वरिष्ठ पत्रकार इंद्रजीत राय की लक्सर लैब्स को मिली NABL मान्यता

इस लैब के साथ विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवी फोरेंसिक वैज्ञानिकों की एक टीम भी जुड़ी है, जो डिजिटल, फिजिकल और क्राइम सीन जांच से जुड़े परीक्षण करती है एवं रिपोर्ट तैयार करती है।

Last Modified:
Friday, 03 July, 2026
Laxhar Lab


देश में फोरेंसिक साइंस क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर, लक्सर एविडेंस लैब्स प्राइवेट लिमिटेड को नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोरेटरीज़ (NABL) से मान्यता मिल गई है। NABL, भारत सरकार के तहत टेस्टिंग और कैलिब्रेशन लैब्स को मान्यता देने वाली प्रमुख संस्था है।

बता दें कि NABL की मान्यता को किसी भी लैब की काबिलियत, वैज्ञानिक क्षमता और काम की गुणवत्ता की महत्वपूर्ण पहचान माना जाता है। यह मान्यता तभी मिलती है, जब टेस्टिंग के तरीकों, लैब की प्रक्रिया, क्वालिटी सिस्टम, इंफ्रास्ट्रक्चर, उपकरणों के कैलिब्रेशन, दस्तावेज़ों और स्टाफ की वैज्ञानिक योग्यता की पूरी और सख्त जांच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य मानकों के अनुसार की जाती है। इसके लिए NABL के विशेषज्ञों की टीम लैब का निरीक्षण करती है।

इस बारे में जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, इस उपलब्धि के साथ, लक्सर लैब्स (Laxhar Lab) भारत की पहली प्राइवेट फोरेंसिक लैब बन गई है, जिसे एक साथ कई डोमेन—डिजिटल फोरेंसिक्स, फिजिकल फोरेंसिक्स और क्राइम सीन मैनेजमेंट—में NABL की मान्यता मिली है। यह उपलब्धि उत्तर प्रदेश के लिए भी खास है, जहां लक्सर लैब्स (Laxhar Lab) सरकारी और प्राइवेट, दोनों श्रेणियों में फोरेंसिक जांच के लिए NABL मान्यता पाने वाली पहली लैब बन गई है।

देश में अब आम लोगों तक पहुंचेगा फोरेंसिक साइंस: प्रेस रिलीज के अनुसार, कई वर्षों से भारत में फोरेंसिक साइंस की सुविधा मुख्य रूप से सरकारी लैब्स तक सीमित थी, जिससे आम लोगों और निजी संस्थानों के लिए इसका उपयोग करना आसान नहीं था। इस मान्यता के बाद अब कोई भी व्यक्ति, वकील, कंपनी, संस्थान या जांच एजेंसी एक मान्यता-प्राप्त प्राइवेट लैब से सबूतों की फोरेंसिक जांच करा सकती है।

चाहे मामला विवादित हस्ताक्षर का हो, जाली दस्तावेज़ का, साइबर धोखाधड़ी का, मोबाइल फोन की जांच का, ऑडियो या वीडियो की प्रामाणिकता की जांच का, फिंगरप्रिंट परीक्षण का, क्लाउड में मौजूद डिजिटल सबूतों का, क्राइम सीन जांच का या टेक्निकल सर्विलांस काउंटर-मेजर्स (TSCM) का—अब लोगों के पास ऐसी फोरेंसिक सेवाएं उपलब्ध हैं, जो वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप जांची-परखी गई हैं और न्यायिक मामलों, कॉर्पोरेट जांच, बीमा दावों तथा अन्य विवादों के समाधान में सहायक हो सकती हैं।

यह लैब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) की धारा 39 और 63 समेत अन्य लागू प्रावधानों के अनुरूप फोरेंसिक जांच और विशेषज्ञ राय (Expert Opinion) उपलब्ध कराती है। इसकी रिपोर्ट और विशेषज्ञ राय का उपयोग न्यायालयों तथा अन्य सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष, लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार किया जा सकता है। लक्सर लैब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सेक्टर-73, नोएडा स्थित एन्थुरियम टावर में मौजूद है, जहां से वह देशभर के ग्राहकों तक अपनी सेवाएं पहुंचाएगी।

लक्सर लैब (Laxhar Lab) की अगुवाई फोरेंसिक सेवाओं के डायरेक्टर इंद्रजीत राय कर रहे हैं, जिन्हें वर्ष 2023 में वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स से सम्मानित किया जा चुका है। वे फोरेंसिक विशेषज्ञ होने के साथ-साथ फोरेंसिक पत्रकार भी रह चुके हैं। इससे पहले वे एबीपी न्यूज़ में कार्यकारी संपादक, जी न्यूज में उप संपादक और नेटवर्क18 में क्राइम एडिटर के रूप में कार्य कर चुके हैं। इस लैब के साथ विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवी फोरेंसिक वैज्ञानिकों की एक टीम भी जुड़ी है, जो डिजिटल, फिजिकल और क्राइम सीन जांच से जुड़े परीक्षण करती है एवं रिपोर्ट तैयार करती है।

इस मौके पर इंद्रजीत राय ने कहा, ‘यह मान्यता सिर्फ लक्सर लैब के लिए नहीं, बल्कि विज्ञान के जरिए इंसाफ चाहने वाले हर नागरिक के लिए एक बड़ा पड़ाव है। हमारा मकसद हमेशा यही रहा है कि मान्यता-प्राप्त फोरेंसिक सेवाएं सिर्फ सरकारी दफ्तरों तक सीमित न रहें, बल्कि हर किसी तक पहुंचें। आज हर आम इंसान, वकील, कारोबारी और संस्थान के पास एक अंतरराष्ट्रीय मान्यता-प्राप्त लैब से भरोसेमंद और वैज्ञानिक तरीके से परीक्षण किए गए सबूत प्राप्त करने का अवसर है।’

लक्सर लैब (Laxhar Lab) निम्नलिखित क्षेत्रों में मान्यता-प्राप्त फोरेंसिक सेवाएं प्रदान करती है—

  • डिजिटल फोरेंसिक
  • मोबाइल फोन फोरेंसिक
  • क्लाउड फोरेंसिक
  • ऑडियो एवं वीडियो फोरेंसिक
  • फिंगरप्रिंट जांच
  • हैंडराइटिंग एवं हस्ताक्षर जांच
  • फोरेंसिक दस्तावेज़ जांच
  • क्राइम सीन जांच एवं मैनेजमेंट
  • टेक्निकल सर्विलांस काउंटर-मेजर्स (TSCM)

देश के न्यायिक तंत्र में आम आदमी के लिए एक बड़ा कदम: प्रेस रिलीज में कहा गया है कि NABL की यह मान्यता लक्सर लैब (Laxhar Lab) की वैज्ञानिक गुणवत्ता, निष्पक्षता और तकनीकी क्षमता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को और मजबूत करती है। मान्यता-प्राप्त फोरेंसिक सेवाओं को आम लोगों तक पहुंचाकर यह लैब सबूत-आधारित न्याय व्यवस्था को मजबूती देने, जांच एजेंसियों, वकीलों, संस्थानों और आम नागरिकों को भरोसेमंद वैज्ञानिक जांच उपलब्ध कराने की दिशा में काम करने का लक्ष्य रखती है।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

डिजिटल इंडिया के 11 साल: 110 करोड़ से ज्यादा शैक्षणिक रिकॉर्ड डिजिटल

डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के 11 वर्ष पूरे होने पर केंद्र सरकार ने शिक्षा क्षेत्र में डिजिटल बदलाव की उपलब्धियां साझा की हैं।

Last Modified:
Friday, 03 July, 2026
India8956

डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के 11 वर्ष पूरे होने पर केंद्र सरकार ने शिक्षा क्षेत्र में डिजिटल बदलाव की उपलब्धियां साझा की हैं। सरकार का कहना है कि Academic Bank of Credits (ABC), APAAR ID और National Academic Depository (NAD) जैसी पहल के जरिए अब छात्रों के शैक्षणिक रिकॉर्ड सुरक्षित, डिजिटल और आसानी से सत्यापित किए जा सकते हैं। इससे स्कूल और कॉलेज बदलने की प्रक्रिया भी पहले से कहीं अधिक आसान हो गई है।

इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अनुसार, 1 जुलाई 2026 तक 26.29 करोड़ से अधिक APAAR ID बनाई जा चुकी हैं, जबकि 110.65 करोड़ से ज्यादा शैक्षणिक रिकॉर्ड डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड किए जा चुके हैं। इसके अलावा 2,963 उच्च शिक्षण संस्थान Academic Bank of Credits (ABC) प्लेटफॉर्म से जुड़ चुके हैं।

सरकार के मुताबिक, Academic Bank of Credits (ABC) शिक्षा मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की पहल है। यह एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जहां छात्र अपने शैक्षणिक क्रेडिट सुरक्षित रख सकते हैं, उन्हें एक संस्थान से दूसरे संस्थान में ट्रांसफर कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर उनका उपयोग भी कर सकते हैं। यह व्यवस्था राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत मल्टीपल एंट्री-मल्टीपल एग्जिट (MEME) और लचीली पढ़ाई की व्यवस्था को बढ़ावा देती है।

ABC को APAAR (Automated Permanent Academic Account Registry) से जोड़ा गया है। इसके तहत हर छात्र को एक स्थायी डिजिटल अकादमिक पहचान (Academic Identity) मिलती है, जिससे स्कूल, कॉलेज, स्किल डेवलपमेंट और अन्य मान्यता प्राप्त संस्थानों के रिकॉर्ड एक ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध रहते हैं।

सरकार ने बताया कि National Academic Depository (NAD) के जरिए डिग्री, डिप्लोमा, मार्कशीट और अन्य शैक्षणिक प्रमाणपत्र डिजिटल रूप में सुरक्षित रखे जाते हैं। छात्र इन्हें कभी भी और कहीं से भी एक्सेस कर सकते हैं। साथ ही, शिक्षण संस्थान, नियोक्ता और सरकारी एजेंसियां इन दस्तावेजों का ऑनलाइन सत्यापन कर सकती हैं।

मंत्रालय के अनुसार, इस व्यवस्था से कागजी दस्तावेजों पर निर्भरता कम हुई है, फर्जी प्रमाणपत्रों पर रोक लगाने में मदद मिली है और प्रवेश, छात्रवृत्ति, नौकरी तथा इंटर्नशिप जैसी प्रक्रियाएं अधिक पारदर्शी और तेज हुई हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के आवेदनों की डिजिटल जांच से भी मानव हस्तक्षेप कम हुआ है और पूरी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनी है।

सरकार का कहना है कि ABC, APAAR, NAD और DigiLocker के एकीकरण से देश में एक मजबूत डिजिटल शैक्षणिक इकोसिस्टम तैयार हुआ है। इससे छात्रों को अपने शैक्षणिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखने, आसानी से साझा करने और कहीं भी सत्यापित कराने की सुविधा मिल रही है।

छत्तीसगढ़ के रुंगटा इंटरनेशनल स्किल्स यूनिवर्सिटी की एमबीए छात्रा अंजलि राठौर ने बताया कि APAAR ID से दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया आसान हो गई है और कागजी कार्यवाही काफी कम हुई है। वहीं, गवर्नमेंट वी.वाई.टी. पीजी ऑटोनॉमस कॉलेज, दुर्ग के छात्र आशीष तिवंगन ने कहा कि अब उनकी मार्कशीट और अन्य शैक्षणिक रिकॉर्ड डिजिटल रूप से सुरक्षित हैं तथा भविष्य में एडमिशन, क्रेडिट ट्रांसफर और छात्रवृत्ति के लिए भी यह व्यवस्था काफी उपयोगी साबित हो रही है।

सरकार का कहना है कि पिछले 11 वर्षों में डिजिटल इंडिया अभियान ने शिक्षा सेवाओं को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित बनाया है। आने वाले समय में इन पहलों के जरिए पेपरलेस गवर्नेंस को और मजबूत किया जाएगा तथा विकसित भारत के लक्ष्य को गति मिलेगी।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

''Lotte India'' ने ''Dentsu Creative'' को बनाया क्रिएटिव एजेंसी पार्टनर

डेंट्सू क्रिएटिव (Dentsu Creative) की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट (Senior Vice President) प्रिया सीएम (Priya CM) ने कहा कि लोटे (Lotte) दुनिया के प्रमुख कन्फेक्शनरी (Confectionery) ब्रांड्स में से एक है।

Last Modified:
Thursday, 02 July, 2026
dentsuandlotte

लोटे इंडिया (Lotte India) ने डेंट्सू क्रिएटिव (Dentsu Creative) को अपना क्रिएटिव एजेंसी पार्टनर (Creative Agency Partner) नियुक्त किया है। यह अकाउंट मल्टी-एजेंसी पिच (Multi-agency Pitch) के बाद डेंट्सू क्रिएटिव (Dentsu Creative) को मिला है और इसे एजेंसी का चेन्नई (Chennai) कार्यालय संभालेगा।

कंपनी के अनुसार, यह रणनीतिक साझेदारी (Strategic Partnership) लोटे इंडिया (Lotte India) के प्रमुख ब्रांड्स को मजबूत बनाने और नई पीढ़ी के स्नैक उपभोक्ताओं के लिए नए अनुभव तैयार करने पर केंद्रित होगी। डेंट्सू क्रिएटिव (Dentsu Creative) ब्रांड स्ट्रैटेजी (Brand Strategy), क्रिएटिव डेवलपमेंट (Creative Development) और इंटीग्रेटेड कैंपेन (Integrated Campaigns) की जिम्मेदारी संभालेगी।

इसमें चोको पाई (Choco Pie), पेपेरो (PEPERO), जोई (Joee) और कॉफी बाइट (Coffy Bite), एक्लेयर्स (Eclairs), कोकोनट पंच (Coconut Punch), लैक्टो किंग (Lacto King), कैरामिल्क (Caramilk), च्यूइट्स (Chewits), लॉली ब्लिस (Lolly Bliss), लोटे जूसीज़ (Lotte Juicies) सहित अन्य ब्रांड्स शामिल हैं। इसकी शुरुआत भारत में कोरिया (Korea) के नंबर-1 स्नैक ब्रांड पेपेरो (PEPERO) के नए कैंपेन से होगी।

डेंट्सू (Dentsu) के प्रेसिडेंट – इंटीग्रेटेड क्लाइंट मैनेजमेंट (President – Integrated Client Management) इंद्रजीत मुखर्जी (Indrajeet Mookherjee) ने कहा कि लोटे (Lotte) जैसे प्रतिष्ठित ब्रांड के साथ साझेदारी करना उनके लिए गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि यह जीत डेंट्सू (Dentsu) की डेटा-आधारित क्रिएटिविटी (Data-driven Creativity) और उपभोक्ताओं के साथ सार्थक जुड़ाव बनाने की क्षमता को दर्शाती है।

डेंट्सू क्रिएटिव (Dentsu Creative) की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट (Senior Vice President) प्रिया सीएम (Priya CM) ने कहा कि लोटे (Lotte) दुनिया के प्रमुख कन्फेक्शनरी (Confectionery) ब्रांड्स में से एक है। उन्होंने कहा कि यह श्रेणी रचनात्मकता की नई सीमाएं तय करने, उपभोक्ताओं के साथ जुड़ाव बढ़ाने और प्रभावशाली ब्रांड कम्युनिकेशन (Brand Communication) विकसित करने के लिए व्यापक अवसर प्रदान करती है।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: RTI कानून के दायरे में आएगा नेशनल स्टॉक एक्सचेंज

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत 'पब्लिक अथॉरिटी' (सार्वजनिक प्राधिकरण) है।

Last Modified:
Thursday, 02 July, 2026
NSE4512

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत 'पब्लिक अथॉरिटी' (सार्वजनिक प्राधिकरण) है। इसका मतलब है कि अब NSE पर भी RTI Act के प्रावधान लागू होंगे और कानून के तहत उससे जानकारी मांगी जा सकेगी।

जस्टिस सी. हरि शंकर और ओम प्रकाश शुक्ला की खंडपीठ ने वर्ष 2010 में दिए गए एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखते हुए NSE की अपील खारिज कर दी।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वह एकल पीठ के इस निष्कर्ष से पूरी तरह सहमत है कि NSE, RTI Act की धारा 2(h) के तहत "अथॉरिटी" यानी सार्वजनिक प्राधिकरण की श्रेणी में आता है।

क्या था मामला?

साल 2010 में तत्कालीन जस्टिस संजीव खन्ना ने अपने फैसले में कहा था कि भले ही NSE की स्थापना कंपनी अधिनियम के तहत एक निजी कंपनी के रूप में हुई हो, लेकिन Securities Contracts (Regulation) Act, 1956 के तहत उसे स्टॉक एक्सचेंज के रूप में मिली मान्यता उसे सार्वजनिक कार्य करने वाली संस्था बना देती है।

कोर्ट ने यह भी कहा था कि NSE को मिली यह मान्यता पहले केंद्र सरकार और बाद में SEBI के जरिए दी गई। इसलिए यह संस्था RTI कानून के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण मानी जाएगी। साथ ही, एकल पीठ ने यह भी माना था कि NSE पर केंद्र सरकार का नियंत्रण है।

NSE ने क्या दलील दी?

NSE ने इस फैसले को चुनौती देते हुए कहा था कि वह Companies Act, 1956 के तहत पंजीकृत एक निजी कंपनी है, इसलिए उसे सरकारी संस्था या सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं माना जा सकता।

हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि एकल पीठ का फैसला पूरी तरह तर्कसंगत और कानून के अनुरूप है। कोर्ट ने कहा कि उसके निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने की कोई वजह नहीं है।

इस फैसले के साथ ही दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि NSE सूचना का अधिकार कानून के दायरे में आएगा और उससे RTI के तहत जानकारी मांगी जा सकेगी।

 

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

दिल्ली HC से संगीतकार इलैयाराजा को राहत नहीं, सारेगामा के पक्ष में अंतरिम रोक बरकरार

दिल्ली हाई कोर्ट ने मशहूर संगीतकार इलैयाराजा को बड़ा झटका देते हुए सारेगामा इंडिया लिमिटेड के पक्ष में पहले से जारी अंतरिम रोक (इंटरिम इंजंक्शन) को हटाने से इनकार कर दिया है।

Last Modified:
Thursday, 02 July, 2026
Ilaiyaraaja451

दिल्ली हाई कोर्ट ने मशहूर संगीतकार इलैयाराजा को बड़ा झटका देते हुए सारेगामा इंडिया लिमिटेड के पक्ष में पहले से जारी अंतरिम रोक (इंटरिम इंजंक्शन) को हटाने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि फिलहाल यह रोक जारी रहेगी।

जस्टिस तुषार राव गेडेला ने इलैयाराजा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने फरवरी में जारी अंतरिम आदेश को रद्द करने की मांग की थी। इस आदेश के तहत इलैयाराजा को उन गीतों और संगीत रचनाओं का इस्तेमाल करने, उनका लाइसेंस जारी करने या उन पर स्वामित्व का दावा करने से रोका गया है, जिन पर सारेगामा अपना कॉपीराइट होने का दावा करती है।

यह मामला 134 फिल्मों के गीतों और संगीत रचनाओं से जुड़ा है। इनमें Annakkili, 16 Vayathiniley, Kavikkuyil, Bharathi, Pallavi Anu Pallavi, Mullum Malarum, Raaja Paarvai, Netrikkann और Kalyanaraman जैसी कई चर्चित फिल्में शामिल हैं।

सारेगामा ने अदालत में दायर अपनी याचिका में कहा था कि कंपनी की स्थापना वर्ष 1901 में हुई थी और पहले इसका नाम The Gramophone Company of India Limited था। कंपनी का दावा है कि वर्ष 1976 से 2001 के बीच उसने कई फिल्म निर्माताओं के साथ समझौते किए थे, जिनके तहत इन फिल्मों के गीतों की साउंड रिकॉर्डिंग, संगीत और साहित्यिक रचनाओं के कॉपीराइट उसे सौंपे गए थे।

सारेगामा का यह भी कहना है कि उसके पास तमिल, हिंदी, मलयालम, कन्नड़, तेलुगु सहित कई भाषाओं के गीतों का बड़ा कैटलॉग है और वह इनका लाइसेंस तीसरे पक्ष को देती है।

कंपनी के मुताबिक, फरवरी 2026 की शुरुआत में उसे पता चला कि उसके कॉपीराइट वाले गीत Amazon Music, iTunes और JioSaavn जैसे प्लेटफॉर्म पर कथित तौर पर बिना अनुमति इस्तेमाल किए जा रहे हैं। साथ ही, इलैयाराजा इन रचनाओं पर अपना स्वामित्व भी जता रहे थे।

सारेगामा ने यह भी बताया कि इलैयाराजा ने 13 जनवरी 2026 को एक कानूनी नोटिस जारी कर दावा किया था कि जिन संगीत रचनाओं को उन्होंने तैयार, कंपोज, अरेंज और ऑर्केस्ट्रेट किया है, उन पर उनका अधिकार है। इनमें वे रचनाएं भी शामिल थीं, जो इस मुकदमे का हिस्सा हैं।

इसी आधार पर हाई कोर्ट ने 13 फरवरी 2026 को अंतरिम राहत देते हुए कहा था कि पहली नजर में सारेगामा का पक्ष मजबूत दिखाई देता है। अदालत ने माना था कि यदि कंपनी को अंतरिम संरक्षण नहीं दिया गया, तो उसे अपूरणीय नुकसान हो सकता है। इसलिए इलैयाराजा और उनके प्रतिनिधियों को इन गीतों का व्यावसायिक इस्तेमाल करने, लाइसेंस जारी करने या उन पर स्वामित्व का दावा करने से रोक दिया गया था।

बाद में इलैयाराजा ने इस अंतरिम आदेश को हटाने की मांग करते हुए अदालत का रुख किया, लेकिन बुधवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही सारेगामा के पक्ष में जारी अंतरिम रोक फिलहाल बरकरार रहेगी।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

पत्रकार शादमा शेख ने जॉइन किया चैनल न्यूज एशिया

पत्रकार शादमा शेख (Shadma Shaikh) ने चैनल न्यूज एशिया (Channel News Asia) में साउथ एशिया कॉरेस्पोंडेंट के रूप में नई जिम्मेदारी संभाली है।

Last Modified:
Wednesday, 01 July, 2026
saadhmasheikah

वरिष्ठ पत्रकार शादमा शेख (Shadma Shaikh) ने चैनल न्यूज एशिया (Channel News Asia-CNA) में "साउथ एशिया कॉरेस्पोंडेंट (South Asia Correspondent)" के रूप में नई पारी की शुरुआत की है। इसकी जानकारी उन्होंने लिंक्डइन (LinkedIn) पर एक पोस्ट के जरिए साझा की।

शादमा शेख (Shadma Shaikh) बेंगलुरु (Bengaluru) में ही कार्यरत रहेंगी, जहां चैनल न्यूज एशिया (Channel News Asia-CNA) अपना पहला भारत ब्यूरो (India Bureau) स्थापित कर रहा है।

अपने लिंक्डइन (LinkedIn) पोस्ट में उन्होंने कहा कि उनके करियर का बड़ा हिस्सा टेक्नोलॉजी (Technology) रिपोर्टिंग पर केंद्रित रहा है। उन्होंने लिखा कि ऐसे समय में भारत (India) पर रिपोर्टिंग करने का अवसर मिलना उनके लिए उत्साहजनक है, जब देश के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence-AI), डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर (Digital Infrastructure), मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing), क्लाइमेट (Climate), हेल्थकेयर (Healthcare) और जियोपॉलिटिक्स (Geopolitics) से जुड़े फैसले एशिया (Asia) और दुनिया भर की चर्चाओं को प्रभावित कर रहे हैं।

शादमा शेख (Shadma Shaikh) सोशल इम्पैक्ट न्यूज़रूम (Social Impact Newsroom) फैक्टरडेली (FactorDaily) की सह-संस्थापक (Co-Founder) भी हैं। टेक्नोलॉजी और डिजिटल इकोसिस्टम की रिपोर्टिंग में उनका लंबा अनुभव रहा है।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

पूर्व संपादक को वोटिंग व पासपोर्ट अधिकारों से वंचित किए जाने पर भारतीय पत्रकारों का विरोध

भारत के वरिष्ठ पत्रकार आर. राजगोपाल का पासपोर्ट नवीनीकरण (Passport Renewal) वोटर लिस्ट से नाम हटने के कारण अटक गया है। इस मामले को लेकर एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने गहरी चिंता जताई है

Last Modified:
Tuesday, 30 June, 2026
RRajgopal87451

भारत के वरिष्ठ पत्रकार आर. राजगोपाल का पासपोर्ट नवीनीकरण (Passport Renewal) वोटर लिस्ट से नाम हटने के कारण अटक गया है। इस मामले को लेकर एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने गहरी चिंता जताई है और कहा है कि यह मामला दिखाता है कि देश के लाखों लोग Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया की वजह से किस तरह की परेशानियों का सामना कर रहे हैं।

राजगोपाल, जो पहले The Telegraph के संपादक रह चुके हैं, का कहना है कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) के दौरान उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया। इसके बाद उनके पासपोर्ट के नवीनीकरण की प्रक्रिया भी प्रभावित हो गई।

क्या है पूरा मामला?

भारतीय निर्वाचन आयोग ने 4 नवंबर 2025 से 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में Special Intensive Revision (SIR) अभियान शुरू किया था। इसका उद्देश्य अयोग्य मतदाताओं की पहचान कर मतदाता सूची को अपडेट करना बताया गया था।

हालांकि, इस प्रक्रिया को लेकर लगातार विवाद बना हुआ है। आलोचकों का आरोप है कि इस अभियान के दौरान लाखों योग्य मतदाताओं के नाम भी वोटर लिस्ट से हटा दिए गए, जबकि चुनाव आयोग इन आरोपों को खारिज करता रहा है।

अब तक इस प्रक्रिया के तहत करीब 6 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं। इनमें से लगभग 90 लाख नाम केवल पश्चिम बंगाल से हटाए गए हैं। राजगोपाल भी उन हजारों लोगों में शामिल हैं जिन्होंने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी है।

25 साल से एक ही इलाके में रह रहे थे

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राजगोपाल ने बताया कि वह पिछले 25 वर्षों से कोलकाता के बालीगंज इलाके में रह रहे हैं। उन्होंने कहा कि वर्ष 2010 से वह नियमित मतदाता रहे हैं और 2016 से 2023 तक कोलकाता के प्रमुख दैनिक अखबार 'द टेलीग्राफ' के संपादक रहे। इसके बावजूद उनका नाम इसलिए हटा दिया गया क्योंकि उनके और उनके पिता का नाम वर्ष 2002 की मतदाता सूची में नहीं मिला।

उन्होंने बताया कि उन्होंने अपना मैट्रिक प्रमाणपत्र भी जमा किया, लेकिन इसके बावजूद उनका नाम दोबारा नहीं जोड़ा गया। फिलहाल उनकी अपील संबंधित ट्रिब्यूनल में लंबित है।

पासपोर्ट नवीनीकरण भी रुका

राजगोपाल का कहना है कि बाद में अधिकारियों ने उन्हें बताया कि कोलकाता पुलिस पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए आवश्यक पुलिस सत्यापन (Police Verification) पूरा नहीं कर सकी, क्योंकि उनका नाम वोटर लिस्ट में नहीं था।

उन्होंने कहा कि उन्हें यह बात हैरान करने वाली लगी, क्योंकि उन्हें ऐसा कोई सार्वजनिक नियम नहीं मिला जिसमें पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए वोटर आईडी को अनिवार्य दस्तावेज बताया गया हो। इस पूरे मामले पर निर्वाचन आयोग की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने क्या कहा?

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने अपने बयान में कहा कि अगर एक जाने-माने पत्रकार और पूर्व संपादक के साथ ऐसा हो सकता है, तो आम नागरिकों, खासकर समाज के कमजोर वर्गों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।

गिल्ड ने कहा कि यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन लाखों भारतीयों की परेशानी को सामने लाता है जिनके नाम SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए हैं।

सोशल मीडिया पर मिला समर्थन

राजगोपाल के मामले को सोशल मीडिया पर भी व्यापक समर्थन मिला है। वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि वह राजगोपाल के साथ खड़े हैं। उन्होंने कहा कि सबसे डराने वाली बात यह है कि ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है।

वहीं, सुप्रिया श्रीनेत ने आरोप लगाया कि राजगोपाल को उनकी पत्रकारिता और जवाबदेही की मांग की कीमत चुकानी पड़ रही है।

केरल से भी उठा मामला

इस बीच वी.डी. सतीशन ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से इस मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि कोलकाता पुलिस की प्रतिकूल सत्यापन रिपोर्ट की वजह से राजगोपाल का पासपोर्ट नवीनीकरण रुक गया। उनके मुताबिक, वोटर लिस्ट से नाम हटने के कारण ही यह स्थिति पैदा हुई है। उन्होंने यह भी बताया कि राजगोपाल ने अपना नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए अपील दायर कर दी है।

वहीं, पिनरयी विजयन ने भी फेसबुक पोस्ट के जरिए इस मामले पर हैरानी जताई। उन्होंने कहा कि SIR प्रक्रिया के कारण राजगोपाल का नाम वोटर लिस्ट से हटा और इसी वजह से उनका पासपोर्ट भी नवीनीकृत नहीं हो सका।

 

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

Del Monte India ने Creativeland Asia को सौंपी क्रिएटिव कम्युनिकेशन की जिम्मेदारी

फूड ब्रैंड Del Monte India ने अपनी क्रिएटिव कम्युनिकेशन की जिम्मेदारी Creativeland Asia की दिल्ली टीम को सौंप दी है।

Last Modified:
Monday, 29 June, 2026
Creativeland5421

फूड ब्रैंड Del Monte India ने अपनी क्रिएटिव कम्युनिकेशन की जिम्मेदारी Creativeland Asia की दिल्ली टीम को सौंप दी है। यह फैसला कई एजेंसियों के बीच हुए मूल्यांकन (Multi-Agency Evaluation) के बाद लिया गया।

इस नई साझेदारी के तहत Creativeland Asia, Del Monte India के लिए ब्रैंड और प्रॉडक्ट कम्युनिकेशन की पूरी रणनीति तैयार करेगी। एजेंसी का फोकस अलग-अलग प्रोडक्ट कैटेगरी के लिए क्रिएटिव कैंपेन विकसित करने, ग्राहकों के साथ ब्रैंड की मजबूत पहचान बनाने और Del Monte की फूड एक्सपर्टीज और विरासत को और मजबूती से पेश करने पर रहेगा।

इस साझेदारी पर Creativeland Asia के चीफ बिजनेस ऑफिसर मयूर चंद्रा ने कहा कि Del Monte एक ऐसा ब्रैंड है, जिसकी वैश्विक विरासत काफी मजबूत है और जो आज भी ग्राहकों के बीच अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है।

उन्होंने कहा कि भारत में लोगों की खाने-पीने की पसंद लगातार बदल रही है। ऐसे में उपभोक्ता ऐसे ब्रैंड चाहते हैं जो किचन में नए प्रयोग करने की प्रेरणा दें और रोजमर्रा के खाने को ज्यादा स्वादिष्ट और खास बनाएं। उनके मुताबिक, Del Monte की विशेषज्ञता, बेहतर प्रोडक्ट्स और बेहतरीन भोजन के अनुभव को एक अलग और प्रभावशाली कहानी के रूप में पेश करने का अच्छा अवसर है। उन्होंने कहा कि कंपनी Del Monte के साथ मिलकर ब्रैंड की अगली विकास यात्रा का हिस्सा बनने को लेकर उत्साहित है।

वहीं, Del Monte Foods की डिप्टी जनरल मैनेजर (मार्केटिंग) किरणप्रीत कौर ने कहा कि ग्राहकों की अपेक्षाएं लगातार बदल रही हैं। ऐसे में कंपनी की खासियतों को ऐसे तरीके से पेश करना जरूरी है जो लोगों के लिए प्रासंगिक भी हो और उन्हें प्रेरित भी करे।

उन्होंने कहा कि Creativeland Asia ने कंपनी के विजन और फूड कैटेगरी की अच्छी समझ दिखाई है। उन्हें उम्मीद है कि दोनों मिलकर ऐसे ब्रैंड कैंपेन तैयार करेंगे जो ग्राहकों पर मजबूत प्रभाव छोड़ें।

कंपनी के अनुसार, इस पूरे अकाउंट का संचालन Creativeland Asia के दिल्ली कार्यालय से किया जाएगा।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

मीडिया इंडस्ट्री के लिए चुनौती बना AI सर्च, क्या खतरे में है भविष्य?

मान लीजिए आपने गूगल पर सवाल सर्च किया और AI बॉक्स में तुरंत जवाब मिल गया, बिना किसी लिंक पर जाए आपने पढ़ा और पेज बंद कर दिया—यही बदलाव अब पब्लिशर्स के लिए बड़ी चुनौती है।

Last Modified:
Friday, 26 June, 2026
AISearch7845

मान लीजिए आपने गूगल पर सर्च किया- “भारत में महंगाई क्यों बढ़ रही है?” और कुछ ही सेकंड में आपके सामने एक बड़े AI बॉक्स में पूरा जवाब आ गया। न आपको किसी लिंक पर क्लिक करना पड़ा, न किसी वेबसाइट पर जाना पड़ा। आपने बस जवाब पढ़ा और पेज बंद कर दिया। देखने में यह कितना आसान लगता है, लेकिन यही बदलाव अब दुनिया भर के पब्लिशर्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

2026 में मीडिया इंडस्ट्री एक ऐसी जंग के दौर में है, जो न कोर्टरूम में पूरी तरह लड़ी जा रही है और न ही संसद की बहसों में—बल्कि सर्च इंजन के रिजल्ट पेज पर ही इसका असली मुकाबला हो रहा है। एक तरफ अखबार, न्यूज पोर्टल, ब्लॉग और कंटेंट क्रिएटर्स हैं, जिन्होंने सालों मेहनत से अपनी जगह बनाई है, और दूसरी तरफ Artificial Intelligence (AI) है, जो उन्हीं के कंटेंट से सीखकर यूजर्स को सीधे, संक्षिप्त जवाब देने लगा है—और कई बार मूल वेबसाइट तक जाने की जरूरत ही खत्म कर देता है।

Zero-Click का जमाना: जब Click ही नहीं हुई तो पैसा कहां से आएगा?

गूगल ने मई 2024 में अमेरिका में AI Overview (AIO) लॉन्च किया था। मई 2025 तक यह फीचर 200 से ज्यादा देशों और 40 भाषाओं तक पहुंच गया। इसमें भारत की हिंदी, तमिल और तेलुगू जैसी भाषाएं भी शामिल हैं। नतीजा? मीडिया इंडस्ट्री के लिए बड़ा झटका।

प्यू रिसर्च सेंटर (Pew Research Center) ने मार्च 2025 में अमेरिका के 900 लोगों की इंटरनेट इस्तेमाल करने की आदतों को ट्रैक किया और गूगल पर की गई 68 हजार से ज्यादा सर्च का विश्लेषण किया। रिपोर्ट में सामने आया कि जब AI Overview दिखाई देता है, तो लोग सिर्फ 8 फीसदी मामलों में ही किसी लिंक पर क्लिक करते हैं। जबकि बिना AI Overview के यह आंकड़ा 15 फीसदी था। यानी क्लिक में करीब 47 फीसदी की गिरावट आई। सबसे बड़ी बात यह कि AI Overview में दिए गए स्रोतों पर सिर्फ 1 फीसदी लोगों ने क्लिक किया।

Similarweb के आंकड़ों के मुताबिक, मई 2024 से मई 2025 के बीच खबरों से जुड़ी सर्च में “जीरो-क्लिक” सर्च का हिस्सा 56 फीसदी से बढ़कर 69 फीसदी हो गया। आसान शब्दों में कहें तो खबरों से जुड़ी 10 में से करीब 7 सर्च ऐसी रहीं, जिनमें लोग किसी भी वेबसाइट पर नहीं पहुंचे।

वहीं, रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ जर्नलिज्म (Reuters Institute for the Study of Journalism) की जनवरी 2026 की रिपोर्ट और ज्यादा चिंता बढ़ाने वाली है। दुनिया के 51 देशों के 280 मीडिया लीडर्स का सर्वे किया गया, जिनमें 64 एडिटर-इन-चीफ और 64 चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर्स (CEO) शामिल थे। उनका मानना है कि अगले तीन साल में सर्च इंजन से आने वाला ट्रैफिक औसतन 43 फीसदी तक गिर सकता है।

चार्टबीट ने 2,500 से ज्यादा न्यूज वेबसाइट्स के आंकड़ों का अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि नवंबर 2024 से नवंबर 2025 के बीच गूगल सर्च से आने वाले विजिटर्स में 33 फीसदी की गिरावट आई। वहीं, गूगल डिस्कवर से आने वाला ट्रैफिक 21 फीसदी घट गया। अमेरिका में यह गिरावट और ज्यादा, यानी 38 फीसदी रही।

छोटे पब्लिशर्स का हाल सबसे बुरा

इस नुकसान का असर सभी पर एक जैसा नहीं पड़ा। बड़े पब्लिशर्स- जैसे The New York Times, जिसके 2025 के आखिर तक 1.278 करोड़ सब्सक्राइबर्स थे, अभी भी किसी तरह टिके हुए हैं। लेकिन छोटे पब्लिशर्स को सबसे बड़ा झटका लगा। 2025 में छोटे पब्लिशर्स का गूगल रेफरल ट्रैफिक करीब 60 फीसदी तक गिर गया, जबकि बड़े पब्लिशर्स में यह गिरावट 22 फीसदी रही।

Business Insider का ऑर्गेनिक सर्च ट्रैफिक अप्रैल 2022 से अप्रैल 2025 के बीच 55 फीसदी तक गिर गया। हालत ऐसी हुई कि कंपनी को मई 2025 में अपने 21 फीसदी एम्प्लॉयीज की छंटनी करनी पड़ी।

वहीं HuffPost की डेस्कटॉप और मोबाइल साइट्स पर सर्च से आने वाले विजिटर्स की संख्या आधी रह गई। यहां तक कि The New York Times का सर्च ट्रैफिक शेयर भी 2022 के 44 फीसदी से घटकर 2025 में 37 फीसदी पर आ गया।

DMG Media , जो MailOnline और Metro जैसे बड़े ब्रिटिश प्रकाशन चलाती है, ने सितंबर 2025 में बताया कि कुछ खास सर्च में क्लिक-थ्रू रेट 89 फीसदी तक गिर गई।

शिक्षा प्लेटफॉर्म Chegg को तो और बड़ा नुकसान हुआ। जनवरी 2024 से जनवरी 2025 के बीच कंपनी का गैर-सब्सक्राइबर ट्रैफिक 49 फीसदी तक गिर गया। इसके बाद कंपनी ने गूगल के खिलाफ प्रतिस्पर्धा विरोधी कानून (एंटीट्रस्ट) का मुकदमा भी दायर कर दिया।

Google की AI और SEO का बदलता मॉडल

कभी SEO यानी सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन का सीधा मतलब होता था- सही कीवर्ड ढूंढो, अच्छा कंटेंट लिखो, गूगल पर ऊपर जगह बनाओ, ट्रैफिक आएगा और विज्ञापनों से कमाई होगी। यह मॉडल कई सालों तक चलता रहा। लेकिन 2026 तक आते-आते यह मॉडल बुरी तरह बदल चुका है।

Seer Interactive ने जून 2024 से सितंबर 2025 के बीच 42 संस्थाओं की 3,119 जानकारी आधारित सर्च को ट्रैक किया। रिपोर्ट में पाया गया कि जिन सर्च में AI Overview दिखाई देता था, वहां ऑर्गेनिक क्लिक-थ्रू रेट 1.76 फीसदी से गिरकर सिर्फ 0.61 फीसदी रह गई। यानी करीब 61 फीसदी की गिरावट। वहीं पेड क्लिक-थ्रू रेट 19.7 फीसदी से टूटकर 6.34 फीसदी पर आ गई, यानी 68 फीसदी की भारी गिरावट।

Semrush के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 की तीसरी तिमाही तक गूगल की करीब 20 से 25 फीसदी सर्च में AI Overview दिखने लगा था। वहीं Gartner का अनुमान है कि 2026 के आखिर तक ऑर्गेनिक सर्च ट्रैफिक का 25 फीसदी हिस्सा AI चैटबॉट्स और वॉइस असिस्टेंट्स की तरफ चला जाएगा।

भारत में भी तेजी से बदलाव दिख रहा है। AI सर्च इंजन Perplexity ने 2024-25 के दौरान 640 फीसदी की बढ़त दर्ज की, खासकर Airtel के साथ साझेदारी के बाद। वहीं ChatGPT अब भारत में प्रोफेशनल्स के बीच दूसरा सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला प्लेटफॉर्म बन चुका है।

टियर-2 और टियर-3 शहरों में 58 फीसदी सर्च अब आवाज के जरिए हो रही हैं। लोग हिंदी, तमिल, तेलुगू और बंगाली जैसी भाषाओं में सवाल पूछ रहे हैं।

इस बदलाव ने SEO इंडस्ट्री की दिशा ही बदल दी है। पहले कीवर्ड रैंकिंग सबसे ज्यादा मायने रखती थी, लेकिन अब “जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन” यानी GEO का दौर शुरू हो गया है। इसका मतलब है कि AI के जवाबों में आपके ब्रैंड या कंटेंट का जिक्र हो, चाहे यूजर आपकी वेबसाइट पर आए या नहीं।

अहरेफ्स की दिसंबर 2025 की स्टडी के मुताबिक, जिन कीवर्ड्स पर AI Overview दिखती है, वहां पहले नंबर पर आने वाली वेबसाइट की क्लिक-थ्रू रेट में 34.5 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई।

Ad Revenue की तस्वीर: पब्लिशर्स का दर्द

पब्लिशर्स का बिजनेस मॉडल काफी सीधा था — ज्यादा ट्रैफिक आएगा, ज्यादा विज्ञापन दिखेंगे और ज्यादा कमाई होगी। लेकिन गूगल के AI सिस्टम ने इस पूरे खेल को बदल दिया है।

अब जब लोग वेबसाइट पर पहुंच ही नहीं रहे, तो विज्ञापन कौन देखेगा? पेज व्यूज कहां से आएंगे? और क्लिक कैसे गिने जाएंगे?

पब्लिशर्स की विज्ञापन कमाई पर दो तरफ से असर पड़ रहा है। पहला, वेबसाइट्स पर ट्रैफिक लगातार घट रहा है। दूसरा, विज्ञापन देने वाली कंपनियां खुद गूगल और Meta जैसे बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की तरफ जा रही हैं, क्योंकि वहां ग्राहकों को ज्यादा सटीक तरीके से टारगेट किया जा सकता है।

मार्च 2026 की फिक्की-ईवाई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर 2025 में 9 फीसदी बढ़कर 2.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। लेकिन इस बढ़त का सबसे ज्यादा फायदा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को मिला, पारंपरिक टीवी और न्यूज पब्लिशर्स को नहीं।

डिजिटल विज्ञापन बाजार 26 फीसदी बढ़कर 947 अरब रुपये तक पहुंच गया। यानी ब्रैंड्स का पैसा डिजिटल दुनिया में जा रहा है, लेकिन न्यूज वेबसाइट्स पर नहीं, बल्कि गूगल और Meta जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स के इकोसिस्टम में।

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की ‘जर्नलिज्म एंड टेक्नोलॉजी ट्रेंड्स 2026’ रिपोर्ट के अनुसार, सर्वे में शामिल पब्लिशर्स ने कहा कि अब कमाई के लिए सब्सक्रिप्शन और मेंबरशिप उनकी पहली प्राथमिकता बन चुकी है। 76 फीसदी पब्लिशर्स ने इसे सबसे अहम बताया, जबकि डिस्प्ले विज्ञापन को 68 फीसदी ने दूसरी प्राथमिकता माना। 

पब्लिशर्स भी चुप नहीं बैठे हैं। वे इस संकट से निपटने के लिए कई मोर्चों पर लड़ाई लड़ रहे हैं।

  1. AI Licensing Deals: कंटेंट का दाम वसूलो

    बड़े पब्लिशर्स अब AI कंपनियों के साथ समझौते कर रहे हैं। मतलब- AI कंपनियां उनका कंटेंट इस्तेमाल करें और बदले में उन्हें पैसा दें।

    News Corp ने OpenAI के साथ 5 साल की 25 करोड़ डॉलर से ज्यादा की डील की है। वहीं The New York Times को Amazon की एलेक्सा और रूफस शॉपिंग असिस्टेंट सेवाओं से हर साल करीब 2 से 2.5 करोड़ डॉलर मिल रहे हैं।

    इसके अलावा Associated Press, Time, Fortune, CNN, The Washington Post और Condé Nast जैसी कई बड़ी मीडिया कंपनियां किसी न किसी AI कंपनी के साथ समझौते कर चुकी हैं।

    लेकिन यह मॉडल फिलहाल सिर्फ बड़े खिलाड़ियों के लिए फायदेमंद दिख रहा है। मिड-साइज पब्लिशर्स को 10 लाख से 50 लाख डॉलर तक की डील मिल सकती है, जो उनके ट्रैफिक नुकसान की भरपाई के लिए काफी नहीं है। वहीं छोटे पब्लिशर्स और स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स के लिए अभी ऐसे समझौतों के दरवाजे लगभग बंद हैं।

    इसी बीच Cloudflare ने “पे पर क्रॉल” नाम का एक मार्केटप्लेस शुरू किया है। इसमें पब्लिशर्स तय कर सकते हैं कि AI कंपनियां उनके कंटेंट को स्कैन करने के बदले कितना पैसा देंगी।

    जून 2025 में Cloudflare के आंकड़ों ने एक चौंकाने वाली तस्वीर दिखाई। गूगल हर 9 से 14 पेज स्कैन करने पर एक विजिटर वेबसाइट को भेजता है। लेकिन OpenAI करीब 1,700 पेज स्कैन करने के बाद सिर्फ एक विजिटर भेजता है। वहीं Anthropic का अनुपात तो 73,000 पेज पर सिर्फ एक विजिटर का रहा।

    यही वजह है कि दुनिया की 79 फीसदी बड़ी न्यूज वेबसाइट्स ने कम से कम एक AI ट्रेनिंग बॉट को ब्लॉक कर दिया है।

  1. सब्सक्रिप्शंस और डायरेक्ट ऑडियंस: प्लेटफॉ़र्म पर नहीं, खुद पर भरोसा

जो पब्लिशर्स AI की मार से बचे हैं, उनका एक कॉमन सिक्रेट है- उन्होंने गूगल पर निर्भरता कम की।

The New Yorker ने 2025 में रिकॉर्ड कमाई, रिकॉर्ड मुनाफा और रिकॉर्ड सब्सक्राइबर्स हासिल किए। वहीं The New York Times के 2025 के आखिर तक 1.278 करोड़ सब्सक्राइबर्स हो चुके थे। कंपनी का लक्ष्य 2027 तक इसे बढ़ाकर 1.5 करोड़ तक पहुंचाने का है।

Time मैगजीन का अनुमान है कि 2026 में उसकी कुल कमाई का 50 फीसदी हिस्सा इवेंट्स से आएगा, जबकि 2023 में यह हिस्सा 28 फीसदी था। वहीं Bloomberg Media के ग्लोबल फोरम्स से 2025 में स्पॉन्सरशिप कमाई में 30 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई।

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक, 76 फीसदी मीडिया लीडर्स का कहना है कि अब वे चाहते हैं कि उनके कर्मचारी “क्रिएटर्स” की तरह काम करें। यानी सिर्फ खबर लिखना नहीं, बल्कि ऑडियंस के साथ सीधा जुड़ाव बनाना भी जरूरी हो गया है।

इसके अलावा 50 फीसदी पब्लिशर्स अब क्रिएटर पार्टनरशिप्स पर काम कर रहे हैं, ताकि नए दर्शकों तक पहुंच बनाई जा सके।

  1. SEO का नया अवतार: GEO (Generative Engine Optimization)
पहले SEO का मतलब था — गूगल के टॉप 10 रिजल्ट्स में जगह बनाओ। लेकिन अब दौर GEO यानी “जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन” का है। अब कोशिश यह होती है कि AI के जवाबों में आपकी वेबसाइट या कंटेंट का जिक्र आए।

रिसर्च बताती है कि जिन वेबसाइट्स का नाम AI ओवरव्यू में आता है, उनकी ऑर्गेनिक क्लिक-थ्रू रेट 35 फीसदी ज्यादा रहती है। वहीं पेड क्लिक-थ्रू रेट 91 फीसदी तक बढ़ जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जिस कंटेंट का ढांचा साफ और व्यवस्थित होगा — जैसे सवाल-जवाब फॉर्मेट, छोटे हेडिंग्स और लिस्ट्स — उसे AI ज्यादा आसानी से समझता है और अपने जवाबों में ज्यादा इस्तेमाल करता है।

ग्रोथ मेमो के फरवरी 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, किसी आर्टिकल के शुरुआती 30 फीसदी हिस्से से ही 44 फीसदी AI सिटेशंस आती हैं। यानी अब आर्टिकल की शुरुआती लाइनें पहले से कहीं ज्यादा अहम हो गई हैं।

भारत में यह बदलाव एक बड़े मौके की तरह भी देखा जा रहा है। हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में AI द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कंटेंट की अभी कमी है। गूगल का AI सिस्टम अब हिंदी में भी जवाब देने लगा है, लेकिन हिंदी कंटेंट क्रिएटर्स अभी GEO के हिसाब से कंटेंट तैयार नहीं कर रहे। ऐसे में जो लोग जल्दी इस दिशा में काम करेंगे, उन्हें सबसे बड़ा फायदा मिल सकता है।

ChatGPT से Traffic: उम्मीद कम, हकीकत और कम

कुछ लोगों को लगता है कि अगर गूगल से ट्रैफिक कम हो रहा है, तो उसकी भरपाई ChatGPT जैसे AI प्लेटफॉर्म्स से हो जाएगी।

सितंबर से नवंबर 2025 के बीच ChatGPT ने पब्लिशर्स को करीब 1.2 अरब आउटगोइंग रेफरल्स भेजे, जो पिछले साल के मुकाबले 52 फीसदी ज्यादा थे। सुनने में यह आंकड़ा अच्छा लगता है, लेकिन असली तस्वीर अलग है।

कंडक्टर की रिसर्च के मुताबिक, सभी AI प्लेटफॉर्म्स मिलकर भी पब्लिशर्स के कुल ट्रैफिक का सिर्फ 1 फीसदी हिस्सा ही भेज पा रहे हैं।

वहीं रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट बताती है कि अकेला गूगल, ChatGPT के मुकाबले 500 गुना ज्यादा रेफरल्स भेजता है। अगर गूगल सर्च और गूगल डिस्कवर को साथ जोड़ दें, तो यह अंतर 1,300 गुना तक पहुंच जाता है।

यानी AI सर्च अभी नया ट्रैफिक स्रोत नहीं बन पाया है। उल्टा, उसने पब्लिशर्स का पुराना ट्रैफिक कम कर दिया है।

भारत के पब्लिशर्स के लिए क्या मायने रखता है?

भारत में internet users की संख्या 2025 के अंत तक 1.03 billion यानी एक अरब तीन करोड़ पार कर गई। यहाँ digital news market 2026 के अंत तक $1 billion revenue generate करने का अनुमान है।

लेकिन AI का असर भारत पर भी उतना ही गहरा है। Perplexity अब India में US से भी बड़ा market बन गया है। ChatGPT फरवरी 2026 तक 900 मिलियन वीकली एक्टिव यूजर्स तक पहुंच गया और भारत में भी 10 करोड़ weekly users। Google AI Overviews 40 भाषाओं में हैं जिनमें हिंदी भी शामिल है।

भारत के हिंदी न्यूज़ पोर्टल्स, regional language sites और छोटे digital पब्लिशर्स — जो Google Search से अपना ज़्यादातर traffic पाते थे — अब एक बड़े transition के मुहाने पर खड़े हैं।

असली सवाल: कंटेंट बनाने वाले को पैसा कौन देगा?

यह सिर्फ बिजनेस मॉडल का मामला नहीं है, बल्कि पत्रकारिता के अस्तित्व का सवाल बन चुका है।

अगर पब्लिशर्स कमाई नहीं कर पाएंगे, तो वे रिपोर्टर्स नहीं रख पाएंगे। रिपोर्टर्स नहीं होंगे, तो ग्राउंड रिपोर्टिंग कम हो जाएगी। और जब ग्राउंड रिपोर्टिंग ही नहीं होगी, तो एआई के पास इस्तेमाल करने के लिए ओरिजिनल कंटेंट भी नहीं बचेगा। बिना ओरिजिनल कंटेंट के एआई सिस्टम भी ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएंगे।

यानी यह एक खतरनाक चक्र बनता जा रहा है, जो पूरे कंटेंट इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा सकता है।

Cloudflare के मुख्य कार्यकारी अधिकारी Matthew Prince ने जुलाई 2025 में पब्लिशर्स को ऐसे टूल्स दिए, जिनकी मदद से वे एआई बॉट्स को ब्लॉक कर सकते हैं। नए Cloudflare ग्राहकों के लिए यह सुविधा डिफॉल्ट रूप से शुरू की गई।

इसका मतलब है कि अब पब्लिशर्स अपने कंटेंट को एआई कंपनियों के लिए मुफ्त में उपलब्ध नहीं कराना चाहते। वे अपने कंटेंट की अहमियत और कमी दोनों बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन गूगल को पूरी तरह ब्लॉक करना आसान नहीं है, क्योंकि सर्च बाजार में उसकी हिस्सेदारी 90 फीसदी से ज्यादा है। अगर कोई पब्लिशर गूगल को ब्लॉक कर दे, तो उसकी वेबसाइट इंटरनेट पर लगभग गायब जैसी हो सकती है।

आगे का रास्ता

Dotdash Meredith के चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर Neil Vogel का कहना है कि AI प्लेटफॉर्म्स को पब्लिशर्स और क्रिएटर्स को उनके कंटेंट का उचित पैसा देना होगा। वहीं Condé Nast के मुख्य कार्यकारी अधिकारी Roger Lynch ने कहा कि OpenAI के साथ साझेदारी से पारंपरिक सर्च से होने वाले कमाई के नुकसान की कुछ हद तक भरपाई हो रही है।

लेकिन छोटे पब्लिशर्स की सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि उनके पास न तो OpenAI जैसी बड़ी कंपनियों के साथ डील है और न ही Condé Nast जैसा बड़ा ब्रैंड नाम।

ऐसे में 2026 में पब्लिशर्स के सामने टिके रहने के लिए कुछ ही रास्ते बचे हैं। जैसे — सब्सक्रिप्शन और मेंबरशिप बढ़ाना, अपनी ऑडियंस के साथ सीधा रिश्ता बनाना जिसे कोई प्लेटफॉर्म छीन न सके, न्यूजलेटर्स को कमाई का मजबूत जरिया बनाना, इवेंट्स और वास्तविक अनुभवों पर निवेश करना और जीईओ यानी “जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन” सीखना।

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट में एक और दिलचस्प बात सामने आई। पब्लिशर्स अब सबसे ज्यादा निवेश YouTube पर करना चाहते हैं। 2025 में इसका नेट स्कोर 52 था, जो 2026 में बढ़कर 74 हो गया। इससे साफ है कि मीडिया इंडस्ट्री तेजी से वीडियो पत्रकारिता की तरफ बढ़ रही है।

एक युग का अंत, एक नई शुरुआत

जिस क्लिक इकॉनमी पर पिछले 20 साल की डिजिटल पत्रकारिता टिकी हुई थी, वह अब तेजी से बदल रही है। AI ने सामान्य कंटेंट को लगभग एक जैसी चीज बना दिया है। अब साधारण सवालों के जवाब AI खुद देने लगा है।

ऐसे में वही पत्रकारिता टिक पाएगी, जिसमें ओरिजिनल रिपोर्टिंग हो, एक्सक्लूसिव आंकड़े हों, विशेषज्ञों का विश्लेषण हो और ऐसा कंटेंट हो जिसे AI आसानी से कॉपी न कर सके।

2026 की मीडिया दुनिया की सबसे बड़ी चिंता यही है — “इनविजिबल पब्लिशर”। यानी वह पब्लिशर जो कंटेंट तो बना रहा है, जवाब भी उसी के कंटेंट से तैयार हो रहे हैं, लेकिन लोग उसकी वेबसाइट तक पहुंच ही नहीं रहे।

हालांकि इतिहास बताता है कि हर बड़ी तकनीकी क्रांति के समय मीडिया इंडस्ट्री ने खुद को बदला है। जब रेडियो आया तो अखबारों को डर लगा। टीवी आया तो रेडियो को खतरा महसूस हुआ। इंटरनेट आया तो टीवी इंडस्ट्री चिंतित हो गई। लेकिन हर दौर में मीडिया ने खुद को नए तरीके से ढाला।

अब AI सर्च के दौर में भी पब्लिशर्स को खुद को बदलना होगा। सिर्फ गूगल के हिसाब से नहीं, बल्कि अपने पाठकों और दर्शकों की जरूरतों के हिसाब से।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

भगवंत मान वीडियो विवाद: फर्जी फॉरेंसिक रिपोर्ट मामले में आया नया मोड़

अकाल तख्त सचिवालय के मीडिया सलाहकार जसकरण सिंह ने हरियाणा पुलिस द्वारा कथित फर्जी फॉरेंसिक रिपोर्ट तैयार किए जाने के मामले में दर्ज की गई एफआईआर को बेहद गंभीर बताया है।

Last Modified:
Thursday, 25 June, 2026
Bhagwant Maan

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से जुड़े कथित आपत्तिजनक वीडियो विवाद में एक नया मोड़ सामने आया है। अकाल तख्त सचिवालय के मीडिया सलाहकार जसकरण सिंह ने हरियाणा पुलिस द्वारा कथित फर्जी फॉरेंसिक रिपोर्ट तैयार किए जाने के मामले में दर्ज की गई एफआईआर को बेहद गंभीर बताया है। उन्होंने मामले से जुड़े सभी लोगों की भूमिका उजागर करने की मांग की है।

दरअसल, गुरुग्राम पुलिस ने मंगलवार को दो लोगों को गिरफ्तार किया था। पुलिस ने एक व्यक्ति की शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उससे वायरल वीडियो के संबंध में एक मनगढ़ंत फॉरेंसिक रिपोर्ट तैयार कराने के लिए संपर्क किया गया था।

बुधवार को प्रतिक्रिया देते हुए जसकरण सिंह ने कहा कि कथित आपत्तिजनक वीडियो के संबंध में फर्जी फॉरेंसिक रिपोर्ट तैयार करने का मामला अत्यंत गंभीर है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह सब सिख समुदाय और पंजाब के लोगों को गुमराह करने तथा अकाल तख्त को गलत साबित करने की मंशा से किया गया।

उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले में शामिल सभी लोगों को बेनकाब किया जाना चाहिए। जसकरण सिंह ने यह भी कहा कि इतिहास गवाह है कि अकाल तख्त को चुनौती देने वालों को हमेशा प्रतिकूल परिणामों का सामना करना पड़ा है। उन्होंने दावा किया कि सिख विरोधी ताकतों और अकाल तख्त को चुनौती देने वालों को यह याद रखना चाहिए कि सांसारिक मामलों में लोगों को भ्रमित किया जा सकता है, लेकिन गुरु साहिब और उनके तख्त को नहीं।

उन्होंने कहा कि इस कथित साजिश में शामिल लोगों को अपने अंतर्मन की आवाज सुननी चाहिए और यह याद रखना चाहिए कि गुरु से विमुख होने वालों को कहीं सहारा नहीं मिलता तथा ऐसे कर्मों का दाग पीढ़ियों तक बना रहता है।

गौरतलब है कि इस कथित वीडियो को लेकर पहले ही राजनीतिक विवाद खड़ा हो चुका है। अकाल तख्त ने 15 जून को मुख्यमंत्री भगवंत मान के खिलाफ आदेश जारी करते हुए उन्हें ‘गुरु दोखी’ और ‘खालसा पंथ विरोधी’ घोषित किया था। यह फैसला अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज्ज के उस दावे के बाद आया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि दो फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं की जांच में वीडियो को “प्रामाणिक” पाया गया है।

हालांकि, भगवंत मान पहले ही इस वीडियो को खारिज कर चुके हैं। उनका कहना है कि यह उन्हें बदनाम करने के उद्देश्य से फैलाया गया “झूठा प्रचार” है। वहीं, पंजाब में आम आदमी पार्टी ने भी दावा किया था कि दो फॉरेंसिक जांचों में यह निष्कर्ष सामने आया कि कथित वीडियो में दिखाई देने वाला व्यक्ति भगवंत मान नहीं है।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

NDTV इंडिया से रिटायर हुए प्रियदर्शन, सहयोगियों ने दी शानदार फेयरवेल

दिसंबर 2003 में चैनल से जुड़ने वाले प्रियदर्शन ने यहां 23 साल से अधिक समय तक अपनी सेवाएं दीं और संपादकीय टीम के अहम स्तंभ के रूप में पहचान बनाई।

Last Modified:
Wednesday, 24 June, 2026
Priyadarshan Ji

हिंदी पत्रकारिता के प्रतिष्ठित नाम, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और संपादक प्रियदर्शन मंगलवार (23 जून) को ‘एनडीटीवी इंडिया’ (NDTV India) से सेवानिवृत्त हो गए। दिसंबर 2003 में चैनल से जुड़ने वाले प्रियदर्शन ने यहां 23 साल से अधिक समय तक अपनी सेवाएं दीं और संपादकीय टीम के अहम स्तंभ के रूप में पहचान बनाई। उनके रिटायरमेंट पर सहयोगियों ने उन्हें शानदार विदाई दी और पत्रकारिता में उनके योगदान को याद किया।

प्रियदर्शन की पहचान केवल एक टीवी पत्रकार के रूप में नहीं, बल्कि एक गंभीर लेखक, स्तंभकार और सांस्कृतिक विश्लेषक के रूप में भी है। साहित्य, सिनेमा, राजनीति, समाज और मीडिया जैसे विषयों पर उनकी गहरी पकड़ है। उनकी लेखन शैली में तथ्यपरकता, भाषा की सादगी और विषय की गहराई का संतुलित मेल देखने को मिलता है।

यह भी पढ़ें: NDTV से प्रियदर्शन के रिटायरमेंट पर भावुक हुए रवीश रंजन शुक्ला, साझा कीं यादें

मूल रूप से झारखंड की राजधानी रांची के रहने वाले प्रियदर्शन ने रांची विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया। छात्र जीवन के दौरान ही उन्होंने अखबारों के लिए लिखना शुरू कर दिया था। पढ़ाई के दिनों में वे कुछ समय तक आकाशवाणी, रांची से कैजुअल आधार पर भी जुड़े रहे।

पत्रकारिता में उनका पेशेवर सफर फ्रीलांस लेखन से शुरू हुआ। वर्ष 1993 से 1996 तक उन्होंने दिल्ली में स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम किया। इसके बाद 1996 में वे हिंदी के प्रतिष्ठित समाचारपत्र ‘जनसत्ता’ से जुड़े, जहां उन्होंने करीब सात वर्षों तक सेवाएं दीं। वर्ष 2003 में उन्होंने एनडीटीवी इंडिया का रुख किया और फिर चैनल के साथ उनकी लंबी और उल्लेखनीय पारी चली।

एनडीटीवी इंडिया में अपने कार्यकाल के दौरान प्रियदर्शन ने संपादकीय संचालन, कंटेंट निर्माण और भाषा की शुद्धता को लेकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। न्यूजरूम में उन्हें ऐसे संपादक के रूप में जाना जाता रहा, जो तथ्यों से समझौता किए बिना संवाद, बहस और नए विचारों को प्रोत्साहित करते थे। कई पीढ़ियों के पत्रकारों ने उनके साथ काम करते हुए भाषा, संपादन और पत्रकारिता की बारीकियां सीखीं।

पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य में भी प्रियदर्शन का योगदान उल्लेखनीय रहा है। अब तक उनकी 20 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जबकि उन्होंने सात पुस्तकों का अनुवाद भी किया है।

NDTV इंडिया से उनके रिटायरमेंट को हिंदी पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण अध्याय के समापन के रूप में देखा जा रहा है। मीडिया जगत के अनेक पत्रकारों, सहयोगियों और शुभचिंतकों ने उनके योगदान को याद करते हुए उन्हें नई पारी के लिए शुभकामनाएं दी हैं।

एनडीटीवी इंडिया से प्रियदर्शन के फेयरवेल की कुछ तस्वीरें आप यहां देख सकते हैं-

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए