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मिस्टर मीडिया: हम न घर के रहे, न घाट के
पत्रकारों के एक बड़े वर्ग के लिए अब मजदूर दिवस के मायने बदल गए हैं
राजेश बादल 6 years ago
राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार
बीस-पच्चीस बरस में कितने बदल गए हम। मजदूर दिवस निकल गया। कितने पत्रकार साथियों ने इस दिवस को अपने अंदर धड़कते हुए महसूस किया? शायद एक या दो फीसदी। कभी हम पत्रकारों के लिए यह बड़े जलसे वाला दिन होता था। उन दिनों टेलिविजन इंडस्ट्री ने आकार नहीं लिया था। अख़बार-प्रबंधन इस दिवस पर अपने कर्मचारियों को एक अलग मुद्रा में देखता था। पत्रकार और ग़ैर पत्रकार सब एकता का प्रेम भाव सगे भाइयों जैसा दिखाते थे। पर, देखिए समय की लीला। आज पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग अपने को मजदूर कहा जाना पसंद नहीं करता। ऐसा लगता है कि उसे अपने श्रमिक और मजदूर कहे जाने पर शर्म आती है। पर, सच्चाई तो यही है कि आज भी अगर सेवा शर्तों अथवा अन्य कारणों से कोई पत्रकार अदालत की शरण लेता है तो उस पर फैक्ट्री एक्ट के तहत मजदूरों वाले क़ानून ही लागू होते हैं। फिर हम यह शर्मीला भाव क्यों ओढ़े फिरते हैं?
याद करिए कि इस सदी की शुरुआत से ही अख़बारों के सैटेलाइट संस्करण प्रारंभ हुए थे। ताबड़तोड़ टेलिविजन चैनल आने लगे थे। देखते ही देखते हमारी मीडिया इंडस्ट्री खड़ी हो गई। संसार में सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाला उद्योग। हमारी तनख़्वाहों और सुविधाओं को पंख लग गए। हम लोगों ने सत्तर-अस्सी के दशक में चार-साढ़े चार सौ रुपए महीने पर काम शुरू किया था और 1999 तक बामुश्किल दस से पचास हज़ार रुपए महीने तक पहुंच पाए थे। अचानक हम लोगों ने पाया कि हमारे वेतन चालीस-पचास हज़ार रुपए से लेकर दो-ढाई लाख रुपए तक जा पहुंचे थे। धीरे-धीरे यह पांच से दस और पंद्रह लाख रुपए महीने तक हो चुके थे। गाड़ी मय ड्राइवर और अन्य सुविधाएँ अलग से। इसकी तो कभी कल्पना भी नहीं की थी। हम आसमान में उड़ने लगे थे। जब इतना पैसा मिला तो मजदूर भाव दफ़न हो गया। शोषण के ख़िलाफ़ लड़ने की इच्छाशक्ति मर गई। उसकी जगह विशिष्ट आभिजात्य भाव ने जन्म ले लिया। हम अचानक अपने को गदगद महसूस करने लगे। मालिक और मैनेजमेंट को सर झुकाकर चौबीस घंटे शोषण करने का हमने लाइसेंस दे दिया। मालिक को और क्या चाहिए था। उसने हमारी गरदन पर ऐसी सवारी की कि हमारी कराह हमीं को नहीं सुनाई दी। वेतन बढ़ते रहे, हम फाइव स्टार मजदूर की तरह शोषण कराते रहे। हमें कोई मजदूर कहे तो बुरा लगने लगा। हम एक तरह से चौबीस घंटे के विलासी-बंधुआ हो चुके थे। हमारे सामाजिक-पारिवारिक जीवन की हत्या हो चुकी थी। आज भी हम सब असामाजिक ही हैं।
इन दिनों हम सब मजदूर हैं। दो-चार साल में एकाध बार बेरोज़गार हो जाते हैं। कुछ तो हर साल या कुछ महीनों के बाद सड़क पर आ जाते हैं। कुछ समय जमा पूँजी चलती है। फिर नए घौंसले की खोज शुरू हो जाती है। ऐसे में प्रॉविडेंट फंड, ईएसआई, ग्रेच्युटी, पेंशन, एलटीसी, एंटरटेनमेंट, न्यूज़पेपर एलाउंस, टेलिफोन बिल रियंबर्समेंट, अर्जित अवकाश, चिकित्सा अवकाश, ओवरटाइम, साप्ताहिक अवकाश और पिकअप-ड्रॉप से लेकर अन्य बुनियादी सुविधाओं की माँग करना तक भूल गए। जो दे दे उसका भला, जो न दे उसका भी भला। अगली नौकरी का ठिकाना नहीं। इसलिए अपनी कुर्सी पर फेवीक़्विक लगाकर बैठे रहते हैं। क्या पता यह नौकरी चली गई तो अगली नौकरी इतने पैसे वाली भी मिलेगी या नहीं? इतना आत्मविश्वास भी हमें नहीं रह गया। हम लाटसाब श्रमिक हो गए। न घर के रहे, न घाट के। जो श्रमिक अधिकारों के लिए लड़ते थे, आवाज़ उठाते थे, वे अपने ही शोषण के ख़िलाफ़ नहीं बोल पाते। हमारे कंधे से कभी मालिक बन्दूक चलाता है तो कभी राजनेता और हम मुंह में महंगी सिगरेट दबाए, बौद्धिक चोला पहने शाम की महफ़िल में दो-चार ड्रिंक लगाकर सिद्धांतों की रक्षा की डींग हाँकते हैं। मजदूर-किसान और दलित के लिए लड़ने की क़समें खाते हैं। देश में लोकतंत्र की बिगड़ती तस्वीर पर आँसू बहाते हैं और अपना शोषण रोक तक नहीं पाते। अपनी पूँछ में आग लगाए घूमते रहते हैं। मन का ग़ुबार दफ़्तर में फटता है। अपने आपको आख़िर इस तरह कब तक धोखा देते रहेंगे मिस्टर मीडिया!
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