिका तक स्वतः पहुंच जाएगी। सड़कें धूलरहित हों, इसके लिये प्लान मात्र सरकारी कार्यालयों द्वारा नहीं विशेषज्ञों द्वारा बनें।
पर्यावरण की स्पष्ट प्रभावी नीति बनानी होगी। अपनी नाकामियों का ठीकरा उद्योगों पर न फोड़कर प्रभावी व्यवस्थाएं हों। कूड़ा एकत्रीकरण और निस्तारण की व्यवस्था हो। मात्र प्लास्टिक बंद के कानून बनाकर इतिश्री नहीं की जा सकती। प्लास्टिक-पॉलीथिन आज जीवन का अंग बन चुके हैं। इन्हें बंद कर जीवन को रोका नहीं जा सकता। विश्व में कहीं भी इन पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। हतोत्साहित अवश्य किया जाना चाहिये। यदि सरकार निस्तारण की व्यवस्था या प्रबंधन में नाकाम है तो जीवन को दूभर भी नहीं बनाया जाना चाहिए।
वाहनों से हो रहे प्रदूषण को सीमित करने के लिए आवश्यक है कि हर शहर में रिंग रोड प्राथमिकता पर बनाए जाएं हों। इससे शहरों का प्रदूषण कम होगा, ट्रैफ़िक की समस्या हल होगी और प्रगति की गति भी बढ़ेगी। जन कार्यों और उद्योगों के लिये भूमि अधिग्रहण की स्पष्ट एवं समयबद्ध नीति बनानी होगी। स्पष्ट नीति होगी तो अदालतें सीमित हस्तक्षेप करेंगी। अधिकतम समय तीन वर्ष से अधिक नहीं होना चाहिये। तीन वर्ष बाद योजना पूरी नहीं होती या अधिग्रहीत नहीं होती तो स्वतः समाप्त होनी चाहिए। हर योजना का एक नोडल अधिकारी हो जो इसे समयबद्ध पूरी कराये और कार्य का आकलन करे।
उत्तर प्रदेश में नगरीय मास्टर प्लान व जोनल प्लान की स्पष्ट ‘लैंड पूलिंग ‘नीति हो, ताकि समयबद्ध और नियोजित विकास हो सके। विडम्बना है कि 20 वर्ष का मास्टर प्लान बनता है और 20 वर्ष में शायद एक भी कार्यान्वित हो पाता हो। मजबूरी में अनियोजित एवं अवैध निर्माण होते हैं। इस समस्या पर बिना किसी देरी के स्पष्ट नीति आवश्यक है और इसमें कोई रॉकेट साइंस नहीं है। किसी भी प्रदेश की नीति कट-पेस्ट की जा सकती है। गुजरात की उपयुक्त हो सकती है।
पर्यटन देश की अर्थव्यवस्था है। उत्तर प्रदेश इसमें अग्रणी होना चाहिये। विश्व धरोहर ताजमहल के अतिरिक्त कई धार्मिक स्थल (कृष्ण जन्मभूमि ब्रज, बाबा काशी विश्वनाथ वाराणसी, राम जन्मभूमि अयोध्या) होते हुए भी प्रदेश आर्थिक रूप से सबसे समृद्ध क्यों नहीं हो सकता? इन सभी का विकास अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ संस्थाओं द्वारा या उनके निर्देशन में होना चाहिये।
उत्तर प्रदेश नदियों का प्रदेश है। मथुरा,आगरा, कानपुर, प्रयागराज या वाराणासी पर आध्यात्मिक घाटों सहित विश्वस्तरीय वॉटर फ्रंट से गंगा-यमुना जैसी नदियां प्रदेश के विकास की गति को आसमान पर ले जा सकती हैं। इन सारे शहरों में ‘पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप’(पीपीपी) मॉडल पर आधुनिक हवाई अड्डे हों। हवाई पट्टी एयरफोर्स की प्रयोग की जा सकती है चेक इन व्यवस्था आधुनिक तकनीक युक्त हो। मोनो रेल से हवाई पट्टी तक पहुंचा जा सकता है। सरकार कोई भी योजना बनाये, उसका जिम्मेदार एक सक्षम नोडल अधिकारी हो, जो इस योजना को समयबद्ध पूरा करा सके। ऐसे अधिकारी पुरस्कृत होने चाहिए।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
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