होम / प्रिंट / रीडरशिप सर्वे की बहाली के लिए MRUC विज्ञापनदाताओं से ले सकता है मदद
रीडरशिप सर्वे की बहाली के लिए MRUC विज्ञापनदाताओं से ले सकता है मदद
2020 से रुकी हुई इंडियन रीडरशिप सर्वे को फिर शुरू करने की संभावनाएं नजर आ रही हैं। मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल इंडिया अब इस सर्वे के लिए विज्ञापनदाताओं को साथ जोड़कर फंडिंग का रास्ता तलाश रहा है
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 10 months ago
कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर व ग्रुप एडिटोरियल इवैन्जिलिस्ट, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
2020 से रुकी हुई इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) को एक बार फिर शुरू करने की संभावनाएं नजर आ रही हैं। मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल (MRUC) इंडिया अब इस सर्वे के लिए विज्ञापनदाताओं को साथ जोड़कर फंडिंग का रास्ता तलाश रहा है।
MRUC के एक वरिष्ठ बोर्ड सदस्य ने 'एक्सचेंज4मीडिया' को बताया, 'मीडिया हाउस इस सालाना रीडरशिप सर्वे की लागत उठाने को तैयार नहीं हैं, ऐसे में विज्ञापनदाताओं से मदद ली जा सकती है ताकि फाइनेंशियल बोझ साझा किया जा सके।'
इस साल फरवरी में MRUC ने अपनी टेक्निकल कमेटी को निर्देश दिया था कि वह IRS के प्रश्नपत्र की समीक्षा करे और सर्वे के लिए किसी एजेंसी को शॉर्टलिस्ट करे। पिछले दो महीनों में पूरी योजना बना ली गई है।
एक अन्य बोर्ड सदस्य ने कहा, 'हम सर्वे शुरू करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते मीडिया मालिक फंडिंग में योगदान दें। हालांकि कई मीडिया हाउस ने भुगतान में असमर्थता जताई है। उनका कहना है कि पिछले दो वर्षों में विज्ञापन बाजार कमजोर रहा है, जिससे राजस्व पर असर पड़ा है। ऐसे में हम अब विज्ञापनदाताओं से फंडिंग पर विचार कर सकते हैं, क्योंकि सर्वे का लाभ उन्हें भी मिलेगा।'
कोविड के बाद पहली रीडरशिप स्टडी
यह प्रस्तावित सर्वे कोविड के बाद का पहला IRS होगा, जो मीडिया इंडस्ट्री पर व्यापक असर डाल सकता है। बीते वर्षों में डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म्स की ओर रुझान बढ़ने से पारंपरिक मीडिया का रीडरशिप बेस घटा है। वहीं, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की आमदनी लगातार बढ़ रही है, जिससे इंडस्ट्री की संरचना बदल रही है।
एक मीडिया मालिक ने कहा, 'पिछले पांच वर्षों से IRS नहीं होने के चलते बाजारियों को आंख मूंदकर फैसले लेने पड़े हैं। वे इस सर्वे को वापस लाना चाहते हैं, लेकिन कोविड के बाद प्रिंट मीडिया की स्थिति बदल गई है, जिससे पब्लिशर सर्वे के नतीजों को लेकर आशंकित हैं। अगर हमें प्रिंट इंडस्ट्री को आगे ले जाना है तो यह गतिरोध खत्म करना जरूरी है।'
फंडिंग बनी सबसे बड़ी चुनौती
पहले, मीडिया मालिकों ने 2019 के कॉस्ट शेयरिंग मॉडल को बनाए रखने पर सहमति जताई थी, जिसमें योगदान प्रिंट सर्कुलेशन के आधार पर तय किया गया था। लेकिन आगामी सर्वे की लागत ₹20 करोड़ से अधिक होने का अनुमान है, जो 2019 में खर्च हुई राशि से ज्यादा है। मौजूदा आर्थिक दबावों के चलते यह फंडिंग बड़ी रुकावट बन गई है।
MRUC अब विभिन्न वित्तीय विकल्पों पर विचार कर रहा है, जिनमें विज्ञापनदाता अहम भूमिका निभा सकते हैं। इन चर्चाओं का नतीजा ही तय करेगा कि IRS का भविष्य क्या होगा।
IRS के अलावा, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा रीडरशिप सर्वे माना जाता है और जो भारत में प्रिंट मीडिया की "आधिकारिक करेंसी" भी है, MRUC ने इंडियन आउटडोर सर्वे (IOS) और इंडियन लिसनरशिप ट्रैक (ILT) जैसे इनिशिएटिव्स भी शुरू किए हैं।
e4m की एक पूर्व रिपोर्ट के अनुसार, मीडिया मालिकों ने 2019 के समान ही कॉस्ट शेयरिंग फॉर्मूला लागू करने पर सहमति जताई थी, जिसमें हिस्सेदारी प्रिंट सर्कुलेशन के अनुसार तय की जाती थी। हालांकि MRUC ने योगदान जमा करने की कोई समयसीमा तय नहीं की थी।
काउंसिल के एक सदस्य ने कहा, 'भले ही पैसे इकट्ठा हो जाएं, MRUC को सर्वे एजेंसी फाइनल करने में कम से कम छह महीने लगेंगे। इसका मतलब है कि यह सर्वे साल के अंत से पहले शुरू नहीं हो सकेगा।'
पाठक आंकड़े: विज्ञापनदाताओं के लिए अहम
आखिरी बार IRS 2019 में हुआ था। 2020 में यह सर्वे पहले महामारी और फिर लागत संबंधी चिंताओं व स्टेकहोल्डर्स की घटती दिलचस्पी के चलते रुक गया था। कई अखबार, खासतौर पर अंग्रेजी डेली, आज भी सर्कुलेशन और राजस्व में महामारी से पहले की स्थिति तक नहीं पहुंच सके हैं।
IRS, जिसे MRUC इंडिया और रीडरशिप स्टडीज काउंसिल ऑफ इंडिया (RSCI) मिलकर करते हैं, एक समय दुनिया का सबसे बड़ा सतत सर्वे माना जाता था, जिसमें हर साल 2.56 लाख से ज्यादा प्रतिभागी शामिल होते थे।
यह सर्वे विज्ञापनदाताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके आंकड़े तय करते हैं कि कौन-से अखबारों में विज्ञापन दिए जाएं। IRS भारत में प्रिंट व मीडिया खपत, डेमोग्राफिक्स, प्रोडक्ट ओनरशिप और 100 से ज्यादा प्रोडक्ट कैटेगरीज के उपयोग की जानकारी देता है।
डिजिटल की चुनौती में घिरा प्रिंट
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के वर्चस्व वाले मौजूदा परिदृश्य में प्रिंट मीडिया पर बदलाव का दबाव लगातार बढ़ रहा है। कई अखबारों ने सर्कुलेशन में 15–20% की कटौती की है और घाटे वाले संस्करणों को बंद कर दिया है। हाल के महीनों में प्रिंट विज्ञापनों से राजस्व में थोड़ी वृद्धि जरूर देखी गई है, लेकिन यह विज्ञापन दरों में गिरावट के चलते है, न कि ब्रैंड्स के कुल विज्ञापन खर्च में वृद्धि के कारण।
वर्तमान में प्रिंट मीडिया देश के कुल विज्ञापन खर्च का केवल 20% हिस्सा प्राप्त कर रहा है, जबकि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स 44% और टेलीविजन 32% हिस्सा लेते हैं।
इंडस्ट्री एक्सपर्ट मानते हैं कि अगर पाठक संख्या से जुड़ा विश्वसनीय और अपडेटेड डेटा उपलब्ध हो तो विज्ञापनदाता प्रिंट में अपने बजट का बड़ा हिस्सा लगाने को तैयार हो सकते हैं।
टैग्स