न्यूजपेपर इंडस्ट्री ने भले ही विज्ञापन दरें बढ़ाने की जरूरत पर एकजुट होकर अपनी बात रखी हो, लेकिन जब वास्तव में विज्ञापनदाताओं से ज्यादा पैसा लेने की बात आई है, तो पब्लिशर्स काफी सावधानी बरत रहे हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
भारत की न्यूजपेपर इंडस्ट्री ने भले ही विज्ञापन दरें बढ़ाने की जरूरत पर एकजुट होकर अपनी बात रखी हो, लेकिन जब वास्तव में विज्ञापनदाताओं से ज्यादा पैसा लेने की बात आई है, तो पब्लिशर्स काफी सावधानी बरत रहे हैं।
इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) ने 22 जुलाई को अपने सदस्यों को 1 अगस्त से विज्ञापनों पर 15% सरचार्ज लगाने की सलाह दी थी। इसके 12 दिन से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी ज्यादातर बड़े अंग्रेजी, हिंदी और रीजनल पब्लिशर्स ने इसे लागू नहीं किया है। यह हिचकिचाहट प्रिंट मीडिया के सामने मौजूद एक पुराने संकट को दिखाती है। बढ़ती लागत से मुनाफे पर दबाव बढ़ रहा है, लेकिन प्रतिस्पर्धी विज्ञापन मार्केट में दरें बढ़ाने से पब्लिशर्स को वही कारोबार खोने का डर है, जिसे वे बचाना चाहते हैं।
INS ने यह सलाह 22 जुलाई को जारी की थी। इससे पहले 17 जुलाई को हुई उसकी एग्जिक्यूटिव कमेटी की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी। INS ने घरेलू और आयातित न्यूजप्रिंट की कीमतों में तेज बढ़ोतरी और लगातार बढ़ते ऑपरेशनल खर्च का हवाला दिया था। इस सिफारिश का मकसद पब्लिशर्स को मिलकर अपनी बढ़ी हुई लागत का कम से कम कुछ हिस्सा विज्ञापनदाताओं तक पहुंचाने का एक तरीका देना था।
लेकिन मार्केट में इसका असर सीमित ही दिखाई दिया है। एक वरिष्ठ पब्लिशिंग एग्जिक्यूटिव ने कहा, “मार्केट की स्थिति मुश्किल है, प्रतिस्पर्धा बहुत ज्यादा है और विज्ञापनदाताओं की ओर से दबाव भी है। इसलिए हमने कुछ और समय तक इसे लागू नहीं करने का फैसला किया है।” यह बयान बताता है कि पब्लिशर्स ऐसे समय में दरें बढ़ाने से क्यों बच रहे हैं, जब विज्ञापन से मिलने वाले हर अतिरिक्त रुपये के लिए भी कड़ी प्रतिस्पर्धा है।
'एक्सचेंज4मीडिया' ने सभी प्रमुख अंग्रेजी और हिंदी प्रकाशनों से संपर्क किया। ऑफ द रिकॉर्ड उन्होंने माना कि उन्होंने अभी तक इसे लागू नहीं किया है।
'द हिंदू' ने भी अभी तक सरचार्ज लागू नहीं किया है। चेन्नई स्थित इस ग्रुप के चीफ रेवेन्यू ऑफिसर सुंदर कोंडूर ने इसकी पुष्टि की।
'मातृभूमि' के मैनेजिंग डायरेक्टर एमवी श्रेयम्स कुमार ने कहा कि ग्रुप ने अब तक सरचार्ज लागू नहीं किया है। उन्होंने बताया कि केरल में भी अखबारों ने बड़े पैमाने पर इसे लागू करने से फिलहाल दूरी बनाए रखी है।
एक प्रमुख मैगजीन पब्लिकेशन के एमडी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि यह सरचार्ज मैगजीन के मुकाबले अखबारों के लिए ज्यादा प्रासंगिक है, क्योंकि दोनों के लागत ढांचे और मार्केट की स्थिति अलग-अलग है।
INS के प्रेजिडेंट विवेक गुप्ता ने बार-बार अनुरोध किए जाने के बावजूद कोई जवाब नहीं दिया।
त्योहारी सीजन ने बढ़ाई मुश्किल
रीजनल पब्लिशर्स के लिए इस समय को लेकर एक और चुनौती सामने आई है। पब्लिशर्स का कहना है कि ओणम (16-26 अगस्त), जो केरल के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है, ने इस समय को और संवेदनशील बना दिया है।
ओणम भारत में त्योहारी सीजन की शुरुआत का संकेत माना जाता है। इसके बाद रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, नवरात्र और दिवाली जैसे बड़े त्योहार आते हैं। यह समय रीजनल मीडिया के लिए विज्ञापन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान रिटेल, ऑटो, ज्वेलरी, FMCG, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और स्थानीय कारोबारों से जुड़े विज्ञापनदाता अपनी मौजूदगी बढ़ाते हैं।
एक प्रमुख पब्लिशर ने कहा, “ज्यादातर विज्ञापनदाता त्योहारी सीजन के दौरान भारी डिस्काउंट चाहते हैं। यह लंबे समय से चली आ रही परंपरा है। ऐसे समय में हम रेट बढ़ाने की मांग करने की स्थिति में नहीं हैं, भले ही मौजूदा हालात इसकी जरूरत बता रहे हों।”
पब्लिशर्स के सामने जोखिम साफ है। 15% की बढ़ोतरी से हर विज्ञापन से होने वाली कमाई बढ़ सकती है, लेकिन इससे बातचीत, ज्यादा डिस्काउंट की मांग या विज्ञापन बजट को दूसरी जगह ले जाने की स्थिति भी बन सकती है। और यह ठीक उसी समय हो सकता है जब पब्लिशर्स विज्ञापन की मात्रा बढ़ाना चाहते हैं।
INS की सिफारिश पर अलग-अलग पब्लिशर्स का अलग-अलग रुख एक बड़ी समस्या को सामने लाता है। लागत का दबाव सभी पर समान है, लेकिन सभी पब्लिशर्स के पास विज्ञापन दरें बढ़ाने की एक जैसी क्षमता नहीं है।
मार्केट कुछ और संकेत दे रहा है
पब्लिशर्स की हिचकिचाहट यह भी दिखाती है कि ज्यादा कमाई की उनकी जरूरत और मार्केट की ज्यादा कीमत चुकाने की इच्छा के बीच कितना बड़ा अंतर है।
पब्लिशर्स कई सालों से यह कहते रहे हैं कि विज्ञापन दरें न्यूजप्रिंट, प्रिंटिंग और डिस्ट्रीब्यूशन की बढ़ती लागत के हिसाब से नहीं बढ़ी हैं। लेकिन जब भी किसी पब्लिशर ने अकेले विज्ञापन दरें बढ़ाने की कोशिश की है, उसे अक्सर विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों के विरोध का सामना करना पड़ा है। INS की सलाह इसी लंबे समय से चली आ रही समस्या के लिए पब्लिशर्स को एक साथ लाने की कोशिश थी।
लेकिन एक साथ इरादा जाहिर करने का मतलब यह नहीं है कि सभी के पास कीमत बढ़ाने की ताकत भी एक जैसी हो। एक प्रमुख FMCG कंपनी के CMO ने कहा, “अखबार और टीवी मीडिया स्पेस की खरीद-बिक्री डिमांड और सप्लाई के आधार पर होती है। यहां दरें मार्केट तय करता है, पब्लिशर्स की संस्था नहीं।”
मार्केटर्स का कहना है कि विज्ञापन की दरें पाठकों की संख्या, सर्कुलेशन, मार्केट में स्थिति, उपलब्ध इन्वेंट्री, किसी कैटेगरी की मांग और विज्ञापनदाता के साथ रिश्ते जैसे कई फैक्टर के आधार पर तय होती हैं। किसी राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक, बड़े हिंदी अखबार और किसी रीजनल प्रकाशन के पास 15% की बढ़ोतरी को विज्ञापनदाताओं पर डालने की समान क्षमता जरूरी नहीं है। INS की सलाह सामने आने के बाद विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों की ओर से यह एक प्रमुख चिंता थी।
एक विज्ञापन एग्जिक्यूटिव ने कहा, “अगर कोई पब्लिकेशन अपनी ऑडियंस की क्वालिटी, रीडरशिप, कंटेंट और असर के आधार पर ज्यादा कीमत को सही साबित कर सकता है, तो मीडिया बायर्स उसके लिए भुगतान करेंगे। लेकिन कीमत तय करना आदर्श रूप से खरीदार और विक्रेता के बीच का फैसला होना चाहिए, न कि किसी तीसरे पक्ष की ओर से तय किया जाना चाहिए।”
इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) की गैरमौजूदगी ने इस पूरी बातचीत को और मुश्किल बना दिया है। पिछले IRS को करीब सात साल हो चुके हैं। इसके बावजूद विज्ञापनदाताओं के पास ऐसा कोई सर्वमान्य रीडरशिप करेंसी नहीं है, जिसके आधार पर अलग-अलग प्रकाशनों की ऑडियंस के आकार, क्वालिटी और अतिरिक्त पहुंच की तुलना की जा सके। डाबर इंडिया के वाइस प्रेसिडेंट, हेड ऑफ मीडिया और हेड ऑफ ब्रांड एक्टिवेशंस राजीव दुबे ने भी कहा है कि इससे प्रिंट मीडिया के लिए ज्यादा दरों को सही ठहराना मुश्किल होता है।
हालांकि पब्लिशर्स का इसके उलट तर्क है कि उनकी कारोबारी वैल्यू को सिर्फ एक रीडरशिप नंबर से नहीं आंका जा सकता। पाठकों का भरोसा, एडिटोरियल प्रभाव, प्रीमियम माहौल और बड़े आयोजनों या महत्वपूर्ण घटनाओं के आसपास प्रभाव पैदा करने की क्षमता भी उनकी वैल्यू का हिस्सा है।
INS के प्रेजिडेंट विवेक गुप्ता ने भी इन्हीं आधारों पर सरचार्ज का बचाव किया है। इससे पहले एक्सचेंज4मीडिया के साथ बातचीत में उन्होंने 15% सरचार्ज को स्थायी बढ़ोतरी के बजाय एक अस्थायी उपाय बताया था। उनका तर्क था कि जब अलग-अलग सेक्टर की कंपनियां अपनी बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल रही हैं, तो अखबारों से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वे महंगाई से बढ़ी लागत को खुद ही वहन करते रहें।
विवेक गुप्ता ने कहा था, “अगर युद्ध और दूसरी ऐसी परिस्थितियां, जिन्होंने हमें इस स्थिति में पहुंचाया है, सामान्य हो जाती हैं और कीमतें नीचे आती हैं, तो हम सरचार्ज को हटा सकते हैं। यह स्थायी सरचार्ज नहीं है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि INS पब्लिशर्स के लिए एक फैसिलिटेटर और गाइड के रूप में काम कर रही है, न कि उनकी कीमतें तय कर रही है।
हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड (HMVL) ने FMCG क्षेत्र की कंपनी RD Retail India Private Limited में 32.5 करोड़ रुपये का निवेश किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड (HMVL) ने FMCG क्षेत्र की कंपनी RD Retail India Private Limited में 32.5 करोड़ रुपये का निवेश किया है। कंपनी ने अपने पास मौजूद वारंट को इक्विटी शेयरों में बदलकर RD Retail के 3,927 शेयर हासिल किए हैं। यह जानकारी कंपनी ने 10 अगस्त 2026 को शेयर बाजारों को दी।
कंपनी के मुताबिक, उसने RD Retail में रखे 3,250 वारंट को इक्विटी शेयरों में बदला, जिसकी कुल कीमत 32.5 करोड़ रुपये है। इस रूपांतरण के बाद RD Retail में HMVL की हिस्सेदारी करीब 3.8% हो गई है।
FMCG कारोबार में करती है RD Retail
RD Retail India Private Limited की शुरुआत 2012 में हुई थी और इसका मुख्यालय दिल्ली में है। कंपनी दिल्ली-एनसीआर में रिटेलर्स को प्रमुख FMCG उत्पाद उपलब्ध कराने वाले बी2बी मार्केटप्लेस के तौर पर काम करती है।
कंपनी के कारोबार में पिछले कुछ वर्षों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। वित्त वर्ष 2024-25 में RD Retail का टर्नओवर 77.28 करोड़ रुपये रहा। इससे पहले वित्त वर्ष 2023-24 में यह 59.04 करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 2022-23 में 68.19 करोड़ रुपये था।
भविष्य में रिटर्न हासिल करने का लक्ष्य
HMVL ने बताया कि RD Retail में निवेश का उद्देश्य भविष्य में पूंजी पर रिटर्न हासिल करना है। साथ ही कंपनी अपने पास मौजूद मीडिया संपत्तियों का फायदा उठाकर इस निवेश का बेहतर इस्तेमाल करना चाहती है।
कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह निवेश किसी संबंधित पक्ष के लेनदेन के तहत नहीं आता है और प्रमोटर, प्रमोटर समूह या समूह की कंपनियों की RD Retail में कोई हिस्सेदारी या हित नहीं है।
इस निवेश के लिए किसी सरकारी या नियामकीय मंजूरी की जरूरत नहीं है। शेयरों का अधिग्रहण नकद भुगतान के जरिए वारंट को इक्विटी शेयरों में बदलकर किया गया है।
एचटी मीडिया (HT Media Limited) के शेयरधारकों ने कंपनी के 95.30 करोड़ रुपये के वारंट इश्यू को मंजूरी दे दी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
एचटी मीडिया (HT Media Limited) के शेयरधारकों ने कंपनी के 95.30 करोड़ रुपये के वारंट इश्यू को मंजूरी दे दी है। 7 अगस्त 2026 को हुई कंपनी की असाधारण आम बैठक (EGM) में यह प्रस्ताव 88.75% वोटों के साथ पास हो गया।
मिली जानकारी के मुताबिक, इस वारंट इश्यू से जुटाई जाने वाली राशि में से 90 करोड़ रुपये कर्ज चुकाने के लिए इस्तेमाल किए जाएंगे, जबकि 5.30 करोड़ रुपये सामान्य कॉरपोरेट जरूरतों पर खर्च किए जाएंगे। कंपनी का उद्देश्य अपने कर्ज का बोझ कम करना और वित्तीय स्थिति को मजबूत बनाना है।
हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर शेयरधारकों की राय बंटी हुई नजर आई। प्रमोटर समूह ने 100% वोट इसके पक्ष में दिए, जबकि सार्वजनिक (पब्लिक) शेयरधारकों के 98.71% वोट इसके विरोध में पड़े। इसके बावजूद प्रमोटर समूह के समर्थन के चलते प्रस्ताव आसानी से पारित हो गया।
इस मंजूरी के तहत कंपनी 3.87 करोड़ से अधिक वारंट 24.57 रुपये प्रति वारंट की कीमत पर जारी करेगी। इनमें प्रमोटर कंपनी Hindustan Times Limited के अलावा कुछ अन्य निवेशकों को भी वारंट आवंटित किए जाएंगे।
कंपनी के अनुसार, इस कदम से कर्ज कम करने में मदद मिलेगी और बैलेंस शीट पहले से अधिक मजबूत होगी। हालांकि, पब्लिक शेयरधारकों के भारी विरोध से यह भी साफ है कि वारंट इश्यू की कीमत और इससे होने वाले संभावित शेयर डाइल्यूशन को लेकर निवेशकों के बीच चिंता बनी हुई है।
DB Corp Limited ने अपनी 30वीं वार्षिक आम बैठक की तारीख का ऐलान कर दिया है। कंपनी की AGM 2 सितंबर 2026 को सुबह 11:30 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और अन्य ऑडियो-वीडियो माध्यम के जरिए आयोजित की जाएगी।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
DB Corp Limited ने अपनी 30वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) की तारीख का ऐलान कर दिया है। कंपनी की AGM 2 सितंबर 2026 को सुबह 11:30 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) और अन्य ऑडियो-वीडियो माध्यम (OAVM) के जरिए आयोजित की जाएगी।
कंपनी ने शेयरधारकों को जानकारी देते हुए बताया कि AGM से पहले रिमोट ई-वोटिंग की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाएगी। ई-वोटिंग 29 अगस्त सुबह 9 बजे से शुरू होकर 1 सितंबर शाम 5 बजे तक चलेगी। जिन शेयरधारकों के पास 26 अगस्त 2026 तक कंपनी के शेयर होंगे, वही मतदान के पात्र होंगे।
कंपनी ने शेयरधारकों से 21 अगस्त तक अपना ई-मेल पता डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट (DP) के साथ अपडेट करने की अपील की है, ताकि उन्हें ई-वोटिंग से जुड़ी सभी जानकारी समय पर मिल सके।
इस AGM में कई अहम प्रस्तावों पर शेयरधारकों की मंजूरी मांगी जाएगी। इनमें सुधीर अग्रवाल को 1 जनवरी 2027 से 31 दिसंबर 2031 तक अगले पांच वर्षों के लिए फिर से मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त करने का प्रस्ताव भी शामिल है। इसके अलावा वित्त वर्ष 2025-26 के ऑडिटेड वित्तीय नतीजों को मंजूरी, कॉस्ट ऑडिटर के पारिश्रमिक की पुष्टि और रोटेशन के आधार पर रिटायर हो रहे पवन अग्रवाल की दोबारा नियुक्ति पर भी फैसला लिया जाएगा।
DB Corp ने हाल ही में वित्त वर्ष 2025-26 के नतीजे जारी किए थे। कंपनी की आय में हल्की बढ़ोतरी हुई, लेकिन मुनाफे पर दबाव देखने को मिला। इसके बावजूद कंपनी ने शेयरधारकों के लिए 7 रुपये प्रति शेयर (70%) के इक्विटी डिविडेंड की भी घोषणा की है। AGM में इन सभी महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर शेयरधारकों की राय ली जाएगी।
बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने 2013 के रेप मामले में तहलका (Tehelka) के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल (Tarun Tejpal) को दोषी ठहराते हुए ट्रायल कोर्ट का बरी करने वाला फैसला पलट दिया।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
तहलका (Tehelka) पत्रिका के पूर्व एडिटर-इन-चीफ तरुण तेजपाल (Tarun Tejpal) को वर्ष 2013 के चर्चित रेप मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) की गोवा बेंच से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने मापुसा (Mapusa) की ट्रायल कोर्ट द्वारा वर्ष 2021 में दिए गए बरी करने के फैसले को पलटते हुए तेजपाल को दोषी करार दिया है।
जस्टिस डॉ. नीला गोखले (Justice Dr. Neela Gokhale) और जस्टिस अमित जमसांडेकर (Justice Amit Jamadar) की खंडपीठ ने गोवा सरकार की अपील स्वीकार करते हुए तरुण तेजपाल को भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code-IPC) की धारा 376(2)(f), 376(2)(k), 354A और 354B के तहत रेप, यौन उत्पीड़न और अन्य संबंधित अपराधों का दोषी ठहराया।
फैसला सुनाए जाने के समय तरुण तेजपाल अदालत में मौजूद थे। उनके वरिष्ठ अधिवक्ता आबाद पोंडा (Abad Ponda) ने अदालत से सजा सुनाते समय नरमी बरतने और आदेश पर आठ सप्ताह की रोक लगाने का अनुरोध किया, ताकि सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में अपील दायर की जा सके। स्वयं तरुण तेजपाल ने भी अपनी उम्र 62 वर्ष बताते हुए अदालत से रियायत की अपील की।
अब अदालत दोपहर 2:30 बजे सजा की अवधि का ऐलान करेगी। यह मामला नवंबर 2013 का है, जब गोवा के एक पांच सितारा होटल में आयोजित THiNK Fest के दौरान एक जूनियर महिला पत्रकार ने तरुण तेजपाल पर लिफ्ट में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। 2021 में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था, लेकिन गोवा सरकार की अपील पर हाई कोर्ट ने अब उस फैसले को पलट दिया है।
दैनिक भास्कर के मैनेजिंग एडिटर जगदीश शर्मा ने पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, पत्रकारों की भूमिका और मीडिया के भविष्य पर विस्तार से अपने विचार साझा किए।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
समाचार4मीडिया के 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में दैनिक भास्कर के मैनेजिंग एडिटर जगदीश शर्मा ने पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, पत्रकारों की भूमिका और मीडिया के भविष्य पर विस्तार से अपने विचार साझा किए। अपने संबोधन की शुरुआत उन्होंने बेहद सहज अंदाज में की।
जगदीश शर्मा ने कहा कि अगर पत्रकारिता के भविष्य की बात करनी है तो केवल मीडिया के कल, आज और कल की नहीं, बल्कि पत्रकारों के कल, आज और कल की भी चर्चा जरूरी है।
उन्होंने कहा कि उन्होंने पत्रकारिता का वह दौर भी देखा है, जब किसी शहर का पत्रकार सबसे बड़ा प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता था। खासकर किसी बड़े अखबार का ब्यूरो चीफ उस शहर में इतनी मजबूत स्थिति रखता था कि उसका प्रभाव कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक (एसपी), सांसद, विधायक और यहां तक कि जिले के प्रभारी मंत्री से भी अधिक माना जाता था।
उन्होंने कहा कि उस समय पत्रकार ही सबसे बड़ा 'इन्फ्लुएंसर' हुआ करता था। लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। अब सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा फॉलोअर्स, व्यूज या मिलियन ऑडियंस रखने वाले व्यक्ति को बड़ा पत्रकार मान लिया जाता है। यानी पत्रकार और इन्फ्लुएंसर की परिभाषा बदल गई है।
अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि इंसान का स्वभाव हमेशा से जानने और दूसरों को बताने का रहा है। हर व्यक्ति नई जानकारी हासिल करना चाहता है और जो जानकारी उसे मिलती है, उसे दूसरों तक भी पहुंचाना चाहता है। यही पत्रकारिता का मूल उद्देश्य भी है- समाज तक सही सूचनाएं पहुंचाना।
उन्होंने कहा कि पहले पत्रकारिता केवल सूचना देने तक सीमित नहीं थी। जब भी कोई खबर प्रकाशित होती थी, उसके साथ कोई संदेश, कोई विचार या समाज के लिए कोई सकारात्मक दिशा देने का प्रयास भी किया जाता था।
जगदीश शर्मा ने बताया कि उन्हें अखबार उद्योग में काम करते हुए 36 वर्ष हो चुके हैं। इस दौरान उन्होंने संपादकीय, प्रबंधन, मार्केटिंग, प्रोडक्शन और सर्वे जैसे लगभग सभी विभागों में काम किया है। उन्होंने बताया कि 65 में से 57 संस्करणों की लॉन्चिंग उनके नेतृत्व में हुई है। इस लंबे अनुभव के आधार पर उन्होंने पत्रकारिता के बदलते स्वरूप को बहुत करीब से देखा है।
उन्होंने कहा कि पिछले करीब 20 वर्षों में मीडिया की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। पहले खबर के साथ संदेश देने पर जोर होता था, लेकिन धीरे-धीरे पूरा ध्यान इस बात पर केंद्रित हो गया कि पाठक की जरूरत क्या है। अब यह समझना जरूरी हो गया कि पाठक किस तरह की जानकारी चाहता है और कौन-सी खबर उसके लिए उपयोगी साबित होगी। यदि खबर उसकी जरूरत पूरी करेगी, तभी वह उसे पढ़ेगा।
उन्होंने कहा कि अब पत्रकारिता एक और बड़े बदलाव की ओर बढ़ रही है। आने वाले समय में केवल खबर या उसकी उपयोगिता पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि खबर के साथ मनोरंजन का तत्व भी जोड़ना पड़ेगा। अगर खबर आकर्षक और रोचक ढंग से प्रस्तुत नहीं की जाएगी तो लोगों का ध्यान उस पर नहीं जाएगा।
उन्होंने पत्रकारिता के इस बदलाव को तीन चरणों में समझाया। उनके मुताबिक पहले दौर में खबर के साथ संदेश देने पर जोर था। दूसरे दौर में खबर के साथ उसकी उपयोगिता सबसे महत्वपूर्ण हो गई। अब आने वाला दौर खबर के साथ मनोरंजन का होगा। यानी पत्रकारिता का उद्देश्य तो वही रहेगा, लेकिन खबरों की प्रस्तुति समय के अनुसार बदलनी पड़ेगी।
जगदीश शर्मा ने स्पष्ट कहा कि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पत्रकारिता खत्म हो जाएगी। उन्होंने कहा कि दुनिया में कभी पत्रकारिता खत्म नहीं होगी, न सूचनाएं खत्म होंगी और न ही लोगों की जानकारी पाने की इच्छा। बदलेंगे तो केवल माध्यम और खबरों को लोगों तक पहुंचाने के तरीके।
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की मूल भावना हमेशा जीवित रहेगी, लेकिन जो संस्थान और पत्रकार समय के साथ खुद को बदलेंगे, वही भविष्य में भी लोगों के बीच अपनी जगह बनाए रख पाएंगे।
अपने संबोधन को आगे बढ़ाते हुए जगदीश शर्मा ने कहा कि पत्रकारिता का भविष्य कभी समाप्त नहीं होगा, लेकिन समय के साथ उसके माध्यम और प्रतिस्पर्धा का स्वरूप लगातार बदलता रहेगा।
उन्होंने कहा कि एक समय था जब अखबारों का मुकाबला केवल दूसरे अखबारों से होता था। हर पत्रकार को पता होता था कि उसके शहर में कितने पत्रकार हैं और कौन-कौन से अखबार काम कर रहे हैं। प्रतिस्पर्धा सिर्फ इस बात की होती थी कि किसके पास बेहतर और ज्यादा खबरें हैं।
इसके बाद मीडिया में बड़ा बदलाव आया और अखबारों का मुकाबला टेलीविजन से होने लगा। उन्होंने कहा कि पहले जो खबर अखबार अगले दिन सुबह प्रकाशित करने वाले होते थे, वह लोगों तक दिन में ही टीवी के जरिए पहुंच जाती थी। ऐसे में अखबारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि जब पाठक रात तक टीवी पर सारी घटनाएं देख चुका है, तब अगले दिन उसे अखबार पढ़ने के लिए क्या नया दिया जाए।
उन्होंने कहा कि इसी वजह से अखबारों ने खबरों में अतिरिक्त जानकारी, विश्लेषण और ऐसी बातें जोड़नी शुरू कीं, जो टीवी पर नहीं मिल पाती थीं। उद्देश्य यही था कि पाठक को अगले दिन भी अखबार पढ़ने की जरूरत महसूस हो।
जगदीश शर्मा ने कहा कि अब पत्रकारिता एक और बड़े बदलाव के दौर में है। आज अखबार और टीवी दोनों का मुकाबला डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया से है। सोशल मीडिया ने खबरों की रफ्तार को कई गुना बढ़ा दिया है और यह पारंपरिक मीडिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है।
हालांकि उन्होंने कहा कि इस चुनौती के बावजूद पारंपरिक मीडिया के पास एक ऐसी ताकत है, जो सोशल मीडिया के पास आज भी नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति से कोई खबर दोहराने को कहा जाए तो वह आज भी यह नहीं कहता कि "मैंने सोशल मीडिया पर देखा, इसलिए यह सही है।" लोग सोशल मीडिया पर मिली जानकारी को अक्सर संदेह की नजर से देखते हैं, जबकि अखबार और विश्वसनीय मीडिया संस्थानों में प्रकाशित खबरों पर आज भी भरोसा करते हैं।
उन्होंने कहा कि यही कारण है कि पत्रकारिता का भविष्य अंधकारमय नहीं है। बल्कि वर्तमान समय मीडिया के लिए एक बड़ा अवसर लेकर आया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म चाहे जितना मजबूत हो जाए, लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमी विश्वसनीयता है। यही वह ताकत है जो पारंपरिक मीडिया के पास मौजूद है।
उन्होंने कहा कि पत्रकारों को अपनी इसी मूल ताकत को बनाए रखते हुए समय के अनुसार खुद को बदलना होगा। सोशल मीडिया जिस तरह खबरों को तेज, आकर्षक और नए तरीके से प्रस्तुत कर रहा है, उसी तरह की प्रस्तुति पारंपरिक मीडिया को भी अपनानी होगी। लेकिन खबरों की सत्यता और तथ्यों की जांच से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं होना चाहिए।
जगदीश शर्मा ने कहा कि पत्रकारिता की आत्मा विश्वसनीयता है और यह वर्षों की मेहनत से बनी है। लोगों का भरोसा ही मीडिया की सबसे बड़ी पूंजी है। इसलिए पत्रकारों को अपनी इसी पहचान को बनाए रखते हुए आधुनिक तकनीक और नए प्रस्तुतीकरण के तरीकों को अपनाना चाहिए।
उन्होंने पत्रकारिता में आए एक और बदलाव की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि पहले लोग केवल इस बात से खुश हो जाते थे कि उनका पक्ष या बयान खबर में शामिल हो गया। इसके बाद समय बदला और लोग यह चाहने लगे कि यदि खबर उनके पक्ष में है तो उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाए और यदि उनके खिलाफ है तो उसे छोटा करके छापा जाए।
उन्होंने कहा कि अब स्थिति इससे भी आगे निकल चुकी है। आज कई लोग सीधे यह कहने लगे हैं कि खबर छापी ही न जाए। कुछ लोग तो यह भी तय करने की कोशिश करते हैं कि खबर किस पेज पर छपे, कितने कॉलम में प्रकाशित हो और उसकी जगह क्या हो। यह भी पत्रकारिता के बदलते दौर का हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि इन सभी बदलावों के बावजूद पत्रकार का मूल दायित्व नहीं बदला है। भगवान ने पत्रकार को समाज तक सही जानकारी पहुंचाने का माध्यम बनाया है। चाहे वह अखबार में काम करे, टीवी में, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर या सोशल मीडिया पर, उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी लोगों तक विश्वसनीय सूचना पहुंचाना ही है।
उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया के विस्तार का एक सकारात्मक पक्ष भी है। अब पत्रकार कभी पूरी तरह रिटायर नहीं होगा। पहले नौकरी छोड़ने के बाद पत्रकारिता से दूरी बन जाती थी, लेकिन अब कोई भी पत्रकार अपने घर से ही सोशल मीडिया, यूट्यूब, इंस्टाग्राम या अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए अपनी पत्रकारिता जारी रख सकता है। आज कई वरिष्ठ पत्रकार अपने-अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाकर सक्रिय रूप से लोगों तक खबरें पहुंचा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यह पत्रकारों के लिए एक बड़ा अवसर है। यदि वे अपनी मूल ताकत यानी विश्वसनीयता को बनाए रखते हुए नए माध्यमों का सही उपयोग करेंगे तो कोई भी चुनौती उनके सामने टिक नहीं पाएगी। लेकिन यदि वे भी बिना तथ्यों की पुष्टि किए केवल सोशल मीडिया की तरह काम करने लगेंगे, तो उनकी सबसे बड़ी ताकत खत्म हो जाएगी।
अपने संबोधन के अंतिम हिस्से में जगदीश शर्मा ने कहा कि यदि पत्रकार अपनी मूल पहचान और मूल्यों को बनाए रखेंगे तो दुनिया की कोई ताकत उनके लिए चुनौती नहीं बन सकती। लेकिन यदि वे भी सोशल मीडिया की तरह बिना विश्वसनीयता के काम करने लगेंगे, तो पत्रकारिता अपनी सबसे बड़ी ताकत खो देगी।
उन्होंने कहा कि आज जिन सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को लोग बड़ी ताकत के रूप में देख रहे हैं, कभी वही ताकत मीडिया के पास हुआ करती थी। उस समय मीडिया बेबाक था, निर्भीक था और बिना किसी दबाव के अपनी बात कहता था। हालांकि समय के साथ पत्रकारिता में व्यावसायिक पहलू भी मजबूत हुआ है और मीडिया संस्थानों को कारोबार की जरूरतों के हिसाब से भी काम करना पड़ता है।
इसी संदर्भ में उन्होंने व्यापार और मिशन का अंतर समझाते हुए एक उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि यदि किसी गांव में राजा रहते हैं तो वहां हाथियों का व्यापार करना पड़ेगा, क्योंकि वहीं उनकी मांग होगी। वहीं यदि कुम्हारों के गांव में व्यापार करना है तो वहां गधों का व्यापार करना होगा, क्योंकि वहां वही बिकेंगे। यानी किसी भी व्यापार में लोगों की जरूरत और पसंद के अनुसार काम करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि मीडिया भी अब एक व्यवसाय है, इसलिए लोगों की रुचि और जरूरतों को समझना जरूरी है। पाठक और दर्शक जो पढ़ना और देखना चाहते हैं, उसे भी ध्यान में रखना होगा। लेकिन इसके साथ यह भी याद रखना होगा कि पत्रकारिता केवल व्यापार नहीं है। यह समाज तक सही और भरोसेमंद जानकारी पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है।
जगदीश शर्मा ने कहा कि लोगों का मीडिया पर भरोसा ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। उन्होंने कहा कि प्रिंट मीडिया की बात करें तो आज भी करोड़ों लोगों की सुबह अखबार पढ़ने से शुरू होती है। यदि किसी दिन अखबार समय पर नहीं पहुंचता तो लोग तुरंत उसकी शिकायत करते हैं। इससे साफ है कि अखबार आज भी लोगों के दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि भारत में प्रिंट मीडिया का भविष्य अभी भी सुरक्षित है और इसके पीछे तीन बड़े कारण हैं।
पहला कारण यह है कि आज भी लोगों के मन में यह विश्वास कायम है कि यदि कोई खबर अखबार में छपी है तो वह सही और तथ्यों पर आधारित होगी। सोशल मीडिया की तुलना में अखबारों की विश्वसनीयता आज भी कहीं अधिक है।
दूसरा कारण अखबारों की वितरण व्यवस्था है। उन्होंने कहा कि देशभर में अखबार बांटने वाले अधिकांश लोग पार्ट-टाइम काम करते हैं। वे दिन में दूसरा काम भी करते हैं, इसलिए अखबारों का वितरण अपेक्षाकृत कम लागत में हो जाता है। यही वजह है कि अखबार आज भी कम कीमत पर पाठकों तक पहुंच पाते हैं।
तीसरा कारण उन्होंने अखबार की रद्दी का आर्थिक मूल्य बताया। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देशों में कागज फेंकने के लिए भी पैसा देना पड़ता है, लेकिन भारत में पुराने अखबार बेचने पर पैसे मिल जाते हैं। इससे अखबार की खरीद पर होने वाला खर्च काफी हद तक वापस मिल जाता है। यही वजह है कि लोग आज भी नियमित रूप से अखबार खरीदते हैं।
उन्होंने कहा कि इन सभी कारणों से प्रिंट मीडिया निकट भविष्य में खत्म होने वाला नहीं है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि मीडिया समय के साथ खुद को बदलता रहे और नई तकनीक तथा नए प्रस्तुतीकरण को अपनाए।
अपने संबोधन का समापन करते हुए जगदीश शर्मा ने कहा कि सोशल मीडिया के पास गति है, मनोरंजन है, रील्स हैं और खबरों को आकर्षक ढंग से पेश करने के कई आधुनिक तरीके हैं। लेकिन उसके पास सबसे महत्वपूर्ण चीज- विश्वसनीयता नहीं है।
उन्होंने कहा कि यदि पारंपरिक मीडिया अपनी इसी विश्वसनीयता को बनाए रखते हुए सोशल मीडिया की अच्छी बातें, जैसे बेहतर प्रस्तुतीकरण, तेजी और आधुनिक तकनीक को अपनाए, तो उसे कोई पीछे नहीं छोड़ सकता। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत आज भी भरोसा है और यही भरोसा भविष्य में भी मीडिया को सबसे आगे रखेगा।
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने सभी प्रतिभागियों का धन्यवाद करते हुए कहा कि समय के साथ बदलाव जरूरी है, लेकिन पत्रकारिता की आत्मा यानी विश्वसनीयता को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहिए।
अमर उजाला समूह के सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री ने कहा कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत तीन चीजों में छिपी है- कंटेंट, क्रेडिबिलिटी (विश्वसनीयता) और क्रिएटिविटी (रचनात्मकता)।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
समाचार4मीडिया के 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में अमर उजाला समूह के सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री ने कहा कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत तीन चीजों में छिपी है- कंटेंट, क्रेडिबिलिटी (विश्वसनीयता) और क्रिएटिविटी (रचनात्मकता)। उन्होंने कहा कि अगर मीडिया इन तीनों सिद्धांतों पर कायम रहे तो उसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) या किसी नई तकनीक से डरने की जरूरत नहीं है। तकनीक पत्रकारिता की दुश्मन नहीं, बल्कि उसका एक उपयोगी औजार है।
अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए विनोद अग्निहोत्री ने कार्यक्रम में मौजूद सभी लोगों का अभिवादन किया। उन्होंने कहा कि उनसे पहले राकेश, जगदीश, सुमित और शमशेर सहित कई वक्ता पत्रकारिता के लगभग सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से अपनी बात रख चुके हैं। इसलिए वह उन्हीं बातों में अपने कुछ अनुभव और विचार जोड़ना चाहेंगे।
उन्होंने कहा कि "मीडिया" शब्द भी बहुत पुराना नहीं है। पहले पत्रकारिता को केवल "प्रेस" कहा जाता था और वाहनों पर भी "प्रेस" ही लिखा होता था। टेलीविजन के आने के बाद "मीडिया" शब्द प्रचलन में आया। इसी तरह आज जिस "जेन-जी" (Gen Z) की चर्चा होती है, यह भी अपेक्षाकृत नया शब्द है। उन्होंने कहा कि नेपाल आंदोलन के बाद यह शब्द अधिक लोकप्रिय हुआ, जबकि उनके दौर में इस शब्द का इस्तेमाल नहीं होता था। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि वह भी उसी पीढ़ी से निकलकर आए हैं।
विनोद अग्निहोत्री ने कहा कि उनके अनुसार पत्रकारिता की सफलता तीन 'सी' पर टिकी है- कंटेंट, क्रेडिबिलिटी और क्रिएटिविटी। उन्होंने कहा कि किसी भी मीडिया संस्थान का कंटेंट जितना मजबूत होगा, उसकी विश्वसनीयता जितनी अधिक होगी और उसके प्रस्तुतिकरण में जितना नयापन होगा, वही उसकी सबसे बड़ी ताकत बनेगा।
उन्होंने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि जब वह वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता के साथ आउटलुक पत्रिका में काम करते थे, तब हर अंक के प्रकाशित होने के बाद अगले अंक की योजना बनाने के लिए बैठक होती थी। उस बैठक में सबसे ज्यादा जोर इस बात पर होता था कि अगली बार नया क्या किया जाए। सभी साथी अपने-अपने सुझाव देते थे, लेकिन अक्सर आलोक मेहता उन सुझावों को खारिज कर देते थे और फिर ऐसा नया विचार रखते थे, जिसे सभी लोग सहजता से स्वीकार कर लेते थे क्योंकि उसमें वास्तव में नवीनता होती थी।
उन्होंने कहा कि आलोक मेहता की हेडलाइन लिखने की शैली भी बेहद अलग थी। कई बार यह देखकर हैरानी होती थी कि इतनी नई और प्रभावी हेडलाइन आखिर उनके दिमाग में कैसे आई। उन्होंने कहा कि उम्र और अनुभव में सबसे वरिष्ठ होने के बावजूद आलोक मेहता ने सीखना कभी नहीं छोड़ा। आज भी वह लगातार खुद को अपडेट रखते हैं, हर विषय पर लिखते हैं और अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से नई पीढ़ी से संवाद करते हैं। विनोद अग्निहोत्री ने कहा कि किसी भी पत्रकार के लिए लगातार सीखते रहना और समय के साथ खुद को बदलना सबसे बड़ी सीख है।
उन्होंने कहा कि यदि पत्रकार कंटेंट, विश्वसनीयता और रचनात्मकता को अपनी प्राथमिकता बना लें तो पत्रकारिता के सामने किसी तरह का संकट नहीं होगा। हालांकि आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि अखबारों के सामने नई चुनौती क्या है। उन्होंने कहा कि सुबह जब कोई व्यक्ति अखबार उठाता है तो पहले पन्ने पर छपी अधिकांश खबरें वह पहले से जानता है क्योंकि रातभर वही खबरें टीवी, मोबाइल और सोशल मीडिया पर देख चुका होता है। यहां तक कि अखबार की मुख्य खबर भी उसके लिए नई नहीं रहती। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अब अखबार अपने पाठकों को क्या नया देगा।
विनोद अग्निहोत्री ने कहा कि उनकी पीढ़ी के लोगों को अखबार पढ़ने की आदत है और बिना अखबार पढ़े उनका दिन पूरा नहीं होता। लेकिन नई पीढ़ी अखबारों से इसलिए दूर हो रही है क्योंकि जो जानकारी अखबार में छपती है, वह उन्हें पहले ही मिल चुकी होती है। इसलिए अखबारों को अब ऐसी सामग्री देनी होगी जो पाठकों को नई जानकारी और नया दृष्टिकोण दे सके।
उन्होंने कहा कि उन्हें पत्रकारिता के लगभग सभी माध्यमों- अखबार, पत्रिका, टेलीविजन और डिजिटल- में काम करने का अवसर मिला है। फिलहाल भी वह अमर उजाला डॉट कॉम से जुड़े हैं। इसलिए वह पूरे विश्वास के साथ कह सकते हैं कि अखबार आज भी पत्रकारिता की बुनियाद है। उन्होंने कहा कि सुबह किसी भी टीवी चैनल की न्यूज मीटिंग में सभी प्रमुख अखबार सामने रखे जाते हैं और उनकी खबरों पर चर्चा होती है। वहीं शाम को जब अखबार की संपादकीय बैठक होती है तो दिनभर टीवी चैनलों पर चली प्रमुख खबरों और हेडलाइन पर विचार किया जाता है। इससे साफ है कि अखबार और टीवी एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहयोगी हैं।
उन्होंने कहा कि जब टेलीविजन आया था, तब यह आशंका जताई गई थी कि अब अखबार बंद हो जाएंगे। बाद में जब डिजिटल मीडिया आया तो यही डर टीवी चैनलों को लेकर भी पैदा हुआ। लेकिन समय ने साबित कर दिया कि तीनों माध्यम एक-दूसरे को मजबूत करते हैं। आज टीवी चैनल अपनी कई ब्रेकिंग खबरों की शुरुआती जानकारी डिजिटल माध्यमों से लेते हैं और बाद में अपने रिपोर्टर से पुष्टि होने पर उसे विस्तार से प्रसारित करते हैं। इस तरह तीनों माध्यम मिलकर पत्रकारिता को आगे बढ़ा रहे हैं।
एआई पर अपनी राय रखते हुए विनोद अग्निहोत्री ने कहा कि जैसे कभी कंप्यूटर आने पर लोगों को डर था कि इससे नौकरियां खत्म हो जाएंगी, वैसे ही आज एआई को लेकर आशंकाएं जताई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि राजीव गांधी के दौर में कंप्यूटरीकरण का भी विरोध हुआ था। उस समय लोगों को लगता था कि बैंक कर्मचारियों, रेलवे कर्मचारियों और दूसरे क्षेत्रों के लोगों की नौकरियां चली जाएंगी। लेकिन अगर कंप्यूटर नहीं आया होता तो देश आज इतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ पाता। इसलिए तकनीक को दुश्मन नहीं, बल्कि एक साधन के रूप में देखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि एआई को कभी भी "मैनेजिंग एडिटर" नहीं बनाना चाहिए। उसे केवल एक सहायक, सचिव या रिसर्च टूल की तरह इस्तेमाल करना चाहिए। आज किसी चर्चा या बहस के दौरान अगर किसी तथ्य पर संदेह होता है तो लोग तुरंत चैटजीपीटी जैसे प्लेटफॉर्म पर जाकर उसकी पुष्टि कर लेते हैं। यह सुविधा अच्छी है, लेकिन अंतिम फैसला इंसान को ही लेना चाहिए।
विनोद अग्निहोत्री ने कहा कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी चिंता तकनीक नहीं, बल्कि पढ़ने-लिखने की घटती आदत है। आज लगभग हर जानकारी गूगल या चैटजीपीटी पर उपलब्ध है, लेकिन केवल जानकारी होना और किसी विषय की गहरी समझ होना दोनों अलग-अलग बातें हैं। उनके अनुसार गूगल या एआई सूचना का भंडार हो सकते हैं, लेकिन वे पुस्तकालय का विकल्प नहीं हैं। इतिहास, समाज और संस्कृति की सही समझ केवल अध्ययन और किताबें पढ़ने से ही विकसित होती है। सूचना कहीं से भी मिल सकती है, लेकिन ज्ञान और समझ लगातार पढ़ने से ही आती है। इसलिए नई पीढ़ी को पढ़ने की आदत बनाए रखना बेहद जरूरी है।
विनोद अग्निहोत्री ने आगे कहा कि पत्रकारिता के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती केवल तकनीक या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) नहीं है, बल्कि मीडिया की विश्वसनीयता को बनाए रखना है। उन्होंने कहा कि सूचना और ज्ञान में अंतर होता है। सूचना इंटरनेट से मिल सकती है, लेकिन समाज, इतिहास और संस्कृति की गहरी समझ पढ़ने और अध्ययन से ही विकसित होती है। इसलिए पत्रकारों और नई पीढ़ी के लिए पढ़ने-लिखने की आदत बनाए रखना बेहद जरूरी है।
उन्होंने कहा कि आज यह जरूर चिंता का विषय है कि नई पीढ़ी में किताबें पढ़ने की आदत कम हो रही है, लेकिन इसे पूरी तरह निराशाजनक स्थिति नहीं कहा जा सकता। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हाल के दिनों में एक युवक इरफान का वीडियो काफी चर्चा में रहा। वह कभी स्कूल नहीं गया, लेकिन जिस तरह उसने अपनी बात रखी, उससे साफ होता है कि मोबाइल और डिजिटल माध्यमों से भी लोग बहुत कुछ सीख रहे हैं। इसलिए तकनीक को पूरी तरह नकारना सही नहीं होगा।
विनोद अग्निहोत्री ने कहा कि यह कहना गलत होगा कि अब सब कुछ खत्म हो जाएगा। समय के साथ मीडिया का स्वरूप जरूर बदल सकता है, लेकिन उसका अस्तित्व समाप्त नहीं होगा। उन्होंने कहा कि इंसान की प्रकृति में हमेशा सूचना, ज्ञान और नई जानकारी हासिल करने की इच्छा रहती है। जब तक यह जिज्ञासा बनी रहेगी, तब तक मीडिया भी जीवित रहेगा। अखबार, टेलीविजन और डिजिटल माध्यम खत्म नहीं होंगे, बल्कि समय के साथ उनका स्वरूप बदलता रहेगा।
उन्होंने अपने लंबे पत्रकारिता जीवन का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें हिंदी पत्रकारिता के कई बड़े संपादकों के साथ काम करने का अवसर मिला। उन्होंने राज माथुर, एस.पी. सिंह, उदयन शर्मा, कन्हैया लाल नंदन और आलोक मेहता जैसे वरिष्ठ संपादकों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन सभी से उन्होंने पत्रकारिता के मूल सिद्धांत सीखे। उन्होंने बताया कि प्रभाष जोशी और मनोहर श्याम जोशी के साथ काम करने का अवसर भले न मिला हो, लेकिन उनसे संवाद जरूर रहा।
उन्होंने कहा कि इन वरिष्ठ पत्रकारों से उन्होंने सबसे बड़ी सीख यही ली कि पत्रकारिता में किसी मुद्दे पर जरूरत पड़ने पर स्पष्ट रुख (स्टैंड) लेना जरूरी होता है। उन्होंने कहा कि वह यह नहीं कह रहे कि हर संपादक हमेशा इस्तीफा जेब में लेकर घूमे, लेकिन जब खबरों और कंटेंट की विश्वसनीयता का सवाल हो तो संपादक को अपना पक्ष स्पष्ट रखना चाहिए। पत्रकारिता की विश्वसनीयता इसी से बनती है।
विनोद अग्निहोत्री ने ऑपरेशन सिंदूर की कवरेज का उदाहरण देते हुए कहा कि उस दौरान देश के लगभग सभी प्रमुख न्यूज चैनलों ने ऐसी खबरें प्रसारित कर दीं, जिनमें यह दिखाया जाने लगा कि भारतीय सेना कराची और रावलपिंडी तक पहुंच गई है। उन्होंने कहा कि उस समय संपादकों को दबाव चाहे किसी भी तरह का रहा हो, लेकिन उन्हें स्पष्ट रूप से कहना चाहिए था कि ऐसी अपुष्ट खबरें नहीं चलाई जाएंगी।
उन्होंने कहा कि उन्हें सबसे अधिक दुख इस बात का हुआ कि कई टीवी चैनलों पर बैठे रक्षा विशेषज्ञ ऐसी बातें कर रहे थे, जबकि वास्तविकता यह थी कि सेना की गतिविधियां अभी अपनी तय सीमाओं से आगे नहीं बढ़ी थीं। लेकिन टीवी स्क्रीन पर कराची और लाहौर तक पहुंचने के दावे किए जा रहे थे। उनके मुताबिक यह भारतीय मीडिया की बड़ी चूक थी और इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश के मीडिया की साख को नुकसान पहुंचा।
उन्होंने कहा कि जब मीडिया अपनी विश्वसनीयता से समझौता करता है तो बाद में उसकी सही खबरों पर भी लोग भरोसा नहीं करते। यही कारण है कि ऐसे समय में लोगों ने भारतीय मीडिया की बजाय अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों की खबरों पर ज्यादा भरोसा करना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि एक बार यदि विश्वसनीयता पर आंच आ जाए तो उसे वापस हासिल करना बेहद कठिन हो जाता है।
उन्होंने जंतर-मंतर की हालिया घटना का जिक्र करते हुए कहा कि आंदोलन के दौरान उनके कई परिचित लगातार सोशल मीडिया के जरिए उन्हें अपडेट भेज रहे थे। लेकिन जब उन्होंने पूछा कि क्या यह खबर किसी अखबार, न्यूज चैनल या विश्वसनीय वेबसाइट पर भी है, तो जवाब मिला कि वहां तो यह खबर काफी देर बाद आएगी। उन्होंने कहा कि यह धारणा बन चुकी है कि मुख्यधारा का मीडिया कई बार जरूरी खबरें समय पर नहीं दिखाता। उन्होंने माना कि यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है, लेकिन लोगों के मन में इस तरह का अविश्वास पैदा होना निश्चित रूप से चिंता का विषय है।
विनोद अग्निहोत्री ने कहा कि आज मीडिया के लिए कई तरह के अपमानजनक शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी भी ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया और न ही वह इससे सहमत हैं। उनके मुताबिक हर पत्रकार एक ही पेशे का हिस्सा है। आज कोई टीवी में है, कल अखबार में जा सकता है और अखबार में काम करने वाला पत्रकार कल डिजिटल या टीवी में पहुंच सकता है। इसलिए किसी भी माध्यम या पत्रकार को कमतर बताना या पूरी तरह खारिज कर देना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने करियर में कई दंगों की रिपोर्टिंग की है। उस दौर में जब पत्रकार घटनास्थल पर पहुंचते थे तो लोग उन्हें सम्मान देते थे और मानते थे कि पत्रकार दोनों पक्षों की बात निष्पक्षता से सामने रखेगा। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। हालांकि उन्होंने जंतर-मंतर पर पत्रकारों और मीडिया कर्मियों के साथ हुई बदसलूकी की कड़ी निंदा की, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि मीडिया जगत को आत्ममंथन करना होगा कि आखिर ऐसी परिस्थितियां क्यों बन रही हैं और लोगों का भरोसा लगातार क्यों घट रहा है।
उन्होंने कहा कि एक समय पत्रकार किसी भी इलाके का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता था, लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। मीडिया की साख कमजोर होने के पीछे क्या कारण हैं, इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। उनके अनुसार यह जिम्मेदारी उन लोगों की है जो मीडिया संस्थानों में फैसले लेने की स्थिति में हैं।
अपने संबोधन के अंत में विनोद अग्निहोत्री ने ब्रेकिंग न्यूज की होड़ पर भी सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि एक बार सरकार गठन के दौरान दूसरे चैनल पर कैबिनेट की सूची चल रही थी। उनके संस्थान के इनपुट एडिटर ने भी वही खबर चलाने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया क्योंकि उनके रिपोर्टर ने अभी तक उसकी पुष्टि नहीं की थी और न ही कोई एजेंसी से आधिकारिक जानकारी आई थी। उन्होंने कहा कि केवल दूसरे चैनल को देखकर अपुष्ट खबर चला देना पत्रकारिता नहीं है।
उन्होंने कहा कि सबसे पहले खबर दिखाने की अंधी दौड़ न्यूज़रूम के कर्मचारियों पर अनावश्यक दबाव डालती है। इससे उनकी रचनात्मकता प्रभावित होती है और कई बार विश्वसनीयता से भी समझौता करना पड़ता है। उनके मुताबिक अगर कोई खबर दो मिनट देर से लेकिन सही तरीके से प्रसारित होती है, तो इससे कोई नुकसान नहीं होता। आम दर्शक एक साथ कई चैनल नहीं देख रहा होता, इसलिए जल्दबाजी की बजाय सही और पुष्ट खबर देना अधिक महत्वपूर्ण है।
विनोद अग्निहोत्री ने कहा कि पत्रकारिता को लेकर बहुत अधिक निराश होने की जरूरत नहीं है। तकनीक लगातार बदलेगी और मीडिया की मदद करेगी। लेकिन यदि पत्रकारिता कंटेंट, क्रेडिबिलिटी और क्रिएटिविटी, इन तीन मूल सिद्धांतों को बनाए रखेगी तो मीडिया नए स्वरूप में आगे भी मजबूती के साथ चलता रहेगा।
पुस्तक के लेखक डॉ. मार्कंडेय आहूजा ने बताया कि इसमें भगवद्गीता के आलोक में संघ प्रार्थना के विविध आयामों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
सुरुचि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. मार्कंडेय आहूजा की पुस्तक 'संघ प्रार्थना: गीता के परिप्रेक्ष्य में' का लोकार्पण समारोह 3 अगस्त 2026 को नई दिल्ली स्थित विचार विनिमय न्यास सभागार, केशव कुंज, झंडेवालान में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह श्री (डॉ.) कृष्ण गोपाल मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे, जबकि प्रख्यात गीता मनीषी एवं जीओ गीता के संस्थापक स्वामी श्री ज्ञानानन्द महाराज ने अपना आशीर्वचन प्रदान किया।
कार्यक्रम की शुरुआत में सुरुचि प्रकाशन के प्रबंध निदेशक रजनीश जिंदल ने सभी अतिथियों का स्वागत किया और सुरुचि प्रकाशन की साहित्यिक यात्रा पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि देशभर के 150 से अधिक पुस्तक-विक्रय केंद्रों और ऑनलाइन माध्यमों के द्वारा विभिन्न विषयों पर आधारित 600 से अधिक शीर्षक पाठकों के लिए उपलब्ध हैं।
इस अवसर पर पुस्तक के लेखक डॉ. मार्कंडेय आहूजा ने पुस्तक की रचना-प्रक्रिया और उसके मूल उद्देश्य पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संघ प्रार्थना केवल कुछ शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि वह भारतीय जीवन-दृष्टि, राष्ट्रचेतना, कर्तव्यबोध और आध्यात्मिक मूल्यों का सजीव घोष है। उन्होंने यह भी बताया कि पुस्तक में भगवद्गीता के आलोक में संघ प्रार्थना के विविध आयामों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
डॉ. कृष्ण गोपाल ने भारतीय चिंतन की परंपरा, गीता के सार्वकालिक संदेश और राष्ट्रजीवन में प्रार्थना के महत्त्व पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि गीता ने विश्व के सामने एक नवीन प्रकार का दर्शन प्रस्तुत किया है। गीता मनुष्य को उसके कर्तव्य का बोध कराती है। उन्होंने कहा कि लेखक ने पुस्तक की कुछ पंक्तियों के माध्यम से उस भाव को जागृत करने का प्रयास किया है, जिसकी आज आवश्यकता है। जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के मोह का निवारण किया था, उसी प्रकार यह पुस्तक स्वयंसेवकों के मन में कर्तव्य और राष्ट्रभाव को जागृत करने का कार्य करेगी।
स्वामी श्री ज्ञानानन्द महाराज ने उपस्थित जनों को गीता के संदेश को अपने जीवन में आत्मसात करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि संघ की प्रार्थना का मूल भाव गीता के संदेश से ही प्रेरित है और उसका उद्देश्य मन पर पड़े अज्ञान के आवरण को दूर करना है। उन्होंने इस संदर्भ में सूर्य और बादलों का उदाहरण देते हुए कहा कि सत्य सदैव विद्यमान रहता है, आवश्यकता केवल उसके आवरण को हटाने की होती है। अपने आशीर्वचन के अंत में उन्होंने उपस्थित सभी लोगों से सामूहिक प्रार्थना कराई तथा लेखक और प्रकाशक को शुभकामनाएं दीं।
कार्यक्रम के अंत में सुरुचि प्रकाशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अंकुर पाठक ने सभी अतिथियों और उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर सुरुचि प्रकाशन के अध्यक्ष राजीव तुली, न्यासी मनमोहन सिंह, सुमित मालूजा और राहुल सिंह सहित शिक्षा, साहित्य, अध्यात्म तथा सामाजिक जीवन से जुड़े अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। अतिथियों ने पुस्तक की विषयवस्तु की सराहना करते हुए इसे भारतीय चिंतन को समझने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कृति बताया। कार्यक्रम का संचालन संपूर्ण बागड़ी ने किया तथा वन्दे मातरम् के सामूहिक गायन के साथ समारोह का समापन हुआ।
दैनिक भास्कर के नेशनल पॉलिटिकल एडिटर धर्मेंद्र भदौरिया ने कहा कि पत्रकारिता का स्वरूप समय के साथ लगातार बदलता रहा है, लेकिन उसका मूल उद्देश्य आज भी वही है- समाज तक सत्य और सही जानकारी पहुंचाना
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
समाचार4मीडिया के 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में दैनिक भास्कर के नेशनल पॉलिटिकल एडिटर धर्मेंद्र भदौरिया ने कहा कि पत्रकारिता का स्वरूप समय के साथ लगातार बदलता रहा है, लेकिन उसका मूल उद्देश्य आज भी वही है- समाज तक सत्य और सही जानकारी पहुंचाना। उन्होंने कहा कि आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के दौर में जहां हर मोबाइल फोन एक न्यूज़रूम बन चुका है और हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में संवाददाता बनने की क्षमता रखता है, वहां मीडिया की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।
धर्मेंद्र भदौरिया ने अपने संबोधन की शुरुआत हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का जिक्र करते हुए की। उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता की जो अलख वर्षों पहले जगी थी, वह आज भी लगातार जल रही है। समय के साथ पत्रकारिता के माध्यम जरूर बदलते गए। पहले अखबार थे, फिर रेडियो आया, उसके बाद टेलीविजन, फिर 24 घंटे के न्यूज चैनल, वेबसाइट, यूट्यूब और पॉडकास्ट का दौर आया और अब एआई का समय है। लेकिन इन तमाम बदलावों के बावजूद पत्रकारिता की मूल भावना नहीं बदली है।
उन्होंने कहा कि आज स्थिति यह है कि हर मोबाइल फोन अपने आप में एक न्यूज़रूम बन गया है और लगभग हर व्यक्ति संवाददाता की भूमिका निभा सकता है। ऐसे समय में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सत्य और असत्य के बीच की दूरी बहुत कम हो गई है। इसलिए मीडिया की जिम्मेदारी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है कि वह लोगों तक प्रमाणिक और सही जानकारी पहुंचाए।
उन्होंने कहा कि एक सवाल अक्सर पूछा जाता है कि आखिर मीडिया की जरूरत क्यों है? मीडिया की भूमिका को लेकर समय-समय पर बहस होती रहती है। मीडिया के पक्ष और विपक्ष में भी चर्चाएं होती हैं, लेकिन इसके बावजूद मीडिया का महत्व आज भी बना हुआ है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इंसान हमेशा कुछ नया जानना चाहता है और वह सत्य को जानना चाहता है। यही जिज्ञासा मीडिया को समाज के लिए हमेशा प्रासंगिक बनाए रखती है।
धर्मेंद्र भदौरिया ने कहा कि उनके विचार से ज्ञान प्राप्त करने के केवल तीन माध्यम हैं। पहला, व्यक्ति स्वयं अलग-अलग स्थानों पर जाकर, लोगों से मिलकर और अनुभव हासिल करके ज्ञान प्राप्त करे। दूसरा, वह गहराई से अध्ययन करे और पढ़े। तीसरा माध्यम मीडिया है, जो इन दोनों का सार निकालकर आम आदमी तक पहुंचाता है। यही कारण है कि मीडिया समाज के लिए इतना महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि आज मीडिया की विश्वसनीयता और उसकी प्रासंगिकता पर सवाल उठाए जाते हैं। हमें यह समझना होगा कि ऐसा क्यों होता है। उनके अनुसार समस्या तब शुरू होती है, जब हम सत्य को उसके वास्तविक स्वरूप में लोगों तक नहीं पहुंचाते, बल्कि उसमें अपने विचार, अपनी विचारधारा, अपने स्वार्थ या बाजार के दबाव को मिला देते हैं। चाहे वह किसी भी विचारधारा का प्रभाव हो या किसी भी तरह का दबाव, यदि सत्य में मिलावट होगी तो लोगों के मन में भ्रम पैदा होगा।
उन्होंने कहा कि यदि मीडिया सत्य को उसी रूप में लोगों के सामने रखे, जैसा वह वास्तव में है, तो लोग मीडिया पर भरोसा करेंगे। मीडिया का महत्व पहले भी था, आज भी है और भविष्य में भी बना रहेगा। इसके लिए हर बार सत्ता या किसी बाहरी तत्व को दोष देना उचित नहीं है। सबसे पहले मीडिया संस्थानों और मीडिया कर्मियों को अपने भीतर झांकना होगा और यह देखना होगा कि वे समाज के सामने कितना सत्य रख पा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता का लगभग 200 वर्षों का इतिहास इस बात का गवाह है कि पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक जिम्मेदारी है। उन्होंने गणेश शंकर विद्यार्थी का उदाहरण देते हुए कहा कि वे पत्रकारिता करते हुए शहीद हो गए। कानपुर के दंगों के दौरान लोगों को बचाने की कोशिश में उन्होंने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। आज भी पूरा देश उन्हें सम्मान के साथ याद करता है।
धर्मेंद्र भदौरिया ने कहा कि महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक जैसे महान नेताओं ने भी समाज को जागरूक करने के लिए मीडिया को ही अपना माध्यम बनाया। इससे स्पष्ट होता है कि पत्रकारिता हमेशा समाज में बदलाव और जनजागरण का सबसे प्रभावी माध्यम रही है।
उन्होंने हाल के जन आंदोलनों का उदाहरण देते हुए कहा कि केवल सोशल मीडिया के सहारे कोई आंदोलन सफल नहीं हो सकता। सोशल मीडिया पर शुरुआत जरूर हो सकती है, लेकिन जब तक मुख्यधारा का मीडिया उसे महत्व नहीं देता, उसका प्रभाव व्यापक नहीं बनता। उन्होंने कहा कि हाल के आंदोलनों में भी यही देखने को मिला कि जब मीडिया ने उन्हें प्रमुखता दी, तभी उनका असर कई गुना बढ़ा और उनकी गूंज संसद तक पहुंची।
युवा पत्रकारों को संदेश देते हुए धर्मेंद्र भदौरिया ने कहा कि पत्रकारिता में सबसे बड़ी जरूरत निष्पक्षता की है। उन्होंने कहा कि यदि पत्रकारिता में किसी भी तरह की 'मिलावट' होगी- चाहे वह सत्ता के पक्ष में हो, विपक्ष के पक्ष में हो, दक्षिणपंथ या वामपंथ के पक्ष में हो- तो पत्रकारिता की विश्वसनीयता कम होती जाएगी। जितनी कम मिलावट होगी, मीडिया की प्रासंगिकता उतनी ही मजबूत रहेगी।
उन्होंने कहा कि कार्यक्रम में अब तक अधिकांश वक्ताओं ने टीवी पत्रकारिता के नजरिए से अपनी बात रखी है, जबकि वह अखबार का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि दैनिक भास्कर आज भी पूरी कोशिश करता है कि पाठकों तक सत्य और तथ्य आधारित खबरें पहुंचाई जाएं। उन्होंने स्वीकार किया कि कभी-कभी खबरों में छोटी-मोटी त्रुटियां हो सकती हैं, लेकिन संस्थान का प्रयास हमेशा सच को सामने लाने का रहता है और आगे भी रहेगा।
मीडिया के भविष्य को लेकर उन्होंने कहा कि निराश होने की कोई जरूरत नहीं है। मीडिया का महत्व पहले भी था, आज भी है और आगे भी रहेगा। उन्होंने जापान का उदाहरण देते हुए कहा कि वह दुनिया के सबसे तकनीकी रूप से उन्नत देशों में से एक है, लेकिन वहां आज भी अखबार सबसे ज्यादा पढ़े जाते हैं। भारत में भी करोड़ों लोगों के हाथ में मोबाइल होने के बावजूद हजारों अखबार प्रकाशित हो रहे हैं और लाखों प्रतियां बिक रही हैं। इससे साफ है कि लोग आज भी विश्वसनीय जानकारी और सत्य जानना चाहते हैं।
अपने संबोधन के अंत में धर्मेंद्र भदौरिया ने कहा कि जब तक मीडिया लोगों को ज्ञान और सत्य उपलब्ध कराता रहेगा, तब तक उसकी प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं होगी। उन्होंने युवा पत्रकारों से आग्रह किया कि वे निष्पक्षता, ईमानदारी और सत्य को अपनी पत्रकारिता का आधार बनाएं। उन्होंने विश्वास जताया कि पत्रकारिता का भविष्य आज भी उतना ही उज्ज्वल है, जितना पहले था।
समाचार4मीडिया के प्रतिष्ठित कार्यक्रम 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' में इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी के पूर्व अध्यक्ष राकेश शर्मा ने भारतीय पत्रकारिता के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर विस्तार से अपने विचार रखे।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
समाचार4मीडिया के प्रतिष्ठित कार्यक्रम 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' में इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी (INS) के पूर्व अध्यक्ष राकेश शर्मा ने भारतीय पत्रकारिता के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर विस्तार से अपने विचार रखे। करीब 50 वर्षों के अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि मीडिया जगत में समय के साथ बड़े बदलाव आए हैं, लेकिन पत्रकारिता का मूल उद्देश्य आज भी वही है- समाज और लोकतंत्र को मजबूत करना। उन्होंने जोर देकर कहा कि मीडिया संस्थानों को हर फैसले के केंद्र में पाठक और दर्शक को रखना होगा, तभी इस इंडस्ट्री का भविष्य सुरक्षित रह सकेगा।
अपने संबोधन की शुरुआत में राकेश शर्मा ने कहा कि वह पिछले पांच दशकों से इस इंडस्ट्री का हिस्सा रहे हैं और इस दौरान उन्होंने पत्रकारिता के कई दौर देखे हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की असली ताकत विचारों की स्वतंत्रता में है। लोकतंत्र में सहमति और असहमति दोनों का समान महत्व है और समाचार पत्रों का पहला दायित्व लोगों के सामने तथ्यों और विचारों को खुलकर रखना है। उन्होंने कहा कि उन्हें सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', राजेंद्र माथुर, रघुवीर सहाय, गिरिलाल जैन, श्यामलाल, खुशवंत सिंह और इंदर मल्होत्रा जैसे दिग्गज संपादकों के साथ काम करने का अवसर मिला। उनका कहना था कि वह ऐसा दौर था, जब संपादकों की अपनी अलग पहचान होती थी, जबकि आज स्थिति काफी बदल चुकी है और कई लोग अपने पसंदीदा मीडिया संस्थान के संपादक का नाम भी नहीं जानते।
कार्यक्रम के दौरान राकेश शर्मा ने मंच पर उनसे पहले वक्ताओं द्वारा रखे गए कुछ विचारों पर भी अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि वह सुमित अवस्थी द्वारा आंदोलन से जुड़ी कही गई बातों से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वह स्वयं सातों दिन जंतर-मंतर पर मौजूद थे और इसलिए सोशल मीडिया या दूसरे माध्यमों के बजाय अपने प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर अपनी बात रख रहे हैं। उन्होंने आंदोलन और वहां मौजूद लोगों को लेकर कई दावे किए और कहा कि उनके अनुसार वहां बड़ी संख्या में राजनीतिक और अन्य समूहों से जुड़े लोग मौजूद थे। उन्होंने यह भी कहा कि पत्रकारों पर हमले, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और पुलिस पर हमले जैसी घटनाएं भी हुईं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि कुछ छात्र वहां जरूर मौजूद थे, लेकिन उनके अनुसार अधिकांश लोग छात्र नहीं थे। यह सभी बातें उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव और दृष्टिकोण के आधार पर कहीं।
इसके बाद उन्होंने कार्यक्रम के मुख्य विषय 'मीडिया: कल, आज और कल' पर बोलते हुए भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब भारत में समाचार पत्रों की शुरुआत हुई थी, तब पत्रकारिता एक मिशन हुआ करती थी। उस समय अखबारों का उद्देश्य केवल खबरें प्रकाशित करना नहीं था, बल्कि देश को आजादी दिलाने के आंदोलन को मजबूत करना भी था। उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे भारतीय अखबार गांव-गांव तक आजादी का संदेश पहुंचाने का काम करते थे, जबकि कुछ अंग्रेजी अखबार अंग्रेजों के हितों के लिए काम कर रहे थे। आजादी के बाद पत्रकारिता ने देश निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राकेश शर्मा ने आपातकाल का जिक्र करते हुए कहा कि वह ऐसा दौर था, जब अखबारों के पहले पन्ने सरकार की मंजूरी के बाद ही प्रकाशित होते थे। उन्होंने बताया कि शाम के समय अखबारों के फ्रंट पेज शास्त्री भवन ले जाए जाते थे, जहां यह तय होता था कि कौन-सी खबर छपेगी और कौन-सी नहीं। उन्होंने कहा कि उस समय भी कई संपादकों ने सेंसरशिप का विरोध अपने तरीके से किया और उन्होंने संपादकीय कॉलम खाली छोड़ दिए। उनके मुताबिक वह पत्रकारिता के साहस और प्रतिबद्धता का दौर था। उन्होंने जनसत्ता के शुरुआती दिनों का भी जिक्र किया और कहा कि उस समय विश्वसनीय पत्रकारिता की वजह से अखबारों की मांग इतनी अधिक होती थी कि कई बार प्रतियां कम पड़ जाती थीं।
उन्होंने कहा कि आज का मीडिया पूरी तरह बदल चुका है। डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने लोगों की जिंदगी बदल दी है। अब दुनिया भर की खबरें लोगों के मोबाइल फोन पर हर समय उपलब्ध रहती हैं। पहले लोग रात में दूरदर्शन देखने के बाद अगली सुबह अखबार का इंतजार करते थे, लेकिन अब हर जानकारी तुरंत मिल जाती है। उन्होंने कहा कि बदलती जीवनशैली की वजह से लोगों के पास सुबह अखबार पढ़ने का समय भी कम होता जा रहा है। बड़े शहरों में लोग लंबी दूरी तय करके दफ्तर जाते हैं और ऐसे में अखबार पढ़ना उनकी प्राथमिकता नहीं रह गया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब किसी व्यक्ति के पास पहले से सारी जानकारी उपलब्ध है, तो वह केवल जानकारी के लिए अखबार पर पैसे क्यों खर्च करेगा।
राकेश शर्मा ने कहा कि हाल ही में एक इंडस्ट्री बैठक के दौरान अखबारों की घटती प्रसार संख्या और बढ़ती लागत पर चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि न्यूज़प्रिंट, स्याही और प्लेट जैसी जरूरी चीजों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, इसलिए राजस्व बढ़ाने के लिए विज्ञापन पर सरचार्ज लगाने जैसे सुझाव भी सामने आए। हालांकि उन्होंने इस सोच पर सवाल उठाया और कहा कि समस्या केवल कीमत की नहीं है। उनके अनुसार असली सवाल यह है कि आखिर पाठक अखबारों से दूर क्यों जा रहे हैं। उनका कहना था कि यदि कोई अखबार पाठकों के लिए वास्तव में उपयोगी और प्रासंगिक सामग्री देगा, तो लोग उसे अधिक कीमत देकर भी खरीदेंगे। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ अखबार कम कीमत पर अखबार के साथ कई तरह के प्रोत्साहन (इंसेंटिव) देते हैं, लेकिन फिर भी यह समझना जरूरी है कि पाठकों का ध्यान अखबारों से क्यों हट रहा है।
उन्होंने कहा कि 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद विज्ञापन बाजार तेजी से बढ़ा और कई बड़े मीडिया संस्थानों ने बेहद कम कीमत पर अखबार बेचने की रणनीति अपनाई। इससे बड़े संस्थानों को तो फायदा हुआ, लेकिन छोटे और मेहनती अखबारों को नुकसान उठाना पड़ा। उन्होंने कहा कि आज भी कई छोटे समाचार पत्र इसी वजह से संघर्ष कर रहे हैं।
राकेश शर्मा ने कहा कि आज पाठकों के पास खबरें हासिल करने के कई माध्यम हैं। इसलिए अब केवल खबर देना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि मीडिया संस्थानों को यह समझना होगा कि पाठक किसी खबर के पीछे की पूरी कहानी, उसका कारण और उसके प्रभाव को भी जानना चाहता है। उन्होंने इसे 'एक्सप्लेनेटरी जर्नलिज्म' की जरूरत बताते हुए कहा कि यही भविष्य की पत्रकारिता है। उन्होंने कहा कि पाठक यह जानना चाहता है कि किसी घटना का उसके जीवन, उसके शहर और देश पर क्या असर पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि मीडिया इंडस्ट्री को गंभीरता से यह अध्ययन करना चाहिए कि पाठकों का ध्यान अखबारों से क्यों हट रहा है और उन्हें वापस कैसे जोड़ा जा सकता है। उनका कहना था कि विज्ञापन हमेशा वहीं जाते हैं, जहां पाठक और दर्शक मौजूद होते हैं। यदि पाठक नहीं होंगे तो विज्ञापन भी नहीं होंगे। इसलिए मीडिया संस्थानों को सबसे पहले अपने पाठकों की जरूरतों और अपेक्षाओं को समझना होगा।
अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा कि समाचार कभी खत्म नहीं होंगे, लेकिन उन्हें पहुंचाने के माध्यम लगातार बदलते रहेंगे। उन्होंने कहा कि जिस तरह आज अखबार डिजिटल माध्यमों की चुनौती का सामना कर रहे हैं, उसी तरह भविष्य में टेलीविजन और डिजिटल मीडिया के सामने भी नई चुनौतियां आएंगी। उन्होंने सोशल मीडिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि वहां हर व्यक्ति अपनी सोच और विचारधारा के अनुसार लिखता है। ऐसे में किसी भी जानकारी की सच्चाई समझने के लिए लोगों को खुद विश्लेषण करना होगा। उन्होंने कहा कि चाहे पत्रकार प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल या भविष्य में आने वाले किसी भी नए माध्यम में काम करें, उन्हें हमेशा तथ्यों की गहराई में जाकर पाठकों और दर्शकों को सही जानकारी देनी होगी।
अपने संबोधन के अंत में राकेश शर्मा ने कहा कि मीडिया के सामने चाहे जितनी भी तकनीकी चुनौतियां आएं, एक बात कभी नहीं बदलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हर मीडिया संस्थान को अपने हर फैसले में पाठक और दर्शक को केंद्र में रखना होगा। यदि पत्रकारिता लोगों की जरूरतों के अनुरूप खुद को बदलती रहेगी, तो उसका भविष्य हमेशा सुरक्षित रहेगा। उन्होंने कहा कि यह ऐसा विषय है, जिस पर लंबे समय तक चर्चा की जा सकती है और वह आज भी अपने अनुभव नई पीढ़ी के पत्रकारों के साथ साझा करते रहते हैं।
इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) की ओर से 22 जुलाई को जारी की गई एडवाइजरी, जिसमें सदस्य प्रकाशनों से 1 अगस्त से विज्ञापनों पर 15% सरचार्ज लगाने की सिफारिश की गई है
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) की ओर से 22 जुलाई को जारी की गई एडवाइजरी, जिसमें सदस्य प्रकाशनों से 1 अगस्त से विज्ञापनों पर 15% सरचार्ज लगाने की सिफारिश की गई है, अब सिर्फ बढ़ती न्यूजप्रिंट लागत का मामला नहीं रह गया है। इस फैसले ने पूरे मीडिया और विज्ञापन उद्योग में नई बहस छेड़ दी है।
जहां प्रकाशकों का कहना है कि यह कदम लगातार बढ़ रही लागत को देखते हुए उठाया गया है, वहीं विज्ञापनदाता और मीडिया एजेंसियों से जुड़े कई विशेषज्ञ एक बड़े सवाल पर चर्चा कर रहे हैं। उनका कहना है कि क्या किसी उद्योग संगठन को पूरे बाजार के लिए एक समान सरचार्ज की सिफारिश करनी चाहिए, जबकि अब तक विज्ञापन दरें हमेशा प्रकाशकों और विज्ञापनदाताओं के बीच अलग-अलग बातचीत के आधार पर तय होती रही हैं?
सरकारी सरचार्ज की तरह INS की यह सिफारिश कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है, बल्कि सलाह के रूप में जारी की गई है। लेकिन सदस्य प्रकाशनों से एक समान 15% सरचार्ज लागू करने का आग्रह किए जाने से यह सवाल उठने लगा है कि क्या किसी उद्योग संगठन को व्यावसायिक कीमतों को प्रभावित करने वाली ऐसी सिफारिश करनी चाहिए?
विशेषज्ञों का कहना है कि अखबारों में विज्ञापन दरें हर प्रकाशन के अनुसार अलग होती हैं। इनमें भौगोलिक क्षेत्र, पाठकों की संख्या, पाठकों की प्रोफाइल, विज्ञापन की उपलब्ध जगह (इन्वेंट्री) और विज्ञापन की मांग जैसे कई कारक शामिल होते हैं। ऐसे में एक समान सरचार्ज की सिफारिश बाजार की मौजूदा व्यवस्था से अलग मानी जा रही है।
एक बड़ी उपभोक्ता वस्तु (FMCG) कंपनी के विज्ञापनदाता ने कहा कि चिंता सिर्फ अतिरिक्त 15% भुगतान की नहीं है, बल्कि उस सिद्धांत की है, जिस पर यह फैसला आधारित है।
उन्होंने कहा, "अब तक विज्ञापन हर अखबार के साथ अलग-अलग बातचीत के आधार पर खरीदे जाते रहे हैं। हर अखबार अपनी पाठक संख्या, बाजार में स्थिति और गुणवत्ता के आधार पर अलग कीमत तय करता है। ऐसे में एक समान सरचार्ज इस पूरी प्रक्रिया की प्रकृति बदल देता है।"
भसीन कंसल्टिंग ग्रुप के फाउंडर और डेंट्सू एशिया पैसिफिक के पूर्व सीईओ आशीष भसीन का मानना है कि कीमत तय करने का अंतिम अधिकार बाजार के पास ही होना चाहिए।
उन्होंने कहा, "कोई भी प्रकाशन 15% सरचार्ज वसूल पाएगा या नहीं, यह पूरी तरह मांग और आपूर्ति पर निर्भर करेगा। अगर कोई प्रकाशन अपनी बेहतर ऑडियंस, पाठक संख्या, कंटेंट और प्रभाव के आधार पर अधिक कीमत को सही ठहरा सकता है, तो मीडिया खरीदार उसे भुगतान करेंगे। लेकिन कीमत तय करना आदर्श रूप से खरीदार और विक्रेता के बीच का फैसला होना चाहिए, किसी तीसरे पक्ष द्वारा तय नहीं किया जाना चाहिए।"
उनकी टिप्पणी विज्ञापन उद्योग की उस व्यापक सोच को दर्शाती है, जिसके अनुसार प्रकाशक अपनी व्यावसायिक शर्तें बदलने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन कीमतें हमेशा बाजार की ताकतों और आपसी बातचीत से तय होती रही हैं, न कि सामूहिक सिफारिशों के आधार पर।
दरअसल, अखबारों में विज्ञापन दरें कई कारकों के आधार पर तय होती हैं। इनमें प्रसार संख्या (सर्कुलेशन), पाठकों की प्रोफाइल, संपादकीय स्थिति, विभिन्न श्रेणियों में विज्ञापन की मांग, उपलब्ध विज्ञापन स्थान और लंबे समय से चले आ रहे व्यावसायिक संबंध शामिल हैं। इसलिए एजेंसियों का कहना है कि अलग-अलग मूल्य वाले इस बाजार में एक समान सरचार्ज को लागू करना व्यावहारिक नहीं लगता।
हालांकि INS की एडवाइजरी अनिवार्य नहीं है। हर प्रकाशक यह तय करने के लिए स्वतंत्र है कि वह सरचार्ज लागू करेगा या नहीं और यदि करेगा तो किस तरह करेगा। इसके बावजूद इस सिफारिश ने चर्चा को केवल प्रिंट मीडिया की आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं रहने दिया है।
हालांकि सभी लोग इसे उद्योग संगठन की सीमा से बाहर का कदम नहीं मानते।
रेडिफ्यूजन के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. संदीप गोयल का कहना है कि उद्योग संगठनों की जिम्मेदारी होती है कि वे अपने सदस्यों को समान आर्थिक चुनौतियों से निपटने में मदद करें।
उन्होंने कहा, "उद्योग संगठनों के पास ऐसा करने का अधिकार होता है। यदि यह उद्योग स्तर पर सामूहिक पहल नहीं होती, तो अलग-अलग अखबार अपने स्तर पर इस तरह का सरचार्ज लागू नहीं कर पाते।"
क्या CCI कर सकती है जांच?
इस पूरे मामले को लेकर अब कानूनी पहलुओं पर भी चर्चा शुरू हो गई है। कुछ कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तरह की सिफारिश का सामूहिक रूप से पालन किया गया तो यह भारतीय प्रतिस्पर्धा कानून (Competition Law) के दायरे में आ सकता है।
राजस्थान हाई कोर्ट के अधिवक्ता तपेश्वर पाल सिंह परमार का कहना है कि व्यापारिक संगठन अपने सदस्यों के हितों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, लेकिन यदि वे एक समान कीमत तय करने या उसकी सिफारिश करने लगें तो यह प्रतिस्पर्धा कानून के तहत गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।
उन्होंने कहा, "विज्ञापन दरें सामान्य रूप से बाजार की ताकतों और प्रकाशकों तथा विज्ञापनदाताओं के बीच बातचीत से तय होती हैं। यदि सभी प्रकाशक एक समान सरचार्ज लागू करते हैं तो इससे कीमतों में प्रतिस्पर्धा कम हो सकती है। विज्ञापनदाताओं की मोलभाव करने की क्षमता भी प्रभावित होगी, जिससे उनकी मार्केटिंग लागत बढ़ सकती है। अंततः इसका असर उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है, क्योंकि कंपनियां बढ़ी हुई लागत को अपने उत्पादों और सेवाओं की कीमतों में जोड़ सकती हैं।"
उन्होंने आगे कहा कि यदि यह साबित होता है कि सरचार्ज को सामूहिक रूप से लागू किया गया या इसे लागू कराने के लिए सामूहिक प्रयास किए गए, तो भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) यह जांच कर सकता है कि कहीं यह कार्टेल बनाने (Cartelisation) या प्रतिस्पर्धा विरोधी गतिविधि (Anti-competitive Coordination) का मामला तो नहीं है।
इसी तरह लॉ फर्म AQUILAW के संस्थापक साझेदार और मीडिया संस्थान Ei Samay एवं Himalaya Darpan के मेंटर संजय बसु का भी मानना है कि INS द्वारा 1 अगस्त 2026 से पूरे देश में एक समान 15% सरचार्ज लागू करने की सिफारिश प्रतिस्पर्धा कानून के प्रावधानों के तहत जांच का विषय बन सकती है।
उन्होंने कहा, "कानूनी दृष्टि से देखें तो प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा 3(3)(a) स्पष्ट रूप से कहती है कि यदि एक ही प्रकार के कारोबार से जुड़े उद्यम या उनके संगठन किसी ऐसे निर्णय पर पहुंचते हैं, जो सीधे या परोक्ष रूप से बिक्री मूल्य को प्रभावित करता है, तो यह माना जा सकता है कि उसका बाजार में प्रतिस्पर्धा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। ऐसे मामलों में कार्टेल बनने का जोखिम भी माना जाता है।"
बसु ने यह भी कहा कि INS का सबसे बड़ा बचाव यह हो सकता है कि उसकी सिफारिश केवल सलाह है, कोई अनिवार्य आदेश नहीं। लेकिन उन्होंने याद दिलाया कि CCI पहले भी ऐसे तर्कों को कई मामलों में खारिज कर चुकी है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि 1 जुलाई 2025 को Pranav Gupta बनाम Federation of Publishers' and Booksellers' Association in India मामले में CCI ने सिर्फ सुझाव के रूप में तय की गई कीमतों को भी प्राइस फिक्सिंग माना था और संबंधित संगठन पर 6 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले हफ्तों में प्रकाशक इस 15% सरचार्ज को एक समान तरीके से लागू करते हैं या पहले की तरह विज्ञापनदाताओं के साथ अलग-अलग बातचीत कर कीमत तय करते हैं। लेकिन इतना तय है कि INS की इस एडवाइजरी ने यह बहस जरूर तेज कर दी है कि उद्योग संगठन की भूमिका कहां तक होनी चाहिए और बाजार की स्वतंत्र व्यवस्था कहां से शुरू होती है।
KS Legal & Associates की मैनेजिंग पार्टनर सोनम चंदवानी का कहना है कि व्यापारिक संगठनों की भूमिका उद्योग के हितों की रक्षा करना है, लेकिन जब बात कीमत तय करने की हो तो उन्हें बेहद सावधानी बरतनी चाहिए।
उन्होंने कहा, "विज्ञापन दर तय करना मूल रूप से एक व्यावसायिक फैसला है और प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था में यह अधिकार हर प्रकाशक के पास अलग-अलग रहना चाहिए।"
उन्होंने यह भी कहा कि केवल इस एडवाइजरी के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि यह कार्टेल बनाने का मामला है। असली सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ उद्योग की सामूहिक चिंता व्यक्त करती है या फिर यह सदस्यों को एक समान मूल्य अपनाने के लिए प्रेरित करती है। यदि प्रतिस्पर्धी संस्थाएं स्वतंत्र रूप से कीमत तय करना छोड़कर एक साथ निर्णय लेने लगती हैं, तो निश्चित रूप से प्रतिस्पर्धा कानून के तहत सवाल खड़े हो सकते हैं।