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बिटिया के जन्मदिन पर हेमंत शर्मा ने सोशल मीडिया पर शेयर किया ये भावुक पत्र

वरिष्ठ पत्रकार और ‘टीवी9 नेटवर्क’ (TV9 Network) में न्यूज डायरेक्टर हेमंत शर्मा ने अपनी बिटिया के जन्मदिन के उपलक्ष्य में सोशल मीडिया पर एक भावुक लेटर शेयर किया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 10 months ago

वरिष्ठ पत्रकार और ‘टीवी9 नेटवर्क’ (TV9 Network) में न्यूज डायरेक्टर हेमंत शर्मा ने अपनी बिटिया के जन्मदिन के उपलक्ष्य में सोशल मीडिया पर एक भावुक लेटर शेयर किया है। इस लेटर को उन्होंने सात वर्ष पूर्व अपनी बिटिया के लिए लिखा था और अब इसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर किया है। इस लेटर को आप यहां हूबहू पढ़ सकते हैं।  

बिटिया का जन्मदिन

शिशु मेरे दिल के धड़कते हुए एक हिस्से का नाम है. काग़ज़ पत्तर में उसका नाम ईशानी दर्ज है. मेरी जाती हुई उम्र में आती हुई उम्मीदों को वही रौशन करती है. मेरे सामाजिक सरोकारों का वही हिस्सा है. मेरे सुख की बड़ी वजह है. खाने पीने पर पाबंदी लगाने वाली मेरी अभिवावक है. घर की महक, चहक, दहक, बहक और लहक का वह केन्द्र है. आज उसका जन्मदिन है. यह जन्मदिन ख़ास है. अगली बार और ख़ास होगा. Sharma Ishanee हमारे जीवन का उत्सव है. उसका होना उत्सव को महोत्सव में तब्दील करता है.

ख़ुश रहो. आबाद रहो ईशानी.

सात साल पहले ईशानी के विवाह के बाद उसके पहले जन्मदिन पर लिखा यह पत्र साझा कर रहा हूँ. जब पहली बार मैं उसके जन्मदिन पर मौजूद नहीं था.

बेटी ईशानी के नाम पत्र

प्रिय शिशु,

आज तुम्हारा जन्मदिन है. इसे यूँ भी लिख सकता हूँ कि मेरे जीवन का बड़ा दिन है. ऐसा पहली बार होगा कि हम तुम्हारे जन्मदिन पर साथ नही होंगे. चाहता तो था कि हम तुम्हें बिना बताए उमरिया पहुंचें. पर यह सम्भव नहीं हो पाया. हम यह जानते हैं कि तुम अब अपने घर बार वाली हो. अब यह सम्भव नहीं होगा कि तुम्हारा हर जन्मदिन हमारे साथ बीते. फिर भी न जाने क्यों लगता है कि ऐसा ही होना चाहिए था. कई बार ऐसा होता है कि हम उसे भी जीते जाते हैं जो नहीं होता या नहीं हो सकता है. इन आँखों मे तुम्हारे एक एक जन्मदिन की तस्वीर छाई हुई है. आंख झपकती है तो तुम एक नई तस्वीर में खिलखिलाती हो. तुम्हारा ये जन्मदिन अनायास ही मुझे उम्र के उन तमाम पड़ावों की ओर लिए जा रहा है जो तुम्हारे आगमन के इस दिन की खुशबू से गुलज़ार हो उठे. मैं तुम्हारे इस एक जन्मदिन में न जाने कितने बीते जन्मदिन मनाने बैठा हूँ. कभी कभी ऐसा भी लगता है कि जीवन और कुछ नहीं, बस इन्हीं सुनहरे दिनों की एक खूबसूरत जीवंत स्मारिका भर है.

मैं आखिर किस किस दृष्टांत के उदाहरण से तुम्हारी अनुपस्थिति की स्वाभाविकता को स्वीकार करूँ. ये जितना ही अनिवार्य है, उतना ही मुश्किल भी. अभिज्ञान शाकुन्तलम् में कालिदास ने लिखा है “अर्थों हि कन्या परकीय एव”. यह कभी पढ़ा था. लेकिन अब समझ आ रहा है. कन्या सचमुच पराया धन होती है. दूसरे की अमानत होती है. पाल-पोस कर आप बड़ा कीजिए. वह एक दिन आपके जीवन में ढेर सारा अपनापन देकर और एक ख़ालीपन छोड़कर चली जाएगी. ऐसा लगता है कि जैसे एक मेला ख़त्म हो गया. उड़ गईं आँगन से चिड़ियाँ. और घर अकेला हो गया. मैं तुम्हारा स्वभाव जानता हूँ. तुम जब साथ नहीं होती हो तब हमारे लिए और भी ज़्यादा चिंता व व्यग्रता से भरी होती हो. मेरे जीवन की हर चुनौती, हर मुश्किल पर अपनी परवाह के फूल उगाए हुए. मेरे बारे में सोचती हुई. देवी देवताओं से मन्नतें मांगती हुई. ये तुम हो. हर बेटी की आंख में एक माँ छिपी होती है. हमारे अनजाने में ही हमारे दुखों को समेटती हुई. हर पल, हर क्षण अपनी शुभाकांक्षाओं की बारिश से हमारे जीवन को आह्लादित करती हुई.

 

तुम्हारे जाने के बाद घर के सूनेपन ने उसके आकार को बढ़ा दिया है. यह संयोग है तुम्हारे साथ साथ ही पार्थ (पुरू) भी अपनी पढ़ाई के लिए विदेश चला गया. अब यहां केवल मैं, तुम्हारी माँ और जैरी बचे हैं. घर सांय सांय कर कहा है. जीवन, जो अनन्य उत्सव की चहल पहल हुआ करता था, एकदम से ठहर गया है.  घर में क्या नहीं है, फिर भी कुछ नहीं है. बेटियां अकेले नहीं जातीं. वे अपने साथ पूरा घर ले जाती हैं.  फूलों की रंगत सूनी है. ख़ुशबू सुहाती नहीं है. गौरैय्या चहकती नहीं हैं. हमारे समाज में लड़कियों के साथ बड़ी मुश्किल है. पहले वह अपने स्नेह में आपको बाँध लेती हैं. फिर आप उन पर हर बात के लिए आश्रित होते हैं. और एक दिन विवाह कर वह अपने घर चली जाती हैं. हमारे साथ भी यही हुआ. ईशानी कब जन्मी? कब घुटने के बल चलने लगी? कब वह स्कूल जाने लगी? कब परिवार के कामों में हाथ बँटाने लगी? कब हम सबकी दोस्त बनी? और कब वह वकील बन हमें नियम क़ायदे समझाने लगी? फिर कब अभिभावक बनकर हमारी देखभाल करने लगी. काल का एक चक्र पूरा हुआ. मैंने तुम्हारी बाल सुलभ चपलताओं में उस बचपन को कितनी बार जिया जो मुझे एक रोज़ दुनियादारी की उथलपुथल में अकेला छोड़ गया और फिर कभी नहीं लौटा. जीवन के तमाम उतार चढ़ाव के बीच, तुम सौभाग्य का टीका बनकर सदैव साथ रहीं. कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान लिखतीं हैं-

 "मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।

नन्दन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी।।

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।

उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया।।"

मुझे तुम्हारा पहला जन्मदिन याद आ रहा है. हम नए नए ९/१ डालीबाग में आए थे. उस घर में पहला आयोजन था. मित्रवर अशोक प्रियदर्शी और नरही वाले सुधीर ने मिल कर इन्तज़ाम किया था. अशोक अब भी याद आते हैं. पिता मैं और अभिभावक वो थे. शिशु किस स्कूल में जाएगी, कैसे जाएगी, इसकी चिन्ता वही करते थे. बहरहाल उन दिनों पास में पैसे कम थे लेकिन आयोजन बड़ा होता था. उसी के ठीक पहले तुमने खड़े होना और चलना शुरू किया था. शिशु गोद में ही रहती थी. किसी काम से हमने नीचे उतार खड़ा किया. और तुम खड़ी हो गयी. हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा… अरे शिशु तो खड़ी हो गयी. मैं वैसे ही ख़ुशी से चिल्लाया था जैसे आर्किमिडीज अपने आविष्कार के बाद यूरेका यूरेका चिल्लाया था. और फिर कुछ ही रोज में तुम चलने लगीं. और तबसे चलते चलते फिर पीछे नहीं देखा.

यह सब तेज़ी से एक सपने की तरह घटा. अब ऐसा लग रहा है कि जैसे शिशु के बिना जीवन अधूरा है. तुम जब अपने घर के लिए विदा हुईं तो एक भरोसा साथ था, कि तुम जहाँ भी जाओगी, अपने दादा और नाना की बेहद क़ीमती विरासत साथ ले जाओगी. मैंने इस भरोसे को सुंदर भाग्य की छाया के तौर पर फ़लीभूत होते देखा. अब मैं उस दिन के इंतज़ार में हूँ, जब ईशानी मेरी बेटी के तौर पर नहीं, मैं उसके पिता के तौर पर जाना जाऊँगा. बेटियां एक रोज़ यूँ चली जाती हैं जैसे अपने हिस्से की सांस दहलीज पार कर जाए. हिंदी साहित्य का विद्यार्थी रहा हूँ. माखनलाल चतुर्वेदी की लिखी कविता "बेटी की विदा" न जाने कितनी बार पढ़ी है. उसके मायने भी समझे हैं पर तुम्हारे जाने के साथ ही ये कविता नए मायने लेकर फिर लौट आई. मैं इन मायनों को समझता हूँ. इनकी सामाजिकता के आगे नतमस्तक भी हूँ. फिर भी हृदय अपने हिस्से के सवाल पूछना नहीं भूलता. सवाल तो माखनलाल चतुर्वेदी जी को भी पूछने पड़े थे. सच इतना ही है कि बेटियां अपनी विदा के वक़्त ऐसा सवाल बन जाती हैं जिसे हम जानते समझते भी हल नहीं कर सकते. वे लिखते हैं-

"आज बेटी जा रही है,

मिलन और वियोग की दुनिया नवीन बसा रही है.

यह क्या, कि उस घर में बजे थे, वे तुम्हारे प्रथम पैंजन,

यह क्या, कि इस आँगन सुने थे, वे सजीले मृदुल रुनझुन,

यह क्या, कि इस वीथी तुम्हारे तोतले से बोल फूटे,

यह क्या, कि इस वैभव बने थे, चित्र हँसते और रूठे,

आज यादों का खजाना, याद भर रह जाएगा क्या?

यह मधुर प्रत्यक्ष, सपनों के बहाने जाएगा क्या?"

बेटी का जाना जीवन की कलकल बहती नदी पर एकदम से बांध बना देता है. जिस पानी को जीवन सींचने का मंत्र होना चाहिए, वही पानी आंख की कोरों में दरिया बनकर ठहर जाता है.

तुम्हारे साथ तुम्हारे दादा पं मनु शर्मा और नाना पं सरयू प्रसाद द्विवेदी की जो साहित्यिक और राजनीतिक विरासत है, उसे सहेज कर रखना. आगे बढ़ाना. तुम्हें इन दोनों बुजुर्गो की विरासत तुम्हें पहचान, सम्मान और शोहरत तो देंगे, पर इन्हें सम्भालना और आगे ले जाना तुम्हारी ज़िम्मेदारी होगी. तुमने अभी अभी तो अपना जीवन शुरू किया है. तुम्हें आगे बढ़ने में कई अड़चनें आएगी. लोग अपनी सोच, अपनी सीमाएं तुम पर थोपेंगे. पर परेशान न होना. वे तुम्हें बताएंगे, तुम्हें कैसे कपड़े पहने चाहिए, तुम्हें कैसे बर्ताव करना चाहिए, तुम्हें किससे मिलना चाहिए, तुम्हें कहां जाना चाहिए, कहां नहीं जाना चाहिए. पर इन सब प्रतिकूलताओं के बावजूद तुम अपने जीवन को उद्देश्य के पदचिन्हों पर आगे ले जा सकोगी. तमाम विषमताओं और प्रतिकूलताओं के बीच उसका निर्माण कर सकोगी. सच यही है कि तमाम आधुनिकताओं के बावजूद लड़कियों के लिए इस दुनिया में जीना अभी भी बहुत मुश्किल है. लेकिन मुझे विश्वास है कि तुममें इन हालात को बदलने का सामर्थ्य है. तुम्हारे लिए अपनी सीमाएं तय करना, अपने फैसले खुद करना, लोगों के फैसलों को नकारकर ऊपर उठना आसान नहीं होगा... लेकिन तुम सारी दुनिया की महिलाओं के लिए उदाहरण प्रस्तुत कर सकती हो. ऐसा कर दिखाओ, कि तुम्हारी उपलब्धि मेरी सारी उम्र की उपलब्धियों से कहीं ज़्यादा साबित हो.

बिटिया के जाने के बाद किसी पिता के पास क्या शेष रह जाता है? मालूम नहीं. पर हर पिता को जीवन में एक न एक दिन इस परीक्षा से दो चार होना पड़ता है. मेरी ज़िंदगी अख़बार की कितनी ही कतरनों में कहाँ कहां बिखरी पड़ी है, मुझे खुद नहीं पता. वो तुम ही थी जो इसे समेटकर रखती थीं. सँवारकर रखती थीं. शायद ये तुम्हारे रूप में मौजूद कोई संबल ही है जो तमाम उतार चढ़ाव के बीच मुझे जोड़कर रखता है. बाँधे रखता है. बिखरने नहीं देता. किसी भी लड़की की अपनी ज़िन्दगी होती है. और मां बाप की अपनी. एक का आगे बढ़ना और दूसरे का बिछुड़ना. यही नियति का खेल है. तुम आगे बढ़ो, कामयाबी की मंज़िलें तय करो. मैं शुभकामनाएँ ही दे सकता हूँ. कैफी आज़मी के शब्दों में-

"अब और क्या तिरा बीमार बाप देगा तुझे

बस इक दुआ कि ख़ुदा तुझ को कामयाब करे

वो टाँक दे तिरे आँचल में चाँद और तारे

तू अपने वास्ते जिस को भी इंतिख़ाब करे".

जानती हो? बेटियाँ ओस की बूंद के समान पारदर्शी और कोमल होती हैं. बेटा एक कुल को रौशन करता है, पर बेटियां दो-दो कुलों में अपनी शीतल चांदनी बिखेरती हैं. पुत्री पिता की धरोहर या कोई वस्तु नहीं, जो दान की जाए. यह सही है कि माता-पिता का घर उसका अपना घर होता है. पर उसका असली घर पति का घर ही होता है. पति की सेवा स्त्री का धर्म है. ये धर्म एकांगी नहीं, परस्पर है. स्त्री अपने पति की सहचरी ही नहीं मंत्री भी होती है. इसलिए उसे अपने पति को समय-समय पर उचित परामर्श देना चाहिए. सीप के बिना मोती, वैसे ही स्त्री के बिना पुरुष और पुरुष के बिना स्त्री अधूरी होती है. दोनों को अपना तन-मन-धन न्योछावर करते हुए अपना गृहस्थ जीवन खुशियों से भरना चाहिए. दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं.

जिंदगी में सब कुछ परफेक्ट नहीं होता, मगर हम उसे अपने लायक बनाने की कोशिश तो कर ही सकते हैं क्योंकि भगवान ने हमें सोचने और करने की शक्ति दी है. सकारात्मक सोच से हम हर विकट परिस्थिति को अपने अनुकूल बना सकते हैं. इसलिए जल्दबाजी में कोई भी फैसला नहीं करना चाहिए. याद रखो, वचनों को निभाना, मर्यादा में रहना, विश्वास व दृढ़ता से कार्य करना, सदैव सुखदायी ही होता है. ससुराल में अधिकतर लड़कियों को तारतम्य बिठाने मे समय लगता है. पर इस मामले में हम और तुम दोनों भाग्यशाली हैं कि शर्मा जी का सज्जन और संत परिवार है. सचिन बेटे जैसे हैं. माता-पिता ही एक ऐसे साधन समान होते हैं, जिनकी शिक्षा से बेटी जान लेती है कि राह में फूल कम हैं, कांटे अनेक हैं और वह मुस्कुराते हुए कांटों पर चलना सीख लेती है। समझ जाती है कि यही है उसकी जिंदगी. इसे संवारने की जिम्मेदारी उसके कंधों पर है. इसलिए श्रद्धा, समर्पण, विश्वास, प्यार, धैर्य, प्रतिज्ञा और कर्तव्य की सीढ़ियां चढ़कर दूसरों की खुशी के लिए अपना सर्वस्व भुला दो. ज्ञात रहे कि सब्र का फल मीठा होता है.

आपने अक्सर लोगों को यह कहते हुए सुना होगा कि हमारी बेटियां बेटों से कम नहीं हैं. जब भी कोई लड़की अपने मेहनत और अदम्य साहस के बलबूते पर कुछ भी कर दिखाती है तो लोगों के मुँह से अनायास ही निकल पड़ता है कि हमारी बेटी किसी बेटे से कम नहीं हैं. ऐसा क्यों कहा जाता है? इसका मतलब यह है कि हम पहले से ही यह मानते हैं कि लड़की लड़कों से कम होती हैं. इसीलिए जब वह कुछ कर दिखाती हैं तो लोगों को लगता है कि यह कार्य तो सिर्फ बेटे ही कर सकते हैं. अब यह कार्य बेटी ने कर दिखाया है तो इसका मतलब यह भी हमारे बेटे के बराबर हो गई है. क्या आपने कभी भी किसी को यह कहते सुना है कि हमारा बेटा किसी बेटी से कम नहीं? ऐसा क्यों होता है कि बेटे अव्वल और बेटी दोयम. कई लोग कहते हैं कि बेटा बेटी एक समान लेकिन क्या वह वाकई में समानता रखते हैं? आज हमें वाकई अपनी सोच बदलने की जरूरत है बेटियों के बारे में. जब तक हमारा समाज दोहरी मानसिकता रखेगा, तब तक यह मर्ज़ जाएगा नहीं. हम अगर चाहें तो अपने विचारों की सम्पूर्णता में बेटी शब्द को पुनर्परिभाषित कर सकते हैं. उसे उसकी गरिमा के नन्दन फूल दे सकते हैं. माखनलाल चतुर्वेदी लिखते हैं-

"कैसा पागलपन है, मैं बेटी को भी कहता हूँ बेटा,

कड़ुवे-मीठे स्वाद विश्व के स्वागत कर, सहता हूँ बेटा,

तुझे विदा कर एकाकी अपमानित-सा रहता हूँ बेटा,

दो आँसू आ गये, समझता हूँ उनमें बहता हूँ बेटा।"

इसे समझाने के लिए तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ. मंकगण एक ऋषि थे. महाभारत में इन्हें सप्तर्षि और मरूतो का जनक बताया गया है. इन्हें कश्यप का मानस पुत्र कहा जाता है. मंकगण सरस्वती के किनारे सप्त सारस्वत तीर्थ में तप कर रहे थे. वहीं इन्हें सिद्धि मिली और वो नृत्य करने लगे. नृत्य इतना भयानक था कि देवतागण डर गए कि नृत्य जारी रहा तो पृ्थ्वी रसातल में जा सकती है. देवगणों के अनुरोध पर भगवान शंकर ने मंकगण के पास जाकर उन्हें दर्शन दिए. उनकी साधना से प्रसन्न हो शंकर ने कहा- क्या चाहते हो, माँगो वत्स. मंकगण ने पुत्र की कामना की. शिव ने कहा- तुम्हारी साधना पूरी हुई है. वर मांगने का तुम्हारा नैसर्गिक अधिकार है. तुम्हारे दिल में भक्ति का अँकुर है इसलिए पूछना चाहता हूँ कि पुत्र क्यों? पुत्री क्यों नहीं? मंकगण ने कहा- प्रभु, पुत्र जीवन में सहायक रहता है पुत्री विदा हो ससुराल चली जाती है. भगवान हँसे और कहा, “वत्स मंकगण, तुम तपस्वी हो तुमने शास्त्रों का ठीक ढंग से अध्ययन नहीं किया है. तुम्हें यह बोध होना चाहिए की सहायक तो मनुष्य के कर्म होते है. कोई व्यक्ति विशेष किसी की सहायता नहीं करता. घर में पुत्र हो या पुत्री, उसे संस्कार और शिक्षा देकर उनके व्यक्तित्व को उन्नत करना माता पिता का दायित्व है. बच्चों से प्रतिदान की आशा पशु पक्षी भी नहीं करते, तुम तो मनुष्य हो. पुत्र पुत्री में भेदभाव अशुभ कर्म है”. मंकगण लज्जित हुआ. शिव के पैरों पर गिर पड़ा.

शिव ने सही कहा. अपाला, मैत्रेयी, गार्गी, अनुसूया, ये सब लड़कियाँ ही तो थीं. अपाला ऋषि अत्रि की बेटी थी. उन्हें चर्म रोग हो गया. पति ने उसे त्याग दिया. उसने तपस्या कर इन्द्र को प्रसन्न किया. उन्हें चर्म रोग से मुक्ति मिली. तब पति कृशाश्व उन्हें लेने पंहुचे. पर उन्होंने पति के घर न जाकर लोक कल्याण में अपना जीवन लगा दिया. यह था स्त्री स्वाभिमान. मुग़लों से लड़ते-लड़ते महाराणा प्रताप की स्थिति बहुत दयनीय हो गयी थी. उनकी बेटी चंपा बहुत भूखी थी. महाराणा थोड़े विचलित हुए. पर ग्यारह बरस की उस लड़की ने यह कहकर पिता को रोक दिया कि पिता जी मेरी भूख के कारण आप राजपुताने के स्वाभिमान को मुग़लों के सामने गिरवी न रखें. सुलोचना एक नाग कन्या थी और मंदोदरी मय की बेटी. रावण इसी मय का जामाता था. अपने ज़माने का महान वास्तुकार. इन दोनों लड़कियों का विवाह राक्षसी कुल में हुआ था. पर अपने आत्मसम्मान और दृढ़ता से इनकी गिनती दुनिया की महान नारियों में हुई.

हालांकि बदलते वक्त के साथ-साथ लोगों ने बेटियों की पढ़ाई तथा उनके आत्मनिर्भर रहने के महत्व को समझना शुरू कर दिया है. इसीलिए लोगों ने अब अपनी बेटियों को भी उच्च शिक्षा देना शुरू कर दिया है. पढ़े-लिखे परिवारों में खासकर जहां पर महिलाएं पढ़ी-लिखी हैं वो अपनी बेटियों के लिए जागरूक हो गई हैं क्योंकि वह शिक्षा के महत्व को समझती हैं. इसलिए वह अपनी बेटियों को हर तरह से मदद कर जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं ताकि उसकी बेटी जीवन में आत्मनिर्भर बने व सम्मान से सिर उठा कर जिए. इसी की बदौलत आज कई महिलाएं सफलता के सर्वोच्च मुकाम पर खड़ी हैं और लोगों को आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रही हैं.

बेटी का होना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है. एक पुरुष की जिन्दगी में पिता बनते ही कई बदलाव आते हैं. लेकिन जब वह बेटी का पिता बनता है, तो उसमें भावनात्मक रूप से बड़ा बदलाव आता है. वो पहले से अधिक इमोशनल हो जाता है और अपनी बेटी को अधिक प्यार करता है. बचपन से ही बेटियों के अन्दर यह विश्वास पैदा हो जाता है कि उसके पापा उसकी ख़ुशी के लिए पूरी दुनिया से लड़ सकते हैं और उसे हर चीज दिला सकते हैं. इसलिए उसके पापा उसके लिए केवल पापा नहीं, उसके हीरो बन जाते हैं.

बेटी एक खूबसूरत एहसास होती हैं. निश्छल मन की परी का रूप होती हैं. कड़कड़ाती धूप में ठंडी छाँव की तरह होती हैं. वो उदासी के हर दर्द का इलाज़ होती हैं. घर की रौनक और चहल पहल. घर के आंगन में चिड़िया की तरह. कठिनाइयों को पार करती हैं असंभव की तरह. महाकवि निराला ने अपनी बेटी सरोज की भावनाओं में अपने इहलोक और परलोक दोनों की सार्थकता महसूस की. उनकी बेटी समय से पहले स्वर्ग पहुंचकर उनके आगमन के मार्ग की ज्योति किरण बन जाती है. वो लिखते हैं-

"जीवित-कविते, शत-शर-जर्जर

छोड़ कर पिता को पृथ्वी पर

तू गई स्वर्ग, क्या यह विचार --

"जब पिता करेंगे मार्ग पार

यह, अक्षम अति, तब मैं सक्षम,

तारूँगी कर गह दुस्तर तम?"

बेटियां यही होती हैं. वे माँ बाप के जीवन का जीवित मोक्ष होती हैं. हर सवाल का सटीक जवाब होती हैं. इंद्रधनुष के सात रंगों की तरह. कभी माँ, कभी बहन, कभी बेटी होती हैं.

शिशु, तुम जीवन का सबसे खूबसूरत अध्याय हो. तुम्हारी उपस्थिति में मैंने जीवन के सबसे स्वर्णिम शिखर देखे हैं. बेहद मुश्किल के दिनों में तुम्हारी आशामयी आँखों में अपने हौसले का उफान लेता सागर देखा है. पिता होने के सौभाग्य को तुम्हारी छाया नित नया आयाम देती आई है. बेटियां बाप के जीवन का आशीर्वाद होती हैं, तुम जीवन में इस सत्य का भी साक्षात्कार बनकर आई हो. तुमसे पहले इसे सुना भर था. तुम आईं तो इसे महसूस कर देख लिया. तुम्हारा ये जन्मदिन खुशियों की मधुर वेणी से सुवासित हो. उत्साह और उमंग हर क्षण, हर लम्हे में तुम्हारी उंगलियां पकड़कर साथ चलें. तुम जब भी आओगी हम तुम्हारे जन्मदिन को फिर से मनाएंगे. मेरी उत्सवप्रियता से तो तुम परिचित ही हो. अपने जीवन के सबसे सुखद दिन को बार बार मनाने से बड़ा सौभाग्य और क्या होगा!

सदा सुखी रहो. सौभाग्यवती रहो. जय जय

(नोट: फेसबुक से साभार)


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