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BARC न्यूज रेटिंग्स: जल्दबाजी होगी जारी हुए डेटा का आकलन करना!
ब्रॉडकास्टर्स ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) इंडिया ने दसवें हफ्ते के डेटा को जारी करने के साथ न्यूज चैनल्स की रेटिंग्स 17 मार्च से फिर से शुरू कर दी है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago
ब्रॉडकास्टर्स ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) इंडिया ने दसवें हफ्ते के डेटा को जारी करने के साथ न्यूज चैनल्स की रेटिंग्स 17 मार्च से फिर से शुरू कर दी है। रेटिंग्स के मामले में हिंदी न्यूज चैनल जॉनर के क्रम ऑर्डर में एक बड़ा बदलाव देखा गया है। बार्क इंडिया ने न्यूज जॉनर वाले चैनल्स के लिए डेटा बोर्ड और तकनीकी समिति द्वारा अनुमोदित संवर्धित डेटा रिपोर्टिंग (Augmented Data Reporting) मानकों के लिए तैयार की गई नई नीति के तहत ही रेटिंग्स (NCCS All 15+ years, Roll Average, 6-24 hours) जारी की है।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि 17 महीने के अंतराल के बाद आए आंकड़ों से अभी कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। उनका यह भी तर्क है कि इंडस्ट्री को टीवी न्यूज रेटिंग्स के स्थिर होने तक इंतजार करने की जरूरत है, क्योंकि पिछले सप्ताह जारी किए गए डेटा पर कोई कॉल लेना बहुत जल्दबाजी होगी।
डेंट्सू इंडिया में एम्पलीफाइ की ग्रुप ट्रेडिंग डायरेक्टर सुजाता द्विबेदी ने कहा, ‘न्यूज डेटा अंततः जारी हो गया है, जोकि वास्तव में एक सकारात्मक कदम है। यह मीडिया प्लानिंग और खरीद पर हमारे निर्णयों का कई तरह से समर्थन करेगा। सावधानी को लेकर एकमात्र शब्द यह है कि रैंकिंग को लेकर कोई भी निर्णय लेना जल्दबाजी होगी। हमें किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले 8 से 13 सप्ताह तक इंतजार करना चाहिए और इस पर नजर बनाए रखना चाहिए। ऐसा भी हो सकता है कि हिंदी स्पीकिंग मार्केट्स (HSM) में कुछ परिणाम हमारे अनुमानों के मुताबिक न हों, लेकिन यह एक वास्तविकता भी हो सकती है।
उन्होंने आगे कहा कि बार्क द्वारा जारी किए गए चार सप्ताह के आंकड़ों में कई हाई-प्रोफाइल इवेंट शामिल हैं, जिससे दर्शकों की संख्या में वृद्धि हुई है। इसलिए, स्थिर अवधि के दौरान रेटिंग का मूल्यांकन करने की जरूरत है।
द्विबेदी ने कहा, ‘डेटा चार सप्ताह की रोलिंग एवरेज कॉन्सेप्ट (four-week rolling average concept) पर आधारित है, जिसमें चुनाव, यूक्रेन वॉर, लता मंगेशकर की मृत्यु और ऐसी कई खबरें शामिल हैं और वह भी 0600-2400 बजे तक के दौरान ही। इसलिए हमें रेटिंग के लिए एक स्थिर अवधि देखनी चाहिए।’
द्विबेदी के मुताबिक, किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले बार्क रेटिंग को मार्केटर्स के आंतरिक सेल्स मैकेनिज्म के साथ संयोजित करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि एक मार्केटर्स के तौर पर हम मार्केट की गतिशीलता को भी समझते हैं क्योंकि हमारे क्लाइंट्स के पास सभी मार्केट के लिए उनकी सेल्स व सपोर्ट टीम हैं, इसलिए हमें फीडबैक मिलता रहता है कि क्या काम करना है। किसी भी समाधान पर पहुंचने से पहले दोनों को समझकर आगे बढ़ना अच्छा है और इंतजार करना तो और भी बेहतर। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए कुछ और सप्ताह का इंतजार करना ही होगा।
न्यूज रेटिंग को फिर से शुरू करने के बारे में बोलते हुए डाबर इंडिया के सीनियर जनरल मैनेजर और मीडिया हेड राजीव दुबे ने कहा कि कंपनी अपने मीडिया खर्च को बार्क रेटिंग सहित कई तरह के फैक्टर्स के आधार पर तय करती है। उन्होंने कहा कि बार्क डेटा केवल एक चीज नहीं है, बल्कि यह प्राइमरी करंसी है क्योंकि यह सभी हितधारकों द्वारा समर्थित है। बार्क डेटा के अलावा, हमारे मीडिया निवेश को तय करने के लिए कई फैक्टर्स हैं। हम अपने आंतरिक फीडबैक सिस्टम पर भी भरोसा करते हैं, जो हमारे पास है। हम डेटा के वैकल्पिक स्रोतों जैसे जैपर (Zapr), रिटर्न पाथ डेटा (आरपीडी) आदि को भी देखते हैं।
उन्होंने कहा कि इन फैक्टर्स के अलावा, डाबर अपने विज्ञापन खर्च को मार्केट के नेतृत्व वाले फैक्टर्स के आधार पर भी तय करता है, जिसके चलते वह तेजी से कुछ राज्यों या भौगोलिक क्षेत्रों में इसका विस्तार करता है।
एक प्रमुख हिंदी न्यूज चैनल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि लीगेसी (परम्परागत) न्यूज ब्रैंड्स केवल तभी प्रभावित होंगे, जब यह प्रवृत्ति कम से कम एक साल तक जारी रहती है। अधिकारी ने कहा, ‘जिन चैनल्स ने अपने दर्शकों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की है, यदि उन चैनल्स की यह प्रवृत्ति एक साल या उससे भी ज्यादा समय तक जारी रहती है तो विज्ञापन दरों में लगभग 15-18% की वृद्धि होगी। इससे उन्हें अपनी इन्वेंट्री की दरों में सुधार करने में भी मदद मिलेगी।’
हालांकि, उन्होंने आगाह किया है कि अच्छे नंबर्स प्राप्त कर लेना एक बात है और दर्शकों के डेटा को मुद्रीकरण (monetise) करना दूसरी बात। अधिकारी ने कहा, ‘आखिरकार, यह सब बेचने की कला है, क्योंकि विज्ञापनदाता विज्ञापन दरों को बढ़ाने के लिए नहीं बैठे हैं। वे न्यूनतम संभव दर पर इन्वेंट्री खरीदना चाहते हैं। इसलिए, दर्शकों की हिस्सेदारी में वृद्धि का मुद्रीकरण एक बड़ी चुनौती है।’
एक अन्य टीवी न्यूज एग्जिक्यूटिव ने कहा कि रेटिंग दोबारा शुरू होने के साथ ही न्यूज चैनल्स द्वारा विज्ञापन दरों में बढ़ोतरी की जा रही है। उन्होंने कहा, ‘हर एक चैनल पर जितने दर्शक जुटेंगे, वही चैनल्स के विज्ञापन दरों में मिलने वाली वृद्धि को तय करेगी। बदलाव का क्रम पुराने ब्रैंड्स के लिए चिंता का विषय होगा।’
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