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रीजनल जर्नलिज्‍म को किस तरह बढ़ावा देगा IIMC, बताया DG के.जी. सुरेश ने

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।। दिल्‍ली में पिछले दिनों बिजनेस वर्ल्‍ड एजुकेशन समिट 2017 (BW Education Summit 2017) का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में इस बात पर चर्चा की गई कि भारत में शिक्षा का क्‍या भविष्‍य है और क्‍या नए जमाने के कॅरियर

समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 years ago

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

दिल्‍ली में पिछले दिनों बिजनेस वर्ल्‍ड एजुकेशन समिट 2017 (BW Education Summit 2017) का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में इस बात पर चर्चा की गई कि भारत में शिक्षा का क्‍या भविष्‍य है और क्‍या नए जमाने के कॅरियर के लिए भारत के युवा तैयार हैं।

कार्यक्रम में ‘Trust Legal’ के संस्‍थापक और मैनेजिंग पार्टनर सुधीर मिश्रा, ‘Internet privacy & Security lawyer’ पैरी आफताब और आईआईएमसी के महानिदेशक के.जी. सुरेश मौजूद थे।

इस मौके पर के.जी. सुरेश ने बताया कि वह मीडिया में तीन दशक से ज्‍यादा समय से कार्यरत हैं। इस दौरान उन्‍होंने प्रिंट से लेकर टीवी और डिजिटल में भी काम किया है। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य दिवस का हवाला देते हुए उन्‍होंने कहा कि इस साल का विषय डिप्रेशन है और अधिकांश लोग, खासकर प्रिंट मीडिया के लोग किसी न किसी रूप में इससे जूझ रहे हैं। क्‍योंकि कई मीडिया प्रतिष्‍ठानों में छंटनी चल रही है अथवा कई अपने एडिशंस बंद कर रहे हैं। उन्‍होंने कहा कि इस तथ्‍य से सभी वाकिफ हैं कि भारतीय प्रिंट मीडिया ग्‍लोबल मीडिया से काफी अलग है। विदेश के मुकाबले हमारे देश की प्रिंट इंडस्‍ट्री सबस्‍क्राइब पर आधारित नहीं है। अखबारों का 70 प्रतिशत रेवेन्‍यू विज्ञापनों से आता है और यह विज्ञापन अब धीरे-धीरे प्रिंट से डिजिटल की ओर जा रहा है।

के.जी. सुरेश ने कहा, ‘मुझे लगता है कि सरकार, मीडिया और शैक्षिक संस्‍थानों को इसके लिए तैयार रहना चाहिए। मुझे लगता है कि सरकार इस दिशा में काम कर रही है। यदि मैं अपने इंस्‍टीट्यूट की ही बात करूं तो यह देश में सबसे बड़ा मीडिया इंस्‍टीट्यूट है और देश भर में इसके छह कैंपस हैं। मैंने देखा है कि सरकार ने इसी बदलाव के तहत किसी ब्‍यूरोक्रेट को इसकी कमान नहीं सौंपी है। इसकी कमान टेक्‍नोक्रेट यानी मुझे सौंपी गई है और ब्‍यूरोक्रेसी से मेरा ज्‍यादा लेना-देना नहीं है। ऐसे में साफ पता चलता है कि सरकार के नजरिये में भी बदलाव आया है। दूसरी बात यह है कि आईआईएमसी ने प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया के पारंपरिक कोर्स की जगह अब न्‍यू मीडिया डिपार्टमेंट तैयार किया है। हम मुंबई में नेशनल सेंटर फॉर एक्‍सीलेंस इन एनिमेशन एंड विजुअल इफेक्‍ट्स, गेमिंग एंड कॉमिक्‍स शुरू कर रहे हैं और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत यह एशिया का सबसे बड़ा और प्राइवेट सेक्‍टर के साथ पार्टनरशिप में बनने वाला पहला इंस्‍टीट्यूट होगा। इसके लिए हम 28 एकड़ जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया में लगे हुए हैं और एक-दो साल में यह कार्य करना शुरू कर देगा। हमारी योजना यहां से हर साल 1600 छात्रों को प्रशिक्षण देने की है। आने वाले समय में हमें और प्रोफेशनल्‍स की जरूरत होगी। अभी हमारी कैपेसिटी इतनी नहीं है कि हम इतने प्रोफेशनल्‍स की जरूरतों को पूरा कर सकें, इसलिए ही हमने ये इंस्‍टीट्यूट शुरू करने की योजना बनाई है। आज सारी दुनिया इंडियन एनिमेशन और इंडियन कार्टून को पसंद कर रही है। हाल ही में बनी बाहुबली पिक्‍चर में एनिमेशन इफेक्‍ट्स डाले गए थे जिसे लोगों ने बहुत पसंद किया और अब बाहुबली पार्ट टू बन रही है। इसके अलावा कई कार्टून्‍स जैसे छोटा भीम आदि भी दर्शकों को बहुत पसंद आ रहे हैं। सिर्फ एनिमेशन ही नहीं बल्कि कॉमिक्‍स, गेमिंग और विजुअल इफेक्‍ट्स का प्रभाव भी बढ़ता जा रहा है।’

के.जी. सुरेश का कहना था, ‘इस साल मैं नेशनल फिल्‍म जूरी में था और यहां दिखाई गई शिवाय मूवी में स्‍पेशल इफेक्‍ट्स डाले गए थे। अब फिल्‍मों में स्‍पेशल इफेक्‍ट्स भी काफी डाले जा रहे हैं और लोग इन्‍हें पसंद भी कर रहे हैं। लेकिन हमें रीजनल मीडिया को भी बढ़ावा देने चाहिए। देश में जब भी नेशनल मीडिया की बात होती है तो इसका मतलब अंग्रेजी प्रेस से ही निकाला जाता है। ‘Nation wants to know’ के बारे में अक्‍सर हम बात करते हैं लेकिन यह भी सच है कि देश की बहुत ही कम आबादी (0.06) प्रतिशत ही अंग्रेजी न्‍यूज देखती है। देश की अधिकांश आबादी सिर्फ अपनी प्रादेशिक भाषा में ही न्‍यूज को देखना-पढ़ना और सुनना पसंद करती है। यही कारण है कि रीजनल चैनल लगातार आगे बढ़ रहे हैं। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि हम रीजनल लैंग्‍वेज वाले पत्रकार तैयार करें।’

के.जी. सुरेश ने कहा कि रीजनल जर्नलिज्‍म को बढ़ावा देने के लिए वह कई कदम उठाने जा रहे हैं। इसके तहत इस शैक्षिक सत्र से नागपुर के पास आईआईएमसी के अमरावती कैंपस से मराठी जर्नलिज्‍म और केरल के कोट्टयम कैंपस से मलयालम जर्नलिज्‍म की शुरुआत की जा रही है।

उन्‍होंने कहा कि यह कदम रीजनल लैंग्‍वेज जर्नलिज्‍म को बढ़ावा देने के लिए उठाया जा रहा है। इसके बाद के.जी. सुरेश ने कम्‍युनिटी रेडियो की बात करते हुए कहा कि इसकी शुरुआत वर्ष 2002 के आखिर में हुई थी लेकिन आज भी हालत यह है कि देश में सिर्फ 206 कम्‍युनिटी रेडियो ही काम कर रहे हैं। उन्‍होंने कहा कि कम्‍युनिटी रेडियो में बहुत स्‍कोप है। लोग जानना चाहते हैं कि उनके आसपास के क्षेत्रों में क्‍या चल रहा है और इसके लिए कम्‍युनिटी रेडियो सबसे अच्‍छा माध्‍यम है। अब सरकार भी कम्‍युनिटी रेडियो को बढ़ावा देने के लिए काफी कार्य कर रही है। इसके लिए सरकार की ओर से न सिर्फ 100 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है बल्कि कम्‍युनिटी रेडियो स्‍टेशनों को ऑल इंडिया रेडियो (AIR) की न्‍यूज को ब्रॉडकास्‍ट करने की अनुमति भी दी गई है।

हालांकि अभी भी कई लोगों को यह जानकारी नहीं है कि कम्‍युनिटी रेडियो के लिए वह किस तरह से आवेदन कर सकते हैं। कैसे कंटेंट जुटाना है और कैसे इस क्षेत्र में काम करना है। लोगों की इसी परेशानी को दूर करने के लिए आईआईएमसी ने कम्‍युनिटी रेडियो एंपॉवर्ड एंड रिसोर्स सेंटर शुरू किया है। इस सेंटर के द्वारा देश भर के लोगों को बताया जा रहा है कि कैसे वे कम्‍युनिटी रेडियो शुरू कर सकते हैं और इसे शुरू करने के बाद कैसे कंटेंट और रिसोर्स जुटा सकते हैं। इसके कोर्स के लिए काफी लोग हमारे पास आ रहे हैं और हम उन लोगों की मदद कर रहे हैं। के.जी. सुरेश ने कहा कि कम्‍युनिटी रेडियो आज की जरूरत है। कनाडा का जिक्र करते हुए उन्‍होंने कहा कि वहां कम्‍युनिटी न्‍यूज पेपर काफी सफल हैं। मुझे उम्‍मीद है कि अपने देश में भी ये सब शुरू होंगे।

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