दुनियाभर में सरकारें इस बात को लेकर सख्त हो रही हैं कि कम उम्र के बच्चे सोशल मीडिया से दूर रहें या उसका इस्तेमाल सीमित करें।
by
Vikas Saxena
सोशल मीडिया आज की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन अब यही प्लेटफॉर्म बच्चों के लिए चिंता का कारण भी बनता जा रहा है। दुनियाभर में सरकारें इस बात को लेकर सख्त हो रही हैं कि कम उम्र के बच्चे सोशल मीडिया से दूर रहें या उसका इस्तेमाल सीमित करें। इसी कड़ी में अब भारत के कुछ राज्य भी तेजी से कदम उठा रहे हैं और नए नियमों की तैयारी कर रहे हैं।
सबसे बड़ा और सख्त कदम ऑस्ट्रेलिया ने उठाया है, जिसने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। इस फैसले ने भारत समेत कई देशों में नई बहस को जन्म दे दिया है। इस कानून के तहत TikTok, YouTube, Instagram और Facebook जैसे प्लेटफॉर्म्स पर 16 साल से कम उम्र के बच्चों का अकाउंट बनाना या इस्तेमाल करना बैन कर दिया गया है। नियम तोड़ने पर कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। यह फैसला बच्चों की मानसिक सेहत, ऑनलाइन सुरक्षा और बढ़ती स्क्रीन टाइम की समस्या को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
भारत में भी कोशिशें तेज
भारत में भी इस मुद्दे पर अब तेजी से चर्चा हो रही है। खासकर कर्नाटक ने इस दिशा में पहला बड़ा कदम उठाते हुए 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाने का फैसला किया है। बेंगलुरु जैसे टेक हब वाले इस राज्य का यह कदम इसलिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि यहां बड़ी संख्या में डिजिटल यूजर्स रहते हैं।
इसके अलावा आंध्र प्रदेश भी इस दिशा में तेजी से काम कर रहा है और एक बड़ा कानून लाने की तैयारी में है। राज्य सरकार 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर सख्त पाबंदी लगाने की योजना बना रही है। इसके साथ ही 13 से 16 साल के बच्चों के लिए “सेफ मोड” वाला सिस्टम लागू करने पर विचार हो रहा है, ताकि उन्हें सीमित और सुरक्षित डिजिटल एक्सेस मिल सके।
आंध्र प्रदेश का नया मॉडल: डिजिलॉकर से उम्र की जांच
आंध्र प्रदेश सरकार इस नए सिस्टम में डिजिलॉकर के साथ “एज टोकन” तकनीक जोड़ने की योजना बना रही है। इसके जरिए यूजर्स की असली उम्र की पुष्टि की जा सकेगी, जिससे फर्जी अकाउंट, प्राइवेसी ब्रीच और बच्चों तक हानिकारक कंटेंट पहुंचने के खतरे को कम किया जा सके। इस पहल का नेतृत्व राज्य के आईटी और एजुकेशन मंत्री नारा लोकेश कर रहे हैं, जिन्होंने सोशल मीडिया कंपनियों के साथ बैठक भी की है।
सरकार का कहना है कि यह कानून बच्चों की सुरक्षा, उनकी क्रिएटिविटी और मानसिक स्वास्थ्य—इन तीनों को ध्यान में रखकर बनाया जाएगा। साथ ही, स्कूलों में डिजिटल सेफ्टी से जुड़े पाठ भी शामिल किए जाएंगे, ताकि बच्चों और अभिभावकों को जागरूक किया जा सके।
भारत में गोवा भी ऐसे ही नियमों पर विचार कर रहा है। वहीं केंद्र सरकार स्तर पर भी इस मुद्दे पर चिंता जताई जा चुकी है। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंथा नागेश्वरन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को “प्रिडेटरी” बताया था, यानी ऐसे प्लेटफॉर्म जो यूजर्स को लंबे समय तक स्क्रीन पर बांधे रखते हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई, नींद और मानसिक विकास प्रभावित होता है।
वैश्विक स्तर पर सख्त होते नियम
अगर वैश्विक तस्वीर देखें तो कई देश इस दिशा में तेजी से कदम उठा रहे हैं। ऑस्ट्रिया 14 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने की तैयारी में है। फ्रांस ने 15 साल से कम उम्र के बच्चों पर रोक लगाने वाला बिल पास किया है, हालांकि अंतिम मंजूरी अभी बाकी है। डेनमार्क, स्पेन और सिंगापुर भी सख्त नियमों पर काम कर रहे हैं।
ग्रीस ने तो 2027 से 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाने का ऐलान कर दिया है। वहीं इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे एशियाई देश भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के अकाउंट सीमित करने या बंद करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
दूसरी तरफ चीन ने अलग मॉडल अपनाया है, जहां “माइनर मोड” के जरिए बच्चों के स्क्रीन टाइम को कंट्रोल किया जाता है। इसमें उम्र के हिसाब से ऐप्स और डिवाइस पर समय सीमा तय की जाती है। जर्मनी और इटली जैसे देशों में बच्चों के लिए पैरेंटल कंसेंट जरूरी है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ यही उपाय काफी नहीं है।
ब्राजील ने इस समस्या से निपटने के लिए सोशल मीडिया अकाउंट को माता-पिता से लिंक करना अनिवार्य किया है और एडिक्टिव फीचर्स पर भी रोक लगाई है। वहीं ब्रिटेन 300 परिवारों के साथ सोशल मीडिया बैन, कर्फ्यू और टाइम लिमिट जैसे प्रयोग कर रहा है, ताकि इसके असर को समझा जा सके।
बच्चों की सुरक्षा क्यों बन रही बड़ी चिंता
सोशल मीडिया पर पाबंदी या सीमाएं लगाने की सबसे बड़ी वजह बच्चों की मानसिक सेहत और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंता है। कई रिपोर्ट्स में सामने आया है कि छोटे बच्चों में सोशल मीडिया के कारण एंग्जायटी, डिप्रेशन और साइबर बुलिंग के मामले बढ़ रहे हैं। “इन्फिनिट स्क्रॉल” जैसे फीचर्स बच्चों को लंबे समय तक स्क्रीन पर बांधे रखते हैं, जिससे उनकी नींद और पढ़ाई प्रभावित होती है।
टेक कंपनियों की बात करें तो TikTok, Facebook और Snapchat जैसी कंपनियां कहती हैं कि उनके प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने की न्यूनतम उम्र 13 साल है। लेकिन कई देशों के आंकड़े बताते हैं कि इससे कम उम्र के बच्चे भी बड़ी संख्या में इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे नियमों की प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं।
आगे क्या? भारत में बन सकते हैं सख्त नियम
भारत में फिलहाल कोई राष्ट्रीय स्तर का कानून नहीं है, लेकिन जिस तरह से राज्यों ने पहल शुरू कर दी है और नई तकनीकों जैसे डिजिलॉकर आधारित एज वेरिफिकेशन पर काम हो रहा है, उससे साफ है कि आने वाले समय में यहां भी सख्त नियम लागू हो सकते हैं।
कुल मिलाकर, दुनिया अब इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है कि बच्चों के लिए डिजिटल दुनिया को सुरक्षित बनाया जाए। भारत भी इस वैश्विक ट्रेंड से अछूता नहीं है। अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि तकनीक के फायदे और बच्चों की सुरक्षा के बीच सही संतुलन कैसे बनाया जाए।
Reddit ने विज्ञापनदाताओं के लिए 15-सेकंड Engaged Video Views गोल पेश किया है। नया विकल्प वीडियो विज्ञापनों का वॉच टाइम बढ़ाने और ज्यादा प्रभावी कैंपेन चलाने में मदद करेगा।
by
Samachar4media Bureau
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट (Reddit) ने वीडियो विज्ञापनों को लेकर विज्ञापनदाताओं के लिए नया विकल्प पेश किया है। कंपनी ने Promotions के लिए 15-सेकंड Engaged Video Views गोल लॉन्च किया है, जिसका उद्देश्य विज्ञापन प्लेसमेंट में वीडियो का वॉच टाइम बढ़ाना है।
यह नया विकल्प Reddit के मौजूदा 6-सेकंड Video Views गोल के साथ उपलब्ध रहेगा। इसके जरिए विज्ञापनदाता ऐसे यूजर्स तक अपने वीडियो विज्ञापन पहुंचा सकेंगे, जिनके वीडियो को ज्यादा देर तक देखने की संभावना है।
Reddit के मुताबिक, 15 सेकंड या उससे कम अवधि वाले वीडियो के लिए पूरा वीडियो देखना Engaged Video View माना जाएगा। वहीं, 15 सेकंड से लंबे वीडियो में यूजर के कम से कम 15 सेकंड तक देखने पर इसे Engaged Video View के तौर पर गिना जाएगा।
Reddit ने बताया कि नया विकल्प उन विज्ञापनदाताओं के लिए ज्यादा उपयोगी हो सकता है, जिनके क्रिएटिव को दर्शकों का ज्यादा वॉच टाइम चाहिए। इनमें फिल्म ट्रेलर, प्रोडक्ट डेमो और कस्टमर टेस्टिमोनियल जैसे वीडियो शामिल हैं।
कंपनी के अनुसार, अगर किसी विज्ञापन का संदेश कुछ ही सेकंड में समझ आ जाता है या क्रिएटिव छोटा है, तो 6-सेकंड Video Views गोल ज्यादा उपयुक्त हो सकता है। वहीं, लंबे समय तक दर्शकों को जोड़कर रखने और संदेश समझाने वाले कैंपेन के लिए 15-सेकंड Engaged Video Views विकल्प बेहतर रहेगा।
Reddit शुरुआती बीटा अवधि में विज्ञापनदाताओं को 15-सेकंड और 6-सेकंड Video Views के बीच स्प्लिट टेस्ट चलाने की सुविधा भी दे रहा है। इससे ब्रांड दोनों विकल्पों के प्रदर्शन की तुलना कर सकेंगे और अपने वीडियो कैंपेन के लिए बेहतर लक्ष्य तय कर पाएंगे।
नए विकल्प के जरिए Reddit विज्ञापनदाताओं को प्लेटफॉर्म पर वीडियो प्रमोशन के लिए एक अतिरिक्त तरीका उपलब्ध करा रहा है, खासकर ऐसे कंटेंट के लिए जिसमें ज्यादा वॉच टाइम महत्वपूर्ण है।
मेटा ने अमेरिका के 48 राज्यों के साथ बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर 18 अरब डॉलर का समझौता किया है। इसके बाद नाबालिग यूजर्स के लिए नए नियम लागू होंगे।
by
Samachar4media Bureau
मेटा प्लेटफॉर्म्स (Meta Platforms) ने अमेरिका (United States) के 48 राज्यों के साथ बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर 18 अरब डॉलर का समझौता किया है। इस करार के बाद इंस्टाग्राम (Instagram) और फेसबुक (Facebook) इस्तेमाल करने वाले 18 साल से कम उम्र के यूजर्स के लिए कई नए नियम लागू किए जाएंगे।
नए नियमों के तहत नाबालिग यूजर्स को इंस्टाग्राम और फेसबुक पर रोजाना अधिकतम दो घंटे का समय मिलेगा। इसके अलावा रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक दोनों प्लेटफॉर्म पर उनका इस्तेमाल अपने आप बंद रहेगा। इस समय सीमा में बदलाव करने के लिए माता-पिता की अनुमति जरूरी होगी।
समझौते में 13 साल से कम उम्र के बच्चों को इन प्लेटफॉर्म से दूर रखने पर भी खास जोर दिया गया है। इसके लिए मेटा को अपनी उम्र पहचानने वाली तकनीक को और मजबूत करना होगा, ताकि कम उम्र के बच्चे गलत जानकारी देकर अकाउंट न बना सकें।
कंपनी उम्र की पुष्टि के लिए अपनी तकनीक के साथ-साथ दूसरे टूल्स का भी इस्तेमाल करेगी। इस व्यवस्था की समय-समय पर बाहरी संस्थाओं से जांच भी कराई जाएगी, ताकि उम्र जांचने की प्रक्रिया प्रभावी बनी रहे।
अगर किसी यूजर की उम्र 13 साल से कम पाई जाती है और उसका अकाउंट हटा दिया जाता है, तो मेटा उसके संपर्क में मौजूद दोस्तों की उम्र की भी जांच कर सकती है। इसके साथ ही बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी कुछ सुविधाएं डिफॉल्ट रूप से सक्रिय रहेंगी।
हालांकि, सभी सुरक्षा विकल्प अपने आप लागू नहीं होंगे। उदाहरण के लिए वीडियो का ऑटो-प्ले बंद करने जैसी कुछ सुविधाओं को यूजर्स को खुद सक्रिय करना होगा।
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े विशेषज्ञों ने इस समझौते को महत्वपूर्ण कदम बताया है, लेकिन उनका मानना है कि सिर्फ सोशल मीडिया इस्तेमाल का समय सीमित करने से बच्चों से जुड़ी सभी समस्याओं का समाधान नहीं होगा।
आलोचकों का कहना है कि बच्चों को कितनी देर सोशल मीडिया इस्तेमाल करने दिया जाता है, इसके साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि उन्हें किस तरह की पोस्ट और वीडियो दिखाई जा रही हैं। उनका जोर प्लेटफॉर्म के कंटेंट रिकमेंडेशन सिस्टम में बदलाव पर भी है।
इस समझौते के बाद मेटा को बच्चों की उम्र पहचानने और उनकी सुरक्षा से जुड़े सिस्टम में कई बदलाव करने होंगे। हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक इन उपायों का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि नए नियमों को कितनी सख्ती और प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है।
OpenAI ने ChatGPT में नया AI स्टिकर फीचर जोड़ा है। यूजर्स टेक्स्ट प्रॉम्प्ट के जरिए कस्टम स्टिकर पैक बना, डाउनलोड और मैसेजिंग ऐप्स पर शेयर कर सकेंगे।
by
Samachar4media Bureau
OpenAI (OpenAI) ने ChatGPT (ChatGPT) यूजर्स के लिए एक नया स्टिकर फीचर पेश किया है। इसकी मदद से लोग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) का इस्तेमाल करके अपनी पसंद के मुताबिक कस्टम स्टिकर पैक तैयार कर सकेंगे। खास बात यह है कि इन स्टिकर्स को बाद में WhatsApp (WhatsApp) और iMessage (iMessage) जैसे मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
यह फीचर रोजमर्रा की घटनाओं, दोस्तों के साथ होने वाली मस्ती, पसंदीदा किरदारों और निजी पलों को मजेदार स्टिकर्स में बदलने के लिए तैयार किया गया है। यूजर सिर्फ टेक्स्ट में यह बता सकता है कि उसे किस तरह का स्टिकर चाहिए और ChatGPT उसी आधार पर इमेज तैयार कर सकता है।
इसमें निजी तस्वीरों या रिश्तों से जुड़े आइडिया को भी क्रिएटिव तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति अपने दोस्तों, परिवार या पालतू जानवरों पर आधारित स्टिकर पैक तैयार कर सकता है। इसी तरह शादी से पहले की पार्टी के लिए बॉलीवुड (Bollywood) अंदाज वाले डायलॉग पर आधारित स्टिकर या छोटे बच्चे के एक्सप्रेशन को कार्टून स्टाइल में बदला जा सकता है।
एक स्टिकर पैक में अधिकतम 9 स्टिकर शामिल किए जा सकते हैं। OpenAI ने यूजर्स को क्रिएटिविटी के लिए कई विजुअल विकल्प भी दिए हैं। इनमें एनीमे (Anime), होलोग्राफिक (Holographic) और 3D (3D) समेत कुल 18 अलग-अलग विजुअल स्टाइल शामिल हैं।
यूजर्स चाहें तो इमोजी (Emoji) की मदद से अपने बनाए हुए स्टिकर पैक को रीमिक्स भी कर सकते हैं। इससे एक ही आइडिया से अलग-अलग डिजाइन और एक्सप्रेशन तैयार करना आसान हो जाता है।
यह नया फीचर OpenAI के लेटेस्ट इमेज जनरेशन मॉडल ChatGPT Images 2.0 (ChatGPT Images 2.0) पर आधारित है। यूजर्स को स्टिकर बनाने के लिए बस अपनी जरूरत के मुताबिक टेक्स्ट प्रॉम्प्ट देना होगा। इसके बाद AI उसी निर्देश के आधार पर स्टिकर तैयार करेगा।
स्टिकर पैक तैयार होने के बाद उसे डाउनलोड किया जा सकता है या सीधे मैसेजिंग ऐप्स पर शेयर किया जा सकता है। OpenAI के मुताबिक, यह फीचर सभी ChatGPT मोबाइल यूजर्स के लिए बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के उपलब्ध कराया गया है।
कुणाल शर्मा ने BBDO Group India में वाइस प्रेसिडेंट के तौर पर नई जिम्मेदारी संभाली है। उन्हें विज्ञापन क्षेत्र में 18 साल से ज्यादा का अनुभव है।
by
Samachar4media Bureau
कुणाल शर्मा (Kunal Sharma) ने BBDO Group India में वाइस प्रेसिडेंट के तौर पर नई पारी शुरू की है। इससे पहले वह Cheil India में General Manager की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। शर्मा को विज्ञापन उद्योग में 18 साल से अधिक का अनुभव है। अपने लंबे करियर के दौरान उन्होंने ऑटोमोबाइल, ई-कॉमर्स, FMCG, शिक्षा और सरोगेट मार्केटिंग सहित कई प्रमुख क्षेत्रों से जुड़े ब्रांड्स पर काम किया है।
Cheil India से पहले शर्मा करीब छह साल तक MagicCircel Communications के साथ जुड़े रहे। इस दौरान उन्होंने विज्ञापन और ब्रांड कम्युनिकेशन से जुड़े विभिन्न प्रोजेक्ट्स पर काम किया।
BBDO Group India में उनकी नियुक्ति ऐसे समय हुई है, जब विज्ञापन उद्योग में ब्रांड्स की बदलती जरूरतों के साथ डिजिटल, क्रिएटिव और एकीकृत कम्युनिकेशन की भूमिका लगातार बढ़ रही है। शर्मा का लंबा इंडस्ट्री अनुभव नई जिम्मेदारी में उनके लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जॉय बोस के पास वैश्विक संगठनों में वर्कफोर्स स्ट्रैटेजी, कैपेबिलिटी सिस्टम्स और टेक्नोलॉजी-लेड ट्रांसफॉर्मेशन के क्षेत्र में करीब दो दशक का अनुभव है।
by
Samachar4media Bureau
डॉ. जॉय बोस (Dr. Joie Bose) को कैपजेमिनी (Capgemini) में डायरेक्टर (Director) के पद पर प्रमोट किया गया है। वह पिछले तीन वर्षों से कंपनी के साथ जुड़ी हुई हैं। इससे पहले वह स्ट्रैटेजी एंड ट्रांसफॉर्मेशन लीडर (Strategy & Transformation Leader) की जिम्मेदारी संभाल रही थीं।
जॉय बोस के पास वैश्विक संगठनों में वर्कफोर्स स्ट्रैटेजी, कैपेबिलिटी सिस्टम्स और टेक्नोलॉजी-लेड ट्रांसफॉर्मेशन के क्षेत्र में करीब दो दशक का अनुभव है। वह इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट कलकत्ता (IIM Calcutta) की भी पूर्व छात्रा हैं।
उन्होंने स्विस स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मैनेजमेंट, जिनेवा (Swiss School of Business and Management, Geneva) से डॉक्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (Doctor of Business Administration) की डिग्री हासिल की है। उन्होंने यह डिग्री summa cum laude के साथ पूरी की।
कैपजेमिनी में अपनी नई भूमिका में जॉय बोस कंपनी के साथ अपने रणनीतिक और ट्रांसफॉर्मेशन अनुभव का इस्तेमाल करते हुए संगठन के नेतृत्व और बिजनेस पहलों में योगदान देंगी। उनका अनुभव खासतौर पर वर्कफोर्स रणनीति और तकनीक आधारित बदलाव के क्षेत्रों से जुड़ा रहा है।
यूट्यूब (YouTube) 24 अगस्त से व्यू गिनने का तरीका बदल रहा है। अब वीडियो की पहली फ्रेम शुरू होते ही उसे एक व्यू माना जाएगा, लेकिन कमाई के नियम नहीं बदलेंगे।
by
Samachar4media Bureau
यूट्यूब (YouTube) 24 अगस्त से वीडियो के व्यू गिनने का तरीका बदलने जा रहा है। नए नियम के तहत वीडियो चलना शुरू होते ही, यानी उसकी पहली फ्रेम दिखाई देने के साथ ही एक व्यू गिना जाएगा। यह बदलाव दुनियाभर में सभी वीडियो फॉर्मेट पर लागू होगा।
अब तक अलग-अलग वीडियो फॉर्मेट के लिए व्यू गिनने के तरीके में अंतर था। नए सिस्टम के जरिए यूट्यूब इस प्रक्रिया को एक जैसा बनाना चाहता है। यह तरीका शॉर्ट्स (Shorts) के लिए पिछले साल शुरू किए गए व्यू काउंटिंग सिस्टम के अनुरूप होगा।
नए नियम के बाद क्रिएटर्स के वीडियो के कुल व्यूज पहले की तुलना में तेजी से बढ़ते दिखाई दे सकते हैं। कंपनी का कहना है कि इससे क्रिएटर्स को अपनी पहुंच समझने और ब्रांड पार्टनर्स व स्पॉन्सर्स के सामने अपने स्तर को बताने में आसानी होगी।
हालांकि, सबसे अहम बात यह है कि इस बदलाव का क्रिएटर्स की कमाई या यूट्यूब पार्टनर प्रोग्राम (YouTube Partner Program) की पात्रता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यूट्यूब पुराने व्यू मेट्रिक को अब “एंगेज्ड व्यूज” (Engaged Views) के नाम से उपलब्ध रखेगा। यह डेटा यूट्यूब एनालिटिक्स के एडवांस्ड मोड में देखा जा सकेगा और इससे पता चलेगा कि कितने दर्शकों ने वीडियो को आगे भी देखना जारी रखा।
कमाई के लिए “एंगेज्ड शॉर्ट्स व्यूज” और “एंगेज्ड वॉच ऑवर्स” ही आधार बने रहेंगे। यूट्यूब पार्टनर प्रोग्राम में शामिल होने की मौजूदा शर्तों में भी कोई बदलाव नहीं किया गया है। कंपनी कुछ दूसरे मेट्रिक्स के नाम भी बदल रही है। “Valid public Shorts views” को अब “Qualified Shorts views” और “Valid public watch hours” को “Qualified watch hours” कहा जाएगा।
मेटा (Meta) के खिलाफ अमेरिका में बड़ा मुकदमा शुरू हो रहा है। कंपनी पर फेसबुक (Facebook) और इंस्टाग्राम (Instagram) को बच्चों के लिए लत लगाने वाला बनाने का आरोप है।
by
Samachar4media Bureau
मेटा (Meta) के लिए अमेरिका में मंगलवार, 18 अगस्त से एक बड़ी कानूनी लड़ाई शुरू होने जा रही है। कैलिफोर्निया की संघीय अदालत में होने वाली सुनवाई में यह तय किया जाएगा कि क्या फेसबुक (Facebook) और इंस्टाग्राम (Instagram) को जानबूझकर इस तरह डिजाइन किया गया था कि बच्चे और किशोर इन प्लेटफॉर्म्स का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करें।
यह मामला 2023 में 29 अमेरिकी राज्यों के अटॉर्नी जनरल की ओर से दायर मुकदमे से जुड़ा है। फिलहाल कैलिफोर्निया, कोलोराडो, केंटकी और न्यू जर्सी के आरोपों पर सुनवाई होगी। राज्यों का आरोप है कि मेटा ने ऐसे फीचर्स तैयार किए, जो कम उम्र के यूजर्स को प्लेटफॉर्म पर ज्यादा समय बिताने के लिए प्रेरित करते हैं। साथ ही कंपनी पर युवाओं के लिए संभावित जोखिमों के बारे में यूजर्स को गुमराह करने का भी आरोप है।
राज्यों का एक अन्य आरोप है कि मेटा ने 13 साल से कम उम्र के बच्चों की निजी जानकारी माता-पिता की अनुमति के बिना जुटाई। यह संघीय बाल गोपनीयता नियमों का उल्लंघन बताया गया है। हालांकि, मेटा ने सभी आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि उसने कम उम्र के यूजर्स की सुरक्षा के लिए कई उपाय और टूल तैयार किए हैं।
इस मामले में आर्थिक दांव भी बहुत बड़ा है। मेटा के वकीलों ने चेतावनी दी है कि राज्यों की कानूनी व्याख्या के आधार पर कंपनी पर करीब 1.4 ट्रिलियन डॉलर तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। हालांकि, कानूनी जानकारों ने इतनी बड़ी राशि के वास्तव में लगाए जाने पर सवाल उठाए हैं।
मामले की सुनवाई कई हफ्तों तक चल सकती है। इसमें मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग (Mark Zuckerberg) और इंस्टाग्राम प्रमुख एडम मोसेरी (Adam Mosseri) जैसे वरिष्ठ अधिकारियों की गवाही भी हो सकती है।
बीजेपी (BJP) ने अपनी राष्ट्रीय संगठनात्मक टीम में बदलाव करते हुए दीपक म्हास्के (Deepak Mhaske) को नया सोशल मीडिया संयोजक नियुक्त किया है।
by
Samachar4media Bureau
बीजेपी (BJP) ने अपनी राष्ट्रीय संगठनात्मक टीम में बदलाव करते हुए दीपक म्हास्के (Deepak Mhaske) को पार्टी का नया सोशल मीडिया संयोजक (Social Media Convener) बनाया है। वह अमित मालवीय (Amit Malviya) की जगह यह जिम्मेदारी संभालेंगे। पार्टी ने यह बदलाव ऐसे समय किया है, जब कई राज्यों में चुनाव होने हैं।
दीपक म्हास्के सोशल मीडिया के सह-संयोजकों प्रीति गांधी (Priti Gandhi), शिवानंद द्विवेदी (Shivanand Dwivedi), आलोक भट्ट (Alok Bhatt) और अरुण यादव (Arun Yadav) के साथ काम करेंगे।
पार्टी ने अनिल बालूनी (Anil Baluni) को मीडिया और कम्युनिकेशन रणनीति की जिम्मेदारी भी सौंपी है। उन्हें मीडिया कोऑर्डिनेटर बनाया गया है। उनके साथ ज्वाइंट कोऑर्डिनेटर के तौर पर आशीष उषा अग्रवाल (Ashish Usha Agarwal), प्रदीप भंडारी (Pradeep Bhandari) और सिद्धार्थ यादव (Siddharth Yadav) काम करेंगे।
छत्तीसगढ़ के रायपुर से आने वाले दीपक म्हास्के ने इंजीनियरिंग में बैचलर डिग्री हासिल की है। वह करीब 15 वर्षों से बीजेपी के आईटी और सोशल मीडिया से जुड़े कामकाज में सक्रिय हैं। अपने करियर के दौरान उन्होंने बिहार, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में बीजेपी के डिजिटल अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन चुनावों में पार्टी को जीत भी मिली।
दीपक म्हास्के कृषि पृष्ठभूमि वाले परिवार से आते हैं और पहली पीढ़ी के बीजेपी नेता हैं। उनके भाई तेज प्रताप म्हास्के (Tej Pratap Mhaske) आरएसएस (RSS) से जुड़े हुए हैं। दीपक म्हास्के ने खुद कभी चुनाव नहीं लड़ा है।
X की योजना के मुताबिक, जहां संभव होगा वहां ऐसे अनुरोध करने वाली सरकारी एजेंसी और कार्रवाई के लिए दिए गए कानूनी आधार या वजह की जानकारी भी साझा की जाएगी।
by
Samachar4media Bureau
एलन मस्क (Elon Musk) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर सरकारी दखल को लेकर बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने कहा है कि सरकारों की ओर से कंटेंट हटाने या उस पर रोक लगाने के लिए किए जाने वाले अनुरोध अब यूजर्स को ज्यादा साफ तौर पर दिखाई देंगे।
मस्क ने 15 अगस्त को X पर एक पोस्ट में कहा कि सरकारों की ओर से मांगी जाने वाली सेंसरशिप अब स्पष्ट रूप से दिखाई देगी। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत यूजर्स यह देख सकेंगे कि किसी सरकारी एजेंसी ने किसी पोस्ट को हटाने या किसी अकाउंट पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है या नहीं।
X की योजना के मुताबिक, जहां संभव होगा वहां ऐसे अनुरोध करने वाली सरकारी एजेंसी और कार्रवाई के लिए दिए गए कानूनी आधार या वजह की जानकारी भी साझा की जाएगी। कंपनी का यह कदम प्लेटफॉर्म पर कंटेंट मॉडरेशन और उसके वितरण को लेकर ज्यादा पारदर्शिता लाने की व्यापक कोशिश का हिस्सा है। इसमें X के रिकमेंडेशन एल्गोरिदम (Recommendation Algorithms) की भूमिका को भी ज्यादा स्पष्ट करने पर जोर दिया जा रहा है।
2022 में ट्विटर (Twitter) का अधिग्रहण करने और बाद में उसका नाम X करने के बाद से मस्क लगातार पारदर्शिता और फ्री स्पीच को अपनी नीति का अहम हिस्सा बताते रहे हैं। हालांकि, स्थानीय कानूनों के तहत जरूरी होने पर X अभी भी सरकारों के कंटेंट हटाने के आदेशों का पालन करता है।
सरकारी आदेशों को लेकर X का कई देशों में विवाद भी रहा है। 2024 में ब्राजील में कोर्ट के आदेशों के बाद कुछ अकाउंट्स पर कार्रवाई को लेकर विवाद हुआ था, जिसके चलते X को अस्थायी रूप से ब्लॉक भी किया गया था।
भारत में भी X ने ऑनलाइन कंटेंट हटाने के सरकारी तंत्र को चुनौती दी है। सितंबर 2025 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने सरकार के सहयोग पोर्टल (Sahyog Portal) को लेकर X की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद X ने फैसले के खिलाफ अपील की।
नई व्यवस्था का मतलब यह नहीं है कि सरकारें कंटेंट हटाने की मांग नहीं कर सकेंगी या X कानूनी आदेशों का पालन नहीं करेगा। इसका मकसद सिर्फ इतना है कि जब किसी कंटेंट या अकाउंट पर सरकारी हस्तक्षेप हो, तो यूजर्स को इसकी जानकारी ज्यादा स्पष्ट रूप से मिल सके।
एलन मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सरकारी दखल को लेकर बड़ा बदलाव करने का ऐलान किया है।
by
Samachar4media Bureau
एलन मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सरकारी दखल को लेकर बड़ा बदलाव करने का ऐलान किया है। कंपनी अब ऐसे सरकारी अनुरोधों को यूजर्स के लिए ज्यादा स्पष्ट और दिखाई देने वाला बनाने की तैयारी कर रही है, जिनके तहत किसी पोस्ट को हटाने या किसी अकाउंट पर रोक लगाने की मांग की जाती है।
नई व्यवस्था के तहत अगर कोई सरकारी अथॉरिटी किसी खास पोस्ट को हटाने या किसी अकाउंट को प्रतिबंधित करने का अनुरोध करती है, तो X यूजर्स को इसकी जानकारी देगा। प्लेटफॉर्म यह भी बताने की योजना बना रहा है कि किस सरकारी एजेंसी ने कार्रवाई की मांग की है और इसके लिए किस कानूनी आधार या वजह का हवाला दिया गया है।
Any censorship required by governments is now clearly visible https://t.co/eQMdoYlhkA
— Elon Musk (@elonmusk) August 15, 2026
सरकारी आदेश और X की अपनी मॉडरेशन में फर्क दिखेगा
इस बदलाव का मकसद सरकारी आदेशों के कारण होने वाली कंटेंट पाबंदियों को लेकर पारदर्शिता बढ़ाना है। X लंबे समय से खुद को फ्री स्पीच पर जोर देने वाले प्लेटफॉर्म के तौर पर पेश करता रहा है, लेकिन अलग-अलग देशों की सरकारों और नियामक एजेंसियों की ओर से मिलने वाले कंटेंट हटाने के अनुरोधों का भी उसे पालन करना पड़ता है।
नई व्यवस्था लागू होने पर यूजर्स के लिए यह समझना आसान होगा कि किसी पोस्ट या अकाउंट पर कार्रवाई X की अपनी कंटेंट पॉलिसी के तहत हुई है या किसी सरकार के अनुरोध पर।
यानी अगर किसी पोस्ट पर सरकारी आदेश के कारण कार्रवाई होती है, तो यह जानकारी यूजर से छिपी नहीं रहेगी और उसे बताया जा सकता है कि कार्रवाई के पीछे किस सरकारी एजेंसी का अनुरोध था।
अलग-अलग देशों में अलग कानून
X को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सरकारों और नियामक संस्थाओं से आधिकारिक अनुरोध मिलते हैं। अलग-अलग देशों में इंटरनेट और सोशल मीडिया को लेकर अलग कानून और नियम हैं। इनमें यूरोपीय संघ, भारत और तुर्की जैसे बाजार भी शामिल हैं।
ऐसे में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के सामने दोहरी चुनौती रहती है। एक तरफ सरकारें अपने देश के कानूनों को लागू करवाने के लिए कंटेंट हटाने या अकाउंट पर कार्रवाई की मांग करती हैं, वहीं दूसरी तरफ यूजर्स ऑनलाइन अभिव्यक्ति की आजादी और पारदर्शिता की मांग करते हैं।
X का नया सिस्टम इसी टकराव के बीच सरकारी हस्तक्षेप को ज्यादा स्पष्ट तरीके से सामने लाने की कोशिश माना जा रहा है।
Musk के दौर में सरकारी अनुरोधों पर ज्यादा कार्रवाई?
रिपोर्ट में Crypto Briefing के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि एलन मस्क के स्वामित्व में आने के बाद अलग-अलग रिपोर्टिंग अवधि में X ने सरकारों की ओर से किए गए 83% से 98.8% तक के कंटेंट हटाने के अनुरोधों का पालन किया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, यह अनुपात X के पिछले प्रबंधन के दौरान दर्ज आंकड़ों से ज्यादा है।
हालांकि, अब X सरकारी अनुरोधों को ज्यादा स्पष्ट रूप से यूजर्स के सामने लाने की दिशा में बढ़ रहा है। इससे यूजर्स को यह समझने में मदद मिल सकती है कि किसी कंटेंट पर लगी रोक प्लेटफॉर्म के अपने फैसले का नतीजा है या किसी सरकारी आदेश का।
फ्री स्पीच और सरकारी नियमों के बीच संतुलन की कोशिश
X का यह कदम ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में सोशल मीडिया कंपनियों पर सरकारी नियमों का पालन करने और यूजर्स की अभिव्यक्ति की आजादी के बीच संतुलन बनाने का दबाव बढ़ रहा है।
अगर यह व्यवस्था लागू होती है तो किसी पोस्ट को हटाए जाने या अकाउंट पर प्रतिबंध लगाए जाने की स्थिति में यूजर्स को उसके पीछे की सरकारी भूमिका के बारे में ज्यादा जानकारी मिल सकेगी। इससे X पर होने वाली कंटेंट मॉडरेशन प्रक्रिया पहले की तुलना में ज्यादा पारदर्शी नजर आ सकती है।