'फिल्मसिटी मीडिया' ने ₹1.90 करोड़ के फंड का दिया हिसाब, इस्तेमाल में नहीं मिली कोई गड़बड़ी

फिल्मसिटी मीडिया लिमिटेड (Filmcity Media Limited) ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में प्रेफरेंशियल इश्यू के जरिए जुटाई गई रकम के इस्तेमाल को लेकर स्टॉक एक्सचेंज को जानकारी दी है।

Vikas Saxena by
Published - Friday, 06 November, 2026
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Friday, 06 November, 2026
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फिल्मसिटी मीडिया लिमिटेड (Filmcity Media Limited) ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में प्रेफरेंशियल इश्यू के जरिए जुटाई गई रकम के इस्तेमाल को लेकर स्टॉक एक्सचेंज को जानकारी दी है। कंपनी ने बताया है कि 30 सितंबर 2026 को समाप्त तिमाही के दौरान फंड के इस्तेमाल में कोई बदलाव या गड़बड़ी नहीं हुई है। इस संबंध में कंपनी की ऑडिट कमेटी ने भी रिपोर्ट की समीक्षा की है।

कंपनी ने प्रेफरेंशियल इश्यू के जरिए कुल 1.90 करोड़ रुपये जुटाए थे। इस रकम का इस्तेमाल तीन कामों के लिए किया जाना था। इनमें फाइनेंस और इन्वेस्टमेंट कंसल्टिंग के क्षेत्र में नया कारोबार शुरू करना, प्रमोटर और प्रमोटर ग्रुप से लिए गए कर्ज को चुकाना और सामान्य कॉरपोरेट जरूरतें शामिल थीं।

कंपनी की ओर से नियुक्त मॉनिटरिंग एजेंसी एक्यूइट रेटिंग्स एंड रिसर्च (Acuité Ratings & Research) की रिपोर्ट के मुताबिक, 30 सितंबर 2026 तक कुल 69.20 लाख रुपये का इस्तेमाल किया गया था, जबकि 1.208 करोड़ रुपये अभी खर्च नहीं किए गए थे।

रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने प्रमोटर और प्रमोटर ग्रुप से लिए गए 60 लाख रुपये के कर्ज का पूरा भुगतान कर दिया है। वहीं, सामान्य कॉरपोरेट जरूरतों के लिए 9.20 लाख रुपये खर्च किए गए हैं। फाइनेंस और इन्वेस्टमेंट कंसल्टिंग का नया कारोबार शुरू करने के लिए तय 82.50 लाख रुपये में से अभी कोई रकम खर्च नहीं की गई है। कंपनी इस कारोबार के लिए फंड के इस्तेमाल से जुड़े इंतजामों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है।

बैंक की एफडी में रखी गई है ज्यादातर बची रकम

मॉनिटरिंग एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, इस्तेमाल नहीं की गई रकम में से 1.205 करोड़ रुपये आईसीआईसीआई बैंक की फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) में रखे गए हैं। इसके अलावा 3 लाख रुपये बैंक खाते में हैं। कंपनी ने बताया है कि बची हुई रकम का इस्तेमाल तय योजना के अनुसार 30 सितंबर 2027 तक किया जाएगा।

कंपनी ने स्पष्ट किया है कि जुटाई गई रकम का इस्तेमाल उन्हीं उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है, जिनकी जानकारी इश्यू के दस्तावेजों में दी गई थी। मॉनिटरिंग एजेंसी ने भी अपनी रिपोर्ट में किसी तरह के बदलाव या विचलन की बात नहीं कही है।

 

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छह साल बाद फिर लौटेगा इंडियन रीडरशिप सर्वे, MRUCI ने तैयार किया नया रोडमैप

IRS को दो चरणों में लागू किया जाएगा। पहले चरण में दो राज्यों को शामिल किया जाएगा, जिनमें एक मेट्रो शहर भी होगा। इसके बाद सर्वे का विस्तार बाकी बाजारों तक किया जाएगा।

Samachar4media Bureau by
Published - Friday, 06 November, 2026
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Friday, 06 November, 2026
IRS

‘मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल इंडिया’ (MRUCI) ने अपने प्रमुख रीडरशिप मापन अध्ययन ‘इंडियन रीडरशिप सर्वे’ (IRS) को छह साल के अंतराल के बाद फिर से शुरू करने की तैयारी की है। यह सर्वे आखिरी बार 2020 की शुरुआत में जारी किया गया था। इसके बाद कोविड-19 महामारी के दौरान इसे रोक दिया गया था। अब नए स्वरूप में इसकी वापसी ऐसे समय में हो रही है, जब मीडिया और विज्ञापन जगत को पाठकों की संख्या, उनकी पसंद और मीडिया उपभोग से जुड़े भरोसेमंद आंकड़ों की जरूरत है।

नए स्वरूप वाले IRS के लिए सर्वे की रूपरेखा और पद्धति की विस्तृत समीक्षा की गई है। इसमें सैंपल साइज को तर्कसंगत बनाया गया है और सर्वे की डिजाइन में बदलाव किए गए हैं। इसका एक प्रमुख उद्देश्य संपन्न और अति-संपन्न परिवारों का बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, ताकि सर्वे से मिलने वाले आंकड़े अधिक व्यापक और वास्तविक तस्वीर पेश कर सकें।

इस बार सर्वे में पारंपरिक मीडिया के साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पाठकों की संख्या और उनकी पहुंच को भी मापा जाएगा। इसके तहत ऐप्स, ई-पेपर्स, वेबसाइट्स और ऑनलाइन एडिशन पर पाठकों के व्यवहार का अध्ययन किया जाएगा। इसके जरिए प्रिंट और डिजिटल, दोनों माध्यमों को शामिल करते हुए भारत का सबसे बड़ा सिंगल-सोर्स क्रॉस-मीडिया मापन उपलब्ध कराने की योजना है।

सर्वे की एक अहम पहल प्रस्तावित मीडिया क्वालिटी एंड इम्पैक्ट मेट्रिक भी है। इसके तहत मीडिया के प्रभाव का आकलन केवल उसकी पहुंच (रीच) के आधार पर नहीं, बल्कि भरोसे और दर्शकों-पाठकों के ध्यान जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखकर किया जाएगा। MRUCI की तकनीकी समिति इस दिशा में काम कर रही है और इस पहल के लिए IRS के रिसर्च पार्टनर Inteliphyle की ओर से किए गए शुरुआती काम को आगे बढ़ा रही है। इसका उद्देश्य मीडिया की प्रभावशीलता और उसकी वास्तविक उपयोगिता को बेहतर ढंग से समझना और अलग-अलग माध्यमों के बीच सार्थक तुलना को संभव बनाना है।

IRS को दो चरणों में लागू किया जाएगा। पहले चरण में दो राज्यों को शामिल किया जाएगा, जिनमें एक मेट्रो शहर भी होगा। इसके बाद सर्वे का विस्तार बाकी बाजारों तक किया जाएगा। इससे पहले एक छोटे स्तर पर प्री-पायलट किया जाएगा, जिसमें सर्वे की डिजाइन के प्रमुख पहलुओं की जांच की जाएगी, ताकि उनकी मजबूती और विश्वसनीयता का आकलन हो सके। पहले चरण की रिपोर्ट सर्वे शुरू होने के छह महीने के भीतर आने की उम्मीद है। इस रिपोर्ट का खर्च MRUCI उठाएगा।

इस सर्वे के लिए MRUCI ने Inteliphyle को रिसर्च एजेंसी नियुक्त किया है। MRUCI की तकनीकी समिति के साथ विचार-विमर्श के बाद Inteliphyle ने प्रस्ताव के लिए अनुरोध (RFP) प्रक्रिया के तहत मिले प्रस्तावों की विस्तृत समीक्षा कर फील्डवर्क एजेंसियों का चयन किया है। IRS की वापसी पर MRUCI के चेयरमैन और मैडिसन वर्ल्ड के पार्टनर एवं डायरेक्टर विक्रम सखूजा ने कहा कि भारत के हर हिस्से में भरोसेमंद ऑडियंस मापन की जरूरत पहले से कहीं अधिक है। नया IRS केवल मीडिया की पहुंच ही नहीं, बल्कि उसके प्रभाव का भी आकलन करेगा। इसे दो चरणों में लागू किया जा रहा है और उन्हें भरोसा है कि इंडस्ट्री इसे एक महत्वपूर्ण मानक के रूप में स्वीकार करेगी।

वहीं, MRUCI की IRS टेक्निकल कमेटी के चेयरमैन शशिधर सिन्हा ने कहा कि बदलते मीडिया परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए सर्वे की डिजाइन को बेहतर बनाया गया है, जबकि इसकी विश्वसनीयता और गुणवत्ता को बरकरार रखा गया है। सैंपल डिजाइन को मजबूत करने, बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने और मीडिया मापन का दायरा बढ़ाने पर ध्यान दिया गया है। नए IRS से पब्लिशर्स, एडवर्टाइजर्स और एजेंसियों को देशभर में पाठकों की संख्या और मीडिया उपभोग को समझने के लिए अपडेटेड जानकारी मिलेगी। इससे मीडिया और विज्ञापन से जुड़े व्यावसायिक फैसले लेने में मदद मिलेगी।

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हिन्दुस्तान मीडिया इन तीन कंपनियों में करेगी निवेश, कंपनी का मुनाफा बढ़ा

हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड (HMVL) ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में जारी कारोबार से मुनाफे में अच्छी बढ़त दर्ज की है।

Vikas Saxena by
Published - Thursday, 05 November, 2026
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Thursday, 05 November, 2026
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हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड (HMVL) ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में जारी कारोबार से मुनाफे में अच्छी बढ़त दर्ज की है। जुलाई-सितंबर 2026 के दौरान कंपनी का जारी कारोबार से टैक्स के बाद मुनाफा 55.51 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की इसी तिमाही के 34.05 करोड़ रुपये के मुकाबले करीब 63% ज्यादा है।

कंपनी ने दूसरी तिमाही के वित्तीय नतीजों के साथ तीन कंपनियों में कुल 88.40 करोड़ रुपये तक निवेश करने को भी मंजूरी दी है। ये निवेश टेक्नोलॉजी, इंश्योरेंस और इलेक्ट्रिक वाहन (EV) से जुड़े कारोबार में किए जाएंगे। कंपनी के बोर्ड ने 4 नवंबर को हुई बैठक में इन फैसलों को मंजूरी दी।

दूसरी तिमाही में 11.5% बढ़ा रेवेन्यू

कंपनी के कंसोलिडेटेड नतीजों के मुताबिक, दूसरी तिमाही में ऑपरेशन से रेवेन्यू 196.58 करोड़ रुपये रहा। पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में यह 176.23 करोड़ रुपये था। इस तरह कंपनी के रेवेन्यू में करीब 11.5% की बढ़ोतरी हुई।

वहीं, जारी कारोबार से टैक्स के बाद मुनाफा 55.51 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 34.05 करोड़ रुपये था। हालांकि, बंद किए जा चुके कारोबार को भी शामिल करने पर कंपनी का कुल मुनाफा 52.04 करोड़ रुपये रहा। पिछले साल की इसी तिमाही में यह 10.08 करोड़ रुपये था।

दरअसल, कंपनी ने मार्च 2026 में अपने OTTplay कारोबार को बंद करने का फैसला लिया था। यह कारोबार 31 मार्च 2026 से बंद हो गया। इसलिए इसके वित्तीय नतीजों को जारी कारोबार से अलग दिखाया गया है। सितंबर 2026 को समाप्त तिमाही में बंद कारोबार से 3.47 करोड़ रुपये का टैक्स के बाद घाटा दर्ज किया गया।

1 Play Global में 24.89 करोड़ रुपये तक निवेश

HMVL ने सिंगापुर की कंपनी 1 Play Global Pte. Limited में 2.62 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी करीब 24.89 करोड़ रुपये तक निवेश करने की मंजूरी दी है। यह निवेश इक्विटी शेयरों की खरीद के जरिए किया जाएगा और दो चरणों में पूरा होगा। पहले चरण में 1.31 मिलियन डॉलर और दूसरे चरण में इतनी ही रकम निवेश की जाएगी।

पहले चरण के निवेश के बाद HMVL को 1 Play Global में 5% तक हिस्सेदारी मिल सकती है। दूसरे चरण में मिलने वाली हिस्सेदारी उस समय तय होने वाली कंपनी की वैल्यूएशन पर निर्भर करेगी।

1 Play Global एक टेक्नोलॉजी कंपनी है। इसके पास अयोध्या में धार्मिक पर्यटन और यात्रा को बढ़ावा देने वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘अयोध्यात्रा’ को विकसित करने, चलाने और प्रमोट करने का 10 साल का कॉन्ट्रैक्ट है। कंपनी स्कूलों के लिए खेल, संगीत और दूसरे आयोजनों से जुड़ी स्ट्रीमिंग और ब्रॉडकास्टिंग सेवाएं भी देती है।

इंश्योरेंस कंपनी में 13.51 करोड़ रुपये लगाएगी

दूसरा निवेश कर्नोदक्षायी इंश्योरेंस प्राइवेट लिमिटेड (Inka Insurance) में किया जाएगा। HMVL इसमें इक्विटी शेयर और वारंट के जरिए 13.51 करोड़ रुपये तक निवेश करेगी। इसमें करीब 10 करोड़ रुपये इक्विटी शेयरों के लिए और करीब 3.51 करोड़ रुपये वारंट के लिए रखे गए हैं।

इक्विटी शेयरों के जरिए HMVL को कंपनी में करीब 10% हिस्सेदारी मिल सकती है। वहीं, वारंट से मिलने वाली हिस्सेदारी उनके इस्तेमाल के समय तय होगी। Inka Insurance टेक्नोलॉजी आधारित इंश्योरेंस सलाह और वितरण प्लेटफॉर्म चलाती है। यह हेल्थ और टर्म इंश्योरेंस से जुड़े प्लान उपलब्ध कराती है। कंपनी की स्थापना 2023 में हुई थी।

EV कंपनी Matter Motor Works में 50 करोड़ रुपये का निवेश

तीसरा और सबसे बड़ा निवेश Matter Motor Works Private Limited में किया जाएगा। HMVL इसमें 50 करोड़ रुपये तक निवेश करेगी। यह रकम कंपल्सरी कन्वर्टिबल प्रेफरेंस शेयर (CCPS) के जरिए लगाई जाएगी। इन शेयरों को तय शर्तों के अनुसार बाद में इक्विटी शेयरों में बदला जा सकता है। HMVL को मिलने वाली हिस्सेदारी शेयरों के कन्वर्जन के समय तय होगी।

Matter Motor Works एक टेक्नोलॉजी आधारित इलेक्ट्रिक वाहन कंपनी है। यह अपनी बैटरी, सॉफ्टवेयर और पावरट्रेन टेक्नोलॉजी के जरिए इलेक्ट्रिक मोटरसाइकिल और एनर्जी सॉल्यूशन विकसित करती है। कंपनी की स्थापना 2019 में हुई थी।

HMVL के मुताबिक, इन तीनों निवेशों को मार्च 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य है। 1 Play Global में निवेश के लिए विदेशी निवेश से जुड़े नियमों का पालन करना होगा। कंपनी ने बताया है कि इन निवेशों का मकसद भविष्य में पूंजी पर रिटर्न हासिल करना और अपने मीडिया एसेट्स का बेहतर इस्तेमाल करना है।

पहली छमाही में 15.5% बढ़ा रेवेन्यू

वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान HMVL का ऑपरेशन से रेवेन्यू 393.76 करोड़ रुपये रहा। पिछले साल की समान अवधि में यह 340.83 करोड़ रुपये था। इस तरह इसमें करीब 15.5% की बढ़ोतरी हुई।

इस दौरान जारी कारोबार से टैक्स के बाद मुनाफा 111.14 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल की पहली छमाही में यह 60.12 करोड़ रुपये था। दूसरी ओर, बंद किए गए कारोबार से इस अवधि में 7.93 करोड़ रुपये का टैक्स के बाद घाटा दर्ज किया गया। इसे शामिल करने के बाद कंपनी का कुल मुनाफा 103.21 करोड़ रुपये रहा।

कंपनी के वित्तीय नतीजों की वैधानिक ऑडिटर्स एसआर बाटलीबोई एंड कंपनी एलएलपी ने लिमिटेड रिव्यू किया है।

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संदेश लिमिटेड को दूसरी तिमाही में नहीं हुआ फायदा, कंपनी सचिव हार्दिक जोशी ने दिया इस्तीफा

मीडिया कंपनी द संदेश लिमिटेड (The Sandesh Limited) ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही के नतीजे जारी कर दिए हैं।

Samachar4media Bureau by
Published - Tuesday, 03 November, 2026
Last Modified:
Tuesday, 03 November, 2026
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मीडिया कंपनी द संदेश लिमिटेड (The Sandesh Limited) ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही के नतीजे जारी कर दिए हैं। 30 सितंबर 2026 को समाप्त तिमाही में कंपनी को कंसोलिडेटेड आधार पर 2.09 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ है। वहीं, कंपनी ने बताया है कि उसके कंपनी सचिव और कंप्लायंस ऑफिसर हार्दिक जोशी 14 नवंबर 2026 से अपना पद छोड़ देंगे।

कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने 3 नवंबर को हुई बैठक में चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही और पहली छमाही के अनऑडिटेड स्टैंडअलोन और कंसोलिडेटेड वित्तीय नतीजों को मंजूरी दी। इन नतीजों की समीक्षा ऑडिट कमेटी ने की थी और कंपनी के वैधानिक ऑडिटर ने इन पर लिमिटेड रिव्यू रिपोर्ट जारी की है।

कंसोलिडेटेड आधार पर कंपनी को हुआ घाटा

कंपनी की ओर से जारी नतीजों के मुताबिक, सितंबर 2026 में समाप्त तिमाही में उसका कुल कंसोलिडेटेड इनकम 149.41 करोड़ रुपये रहा। इसमें ऑपरेशन से होने वाली आय और अन्य आय शामिल हैं। इस दौरान कंपनी का कुल खर्च करीब 149.75 करोड़ रुपये रहा। इसके चलते असाधारण मदों से पहले कंपनी को 34.13 लाख रुपये का घाटा हुआ।

असाधारण मदों के बाद कंपनी का प्रॉफिट बिफोर टैक्स 14.11 लाख रुपये रहा। हालांकि, टैक्स और अन्य मदों के बाद कंपनी को 2.09 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ। पिछले साल की इसी तिमाही में कंपनी ने 3.85 करोड़ रुपये का कंसोलिडेटेड शुद्ध मुनाफा दर्ज किया था।

कंपनी के नतीजों पर निवेश से जुड़े उतार-चढ़ाव का भी असर पड़ा। कंपनी ने बताया कि सितंबर 2026 तिमाही में इक्विटी शेयरों और म्यूचुअल फंड में किए गए निवेश के उचित मूल्य में बदलाव के कारण 20.98 करोड़ रुपये का शुद्ध नुकसान दर्ज किया गया। इस नुकसान को अन्य खर्चों में शामिल किया गया है।

पहली छमाही में मुनाफे की स्थिति

वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान कंपनी की कुल कंसोलिडेटेड इनकम 674.78 करोड़ रुपये रही। इस अवधि में कंपनी ने 109.70 करोड़ रुपये का प्रॉफिट बिफोर टैक्स और करीब 97.44 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया। इसकी तुलना में पिछले वित्त वर्ष की पहली छमाही में कंपनी का कंसोलिडेटेड शुद्ध मुनाफा करीब 51.90 करोड़ रुपये था।

हार्दिक जोशी 14 नवंबर से छोड़ेंगे पद

कंपनी ने एक अन्य जानकारी में बताया कि उसके कंपनी सचिव और कंप्लायंस ऑफिसर हार्दिक जोशी का इस्तीफा बोर्ड ने मंजूर कर लिया है। वह कंपनी के सीनियर मैनेजमेंट पर्सनल भी हैं। उनका आखिरी कार्य दिवस 14 नवंबर 2026 होगा।

कंपनी ने बताया कि हार्दिक जोशी के इस्तीफे के बाद सेबी के लिस्टिंग नियमों के तहत महत्वपूर्ण घटनाओं और जानकारियों की अहमियत तय करने और स्टॉक एक्सचेंजों को उनका खुलासा करने की जिम्मेदारी चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर (CFO) संजय कुमार टंडन को दी गई है। इस काम के लिए कंपनी ने उनका नाम अधिकृत अधिकारी के तौर पर तय किया है।

संदेश डिजिटल के विलय की प्रक्रिया जारी

कंपनी ने अपने नतीजों के साथ यह भी बताया कि उसके बोर्ड ने 5 अगस्त 2026 को अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली सब्सिडियरी कंपनी संदेश डिजिटल प्राइवेट लिमिटेड (Sandesh Digital Private Limited) के विलय की योजना को मंजूरी दी थी। इस योजना के लिए 1 अप्रैल 2026 को नियुक्त तारीख (Appointed Date) तय की गई है। कंपनी ने इस संबंध में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के समक्ष आवेदन भी दाखिल कर दिया है।

कंपनी की फाइलिंग के मुताबिक, यह विलय अभी जरूरी नियामकीय मंजूरियों के अधीन है। इसलिए 1 अप्रैल 2026 को नियुक्त तारीख तय होने का मतलब यह नहीं है कि विलय की प्रक्रिया उसी दिन पूरी हो गई थी।

 

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लोकतंत्र, सत्ता और नैतिकता पर सवाल उठाती सुधीर एस. रावल की नई किताब

पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सुधीर एस. रावल की नई किताब Beyond The Fault Lines Of Modernity – A Journalist's Inquiries into Power, the Crisis of Character and Humanity हाल ही में बाजार में आई है।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 02 November, 2026
Last Modified:
Monday, 02 November, 2026
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पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सुधीर एस. रावल की नई किताब Beyond The Fault Lines Of Modernity – A Journalist's Inquiries into Power, the Crisis of Character and Humanity हाल ही में बाजार में आई है। इस किताब में लोकतंत्र, शासन व्यवस्था, सत्ता, नैतिकता और मानवता से जुड़े मौजूदा सवालों पर चर्चा की गई है। लेखक ने इसमें यह समझने की कोशिश की है कि आज के दौर में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं और संस्थानों के सामने आ रही चुनौतियों की जड़ें केवल प्रशासनिक कमियों में नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और सामूहिक चरित्र में आ रही गिरावट में भी हो सकती हैं।

किताब की विषयवस्तु के मुताबिक, आज दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां तकनीक तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन इसके साथ ही समाज और संस्थाओं के सामने कई गंभीर चुनौतियां भी खड़ी हो रही हैं। लेखक का मानना है कि केवल कानून और नियम बना देने से किसी देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती। इसके लिए नैतिक मूल्यों, जवाबदेही और जिम्मेदारी को भी उतनी ही अहमियत देनी होगी।

50 अध्यायों में रखे गए विचार

इस किताब में कुल 50 अध्याय हैं। इनमें लोकतांत्रिक व्यवस्था, शासन प्रणाली और संस्थागत जवाबदेही से जुड़े अलग-अलग पहलुओं पर विचार रखे गए हैं। लेखक ने मौजूदा व्यवस्था की कमियों की पड़ताल करने के साथ-साथ उनमें सुधार के संभावित रास्तों पर भी चर्चा की है।

किताब में कुछ ऐसे विशेष ढांचों और विचारों को भी शामिल किया गया है, जिन्हें लेखक ने संस्थाओं और शासन व्यवस्था में बदलाव की दिशा में बहस को आगे बढ़ाने के लिए तैयार किया है। इसका मकसद केवल समस्याओं की पहचान करना नहीं, बल्कि उनके समाधान और संस्थागत सुधार के रास्तों पर भी चर्चा करना है।

सत्ता और नैतिकता के रिश्ते पर जोर

किताब का एक प्रमुख विषय सत्ता और नैतिकता के बीच का संबंध है। लेखक ने इस बात पर जोर दिया है कि लोकतंत्र की मजबूती केवल संवैधानिक प्रावधानों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इसे चलाने वाले लोगों के चरित्र और उनके फैसलों की नैतिकता भी इसमें अहम भूमिका निभाती है।

इसमें शासन व्यवस्था को नैतिक जिम्मेदारी, न्याय और मानवीय मूल्यों के साथ जोड़ने की जरूरत पर चर्चा की गई है। साथ ही, वैश्विक कूटनीति और लोकतांत्रिक संस्थानों की जवाबदेही जैसे विषयों को भी जगह दी गई है।

किन लोगों के लिए उपयोगी हो सकती है किताब?

किताब की विषयवस्तु के अनुसार, यह राजनेताओं, शिक्षाविदों, नीति से जुड़े लोगों, शोधकर्ताओं और लोकतांत्रिक व्यवस्था को समझने में दिलचस्पी रखने वाले पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गई है। आम नागरिकों के लिए भी इसमें समाज, शासन और मानवीय मूल्यों से जुड़े कई विचार रखे गए हैं।

Beyond The Fault Lines Of Modernity के जरिए सुधीर एस. रावल ने लोकतंत्र और शासन व्यवस्था को केवल कानूनों और संस्थागत प्रक्रियाओं के नजरिए से देखने के बजाय उसमें चरित्र, नैतिकता और मानवीय मूल्यों की भूमिका पर भी बहस शुरू करने की कोशिश की है।

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जानिए, प्रेस सेवा पोर्टल से अखबारों और पत्रिकाओं के पंजीकरण में क्या बदला

अखबारों और पत्रिकाओं का पंजीकरण कराने वाले प्रकाशकों के लिए अब आवेदन से लेकर दस्तावेज जमा करने और सालाना विवरण देने तक की प्रक्रिया ऑनलाइन हो गई है।

Vikas Saxena by
Published - Monday, 02 November, 2026
Last Modified:
Monday, 02 November, 2026
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अखबारों और पत्रिकाओं का पंजीकरण कराने वाले प्रकाशकों के लिए अब आवेदन से लेकर दस्तावेज जमा करने और सालाना विवरण देने तक की प्रक्रिया ऑनलाइन हो गई है। इसके लिए सरकार ने प्रेस सेवा पोर्टल को अहम माध्यम बनाया है। इस पोर्टल के जरिए प्रकाशक घर बैठे आवेदन कर सकते हैं, जरूरी दस्तावेज अपलोड कर सकते हैं, अपनी जानकारी अपडेट कर सकते हैं और आवेदन की स्थिति भी देख सकते हैं। इससे सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने और कागजी प्रक्रिया पर निर्भरता कम हुई है।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 के मुताबिक, प्रेस एवं पत्र-पत्रिका पंजीकरण अधिनियम, 2023 (PRP Act) एक मार्च 2024 से लागू हुआ। इसने 1867 के पुराने प्रेस एवं पुस्तक पंजीकरण अधिनियम की जगह ली। नए कानून के तहत अखबारों और पत्रिकाओं के शीर्षक सत्यापन, घोषणा, पंजीकरण और सालाना विवरण जमा करने की प्रक्रिया को डिजिटल बनाया गया है।

आवेदन से लेकर स्थिति जानने तक की सुविधा ऑनलाइन

नए सिस्टम में प्रकाशकों को पंजीकरण से जुड़ी सेवाओं के लिए प्रेस सेवा पोर्टल का इस्तेमाल करना होता है। इसके जरिए वे नए प्रकाशन के पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकते हैं। मौजूदा पंजीकरण में बदलाव, मालिकाना हक का हस्तांतरण और सालाना विवरण जमा करने जैसी प्रक्रियाएं भी इसी पोर्टल के माध्यम से पूरी की जा सकती हैं।

पोर्टल पर आवेदन के साथ जरूरी दस्तावेज अपलोड करने, जानकारी में बदलाव करने और आवेदन की स्थिति पर नजर रखने की सुविधा दी गई है। यानी आवेदन जमा करने के बाद उसकी प्रगति जानने के लिए बार-बार संबंधित सरकारी कार्यालय जाने की जरूरत नहीं रह गई है।

जिला स्तर पर भी बदली प्रक्रिया

नए सिस्टम में जिला मजिस्ट्रेट (DM) की भूमिका को भी ऑनलाइन व्यवस्था से जोड़ा गया है। रिपोर्ट के अनुसार, जिला मजिस्ट्रेट अब दस्तावेजों का ऑनलाइन सत्यापन कर सकते हैं और सत्यापित दस्तावेज सीधे प्रेस रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (PRGI) को भेज सकते हैं।

इससे आवेदन की प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने और देरी कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। दस्तावेजों का डिजिटल रिकॉर्ड भी सुरक्षित रहता है। इसके अलावा, आधार आधारित ई-सिग्नेचर की सुविधा से दस्तावेजों की विश्वसनीयता और आवेदन करने वाले व्यक्ति की पहचान की पुष्टि को मजबूत किया गया है।

पुराने कानून की जगह आया नया सिस्टम

प्रेस एवं पत्र-पत्रिका पंजीकरण अधिनियम, 2023 लागू होने के बाद पहले के रजिस्ट्रार ऑफ न्यूजपेपर्स फॉर इंडिया (RNI) कार्यालय का नाम बदलकर प्रेस रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (PRGI) कर दिया गया। नए कानून के तहत इसकी जिम्मेदारियों का दायरा भी बढ़ा है।

PRGI का काम देश में प्रकाशित अखबारों और पत्रिकाओं का पंजीकरण करना, उनके रिकॉर्ड रखना, प्रकाशकों से सालाना विवरण लेना और प्रिंट मीडिया से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण करना है। यह संस्था जरूरत के मुताबिक प्रकाशनों के सर्कुलेशन की भी जांच करती है।

31 दिसंबर 2025 तक 1.60 लाख से ज्यादा प्रकाशन पंजीकृत

मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, 31 दिसंबर 2025 तक PRGI के पास कुल 1,60,315 पत्र-पत्रिकाएं पंजीकृत थीं। साल 2025 के दौरान 6,013 नए प्रकाशनों का पंजीकरण किया गया।

वहीं, लगातार 10 या उससे ज्यादा साल तक सालाना विवरण जमा नहीं करने वाले बंद पड़े शीर्षकों को रिकॉर्ड से हटाने की प्रक्रिया के तहत 88,316 शीर्षकों का पंजीकरण रद्द किया जा चुका था।

हर साल सालाना विवरण जमा करना जरूरी

नए कानून के तहत हर पंजीकृत अखबार और पत्रिका के प्रकाशक को हर साल अपना सालाना विवरण जमा करना होता है। अधिनियम की धारा 12(1) के अनुसार, यह विवरण हर साल 31 मई तक प्रेस रजिस्ट्रार जनरल को देना जरूरी है।

अगर कोई प्रकाशक अपने नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण तय समय पर विवरण जमा नहीं कर पाता है, तो वह PRGI की पहले से अनुमति लेकर अतिरिक्त समय मांग सकता है। हालांकि, यह समयसीमा उसी कैलेंडर वर्ष की 31 दिसंबर से आगे नहीं बढ़ सकती।

रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 के लिए साल 2025 में कुल 39,345 प्रकाशनों ने अपना सालाना विवरण जमा किया। यह जानकारी देश में प्रिंट मीडिया की स्थिति का आकलन करने और ‘प्रेस इन इंडिया’ रिपोर्ट तैयार करने का भी अहम आधार बनती है।

सर्कुलेशन वेरिफिकेशन के लिए मिले 564 आवेदन

प्रेस सेवा पोर्टल से जुड़ी व्यवस्था में सर्कुलेशन वेरिफिकेशन यानी अखबार या पत्रिका की बताई गई प्रसार संख्या की जांच भी एक अहम प्रक्रिया है। PRGI प्रकाशकों के अनुरोध के अलावा शिकायतों और अपील के आधार पर भी सर्कुलेशन की जांच करता है।

मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी 2026 तक PRGI को वित्त वर्ष 2023-24 और 2024-25 से जुड़े सर्कुलेशन वेरिफिकेशन के लिए कुल 564 आवेदन मिले थे। इनमें वित्त वर्ष 2023-24 के सभी 278 आवेदनों की प्रक्रिया पूरी कर ली गई थी। दोनों वित्त वर्षों को मिलाकर कुल 349 सर्कुलेशन सर्टिफिकेट जारी किए गए थे।

सर्कुलेशन वेरिफिकेशन के तहत प्रकाशक की ओर से दी गई प्रसार संख्या की जांच की जाती है। इसके लिए डेस्क ऑडिट यानी उपलब्ध दस्तावेजों और रिकॉर्ड के आधार पर जांच की जाती है। जरूरत पड़ने पर प्रकाशक के कारोबारी परिसर और प्रिंटिंग प्रेस में मौजूद दस्तावेजों और अन्य रिकॉर्ड का भौतिक निरीक्षण भी किया जा सकता है।

न्यूजप्रिंट आयात के लिए भी पोर्टल का इस्तेमाल

प्रेस सेवा पोर्टल का इस्तेमाल सिर्फ पंजीकरण और सालाना विवरण तक सीमित नहीं है। इसके जरिए PRGI पंजीकृत प्रकाशनों के प्रकाशकों की ओर से न्यूजप्रिंट आयात के लिए जमा किए गए स्व-घोषणा पत्रों को भी प्रमाणित करता है। यह प्रक्रिया वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की आयात-निर्यात नीति के तहत होती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 के दौरान PRGI ने न्यूजप्रिंट आयात के लिए 763 स्व-घोषणा पत्रों को प्रमाणित किया।

कुल मिलाकर, प्रेस सेवा पोर्टल ने अखबारों और पत्रिकाओं के पंजीकरण से जुड़ी प्रक्रिया को कागजी व्यवस्था से ऑनलाइन सिस्टम की ओर बढ़ाया है। आवेदन, दस्तावेज अपलोड, जिला स्तर पर सत्यापन, सालाना विवरण और सर्कुलेशन वेरिफिकेशन जैसी सेवाओं को एक ही डिजिटल मंच पर लाने से प्रकाशकों के लिए प्रक्रिया को अधिक आसान और पारदर्शी बनाने की कोशिश की गई है।

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Sambhaav Media को कुछ इस तरह से हुआ ₹27.58 लाख रुपये का मुनाफा

मीडिया कंपनी सम्भाव मीडिया (Sambhaav Media Limited) ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी कर दिए हैं।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 02 November, 2026
Last Modified:
Monday, 02 November, 2026
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मीडिया कंपनी सम्भाव मीडिया (Sambhaav Media Limited) ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी कर दिए हैं। 30 सितंबर 2026 को समाप्त हुई तिमाही में कंपनी ने स्टैंडअलोन आधार पर 27.58 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया है। वहीं, कंसोलिडेटेड आधार पर कंपनी को 211.04 लाख रुपये का शुद्ध घाटा हुआ है।

कंपनी के निदेशक मंडल ने 30 अक्टूबर 2026 को हुई बैठक में दूसरी तिमाही और छमाही के अनऑडिटेड वित्तीय नतीजों को मंजूरी दी। कंपनी ने इसकी जानकारी शेयर बाजार को दी है।

स्टैंडअलोन आधार पर 27.58 लाख रुपये का मुनाफा

कंपनी के स्टैंडअलोन नतीजों के मुताबिक, जुलाई-सितंबर 2026 तिमाही में ऑपरेशन से होने वाली आय 987.87 लाख रुपये रही, जबकि पिछले साल की इसी तिमाही में यह 900.45 लाख रुपये थी। इस तरह कंपनी की ऑपरेशन से होने वाली आय में सालाना आधार पर बढ़ोतरी हुई है।

अन्य आय को जोड़ने के बाद कंपनी की कुल आय 1,022.54 लाख रुपये रही, जो पिछले साल की इसी अवधि में 934.79 लाख रुपये थी।

इस दौरान कंपनी का कुल खर्च बढ़कर 992 लाख रुपये हो गया, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 865.17 लाख रुपये था। कंपनी ने इस तिमाही में टैक्स से पहले 30.54 लाख रुपये का मुनाफा दर्ज किया। टैक्स के बाद शुद्ध मुनाफा 27.58 लाख रुपये रहा। पिछले साल की इसी तिमाही में कंपनी को 15.24 लाख रुपये का शुद्ध घाटा हुआ था।

कंसोलिडेटेड आधार पर घाटा बढ़ा

कंसोलिडेटेड नतीजों में कंपनी की ऑपरेशन से होने वाली आय 1,098.03 लाख रुपये रही, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 1,008.18 लाख रुपये थी। अन्य आय सहित कुल आय 1,126.50 लाख रुपये रही।

हालांकि, इस दौरान कंपनी का कुल खर्च बढ़कर 1,098.37 लाख रुपये से भी ज्यादा, यानी 1,120.29 लाख रुपये रहा। कंपनी को टैक्स से पहले 214.78 लाख रुपये का घाटा हुआ। टैक्स के बाद शुद्ध घाटा 211.04 लाख रुपये दर्ज किया गया। पिछले साल की इसी तिमाही में कंपनी को 41.79 लाख रुपये का शुद्ध घाटा हुआ था।

छमाही के नतीजे भी जारी

वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान कंपनी की स्टैंडअलोन ऑपरेशन आय 1,840.77 लाख रुपये रही, जो पिछले साल की समान अवधि के 1,715.11 लाख रुपये से अधिक है। हालांकि, इस अवधि में कंपनी को 73.16 लाख रुपये का शुद्ध घाटा हुआ, जबकि पिछले साल की पहली छमाही में यह घाटा 14.55 लाख रुपये था।

वहीं, कंसोलिडेटेड आधार पर पहली छमाही में ऑपरेशन से आय 2,059.75 लाख रुपये रही। इस दौरान कंपनी का शुद्ध घाटा बढ़कर 236.42 लाख रुपये हो गया, जबकि पिछले साल की इसी अवधि में यह 69.68 लाख रुपये था।

दो कारोबार में काम करती है कंपनी

Sambhaav Media ने अपने कारोबार को दो प्रमुख हिस्सों में बांटा है। इनमें Media and Allied Business और Technology and Allied Business शामिल हैं। दूसरी तिमाही में स्टैंडअलोन आधार पर Media and Allied Business से 779.56 लाख रुपये की आय हुई, जबकि Technology and Allied Business से 208.31 लाख रुपये की आय दर्ज की गई।

कंसोलिडेटेड आधार पर कंपनी के Media and Allied Business की आय 779.57 लाख रुपये और Technology and Allied Business की आय 318.46 लाख रुपये रही।

कंपनी की एक सब्सिडियरी Ved Technoserve Private Limited और एक एसोसिएट कंपनी Gujarat News Broadcasters Private Limited है। इन्हें शामिल करते हुए कंपनी ने कंसोलिडेटेड वित्तीय नतीजे जारी किए हैं।

कंपनी ने बताया कि उसके वित्तीय नतीजों की ऑडिट कमेटी ने समीक्षा की और इसके बाद निदेशक मंडल ने इन्हें मंजूरी दी। वैधानिक ऑडिटर ने भी इन नतीजों की लिमिटेड रिव्यू प्रक्रिया पूरी की है।

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त्योहारों में बढ़ती ऐड बुकिंग के बावजूद अखबारों को रेट बढ़ाने में क्यों आ रही मुश्किल?

विज्ञापनों की संख्या बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि अखबार अपनी विज्ञापन दरें भी आसानी से बढ़ा सकते हैं।

Samachar4media Bureau by
Published - Friday, 30 October, 2026
Last Modified:
Friday, 30 October, 2026
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कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।

भारत में अखबारों के लिए त्योहारों का समय विज्ञापन से कमाई के लिहाज से बेहद अहम होता है। अनुमान है कि पूरे साल के विज्ञापन राजस्व का करीब 40-45% हिस्सा इसी त्योहारी तिमाही से आता है। दशहरा, दिवाली और त्योहारों की खरीदारी के दौरान कंपनियां अपने विज्ञापन बजट बढ़ाती हैं। इससे अखबारों में विज्ञापनों की बुकिंग भी बढ़ जाती है। हालांकि, विज्ञापनों की संख्या बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि अखबार अपनी विज्ञापन दरें भी आसानी से बढ़ा सकते हैं।

इस साल अखबारों के सामने एक बड़ी चुनौती इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) की ओर से सुझाए गए 15% विज्ञापन सरचार्ज को लागू करने की है। बढ़ती लागत की भरपाई के लिए INS ने यह सरचार्ज लगाने की सिफारिश की थी, लेकिन विज्ञापनदाताओं के विरोध के चलते ज्यादातर अखबार इसे लागू नहीं कर पाए हैं।

खास बात यह है कि दिवाली में अब सिर्फ एक सप्ताह बाकी रहने के बावजूद इस बढ़ोतरी को व्यापक स्तर पर स्वीकार नहीं किया गया है। INS ने प्रकाशकों को 1 अगस्त से यह सरचार्ज लागू करने की सलाह दी थी, लेकिन तीन महीने बाद भी विज्ञापनदाता और मीडिया प्लानर इसे लेकर सहमत नहीं दिख रहे हैं।

अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं के अखबारों का भी कहना है कि मौजूदा आर्थिक हालात में विज्ञापन दरें बढ़ाना आसान नहीं है। प्रकाशकों के मुताबिक, बाजार की मुश्किल परिस्थितियां, कड़ी प्रतिस्पर्धा और विज्ञापनदाताओं का दबाव इसकी प्रमुख वजहें हैं।

बेनेट, कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड (टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप) के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर और बोर्ड मेंबर मोहित जैन, जो ABC के चेयरमैन भी हैं, ने कहा कि प्रकाशक अभी तक विज्ञापनदाताओं से 15% सरचार्ज नहीं मांग पाए हैं। वहीं, न्यूजप्रिंट और माल ढुलाई की बढ़ती लागत के कारण अखबारों के लिए अपना खर्च संभालना लगातार मुश्किल हो रहा है।

INS के पूर्व प्रमुख और मातृभूमि के मैनेजिंग डायरेक्टर एमवी श्रेयम्स कुमार ने कहा, "हमने अभी तक यह सरचार्ज लागू नहीं किया है। मुझे नहीं लगता कि दूसरे प्रकाशकों ने भी ऐसा किया है।"

उन्होंने आगे कहा, "सरचार्ज की बात तो छोड़िए, ज्यादातर विज्ञापनदाता त्योहारों के दौरान लंबे समय से चली आ रही परंपरा के मुताबिक काफी ज्यादा छूट मांगते हैं।"

वहीं, विज्ञापनदाताओं का कहना है कि सभी अखबारों के लिए एक जैसी दर बढ़ोतरी लागू करना सही नहीं होगा। उनका तर्क है कि अलग-अलग प्रकाशनों की पाठक संख्या, बाजार में स्थिति और कारोबार करने की क्षमता अलग होती है।

एक वरिष्ठ मार्केटर ने कहा, "सभी प्रकाशनों के लिए विज्ञापन दरों में एक जैसी बढ़ोतरी काम नहीं करती। विज्ञापनदाता दरों पर बातचीत करते समय कई बातों को देखते हैं। इनमें सर्कुलेशन, पाठकों की गुणवत्ता, उपलब्ध विज्ञापन जगह, संबंधित कैटेगरी की मांग और प्रकाशकों के साथ पुराने कारोबारी संबंध शामिल हैं।"

विज्ञापनदाताओं का कहना है कि किसी अखबार को ज्यादा विज्ञापन दर तभी मिलनी चाहिए, जब वह विज्ञापन के बदले बेहतर मूल्य दे रहा हो। एक विज्ञापन अधिकारी ने कहा, "विज्ञापन दरों में बढ़ोतरी को अखबार की ओर से मिलने वाले मूल्य के आधार पर सही ठहराया जाना चाहिए। इसमें पाठक संख्या, पाठकों की गुणवत्ता, कंटेंट और विज्ञापन के असर जैसी बातें शामिल हैं। आखिरकार विज्ञापन की कीमत पर फैसला विज्ञापनदाता और प्रकाशक के बीच बातचीत से होना चाहिए। इसमें किसी एसोसिएशन की भूमिका नहीं होनी चाहिए।"

दरें तय करने में अखबारों के सामने एक और समस्या भरोसेमंद और सभी को स्वीकार्य पाठक संख्या के आंकड़ों की कमी है। आखिरी इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) को करीब सात साल बीत चुके हैं। ऐसे में विज्ञापनदाताओं के पास ऐसा कोई सर्वमान्य पैमाना नहीं है, जिसके आधार पर वे अलग-अलग अखबारों की पाठक संख्या, पाठकों की गुणवत्ता और नए पाठकों तक पहुंच की तुलना कर सकें। इससे प्रकाशकों के लिए अपनी विज्ञापन दरों को सही साबित करना और मुश्किल हो जाता है।

त्योहारों में विज्ञापन बुकिंग बढ़ी, लेकिन किस कीमत पर?

त्योहारों के दौरान कंज्यूमर गुड्स, ऑटोमोबाइल, रिटेल और ज्वेलरी जैसे क्षेत्रों में विज्ञापन गतिविधियां बढ़ जाती हैं। अखबारों को इस दौरान ज्यादा विज्ञापन बुकिंग, बड़े आकार के विज्ञापन और प्रमुख पेजों पर विज्ञापन देने की मांग मिलती है।

लेकिन ज्यादा मांग होने का मतलब यह नहीं है कि प्रकाशक अपनी मर्जी से विज्ञापन दरें बढ़ा सकते हैं। एक मीडिया प्लानर ने बताया, "विज्ञापनदाता और मीडिया एजेंसियां अब भी विज्ञापन की लागत की तुलना कैंपेन के उद्देश्य, पाठकों तक पहुंच और दूसरे मीडिया माध्यमों से करती हैं। छूट, बातचीत के आधार पर तय पैकेज और अलग-अलग माध्यमों को जोड़कर दिए जाने वाले ऑफर से विज्ञापन की वास्तविक कीमत भी प्रभावित होती है।"

INS की ओर से सुझाए गए सरचार्ज को लेकर चल रही बहस भी मांग और विज्ञापन दरें बढ़ाने की क्षमता के बीच इसी अंतर को दिखाती है।

प्रकाशकों का कहना है कि अखबारों की वास्तविक कारोबारी कीमत सिर्फ उनकी पाठक संख्या से तय नहीं होती। एक प्रकाशक ने कहा, "पाठकों का भरोसा, संपादकीय विश्वसनीयता, विज्ञापन के लिए बेहतर माहौल और बड़े आयोजनों के दौरान लोगों का ध्यान आकर्षित करने की क्षमता भी किसी अखबार की कारोबारी वैल्यू बढ़ाती है। इसके अलावा, हमारे पास DAVP की विज्ञापन दरें और ABC के सर्कुलेशन आंकड़े भी हैं, जो बेंचमार्क का काम करते हैं।"

विज्ञापन से कमाई बढ़ना और विज्ञापन दरें बढ़ना अलग-अलग बातें

विज्ञापन बाजार के आंकड़े भी अखबारों के सामने मौजूद चुनौती को दिखाते हैं। पिच मैडिसन एडवर्टाइजिंग रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में प्रिंट विज्ञापन बाजार 3% बढ़कर 20,866 करोड़ रुपये हो गया, जबकि 2024 में यह 20,272 करोड़ रुपये था। हालांकि, कुल विज्ञापन खर्च में प्रिंट की हिस्सेदारी 19% से घटकर 18% रह गई।

इन आंकड़ों से पता चलता है कि प्रिंट विज्ञापन बाजार में कुल कमाई तो बढ़ रही है, लेकिन इसकी रफ्तार पूरे विज्ञापन बाजार की तुलना में कम है। हालांकि, सिर्फ इन आंकड़ों से यह साबित नहीं होता कि अखबारों ने विज्ञापन दरें बढ़ाकर कमाई की है या फिर ज्यादा विज्ञापन बेचकर अपना राजस्व बढ़ाया है।

प्रकाशकों के लिए इन दोनों बातों के बीच अंतर समझना जरूरी है। विज्ञापन से कमाई बढ़ने के कई कारण हो सकते हैं। जैसे ज्यादा विज्ञापन जगह बेचना, नए विज्ञापनदाता जोड़ना या पुराने विज्ञापनदाताओं का बजट बढ़ना। लेकिन विज्ञापन दरों पर मजबूत पकड़ तभी मानी जाएगी, जब विज्ञापनदाता बिना किसी दूसरी छूट या रियायत के ज्यादा कीमत देने को तैयार हों।

दूसरी ओर, न्यूजप्रिंट और अन्य परिचालन खर्चों में बढ़ोतरी ने भी प्रकाशकों की मुश्किलें बढ़ाई हैं। e4m की पहले की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक साल में आयातित न्यूजप्रिंट की कीमतों में करीब 10% की बढ़ोतरी हुई है। भू-राजनीतिक अस्थिरता, माल ढुलाई की लागत और रुपये की कमजोरी ने भी प्रकाशकों पर दबाव बढ़ाया है।

भारत अपनी न्यूजप्रिंट जरूरतों के लिए काफी हद तक दूसरे देशों पर निर्भर है। देश में न्यूजप्रिंट की कुल खपत का करीब दो-तिहाई हिस्सा आयात किया जाता है। रुपये की कमजोरी ने भी इस खर्च को बढ़ाया है। डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 95 रुपये के स्तर पर है, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले लगभग 9-10% कमजोर है।

INS ने बढ़ती लागत से राहत देने के उद्देश्य से ही 15% सरचार्ज लगाने की सिफारिश की थी। हालांकि, किसी इंडस्ट्री एसोसिएशन की सलाह से यह तय नहीं हो सकता कि कोई विज्ञापनदाता कितना भुगतान करेगा। प्रकाशकों को इसके लिए बाजार की प्रतिस्पर्धा और विज्ञापनदाताओं के साथ होने वाली बातचीत का सामना करना पड़ता है।

इंडस्ट्री के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "विज्ञापनदाता कितना भुगतान करने को तैयार होगा, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि उसे उस माध्यम से कितना फायदा दिखाई देता है। पाठकों तक पहुंच, पाठकों की प्रोफाइल, विश्वसनीयता, बाजार में प्रासंगिकता और कैंपेन के नतीजे जैसे कई पहलू विज्ञापन की ज्यादा कीमत को सही ठहराते हैं। इसलिए प्रकाशकों को अपनी बढ़ती लागत और विज्ञापनदाताओं की उम्मीदों के बीच संतुलन बनाना होगा।"

INS का क्या कहना है?

INS के चेयरमैन और लोकमत मीडिया के CEO करण दर्दा का कहना है कि 15% सरचार्ज अनिवार्य नहीं, बल्कि एक सलाह है। उनके मुताबिक, दैनिक भास्कर और लोकमत जैसे कुछ प्रकाशक चुनिंदा विज्ञापनदाताओं के साथ इसे आंशिक रूप से लागू करने में सफल रहे हैं।

हालांकि, दर्दा ने न तो उन विज्ञापनदाताओं के नाम बताए और न ही यह स्पष्ट किया कि विज्ञापन दरों में वास्तव में कितनी बढ़ोतरी की गई है। उन्होंने बताया कि ऑटोमोबाइल सेक्टर इस बढ़ोतरी को लेकर ज्यादा सकारात्मक रहा है।

दर्दा ने कहा, "भारतीय बाजार मजबूत स्थिति में है। ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स समेत कई सेक्टरों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। इसके अलावा, दूसरे मीडिया माध्यमों की तुलना में अखबारों पर लोगों का भरोसा ज्यादा है। इससे हमारी संभावनाएं बेहतर हो रही हैं।"

हालांकि, कुछ प्रकाशकों का कहना है कि सरचार्ज का आंशिक रूप से लागू होना सामान्य कारोबारी बातचीत का ही हिस्सा है। उनके मुताबिक, त्योहारों के दौरान बाकी सीजन की तुलना में वे करीब 2-4% तक की बढ़ोतरी हासिल कर पाते हैं।

असली परीक्षा विज्ञापन से होने वाली कमाई की होगी

त्योहारी तिमाही प्रिंट मीडिया की कारोबारी स्थिति को समझने का एक अहम मौका होगी। अगर विज्ञापनों की बुकिंग बढ़ती है, लेकिन विज्ञापन की वास्तविक दरें पहले जैसी ही रहती हैं, तो प्रकाशकों का कारोबार तो बढ़ सकता है, लेकिन विज्ञापन दरों पर उनकी पकड़ मजबूत नहीं होगी।

इसके उलट, अगर प्रकाशक विज्ञापन की संख्या बनाए रखते हुए ज्यादा दरें हासिल कर लेते हैं, तो यह इस बात का संकेत होगा कि बाजार की बढ़ती मांग से उन्हें वास्तव में ज्यादा कमाई हो रही है।

एक विज्ञापन अधिकारी ने कहा, "विज्ञापन की संख्या बनाए रखना और हर विज्ञापन से ज्यादा कमाई करना हमेशा एक जैसी बात नहीं होती। अगर कोई प्रकाशक बड़े विज्ञापनदाता को बनाए रखने के लिए दरें बढ़ाने से पीछे हटता है, तो उसे फिलहाल कारोबार का फायदा मिल सकता है, लेकिन बढ़ती लागत का बोझ उसी पर बना रहेगा। दूसरी तरफ, अगर विज्ञापनदाताओं के पर्याप्त समर्थन के बिना दरें बढ़ाई जाती हैं, तो विज्ञापनदाता दूसरे अखबारों या मीडिया माध्यमों की ओर जा सकते हैं।"

ऐसे में साल की सबसे अहम विज्ञापन तिमाही में अखबारों की सफलता सिर्फ इस बात से नहीं मापी जाएगी कि उनके कितने पन्ने विज्ञापनों से भरे या कितनी बुकिंग मिली। असली सवाल यह होगा कि क्या बढ़ती विज्ञापन मांग से अखबारों को बेहतर दरें मिल पाती हैं और क्या वे न्यूजप्रिंट समेत दूसरे बढ़ते खर्चों की भरपाई कर पाते हैं।

 

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डिजिटल दौर में फिर क्यों लौट रही हैं प्रिंट मैगजीन? LIFE की वापसी ने छेड़ी नई बहस

अमेरिका में LIFE मैगजीन की वापसी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि तेजी से डिजिटल होती दुनिया में प्रिंट मीडिया की क्या भूमिका रह गई है।

Samachar4media Bureau by
Published - Thursday, 29 October, 2026
Last Modified:
Thursday, 29 October, 2026
LifeMagazine

सुभ्रांशु सिंह, राइटर व मार्केटर ।।

अमेरिका में LIFE मैगजीन की वापसी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि तेजी से डिजिटल होती दुनिया में प्रिंट मीडिया की क्या भूमिका रह गई है। शुभ्रांशु सिंह इस बात पर विचार कर रहे हैं कि क्या मैगजीन पाठकों को ऐसा अनुभव देकर अपनी अहमियत दोबारा हासिल कर सकती हैं, जो डिजिटल मीडिया में अक्सर नहीं मिल पाता। यह अनुभव है थोड़ा ठहरकर पढ़ने, तस्वीरों को करीब से देखने और किसी कहानी में पूरी तरह डूब जाने का।

नीचे लिंक्डइन पर शुभ्रांशु सिंह की पूरी पोस्ट पढ़ें:

डिजिटल संस्कृति जिस माध्यम को लगभग अप्रासंगिक बना चुकी थी, हो सकता है कि डिजिटल दुनिया से पैदा हुई थकान के बीच वही माध्यम एक बार फिर अपनी नई पहचान बना ले। अमेरिका में LIFE मैगजीन की वापसी इसी संभावना को परखने वाला एक दिलचस्प प्रयोग है।

कई दशकों तक मैगजीन सिर्फ जानकारी देने का माध्यम नहीं रही हैं। उन्होंने तस्वीरों, विस्तार से लिखी गई खबरों, आकर्षक डिजाइन और पन्ने पलटते हुए अचानक कुछ नया खोज लेने के अनुभव के जरिए पाठकों के सामने एक अलग दुनिया पेश की। पाठक मैगजीन के पन्नों में दाखिल होते थे और कुछ समय तक उसी दुनिया में खोए रहते थे।

अपने सुनहरे दौर में LIFE सिर्फ एक मैगजीन नहीं थी। यह दुनिया को देखने की एक खिड़की थी। इसने दूर-दराज के युद्धों, राजनीतिक उथल-पुथल, वैज्ञानिक उपलब्धियों और आम लोगों की जिंदगी के खास पलों को लाखों घरों तक पहुंचाया।

इसकी सबसे बड़ी खासियत यह सोच थी कि तस्वीरें भी कहानियां कह सकती हैं और कई बार उनका असर सिर्फ शब्दों से कहीं ज्यादा होता है। दूसरे विश्व युद्ध के मोर्चों से लेकर नागरिक अधिकार आंदोलन और अंतरिक्ष की खोज के शुरुआती कदमों तक, LIFE ने कई पीढ़ियों को इतिहास को घटित होते हुए देखने, समझने और याद रखने में मदद की।

अपने सबसे लोकप्रिय दौर में इस मैगजीन की हर सप्ताह 80 लाख से ज्यादा प्रतियां बिकती थीं। इस तरह यह 20वीं सदी में तस्वीरों के जरिए कहानियां सुनाने वाले सबसे प्रभावशाली माध्यमों में से एक बन गई। इसके पाठकों के लिए LIFE का एक अंक खोलना अपनी दुनिया से बाहर निकलकर बड़े संसार में कदम रखने जैसा था। फिर डिजिटल मीडिया ने पूरी तस्वीर बदल दी।

कंटेंट तुरंत मिलने लगा। जानकारी की भरमार हो गई और लगभग हर विषय पर सामग्री हर समय उपलब्ध रहने लगी। लेकिन इस बढ़ती उपलब्धता के बीच धीरे-धीरे ठहरकर पढ़ने, किसी तस्वीर को ध्यान से देखने और किसी कहानी में पूरी तरह डूब जाने का अनुभव कम होता चला गया।

अब LIFE एक बार फिर प्रिंट प्रकाशन के रूप में लौट रही है। इसका नया संस्करण हर तीन महीने में प्रकाशित होगा और इसे कार्ली क्लॉस की कंपनी बेडफोर्ड मीडिया का समर्थन हासिल है। इसकी योजना सिर्फ प्रिंट तक सीमित रहने की नहीं है, बल्कि डिजिटल मंचों, फिल्मों और आयोजनों तक भी पहुंचने की है।

हालांकि, पुरानी यादें और किसी मशहूर ब्रांड का नाम अपने आप में काफी नहीं हैं। इस मैगजीन के सामने कारोबार से जुड़ी बड़ी चुनौतियां भी हैं। सिर्फ एक ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित नाम होने से यह सुनिश्चित नहीं हो जाता कि उसका नया संस्करण आर्थिक रूप से सफल होगा और लंबे समय तक टिक पाएगा।

शायद असली अवसर अतीत के मैगजीन कारोबार को दोबारा खड़ा करने में नहीं, बल्कि यह समझने में है कि आखिर मैगजीन पहले इतनी अहम क्यों थीं।

ऐसी दुनिया में, जहां लोग लगातार स्क्रीन पर स्क्रॉल करते रहते हैं, शायद अब उस अनुभव की अहमियत फिर बढ़ सकती है, जिसमें पाठक किसी सामग्री को सिर्फ देखते या पढ़ते नहीं, बल्कि उसमें पूरी तरह डूब जाते हैं।

मैगजीन का भविष्य शायद इस बात पर कम निर्भर करेगा कि वे डिजिटल मीडिया की तरह ही प्रतिस्पर्धा कैसे करती हैं। इसके बजाय उनकी सफलता इस बात पर निर्भर कर सकती है कि वे पाठकों को ऐसा क्या देती हैं, जिसकी कमी डिजिटल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल के बीच महसूस होने लगी है।

फोटो कैप्शन: अगले महीने प्रकाशित होने वाली नई LIFE मैगजीन के पहले अंक के कवर की तस्वीर। (फोटो साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स)

 

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बिनू के. जॉन की नई किताब ‘All in a Flash’ लॉन्च, तस्वीरों में दर्ज है भारत का इतिहास

प्रकाशन जगत की जानी-मानी संस्था नियोगी बुक्स (Niyogi Books) द्वारा प्रकाशित इस किताब में दुर्लभ तस्वीरों के जरिए महत्वपूर्ण घटनाओं और पत्रकारिता में न्यूज फोटोग्राफी की भूमिका को किया गया है रेखांकित

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 26 October, 2026
Last Modified:
Monday, 26 October, 2026
Niyogi Books

प्रकाशन जगत की जानी-मानी संस्था नियोगी बुक्स (Niyogi Books) ने वरिष्ठ पत्रकार और लेखक बिनू के. जॉन की नई किताब All in a Flash: News Photography in India प्रकाशित की है। इस किताब में दुर्लभ तस्वीरों के जरिए ऐतिहासिक घटनाओं, सामाजिक बदलावों और देश के इतिहास को दर्ज करने में न्यूज फोटोग्राफी की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है।

बिनू के. जॉन ने बताया कि फोटोग्राफी में उनकी दिलचस्पी लंबे समय से रही है और पत्रकारिता में अपने 35 साल के दौरान उन्होंने खास तौर पर न्यूज फोटोग्राफी को करीब से समझा है। उनके मुताबिक, इस अवधि में फोटोग्राफी की तकनीक में बड़े बदलाव हुए हैं। आज कैमरा मोबाइल फोन का हिस्सा बन चुका है, लेकिन न्यूज फोटोग्राफी अब भी एक चुनौतीपूर्ण कला है। उन्होंने कहा कि यह वास्तविक घटनाओं, पीड़ितों और जिम्मेदार लोगों को सामने लाने में अहम भूमिका निभाती है। लेखक के अनुसार, यह उनकी पांचवीं नॉन-फिक्शन किताब है और इसमें दुर्लभ तस्वीरों के माध्यम से भारत में न्यूज फोटोग्राफी के विकास को दर्ज किया गया है।

किताब में भारत के इतिहास के कई अहम पड़ावों को तस्वीरों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। इसमें बंटवारे के बाद के हालात को दिखाने वाली सुनील जाना की तस्वीरों से लेकर भोपाल गैस त्रासदी की रघु राय की चर्चित तस्वीरों तक का उल्लेख है। इसके अलावा, कोरोना महामारी के दौरान हुए नुकसान को कैमरे में दर्ज करने वाले क़मर सिब्तैन और रितेश शुक्ला के काम को भी शामिल किया गया है। किताब में ताजमहल को उसकी खूबसूरती के साथ-साथ सेलिब्रिटी और राजनीति से जुड़े प्रसंगों के संदर्भ में भी देखा गया है। इसमें जॉन मरे के ताजमहल के शुरुआती निगेटिव और राजकुमारी डायना की चर्चित यात्रा का जिक्र है।

किताब में फोटोग्राफी के ऐतिहासिक और समकालीन पहलुओं के साथ प्रेस फोटोग्राफरों के सामने आने वाली चुनौतियों पर भी चर्चा की गई है। इसमें वर्ष 1868 में कलकत्ता के एमहर्स्ट स्ट्रीट हत्याकांड में सबूत के तौर पर फोटोग्राफी के शुरुआती इस्तेमाल से लेकर 2014 के बाद सत्ता के गलियारों में प्रेस फोटोग्राफरों की घटती पहुंच तक के विषय शामिल हैं। किताब यह भी बताती है कि तस्वीरें इतिहास को समझने, दुनिया की घटनाओं को जानने और लोगों के अनुभवों को दर्ज करने में किस तरह मदद करती हैं।

नियोगी बुक्स की चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (सीओओ) त्रिशा नियोगी ने कहा कि All in a Flash फोटोग्राफी और ऐतिहासिक चेतना के बीच संबंध को समझने का अवसर देती है। उनके अनुसार, किताब सुनील जाना और रघु राय जैसे चर्चित फोटोग्राफरों के काम के माध्यम से ऐतिहासिक घटनाओं के पीछे छिपे मानवीय अनुभवों को सामने लाती है। यह तस्वीरों के बदलते स्वरूप, विजुअल स्टोरीटेलिंग और प्रेस फोटोग्राफरों के सामने आने वाली चुनौतियों पर भी विचार करती है। उनका मानना है कि यह किताब पाठकों को तस्वीरों को अधिक गंभीरता और आलोचनात्मक नजरिए से देखने के लिए प्रेरित कर सकती है।

बता दें कि दिल्ली में रहने वाले बिनू के. जॉन कई अंग्रेजी प्रकाशनों में संपादक के रूप में काम कर चुके हैं। इनमें Sunday, The Telegraph, The Indian Express, India Today और Mail Today जैसे प्रतिष्ठित नाम शामिल हैं। उनकी हालिया पत्रकारिता The Federal और The Wire में प्रकाशित हुई है। उनके उपन्यास The Last Song of Savio De Souza के अलावा नॉन-फिक्शन किताबों में Entry from Backside Only: Hazaar Fundas of Indian English, Under a Cloud: Life in Cherrapunji, the Wettest Place on Earth, The Curry Coast: Travels in Malabar 500 Years after Vasco Da Gama और Top Game: Winning, Losing and a New Understanding of Sport शामिल हैं।

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न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों से अखबारों पर बढ़ रहा दबाव

न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों ने भारतीय अखबार उद्योग के सामने एक बार फिर लागत संभालने की चुनौती खड़ी कर दी है।

Vikas Saxena by
Published - Thursday, 22 October, 2026
Last Modified:
Thursday, 22 October, 2026
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न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों ने भारतीय अखबार उद्योग के सामने एक बार फिर लागत संभालने की चुनौती खड़ी कर दी है। कागज महंगा होने के साथ प्रकाशकों को विज्ञापन से होने वाली कमाई, अखबार की कीमत और प्रसार के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। दूसरी ओर, न्यूजप्रिंट बनाने वाली कंपनियों ने भी कच्चे माल और उत्पादन से जुड़ी समस्याएं उठाई हैं। ऐसे में सवाल है कि पिछले साल के मुकाबले न्यूजप्रिंट कितना महंगा हुआ है, इसके पीछे क्या कारण हैं और इसका असर अखबारों के कारोबार पर किस तरह पड़ सकता है?

इसका एक स्पष्ट उदाहरण देश के बड़े अखबार समूह DB Corp के ताजा वित्तीय नतीजों के बाद हुई कॉन्फ्रेंस कॉल में सामने आया। कंपनी के डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर पवन अग्रवाल ने 16 अक्टूबर 2026 को बताया कि पिछले साल जहां कंपनी न्यूजप्रिंट के लिए औसतन 47,000 रुपये प्रति टन खर्च कर रही थी, वहीं अब यह लागत बढ़कर करीब 57,000 रुपये प्रति टन हो गई है। इस तरह कंपनी की औसत खरीद लागत में लगभग 20.8% की बढ़ोतरी हुई है।

पवन अग्रवाल के मुताबिक, इसके पीछे भू-राजनीतिक परिस्थितियां, आयातित न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतें और माल ढुलाई का खर्च प्रमुख कारण हैं। उन्होंने कहा कि आयातित न्यूजप्रिंट की कीमत बढ़ने पर घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतों पर भी असर पड़ता है। कंपनी को अपने आपूर्तिकर्ताओं से संकेत मिले हैं कि वित्त वर्ष 2026-27 की तीसरी और चौथी तिमाही में कीमतों में 2–3% तक नरमी आ सकती है। हालांकि, यह कंपनी प्रबंधन का अनुमान है, न कि कीमतों में कमी की गारंटी।

न्यूजप्रिंट की कीमतों में कितनी बढ़ोतरी?

किसी एक कंपनी की खरीद लागत और पूरे बाजार की कीमतों में बदलाव को एक जैसा नहीं माना जा सकता। इसलिए न्यूजप्रिंट की महंगाई को समझने के लिए सरकारी थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं।

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आर्थिक सलाहकार कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2026 में न्यूजप्रिंट का थोक मूल्य सूचकांक पिछले साल के इसी महीने की तुलना में 16.38% अधिक था। अगस्त 2026 में यह सालाना बढ़ोतरी 17.61% और जुलाई में 18.07% रही थी। इससे पता चलता है कि न्यूजप्रिंट के थोक मूल्य सूचकांक में सालाना बढ़ोतरी बनी हुई है, हालांकि सितंबर में इसकी दर पिछले दो महीनों से कम रही।

यहां यह समझना जरूरी है कि WPI में 16.38% की बढ़ोतरी का मतलब यह नहीं है कि देश के हर अखबार की न्यूजप्रिंट खरीद लागत भी इतनी ही बढ़ी है। यह व्यापक थोक मूल्य सूचकांक है, जबकि DB Corp का आंकड़ा कंपनी की औसत खरीद लागत को दर्शाता है।

इसी बीच, इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी (INS) ने अगस्त 2026 में दावा किया था कि मार्च के बाद घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतों में 30–40% तक बढ़ोतरी हुई है। यह उद्योग संगठन का आकलन है। इसकी अवधि और आधार सरकारी WPI तथा DB Corp की खरीद लागत से अलग हैं। इसलिए इन तीनों आंकड़ों को एक ही राष्ट्रीय औसत के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।

आयात पर निर्भरता और आपूर्ति की समस्या

न्यूजप्रिंट की कीमतों में बदलाव का एक बड़ा कारण भारत की आयात पर निर्भरता है। INS के मुताबिक, देश में न्यूजप्रिंट की सालाना खपत करीब 13 लाख टन है, जबकि घरेलू उत्पादन लगभग 5 लाख टन है। यानी घरेलू उत्पादन देश की पूरी जरूरत को पूरा नहीं करता और अखबार प्रकाशकों को आयातित कागज पर भी निर्भर रहना पड़ता है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने पर आयात करने वाले प्रकाशकों की लागत बढ़ सकती है। इसके अलावा रुपये की विनिमय दर, समुद्री माल ढुलाई और आपूर्ति में अनिश्चितता भी महत्वपूर्ण हैं। यदि रुपये के मुकाबले डॉलर महंगा होता है, तो समान कीमत वाले आयातित कागज के लिए अधिक रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं।

पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में अनिश्चितता का मुद्दा भी INS ने उठाया है। संगठन के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्यूजप्रिंट की उपलब्धता और कीमतों पर इसका असर पड़ा है। हालांकि, कीमतों में हुई पूरी बढ़ोतरी को केवल एक क्षेत्र के तनाव या किसी एक कारण से जोड़ना उचित नहीं होगा।

न्यूजप्रिंट निर्माता भी परेशान, कोयले की आपूर्ति का मुद्दा उठा

न्यूजप्रिंट की महंगाई की तस्वीर का दूसरा पहलू घरेलू उत्पादन है। 20 अक्टूबर 2026 को Business Standard में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, इंडियन न्यूजप्रिंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (INMA) ने कोयले की आपूर्ति में रुकावटों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हस्तक्षेप की मांग की।

संगठन ने कहा कि उसके सदस्य कोल इंडिया की विभिन्न सहायक कंपनियों के साथ लंबे समय के ईंधन आपूर्ति समझौते होने के बावजूद तय समय पर कोयले की पर्याप्त आपूर्ति नहीं मिलने की समस्या का सामना कर रहे हैं। INMA के मुताबिक, इसके कारण कुछ निर्माताओं को खुले बाजार से महंगा कोयला खरीदना पड़ रहा है और महंगी बिजली का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।

संगठन ने दावा किया कि अनियमित आपूर्ति से उत्पादन क्षमता का पूरा इस्तेमाल करना मुश्किल हो रहा है। इससे घरेलू न्यूजप्रिंट की उपलब्धता पर भी असर पड़ सकता है। INMA ने कोयले की आपूर्ति और आवंटन व्यवस्था में सुधार की मांग की है।

यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है, क्योंकि न्यूजप्रिंट की कीमत केवल आयात पर निर्भर नहीं करती। घरेलू मिलों की उत्पादन लागत और उनकी नियमित आपूर्ति भी बाजार में उपलब्ध कागज की मात्रा को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, कोयले की आपूर्ति की समस्या को न्यूजप्रिंट की कीमतों में हुई पूरी बढ़ोतरी का अकेला कारण नहीं माना जा सकता।

कागज निर्माताओं का क्या कहना है?

न्यूजप्रिंट की लागत पर कागज निर्माताओं का नजरिया भी महत्वपूर्ण है। 19 अगस्त 2026 को प्रकाशित Exchange4media की रिपोर्ट में Emami Paper Mills ने घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमत लगभग 58–62 रुपये प्रति किलो बताई थी। कंपनी ने रुपये की कमजोरी, आयातित रेशों और रसायनों की लागत, पूंजी खर्च तथा माल ढुलाई को कीमतों पर असर डालने वाले कारकों में शामिल किया था।

यह आंकड़ा निर्माता की ओर से बताई गई घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमत का दायरा है। इसे सभी प्रकार के न्यूजप्रिंट की एक समान कीमत नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि गुणवत्ता, उत्पाद की किस्म, खरीद की मात्रा और अनुबंध के आधार पर वास्तविक कीमत अलग हो सकती है।

INS ने आयातित न्यूजप्रिंट पर लगने वाले 5% सीमा शुल्क को हटाने की मांग भी उठाई है। संगठन का तर्क है कि घरेलू उत्पादन देश की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं है और आयात पर शुल्क प्रकाशकों की लागत बढ़ाता है। दूसरी ओर, घरेलू निर्माताओं की उत्पादन लागत और आपूर्ति की समस्याओं को भी ध्यान में रखना होगा। ऐसे में सरकार के सामने घरेलू उत्पादन और अखबार उद्योग की जरूरतों के बीच संतुलन बनाने का सवाल है।

विज्ञापन कारोबार में गिरावट ने बढ़ाई चुनौती

न्यूजप्रिंट की बढ़ती लागत ऐसे समय में चिंता का विषय है, जब प्रिंट मीडिया के विज्ञापन कारोबार में भी कमजोरी दिखाई दी है।

INS की 87वीं वार्षिक रिपोर्ट, 2025-26 के मुताबिक, उसके सदस्य प्रकाशनों का कुल विज्ञापन कारोबार 2025 में 14,773.74 करोड़ रुपये रहा, जबकि 2024 में यह 15,316.39 करोड़ रुपये था। इस तरह एक साल में विज्ञापन कारोबार में करीब 3.54% की गिरावट दर्ज की गई।

ये आंकड़े INS के सदस्य प्रकाशनों के रिपोर्ट किए गए विज्ञापन कारोबार के हैं, पूरे भारतीय विज्ञापन बाजार के नहीं। फिर भी वे उद्योग की कारोबारी स्थिति को समझने में मदद करते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, विज्ञापन एजेंसियों के जरिये मिलने वाला कारोबार 2024 के 8,229.73 करोड़ रुपये से घटकर 2025 में 8,178.15 करोड़ रुपये रहा। इसके उलट, सीधे मिलने वाला विज्ञापन कारोबार 2,588.22 करोड़ रुपये से बढ़कर 2,685.74 करोड़ रुपये हो गया। यानी विज्ञापन के अलग-अलग स्रोतों में बदलाव एक जैसा नहीं रहा।

INS के आंकड़ों में भारतीय भाषा के दैनिक अखबारों की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। विज्ञापन एजेंसियों के जरिये मिलने वाले कारोबार में भारतीय भाषा के दैनिक अखबारों की हिस्सेदारी 2025 में 57.57% रही, जबकि अंग्रेजी दैनिकों की हिस्सेदारी 43.90% थी। यह हिस्सेदारी एजेंसी से मिलने वाले विज्ञापन कारोबार की है, कुल विज्ञापन कारोबार की नहीं।

न्यूजप्रिंट की बढ़ती लागत और विज्ञापन कारोबार में गिरावट एक साथ होने पर प्रकाशकों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है। लेकिन किसी कंपनी का वास्तविक मुनाफा उसके विज्ञापन राजस्व, प्रसार से होने वाली आय, कागज की खपत और दूसरे खर्चों पर निर्भर करेगा।

DB Corp के नतीजे क्या संकेत देते हैं?

DB Corp के वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि कंपनी को विज्ञापन कारोबार में भी कुछ दबाव का सामना करना पड़ा। 16 अक्टूबर की कॉन्फ्रेंस कॉल में कंपनी ने बताया कि दूसरी तिमाही में उसका विज्ञापन राजस्व 411 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 439 करोड़ रुपये था। प्रसार से मिलने वाला राजस्व भी 121 करोड़ रुपये से घटकर 116 करोड़ रुपये रहा।

कंपनी के प्रबंधन ने बताया कि त्योहारों के समय में बदलाव का असर तिमाही के विज्ञापन कारोबार पर पड़ा। नवरात्रि से जुड़े कुछ विज्ञापन खर्च सितंबर से अक्टूबर में खिसक गए। इसलिए इस गिरावट को केवल न्यूजप्रिंट की महंगाई या विज्ञापन बाजार की कमजोरी का परिणाम मानना सही नहीं होगा।

कंपनी ने यह भी कहा कि उसने अन्य खर्चों को नियंत्रण में रखने की कोशिश की है, लेकिन न्यूजप्रिंट की कीमत ऐसा क्षेत्र है जिस पर उसका सीधा नियंत्रण सीमित है। इससे यह समझ आता है कि बढ़ती लागत से निपटने के लिए प्रकाशक सिर्फ कागज की खरीद पर ही नहीं, बल्कि दूसरे खर्चों और विज्ञापन से होने वाली कमाई पर भी ध्यान दे रहे हैं।

क्या अखबारों की कीमत बढ़ेगी?

न्यूजप्रिंट की महंगाई के बीच सबसे बड़ा सवाल है कि क्या अखबारों के कवर प्राइस बढ़ेंगे। DB Corp के प्रबंधन ने कॉन्फ्रेंस कॉल में कहा कि कंपनी फिलहाल कीमत बढ़ाने को लेकर सावधानी बरत रही है। पवन अग्रवाल के मुताबिक, कवर प्राइस बढ़ने से अखबार की प्रतियों की संख्या में और गिरावट आ सकती है। कंपनी का कहना है कि वह अखबार को घरों के लिए किफायती बनाए रखना चाहती है।

हालांकि, एक कंपनी की रणनीति को पूरे उद्योग पर लागू नहीं माना जा सकता। अलग-अलग प्रकाशक विज्ञापन दरों में बदलाव, कागज के बेहतर इस्तेमाल, खर्चों में कटौती या कवर प्राइस में संशोधन जैसे विकल्पों पर विचार कर सकते हैं। अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि सभी अखबार अपनी कीमतें बढ़ाने जा रहे हैं।

हिंदी और क्षेत्रीय अखबारों पर पड़ने वाले असर को समझने के लिए भी वास्तविक आंकड़ों की जरूरत है। हर प्रकाशक की खरीद क्षमता, प्रसार, विज्ञापन बाजार और उत्पादन लागत अलग होती है। इसलिए छोटे और क्षेत्रीय अखबारों पर सबसे ज्यादा असर पड़ने का निष्कर्ष निकालने से पहले उनके वास्तविक खर्च और कमाई की तुलना करनी होगी।

आगे क्या?

न्यूजप्रिंट की कीमतों का अगला रुख अंतरराष्ट्रीय बाजार, आयात की लागत, रुपये की विनिमय दर, घरेलू मिलों की उत्पादन क्षमता और कच्चे माल की उपलब्धता पर निर्भर करेगा। DB Corp के प्रबंधन को अगली दो तिमाहियों में कीमतों में 2–3% नरमी की उम्मीद है, लेकिन इसे पूरे उद्योग के लिए निश्चित अनुमान नहीं माना जा सकता।

दूसरी ओर, INMA की कोयला आपूर्ति संबंधी मांग से पता चलता है कि घरेलू उत्पादन में भी ऐसी समस्याएं हैं जो कागज की उपलब्धता को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में प्रकाशकों के लिए चुनौती सिर्फ सस्ता कागज खरीदने की नहीं, बल्कि नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने और विज्ञापन से होने वाली कमाई को संभालने की भी है।

कुल मिलाकर, न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमत भारतीय अखबार उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण कारोबारी चुनौती है। सितंबर 2026 में सरकारी थोक मूल्य सूचकांक में सालाना 16.38% बढ़ोतरी, DB Corp की खरीद लागत में करीब 20.8% इजाफा और INS सदस्य प्रकाशनों के विज्ञापन कारोबार में 2025 के दौरान 3.54% गिरावट इस चुनौती के अलग-अलग पहलुओं को दिखाते हैं, लेकिन इन आंकड़ों को एक ही पैमाने पर नहीं रखा जा सकता।

आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि प्रकाशक बढ़ती लागत का सामना कैसे करते हैं, घरेलू न्यूजप्रिंट निर्माता उत्पादन और आपूर्ति की समस्याओं से कैसे निपटते हैं और विज्ञापन बाजार में सुधार से अखबारों को कितनी राहत मिलती है।

 

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