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इस उपन्यास ने किया साबित, कंटेंट में दम हो तो मायने नहीं रखतीं इस तरह की बातें
जाने-माने साहित्यकार, पत्रकार और स्तंभकार कमलाकांत त्रिपाठी ने महाकाव्यात्मक शैली का उपन्यास लिखा है
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
जिस दौर में उपन्यासों का आकार सिकुड़ता रहा है और माना जा रहा है कि पाठकों को आकर्षित करने के लिए उपन्यासों को छोटा होना चाहिए, उस दौर में जाने-माने साहित्यकार, पत्रकार और स्तंभकार कमलाकांत त्रिपाठी ने महाकाव्यात्मक शैली का उपन्यास 'सरयू से गंगा' लिखा है। खास बात यह है कि करीब 600 पृष्ठों में समाया यह उपन्यास पाठकों को पसंद भी आ रहा है। दिल्ली के साहित्य अकादमी भवन में किताबघर से प्रकाशित इस उपन्यास पर जब वरिष्ठ साहित्यकारों ने चर्चा की तो सामने यही आया कि कंटेंट में दम हो तो न तो उपन्यास की दुरुह भाषा मायने रखती है और न उसका आकार-प्रकार। साहित्य अकादमी भवन में कमलाकांत त्रिपाठी के ऐतिहासिक-सांस्कृतिक उपन्यास 'सरयू से गंगा' पर मुरली मनोहर प्रसाद सिंह की अध्यक्षता में एक परिचर्चा का आयोजन किया गया था। परिचर्चा में प्रो. नित्यानंद तिवारी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे तथा प्रसिद्ध कथाकार संजीव ने विषय-प्रवर्तन किया। कर्ण सिंह चौहान, असगर वजाहत, कैलाश नारायण तिवारी, बली सिंह, संजीव कुमार, राकेश तिवारी एवं अमित धर्मसिंह ने परिचर्चा में वक्ता के रूप में शामिल रहे।
इस अवसर पर कथाकार संजीव ने सरयू से गंगा को इतिहास एवं सामाजिक जीवन के विस्तृत फलक पर लिखा गया एक वृहद् औपन्यासिक कृति बताया। पानीपत, प्लासी, बक्सर, मुगल साम्राज्य का ह्रास, ईस्ट इंडिया कंपनी के वर्चस्व में सतत विस्तार और नेपाल के एकीकरण की प्रक्रिया की पृष्ठभूमि में उन्होंने मालगुजारी, तालुकेदारी, किसानी और खेती को उपन्यास के केन्द्र में बताया। दूसरे वक्ता अमित धर्मसिहं ने उपन्यास को इतिहास, समाज और जीवन के तीन विभिन्न सन्दर्भों में बांटकर देखा। अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में कम्पनी के प्रभुत्व में विस्तार के साथ किसान रिआया की तकलीफों, लगान की मार से उसके शोषण तथा स्त्री जीवन की विडम्बना को उन्होंने वर्तमान परिदृष्य के लिए प्रासंगिक बताया। जीवन पक्ष पर बात करते हुए उन्होंने धर्म का अतिक्रमण करते हुए मानव मन की सत्ता और मन के मिलने से ही सार्थक हिंदू-मुस्लिम एकता को उपन्यास में साकार होते देखा।
तीसरे वक्ता पत्रकार एवं लेखक राकेश तिवारी ने उपन्यास में धार्मिक आडम्बर के रूप में महामत्युंजय जप के प्रसंग का जिक्र करते हुए, लेखक को ऐसे आडम्बरों के खिलाफ खड़े देखा। उन्होंने अठारहवीं सदी के सामाजिक-राजनीतिक संक्रमण तथा लेखीपति, जमील और रज्जाक जैसे पात्रों के माध्यम से सांस्कृतिक विकास के महत्व को लक्षित किया। राकेश जी ने सरयू से गंगा को मूलतः ग्रामीण किसान और मजदूर वर्ग का उपन्यास बताया। अगले वक्ता के रूप में कवि और आलोचक बली सिंह ने उपन्यास के विस्तृत फलक पर तत्कालीन गाँव, किसान, खेत, फसल, जंगल, नदी आदि के भौगोलिक और प्राकृतिक परिदृश्य को मूर्तिमान होते हुए देखा। इस संदर्भ में उन्होंने लेखक की पैनी एवं प्रामाणिक दृष्टि के सामने गूगल को अक्षम पाया। उन्होंने कहा, ‘उपन्यास एक नाटकीय शैली में लिखा गया है, जिसमें इतिहास नामक पात्र सूत्रधार की भूमिका निभाता है। नवाबों और कम्पनी के बीच की संधि से किसान को कुछ लेना-देना नहीं है किन्तु वह उसके आधार पर होने वाले शोषण का सबसे बड़ा शिकार बनता है। आज के भूमण्डलीकरण के दौर में ऐसी ही संधि सरकार और पूँजीपति के बीच होती है, जिसका खामियाजा किसान व जनता को बेराजगारी, भुखमरी और आत्महत्या के रूप में भुगतना पड़ता हैं। उपन्यास का मुख्य पात्र लेखीपति मिलीभगत की इस जकड़ से निकलने के लिए संघर्ष करता दिखाई पड़ता है। उपन्यास में लोकतांत्रिक एकीकरण की चेतना और राष्ट्र राज्य का संदेष अर्न्तनिहित है जो धार्मिक, सांस्कृतिक मिथकों तक सीमित था, किन्तु जिसका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं था।
अगले वक्ता व आलोचना पत्रिका के संपादक ने उपन्यास कथा के दो उज्जवल पक्षों-धर्मनिरपेक्षता एवं जनपक्षधरता का नोटिस लिया। लेखीपति, जमील और रज्जाक जैसे पात्र धर्म का अतिक्रमण कर एकजुट होते हैं और कम्पनी के ऊपर नवाब की निर्भरता से समाज में जो भयानक, अराजक और शोषक स्थिति पैदा होती है, उसके खिलाफ संघर्ष करते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राघ्यापक और लेखक कैलाश नारायण तिवारी ने लेखकीय स्वायत्तता और स्वतंत्रता का मुद्दा उठाते हुए कहा कि कमलाकांत ने अपने इस उपन्यास में इतिहास के वृहत्तर फलक के दायरे में लेखीपति, जमील, रज्जाक, सावित्री जैसे पात्रों की परिस्थितियों के अनुरूप उनके मनोभावों और सूक्ष्म संवेदना का जो उन्मुक्त खाका खींचा है, उससे प्रेमचन्द के गोदान मेंगुंथी दो समान्तर कथाओं की याद आती है। उपन्यास में हिन्दू-मुस्लिम संबंध को धर्म से इतर विशुद्ध मानवीय धरातल पर दिखाया गया है जो सूक्ष्म संवेदना से ओतप्रोत है।
कर्ण सिंह चौहान ने कहा कि कोई भी कृति हमारे सामने संवाद के लिए होती है और यह उपन्यास हमारे सामने सजीव संवाद प्रस्तुत करता है। देश में स्वतंत्र ग्रामीण इकाई की जो स्वस्थ और सम्यक व्यवस्था हजारों साल से चली आ रही थी, अंग्रेजों ने उसे एक ही झटके में तोड़ दिया और उसी के साथ समाज, संस्कृति, और उत्पादन के उत्कृष्ट उपादान ध्वस्त कर दिए। अन्त में उन्होंने निष्कर्ष दिया कि ऐसे उत्तम कोटि के उपन्यास बहुत कम और बहुत समय बाद आते हैं। प्रसिद्ध नाटककार-कथाकर असगर वजाहत ने बताया कि उपन्यास भूत, वर्तमान और भविष्य में विचरण करते हुए अवध प्रदेश की सामंती व्यवस्था के उपनिवेशवादी व्यवस्था में अंतरण की कथा कहता है। उपन्यास में तत्कालीन समाज में धर्म उस अर्थ से भिन्न अर्थ में दिखाई पड़ता है, जो आज के समाज में हावी होता जा रहा है। मुख्य अतिथि प्रोफेसर नित्यानंद तिवारी ने कहा कि उपन्यास इतिहास की धारा को सही तरह से उभारता है। उसकी अन्तःगतिशीलता और क्राइसिस की धार को कुंठित नहीं करता। तत्कालीन समाज में जो डर व्याप्त है, उपन्यास का हर पात्र उसकी गिरफ्त में है। उस डर और उसके पीछे की अमानवीयता से सतत लड़ता हुआ दिखाई पड़ता है जो आज के परिदृश्य के लिए बेहद प्रासंगिक है। उपन्यास हिन्दू-मुस्लिम समाज का वह रूप पेश करता है, जो जायसी के पद्मावत में मिलता है।
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने उपन्यास को इतिहास की प्रक्रिया से उपजे उस संकट के मर्म को खोलने वाला बताया, जिसमें व्यापारी बनकर आये अंग्रेज राज सत्ता पर काबिज होते हैं। इतिहासकार राय चौधरी का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इस उपन्यास में उन्नीसवीं शताब्दी के उपन्यासों की तरह कहीं भी मुस्लिम पुरुष और महिला पात्रों को मानव चरित्र की बुराई के प्रतीक के रूप में नहीं दिखाया गया है। यह कृति धर्म का अतिक्रमण करती हुई मनुष्य के उज्जवल पक्ष को उजागर करने के कारण इस शताब्दी की महत्वपूर्ण औपन्यासिक कृति के रूप में जानी जाएगी। परिचर्चा के समापन के पूर्व अनुपम भट्ट ने प्रतिष्ठित दक्षिण भारतीय लेखक और कर्नाटक विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. टीआर भटट् द्वारा भेजा गया संदेश पढ़कर सुनाया, जिसमें उन्होंने कमलाकांत त्रिपाठी को बधाई देते हुए उन्हें दक्षिण भारत के एस.एल. भैरप्पा के समकक्ष बताया। अंत में अनुपम भट्ट ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए सभी उपस्थित वक्ताओं और श्रोताओं के प्रति आभार प्रकट किया।
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