लेकिन जब हम देश की बैंकिंग व्यवस्था की ओर देखते हैं तो एक असहज सवाल सामने आता है। क्या हमारी सरकारी और निजी बैंकिंग व्यवस्था ने इस परंपरा के मूल्यों का पालन किया है?
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
दीपावली का पर्व आते ही देश के व्यापारिक प्रतिष्ठानों, दुकानों और घरों में एक पुरानी परंपरा जीवंत हो उठती है। व्यापारी अपने नए बही-खाते की पूजा करते हैं, लक्ष्मी-गणेश की आराधना होती है और नए आर्थिक वर्ष के लिए समृद्धि की कामना की जाती है। इस परंपरा का संदेश केवल धन कमाना नहीं, बल्कि ईमानदारी से कमाना, हिसाब-किताब साफ रखना और आर्थिक व्यवहार में विश्वास बनाए रखना भी है।
लेकिन जब हम देश की बैंकिंग व्यवस्था की ओर देखते हैं तो एक असहज सवाल सामने आता है। क्या हमारी सरकारी और निजी बैंकिंग व्यवस्था ने इस परंपरा के मूल्यों का पालन किया है? क्या जनता की मेहनत की कमाई से बने बैंकों को राजनीतिक हस्तक्षेप, प्रभावशाली उद्योगपतियों, भ्रष्ट अधिकारियों और कमजोर प्रबंधन से बचाया जा सका है?
इस समय आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक विनिवेश को लेकर राहुल गांधी की कांग्रेस और कुछ कम्युनिस्ट विचार वाले दलों की आपत्तियां सामने आ रही हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने बैंक के नियंत्रण और स्वामित्व में बदलाव की प्रक्रिया आगे बढ़ाई है।
सवाल उठाने वालों को यह भी बताना चाहिए कि जिन सरकारी बैंकों को कभी राष्ट्रीय गौरव और सामाजिक न्याय का माध्यम बताया गया था, उनकी आर्थिक सेहत बिगड़ने, हजारों करोड़ रुपये के कर्ज डूबने और राजनीतिक संरक्षण में कर्ज बांटने की परिस्थितियां कैसे पैदा हुईं? बैंक सरकारी हो या निजी, असली सवाल उसके मालिक का नहीं, बल्कि उसकी जवाबदेही, पारदर्शिता, वित्तीय अनुशासन और जनता के पैसे की सुरक्षा का है।
आजादी के तत्काल बाद बीस वर्षों तक राजा-महाराजा या सेठों के कुछ बैंक भी थे। कई बड़े सेठ, ठेकेदार, जमींदार गरीबों को कई गुना अधिक ब्याज दरों पर कर्ज देकर मुनाफा कमा उनका शोषण करते थे। जब सार्वजनिक बैंक बने तो नेताओं ने अपने ढंग से गरीबों और ईमानदार लोगों का पैसा लूटा।
जब नरेंद्र मोदी सरकार 2014 में सत्ता में आई, तब बैंकों के फंसे हुए कर्ज यानी गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) का संकट बहुत गंभीर था। रिजर्व बैंक की एसेट क्वालिटी रिव्यू प्रक्रिया के बाद बैंकों के पुराने दबे हुए खराब ऋण बड़े पैमाने पर सामने आए।
मोदी सरकार ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी), 2016 लागू की। इसका उद्देश्य दिवालिया कंपनियों के समाधान और ऋण वसूली की प्रक्रिया को समयबद्ध बनाना था। इसके साथ बैंकों के पुनर्पूंजीकरण, विलय और प्रबंधन सुधार की दिशा में भी कदम उठाए गए।
2015 में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सुधार के लिए इंद्रधनुष योजना की घोषणा की थी। इसमें नियुक्तियों को बेहतर बनाने, बैंक बोर्ड ब्यूरो की स्थापना, पूंजी उपलब्ध कराने और बैंकिंग प्रशासन में सुधार पर जोर था। इन कदमों से बैंकिंग व्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन यह कहना भी अतिशयोक्ति होगा कि एनपीए की समस्या पूरी तरह समाप्त हो गई है। बैंकिंग क्षेत्र में निरंतर निगरानी और जवाबदेही की जरूरत बनी हुई है।
राहुल गांधी इन दिनों मोदी सरकार और उनकी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर ऐसे कई मुद्दों पर अनर्गल आरोप लगाकर जनता को भ्रमित कर रहे हैं। वे कभी अंबानी-अडानी का नाम लेकर गंभीर आरोप लगाते हैं। वे भूल जाते हैं कि कांग्रेस राज में 'टाटा-बिड़ला' की सरकार कहलाने के साथ ही राजीव गांधी से मनमोहन सिंह राज के दौरान ही अंबानी-अडानी भी आगे बढ़े हैं। मोदी ने तो गुजरात में ही टाटा, बिड़ला, अंबानी, अडानी, मित्तल जैसे सभी घरानों को प्रोत्साहित किया, ताकि उद्योग-व्यापार के साथ रोजगार के अधिकाधिक अवसर मिले।
राहुल गांधी एंड कंपनी इन तथ्यों को भी ध्यान में रखें। 19 जुलाई 1969 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने 14 प्रमुख निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। उस समय इन बैंकों में 50 करोड़ रुपये से अधिक की जमा राशि थी। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों तक बैंकिंग पहुंचाना, किसानों और छोटे उद्योगों को ऋण उपलब्ध कराना तथा कुछ बड़े औद्योगिक घरानों के आर्थिक प्रभाव को सीमित करना बताया गया था।
इस निर्णय का भारतीय अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा। बैंकों की शाखाएं गांवों और कस्बों तक पहुंचीं। कृषि, लघु उद्योग, छोटे व्यापार और आम नागरिकों को संस्थागत ऋण उपलब्ध कराने का रास्ता खुला। मैं 1971 से दिल्ली में पत्रकारिता में हूं और बैंक या कोयला खानों के राष्ट्रीयकरण के लाभ और बाद में नुकसान यानी घोटालों पर जमीनी रिपोर्टिंग या लेख लिखता रहा हूं। कई वित्त मंत्रियों से इंटरव्यू करता रहा हूं।
राष्ट्रीयकरण के केवल दो वर्ष बाद 1971 में नागरवाला कांड ने देश की बैंकिंग और राजनीतिक व्यवस्था को हिला दिया। 24 मई 1971 को दिल्ली स्थित स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की संसद मार्ग शाखा से 60 लाख रुपये निकलवाए गए।
बैंक के मुख्य कैशियर वेद प्रकाश मल्होत्रा को कथित तौर पर फोन पर प्रधानमंत्री कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी पी.एन. हक्सर और स्वयं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नाम का हवाला दिया गया था। बाद में पता चला कि फोन करने वाला व्यक्ति रुस्तम सोहराब नागरवाला था।
उस समय 60 लाख रुपये बहुत बड़ी रकम थी। अधिकांश राशि बरामद हो गई और नागरवाला गिरफ्तार हुआ। लेकिन यह मामला केवल धोखाधड़ी तक सीमित नहीं रहा। इसमें प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम, बैंक की आंतरिक प्रक्रियाएं और पुलिस जांच की विश्वसनीयता जैसे गंभीर सवाल जुड़े।
न्यायमूर्ति जे. जगनमोहन रेड्डी आयोग ने मामले की जांच की। आयोग ने पुलिस जांच की गंभीर कमियों की ओर ध्यान दिलाया और कई ऐसे प्रश्न छोड़े जिनका संतोषजनक उत्तर नहीं मिला।
सरकारी व्यवस्था का खेल समझने वाले यशवंत सिन्हा सबसे पहले चंद्रशेखर की कुछ महीनों की कांग्रेस समर्थित सरकार में वित्त मंत्री बन गए। विश्व बैंक की शर्तों पर भारत की आर्थिक नीति का मसविदा तभी बना। फिर कांग्रेस के नरसिम्हा राव के कार्यकाल में मनमोहन सिंह ने उस मसविदे को अपने ढंग से उदारवादी नीति की तरह लागू करना शुरू किया। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में यशवंत सिन्हा फिर से जोड़-तोड़ कर वित्त मंत्री बनने में सफल हुए।
उनके कार्यकाल में 2001 का शेयर बाजार संकट और यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया (यूटीआई) का यूएस-64 संकट देश की आर्थिक व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आया। यूएस-64 में लाखों छोटे निवेशकों ने अपनी बचत लगाई थी। इसी दौर में केतन पारेख का शेयर बाजार घोटाला सामने आया। इस प्रकरण में बैंकों, सहकारी बैंकों, कंपनियों और शेयर दलालों के बीच संदिग्ध वित्तीय लेन-देन की जांच हुई।
संसदीय संयुक्त समिति ने 2002 में अपनी रिपोर्ट पेश की। समिति ने केतन पारेख को घोटाले का प्रमुख खिलाड़ी माना और यूटीआई के तत्कालीन प्रबंधन तथा वित्त मंत्रालय की निगरानी संबंधी कमियों पर सवाल उठाए। सरकार किसी भी पार्टी की हो, वित्त मंत्रालय और नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी केवल बजट प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि वित्तीय संस्थानों में संकट के संकेतों पर समय पर कार्रवाई करना है।
फारूक अब्दुल्ला का नाम भी जम्मू-कश्मीर में बैंक खातों और क्रिकेट एसोसिएशन के धन के कथित दुरुपयोग से जुड़े मामले में आया। जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन को 2002 से 2011 के बीच बीसीसीआई से लगभग 113 करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे।
सीबीआई ने आरोप लगाया कि इसमें से 43.69 करोड़ रुपये का कथित गबन हुआ। 2018 में सीबीआई ने फारूक अब्दुल्ला सहित चार व्यक्तियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। इसमें एसोसिएशन के पदाधिकारियों के साथ जम्मू-कश्मीर बैंक की खनयार शाखा के एक अधिकारी का नाम भी शामिल था।
प्रवर्तन निदेशालय ने भी इस मामले में जांच की और फारूक अब्दुल्ला से संबंधित वित्तीय लेन-देन की पड़ताल की। वैसे यह जम्मू-कश्मीर बैंक के अपने धन का कथित घोटाला नहीं, बल्कि क्रिकेट एसोसिएशन के धन के कथित गबन का मामला था, जिसमें बैंक खातों और बैंक अधिकारी की भूमिका भी जांच के दायरे में आई थी। यह उदाहरण दिखाता है कि राजनीतिक पद, संस्थाओं का प्रबंधन और बैंकिंग लेन-देन जब एक-दूसरे से जुड़ते हैं तो पारदर्शिता कितनी जरूरी हो जाती है।
सरकारी बैंकों की एक बड़ी समस्या लंबे समय से उनके शीर्ष प्रबंधन की नियुक्तियों और निर्णय प्रक्रिया में सरकारी प्रभाव को लेकर रही है। बैंकों के अध्यक्ष, प्रबंध निदेशक और निदेशक मंडल के सदस्यों के लिए वित्तीय विशेषज्ञता, बैंकिंग अनुभव, जोखिम प्रबंधन और स्वतंत्र निर्णय क्षमता जरूरी है।
लेकिन जब नियुक्तियों में राजनीतिक नजदीकी, प्रशासनिक पसंद या व्यक्तिगत संबंधों को प्राथमिकता मिलने लगे तो संस्थागत स्वतंत्रता कमजोर होती है। बैंकिंग क्षेत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप की समस्या को कई समितियों और विशेषज्ञों ने गंभीरता से उठाया है। शायद इसीलिए मोदी सरकार ने कई बैंकों में निदेशक नियुक्त नहीं किए।
दीपावली पर व्यापारी अपने पुराने बही-खातों का हिसाब करते हैं। लक्ष्मी पूजन के अवसर पर देश को यह संकल्प लेना चाहिए कि बैंकिंग व्यवस्था में न राजनीतिक सिफारिश चलेगी, न उद्योगपतियों का दबाव और न भ्रष्ट अधिकारियों की मनमानी। सरकारी बैंक हों या निजी बैंक, सबके लिए एक समान वित्तीय अनुशासन होना चाहिए।
बैंक का धन जनता का विश्वास है। उसे बचाना सरकार, रिजर्व बैंक, बैंक प्रबंधन और राजनीतिक दलों-सभी की जिम्मेदारी है। दीपावली की असली लक्ष्मी वही है जो ईमानदारी से अर्जित हो, सुरक्षित रहे और देश की आर्थिक समृद्धि में योगदान दे। बही-खाते में केवल लाभ नहीं, जवाबदेही का हिसाब भी साफ होना चाहिए।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
1921 में 3 प्रेसिडेंसी बैंकों को मिलाकर इंपीरियल बैंक बना था। इसे 1955 में भारत सरकार ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में तब्दील किया था। स्टेट बैंक ना तो कांग्रेस ने बनाया ना ही बीजेपी ने।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
IDBI बैंक के सौदे के बाद पक्ष-विपक्ष में बहस चल रही है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने बैंक बनाए, जबकि मोदी सरकार बैंक बेच रही है। सच तो यह है कि ज़्यादातर बैंक ना तो कांग्रेस ने बनाए, ना ही बीजेपी ने। आज के सरकारी बैंक कभी प्राइवेट थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें कानून बनाकर सरकारी बैंक बना दिया।
पहले IDBI बैंक की बात कर लेते हैं। भारत सरकार ने 1964 में कानून बनाकर Industrial Development Bank of India (IDBI) बनाया था। मकसद था कंपनियों को लोन देना ताकि वो उद्योग लगा सकें। यह कोई कमर्शियल बैंक नहीं था, जहां रिटेल ग्राहक पैसे जमा कर सकें या लोन ले सकें। ये सिर्फ कंपनियों को लोन देती थी। कंपनियों के चक्कर में IDBI में डूबे क़र्ज़ बढ़ने लगे। 2004 में फ़ैसला हुआ कि इसे कमर्शियल बैंक बनाया जाए, जैसे बाकी बैंक हैं।
IDBI बैंक को डिपॉजिट से सस्ता पैसा मिलेगा। बैंक क़र्ज़ देकर प्रॉफिट बनाएगी। 2016 में बैंक डूबे क़र्ज़ के कारण फिर मुश्किल में पड़ गई। सरकार ने 2019 में LIC को 51% हिस्सेदारी बेचकर बैंक को बचाया। बैंक को घाटे से उबारा और अब Fairfax को बेच रही है। IDBI की पूरी यात्रा देखेंगे तो कांग्रेस ने बनाया है और बीजेपी ने बचाया है।
अब आइए 12 सरकारी बैंकों पर, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया समेत 12 बैंक हैं। स्टेट बैंक की स्थापना ब्रिटिश राज में हुई थी। 1921 में 3 प्रेसिडेंसी बैंकों को मिलाकर इंपीरियल बैंक बना था। इसे 1955 में भारत सरकार ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में तब्दील किया था। स्टेट बैंक ना तो कांग्रेस ने बनाया, ना ही बीजेपी ने। ना ही इसे बेचने का कोई प्लान है।
अब आइए, बचे हुए 11 सरकारी बैंकों पर जैसे बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ बड़ौदा। ये बैंक प्राइवेट थे। 1969 में इंदिरा गांधी की सरकार ने 14 प्राइवेट बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। तब भी उस पर सवाल उठे थे। 1970 में सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण के कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
सरकार ने कानून में फिर बदलाव किया। 1980 में 6 और प्राइवेट बैंकों को सरकार अपने अधीन ले लिया। 2014 में 27 सरकारी बैंक थे, जिन्हें मर्ज करने के बाद 12 पर लाया गया है। इनमें से कोई बैंक ना तो कांग्रेस ने बनाए हैं, ना ही बीजेपी ने।
ये सिफारिश की जाती रही है कि देश में 4-5 बड़े सरकारी बैंक होना चाहिए, जो ग्लोबल लेवल पर अपनी जगह बना सके। सरकार ने 2021 में घोषणा की थी कि वो 2 सरकारी बैंकों को बेच देगी। IDBI बैंक उसमें शामिल नहीं था। IDBI बैंक को रिजर्व बैंक ने प्राइवेट बैंक की श्रेणी में रखा है। बैंकों पर राजनीति इतनी ज़्यादा हो रही है कि सरकार चाहकर भी आगे नहीं बढ़ पा रही है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
धर्मपाल जी की किताब 'द ब्यूटीफुल ट्री' हमें ऐसे भारत के दर्शन कराती है, जहां प्रत्येक गांव में एक या अधिक स्कूल थे। ये स्कूल ज्ञान और कौशल देने का काम करते थे।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रो. संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।
संकटग्रस्त और बिखरती पारिवारिक व्यवस्था, ध्वस्त होते जीवन-मूल्य और अपनी जड़ों से उखड़ती पीढ़ी वर्तमान की बड़ी चुनौतियां हैं। इनके बीच उपनिवेशवादी मानसिकता से प्रभावित शिक्षा व्यवस्था हमें आज भी जकड़े हुए है। अंग्रेजों के जाने के आठ दशक बाद भी हम अपनी शिक्षा व्यवस्था को उन संकटों से मुक्त नहीं करा पाए हैं, जो लंबी दासता ने दिए थे। इसी कारण 'इंडिया' से 'भारत' की ओर हमारा प्रवास संभव नहीं हो पा रहा है।
धर्मपाल जी की किताब 'द ब्यूटीफुल ट्री' हमें ऐसे भारत के दर्शन कराती है, जहां प्रत्येक गांव में एक या अधिक स्कूल थे। ये स्कूल ज्ञान और कौशल देने का काम करते थे। अंग्रेजों ने इस भारतीय शिक्षा व्यवस्था का कैसे ध्वंस किया और क्यों किया, यह समझना जरूरी है। महात्मा गांधी के आरंभिक लेखन में भी क्षत-विक्षत होते भारत का दर्द दिखाई देता है। अंग्रेजी शिक्षा ने हमें 'कमजोर और कम भारतीय' बनाया और अपनी जमीन तथा उसके मूल्यों के प्रति हिकारत और हीनता बोध पैदा किया। यह आत्मदैन्य आज भी हमें जकड़े हुए है।
किताबों तक सिमटी शिक्षा
अंग्रेजी शिक्षा ने 'घर' और 'स्कूल' के बीच दूरी बनाई। इस पढ़ाई ने हमें यह सिखाया कि स्कूल ऊंची जगह है और घर ठीक नहीं है। इस हीनता में फंसकर हमने अपनी संस्कारशाला 'परिवार' और उसके मूल्यों को कमतर मान लिया। बच्चों में नैतिक मूल्य, आदर और सामाजिक जिम्मेदारियां परिवार और समाज द्वारा सिखाई जाती थीं। धीरे-धीरे यह जिम्मेदारी स्कूलों पर डाल दी गई और परिवार की भूमिका गौण होती चली गई।
शिक्षा मुख्य रूप से किताबों और चार दीवारों तक सीमित हो गई। बच्चे घर के पारंपरिक कामकाज, खेती, दस्तकारी और व्यावहारिक जीवन के अनुभवों से दूर होते गए, जबकि पहले ये चीजें घर के माध्यम से सहज रूप से सीखी जाती थीं।
अंग्रेजों की नकल सिर्फ भाषा तक सीमित नहीं रही, बल्कि जीवन में भी प्रवेश कर गई। खानपान, परिधान, दिनचर्या और कैलेंडर तक बदल गए। स्कूल जब बदलते हैं तो वे पूरे सांस्कृतिक परिवेश को बदलने की क्षमता रखते हैं। उस दौर में भारत के गवर्नर जनरल रहे लॉर्ड विलियम बेंटिक ने कहा था, "पढ़ने के बाद वे हमारी नकल करने लगे हैं।"
क्या से क्या हो गए देखते-देखते-
ऐसा देश, जहां लोग 'स्वधर्म' पर चलते हुए अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं, जहां घरों में ताले नहीं हैं, चोरियां नहीं होतीं, लोग झूठ नहीं बोलते और ऊंच-नीच नहीं है-सोचिए कि उस समाज और उसकी शिक्षा की प्रकृति कैसी रही होगी। अनेक विदेशी यात्रियों ने भारत के बारे में ऐसे अनुभव दर्ज किए हैं।
अंग्रेजों की शिक्षा व्यवस्था ने भारतीय समाज का मानस बदला। नतीजतन समाज और उसके मूल्यों में व्यापक बदलाव हुए। सरकार, पुलिस, अदालत और प्रशासनिक तंत्र का महत्व बढ़ा, जबकि हमारी स्वायत्त और समाज-केंद्रित व्यवस्थाएं कमजोर हुईं। हम सरकार के सामने याचक की तरह खड़े हो गए। गांव उजड़ने लगे, स्थानीय उद्यम और कुटीर उद्योग नष्ट हुए तथा पारिवारिक कौशल कमजोर पड़े।
अंग्रेजी शिक्षा ने भारत में गहरे विभाजन पैदा किए। अलीट और नॉन-अलीट का बंटवारा हुआ और 'भारत' तथा 'इंडिया' की अलग पहचान बन गई। हम यह भी समझ नहीं पाए कि पांव छूने, नमस्कार करने और हाथ मिलाने में अंतर क्या है और श्रेष्ठ क्या है।
हर जानकारी नहीं है ज्ञान-
हर जानकारी ज्ञान नहीं है। इस शिक्षा व्यवस्था ने ज्ञान के नाम पर ढेरों जानकारियां परोस दीं, लेकिन जीवन संघर्षों में उनका उपयोग कितना है, यह सवाल बना रहा। हम 'मानने' को 'जानना' समझने लगे और 'क्यों' का विचार पीछे छूट गया।
1750 में दुनिया के उत्पादन और व्यापार में भारत की बड़ी हिस्सेदारी थी। अंग्रेजी राज और उसकी शिक्षा ने हमारी स्वायत्त व्यवस्था को कमजोर कर दिया। नई अंग्रेजी शिक्षा मुक्त नहीं करती थी, बांधती थी। सेवक बनाने पर जोर था, जबकि गुरुकुल पद्धति, स्थानीय हस्तकलाएं, कृषि ज्ञान और स्वदेशी विज्ञान हाशिए पर चले गए।
आधुनिक शिक्षा ने पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को कमजोर किया, जबकि ये प्रणालियां स्थानीय समाज की जरूरतों के अनुकूल थीं। 'लोक' की उपेक्षा से ऐसा समाज खड़ा हुआ जो अपनी जड़ों से उखड़ता गया। स्कूल आधुनिक और पश्चिमी मूल्यों को बढ़ावा देते रहे, जबकि अधिकांश भारतीय घर पारंपरिक और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े रहे। इस वैचारिक अंतर ने घर और विद्यालय के परिवेश में टकराव की स्थिति पैदा की।
इस शिक्षा प्रणाली ने अंग्रेजों की नीतियों को सही ठहराने वाला ऐसा वर्ग तैयार किया, जो मानसिक रूप से उपनिवेशवादी सोच का समर्थन करने लगा। जब तक हम अपनी माटी के ज्ञान और भाषा का सम्मान करना नहीं सीखेंगे, तब तक औपनिवेशिक छाया से पूरी तरह मुक्त होना कठिन है।
अंग्रेजी की लंबी छाया-
भारत ने स्थानीय भाषाओं में अपना ज्ञान विकसित किया था। अंग्रेजी सिर्फ भाषा की तरह नहीं, बल्कि एक 'कौशल' की तरह आई और इसे न जानने वाले कमतर माने जाने लगे। शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होने के कारण आम जनता के लिए उच्च शिक्षा और विज्ञान के दरवाजे सीमित हुए। रटने वाली शिक्षा को बढ़ावा मिला, जिससे मौलिक सोच, अनुसंधान और स्वतंत्र चिंतन पर विपरीत प्रभाव पड़ा।
अंग्रेजी जानने वाले शिक्षित वर्ग और पारंपरिक शिक्षा पाने वाले या अशिक्षित आम जनमानस के बीच गहरी खाई बन गई। 'कोलोनिज्म' को 'डिकोड' करने के सचेत प्रयास होने चाहिए थे, लेकिन हमने कहां किए? आज भी इसकी छाया सरकारी कामकाज में दिखाई देती है। शिक्षा मंत्रालय को मानव संसाधन मंत्रालय बनाया गया और फिर उसे शिक्षा मंत्रालय किया गया। जबकि संस्कृति मंत्रालय को शिक्षा से अलग रखा गया है। क्या संस्कृति और शिक्षा एक-दूसरे के पूरक नहीं हैं?
गुलामी के लंबे कालखंड में आक्रांताओं ने हमारे विश्वविद्यालयों को बार-बार लूटा और नष्ट किया। अंग्रेजों ने जड़ों पर चोट की, मानसिकता बदली, हीन भावना पैदा की और हमारे ही लोगों को हमारे विचार के विरुद्ध खड़ा कर दिया। इस संकट से आज भी हिंदुस्तान जूझ रहा है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बौद्धिक गुलामी की बेड़ियों को तोड़ें, जो हमें अपनी ही माटी में पराया बनाती हैं। जब तक हमारी शिक्षा हमारी संस्कृति, भाषा और मौलिक चिंतन से नहीं जुड़ेगी, तब तक हम वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र नहीं हो सकते। उपनिवेशवाद की छोड़ी हुई छायाओं को मिटाकर ही हम आत्मविश्वासी, स्वदेशी और सशक्त भारतीय समाज का निर्माण कर सकते हैं।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
सवाल है कि FII भारत में सिर्फ इस कारण पैसे लगा देंगे कि टैक्स कम लगेगा। जब तक रिटर्न बढ़ने की संभावना नहीं होगी या शेयर सस्ते नहीं होंगे, तब तक वो क्यों आएंगे?
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
2004 में यूपीए की नई-नई सरकार बनी थी। वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने बजट में बड़ी घोषणा कर दी। शेयरों पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स (LTCG) को खत्म कर दिया गया था। 12 महीने बाद शेयर बेचने से होने वाले प्रॉफिट पर कोई टैक्स नहीं देना था।
इसके बदले शेयरों को खरीदने या बेचने पर STT यानी सिक्योरिटी ट्रांजेक्शन टैक्स लगाया गया। NDA सरकार ने 2018 में शेयरों पर LTCG फिर लगा दिया और STT को बनाए रखा।
अब दोनों टैक्स खत्म करने की मांग उठ रही है। इससे FII यानी विदेशी निवेशक आकर्षित होने की उम्मीद है, लेकिन क्या इससे FII दौड़े चले आएंगे? हिसाब-किताब LTCG का। वित्त मंत्री ने कहा है कि वो इस बहस को ध्यान से सुन रही हैं। वो बजट से पहले कुछ कहना नहीं चाहती हैं। बाजार ने इसका मतलब निकाला कि सरकार LTCG पर कुछ कर सकती है।
पहले यह समझ लीजिए कि LTCG हटाने की मांग क्यों उठ रही है?
FII भारत के शेयर बाजार में लगातार बिकवाली कर रहे हैं। पिछले 12 महीनों में वो 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के शेयर बेच चुके हैं। यह बाजार में गिरावट का एक बड़ा कारण माना जा रहा है। FII को आकर्षित करने के लिए LTCG हटाने की मांग की जा रही है। इससे उनके रिटर्न में सुधार आने की उम्मीद है।
SBI रिसर्च ने सलाह दी है कि LTCG को खत्म कर दिया जाना चाहिए। साथ में शेयरों को रखने की अवधि 1 साल से बढ़ाकर 2 या 3 साल कर दी जाए। सरकार के लिए यह टैक्स हटाना इतना आसान नहीं है, क्योंकि शेयरों पर LTCG से पिछले साल सरकार को ₹1.29 लाख करोड़ की कमाई हुई थी। क्या सरकार इतनी बड़ी रकम छोड़ सकती है? ऑयल और खाद सब्सिडी सरकार को इस साल बजट अनुमान से ज्यादा देनी पड़ रही है। खर्चे बढ़ रहे हैं, लेकिन आमदनी उस अनुपात में नहीं।
मान लीजिए कि सरकार ने LTCG हटा दिया तो क्या FII भारत में शेयर खरीदने लगेंगे?
Bernstein ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि LTCG हटाना पर्याप्त नहीं है। शॉर्ट रैली आ सकती है, लेकिन उस तेजी को बरकरार रखना मुश्किल होगा। विदेशी निवेशकों को भारतीय कंपनियां अब भी महंगी लगती हैं।
शेयरों की महंगाई मापने का एक पैमाना है कि PE Ratio कितना है? जितना ज्यादा Ratio, शेयर उतने महंगे माने जाते हैं। MSCI इंडेक्स को देखकर विदेशी पैसा लगाते हैं। MSCI India का PE लगभग 18 है, जबकि MSCI Emerging Markets का लगभग 9। मतलब भारतीय शेयरों की कीमत लगभग दो गुनी है, जबकि रिटर्न Emerging Markets का बेहतर है। पिछले 12 महीनों में MSCI India का रिटर्न -14% है, जबकि Emerging Markets का +27%।
सवाल है कि FII भारत में सिर्फ इस कारण पैसे लगा देंगे कि टैक्स कम लगेगा। जब तक रिटर्न बढ़ने की संभावना नहीं होगी या शेयर सस्ते नहीं होंगे, तब तक वो क्यों आएंगे? हां, LTCG के साथ-साथ STT वसूलना गलत है। किसी एक टैक्स को जाना चाहिए। 2004 के फैसले की भावना का सम्मान करना चाहिए।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
संसद के भाषण में उन्होंने कहा था, "संविधान के लिए कुछ लोगों का कहना है कि मुख्य तत्व मूल अधिकार है, तो कुछ निर्देशक सिद्धांतों को वैसा मानते हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी ने पिछले दिनों विपक्ष और कुछ बाहरी ताकतों पर देश में अराजकता फैलाकर सरकार को अस्थिर करने और 'तख्तापलट' के जरिए जल्द से जल्द सत्ता में आने की कोशिश का गंभीर आरोप लगाए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सप्ताह एक कार्यक्रम में कहा कि दुनिया जहां नए ऑर्डर की तलाश में है, कुछ लोग भारत में डिसऑर्डर के सपने देख रहे हैं।
कुछ लोग दुनिया में जाकर भारत को बदनाम कर रहे हैं। यह पहला अवसर नहीं है। 7 मई 2024 में भी प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि कुछ विदेशी ताकतें भारत के चुनावों को प्रभावित करने का प्रयास कर रही हैं। लेकिन ये प्रयास कभी सफल नहीं होंगे। 21 फरवरी 2016 को प्रधानमंत्री मोदी ने एक रैली में आरोप लगाया कि कुछ एनजीओ और उन लोगों के समूह, जिनके हित सरकार के कदमों से प्रभावित हुए, उनकी सरकार को अस्थिर करने और उन्हें बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने विदेशी धन के स्रोत और उसके इस्तेमाल का हिसाब देने की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत को विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की आवश्यकता है, लेकिन विदेशी विनाशकारी विचारधारा से भी देश की रक्षा करनी होगी।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विदेशी योगदान नियमन कानून के तहत विदेशी धन के प्रवाह और उसके उपयोग की निगरानी के मुद्दे पर साफ कहा है कि विदेशी फंडिंग से सामाजिक अशांति पैदा करने या देश की जनसांख्यिकी बदलने की कोशिश करने वाले संगठनों के प्रति सरकार नरमी नहीं बरतेगी।
शाह ने आरोप लगाया कि कुछ एनजीओ विदेशी धन का दुरुपयोग राष्ट्रविरोधी गतिविधियों और धार्मिक धर्मांतरण के लिए कर रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ संगठन सरकारी कल्याण योजनाओं के कार्यान्वयन में बाधाएं पैदा करते हैं।
कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी और उनके आंदोलनों के समर्थक इन आरोपों को पूर्वाग्रही और बेबुनियाद बताने की कोशिश करते हैं। जबकि भारत की राजनीति में विदेशी हस्तक्षेप का सवाल केवल किसी एक प्रधानमंत्री, किसी एक राजनीतिक दल या किसी एक दौर तक सीमित नहीं रहा है।
स्वतंत्रता के बाद से ही भारतीय नेताओं ने समय-समय पर आशंका जताई कि देश के भीतर राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने, सरकार की नीतियों को प्रभावित करने, विपक्षी समूहों को समर्थन देने और राष्ट्रीय हितों को कमजोर करने में विदेशी शक्तियों की भूमिका हो सकती है।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सार्वजनिक भाषणों और राजनीतिक चर्चाओं में विदेशी हस्तक्षेप का मुद्दा उठाया। उनके समकालीन कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने भी कई बार अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सीआईए का नाम लेकर ऐसे आरोप लगाए थे। उस समय मैंने स्वयं हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी के संवाददाता के रूप में उनसे इंटरव्यू अथवा पत्रकार समूहों के साथ चर्चा के दौरान कही गई बातें रिपोर्ट की थीं।
इंदिरा गांधी को आशंका थी कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत के स्वतंत्र निर्णयों को प्रभावित करने के प्रयास हो सकते हैं। इस पृष्ठभूमि में सीआईए का नाम भारतीय राजनीतिक बहस में बार-बार आया। उस समय सीआईए पर दूसरे देशों में गुप्त राजनीतिक गतिविधियों और सरकारों को प्रभावित करने के आरोप केवल भारत में नहीं लगते थे। ईरान, ग्वाटेमाला, चिली और अन्य देशों के मामले महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
आज यही बात बांग्लादेश, नेपाल, फ्रांस में हुई घटनाओं के संदर्भ में कही जा रही हैं। अब तो माओवादी लेनिनवादी संगठन की कथित युवा नेत्री और कांग्रेस के साथ खड़े कई कथित एक्टिविस्ट भारत में 'रिजीम चेंज' यानी तख्ता पलट की आवाज लगा रहे हैं।
वर्तमान विवाद के दौरान इंदिरा गांधी द्वारा 27 अक्टूबर 1976 को लोकसभा में अपने भाषण के दौरान कही गई बात बहुत दिलचस्प और महत्वपूर्ण है। तब मैं संसद की कार्यवाही सदन में बैठकर सुन और रिपोर्ट करता था। श्रीमती गांधी ने कहा था, "भाड़े के कुछ राजनीतिज्ञों की जड़ें भारत में नहीं हैं, लेकिन विदेशों में उनको भारत का नेता कहकर हाथोंहाथ लिया जाता है।
वे विदेशी दूतावासों के चक्कर लगाते हैं। वे केवल चांदी के चंद टुकड़ों के लिए ही नहीं, बल्कि व्हिस्की की बोतलों, विदेश यात्राओं की लालसा या अपने बच्चों को विदेशी वजीफा पाने के लिए ऐसा करते हैं। जो कोई भारत के गौरवशाली अतीत पर और भारतीय जनता पर गौरव करता हो, उसे लोकतंत्र के इन तथाकथित 'मित्रों' पर लज्जा अवश्य अनुभव होगी।"
आजकल राहुल गांधी एक लाल कवर वाली एक छोटे आकार वाली किताब को 'संविधान' की किताब कहकर सभाएं करते हैं। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अदालतों की बात सुनने को तैयार नहीं होते, लेकिन उनको इंदिरा गांधी के भाषण का एक अंश अवश्य पढ़ना चाहिए। संसद के भाषण में उन्होंने कहा था, "संविधान के लिए कुछ लोगों का कहना है कि मुख्य तत्व मूल अधिकार है, तो कुछ निर्देशक सिद्धांतों को वैसा मानते हैं।
अन्य लोगों के अनुसार 'न्यायिक समीक्षा' इसका सार तत्व है। कुछ लोगों ने संवैधानिक सर्वोच्चता का सिद्धांत प्रस्तुत किया है। परन्तु वास्तविक सर्वोच्चता जनता की है। संविधान एक महत्वपूर्ण दस्तावेज अवश्य है, लेकिन यह जनता की सेवा के लिए एक साधन है। लोगों को उसका आदर करना चाहिए, लेकिन उसकी खातिर लोगों की बलि नहीं दी जा सकती।"
पंजाब की स्थिति में सीमा-पार से समर्थन, उग्रवादी संगठनों की गतिविधियों और विदेशी धन की भूमिका पर अलग-अलग ऐतिहासिक और सुरक्षा संबंधी चर्चाएं संसद के अंदर और बाहर होती रही हैं। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने भी विदेशी शक्तियों द्वारा भारत को अस्थिर करने की आशंका सार्वजनिक रूप से व्यक्त की। लेकिन उनके मामले में संदर्भ अलग था।
उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे, बोफोर्स सौदे का विवाद उभर चुका था और विपक्ष सरकार की जवाबदेही की मांग कर रहा था। 16 मई 1987 को दिल्ली के बोट क्लब में कांग्रेस की विशाल रैली हुई। राजीव गांधी ने अपने भाषण में विदेशी शक्तियों और उनके भारतीय सहयोगियों पर देश को अस्थिर करने का आरोप लगाया और कहा कि भारत को दबाव में लाने के लिए भ्रष्टाचार संबंधी आरोपों तथा साम्प्रदायिक तनावों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
राजीव गांधी ने फिजी में सैन्य तख्तापलट का संदर्भ देते हुए कहा कि वे भारत में ऐसी स्थिति पैदा नहीं होने देंगे। उन्होंने चिली और अफ्रीका के कुछ देशों में निर्वाचित सरकारों को हटाए जाने की घटनाओं का भी उल्लेख किया। यह भाषण ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है।
राजीव गांधी ने भी अपने विरुद्ध राजनीतिक आरोपों के बीच राष्ट्रीय संप्रभुता और विदेशी दबाव का प्रश्न उठाया। राजीव गांधी के कार्यकाल में ही सीआईए से जुड़े 'रामस्वरूप जासूसी काण्ड' पर मैंने 'नवभारत टाइम्स' में कई रिपोर्ट लिखी थी। कानूनी नोटिस भी हमें मिले। लेकिन बाद में 29 जनवरी 1986 को इस आरोप का उल्लेख किए बिना उनकी सरकार के दो मंत्रियों के इस्तीफे हुए।
भारत की अपेक्षा अमेरिकी मीडिया में इन इस्तीफों को जासूसी कांड का उल्लेख करते हुए खबरें प्रकाशित हुईं। नरसिम्हा राव की सरकार में अमेरिकी दबाव में परमाणु परीक्षण न होने देने और एक दशक बाद कांग्रेस की मनमोहन सरकार में परमाणु समझौते के तथ्य सर्वविदित हैं। यही नहीं, सबसे अनुभवी राजनयिक और विदेश मंत्री नटवर सिंह का इस्तीफा उसी तरह के दबाव में लिया गया।
मोदी सरकार पर संविधान और चुनाव व्यवस्था पर आरोपों और आंदोलनों के साथ यूरोप के लोकतांत्रिक देशों का उल्लेख बहुत किया जा रहा है। इसलिए मुझे जर्मनी के संविधान के कुछ तथ्य ध्यान में आते हैं। मैं 1979 से 1982 तक जर्मन रेडियो में भी हिंदी विभाग का संपादक रहा हूँ और बाद में भी यूरोपीय देशों और अमेरिका के चुनावों में जाता रहा हूँ।
जर्मनी के संविधान की धारा 18 में कहा गया है : "जब अभिव्यक्ति की, विशेषतः प्रेस की स्वतंत्रता, संगठन बनाने की स्वतंत्रता, डाक-तार आदि को गोपनीय रखने या सम्पत्ति तथा शरण लेने के अधिकार का दुरुपयोग स्वतंत्र रूप से बनाई गई लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रहार के लिए किया जाए, तो ये मूल अधिकार प्रभावी नहीं माने जाएंगे।"
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
पीयूष पांडेय को इस दुनिया से गए एक साल हो गया है। वक्त तेजी से गुजरता है, लेकिन ओगिल्वी और भारतीय विज्ञापन जगत में उनके योगदान को भुलाना आसान नहीं है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
गणपति विश्वनाथन, कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक।।
पीयूष पांडेय को इस दुनिया से गए एक साल हो गया है। वक्त तेजी से गुजरता है, लेकिन ओगिल्वी और भारतीय विज्ञापन जगत में उनके योगदान को भुलाना आसान नहीं है। आज जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), इन्फ्लुएंसर्स, छोटे वीडियो, डिजिटल मार्केटिंग, आंकड़ों और एल्गोरिदम की वजह से विज्ञापन की दुनिया तेजी से बदल रही है, तो एक सवाल उठता है कि अगर पीयूष पांडेय आज हमारे बीच होते, तो विज्ञापन जगत को क्या सीख देते?
शायद उनका पहला संदेश यही होता कि तकनीक विज्ञापन बनाने के तरीके बदल सकती है, लेकिन हमें सोचने का तरीका नहीं बदलना चाहिए।
क्लाइंट सर्विसिंग से क्रिएटिव लीडरशिप तक का सफर
पीयूष पांडेय का सफर अपने आप में खास और प्रेरणादायक था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत क्लाइंट सर्विसिंग से की। इसके बाद वह क्रिएटिव काम की ओर आए और आगे चलकर ओगिल्वी में क्रिएटिव नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने लंबे समय तक इस जिम्मेदारी को निभाया और विज्ञापन जगत को कई यादगार अभियान दिए।
उनकी पहचान सिर्फ किसी एक बड़े विज्ञापन या किसी खास दौर की सफलता तक सीमित नहीं थी। उनकी असली ताकत लगातार अच्छा काम करते रहना और ऐसे विचार पेश करना था, जो लोगों से जुड़ते थे और ब्रैंड को एक अलग पहचान देते थे।
आज के दौर में यह बात खास मायने रखती है, जब विज्ञापन जगत में हर कोई तुरंत चर्चा में आने की कोशिश करता है। सुबह कोई अभियान लोगों के बीच चर्चा का विषय बनता है और शाम तक लोग उसे भूल भी जाते हैं।
पीयूष पांडेय का करियर हमें याद दिलाता है कि विज्ञापन का मतलब हर समय कुछ नया और चौंकाने वाला करना नहीं है। असली काम ऐसे विचार तैयार करना है, जो लंबे समय तक लोगों के दिलों और दिमाग में बने रहें और ब्रैंड की पहचान मजबूत करें।
अवॉर्ड जरूरी हैं, लेकिन ब्रैंड उससे भी ज्यादा जरूरी है
पीयूष पांडेय पुरस्कारों की अहमियत समझते थे। उनका मानना था कि पुरस्कार मिलने से क्रिएटिव टीम का उत्साह बढ़ता है, लोगों का आत्मविश्वास मजबूत होता है और एजेंसियों को बेहतर काम करने की प्रेरणा मिलती है।
लेकिन पुरस्कार जीतना कभी भी काम का सबसे बड़ा मकसद नहीं होना चाहिए। सबसे पहली जिम्मेदारी ब्रैंड के प्रति होती है।
उनकी सोच को इस तरह समझा जा सकता है कि अगर कोई विज्ञापन ब्रैंड की असली समस्या का समाधान करता है, लोगों से जुड़ता है और साथ ही कोई पुरस्कार भी जीत लेता है, तो यह अतिरिक्त खुशी की बात है। विज्ञापन को पहले क्लाइंट और उपभोक्ता के लिए उपयोगी होना चाहिए। अगर उसे पहचान मिले, टीम का उत्साह बढ़े और एजेंसी की प्रतिष्ठा मजबूत हो, तो यह और भी अच्छी बात है।
आज यह सीख इसलिए जरूरी है, क्योंकि कई बार ऐसा काम बनाने का दबाव रहता है, जिसे ज्यादा लाइक मिलें, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो या पुरस्कार जीत सके। ऐसे में ब्रैंड की असली जरूरत पीछे छूट सकती है।
पीयूष पांडेय की सोच हमें याद दिलाती है कि अच्छा विज्ञापन वह नहीं है, जो सिर्फ लोगों का ध्यान खींचे। अच्छा विज्ञापन वह है, जो लोगों से जुड़ने के साथ ब्रैंड के लिए भी काम करे।
आम जिंदगी को देखने और समझने की खास ताकत
पीयूष पांडेय की सबसे बड़ी खूबियों में से एक थी उनकी चीजों को ध्यान से देखने और समझने की क्षमता। वह रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसी छोटी-छोटी बातें खोज लेते थे, जिन पर आमतौर पर लोगों का ध्यान नहीं जाता। फिर उन्हीं बातों को एक यादगार विज्ञापन के विचार में बदल देते थे।
वह समझते थे कि किसी बड़े विज्ञापन विचार के लिए हमेशा बहुत जटिल रणनीति या लंबी व्याख्या की जरूरत नहीं होती। कई बार सबसे अच्छा विचार हमारे आसपास ही मौजूद होता है।
साधारण-सी बात को यादगार संदेश में बदलना उनकी रचनात्मकता की बड़ी ताकत थी। हास्य भी उनकी विज्ञापन शैली का अहम हिस्सा था। वह समझते थे कि कहां हंसी-मजाक किसी विचार को ज्यादा असरदार, यादगार और इंसानी बना सकता है।
आज विज्ञापन बनाने वालों के पास उपभोक्ताओं से जुड़े ढेरों आंकड़े हैं। उन्हें पता चल सकता है कि लोग क्या खोजते हैं, क्या देखते हैं, क्या खरीदते हैं, क्या साझा करते हैं और किस पर क्लिक करते हैं।
लेकिन आंकड़े यह बता सकते हैं कि लोग क्या कर रहे हैं। वे हमेशा यह नहीं बताते कि लोग क्या महसूस कर रहे हैं। इसके लिए लोगों को समझना, उनकी भावनाओं को महसूस करना और उनकी जिंदगी को करीब से देखना जरूरी है।
क्या पीयूष पांडेय AI को अपनाते?
इसका जवाब शायद हां होता। पीयूष पांडेय बदलाव से डरने वालों में नहीं थे। संभव है कि वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को भी उत्सुकता के साथ समझते और देखते कि इससे नए विचार खोजने, जानकारी का विश्लेषण करने, विज्ञापन के अलग-अलग रूप तैयार करने और काम तेजी से करने में किस तरह मदद मिल सकती है।
वह AI को रचनात्मक काम में इस्तेमाल होने वाले एक और औजार के रूप में देखते। लेकिन क्या वह इंसानी सोच की जगह AI को लेने देते? शायद नहीं।
उनकी सोच का एक अहम पहलू यह था कि मशीनें इंसानों की तरह स्वतंत्र रूप से नहीं सोचतीं। वे इंसानी सोच और निर्देशों की मदद से काम करती हैं। आज के दौर में यह अंतर और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
AI कुछ ही समय में सैकड़ों विज्ञापन विचार तैयार कर सकता है। लेकिन असली चुनौती यह पहचानना है कि उनमें से किस विचार के पीछे इंसानी भावना, कोई सच्चाई और लोगों से जुड़ने की क्षमता है।
मशीन कोई जवाब दे सकती है, लेकिन उस जवाब का लोगों के लिए कोई मतलब भी है या नहीं, यह तय करने की जिम्मेदारी रचनात्मक सोच रखने वाले इंसान की ही होती है।
एल्गोरिदम पर भरोसा करें, लेकिन अपनी समझ न छोड़ें
आज विज्ञापन की दुनिया तेजी से आंकड़ों और एल्गोरिदम पर निर्भर होती जा रही है। विज्ञापन की योजना आंकड़ों के आधार पर बनती है, सही दर्शकों तक पहुंचना पहले से आसान हुआ है और अभियान का प्रदर्शन भी तेजी से मापा जा सकता है।
इस बदलाव ने विज्ञापन को ज्यादा जवाबदेह बनाया है। अब कंपनियां बेहतर तरीके से समझ सकती हैं कि उनका पैसा कहां खर्च हो रहा है और उससे क्या नतीजे मिल रहे हैं। लेकिन पीयूष पांडेय शायद यह याद दिलाते कि उपभोक्ता किसी कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखने वाले आंकड़े भर नहीं हैं। वे भावनाओं, इच्छाओं, असुरक्षाओं, उम्मीदों और हास्यबोध वाले इंसान हैं।
खतरा यह है कि आंकड़ों के जरिए उपभोक्ता को समझने की कोशिश में हम उसके पीछे मौजूद इंसान को ही भूल जाएं।
वह युवा क्रिएटिव लोगों से शायद कहते कि जानकारी जुटाने के हर उपलब्ध तरीके का इस्तेमाल करो, लेकिन लोगों को करीब से देखना कभी बंद मत करो। उनसे बात करो, उनकी बातें सुनो और उनके व्यवहार को समझो। यह जानने की कोशिश करो कि उन्हें किस बात पर हंसी आती है, किस चीज से परेशानी होती है, वे क्या हासिल करना चाहते हैं और किस बात से डरते हैं।
कई बार सबसे अलग और असरदार विज्ञापन विचार इसी तरह की छोटी-छोटी बातों से निकलते हैं।
छोटे वीडियो के दौर में भी विचार बड़ा होना चाहिए
छोटे वीडियो यानी शॉर्ट-फॉर्म वीडियो ने विज्ञापन देखने और समझने का तरीका बदल दिया है। अब ब्रैंड के पास लोगों का ध्यान खींचने के लिए कुछ सेकंड ही होते हैं। कई बार इससे भी कम समय में अपना संदेश पहुंचाना पड़ता है। लेकिन पीयूष पांडेय शायद कम समय को रचनात्मकता का दुश्मन नहीं मानते। वह सादगी की ताकत समझते थे। अगर विचार मजबूत हो, तो छोटा संदेश भी लोगों पर गहरा असर डाल सकता है।
असल चुनौती यह नहीं है कि विज्ञापन छह सेकंड का है या 60 सेकंड का। असली सवाल यह है कि क्या उसमें कोई ऐसी बात है, जिसे लोग याद रखना चाहेंगे?
छोटे वीडियो के दौर में सोच को छोटा करने की जरूरत नहीं है। जरूरत है विचार को ज्यादा स्पष्ट, सटीक और असरदार बनाने की।
युवा क्रिएटिव लोगों को क्या सलाह देते?
शायद पीयूष पांडेय युवा विज्ञापन निर्माताओं से कहते कि पुरस्कारों के पीछे भागने के बजाय अच्छे विचारों की तलाश करो। विज्ञापन को सिर्फ चतुर दिखाने की कोशिश मत करो, उसे लोगों के लिए मायने रखने वाला बनाओ। जटिलता को रचनात्मकता मत समझो और तकनीक को अपनी जगह सोचने मत दो।
सबसे जरूरी बात, ब्रैंड को समझो। पीयूष पांडेय के लिए रचनात्मकता और ब्रैंड एक-दूसरे से अलग नहीं थे। सबसे अच्छा काम तब निकलता है, जब कोई मजबूत रचनात्मक विचार ब्रैंड की असली पहचान और जरूरत से जुड़ता है।
यह बात आज भी उतनी ही जरूरी है, चाहे विज्ञापन टेलीविजन पर दिखाया जाए, इंस्टाग्राम पर आए, यूट्यूब पर चले, मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई दे या AI की मदद से तैयार किया गया हो। तकनीक और मंच बदल सकते हैं, लेकिन ब्रैंड को समझने और लोगों से जुड़ने की जरूरत कभी खत्म नहीं होती।
क्यों हमेशा याद आएंगे पीयूष पांडेय?
पीयूष पांडेय को सिर्फ इसलिए याद नहीं किया जाएगा कि उन्होंने भारत को कई यादगार विज्ञापन दिए। उन्हें इसलिए भी याद किया जाएगा, क्योंकि उन्होंने रचनात्मकता को देखने और समझने का एक अलग नजरिया दिया।
उन्होंने दिखाया कि विज्ञापन सरल हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसमें गहराई न हो। वह मजेदार हो सकता है, लेकिन सिर्फ मनोरंजन तक सीमित होना जरूरी नहीं। वह भावनात्मक हो सकता है, लेकिन उसे जरूरत से ज्यादा भावुक बनाने की जरूरत नहीं। उन्होंने यह साबित किया कि आम जिंदगी से जुड़ी साधारण बातें भी ब्रैंड के लिए असाधारण विचार बन सकती हैं।
एक साल बाद विज्ञापन जगत AI, एल्गोरिदम, क्रिएटर्स और नए डिजिटल मंचों की दुनिया में और आगे बढ़ चुका है। काम करने के औजार तेजी से बदल रहे हैं, लेकिन बुनियादी चुनौती आज भी वही है- ऐसा विचार खोजना, जो एक इंसान को दूसरे इंसान से जोड़ सके।
अगर पीयूष पांडेय आज हमारे बीच होते, तो शायद इन नई तकनीकों को देखकर मुस्कुराते और कहते कि हर उपलब्ध औजार का इस्तेमाल करो, लेकिन सोचना मत भूलो। शायद यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है और यही वजह है कि विज्ञापन जगत उन्हें हमेशा याद करता रहेगा।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
उनकी रचनात्मक सोच, लोगों को समझने की क्षमता, क्लाइंट्स के साथ उनके रिश्ते, जयपुर से लगाव और क्रिकेट के प्रति जुनून उनके व्यक्तित्व के ऐसे पहलू थे, जिन्होंने उन्हें एक अलग पहचान दी।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. अनुराग बत्रा।।
विज्ञापन जगत के दिग्गज पीयूष पांडेय को उनकी पहली पुण्यतिथि पर याद करने का मौका एक बार फिर उनकी शख्सियत के उन पहलुओं की ओर ध्यान खींचता है, जो उनके विज्ञापनों और पेशेवर उपलब्धियों से आगे थे। उनकी रचनात्मक सोच, लोगों को समझने की क्षमता, क्लाइंट्स के साथ उनके रिश्ते, जयपुर से लगाव और क्रिकेट के प्रति जुनून उनके व्यक्तित्व के ऐसे पहलू थे, जिन्होंने उन्हें एक अलग पहचान दी।
पीयूष पांडेय के लिए क्रिएटिविटी केवल दफ्तर या विचार-विमर्श तक सीमित नहीं थी। रोजमर्रा की जिंदगी में होने वाली कोई घटना, किसी से बातचीत या यात्रा के दौरान दिखाई देने वाली कोई चीज उनके लिए नए विचार की शुरुआत बन सकती थी। लोगों के रहन-सहन, बोलने के तरीके और सोच को समझने की उनकी सहज क्षमता उनके काम में दिखाई देती थी। यही वजह थी कि उनके विज्ञापनों में भारतीय जीवन और संस्कृति की झलक स्वाभाविक रूप से नजर आती थी।
क्लाइंट्स के साथ उनके रिश्ते भी उनकी कार्यशैली का अहम हिस्सा थे। वह अपने क्लाइंट्स के सम्मान की कद्र करते थे और उन्हें भी उतना ही सम्मान देते थे। उनकी कोशिश रहती थी कि क्लाइंट्स की अपेक्षाओं को समझते हुए उनके साथ मिलकर काम किया जाए और क्रिएटिव विचारों से समझौता किए बिना एक साझा रास्ता निकाला जाए। उनके लिए किसी अभियान की सफलता जितनी महत्वपूर्ण थी, उतना ही महत्वपूर्ण उससे जुड़े लोगों के साथ बना रिश्ता भी था। रचनात्मक विचारों पर उनका भरोसा और लोगों के साथ काम करने की उनकी क्षमता ने उन्हें लंबे समय तक टिकने वाले पेशेवर संबंध बनाने में मदद की।
जयपुर से उनका जुड़ाव भी उनकी जिंदगी का एक खास हिस्सा था। मौका मिलने पर वह अपने गृह शहर जाना, वहां के परिचित माहौल में समय बिताना और मशहूर कचौरियों का आनंद लेना पसंद करते थे। देश-विदेश तक फैले उनके पेशेवर जीवन के बावजूद जयपुर से उनका रिश्ता बना रहा। उनके लिए यह शहर केवल जन्मस्थान नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने का एक अहम माध्यम था।
क्रिकेट के प्रति उनका जुनून भी कम नहीं था। पीयूष पांडेय केवल क्रिकेट देखने के शौकीन नहीं थे, बल्कि उन्होंने इस खेल को गंभीरता से खेला भी था। वह दिल्ली विश्वविद्यालय और राजस्थान का प्रतिनिधित्व कर चुके थे। हालांकि, पेशेवर व्यस्तताओं के कारण उनके लिए पूरा मैच देख पाना हमेशा संभव नहीं होता था, लेकिन वह स्कोर पर नजर रखते और मैदान पर चल रही गतिविधियों की जानकारी लेते रहते थे। इसके साथ ही परिवार और अपनों के साथ बिताया गया समय भी उनके लिए महत्वपूर्ण था।
पीयूष पांडेय को याद करते समय उनके चर्चित विज्ञापनों और भारतीय विज्ञापन जगत में उनके योगदान की चर्चा स्वाभाविक है। लेकिन उनकी यादें केवल उनके काम तक सीमित नहीं हैं। लोगों के साथ हुई बातचीत, यात्राएं, साथ बैठकर भोजन करना, जयपुर के प्रति उनका लगाव और क्रिकेट में उनकी दिलचस्पी भी उनकी शख्सियत का हिस्सा हैं। उनके निधन के एक साल बाद भी उनका काम याद किया जाता है, उस पर चर्चा होती है और उसे समझा जाता है। वहीं, उन्हें करीब से जानने वालों के लिए उनकी याद एक ऐसे इंसान की भी है, जो रोजमर्रा की जिंदगी में रचनात्मकता तलाशता था और उन लोगों व जगहों से जुड़ा रहा, जो उसके लिए मायने रखते थे।
(डॉ. अनुराग बत्रा BW Businessworld के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ और एक्सचेंज4मीडिया के फाउंडर हैं।)
औसत भारतीय का आचरण अंग्रेजी शासनकाल में कैसा था, कहने की जरूरत नहीं है। हम कोहिनूर को छोड़कर कांच की ओर दौड़ रहे थे। अंग्रेजी भाषा और संस्कृति श्रेष्ठता की परिचायक बन गई।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रो. संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।
कोई भी राष्ट्र जिस स्थिति में होता है, उसके लिए वह खुद जिम्मेदार होता है। जापानी जैसे हैं, उनका देश वैसा ही है। इसी तरह इजरायल, चीन, ईरान या किसी भी देश के बारे में कहा जा सकता है। भारत भी वैसा ही है, जैसे हम हैं। ऐसे में कभी विदेशी आक्रांताओं, कभी मैकाले और कभी आजादी के बाद सत्ता में आए नायकों को कोसते हुए हम अपने कर्तव्यबोध से मुक्त हो जाते हैं। कोई भी राष्ट्र अपने नागरिकों की सामूहिक चेतना के आधार पर विकसित होता है। उसका इतिहासबोध, संस्कृतिबोध, मित्रबोध और शत्रुबोध मिलकर राष्ट्रीय मानस और राष्ट्रीय भाव का निर्माण करते हैं।
लंबे समय की गुलामी ने हमें आत्मदैन्य और आत्महीनता की ओर ढकेल दिया। भारतीय समाज के पारंपरिक मूल्यों को छोड़कर हम शासक वर्गों द्वारा थोपी जा रही संस्कृति का अनुगमन करने लगे। हमें लगा कि हमारे अंग्रेज शासक, उनकी भाषा, पहनावा और संस्कृति हमसे बेहतर है। उनके अनुयायी बनकर ही हमारी मुक्ति है। तत्कालीन समाज के श्रेष्ठ जन भी ब्रिटिश शासन में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त कर भारत लौटते थे और खुद को आधा-अधूरा अंग्रेज साबित करने में जुट जाते थे। देश में तमाम सर, रायबहादुर और साहेब बहादुर हमारे आदर्श बन गए।
स्वामी विवेकानंद, लोकमान्य तिलक, महर्षि अरविन्द, महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी, भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और रवीन्द्रनाथ टैगोर के गहरे भारतबोध ने हमें संभाला, वरना हमारी दास्तां भी न होती दास्तानों में। हमारी हस्ती मिटने से कोई रोक नहीं सकता था।
औसत भारतीय का आचरण अंग्रेजी शासनकाल में कैसा था, कहने की जरूरत नहीं है। हम कोहिनूर को छोड़कर कांच की ओर दौड़ रहे थे। अंग्रेजी भाषा और संस्कृति श्रेष्ठता की परिचायक बन गई। जब तक अपना कोई व्यक्ति या कार्य पश्चिम में स्थापित न हो जाए, उसे हम श्रेष्ठ मानने को तैयार नहीं थे। सत्ता के आतंक और सत्ता से जुड़े रहने के आकर्षण से हमने अपने जीवन मूल्यों का सनातन सिद्ध राजमार्ग छोड़कर अंग्रेजियत की पगडंडियों पर चलना प्रारंभ कर दिया। जाहिर है, इस मार्ग पर हम नेतृत्वकर्ता नहीं, अनुगामी ही बन सकते थे।
हमारे एकत्व को चोटिल करने के सचेतन प्रयास हुए। भारतीय शिक्षा पद्धति को अंग्रेजी राज में कैसे नष्ट किया गया, इसे धर्मपाल जी को पढ़कर समझा जा सकता है। 'स्व' के स्थान पर 'परकीय' विचारों की स्थापना के प्रयास चले। हमें बताया गया कि हम एक 'राष्ट्र' नहीं हैं। अनेक स्थानीयताओं को राष्ट्रीयता के बरक्स स्थापित करने के अकादमिक प्रयास भी हुए। भारतीय ज्ञान परंपरा पर चलने वालों के आत्मविश्वास को समाप्त कर इस पूरे विचार को पोंगापंथ और पिछड़ेपन के रूप में प्रस्तुत करना फैशन बन गया।
राजनीतिक परिवर्तन के कारण लंबे समय के बाद भारत फिर से खुद को खोज रहा है और अपनी जड़ों की तरफ वापसी करना चाहता है। इसे 'विचारों की घर वापसी' कहा गया है। जरूरी है कि भारत प्रेमी बौद्धिक वर्ग सत्य के सूर्य की स्थापना के लिए अध्यवसाय में जुटे। सिर्फ भावनात्मक प्रवचनों और कार्यक्रमों से आगे बढ़कर भ्रमों के निवारण का प्रयास करे। ऐसे कुशल बौद्धिक योद्धा ही अपनी ज्ञान परंपरा को सामने लाकर तथ्य और प्रमाणों के साथ उनकी युगानुकूल व्याख्या कर सकते हैं।
इसके लिए लोकसंग्रही और विनम्र बनना पहली शर्त है। परंपरा, जीवन पद्धति और परिवार पर छाए संकटों के बीच ये प्रयास ही हमें आत्मशक्ति देंगे। दुनिया भर में चल रहे सभ्यतागत संघर्ष के बीच भारत को अपनी वृहत्तर भूमिका का निर्वहन करना है, क्योंकि हमारे पास दुनिया को देने के लिए समावेशी विचार है। यहां साझापन सौंदर्य की तरह है और विविधता तथा बहुलता का उत्सव मनाया जाता है। हम पूजा में भी अनेक देवताओं की पूजा करते हैं। बहुलतावादी समाज होने के कारण हमने मतभिन्नता का सदैव स्वागत किया। इसका उदाहरण हमारी 'शास्त्रार्थ' परंपरा है।
इसलिए "एक किताब, एक विचार, एक देवता" को मानने और दूसरे विचार को समाप्त करने को आतुर विचार भारत को नहीं समझ सकते। भारत वह भूमि है, जहां दुनिया के हर पंथ के लोग सहजता से सांस ले सकते हैं। यहां कोई श्रेष्ठ और निकृष्ट नहीं है। सब समान रूप से इस धरती मां की संतान हैं। ऐसे में भारत केंद्रित विमर्श ही विश्व शांति का मार्ग है।
'स्वत्व' ही मार्ग है। इस मार्ग पर चलने के लिए महात्मा गांधी, धर्मपाल, सीताराम गोयल, दीनदयाल उपाध्याय, वासुदेव शरण अग्रवाल, निर्मल वर्मा और विद्यानिवास मिश्र का अध्ययन मदद कर सकता है। इससे भारत के मूल विचार को समझने तथा भारत का मौलिक चिंतन स्थापित करने में सहायता मिलती है। इसी आधार पर गलत बातों का खंडन करते हुए हम सही विमर्श की स्थापना में सफल हो सकते हैं।
भारतीय उदात्त जीवन मूल्यों के आधार पर संपूर्ण विश्व के लिए हमें ही वैश्विक बौद्धिक नेतृत्व देना होगा। इसकी एक झलक हमें स्वामी विवेकानंद में दिखती है। ऐसे में 'स्वबोध' का जागरण ही विकल्प है। पहले हमारे अपने विचार को भारत स्वीकार करे। वह आत्मदैन्य से मुक्त होकर 'भारत' को 'भारत' की नजर से देखना प्रारंभ करे, 'इंडिया' की नजर से नहीं।
वैचारिक साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिए कई स्तरों पर काम करने की आवश्यकता है। गोरा बनाना और अंग्रेजी सिखाना आज भी हिंदुस्तान में दो बड़े व्यापार हैं। यही उपनिवेशवादी मानसिकता है। इसके चलते हमारे गांव उजड़ते चले गए और संयुक्त परिवार बिखर गए। आज एकल परिवारों के कारण अलग तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक संकट हमारे सामने हैं। जाति, भाषा, क्षेत्र और पंथ की लड़ाइयों से आगे भी विभाजनकारी बातें हर दिन खोजी जाती हैं और फिर आख्यान गढ़े जाते हैं।
भारत को कभी 'इंडिया' बनाने की कोशिशें हुईं, लेकिन उसे भारत बनाए रखने के लिए हमें ही आगे आना होगा। क्योंकि भारत का नष्ट होना उस विचार का मिट जाना होगा, जिसने हमें "वसुधैव कुटुम्बकम्" का संदेश दिया। जिसने हमें राम, कृष्ण, शिव, बुद्ध, महावीर और गुरु नानक देव जैसे नायक दिए। जिसने "सर्वे भवन्तु सुखिन:" में अपनी मुक्ति देखी और लोक-मंगल को अपना मूलमंत्र बनाया।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
करीब 25 साल पहले वाजपेयी सरकार ने इसके शेयर Sterlite ग्रुप (अब वेदांता) को करीब ₹800 करोड़ में बेच दिए थे। सरकार ने करीब 30% शेयर अपने पास रखे थे।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
IDBI बैंक के शेयर बेचने का फ़ैसला सरकार ने किया तो विरोध में प्रतिक्रिया थी कि घर के गहने क्यों बेच रहे हैं? सवाल सिर्फ IDBI बैंक का नहीं है, बल्कि यह है कि सरकार हर धंधे में क्यों पड़े?
IDBI बैंक से पहले हिंदुस्तान जिंक की बात कर लेते हैं। यह कहानी कोटक महिंद्रा AMC के MD निलेश शाह ने सुनाई है। करीब 25 साल पहले वाजपेयी सरकार ने इसके शेयर Sterlite ग्रुप (अब वेदांता) को करीब ₹800 करोड़ में बेच दिए थे। सरकार ने करीब 30% शेयर अपने पास रखे थे। आज उन शेयरों की क़ीमत ₹60 हज़ार करोड़ है। साल दर साल डिवीडेंड अलग मिलता है। जितने में बेचा था, उससे ज़्यादा तो डिवीडेंड मिल चुका है।
बात मुनाफ़े की नहीं है, बल्कि सरकार के बिज़नेस करने की है। स्वतंत्रता के बाद सरकार ने हर तरह के सामान बनाने के लिए कारख़ाने लगाए थे। तब तर्क यह था कि प्राइवेट सेक्टर के पास पूंजी नहीं है। हम कहने को तो मिश्रित अर्थव्यवस्था थे, लेकिन असल में हर धंधे में सरकार का बोलबाला था। 1991 में आर्थिक संकट में फँसने के बाद समझ में आया कि समाजवादी नीतियों का फ़ायदा नहीं हो रहा है।
सरकार ने धीरे-धीरे ग़ैर ज़रूरी बिज़नेस से निकलने का फ़ैसला किया। आपको आश्चर्य होगा कि 30-35 साल पहले तक भारत सरकार ब्रेड, नमक बनाती थी, कपड़े, घड़ी, टायर, कार और स्कूटर का कारख़ाना चलाती थी। फ़ोन कनेक्शन देती थी, हवाई जहाज़ सरकारी ही थे। बैंकों में अपने ही पैसे निकालने के लिए लोग काम से छुट्टी लेते थे। बैंक काउंटर पर लंबी लाइन लगी रहती थी।
तब ATM नहीं होता था। धीरे-धीरे सरकार ने 1991 के बाद से बाज़ार खोल दिया, अपने धंधे बेचना शुरू किए। आज ग्राहकों के पास बेहतर विकल्प है और कई चीजें सस्ती भी हुई हैं।
बात सिर्फ IDBI बैंक की नहीं है, सरकार को और बैंकों से भी निकलना चाहिए। सरकार के पास अब भी 12 बैंक हैं, जबकि नीति आयोग सलाह दे चुका है कि SBI के अलावा चार बड़े बैंक सरकार को अपने पास रखना चाहिए। यह 2047 विकसित भारत रोडमैप का हिस्सा है। सरकार ने 2021 में कहा था कि वो दो सरकारी बैंक और एक जनरल इंश्योरेंस कंपनी बेच देगी।
अभी तो IDBI बैंक पर ही इतना बवाल हो रहा है कि सरकार पता नहीं अगला कदम कब उठाएगी? सरकार की ज़िम्मेदारी शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान देना है, धंधा चलाना नहीं, लेकिन विडंबना देखिए, हम शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा भी प्राइवेट सेक्टर को देकर बैठे हैं।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
ये प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भारत में पहले भी एक प्रमुख राजनीतिक नेता को चुनावी आचरण के मामले में छह साल के लिए अयोग्य ठहराया गया था। वह नेता थे शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक नेताओं को सरकार की आलोचना करने, धार्मिक-सामाजिक विचारों पर बहस करने और चुनाव आयोग से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने का पूरा अधिकार है। लेकिन क्या इस अधिकार की कोई सीमा नहीं है? क्या चुनाव जीतने के लिए धर्म और जाति की भावनाओं को उभारना, विरोधी समुदाय के प्रति शत्रुता पैदा करना या संवैधानिक संस्थाओं के विरुद्ध आक्रामक राजनीतिक अभियान चलाना भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उचित ठहराया जा सकता है?
ये प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भारत में पहले भी एक प्रमुख राजनीतिक नेता को चुनावी आचरण के मामले में छह साल के लिए अयोग्य ठहराया गया था। वह नेता थे शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे। आज कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के भाषणों, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), हिंदुत्व, जातिगत टिप्पणियों, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, संघ प्रमुख मोहन भागवत तथा चुनाव आयोग को लेकर उनके राजनीतिक अभियान के संदर्भ में भी यही सवाल उठाया जा सकता है कि कानून की कसौटी सभी नेताओं के लिए समान है या नहीं?
बाल ठाकरे की मिसाल वर्तमान विवादों और आंदोलनों में दिलचस्प तथा महत्वपूर्ण है। शायद राहुल गांधी और उनकी सलाहकार सहयोगी मंडली उसे भूल रहे हैं। 11 दिसंबर 1995 को सर्वोच्च न्यायालय ने डॉ. रमेश यशवंत प्रभू बनाम प्रभाकर काशीनाथ कुंटे मामले में अपना फैसला सुनाया। यह मामला महाराष्ट्र विधानसभा के 1987 के विले पार्ले उपचुनाव से जुड़ा था।
शिवसेना के उम्मीदवार डॉ. रमेश प्रभू की ओर से प्रचार करते हुए बाल ठाकरे ने 29 नवंबर, 9 दिसंबर और 10 दिसंबर 1987 को भाषण दिए थे। इन भाषणों में हिंदू धर्म के आधार पर समर्थन जुटाने और धार्मिक समुदायों के बीच शत्रुता बढ़ाने से संबंधित आरोप चुनाव याचिका में लगाए गए थे। बॉम्बे हाई कोर्ट ने संबंधित आरोपों को सिद्ध माना था और सर्वोच्च न्यायालय ने उस निर्णय के विरुद्ध अपीलों पर सुनवाई करते हुए उसे बरकरार रखा।
इस मामले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(3) और 123(3A) निर्णायक थीं। पहली धारा चुनाव में धर्म, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर वोट माँगने से संबंधित है। दूसरी धारा चुनावी लाभ के लिए इन आधारों पर नागरिकों के विभिन्न वर्गों के बीच शत्रुता या घृणा बढ़ाने अथवा उसका प्रयास करने को भ्रष्ट आचरण मानती है।
इस मामले की एक विशेष बात यह है कि ठाकरे स्वयं उस चुनाव में उम्मीदवार नहीं थे। फिर भी चुनाव अभियान में उनकी भूमिका और उम्मीदवार की सहमति से किए गए प्रचार के आधार पर उन्हें भ्रष्ट आचरण के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। न्यायालय ने उन्हें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 99 के अंतर्गत नामित किया। बाद में धारा 8A की प्रक्रिया के तहत उनकी छह वर्ष की अयोग्यता का मामला चला।
इस ऐतिहासिक मामले से एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है: चुनावी राजनीति में किसी नेता की जिम्मेदारी केवल उसके अपने चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं रहती। कानून में निर्धारित शर्तें पूरी होने पर किसी उम्मीदवार के समर्थन में काम करने वाला व्यक्ति भी जवाबदेह हो सकता है।
राहुल गांधी और कुछ कांग्रेसी पिछले कई वर्षों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा, आरएसएस और हिंदुत्व की राजनीतिक व्याख्या की आलोचना करते रहे हैं। साथ ही वे जातिगत भेदभाव बढ़ाने वाली बातें अपने राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाते हैं।
संसद में जुलाई 2024 के उनके भाषण के दौरान हिंदू धर्म, भाजपा और कथित हिंसा के संबंध में दिए गए वक्तव्यों पर विवाद हुआ। लोकसभा अध्यक्ष ने भाषण के कुछ अंश सदन की कार्यवाही से हटाए। राहुल गांधी ने अपनी टिप्पणियों का बचाव किया, जबकि सत्ता पक्ष ने उन पर आपत्ति जताई।
यह विवाद राजनीतिक विमर्श की प्रकृति पर सवाल अवश्य उठाता है, लेकिन संसद की कार्यवाही से किसी टिप्पणी को हटाया जाना अपने आप में चुनावी भ्रष्ट आचरण सिद्ध नहीं करता। इसके लिए संबंधित कानून के तहत अलग से आवश्यक तथ्य और साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे।
यहाँ मूल अंतर समझना आवश्यक है। हिंदुत्व की विचारधारा, आरएसएस की नीतियों, प्रधानमंत्री के निर्णयों या किसी धार्मिक-राजनीतिक संगठन के प्रभाव की आलोचना करना अपने आप में अपराध नहीं है। इसी तरह जातिगत असमानता पर चर्चा, आरक्षण की माँग या सामाजिक न्याय के लिए राजनीतिक अभियान चलाना भी लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा हो सकता है। लेकिन नेताओं, अधिकारियों, पत्रकारों आदि की जातियों पर सवाल उठाकर एक तरह से नफरत पैदा कर रहे हैं।
लेकिन यदि किसी विशेष भाषण में किसी समुदाय के विरुद्ध घृणा या शत्रुता बढ़ाने का प्रयास किया गया हो, अथवा चुनाव में किसी उम्मीदवार को जिताने या हराने के लिए कानून द्वारा निषिद्ध धार्मिक या जातीय बयानबाजी करने पर मामला दर्ज किया जा सकता है।
इसलिए राहुल गांधी के विरुद्ध कोई कानूनी कार्रवाई के लिए किसी व्यक्ति या संगठन को भाषणों की पूरी रिकॉर्डिंग, सटीक शब्द, तारीख, स्थान, चुनाव से उसका संबंध और लागू कानून के आवश्यक तत्वों को प्रमाणित करना होगा।
यह सप्ताह यानी विजय दशमी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्थापना दिवस है। संघ ने 2025 में अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे किए। इस अवसर पर संगठन ने अपनी विचारधारा, सामाजिक गतिविधियों और भविष्य की योजनाएं बनाई। संघ का भारतीय राजनीति और सामाजिक जीवन पर प्रभाव लंबे समय से सार्वजनिक बहस का विषय रहा है। राहुल गांधी आरएसएस की विचारधारा, उसके सामाजिक दृष्टिकोण और भाजपा के साथ उसके संबंधों की आलोचना करते हैं। दूसरी ओर, आरएसएस और भाजपा के समर्थक इसे अपनी सांस्कृतिक तथा राजनीतिक मान्यताओं पर हमला मान सकते हैं।
संघ प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर भी इसी प्रकार तीखी राजनीतिक बहस होती है। राहुल गांधी कहते हैं कि आरएसएस की विचारधारा संविधान की उनकी समझ से मेल नहीं खाती, या वे मोदी सरकार की नीतियों को गलत बताते हैं, तो ऐसी राजनीतिक आलोचना को केवल अप्रिय या कठोर भाषा के आधार पर प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।
लेकिन वह या उनके सहयोगी का विशिष्ट वक्तव्य कानून के तहत निषिद्ध घृणा, हिंसा के उकसावे या चुनावी भ्रष्ट आचरण की आवश्यक शर्तें पूरी करता है, तो कानूनी कार्रवाई हो सकती है। वैसे यही नियम भाजपा अथवा किसी कट्टरपंथी नेता पर भी लागू हो सकता है।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8A के अनुसार, चुनावी भ्रष्ट आचरण के लिए सक्षम न्यायिक प्रक्रिया में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की अयोग्यता का प्रश्न निर्धारित प्रक्रिया से राष्ट्रपति के समक्ष जाता है, जहाँ चुनाव आयोग की राय भी ली जाती है। कानून के अंतर्गत अधिकतम छह वर्ष की अयोग्यता का प्रावधान है। इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई भी नागरिक सर्वोच्च न्यायालय में याचिका देकर किसी नेता पर छह साल की पाबंदी लगवा सकता है। याचिका दायर करना, आरोपों की जाँच होना, भ्रष्ट आचरण सिद्ध होना और वैधानिक अयोग्यता लागू होना अलग-अलग चरण हैं।
बाल ठाकरे के मामले में भी एक स्थापित चुनावी मुकदमे, विशिष्ट भाषणों, न्यायिक निष्कर्षों और उसके बाद की वैधानिक प्रक्रिया का महत्व था। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि किसी नेता के भाषण से समाज में तनाव पैदा हुआ, इसलिए उसे उसी तरह दंडित कर दिया जाए। राहुल गांधी के मामले में भी यदि कोई व्यक्ति ऐसा कदम उठाना चाहता है, तो उसे पहले यह पहचानना होगा कि संबंधित भाषण किस कानून का उल्लंघन करता है और किस सक्षम प्राधिकारी के समक्ष उचित कार्यवाही उपलब्ध है। यदि आरोप किसी चुनाव में धर्म या जाति के आधार पर वोट माँगने अथवा समुदायों के बीच शत्रुता बढ़ाने का है, तो धारा 123 के प्रावधानों की कसौटी लागू हो सकती है।
लोकतंत्र में चुनाव आयोग, न्यायपालिका और सरकार की आलोचना करना नागरिकों तथा राजनीतिक दलों का अधिकार है। चुनावी अनियमितताओं के आरोप उठाना, मतदाता सूची की पारदर्शिता की माँग करना और अदालत से राहत माँगना संवैधानिक व्यवस्था के भीतर उपलब्ध रास्ते हैं। लेकिन आलोचना के अधिकार का अर्थ यह नहीं कि कोई भी व्यक्ति न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने, अदालत पर अनुचित दबाव डालने या न्याय प्रशासन में बाधा डालने के लिए स्वतंत्र है।
किसी विशेष आचरण को अवमानना या अन्य अपराध मानने के लिए संबंधित कानून की शर्तें पूरी होना आवश्यक है। अक्टूबर में चुनाव आयोग से संबंधित मुद्दों को लेकर विपक्षी नेताओं के सर्वोच्च न्यायालय तक मार्च के बाद राहुल गांधी के आचरण पर न्यायालय ने आपत्ति जताई और स्पष्टीकरण माँगा है। साथ ही, चुनावी प्रक्रिया से संबंधित याचिकाओं पर न्यायालय ने संबंधित पक्षों से जवाब भी माँगा। यदि किसी नेता के आचरण से न्यायिक प्रक्रिया में वास्तविक बाधा उत्पन्न होने का आरोप है, तो उसका मूल्यांकन उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत होगा।
जाति और धर्म से जुड़े प्रश्न वास्तविक सामाजिक तथा ऐतिहासिक मुद्दे हैं। जातिगत जनगणना की माँग हो, आरक्षण का प्रश्न हो, धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा हो या बहुसंख्यक समुदाय की सांस्कृतिक आकांक्षाएँ—इन सभी विषयों पर राजनीतिक दल अपनी नीतियाँ प्रस्तुत कर सकते हैं। लेकिन सामाजिक न्याय की चर्चा और जातियों के बीच वैमनस्य फैलाने में अंतर है। इसी तरह धार्मिक परंपराओं का सम्मान करना और धर्म के आधार पर नागरिकों को एक-दूसरे का शत्रु बताना दो अलग बातें हैं। कानून को यह देखना होगा कि कोई वक्तव्य सामाजिक समस्या पर बहस कर रहा है या किसी समुदाय के प्रति शत्रुता बढ़ा रहा है।
राजनीतिक नेताओं को अपने शब्दों के प्रभाव के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए। विशेष रूप से राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के भाषण व्यापक जनसमूह तक पहुँचते हैं और उनका राजनीतिक प्रभाव भी बड़ा होता है। निश्चित रूप से, यदि कोई नागरिक मानता है कि किसी नेता ने कानून का उल्लंघन किया है, तो वह उपलब्ध कानूनी उपायों का सहारा ले सकता है। वह संबंधित भाषणों के प्रमाण जुटाकर चुनाव आयोग या सक्षम प्राधिकारी के सामने शिकायत रख सकता है। जहाँ कानून के अनुसार न्यायालय का हस्तक्षेप उपलब्ध हो, वहाँ उचित याचिका भी दायर की जा सकती है।
बाल ठाकरे के मामले से यह सीख मिलती है कि चुनावी प्रचार में धर्म के इस्तेमाल पर कानून लागू हो सकता है और किसी उम्मीदवार के समर्थन में भाषण देने वाला नेता भी निर्धारित शर्तों के अंतर्गत जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। यह सिद्धांत किसी एक दल, विचारधारा या धार्मिक समुदाय के लिए नहीं है। न्याय का अर्थ सभी नेताओं को समान परिणाम देना नहीं, बल्कि समान कानून और निष्पक्ष प्रक्रिया के तहत प्रत्येक मामले का निर्णय करना है।
बाल ठाकरे की छह वर्ष की चुनावी अयोग्यता भारतीय चुनावी इतिहास का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह दिखाती है कि चुनाव प्रचार में धार्मिक अपील और समुदायों के बीच शत्रुता बढ़ाने से संबंधित आरोप, जब कानून के अनुसार सिद्ध हों, तो गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
राहुल गांधी के भाषणों, आरएसएस और भाजपा की आलोचना, जातिगत राजनीति तथा चुनाव आयोग और न्यायपालिका से संबंधित उनके सार्वजनिक आचरण पर बहस हो सकती है। यदि किसी विशिष्ट वक्तव्य या गतिविधि में कानून के उल्लंघन का पर्याप्त आधार हो, तो उचित कानूनी कार्यवाही भी हो सकती है। लोकतंत्र की मजबूती इस बात में है कि सत्तारूढ़ या विपक्ष के नेता तक, सभी कानून के प्रति जवाबदेह हों।
धार्मिक भावनाओं के नाम पर चुनावी नियमों से छूट नहीं मिलनी चाहिए। प्रश्न यह नहीं कि राहुल गांधी को बाल ठाकरे की तरह दंडित किया जाना चाहिए या नहीं। असली बात यह है कि किसी भी नेता के विरुद्ध, चाहे वह सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का, कानून के उल्लंघन के पर्याप्त प्रमाण मिलने पर निष्पक्ष और पारदर्शी कार्रवाई होगी। यदि भारतीय लोकतंत्र इस कसौटी पर खरा उतरता है, तभी चुनावी राजनीति में धर्म, जाति और संस्थागत टकराव के बीच कानून की सर्वोच्चता कायम रह सकती है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
उन्होंने इस मामले में चैनल की विश्वसनीयता, पत्रकारिता में तथ्यों की पड़ताल और खबर प्रसारित करने वाले पत्रकारों की जवाबदेही को लेकर अपनी बात रखी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
लोक गायिका नेहा सिंह राठौर से जुड़े मामले में वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखकर ABP News की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इस मामले में चैनल की विश्वसनीयता, पत्रकारिता में तथ्यों की पड़ताल और खबर प्रसारित करने वाले पत्रकारों की जवाबदेही को लेकर अपनी बात रखी है।
ओम थानवी ने अपनी फेसबुक पोस्ट में क्या लिखा है, पढ़िए उन्हीं के शब्दों में:
एबीपी न्यूज़ को मैं दूसरे चैनलों से कुछ अलग समझता आया हूँ। शाज़ी ज़माँ और मिलिंद खांडेकर का ज़माना भले चला गया, दिबांग भी अब वहाँ नहीं, फिर भी बुलंद ऐंकर संदीप चौधरी या रोमाना इसरार ख़ान, प्रतिमा मिश्रा जैसी आवाज़ों ने चैनल की ठसक बनाए रखी है।
लेकिन एबीपी नैटवर्क में जुझारू गायिका नेहा सिंह राठौर को बदनाम करने वाली झूठी ख़बर — जो उनके पोर्टल यानी डिज़िटल माध्यम पर चली — ने एबीपी न्यूज़ नैटवर्क की विश्वसनीयता को कटघरे में ला खड़ा किया है। एबीपी ने माफ़ी माँग ली। नेहा ने माफ़ी नहीं दी है। देनी भी नहीं चाहिए। यह कोई चूक नहीं थी। सरासर आपराधिक कृत्य था।
माफ़ी की याचना के साथ एबीपी वालों को ख़बर लिखने और चलाने वाले पत्रकारों पर कठोर कार्रवाई भी करनी चाहिए थी। मैं कभी किसी का रोज़गार छीनने के पक्ष में नहीं रहा। लेकिन चंडीगढ़ में एक उप-संपादक को (उन दिनों वेजबोर्ड की पक्की नौकरी हुआ करती थी) पहले मुअत्तल किया, फिर बाहरी लम्बी इंक्वायरी के बाद बर्ख़ास्त कर दिया था। मामला भ्रष्ट आचरण का था।
नेहा प्रतिभावान हैं, प्रसिद्ध हैं, बहादुर हैं। उनकी हिम्मत तोड़ने को दूर-दूर मुक़दमे हुए। राजद्रोह तक का मुक़दमा दायर किया गया। इस सिलसिले को देखते हुए मुमकिन है कि निडर गायिका को बदनाम करने के लिए कोई क्षुद्र चाल चली गई हो।
लेकिन मीडिया उसका हथियार क्यों बने। ख़बर का पहला क़ायदा है, तथ्यों की पड़ताल। दूसरे पक्ष से बात करते ही कल्पित बातें खुल जाती हैं। सचाई हो तब भी दूसरे पक्ष का कथन ख़बर का हिस्सा होता है। नेहा से बात ही नहीं की गई, इसी से साफ़ है कि ख़बर लिखने-प्रसारित करने वाले पत्रकारों की नीयत में खोट थी — या वे ज़िम्मेदारी के निर्वाह को सर्वथा अयोग्य हैं।
नेहा अदालत में जा रही हैं। वे समझौते वाली शख़्सियत नहीं। उम्मीद है उन्हें न्याय मिलेगा और कीचड़उछाल मीडियाकर्मियों को सबक़ भी।
(वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की फेसबुक पोस्ट से साभार)