अभिनेता और मक्कल निधि मय्यम प्रमुख कमल हासन ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय से मुलाकात कर तमिल फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े छह बड़े मुद्दों को लेकर एक ज्ञापन सौंपा।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
अभिनेता और मक्कल निधि मय्यम प्रमुख कमल हासन ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय से मुलाकात कर तमिल फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े छह बड़े मुद्दों को लेकर एक ज्ञापन सौंपा। इनमें सबसे प्रमुख मांग राज्य सरकार की अपनी ओटीटी प्लेटफॉर्म शुरू करने की रही।
कमल हासन ने अपने एक्स अकाउंट पर जारी बयान में कहा कि तमिल दर्शकों को सस्ती दरों पर तमिल फिल्में, स्वतंत्र सिनेमा और डॉक्यूमेंट्री उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार को अपना ओटीटी प्लेटफॉर्म शुरू करना चाहिए।
उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री पर बढ़ते खर्च का भी मुद्दा उठाया। हासन ने सरकार से स्थानीय निकायों द्वारा लगाए जाने वाले 4 फीसदी एंटरटेनमेंट टैक्स को खत्म करने की मांग की। उनका कहना है कि इससे तमिल फिल्म इंडस्ट्री को बड़ी राहत मिलेगी।
कमल हासन ने पायरेसी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की भी मांग की। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु पुलिस के साइबर क्राइम विभाग में एक विशेष एंटी-पायरेसी टीम बनाई जानी चाहिए, जो ऑनलाइन लीक होने वाले कंटेंट को तुरंत हटाने की ताकत रखे।
उन्होंने राज्य के सिनेमाघरों में सभी फिल्मों के लिए रोज पांच शो चलाने की अनुमति देने की भी मांग की। हासन के मुताबिक इससे थिएटर मालिकों की कमाई बढ़ेगी और फिल्म प्रदर्शन कारोबार को सहारा मिलेगा।
इसके अलावा उन्होंने फिल्मों के ओटीटी रिलीज के लिए आठ हफ्ते की अनिवार्य विंडो तय करने की मांग की, ताकि थिएटर मालिकों और डिस्ट्रीब्यूटर्स को नुकसान न हो।
कमल हासन ने फिल्म प्रोडक्शन इंसेंटिव स्कीम शुरू करने की भी अपील की। उनका कहना है कि इससे तमिलनाडु फिर से देश का बड़ा फिल्म प्रोडक्शन हब बन सकता है, रोजगार बढ़ेगा और पर्यटन को भी फायदा मिलेगा।
उन्होंने अपने बयान में कहा कि सिनेमा तमिलनाडु की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है और लाखों परिवारों की रोजी-रोटी इससे जुड़ी है।
भारतीय दर्शक अब एक नई तरह की थकान महसूस कर रहा है। इंडस्ट्री की भाषा में इसे “Subscrption Fatigue” कहा जाता है, यानी OTT खर्चों से थकता दर्शक।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मान लीजिए आप एक सामान्य शहरी परिवार हैं। महीने के अंत में बिजली का बिल, किराया और राशन जैसे जरूरी खर्चों के साथ अब एक नई जिम्मेदारी भी जुड़ गई है- OTT सब्सक्रिप्शंस। Netflix, Amazon Prime Video, JioHotstar, Sony LIV, Zee5 जैसे प्लेटफॉर्म्स, और अगर घर में क्रिकेट देखने वाले हैं तो अलग से स्पोर्ट्स पैक। ऐसे में यह खर्च आसानी से ₹1,500 प्रति महीने के पार पहुंच जाता है।
कोरोना काल के दौरान OTT प्लेटफॉर्म्स भारत में मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम बनकर उभरे। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। हर प्लेटफॉर्म अलग सब्सक्रिप्शन मांग रहा है, हर बड़ा कंटेंट किसी एक ही ऐप पर “एक्सक्लूसिव” हो गया है और हर साल कीमतें भी बढ़ रही हैं। इसका असर यह है कि भारतीय दर्शक अब एक नई तरह की थकान महसूस कर रहा है। इंडस्ट्री की भाषा में इसे “Subscrption Fatigue” कहा जाता है, यानी OTT खर्चों से थकता दर्शक।
पहले एक बिल था, अब एक दर्जन ऐप्स
केबल टीवी के दौर में मामला काफी आसान था- एक DTH कनेक्शन, एक मंथली रिचार्ज और सैकड़ों चैनल्स। लेकिन OTT के दौर में यह पूरा फॉर्मूला बदल गया है। अब हर प्लेटफॉर्म का अपना कंटेंट किला है और अपनी अलग दीवारें हैं।
Ormax Media की ताजा रिपोर्ट (2025) के मुताबिक भारत में OTT दर्शकों की संख्या 60.12 करोड़ तक पहुंच चुकी है। यानी देश की 41% आबादी किसी न किसी रूप में ऑनलाइन वीडियो देखती है। इनमें से पेड सब्सक्रिप्शंस की संख्या 14.82 करोड़ है। भारत का OTT मार्केट 2025 में $5.4 बिलियन का हो चुका है और 2034 तक इसके $28.1 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है।
हालांकि इन चमकदार आंकड़ों के पीछे एक असुविधाजनक सच भी छिपा है। भारतीय दर्शक अब प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती संख्या और लगातार बढ़ती कीमतों से ऊबने लगा है।
Subscrption Fatigue क्या है?
Subscrption Fatigue वह मनोवैज्ञानिक थकान है, जो तब पैदा होती है जब दर्शकों को लगने लगता है कि OTT प्लेटफॉर्म्स की संख्या जरूरत से ज्यादा हो गई है। लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि कौन-सा कंटेंट किस प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है।
इसके साथ ही हर प्लेटफॉर्म अलग से पेमेंट मांग रहा है। किसी एक शो के लिए एक ऐप, तो दूसरी फिल्म के लिए दूसरा ऐप लेना पड़ता है। कंटेंट पूरी तरह बिखर गया है- एक शो यहां, दूसरा वहां।
दर्शकों की परेशानी सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती। हर महीने OTT पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन कई लोगों को उसके मुकाबले उतनी “वैल्यू” महसूस नहीं होती। यही वजह है कि लोग अब OTT सब्सक्रिप्शंस से थकान महसूस करने लगे हैं।
यह सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। अमेरिका जैसे मैच्योर OTT मार्केट्स में भी लोग अब अपने सब्सक्रिप्शंस को रोटेट करने लगे हैं। यानी एक महीने Netflix लिया, अगले महीने Disney+, फिर जरूरत खत्म होने पर कैंसल कर दिया। भारत में भी यही पैटर्न धीरे-धीरे उभरता दिखाई दे रहा है।
भारतीय घर का मंथली OTT बिल: असली हिसाब
आइए एक सामान्य शहरी परिवार का हिसाब देखते हैं, जो सभी मुख्य OTT प्लेटफॉर्म्स सब्सक्राइब करती है:
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प्लेटफॉर्म |
प्लान (2026) |
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Netflix (Standard) |
₹499/माह |
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Amazon Prime Video |
₹299/माह |
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JioHotstar (Premium) |
₹299/माह |
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Sony LIV (Premium monthly) |
₹399/माह |
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Zee5 (All Languages + KidZ) |
₹299/माह |
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कुल मासिक खर्च (approx.) |
~₹1,795/माह |
यानी सिर्फ इन पांच OTT प्लेटफॉर्म्स पर ही अगर सालाना पैकेज लिया जाए, तो दर्शकों का खर्च लगभग ₹8,000 से ₹10,000 तक पहुंच जाता है। इसमें अगर Crunchyroll (anime), Lionsgate Play या कोई रीजनल OTT प्लेटफॉर्म भी जोड़ दिया जाए, तो यह खर्च और ज्यादा बढ़ जाता है।
MiQ की Advanced TV Report India के अनुसार भारतीय दर्शक औसतन 3 स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स subscribe करते हैं और इस पर करीब ₹1,360 प्रति माह खर्च करते हैं। यह आंकड़ा भारत के मध्यम वर्ग के लिए किसी बड़े बोझ से कम नहीं है, क्योंकि जरूरी खर्चों के बाद बचने वाली कमाई पर पहले से ही कई जिम्मेदारियां होती हैं।
Netflix ने मार्च 2026 में अमेरिका में अपने प्लान्स की कीमत एक बार फिर बढ़ाई। पिछले 6 साल में यह 5वीं बार है, जब कंपनी ने कीमतों में इजाफा किया है। हालांकि भारत में Netflix के प्लान्स फिलहाल नहीं बदले गए हैं- Mobile ₹149, Standard ₹499 और Premium ₹649- लेकिन पिछले ट्रेंड बताते हैं कि अमेरिका में कीमतें बढ़ने के 6-12 महीने बाद उसका असर भारत में भी देखने को मिलता है।
वहीं, JioHotstar ने जनवरी 2026 से अपने प्रीमियम सालाना प्लान की कीमत ₹1,499 से बढ़ाकर ₹2,199 कर दी। यानी इसमें करीब 47% की बढ़ोतरी हुई है।
Amazon Prime Video ने June 2025 से अपने स्टैंडर्ड प्लान में विज्ञापन दिखाने शुरू कर दिए हैं। अब विज्ञापन मुक्त कंटेंट देखने के लिए यूजर्स को ₹699 प्रति वर्ष या ₹129 प्रति माह अलग से चुकाने पड़ रहे हैं।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या कीमत को लेकर संवेदनशील भारतीय बाजार यह बढ़ता OTT खर्च लंबे समय तक झेल पाएगा?
Telecom Bundling: थकान का अस्थायी इलाज
OTT इंडस्ट्री की असली लाइफलाइन फिलहाल Telecom Bundling बनती जा रही है।
Reliance Jio का ₹749 वाला पोस्टपेड प्लान Netflix Basic, Amazon Prime Lite और JioHotstar तीनों का एक्सेस एक साथ देता है। वहीं Airtel के Xstream bundles में भी कई OTT सर्विसेज शामिल हैं। यानी बड़ी संख्या में यूजर्स को OTT का डायरेक्ट बिल अलग से नहीं भरना पड़ता, क्योंकि उसका खर्च उनके मोबाइल रिचार्ज में ही जुड़ा होता है।
यह मॉडल इसलिए कारगर माना जा रहा है, क्योंकि इसमें यूज़र्स को अलग-अलग पेमेंट करने का झंझट नहीं रहता। साथ ही टेलीकॉम कंपनियों की सब्सक्राइबर रिटेंशन बेहतर होती है और OTT प्लेटफॉर्म्स को एक भरोसेमंद सब्सक्राइबर बेस मिल जाता है।
हालांकि यह समाधान पूरी तरह परफेक्ट नहीं है। Bundled प्लान्स में अक्सर सिर्फ बेसिक टियर ही मिलता है। HD या 4K क्वॉलिटी और प्रीमियम प्लान्स के लिए यूज़र्स को अलग से पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इसके अलावा जैसे-जैसे टेलीकॉम प्लान्स महंगे हो रहे हैं, वैसे-वैसे यह “फ्री” OTT भी लोगों को महंगा पड़ने लगा है।
पॉसवर्ड शेयरिंग: OTT का साइलेंट क्राइसेस
भारत में एक OTT सब्सक्रिप्शन को घर के कई लोग, दोस्त और रिश्तेदार मिलकर इस्तेमाल करते हैं। यह कोई सिक्रेट नहीं, बल्कि एक आम सामाजिक प्रैक्टिस बन चुकी है।
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर OTT प्लेटफॉर्म्स पॉसवर्ड शेयरिंग को प्रभावी तरीके से रोक दें, तो वे अपने पेड सब्सक्राइबर बेस को दोगुना तक बढ़ा सकते हैं।
Netflix ने पॉसवर्ड शेयरिंग रोकने के लिए दुनियाभर में सख्ती शुरू की थी। इसका फायदा कंपनी को तुरंत मिला। सिर्फ Q2 2023 में ही Netflix को 59 लाख नए सब्सक्राइबर्स मिले, जबकि इससे एक साल पहले इसी तिमाही में कंपनी ने 10 लाख सब्सक्राइबर्स खो दिए थे।
लेकिन भारत में यह तरीका उतना आसान नहीं है। यहां सबसे बड़ी समस्या एफोर्डबिलिटी (affordability) यानी लोगों की खर्च करने की क्षमता है। अगर कोई परिवार अब तक एक ही Netflix अकाउंट मिल-बांटकर चला रहा था और अब सभी को अलग सब्सक्रिप्शन लेना पड़े, तो कई लोग सीधा कहेंगे- “Netflix बंद कर दो।”
इसी वजह से भारत में पॉसवर्ड शेयरिंग को पायरेसी का एक “सॉफ्ट वर्जन” माना जाने लगा है। लोग पैसे कम खर्च करना चाहते हैं, लेकिन अपने पसंदीदा कंटेंट को छोड़ना भी नहीं चाहते।
Ad-Supported OTT: फ्री का जादू वापस आ रहा है
OTT इंडस्ट्री इस समय एक बड़ा U-turn लेती दिखाई दे रही है। जिन प्लेटफॉर्म्स ने शुरुआत में सिर्फ सब्सक्रिप्शन मॉडल के दम पर अपनी पहचान बनाई थी, वे अब तेजी से ऐडवर्टाइजिंग की तरफ लौट रहे हैं।
SVOD यानी Subscription Video On Demand- यह Netflix-style पेड मॉडल है, जहां दर्शकों को कंटेंट देखने के लिए हर महीने या सालाना शुल्क देना पड़ता है। वहीं AVOD यानी ऐडवर्टाइजिंग Video On Demand- YouTube-style मॉडल है, जिसमें कंटेंट मुफ्त होता है, लेकिन बीच-बीच में विज्ञापन दिखाए जाते हैं।
अब OTT इंडस्ट्री का झुकाव तेजी से AVOD मॉडल की तरफ बढ़ रहा है।
Amazon Prime Video ने जून 2025 में अपने स्टैंडर्ड प्लान को AVOD मॉडल में बदल दिया। इसका मतलब यह है कि अब रेगुलर प्राइम मेंबर्स को भी कंटेंट देखते समय विज्ञापन दिखाई देते हैं। अगर कोई यूज़र विज्ञापन-मुक्त अनुभव चाहता है, तो उसे इसके लिए अलग से पैसे देने पड़ते हैं।
वहीं Netflix का ad-supported tier भी तेजी से नए सब्सक्राइबर्स जोड़ रहा है। FICCI-EY 2026 रिपोर्ट के मुताबिक AVOD अब OTT रेवेन्यू ग्रोथ का सबसे बड़ा इंजन बनता जा रहा है और इसकी रफ्तार SVOD मॉडल से भी ज्यादा तेज है।
इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत मूल रूप से फ्री कंटेंट का बाजार माना जाता है। YouTube, MX Player और JioCinema के फ्री cricket स्ट्रीमिंग एक्सपेरिमेंट्स ने यह बात साफ कर दी है।
IPL 2023 में जब JioCinema ने फ्री स्ट्रीमिंग शुरू की, तो टूर्नामेंट के पहले 17 मैचेस में ही 550 करोड़ cumulative video views दर्ज किए गए। वहीं फाइनल मुकाबले के दौरान एक साथ 3.2 करोड़ concurrent व्युअर्स जुड़े, जो एक नया वर्ल्ड रिकॉर्ड था। यह वह स्केल है, जहां तक किसी भी पेड OTT प्लेटफॉर्म का पहुंचना बेहद मुश्किल माना जाता है।
Sports राइट्स: सबसे बड़ी Fragmentation की जड़
आज OTT की दुनिया में दर्शकों को अपनी पसंद के कंटेंट के हिसाब से अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स का सब्सक्रिप्शन लेना पड़ रहा है।
अगर आप क्रिकेट फैन हैं, तो JioHotstar जरूरी है, क्योंकि IPL राइट्स उसी के पास हैं। अगर आप फुटबॉल देखना पसंद करते हैं, तो उसके लिए अलग प्लेटफॉर्म चाहिए। WWE देखने वालों को Sony LIV लेना पड़ता है। Anime पसंद करने वाले दर्शकों के लिए Crunchyroll जरूरी हो जाता है। वहीं Hollywood का लेटेस्ट कंटेंट देखने के लिए Netflix या Prime का सहारा लेना पड़ता है।
यानी अब दर्शकों को कंटेंट के हिसाब से अलग-अलग OTT सब्सक्रिप्शंस लेने पड़ रहे हैं।
केबल टीवी के दौर में स्थिति काफी अलग थी। उस समय “one pack, many channels” का मॉडल चलता था। लेकिन OTT के दौर में अब “many ऐप्स, many bills” नई रियलटी बनती जा रही है।
स्पोर्ट्स राइट्स को लेकर प्लेटफॉर्म्स के बीच होड़ ने यह समस्या और बढ़ा दी है। अब लगभग हर बड़ी स्पोर्ट्स लीग किसी एक OTT प्लेटफॉर्म पर ही देखने को मिलती है। ऐसे में दर्शकों के पास दो ही रास्ते बचते हैं- या तो उस प्लेटफॉर्म का सब्सक्रिप्शन लें, या फिर अपना पसंदीदा मैच और कंटेंट छोड़ दें।
रीजनल OTT: दिल जीता, जेब नहीं
Regional OTT: दिल जीता, जेब नहीं
भारत कई भाषाओं वाला देश है और रीजनल OTT प्लेटफॉर्म्स ने इस बात को अच्छी तरह समझा है।
Hoichoi (बंगाली), ManoramaMAX (मलयालम), Sun NXT (तमिल, तेलुगु) और Chaupal (पंजाबी) जैसे प्लेटफॉर्म्स ने अपनी-अपनी भाषाओं के दर्शकों के बीच मजबूत पहचान बनाई है।
Market Research Future के मुताबिक 2025 में रीजनल language content में 40% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह trend साफ दिखाता है कि दर्शक अपनी भाषा में कंटेंट देखना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
लेकिन यहां भी सबसे बड़ी समस्या वही है- हर रीजनल ऐप का अलग subscription।
उदाहरण के तौर पर, अगर मुंबई में रहने वाला कोई मराठी परिवार Bengali content भी देखना चाहता है, तो उसे national OTT प्लेटफॉर्म्स के अलावा दो रीजनल ऐप्स का अतिरिक्त खर्च भी उठाना पड़ता है।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या रीजनल OTT प्लेटफॉर्म्स अपने survival के लिए telecom bundling या national aggregation का रास्ता अपनाएंगे? 2026 में यह OTT इंडस्ट्री के सामने सबसे बड़ा strategic सवाल माना जा रहा है।
Aggregator ऐप्स: Cable Operator की वापसी?
OTT इंडस्ट्री में अब एक नई संभावना भी दिखाई दे रही है। जैसे पहले cable operators एक ही subscription में सैकड़ों चैनल्स उपलब्ध कराते थे, वैसे ही अब OTT aggregator ऐप्स का चलन बढ़ सकता है।
Tata Play Binge पहले से इस मॉडल पर काम कर रही है। इसमें users को एक ही app में कई OTT प्लेटफॉर्म्स का एक्सेस और एक ही billing system मिलता है।
Smart TV ecosystems और broadband bundles में भी यह trend तेजी से दिखाई देने लगा है।
अगर यह मॉडल बड़े स्तर पर सफल हो जाता है, तो यह subscription fatigue का सबसे practical समाधान बन सकता है। हालांकि सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि OTT प्लेटफॉर्म्स आपस में revenue share करने के लिए कितने तैयार होते हैं।
Connected TV: Big Screen पर Big Business
सब्सक्रिप्शन fatigue के बीच एक बड़ा बदलाव Connected TV यानी CTV के रूप में भी देखने को मिल रहा है।
Ormax की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक भारत में active CTV users की संख्या 12.92 करोड़ तक पहुंच गई है। यह 2024 के मुकाबले 87% की बड़ी छलांग है।
FICCI-EY 2026 रिपोर्ट के अनुसार यह करीब 6.8 करोड़ CTV households तक फैल चुका है, जिनमें से 4 करोड़ weekly active हैं।
इसी रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में CTV ऐडवर्टाइजिंग revenues 42% बढ़कर ₹9,900 करोड़ तक पहुंच गए।
वहीं WPP की TYNY 2026 report का अनुमान है कि 2026 में CTV ऐडवर्टाइजिंग में 22% की growth देखने को मिलेगी।
यह advertisers के लिए एक नई opportunity बनकर उभर रहा है। जैसे-जैसे लोग पेड सब्सक्रिप्शंस से हटकर फ्री और ad-supported प्लेटफॉर्म्स की तरफ बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे ब्रैंड्स को बड़े स्क्रीन पर टार्गेटेड ऐडवर्टाइजिंग का मौका मिल रहा है।
अनुमान है कि CTV ऐडवर्टाइजिंग 2026 तक ₹8,000 करोड़ तक पहुंच सकती है।
Consumer Psychology: “कुछ देखने को नहीं” का Paradox
OTT इंडस्ट्री में एक दिलचस्प स्थिति भी देखने को मिलती है। आज 600 करोड़ वीडियोज, हजारों शोज और दर्जनों प्लेटफॉर्म्स मौजूद हैं, लेकिन इसके बावजूद भारतीय दर्शक अक्सर शिकायत करता है- “कुछ देखने को नहीं।”
यह स्थिति जरूरत से ज्यादा कंटेंट होने की वजह से बनती है। जब देखने के लिए बहुत ज्यादा विकल्प होते हैं, तो लोग समझ नहीं पाते कि आखिर क्या देखें।
Auto-debit frustration, मंथली सब्सक्रिप्शन रिमाइंडर्स और अलग-अलग ऐप्स में कंटेंट ढूंढने की परेशानी- यह सब मिलकर व्युअर्स को मानसिक रूप से थका देता है।
MiQ की रिपोर्ट के मुताबिक 67% भारतीय व्युअर्स आने वाले समय में अपने streaming सब्सक्रिप्शंस बढ़ाने की सोच रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ वही दर्शक प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती कीमतों से नाराज भी हैं।
Advertisers के लिए क्या मायने?
अगर दर्शक पेड सब्सक्रिप्शंस कम करते हैं और फ्री या ad-supported प्लेटफॉर्म्स की तरफ जाते हैं, तो इसका सबसे बड़ा फायदा डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री को मिल सकता है।
FICCI-EY की 2026 रिपोर्ट के मुताबिक भारत में डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग 2025 में 26% बढ़कर ₹94,700 करोड़ ($11.4 बिलियन) तक पहुंच गई। अनुमान है कि 2028 तक यह आंकड़ा ₹1,39,000 करोड़ तक पहुंच जाएगा।
YouTube अकेले 2030 तक भारत में $3.05 बिलियन का ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्यू जनरेट करेगा।
OTT प्लेटफॉर्म्स पर ऐड इन्वेंट्री बढ़ने से ब्रैंड्स को टार्गेटेड और डेटा संचालित वीडियो ऐडवर्टाइजिंग का बेहतर मौका मिलेगा। वहीं Connected TV पर प्रीमियम ऐप प्लेसमेंट्स की वैल्यू भी लगातार बढ़ेगी।
OTT का Next Phase: क्या होगा आगे?
2026 और उसके बाद भारत का OTT landscape कई बड़े बदलावों से गुजर सकता है।
Consolidation: छोटे OTT प्लेटफॉर्म्स या तो बड़े प्लेटफॉर्म्स में merge हो सकते हैं या फिर बाजार से बाहर हो सकते हैं। बढ़ते competitive pressure में survival आसान नहीं रहेगा।
Flexible Pricing: भविष्य में वीकली प्लान्स, event-based सब्सक्रिप्शंस (जैसे सिर्फ IPL सीजन के लिए) और माइक्रो-पेमेंट्स जैसे एक्सपेरिमेंट्स बढ़ सकते हैं।
Hybrid Models का विस्तार: फ्री + विज्ञापन वाला टियर लगभग हर प्लेटफॉर्म पर स्टैंडर्ड बन सकता है। वहीं सिर्फ पेड मॉडल धीरे-धीरे लग्जरी सेगमेंट तक सीमित हो सकता है।
AI-Powered Personalization: आने वाले समय में OTT प्लेटफॉर्म्स की कंटेंट सुझाव इतनी बेहतर हो सकती है कि लोगों को अलग-अलग ऐप्स पर जाकर कंटेंट ढूंढने की जरूरत न पड़े। उन्हें एक ही जगह अपनी पसंद का ज्यादा कंटेंट आसानी से मिल सकता है।
बैलेंस ही असली जवाब
भारत में OTT की कहानी अब सिर्फ technology और entertainment तक सीमित नहीं रह गई है। यह लोगों की बदलती आदतों और डिजिटल मनोरंजन के बदलते कारोबार की कहानी बन चुकी है।
एक तरफ देश में 60 करोड़ से ज्यादा OTT व्युअर्स हैं, Connected TV की पहुंच तेजी से बढ़ रही है और भारत दुनिया का सबसे बड़ा SVOD मार्केट बनने की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन दूसरी तरफ OTT प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती कीमतें, अलग-अलग ऐप्स में बंटा कंटेंट, पॉसवर्ड शेयरिंग की समस्या और बढ़ता खर्च लोगों को परेशान भी कर रहा है।
मिडिल क्लास दर्शक हर महीने यही सोचता है- “इस बार कौन सा OTT बंद करूं?”
यही वजह है कि भारत में OTT का भविष्य सिर्फ महंगे सब्सक्रिप्शंस पर नहीं टिका होगा। आने वाले समय में वही प्लेटफॉर्म ज्यादा सफल होंगे, जो कम कीमत, अच्छे कंटेंट, विज्ञापन और आसान एक्सेस के बीच सही संतुलन बना पाएंगे।
जो प्लेटफॉर्म दर्शकों की जरूरत और उनकी जेब- दोनों को समझेगा, वही सबसे आगे निकलेगा।
प्रसार भारती के OTT प्लेटफॉर्म ‘Waves’ को लेकर TDSAT में कानूनी विवाद बढ़ गया है। मामला अब OTT प्लेटफॉर्म्स पर टीवी चैनलों की स्ट्रीमिंग के नियमन और अधिकार क्षेत्र तक पहुंच गया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रसार भारती (Prasar Bharati) के OTT प्लेटफॉर्म ‘Waves’ को लेकर शुरू हुआ विवाद अब भारत में OTT और पारंपरिक प्रसारण नियमों के बीच बड़े कानूनी और नीतिगत टकराव का रूप लेता दिखाई दे रहा है। मामला दूरसंचार विवाद निपटान और अपीलीय अधिकरण (TDSAT) में चल रहा है, जहां इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन (IBDF) ने प्रसार भारती का समर्थन किया है।
विवाद की शुरुआत ऑल इंडिया डिजिटल केबल फेडरेशन (AIDCF) की याचिका से हुई, जिसमें ‘Waves’ पर इंटरनेट के जरिए टीवी चैनलों की स्ट्रीमिंग को रोकने की मांग की गई है। AIDCF का आरोप है कि यह सेवा Uplinking और Downlinking Guidelines 2022 का उल्लंघन करती है और इससे लाइसेंस प्राप्त केबल नेटवर्क्स के कारोबार पर असर पड़ रहा है।
हालांकि 12 मई को हुई सुनवाई में प्रसार भारती ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। उसने कहा कि AIDCF केवल ‘Waves’ को निशाना बना रहा है, जबकि वही कंटेंट YouTube और अन्य निजी OTT प्लेटफॉर्म्स पर भी खुले तौर पर उपलब्ध है। प्रसार भारती ने दलील दी कि ‘Waves’ केवल उसी डिजिटल वितरण मॉडल का हिस्सा है, जिसे कई ब्रॉडकास्टर्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म पहले से अपना रहे हैं।
मामले में IBDF ने भी TDSAT के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया। संगठन का कहना है कि OTT सेवाएं TRAI के पारंपरिक ब्रॉडकास्टिंग डिस्ट्रीब्यूशन फ्रेमवर्क के दायरे में नहीं आतीं। IBDF ने TRAI के 2017 के टैरिफ और इंटरकनेक्शन नियमों का हवाला देते हुए कहा कि OTT प्लेटफॉर्म्स को कभी “डिस्ट्रिब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर” (DPO) नहीं माना गया।
दूसरी ओर AIDCF का कहना है कि OTT पर टीवी चैनलों को उनके लोगो और ब्रांडिंग के साथ दिखाया जाना केबल सेवाओं का सीधा विकल्प बन रहा है। खासकर छोटे शहरों और कस्बों में दर्शक चैनलों को उनके ब्रांड नाम से पहचानते हैं, जिससे केबल सब्सक्रिप्शन प्रभावित हो सकते हैं।
प्रसार भारती ने अपने जवाब में बताया कि ‘Waves’ पर 88 कंटेंट प्रोवाइडर्स और चैनल्स को औपचारिक समझौतों के तहत जोड़ा गया है। उसने यह भी कहा कि याचिका में इन कंटेंट पार्टनर्स को पक्षकार नहीं बनाया गया, जबकि किसी भी अंतरिम आदेश का सीधा असर उनके व्यावसायिक हितों पर पड़ेगा।
मीडिया इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि यह मामला केवल ‘Waves’ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि भारत में इंटरनेट आधारित टीवी स्ट्रीमिंग को मौजूदा प्रसारण कानूनों के तहत नियंत्रित किया जा सकता है या नहीं। मामले की अगली सुनवाई 28 मई 2026 को होगी।
सुबह नींद खुलते ही मोबाइल स्क्रीन ऑन हो जाती है। कोई चाय पीते-पीते दो मिनट का एपिसोड देख रहा है, तो कोई ऑफिस जाते वक्त मेट्रो में अगला पार्ट। मोबाइल स्क्रीन पर यह नई आदत सिर्फ टाइमपास नहीं है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
सुबह नींद खुलते ही मोबाइल स्क्रीन ऑन हो जाती है। कोई चाय पीते-पीते दो मिनट का एपिसोड देख रहा है, तो कोई ऑफिस जाते वक्त मेट्रो में अगला पार्ट। लंच ब्रेक में कुछ मिनट की स्क्रॉलिंग, फिर रात को सोने से पहले “बस एक एपिसोड और…”।
मोबाइल स्क्रीन पर यह नई आदत सिर्फ टाइमपास नहीं है। यह भारत में तेजी से बदलती डिजिटल एंटरटेनमेंट संस्कृति की कहानी है और इस बदलाव का नया चेहरा है- ‘माइक्रो ड्रामा’ (Micro Drama)। छोटे-छोटे एपिसोड, तेज कहानी, लगातार Cliffhanger और मोबाइल-फर्स्ट फॉर्मेट… यही वजह है कि माइक्रो ड्रामा आज भारत में सबसे तेजी से बढ़ते डिजिटल कंटेंट फॉर्मेट्स में शामिल हो चुका है।
VC फर्म Lumikai की ‘State of India Interactive Media Report 2025’ के मुताबिक, भारत का माइक्रो ड्रामा मार्केट अपने पहले ही साल में लगभग 300 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया। रिपोर्ट के अनुसार, इस सेगमेंट ने करीब 45 करोड़ डाउनलोड और लगभग 10 करोड़ मंथली एक्टिव यूजर्स (MAUs) हासिल किए हैं। अनुमान है कि 2030 तक यह बाजार 4.5 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।
यह सिर्फ एक नया OTT ट्रेंड नहीं है। यह दर्शकों की बदलती आदतों, मोबाइल-फर्स्ट एंटरटेनमेंट और सोशल मीडिया आधारित कंटेंट डिस्कवरी का नया दौर है।
Reels Culture से Micro Drama तक
भारत में Short Video Culture पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। TikTok के जाने के बाद Instagram Reels, YouTube Shorts और Moj जैसे प्लेटफॉर्म्स ने लोगों को छोटे वीडियो देखने की आदत डाल दी। अब वही आदत कहानी-आधारित कंटेंट में बदल रही है।
पहले OTT पर दर्शक 40-50 मिनट की वेब सीरीज देखते थे। अब वही दर्शक 1 से 3 मिनट के एपिसोड में पूरी कहानी देखना चाहते हैं। माइक्रो ड्रामा इसी बदलती Viewing Habit का परिणाम है।
इस फॉर्मेट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह मोबाइल स्क्रीन के हिसाब से बनाया गया है। वीडियो Vertical Format में शूट होते हैं। एपिसोड छोटे होते हैं। कहानी तेज गति से आगे बढ़ती है और हर एपिसोड किसी बड़े मोड़ पर खत्म होता है, ताकि दर्शक अगला पार्ट तुरंत देखने लगे।
इसी वजह से माइक्रो ड्रामा का Consumption Pattern पारंपरिक OTT से बिल्कुल अलग है। लोग इसे TV पर बैठकर नहीं, बल्कि दिनभर छोटे-छोटे ब्रेक्स (Breaks) में देखते हैं।
Feed में मिलता है कंटेंट, Search में नहीं
माइक्रो ड्रामा की सफलता की सबसे बड़ी वजह उसका डिस्कवरी पैटर्न है। Meta और Ormax Media की संयुक्त रिपोर्ट ‘Micro Dramas: The India Story’ के मुताबिक, 89% दर्शक माइक्रो ड्रामा को Social Media Feeds और Recommendations के जरिए खोजते हैं। यानी लोग इन्हें Netflix की तरह Search नहीं करते, बल्कि Instagram या Facebook स्क्रॉल करते-करते देखना शुरू करते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, 65% दर्शकों ने पिछले एक साल के भीतर ही माइक्रो ड्रामा देखना शुरू किया है। रिसर्च नवंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच 14 राज्यों में 2,000 लोगों और 50 गहन इंटरव्यू के आधार पर की गई थी। यानी यह पूरा इकोसिस्टम अभी नया है, लेकिन इसकी ग्रोथ स्पीड बेहद तेज है।
भारत का नया मोबाइल-फर्स्ट एंटरटेनमेंट
Lumikai की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में स्मार्टफोन यूजर्स की संख्या 87.7 करोड़ तक पहुंच चुकी है। यही वजह है कि मोबाइल-फर्स्ट कंटेंट तेजी से बढ़ रहा है। माइक्रो ड्रामा इसी मोबाइल-फर्स्ट बिहेवियर के हिसाब से बनाया गया फॉर्मेट है।
Meta-Ormax रिपोर्ट बताती है कि दर्शक हर हफ्ते औसतन 3.5 घंटे माइक्रो ड्रामा देखते हैं। लेकिन यह समय एक साथ नहीं, बल्कि दिनभर कई छोटे-छोटे Sessions में बंटा होता है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि लगभग 57% लोग माइक्रो ड्रामा देखते समय कोई दूसरा काम भी कर रहे होते हैं- जैसे यात्रा करना, काम के बीच ब्रेक लेना या रात में स्क्रॉलिंग करना। यानी माइक्रो ड्रामा “Appointment Viewing” नहीं, बल्कि “In-Between Viewing” बन चुका है।
कौन-कौन से प्लेटफॉर्म्स आगे?
भारत में अब माइक्रो ड्रामा का पूरा इकोसिस्टम तैयार हो रहा है। Kuku TV, Story TV, QuickTV और कई नए स्टार्टअप्स इस स्पेस में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। ये प्लेटफॉर्म हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में छोटे एपिसोड आधारित कंटेंट बना रहे हैं।
Kuku TV जैसे प्लेटफॉर्म रिश्तों, परिवार, बदला, गांव-शहर, रोमांस और मेलोड्रामा जैसी कहानियों पर फोकस कर रहे हैं। इस कंटेंट की खास बात यह है कि यह “High Drama, High Emotion” मॉडल पर चलता है। हर एपिसोड में Shock Value, Emotion और Suspense होता है।
अब बड़े OTT प्लेटफॉर्म्स भी इस स्पेस को गंभीरता से देखने लगे हैं। इंडस्ट्री में माना जा रहा है कि आने वाले समय में बड़े OTT प्लेयर्स भी Short Episodic Vertical Content पर निवेश बढ़ा सकते हैं।
OTT का नया प्रतिद्वंद्वी?
भारत का पारंपरिक OTT बाजार पहले से बड़ा है, लेकिन माइक्रो ड्रामा की ग्रोथ स्पीड ज्यादा तेज दिखाई दे रही है।
Lumikai रिपोर्ट के मुताबिक, माइक्रो ड्रामा सेगमेंट 2030 तक 4.5 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। Netflix और JioHotstar जैसे प्लेटफॉर्म्स ने भारत में OTT की मजबूत नींव बनाई, लेकिन माइक्रो ड्रामा दर्शकों के उस नए वर्ग को टारगेट कर रहा है, जो लंबे कंटेंट के बजाय Fast Consumption चाहता है। यही वजह है कि इंडस्ट्री इसे OTT का “Next Big Format” मानने लगी है।
चीन से आया मॉडल, भारत में नया रूप
माइक्रो ड्रामा का मॉडल सबसे पहले चीन में तेजी से लोकप्रिय हुआ। वहां Short Serialized Drama Apps ने अरबों डॉलर का बाजार बनाया। अब वही मॉडल भारतीय बाजार में लोकल कहानियों और भारतीय भावनाओं के साथ अपनाया जा रहा है।
भारत में यह फॉर्मेट खासतौर पर Tier-2 और Tier-3 शहरों में तेजी से बढ़ रहा है, जहां Mobile Internet Consumption तेजी से बढ़ा है। भारतीय दर्शकों के लिए रिश्तों, परिवार, गांव, प्यार, बदला और सामाजिक संघर्षों पर आधारित कहानियां ज्यादा काम कर रही हैं।
AI और Micro Drama
माइक्रो ड्रामा इंडस्ट्री में AI का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ रहा है।
Meta-Ormax रिपोर्ट के मुताबिक, 47% दर्शकों ने AI-Generated Micro Drama Content को “Unique” और “Creative” बताया। वहीं सिर्फ 6% दर्शकों ने AI Content को पूरी तरह खारिज किया। इसका मतलब है कि दर्शक AI आधारित कंटेंट को लेकर उतने नकारात्मक नहीं हैं, जितना पहले माना जा रहा था।
AI की मदद से Script Writing, Dubbing, Translation और Content Production की लागत कम हो सकती है। इससे छोटे प्लेटफॉर्म्स को तेजी से ज्यादा कंटेंट बनाने में मदद मिल रही है।
ब्रांड्स के लिए नया मौका
माइक्रो ड्रामा सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं, बल्कि ऐडवर्टाइजिंग और ब्रैंड इंटेग्रेशन (Brand Integration) का नया प्लेटफॉर्म भी बन रहा है। पारंपरिक OTT पर विज्ञापन महंगे होते हैं और दर्शक अक्सर Ads Skip कर देते हैं। लेकिन माइक्रो ड्रामा में ब्रैंड इंटेग्रेशन कहानी का हिस्सा बन सकता है।
Meta जैसी कंपनियां अब इस इकोसिस्टम का अहम हिस्सा बन चुकी हैं, क्योंकि ज्यादातर Discovery Social Feeds के जरिए हो रही है। इसका फायदा ब्रैंड्स को भी मिल रहा है, क्योंकि वे सीधे मोबाइल-फर्स्ट ऑडियंस तक पहुंच पा रहे हैं।
लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि माइक्रो ड्रामा की ग्रोथ तेज है, लेकिन इंडस्ट्री के सामने कई गंभीर चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ा सवाल कंटेंट क्वॉलिटी का है। कई प्लेटफॉर्म्स बहुत तेजी से कंटेंट बना रहे हैं। लेकिन क्वॉन्टिटी बढ़ने के साथ क्वॉलिटी बनाए रखना आसान नहीं है।
Clickbait Titles, Overdramatic Thumbnails और Repetitive Stories भी इस इंडस्ट्री की बड़ी समस्या बनती जा रही हैं। इसके अलावा यूजर रिटेंशन भी बड़ी चुनौती है।
दर्शक छोटे एपिसोड तेजी से देखते हैं, लेकिन लंबे समय तक एक ही प्लेटफॉर्म पर टिके रहें, यह अभी साबित होना बाकी है। मॉनेटाइजेशन भी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है। अभी ज्यादातर प्लेटफॉर्म In-App Purchases, Subscription और ऐडवर्टाइजिंग मॉडल्स पर प्रयोग कर रहे हैं।
आगे क्या?
फिलहाल एक बात साफ है- माइक्रो ड्रामा कोई गुजरता हुआ ट्रेंड नहीं है। यह भारत के डिजिटल एंटरटेनमेंट में हो रहे बड़े बदलाव का हिस्सा है, जहां मोबाइल स्क्रीन ही नया टेलीविजन बन चुकी है।
दर्शक अब Long Attention Span वाले कंटेंट के बजाय Fast, Emotional और Easily Consumable कहानियां चाहते हैं और माइक्रो ड्रामा ठीक वही दे रहा है।
अगर आने वाले समय में बड़े OTT प्लेटफॉर्म्स, स्टार्टअप्स और प्रॉडक्शन हाउस इस फॉर्मेट में बेहतर क्वालिटी, मजबूत राइटिंग और स्थायी मॉनेटाइजेशन मॉडल ला पाए, तो माइक्रो ड्रामा भारतीय OTT इंडस्ट्री का अगला बड़ा अध्याय बन सकता है।
दो मिनट की कहानी में पूरी भावनाएं समेटने का यही हुनर आज माइक्रो ड्रामा की सबसे बड़ी ताकत बन चुका है।
प्रसार भारती के तहत आने वाले दूरदर्शन केंद्र पणजी ने शास्त्रीय नृत्य कलाकारों के लिए ऑडिशन की घोषणा की है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
बच्चों का एंटरटेनमेंट अब सिर्फ कार्टून तक सीमित नहीं रहा, बल्कि OTT प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट देखने की आदत तेजी से बढ़ती जा रही है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
सवाल यह है कि भारत का आम दर्शक आखिर किस मॉडल को अपना रहा है और विज्ञापन की दुनिया में इसका क्या मतलब है?
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
भारत में डिजिटल मनोरंजन की दुनिया एक नए मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ Netflix और Amazon Prime Video जैसे पेड प्लेटफॉर्म्स हैं जो प्रीमियम कंटेंट का वादा करते हैं, तो दूसरी तरफ YouTube, Amazon MX Player और JioCinema जैसे फ्री प्लेटफॉर्म्स हैं जो बिना एक रुपया खर्च किए घंटों का मनोरंजन परोस रहे हैं। सवाल यह है कि भारत का आम दर्शक आखिर किस मॉडल को अपना रहा है और विज्ञापन की दुनिया में इसका क्या मतलब है?
भारत का OTT मार्केट: एक झलक
Ormax Media की 'The Ormax OTT Audience Report: 2025' के अनुसार, 2025 में भारत के OTT दर्शकों की संख्या 60.12 करोड़ (601.2 मिलियन) तक पहुंच गई। यह देश की कुल आबादी का 41.1 प्रतिशत है। 2024 में यह आंकड़ा 54.73 करोड़ था, यानी एक साल में करीब 10% की बढ़त। यह रिपोर्ट जून-जुलाई 2025 के दौरान 15,600 प्रतिभागियों पर किए गए प्राइमरी रिसर्च पर आधारित है।
मार्केट के मूल्य की बात करें तो Statista के अनुसार 2025 में भारत का OTT वीडियो मार्केट $4.44 अरब (लगभग ₹37,000 करोड़) तक पहुंचा। Media Partners Asia (MPA) की AVB 2026 रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में भारत का कुल ऑनलाइन वीडियो रेवेन्यू $4.31 अरब था और 2030 तक यह $9.17 अरब तक पहुंचने का अनुमान है। लेकिन इस पूरे मार्केट की असली कहानी है- 'फ्री कंटेंट' बनाम 'पेड कंटेंट' की जंग।
YouTube vs Netflix: दो प्लेटफॉर्म, दो अलग इकोसिस्टम
YouTube - मुफ्त का महाराजा
भारत में YouTube की बादशाहत बेमिसाल है। Ormax Media की रिपोर्ट के मुताबिक, YouTube के 50 करोड़ (500 मिलियन) से ज्यादा इंस्टाल्स हैं और इसके 45 करोड़ (450 मिलियन) से अधिक मंथली एक्टिव यूजर्स (MAU) हैं। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि इनमें से करीब 98% यूजर्स बिल्कुल मुफ्त में कंटेंट देखते हैं- YouTube प्रीमियम के सब्सक्राइबर्स भारत में केवल 70-80 लाख के आसपास हैं, यानी कुल यूजर बेस का 2% से भी कम।
विज्ञापन राजस्व के मामले में YouTube भारत में एक विशाल मशीन है। MPA की AVB 2026 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में YouTube का ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्यू 2024 में $1.84 अरब था, जो 2030 तक बढ़कर $3.05 अरब से अधिक होने का अनुमान है। यानी YouTube भारत की OTT ऐडवर्टाइजिंग इकनॉमी की रीढ़ है।
Netflix- प्रीमियम का किला, पर सीमित दायरा
Netflix ने भारत में जनवरी 2016 में कदम रखा था। दस साल बाद, बिजनेस स्टैंडर्ड की मार्च 2026 की रिपोर्ट (Media Partners Asia के हवाले से) के अनुसार, Netflix India के पास 1.6 करोड़ से अधिक (16 मिलियन+) सब्सक्राइबर्स और लगभग 5 करोड़ व्युअर्स हैं, जबकि इसकी भारत से रेवेन्यू करीब ₹4,000 करोड़ के आसपास है।
Netflix India के सब्सक्राइबर्स की संख्या अलग-अलग sources में भिन्न है- बिजनेस स्टैंडर्ड/MPA (मार्च 2026) 1.6 करोड़ बताते हैं, DemandSage/Zee News 1.24 करोड़ (12.37 मिलियन) और HSBC (जनवरी 2026) लगभग 2 करोड़ का अनुमान देते हैं। यह अंतर अलग-अलग measurement methodologies की वजह से है।
Netflix India की मुख्य खासियत यह है कि इसकी ARPU (एवरेज रेवेन्यू प्रति यूजर) इंडस्ट्री एवरेज से तीन गुना ज्यादा है- यानी यह एक छोटे लेकिन बेहद मूल्यवान दर्शक वर्ग को serve करता है।
Netflix globally देखें तो कंपनी ने Q4 2025 में 325 मिलियन (32.5 करोड़) पेड memberships का आंकड़ा पार किया- यह Netflix की official SEC Filing (Form 8-K) से confirmed है। 2025 में Netflix का वैश्विक रेवेन्यू $45.18 अरब रहा, जो 2024 की तुलना में 15.84% अधिक है।
Free OTT का उभरता साम्राज्य: MiniTV, MX Player और JioCinema
Amazon MX Player- 25 करोड़ की ताकत
Amazon ने 2024 में MX Player के एसेट्स खरीदे और अपनी फ्री सर्विस Amazon miniTV के साथ मिलाकर Amazon MX Player बनाया। यह प्लेटफॉर्म पूरी तरह free (AVOD model) है- बिना किसी पेड सब्सक्रिप्शन के। Amazon India की ऑफिशियल प्रेस रिलीज के अनुसार, इस merged प्लेटफॉर्म के 25 करोड़ (250 मिलियन) से ज्यादा यूनिक मंथली यूजर्स हैं, जो इसे भारत की सबसे बड़ी फ्री स्ट्रीमिंग सर्विसेज में से एक बनाता है।
मई 2026 में एक और बड़ा कदम उठाते हुए Amazon ने Amazon MX Player को Prime Video के साथ इंटीग्रेट कर दिया, जिससे अब एक ही जगह SVOD (पेड), AVOD (free), और TVOD तीनों मॉडल उपलब्ध हैं। Aashram, Dharavi Bank, Campus Diaries, Yeh Meri Family जैसे popular shows अब बिल्कुल मुफ्त देखे जा सकते हैं।
JioCinema और JioHotstar- खेल बदलने वाला कदम
JioCinema ने भारतीय OTT इतिहास में एक क्रांतिकारी मोड़ तब लाया जब IPL 2023 को उसने पूरी तरह मुफ्त stream किया। बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार, पूरे IPL 2023 सीजन में JioCinema के कुल 44.9 करोड़ (449 मिलियन) व्युअर्स रहे। IPL 2023 के फाइनल मैच में एकसाथ 3.2 करोड़ concurrent व्युअर्स ने लाइव स्ट्रीमिंग देखी- जो उस समय का वर्ल्ड रिकॉर्ड था।
2025 में Reliance और Disney के बीच मर्जर के बाद JioCinema और Disney+ Hotstar मिलकर JioHotstar बन गए। JioHotstar का आधिकारिक लॉन्च 14 फरवरी 2025 को 5 करोड़ सब्सक्राइबर्स के साथ हुआ। फिर IPL 2025 ने इसे रॉकेट की गति दी:
यानी महज चार महीनों में 5 करोड़ से 30 करोड़ सब्सक्राइबर्स तक का सफर। IPL 2025 में JioHotstar का डिजिटल ऑडियंस 65.2 करोड़ रहा- जो TV audience (53.7 करोड़) से भी आगे निकल गया।
बिजनेस स्टैंडर्ड की मई 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, JioHotstar के CEO Kevin Vaz ने अर्निंग कॉल्स में बताया कि प्लेटफॉर्म की कंटेंट लाइब्रेली 3,20,000 घंटे (320,000 hours) की है- जो Netflix या Amazon Prime Video के Indian catalogue से छह गुना बड़ी है। JioHotstar के मंथली एक्टिव यूजर्स की संख्या 50 करोड़ (503 मिलियन) से अधिक है।
फ्री vs पेड: दर्शक कहां खड़े हैं?
फ्री यूजर्स की बहुसंख्यक दुनिया
भारत में OTT का सबसे बड़ा सच यह है कि अधिकांश दर्शक अभी भी मुफ्त कंटेंट को पंसद करते हैं। Ormax Media के अनुसार 2025 के मध्य तक भारत में एक्टिव पेड OTT सब्सक्रिप्शंस की संख्या 14.82 करोड़ (148.2 मिलियन) थी- और इसमें telecom bundles और aggregators के जरिए ली गई सब्सक्रिप्शंस भी शामिल हैं। इसे 60 करोड़ OTT users के साथ compare करें, तो साफ है कि करीब 75% से ज्यादा दर्शक किसी पेड प्लेटफॉर्म से नहीं जुड़े हैं।
FICCI-EY की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2024 में subscribing households की संख्या 4.7 करोड़ (47 मिलियन) थी और 2027 तक यह 6.5 करोड़ (65 मिलियन) होने का अनुमान है। यह वृद्धि प्रभावशाली है, लेकिन भारत की 140 करोड़ आबादी को देखते हुए पेड OTT अभी भी एक छोटे हिस्से का खेल है।
Regional OTT में पेड का अपवाद
दिलचस्प बात यह है कि niche और रीजनल OTT प्लेटफॉर्म्स पर पेड सब्सक्राइबर्स का अनुपात काफी ज्यादा है। The Media Ant की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, मलयालम प्लेटफॉर्म ManoramaMAX के करीब 85% यूजर्स पेड हैं, जबकि बंगाली प्लेटफॉर्म Hoichoi के लगभग 70% यूजर्स सब्सक्रिप्शन लेकर कंटेंट देखते हैं। इससे साफ होता है कि जहां हाइपरलोकल और एक्सक्लूसिव कंटेंट मिलता है, वहां दर्शक पैसे खर्च करने के लिए तैयार रहते हैं।
Viewing Hours: कौन देख रहा है कितना?
The Media Ant के CTV रिसर्च के अनुसार, एक औसतन एक भारतीय दर्शक अब रोजाना 3.5 घंटे TV पर बिताता है, जिसमें से 80% समय मोबाइल डिवाइस के साथ cross-screen का इस्तेमाल करता है। यानी टीवी देखते समय मोबाइल चलाना, OTT कंटेंट टीवी पर देखना और उससे जुड़ी जानकारी मोबाइल पर सर्च करना या फिर लैपटॉप, मोबाइल और स्मार्ट टीवी के बीच कंटेंट स्विच करना। Netflix के ग्लोबल डेटा के अनुसार, पेड यूजर्स प्रतिदिन करीब 2 घंटे प्लेटफॉर्म पर बिताते हैं।
Connected TV (CTV) एक गेम चेंजर बन रहा है। Ormax Media के अनुसार, 2025 में CTV users की संख्या 87% की छलांग के साथ 12.92 करोड़ (129.2 मिलियन) हो गई- 2024 में यह 6.97 करोड़ थी। यह 35-40 मिलियन CTV homes में तब्दील होता है। अब 21% OTT दर्शक CTV पर कंटेंट देखते हैं, जो 2024 में 13% था। इनमें 55% से ज्यादा CTV व्युअर्स 10 लाख से कम आबादी वाले शहरों और कस्बों से आते हैं।
Ad-Supported Consumption: विज्ञापन की असली कहानी
AVOD का दबदबा
भारत में OTT मोनेटाइजेशन का सबसे बड़ा इंजन अभी भी ऐडवर्टाइजिंग है। MPA की AVB 2026 रिपोर्ट के अनुसार:
कुल OTT रेवेन्यू ग्रोथ का 70% से अधिक हिस्सा AVOD से ही आएगा। SVOD (Subscription-based) रेवेन्यू 2024 में पहली बार $1 अरब का मील का पत्थर पार कर गया और 2030 तक $2.68 अरब होने का अनुमान है।
India का Digital Advertising मार्केट
dentsu-e4m Digital Advertising Report 2026 (जिसे भारत की सबसे भरोसेमंद ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट माना जाता है) के अनुसार, 2025 में भारत का डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग मार्केट ₹71,621 करोड़ तक पहुंचा और यह देश के कुल ऐडवर्टाइजिंग स्पेंड का 59% हिस्सा है। 2026 में यह बढ़कर ₹84,770 करोड़ होने का अनुमान है। Online video (OTT + short-form) digital ad spend का 28% हिस्सा है यानी ₹20,004 करोड़।
CPM और CPC Trends: भारत सस्ता, पर तेजी से महंगा होता मार्केट
The Current की रिपोर्ट एक अहम विरोधाभास उजागर करती है: भारत में लोग अपना 52% digital time OTT, CTV, music streaming और apps पर बिताते हैं, लेकिन ऐडवर्टाइजर्स इन प्लेटफॉर्मs पर अपना केवल 15% budget खर्च करते हैं। यह असंतुलन एक बड़ा untapped अवसर है।
CPM/CPC के मामले में भारत अभी भी global markets से काफी सस्ता है। OwlClaw Technologies के 2025-26 benchmark data के अनुसार, भारत में CPCs अमेरिका के मुकाबले 70-85% कम हैं।
CTV advertising में तेज वृद्धि देखी जा रही है। The Media Ant के विश्लेषण (Pitch Madison और dentsu e4m के हवाले से) के मुताबिक, 2026 में CTV ad spend ₹2,300-2,500 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है- यह कुल digital video ad spend का 18% हिस्सा है, जो पहले 12% था। 2027 तक यह बढ़कर ₹3,500 करोड़ से ऊपर जाने की उम्मीद है। 2026 में CTV का total TV ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में हिस्सा 16% से ज्यादा होने का अनुमान है।
Hybrid Model: भविष्य की दिशा
यह साफ हो रहा है कि भारत में कोई एक मॉडल "विजेता" नहीं होगा। बड़े प्लेटफॉर्मs hybrid approach अपना रहे हैं:
MPA की रिपोर्ट बताती है कि एक average Indian household अब औसतन 3 OTT services subscribe करता है और प्रति माह ₹1,360 से अधिक खर्च करता है- लेकिन ऐसे households अभी भी कुल दर्शकों का एक छोटा हिस्सा ही हैं।
भारत free का दीवाना, पेड का राज सीमित
2026 के आंकड़े बिल्कुल साफ तस्वीर पेश करते हैं। भारत में OTT का असली राज 'फ्री कंटेंट' का है। YouTube के 45 करोड़ मंथली यूजर्स, Amazon MX Player के 25 करोड़ यूजर्स और JioHotstar का 3,20,000 घंटे का विशाल कंटेंट लाइब्रेरी- यह सब मिलकर एक ऐसी दुनिया बना रहे हैं जहां मनोरंजन के लिए पैसे देने की मजबूरी नहीं।
भारत का दर्शक फ्री OTT पसंद करता है और ऐडवर्टाइजर उसे ढूंढने के लिए पैसे देने को तैयार है।
करीब 300 करोड़ रुपये सालाना का यह मीडिया मैंडेट भारतीय मीडिया एजेंसी बाजार के सबसे बड़े अकाउंड्स में गिना जा रहा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
देश के ओटीटी और विज्ञापन जगत में एक बड़ा बदलाव सामने आया है। दरअसल, नेटफ्लिक्स (Netflix) ने भारत में अपने करीब 300 करोड़ रुपये के मीडिया मैंडेट को ओमनीकॉम मीडिया ग्रुप (Omnicom Media Group) की नेटवर्क एजेंसी ‘Initiative’ को सौंप दिया है। यह फैसला मल्टी-एजेंसी पिच प्रक्रिया के बाद लिया गया, जिसमें कई बड़ी मीडिया एजेंसियों ने हिस्सा लिया था।
इससे पहले यह मीडिया मैंडेट वेवमेकर इंडिया (Wavemaker India) के पास था, जो पिछले कई वर्षों से नेटफ्लिक्स के पारंपरिक और डिजिटल मीडिया प्लानिंग और खरीदारी का काम संभाल रही थी।
यह बदलाव इस साल ओटीटी और एंटरटेनमेंट सेक्टर में सबसे बड़े मीडिया अकाउंट मूवमेंट्स में से एक माना जा रहा है। ऐसे समय में यह फैसला आया है जब स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स के बीच दर्शकों और सब्सक्राइबर्स को लेकर प्रतिस्पर्धा लगातार तेज हो रही है।
जानकारी के मुताबिक, नेटफ्लिक्स ने इस साल की शुरुआत में अपने मीडिया एजेंसी पार्टनर की समीक्षा शुरू की थी। इस प्रक्रिया में टीवी, डिजिटल, परफॉर्मेंस मार्केटिंग और रीजनल मार्केट तक पहुंच जैसे पहलुओं पर एजेंसियों का मूल्यांकन किया गया। कई राउंड्स की इस पिच में डेटा-आधारित प्लानिंग, टेक्नोलॉजी इंटीग्रेशन और बिजनेस रिजल्ट्स पर खास फोकस रहा।
इंडस्ट्री सूत्रों के अनुसार, Initiative की मजबूत डिजिटल क्षमता और ऑडियंस एनालिटिक्स के चलते उसे यह बड़ा मीडिया मैंडेट हासिल हुआ। यह जीत भारत में Initiative के एंटरटेनमेंट और डिजिटल पोर्टफोलियो को और मजबूत करेगी, साथ ही ओमनीकॉम की स्थिति को भी मीडिया एजेंसी बाजार में और मजबूत बनाएगी।
नेटफ्लिक्स का यह फैसला ऐसे समय आया है जब ग्लोबल स्ट्रीमिंग कंपनियां बढ़ते कंटेंट निवेश और मुनाफे के दबाव के बीच अपने मार्केटिंग खर्च और यूजर एक्विजिशन स्ट्रैटेजी की समीक्षा कर रही हैं। इस दौड़ में Amazon Prime Video और Jiostar जैसे प्रतिस्पर्धी भी अपनी रणनीतियों में बदलाव कर रहे हैं।
भारत नेटफ्लिक्स के लिए एक अहम बाजार बना हुआ है, खासकर क्षेत्रीय भाषाओं के कंटेंट और विज्ञापन-समर्थित मॉडल को बढ़ावा देने के साथ। माना जा रहा है कि नया मीडिया स्ट्रक्चर कंपनी को मेट्रो शहरों से आगे बढ़कर छोटे शहरों तक पहुंच बनाने और सब्सक्राइबर बढ़ाने में मदद करेगा।
करीब 300 करोड़ रुपये सालाना का यह मीडिया मैंडेट भारतीय मीडिया एजेंसी बाजार के सबसे बड़े अकाउंड्स में गिना जा रहा है। हालांकि, इस पूरे मामले पर नेटफ्लिक्स और ओमनीकॉम की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
आने वाले महीनों में इस ट्रांजिशन के पूरा होने की उम्मीद है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस तरह के बड़े मीडिया पिच यह दिखाते हैं कि अब कंपनियां सिर्फ मीडिया खरीदारी नहीं, बल्कि डेटा, परफॉर्मेंस और स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं।
आने वाले महीनों में दोनों प्लेटफॉर्म मिलकर एक ऐसा बड़ा स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म तैयार करेंगे, जहां दर्शकों को फ्री और पेड, दोनों तरह का कंटेंट एक ही जगह मिलेगा।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
देश के ओवर द टॉप (OTT) मार्केट में बड़ा बदलाव देखने को मिलने वाला है। एमेजॉन एमएक्स प्लेयर (Amazon MX Player) ने प्राइम वीडियो (Prime Video) के साथ अपने इंटीग्रेशन का ऐलान किया है। आने वाले महीनों में दोनों प्लेटफॉर्म मिलकर एक ऐसा बड़ा स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म तैयार करेंगे, जहां दर्शकों को फ्री और पेड, दोनों तरह का कंटेंट एक ही जगह मिलेगा।
इस नए इंटीग्रेटेड प्लेटफॉर्म में Subscription Video on Demand (SVOD), Advertising Video on Demand (AVOD), Transactional Video on Demand (TVOD) और add-on subscriptions जैसी सभी सेवाएं शामिल होंगी। कंपनी का दावा है कि यह भारत का सबसे बड़ा फ्री और पेड स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म बनेगा।
Prime Video के वाइस प्रेजिडेंट (एशिया पैसिफिक) और ANZ गौरव गांधी इस संयुक्त प्लेटफॉर्म का नेतृत्व करेंगे। उन्होंने कहा कि Prime Video का हमेशा से मकसद दर्शकों तक विविधता से भरी और दमदार स्टोरीज पहुंचाना रहा है। Amazon MX Player के ओरिजिनल कंटेंट और बड़े यूजर बेस के जुड़ने से यह पेशकश पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो जाएगी।
उन्होंने कहा कि अब Prime Video भारत में हर तरह के दर्शकों के लिए क्वालिटी एंटरटेनमेंट का वन-स्टॉप डेस्टिनेशन बनने जा रहा है। गौरव गांधी के मुताबिक, Amazon MX Player ने अपनी अलग और विविध कंटेंट लाइब्रेरी के जरिए मजबूत दर्शक वर्ग तैयार किया है। अब Prime Video के लोकप्रिय और एक्सक्लूसिव कंटेंट के साथ जुड़कर यह प्लेटफॉर्म भारतीय और ग्लोबल कंटेंट की सबसे बड़ी पेशकश देने की दिशा में आगे बढ़ेगा।
इस इंटीग्रेशन का फायदा विज्ञापनदाताओं को भी मिलेगा। Amazon Ads India के वाइस प्रेजिडेंट और हेड गिरीश प्रभु ने कहा कि यह साझेदारी भारतीय विज्ञापन बाजार के लिए गेमचेंजर साबित होगी। अब ब्रांड्स एक ही प्लेटफॉर्म पर फ्री और पेड दोनों तरह के दर्शकों तक पहुंच सकेंगे।
उन्होंने कहा कि Amazon के shopping, browsing और streaming signals की मदद से विज्ञापनदाताओं को ज्यादा प्रभावी और बेहतर targeted advertising solutions मिलेंगे, जिससे हर विज्ञापन को measurable business outcomes में बदला जा सकेगा।
कंपनी ने साफ किया है कि एंड्रॉयड पर Amazon MX Player ऐप पहले की तरह मुफ्त AVOD यूजर्स को सेवा देता रहेगा। हालांकि, इसे नए ब्रांडिंग स्वरूप के साथ पेश किया जाएगा और इसमें Prime Video का अलग एक्सपीरियंस भी मिलेगा।
भारत में पायरेसी एक बड़ी समस्या है। फिल्म सिनेमाघरों में पहुंचे उससे पहले ही उसका HD प्रिंट मोबाइल स्क्रीन पर घूमने लगता है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
कितना बड़ा है यह नुकसान?
EY और इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) की रिपोर्ट "The Rob Report" (अक्टूबर 2024) के अनुसार, 2023 में भारत की पायरेसी अर्थव्यवस्था का आकार ₹22,400 करोड़ था। यह आंकड़ा भारत के मीडिया एवं एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की कुल आय में चौथे सबसे बड़े हिस्से के बराबर है। इसमें से ₹13,700 करोड़ का नुकसान सिनेमा हॉल की पायरेसी से और ₹8,700 करोड़ का नुकसान सीधे OTT कंटेंट की पायरेसी से हुआ। इसके अलावा सरकार को GST के रूप में ₹4,300 करोड़ का संभावित नुकसान अलग से हुआ।
Media Partners Asia (MPA), IP House और Confederation of Indian Industry (CII) की संयुक्त रिपोर्ट (मई 2025) के अनुसार, 2024 में करीब 9 करोड़ (90 मिलियन) भारतीय यूजर्स ने पायरेटेड वीडियो कंटेंट देखा, जिससे लगभग 1.2 अरब डॉलर (करीब ₹10,000 करोड़) का राजस्व नुकसान हुआ। यह भारत के वैध वीडियो उद्योग की कुल आय का 10% है।
OTT सेक्टर पर बात करें तो उद्योग विशेषज्ञों का अनुमान है कि सिर्फ OTT मार्केट को हर साल ₹8,000 से ₹11,000 करोड़ का नुकसान पायरेसी से होता है। यह OTT कंटेंट क्रिएटर्स और फंडर्स की संभावित आय का 10 से 25 प्रतिशत है। Broadcasters और distributors की मानें तो पायरेसी उनकी कुल आय का 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा खा जाती है।
अगर यही रफ्तार जारी रही तो 2029 तक पायरेसी यूजर्स की संख्या 15.8 करोड़ तक पहुंच सकती है और संचयी नुकसान 2.4 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। MUSO की 2024 Piracy Trends and Insights Report (जून 2025) के अनुसार भारत अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा पायरेसी ट्रैफिक स्रोत है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक पायरेसी ट्रैफिक में भारत की हिस्सेदारी 8.12% है।
टेलीग्राम- पायरेसी का नया अड्डा
कुछ साल पहले तक पायरेसी का मतलब था Torrent साइट्स और Illegal Streaming Websites। लेकिन अब तस्वीर बदल गई है। आज टेलीग्राम पायरेसी का सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक जरिया बन चुका है।
पायरेसी का एक और बड़ा जरिया है Illegal Streaming Sites- ये फिशिंग साइट्स, OTT प्लेटफॉर्म्स की नकल करके यूजर्स को आकर्षित करती हैं और मुफ्त में पायरेटेड कंटेंट दिखाती हैं। AI आधारित टूल से ये साइट्स DRM (Digital Rights Management) को बाइपास करने की कोशिश करती हैं।
रिलीज के कुछ घंटों में लीक-"Day 1 Piracy"
पायरेसी का सबसे खतरनाक रूप है "Day 1 Piracy"- यानी फिल्म या वेब सीरीज रिलीज होते ही उसे इंटरनेट पर फ्री में उपलब्ध करा देना।
Pushpa 2: The Rule (दिसंबर 2024): अल्लू अर्जुन की इस ब्लॉकबस्टर फिल्म का लीक उसी दिन शुरू हो गया जब यह सिनेमाघरों में रिलीज हुई यानी 5 दिसंबर 2024 को। TamilYogi, Ibomma, Tamilblasters, 9xMovies, Bolly4u समेत दर्जनों साइट्स पर यह 480p से लेकर 1080p तक कई रिजॉल्यूशन में उपलब्ध हो गई। इसके बाद 20 दिसंबर को Ultra HD प्रिंट भी लीक हो गया यानी रिलीज के सिर्फ 15 दिन में। पहले हफ्ते में ही इस फिल्म ने बहुत बड़ा कलेक्शन किया और तेजी से ₹1,000 करोड़ क्लब के करीब पहुंची , फिर भी रिलीज के दिन से ही पायरेसी जारी रही।
OTT कंटेंट की "Day 1 Piracy" और भी खतरनाक है। Ultra Media & Entertainment Group के COO राजत अग्रवाल के अनुसार, पायरेटेड कंटेंट अक्सर हाई-प्रोफाइल रिलीज के कुछ घंटों के अंदर ऑनलाइन आ जाता है। ChanaJor के फाउंडर और CEO प्रताप जैन कहते हैं कि DRM होने के बावजूद कंटेंट रिकॉर्ड करके अपलोड हो जाता है और लिंक Takedown Teams के एक्शन लेने से पहले ही लाखों लोगों तक पहुंच जाते हैं।
कौन देखता है पायरेटेड कंटेंट?
EY-IAMAI की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 51 प्रतिशत मीडिया उपभोक्ता पायरेटेड सोर्स से कंटेंट देखते हैं। Streaming Services पायरेसी में सबसे आगे है- 63% पायरेटेड कंटेंट Streaming के जरिए देखा जाता है, इसके बाद Mobile Apps का स्थान है (16%), और Social Media व Torrents मिलकर 21% हिस्सा रखते हैं।
पायरेटेड कंटेंट देखने वाले 76 प्रतिशत लोग 19 से 34 साल की उम्र के हैं। महिलाएं ज्यादातर OTT Shows देखना पसंद करती हैं जबकि पुरुष पुरानी फिल्में और क्लासिक्स पायरेटेड रूप में देखते हैं। 40% पायरेटेड कंटेंट हिंदी में देखा जाता है, जबकि अंग्रेजी कंटेंट की हिस्सेदारी 31% है। एक औसत भारतीय हर हफ्ते 9 घंटे पायरेटेड कंटेंट देखने में बिताता है।
दिलचस्प बात यह है कि 64 प्रतिशत पायरेटेड कंटेंट उपभोक्ताओं ने माना कि अगर उन्हें बिना पैसे के, विज्ञापनों के साथ कंटेंट मिल जाए तो वे अधिकृत चैनल्स (authorized चैनल्स) पर जाएंगे। 70 प्रतिशत ने कहा कि वे OTT सब्सक्रिप्शन नहीं खरीदना चाहते। Tier-I शहरों के यूजर पुरानी फिल्में पायरेटेड तरीके से देखते हैं जबकि Tier-II शहरों में हाल ही में रिलीज हुई फिल्में पायरेट की जाती हैं।
सरकार के नियम क्या कहते हैं?
भारत में पायरेसी रोकने के लिए कई कानून हैं, लेकिन हाल के सालों में इन्हें और सख्त किया गया है। खास तौर पर 2023 में हुए बदलाव के बाद अब नियम पहले से ज्यादा मजबूत हो गए हैं।
सबसे अहम है Cinematograph (Amendment) Act, 2023। इस कानून के तहत अगर कोई व्यक्ति थिएटर में बैठकर मोबाइल या किसी भी डिवाइस से फिल्म रिकॉर्ड करता है, तो वह सीधा अपराध माना जाएगा। इसी तरह किसी फिल्म की बिना इजाजत कॉपी दिखाना या शेयर करना भी गैरकानूनी है।
इसमें सजा भी तय है- कम से कम 3 महीने से लेकर 3 साल तक की जेल हो सकती है। जुर्माना कम से कम ₹3 लाख और फिल्म की कुल लागत का 5% तक हो सकता है। यानी अगर फिल्म ₹500 करोड़ की है, तो जुर्माना ₹25 करोड़ तक जा सकता है।
इसके अलावा Information Technology Act, 2000 भी पायरेसी रोकने में अहम भूमिका निभाता है। इसके तहत सरकार टेलीग्राम या इंटरनेट कंपनियों जैसे प्लेटफॉर्म्स को आदेश दे सकती है कि वे गैरकानूनी कंटेंट हटाएं। अब तो यह भी तय किया गया है कि ऐसे कंटेंट को 48 घंटे के अंदर हटाना होगा।
वहीं Copyright Act, 1957 के तहत अगर कोई जानबूझकर पायरेसी करता है, तो उसे 6 महीने से 3 साल तक की जेल और ₹50,000 से ₹2 लाख तक जुर्माना हो सकता है। अगर कोई बार-बार ऐसा करता है, तो सजा और बढ़ जाती है—कम से कम 1 साल की जेल और ₹1 लाख तक का जुर्माना।
साथ ही, नए IT नियमों के मुताबिक अगर किसी प्लेटफॉर्म को कोर्ट या सरकार की तरफ से नोटिस मिलता है, तो उसे 36 घंटे के अंदर कार्रवाई करनी होती है।
सरकार और कोर्ट की बड़ी कार्रवाइयां
मार्च 2026- भारत की सबसे बड़ी टेलीग्राम कार्रवाई
11 मार्च 2026 को भारत सरकार ने अब तक की सबसे बड़ी एकल एंटी-पायरेसी कार्रवाई की। IT Act की Section 79(3)(b) के तहत टेलीग्राम को 3,142 पायरेसी चैनल्स बंद करने का आदेश दिया गया। ये चैनल्स JioCinema और Amazon Prime Video समेत कई OTT प्लेटफॉर्म्स का अनअधिकृत कंटेंट शेयर (anauthorized कंटेंट share) कर रहे थे। इसके साथ ही Internet Service Providers के जरिए करीब 800 पायरेसी वेबसाइट्स भी ब्लॉक की गईं। सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन ने इसकी जानकारी लोकसभा में दी। यह सिनेमैटोग्राफ (संशोधन) अधिनियम, 2023 के तहत बड़े स्तर पर की गई पहली प्रवर्तन कार्रवाई थी।
दिल्ली हाई कोर्ट- Dynamic+ Injunction
पायरेसी से निपटने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट ने एक खास तरीका अपनाया, जिसे “Dynamic Injunction” कहा जाता है। इसकी शुरुआत 2019 में हुई थी।
इसका फायदा यह है कि अगर किसी पायरेसी वेबसाइट को ब्लॉक करने का आदेश मिल जाता है, तो बाद में उसी वेबसाइट के नए-नए वर्जन (mirror sites) को ब्लॉक कराने के लिए बार-बार कोर्ट जाने की जरूरत नहीं पड़ती। सिर्फ नई वेबसाइट का लिंक (URL) बताकर उसे ब्लॉक कराया जा सकता है।
अब 2026 में इसे और मजबूत बनाते हुए “Dynamic+ Injunction” शुरू किया गया है। इस नए सिस्टम में कंटेंट बनते ही उसकी सुरक्षा शुरू हो जाती है। यानी अगर कोई नई पायरेसी वेबसाइट बनती है, तो उसे जल्दी से ब्लॉक किया जा सकता है, चाहे उसका नाम कुछ भी हो। इंटरनेट कंपनियों (ISP) को ऐसे नए डोमेन 72 घंटे के अंदर बंद करने होते हैं।
इसमें बड़ी कंपनियों जैसे Warner Bros., Netflix, Disney, Apple और Crunchyroll को राहत मिली है। IPL 2026 के दौरान भी इस नियम का इस्तेमाल हुआ, जहां लाइव मैच की पायरेसी करने वाली वेबसाइट्स और ऐप्स को तुरंत (real-time) ब्लॉक किया गया।
जमीनी हकीकत- कानून बने, असर कम
यहां सबसे कड़वा सच सामने आता है। नियम मजबूत हुए हैं, कोर्ट सक्रिय है, सरकार ने March 2026 में ऐतिहासिक कार्रवाई भी की, लेकिन जमीनी स्तर पर पायरेसी में कोई खास कमी नहीं आई।
MPA-CII-IP House की रिपोर्ट खुद कहती है कि कानूनी ढांचे मौजूद हैं, लेकिन स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर की प्रवर्तन एजेंसियों में कॉपीराइट कानूनों को प्राथमिकता देने की इच्छाशक्ति कम है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि Cinematograph Act में कैमकॉर्डर से शूट करने वाले को पकड़ने का प्रावधान तो है, लेकिन असल में "किसने लीक किया" यह पता लगाना बेहद मुश्किल है और अभियोजन पक्ष शायद ही कभी यह साबित कर पाता है।
टेलीग्राम पर 3,142 चैनल्स बंद हुए, लेकिन उनकी जगह नए चैनल्स तुरंत बन जाते हैं। 800 पायरेसी वेबसाइट्स ब्लॉक हुईं, लेकिन वे नए डोमेन के साथ वापस आ गईं। Dynamic Injunctions काम करते हैं, लेकिन VPNs और Proxies के जरिए लोग इन्हें bypass कर लेते हैं। VPN भारत में legal है, इसका इस्तेमाल कोई अपराध नहीं, लेकिन पायरेटेड कंटेंट तक पहुंचने के लिए VPN का उपयोग उतना ही illegal है जितना सीधे पायरेटेड साइट से देखना।
इंडस्ट्री विशेषज्ञ मानते हैं कि पायरेसी का असली हल है- OTT Theatrical Window को कम रखना। तमिल फिल्म प्रोड्यूसर्स काउंसिल (TFPC) ने अप्रैल 2026 में एक प्रस्ताव पास किया कि मौजूदा 28 दिन (4 हफ्ते) की OTT विंडो जारी रहनी चाहिए। Theatre owners की Association ने इसे बढ़ाकर 56 दिन (8 हफ्ते) करने की मांग की थी, जिसका TFPC ने विरोध किया। TFPC का तर्क है: OTT window जितनी लंबी होगी, पायरेसी की विंडो उतनी बड़ी होगी। अगर लीगल स्ट्रीम जल्दी नहीं आती, तो दर्शक पायरेटेड कंटेंट की तरफ जाते हैं।
आगे क्या?
MUSO की 2024 रिपोर्ट के अनुसार, JioFiber और Airtel Xstream के जरिए एक साथ (बंडल में) OTT सर्विस देना पिछले दो सालों में पायरेसी कम करने वाले गिने-चुने असरदार कदमों में से एक रहा है। Jio करीब 16 और Airtel 25 से अधिक OTT प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच देता है। जब कंटेंट सस्ता और आसानी से लीगल रूप में मिलता है, तो पायरेसी कम होती है।
MPA-CII रिपोर्ट के मुताबिक, अगर एंटी-पायरेसी के उपाय सही तरीके से लागू किए जाएं, तो 2025 से 2029 के बीच 1,58,000 से ज्यादा सीधी और परोक्ष नौकरियां पैदा हो सकती हैं। साथ ही, इंडस्ट्री में करीब 50 करोड़ डॉलर (0.5 बिलियन डॉलर) का अतिरिक्त कंटेंट निवेश भी आ सकता है। सरकार की दृष्टि से, भारत की M&E इंडस्ट्री 2025 में 9% ग्रोथ के साथ ₹2.78 लाख करोड़ तक पहुंची (FICCI-EY Report, मार्च 2026), लेकिन पायरेसी इस ग्रोथ को लगातार कमजोर करती है।
OTT और टेलीग्राम पायरेसी आज भारत के एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। ₹22,400 करोड़ का सालाना नुकसान, 9 करोड़ पायरेसी यूजर्स, दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा पायरेसी बाजार, और रिलीज के कुछ घंटों में लीक होती फिल्में- यह सब मिलकर एक ऐसी समानांतर इकनॉमी बना रहे हैं जो न सिर्फ प्रोड्यूसर्स और प्लेटफॉर्म्स को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि लेखकों, तकनीशियनों और हजारों इंडस्ट्री वर्कर्स की रोजी-रोटी भी छीनती है।
मार्च 2026 की टेलीग्राम कार्रवाई और दिल्ली हाई कोर्ट के Dynamic+ Injunction जैसे कदम सही दिशा में हैं। लेकिन जब तक जमीनी स्तर पर कानून लागू करने की इच्छाशक्ति नहीं बढ़ेगी, जब तक कानूनी कंटेंट सस्ता और आसानी से उपलब्ध नहीं होगा, और जब तक लोगों में जागरूकता नहीं आएगी- तब तक यह लड़ाई अधूरी ही रहेगी।
इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) ने आरोप लगाया है कि ट्राई (TRAI) अपने नए नियमों के जरिए OTT प्लेटफॉर्म्स को भी रेगुलेट करने की कोशिश कर रहा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
इंटरनेट और मोबाइल सेक्टर में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। इंडस्ट्री बॉडी इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) ने आरोप लगाया है कि ट्राई (TRAI) अपने नए नियमों के जरिए OTT प्लेटफॉर्म्स को भी रेगुलेट करने की कोशिश कर रहा है।
IAMAI का कहना है कि WhatsApp, Signal और Telegram जैसे OTT प्लेटफॉर्म्स टेलीकॉम सर्विस के दायरे में नहीं आते, लेकिन TRAI के नए ड्राफ्ट नियमों में ऐसे प्रावधान हैं, जो इन ऐप्स को भी कवर कर सकते हैं। इंडस्ट्री के मुताबिक यह “ओवररीच” है, यानी TRAI अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम कर रहा है।
दरअसल, TRAI ने स्पैम कॉल और मैसेज पर लगाम लगाने के लिए नए बदलाव प्रस्तावित किए हैं। इसके तहत Telecom Commercial Communications Customer Preference (TCCCPR) नियमों में संशोधन का ड्राफ्ट लाया गया है। इसमें कॉल मैनेजमेंट ऐप्स, फोन डायलर और थर्ड-पार्टी ऐप्स के लिए भी नियम शामिल किए गए हैं। यही बात OTT कंपनियों को खटक रही है।
IAMAI ने यह भी कहा है कि अगर OTT प्लेटफॉर्म्स से डेटा शेयर करने को कहा गया, तो यह कंपनियों के लिए बड़ा नुकसान हो सकता है। उनका तर्क है कि यह डेटा उनकी मेहनत और निवेश से तैयार होता है, ऐसे में इसे जबरन साझा करना कंपनियों के अधिकारों के खिलाफ है।
इसके अलावा, इंडस्ट्री बॉडी ने एक और चिंता जताई है। ड्राफ्ट नियमों में यह प्रावधान भी है कि अगर कोई इंटरमीडियरी नियमों का पालन नहीं करता, तो उसका “सेफ हार्बर” स्टेटस खत्म किया जा सकता है। यह सुरक्षा Information Technology Act 2000 के सेक्शन 79 के तहत मिलती है, जिससे प्लेटफॉर्म्स को यूजर्स के कंटेंट के लिए सीधे जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता।
वहीं दूसरी तरफ TRAI का कहना है कि ये बदलाव स्पैम कॉल और फर्जी मैसेज से लोगों को बचाने के लिए जरूरी हैं। टेलीकॉम कंपनियों ने AI बेस्ड टेक्नोलॉजी तैयार की है, जो संदिग्ध कॉल और मैसेज की पहचान कर सकती है। अब प्रस्ताव है कि अगर किसी नंबर से स्पैम कॉल का शक हो, तो 2 घंटे के अंदर उसकी जानकारी दूसरी टेलीकॉम कंपनी के साथ शेयर की जाए।
इसके बाद उस नंबर को चेतावनी भेजी जाएगी और 1 दिन के अंदर उसका KYC दोबारा किया जाएगा। साथ ही उस व्यक्ति के नाम पर जारी सभी कनेक्शन की जांच भी होगी।
कुल मिलाकर, एक तरफ सरकार और TRAI स्पैम पर सख्ती करना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ इंटरनेट कंपनियां इसे अपने अधिकारों में दखल मान रही हैं। अब देखना होगा कि इन नियमों पर अंतिम फैसला क्या होता है और OTT प्लेटफॉर्म्स पर इसका कितना असर पड़ता है।