दैनिक भास्कर की पत्रकार महिमा सिंह ने किया मानव तस्करी रैकेट का खुलासा

खोजी पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘दैनिक भास्कर’ (Dainik Bhaskar) से जुड़ीं पत्रकार महिमा सिंह इन दिनों देशभर में चर्चा का विषय बनी हुई हैं।

Last Modified:
Sunday, 10 May, 2026
Mahima Singh


खोजी पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘दैनिक भास्कर’ (Dainik Bhaskar) से जुड़ीं पत्रकार महिमा सिंह इन दिनों देशभर में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। महिमा सिंह ने बिहार में कथित तौर पर चल रहे मानव तस्करी नेटवर्क का पर्दाफाश कर एक बेहद खतरनाक और साहसिक अंडरकवर ऑपरेशन को अंजाम दिया। उनकी इस खोजी रिपोर्ट को सोशल मीडिया पर लोग निडर पत्रकारिता का बड़ा उदाहरण बता रहे हैं।

बताया जा रहा है कि यह पूरा ऑपरेशन मई 2026 की शुरुआत में किया गया, जिसे ‘ऑपरेशन ऑर्केस्ट्रा’ या ‘ऑपरेशन रेड लाइट’ नाम दिया गया। महिमा सिंह ने करीब पांच दिनों तक खुद को एक ऐसी महिला के रूप में पेश किया, जो ऑर्केस्ट्रा ग्रुप में काम की तलाश कर रही हो। इसी दौरान उन्होंने उन नेटवर्क्स के भीतर रहकर कई अहम सबूत जुटाए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस अंडरकवर मिशन के दौरान दलालों और नेटवर्क से जुड़े लोगों ने उन्हें तीन बार खरीदा और बेचा।

इस दौरान उन्हें लगातार धमकियों, डर और खतरनाक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। एक घटना में कथित तौर पर उन्हें डराने के लिए मेज पर पिस्टल तक रख दी गई थी। इसके बावजूद महिमा सिंह ने हिम्मत नहीं हारी और पूरे नेटवर्क के खिलाफ सबूत जुटाती रहीं।

महिमा सिंह की जांच में कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए। रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में कुछ तथाकथित ऑर्केस्ट्रा ग्रुप्स का इस्तेमाल नाबालिग लड़कियों की तस्करी के लिए किया जा रहा था। इन लड़कियों को पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा समेत बांग्लादेश और नेपाल सीमा से सटे इलाकों से लाने के आरोप सामने आए हैं। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि इस नेटवर्क के जरिए जबरन देह व्यापार, शारीरिक शोषण, नाबालिग लड़कियों को बड़ा दिखाने के लिए हार्मोन इंजेक्शन, जबरन गर्भधारण और नवजात बच्चों की अवैध बिक्री जैसे गंभीर अपराध किए जा रहे थे।

इस खुलासे के बाद प्रशासन में भी हड़कंप मच गया। रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद पुलिस ने सीवान और सारण समेत कई जिलों में छापेमारी की। कई एजेंट और नेटवर्क से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें एक आरोपी वह भी बताया जा रहा है, जिसने अंडरकवर ऑपरेशन के दौरान महिमा सिंह को कथित तौर पर बेचा था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस कार्रवाई के दौरान कई नाबालिग लड़कियों को भी इन नेटवर्क्स से मुक्त कराया गया।

सोशल मीडिया पर लोग महिमा सिंह की जमकर तारीफ कर रहे हैं। कई यूजर्स ने कहा कि आज के दौर में इस तरह की जमीनी और जोखिम भरी पत्रकारिता बहुत कम देखने को मिलती है। लोगों का मानना है कि महिमा सिंह की इस रिपोर्ट ने न सिर्फ एक खौफनाक अपराध नेटवर्क को उजागर किया, बल्कि कई जिंदगियां बचाने का काम भी किया है।

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Newslaundry विवाद: क्या मीडिया वॉचडॉग खुद के तय मानकों पर खरा उतर पाएगा?

डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म न्यूजलॉन्ड्री (Newslaundry) पर उसके कुछ पूर्व एम्प्लॉयीज की ओर से लगाए गए आरोपों को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा तेज है।

Last Modified:
Wednesday, 12 August, 2026
Newslaundary5412

न्यूजलॉन्ड्री पर पूर्व एम्प्लॉयीज के आरोपों से उठे सवाल, संस्था ने कहा- 2017 से POSH नियमों का कर रहे पालन

डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म न्यूजलॉन्ड्री (Newslaundry) पर उसके कुछ पूर्व एम्प्लॉयीज की ओर से लगाए गए आरोपों को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा तेज है। इन आरोपों के बीच न्यूजलॉन्ड्री ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि वह 2017 से POSH (Prevention of Sexual Harassment) कानून के तहत नियमों का पालन कर रहा है और उसके यहां इंटर्नल कम्प्लेंट्स कमेटी (ICC) भी मौजूद है।

संस्था के मुताबिक, अब तक यौन उत्पीड़न से जुड़ी चार शिकायतों पर ICC के जरिए कार्रवाई की गई है। इन मामलों में अनुशासनात्मक कार्रवाई के तौर पर एम्प्लॉयीज की बर्खास्तगी और निलंबन जैसे कदम भी उठाए गए हैं।

न्यूजलॉन्ड्री ने कहा- हमसे भी सवाल पूछे जाने चाहिए

न्यूजलॉन्ड्री ने अपने बयान में कहा कि POSH नियमों का पालन करने का यह मतलब नहीं है कि संस्था बेहतर करने की कोशिश नहीं कर सकती। उसने अपने साथ जुड़े लोगों, जिसमें पूर्व एम्प्लॉयी भी शामिल हैं, से अपनी बात और शिकायतें सीधे संस्था तक पहुंचाने की अपील की है।

संस्था ने कहा कि वह पिछले पांच दिनों से न्यूजलॉन्ड्री और उसके एम्प्लॉयीज को लेकर सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं पर नजर रख रही है। उसके मुताबिक, इस दौरान कुछ बिना आधार और गलत आरोप भी लगाए गए हैं।

न्यूजलॉन्ड्री ने यह भी कहा कि उसके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है और एम्प्लॉयीज या संस्था की ओर से हर आरोप का जवाब नहीं देना किसी तरह की कमजोरी या बचाव की कोशिश के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

‘हमने कभी खुद को परफेक्ट नहीं बताया’

अपने बयान में न्यूजलॉन्ड्री ने कहा कि उसने कभी खुद को परफेक्ट होने का दावा नहीं किया। संस्था के मुताबिक, वह लगातार सीखने और बेहतर करने की कोशिश करती रही है।

न्यूजलॉन्ड्री ने अपनी उस पुरानी सोच को भी दोहराया कि किसी को भी जांच-पड़ताल और आलोचना से ऊपर नहीं होना चाहिए, खुद न्यूजलॉन्ड्री भी नहीं। यही बात अब मौजूदा विवाद के केंद्र में आ गई है।

‘सबकी धुलाई’ के सिद्धांत की अब खुद पर कसौटी

पिछले एक दशक से ज्यादा समय में न्यूजलॉन्ड्री ने मीडिया संस्थानों, न्यूजरूम की कार्यशैली और पत्रकारिता से जुड़े नैतिक सवालों पर खुलकर बात की है। उसका चर्चित विचार रहा है कि मीडिया समेत किसी भी संस्था को सवालों और आलोचना से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए।

लेकिन पूर्व एम्प्लॉयीज के आरोपों के बाद अब यही सवाल न्यूजलॉन्ड्री के अपने न्यूजरूम को लेकर उठ रहे हैं। विवाद ने पारदर्शिता, शिकायतों की प्रक्रिया और संस्थागत जवाबदेही को लेकर बहस छेड़ दी है।

मुद्दा सिर्फ यह नहीं है कि न्यूजलॉन्ड्री को अपने बचाव में जवाब देने का अधिकार है या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि जिस पारदर्शिता, जवाबदेही और कड़ी जांच-पड़ताल की मांग संस्था लंबे समय से दूसरे मीडिया संस्थानों, कंपनियों और सार्वजनिक संस्थाओं से करती रही है, क्या वही कसौटी अब उस पर भी लागू होनी चाहिए?

फिलहाल न्यूजलॉन्ड्री ने अपनी ओर से POSH अनुपालन और चार शिकायतों पर कार्रवाई की जानकारी दी है। हालांकि, उपलब्ध बयान में पूर्व एम्प्लॉयीज की ओर से लगाए गए विशिष्ट आरोपों का विस्तृत जवाब नहीं दिया गया है। इसलिए मौजूदा विवाद में संस्था के बयान और पूर्व एम्प्लॉयीज के आरोपों के बीच तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि का सवाल अभी बना हुआ है।

 

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बिक्रम बसु बने ABD Maestro के वाइस चेयरमैन

एबीडी मेस्ट्रो (ABD Maestro) ने बिक्रम बसु (Bikram Basu) को वाइस चेयरमैन (Vice Chairman) नियुक्त किया है। वह मार्केटिंग और इनोवेशन की जिम्मेदारी भी संभालते रहेंगे।

Last Modified:
Tuesday, 11 August, 2026
bikrambasu

एबीडी मेस्ट्रो (ABD Maestro) ने बिक्रम बसु (Bikram Basu) को वाइस चेयरमैन (Vice Chairman) नियुक्त किया है। इसके साथ ही वह एबीएल ग्रुप (ABDL Group) के चीफ मार्केटिंग एंड इनोवेशन ऑफिसर (Chief Marketing and Innovation Officer) की मौजूदा जिम्मेदारी भी संभालते रहेंगे।

बिक्रम बसु अप्रैल 2025 से एबीडी मेस्ट्रो में मैनेजिंग डायरेक्टर (Managing Director) के पद पर हैं। नई जिम्मेदारी के बाद भी वह कंपनी के कामकाज की देखरेख करेंगे और एबीडीएल (ABDL) तथा एबीडी मेस्ट्रो के अलग-अलग ब्रांड्स के लिए मार्केटिंग और इनोवेशन से जुड़े काम को आगे बढ़ाएंगे।

नई लीडरशिप व्यवस्था के तहत बिक्रम बसु एबीडीएल के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर (Chief Marketing Officer) प्रदीप्ता बसु (Pradipta Basu) और एबीडी मेस्ट्रो के डायरेक्टर–मार्केटिंग एंड स्पेशल अकाउंट्स–ऑन ट्रेड (Director – Marketing and Special Accounts – On Trade) अरविंद हंगल (Arvind Hangal) के साथ मिलकर काम करेंगे।

कंपनी के मुताबिक, नई व्यवस्था से ग्रुप की मार्केटिंग टीमों के बीच बेहतर तालमेल होगा। इसके साथ मार्केटिंग क्षमताओं को एक साथ लाने, इनोवेशन को तेज करने और अलग-अलग टीमों के अच्छे तरीकों को साझा करने में मदद मिलेगी।

बिक्रम बसु ने मार्च 2015 में एलाइड ब्लेंडर्स एंड डिस्टिलर्स (Allied Blenders & Distillers) में चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (Chief Operating Officer) के तौर पर करियर शुरू किया था। इसके बाद उन्होंने ग्रुप में कई अहम जिम्मेदारियां संभालीं।

बाद में वह एबीडी मेस्ट्रो से जुड़े, जो कंपनी की सुपर-प्रीमियम और लग्जरी स्पिरिट्स (Super-premium and Luxury Spirits) के कारोबार पर फोकस करने वाली सब्सिडियरी है। अप्रैल 2025 में उन्हें एबीडी मेस्ट्रो का मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया था।

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पत्रकार राम चंद्र हत्याकांड: राम रहीम को बरी किए जाने के खिलाफ याचिका पर SC करेगा सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को पत्रकार राम चंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में बरी किए जाने को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने की मंजूरी दे दी।

Last Modified:
Tuesday, 11 August, 2026
RamRahim541

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को पत्रकार राम चंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में बरी किए जाने को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने की मंजूरी दे दी। राम रहीम फिलहाल दो महिला अनुयायियों से यौन शोषण के मामले में 20 साल की सजा काट रहा है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। पीठ ने राम रहीम के वकील आर. बसंत की उस दलील को नहीं माना, जिसमें उन्होंने कहा था कि यह बरी किए जाने का मामला है और राज्य ने इस फैसले के खिलाफ कोई अपील भी दाखिल नहीं की है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले पर विचार किए जाने की जरूरत है। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट की ओर से दर्ज की गई सजा को पलटा गया है। यह ऐसा मामला नहीं है, जिसमें हाई कोर्ट ने पहले से बरकरार रखे गए बरी होने के फैसले को फिर से पलटा हो। अदालत ने यह भी कहा कि उसे इस बात की जानकारी है कि राज्य यानी CBI इस बरी किए जाने के खिलाफ अपील नहीं करेगी।

2019 में ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद

सिरसा के पत्रकार राम चंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में जनवरी 2019 में ट्रायल कोर्ट ने गुरमीत राम रहीम को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

अब पत्रकार के बेटे और इस मामले में शिकायतकर्ता अरिंदम छत्रपति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर राम रहीम को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट से मामले से जुड़े रिकॉर्ड मंगवाए हैं। इनमें गवाहों के बयान भी शामिल हैं। अदालत अब इस मामले की अंतिम सुनवाई नवंबर के आखिरी सप्ताह में करेगी।

मुख्य गवाह की गवाही पर उठे सवाल

राम रहीम की ओर से पेश वकील आर. बसंत ने अदालत में कहा कि हाई कोर्ट ने साफ तौर पर माना था कि मामले के मुख्य गवाह पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं किया जा सकता।

इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि वह मुख्य गवाह की गवाही से जुड़े विशेष परिस्थितियों और इस बात की जांच करेगी कि उसकी गवाही का सही तरीके से मूल्यांकन किया गया था या नहीं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जिस मुख्य गवाह का जिक्र कर रहा है, वह राम रहीम का पूर्व ड्राइवर है।

याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट के फैसले पर उठाए सवाल

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि हाई कोर्ट ने राम चंद्र छत्रपति की हत्या की साजिश के अस्तित्व को लेकर ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष को बरकरार रखा था। साथ ही, तीन अन्य आरोपियों को IPC की धारा 120-B और धारा 302 के तहत दोषी ठहराए जाने को भी बरकरार रखा गया था।

याचिकाकर्ता का आरोप है कि इसके बावजूद हाई कोर्ट इस नतीजे पर पहुंच गया कि बाबा गुरमीत सिंह यानी गुरमीत राम रहीम की हत्या की साजिश में भागीदारी साबित नहीं हुई है। याचिकाकर्ता ने इसी निष्कर्ष को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

स्थानीय पुलिस की जांच पर उठे थे सवाल

राम चंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में स्थानीय पुलिस की जांच में कुछ कमियां सामने आने के बाद पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने नवंबर 2003 में मामले की जांच CBI को सौंप दी थी। यह हत्या होने के करीब एक साल बाद का मामला था।

CBI ने इसके बाद मामले की जांच की और आगे की कानूनी कार्रवाई हुई।

अब सुप्रीम कोर्ट यह देखेगा कि गुरमीत राम रहीम को बरी किए जाने के हाई कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी या तथ्यात्मक गलती हुई थी या नहीं। मामले की अगली और अंतिम सुनवाई नवंबर के आखिरी सप्ताह में होने की उम्मीद है।

 

 

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फेक न्यूज रोकने के लिए बहु-एजेंसी व्यवस्था चाहती है संसदीय समिति

संसदीय स्थायी समिति ने फर्जी खबरों पर रोक के लिए स्वतंत्र निगरानी निकाय बनाने की सिफारिश की है। समिति ने AI जनित कंटेंट और सोशल मीडिया पर कड़ी निगरानी की जरूरत बताई।

Last Modified:
Friday, 07 August, 2026
PIBfactcheck

संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee on Communications and Information Technology) ने केंद्र सरकार से फर्जी खबरों (Fake News) से निपटने के लिए एक स्वतंत्र और केंद्रीकृत संस्थागत व्यवस्था बनाने की मांग दोहराई है। 6 अगस्त को संसद में पेश अपनी 'एक्शन टेकन रिपोर्ट' (Action Taken Report) में समिति ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था तेजी से बदलते मीडिया परिदृश्य के लिए पर्याप्त नहीं है।

समिति ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (Ministry of Information and Broadcasting-MIB), इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (Ministry of Electronics and Information Technology-MeitY), मीडिया संगठनों और अन्य संबंधित पक्षों को शामिल करते हुए एक विशेष निगरानी निकाय या टास्क फोर्स गठित करने की सिफारिश की है। समिति का मानना है कि यह निकाय फर्जी खबरों की जांच कर आवश्यक दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश करने में सक्षम होना चाहिए।

रिपोर्ट में कहा गया है कि फर्जी खबरें अब प्रिंट, टेलीविजन, डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence-AI) से तैयार कंटेंट के जरिए तेजी से फैल रही हैं। ऐसे में केवल प्रेस सूचना ब्यूरो (Press Information Bureau-PIB) की फैक्ट चेक यूनिट (Fact Check Unit-FCU) पर निर्भर रहने के बजाय बहु-एजेंसी व्यवस्था विकसित करना आवश्यक है। समिति ने PIB FCU के कामकाज में अधिक पारदर्शिता लाने की भी मांग की है और वर्ष 2019 से अब तक प्राप्त शिकायतों, उनके निपटान और सफलता दर का विस्तृत ब्यौरा मांगा है।

समिति ने AI जनित फर्जी सामग्री को उभरती हुई बड़ी चुनौती बताते हुए ऐसी सामग्री की अनिवार्य लेबलिंग, संभावित लाइसेंसिंग व्यवस्था, मीडिया संस्थानों में फैक्ट-चेकिंग तंत्र, आंतरिक लोकपाल, मीडिया साक्षरता कार्यक्रम और सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही बढ़ाने जैसे कई संरचनात्मक सुधारों की भी सिफारिश की है। समिति का कहना है कि भविष्य में फर्जी खबरों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए स्थायी और बहु-एजेंसी नियामकीय ढांचे की आवश्यकता होगी।

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पिछले एक साल में प्रसार भारती की संपादकीय स्वतंत्रता को लेकर नहीं मिली कोई शिकायत: सरकार

यह जानकारी लोकसभा में सूचना एवं प्रसारण तथा संसदीय कार्य राज्य मंत्री एल. मुरुगन ने सांसद अधिवक्ता प्रिया सरोज और पुष्पेंद्र सरोज के सवाल के लिखित जवाब में दी।

Last Modified:
Friday, 07 August, 2026
PrasarBharati741

केंद्र सरकार ने कहा है कि पिछले एक वर्ष के दौरान प्रसार भारती की संपादकीय स्वतंत्रता (Editorial Autonomy), नियुक्तियों या सार्वजनिक प्रसारण सेवाओं के कामकाज को लेकर पत्रकारों, कर्मचारियों या किसी मीडिया संगठन की ओर से कोई शिकायत या औपचारिक प्रस्तुति (Representation) प्राप्त नहीं हुई है।

यह जानकारी लोकसभा में सूचना एवं प्रसारण तथा संसदीय कार्य राज्य मंत्री एल. मुरुगन ने सांसद अधिवक्ता प्रिया सरोज और पुष्पेंद्र सरोज के सवाल के लिखित जवाब में दी।

BIND योजना को 2027 तक बढ़ाया गया

सरकार ने बताया कि देश में प्रसार भारती के प्रसारण ढांचे के विकास, आधुनिकीकरण और उन्नयन के लिए Broadcasting Infrastructure and Network Development (BIND) योजना चलाई जा रही है। यह केंद्रीय क्षेत्र की योजना वर्ष 2021-26 के लिए मंजूर की गई थी, जिसे अब 31 मार्च 2027 तक बढ़ा दिया गया है।

सरकार के अनुसार, इस योजना के तहत आवंटित बजट, वास्तविक खर्च और राजस्व से जुड़ी जानकारी प्रसार भारती की वेबसाइट पर उपलब्ध है।

संपादकीय मामलों की नियमित समीक्षा

सरकार ने कहा कि समाचारों की गुणवत्ता, सटीकता, निष्पक्षता और प्रस्तुति सुनिश्चित करने के लिए संपादकीय मामलों की नियमित समीक्षा Editor-in-Chief और वरिष्ठ संपादकीय टीम करती है। जरूरत पड़ने पर समाचारों की गुणवत्ता सुधारने और प्रसार भारती की संपादकीय नीति तथा प्रोग्राम कोड का पालन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश और सुधारात्मक कदम भी उठाए जाते हैं।

सरकार ने बताया कि दर्शकों की ओर से मिलने वाली शिकायतों और सुझावों, जिनमें संपादकीय सामग्री से जुड़ी शिकायतें भी शामिल होती हैं, उन्हें संबंधित संपादकीय टीम के पास भेजा जाता है, जहां निर्धारित नीति के अनुसार कार्रवाई की जाती है।

नियुक्तियों से जुड़ी 7 शिकायतें मिलीं

सरकार के अनुसार, पिछले एक वर्ष में संपादकीय स्वतंत्रता या कार्यप्रणाली से जुड़ी कोई शिकायत नहीं मिली, लेकिन नियुक्तियों से संबंधित 7 शिकायतें आवेदकों की ओर से प्राप्त हुई थीं।

आकाशवाणी की पहुंच 98% आबादी तक

सरकार ने बताया कि आकाशवाणी (Akashvani) की पहुंच देश की लगभग 98 प्रतिशत आबादी और 90 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र तक है। वहीं, DD Free Dish देश के किसी भी हिस्से में बिना किसी सब्सक्रिप्शन शुल्क के देखा जा सकता है।

दर्शकों की प्रतिक्रिया के आधार पर होता है सुधार

सरकार ने कहा कि प्रसार भारती नियमित रूप से दर्शकों की संख्या (Viewership Data), लोगों की प्रतिक्रिया और सोशल मीडिया एनालिटिक्स की समीक्षा करता है। इन आंकड़ों और सुझावों के आधार पर समाचारों की गुणवत्ता, कंटेंट और प्रस्तुति में लगातार सुधार किया जाता है, ताकि दर्शकों को बेहतर और संतुलित समाचार उपलब्ध कराए जा सकें।

 

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'प्रीतीश नंदी कम्युनिकेशन लिमिटेड' का बदलेगा नाम, जल्द इस नाम से जानी जाएगी कंपनी

प्रीतीश नंदी कम्युनिकेशन लिमिटेड (Pritish Nandy Communications Limited) के शेयरधारकों ने कंपनी का नाम बदलने के प्रस्ताव को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है।

Last Modified:
Friday, 07 August, 2026
Pritish Nandy Communications Limited

प्रीतीश नंदी कम्युनिकेशन लिमिटेड (Pritish Nandy Communications Limited) के शेयरधारकों ने कंपनी का नाम बदलने के प्रस्ताव को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। अब कंपनी का नया नाम PNC Media and Entertainment Limited होगा। 5 अगस्त 2026 को इस फैसले पर मुहर लगने के साथ ही कंपनी ने अपनी नई पहचान की दिशा में बड़ा कदम बढ़ा दिया है। कंपनी का कहना है कि नया नाम उसके मीडिया और मनोरंजन कारोबार को पहले से बेहतर तरीके से दर्शाएगा।

कंपनी के अनुसार, नाम बदलने के प्रस्ताव के पक्ष में 99.98 फीसदी वैध वोट पड़े। इस भारी समर्थन को निवेशकों के कंपनी की नई रणनीति और भविष्य की योजनाओं पर भरोसे के रूप में देखा जा रहा है।

यह मतदान SEBI (लिस्टिंग ऑब्लिगेशंस एंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्स) रेगुलेशंस, 2015 के तहत पोस्टल बैलेट और रिमोट ई-वोटिंग के जरिए कराया गया। ई-वोटिंग प्रक्रिया 7 जुलाई 2026 से शुरू हुई थी और 5 अगस्त 2026 को समाप्त हुई। पूरी प्रक्रिया की निगरानी प्रैक्टिसिंग कंपनी सेक्रेटरी विनायक एन. देवधर ने स्क्रूटिनाइजर के रूप में की।

इस दौरान शेयरधारकों के सामने तीन विशेष प्रस्ताव रखे गए। इनमें कंपनी का नाम बदलकर PNC Media and Entertainment Limited करना, मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन (MOA) में नाम से जुड़े क्लॉज में संशोधन करना और आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (AOA) में भी नए नाम को शामिल करना शामिल था। तीनों प्रस्ताव लगभग समान समर्थन के साथ पारित हो गए।

कंपनी की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, कट-ऑफ तारीख तक उसके कुल 10,730 शेयरधारक थे। इनमें से 76 शेयरधारकों ने मतदान में हिस्सा लिया। वोटिंग करने वाले निवेशकों के पास कुल 96.73 लाख शेयर थे, जिनमें से 99.98 फीसदी यानी 96,71,518 शेयर नाम बदलने के पक्ष में रहे। केवल 1,685 शेयर, यानी 0.02 फीसदी, प्रस्ताव के विरोध में पड़े। कोई भी वोट अमान्य घोषित नहीं हुआ।

कंपनी के प्रमोटर और प्रमोटर समूह, जिनके पास 86.39 लाख शेयर हैं, ने भी सर्वसम्मति से नाम बदलने के प्रस्ताव का समर्थन किया। वहीं, सार्वजनिक निवेशकों का भी लगभग पूरा समर्थन कंपनी को मिला।

स्क्रूटिनाइजर की रिपोर्ट में पुष्टि की गई है कि सभी प्रस्ताव आवश्यक बहुमत से पारित हो चुके हैं। इसके बाद कंपनी ने इस फैसले की जानकारी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) को भी दे दी है, जहां कंपनी PNC सिंबल के तहत सूचीबद्ध है।

अब शेयरधारकों की मंजूरी मिलने के बाद कंपनी नाम परिवर्तन से जुड़ी सभी कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी करेगी। इसके तहत वैधानिक रिकॉर्ड में संशोधन किया जाएगा और संबंधित नियामक संस्थाओं को इसकी जानकारी दी जाएगी।

कंपनी का मानना है कि PNC Media and Entertainment Limited नाम अपनाने से उसकी ब्रैंड पहचान और मजबूत होगी तथा मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र में उसकी मौजूदगी को नई पहचान मिलेगी। साथ ही, इससे कंपनी की कारोबारी दिशा और सार्वजनिक छवि उसके मुख्य व्यवसाय के अनुरूप और स्पष्ट दिखाई देगी।

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बनारस की आध्यात्मिक चेतना को स्वर देता मनोज भावुक का भोजपुरी भक्ति गीत, हुआ वायरल

सावन के पावन महीने में भगवान शिव और काशी की महिमा पर आधारित भोजपुरी भक्ति गीत 'हे भोले बाबा, मनवा के हमरा बनारस बना दs' तेजी से लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहा है।

Last Modified:
Thursday, 06 August, 2026
BholeBaba985

सावन के पावन महीने में भगवान शिव और काशी की महिमा पर आधारित भोजपुरी भक्ति गीत 'हे भोले बाबा, मनवा के हमरा बनारस बना दs' तेजी से लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहा है। Bhojpuri IT Cell के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर रिलीज हुए इस गीत को पहले ही दिन पांच लाख से ज्यादा बार देखा गया। यह गीत बनारस को केवल एक शहर नहीं, बल्कि भक्ति, आध्यात्मिक चेतना और मुक्ति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करता है।

इस गीत के बोल भोजपुरी के प्रसिद्ध साहित्यकार और गीतकार मनोज भावुक ने लिखे हैं। इसे सुरभि कश्यप और अर्जुन पांडेय ने अपनी आवाज दी है। संगीत भोजपुरी फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार रजनीश मिश्रा का है। गीत की परिकल्पना आस्था द्विवेदी ने की है। वीडियो का निर्देशन सुमित तिवारी ने किया है, जबकि छायांकन सुधांशु सिंह ने किया है। वीडियो का निर्माण वन शॉट फिल्म्स के बैनर तले हुआ है और इसके निर्माता शैलेंद्र द्विवेदी हैं।

गीत के बारे में बात करते हुए मनोज भावुक ने कहा कि यह सिर्फ एक भक्ति गीत नहीं, बल्कि बनारस की उस जीवन-दृष्टि को समर्पित रचना है, जहां शिवत्व, करुणा, वैराग्य और जीवन का उत्सव एक साथ दिखाई देता है। उन्होंने बताया कि इस गीत के माध्यम से महादेव से प्रार्थना की गई है कि हर व्यक्ति के भीतर भी ऐसा 'बनारस' बस जाए, जहां मन को शांति, संतुलन और आत्मिक आनंद मिल सके।

गीत का मुखड़ा है—

"हे भोले बाबा, हे शंभु बाबा, मनवा के हमरा बनारस बना दs,
दुख हो या सुख हो, मस्ती में राखs, जिनगी के नइया पार लगा दs..."

गीत के अंतरों में काशी विश्वनाथ मंदिर, मणिकर्णिका घाट, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे भारतीय दर्शन के मूल तत्वों का उल्लेख किया गया है। साथ ही लंका चौराहे के प्रतीक के जरिए जीवन के संघर्ष और आध्यात्मिक मार्ग को सरल भोजपुरी भाषा में प्रस्तुत किया गया है।

मनोज भावुक का कहना है कि बनारस केवल एक शहर नहीं, बल्कि मनुष्य की आंतरिक चेतना की वह अवस्था है, जहां भक्ति और वैराग्य का संतुलन मिलता है। उनका मानना है कि भोजपुरी में बनारस की आध्यात्मिक परंपरा पर अपेक्षाकृत कम गीत लिखे गए हैं और यह रचना उसी दिशा में एक विनम्र प्रयास है।

मनोज भावुक और संगीतकार रजनीश मिश्रा की जोड़ी इससे पहले 'तोर बउरहवा रे माई', 'आपन कहाये वाला के बा', 'दुलहिनिया नाच नचावे' और 'मेरे राम' जैसे कई चर्चित गीत दे चुकी है।

मनोज भावुक ने कहा कि भोजपुरी संगीत की पहचान सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं है। इसकी समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को नए गीतों के जरिए सामने लाना समय की जरूरत है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह गीत शिवभक्तों के साथ-साथ साहित्य और संगीत के गंभीर श्रोताओं के दिलों को भी जरूर छुएगा।

 

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विक्रम सोलर ने हंसवीन कौर को बनाया हेड ऑफ मार्केटिंग

विक्रम सोलर (Vikram Solar) ने हंसवीन कौर (Hansveen Kaur) को Head of Marketing नियुक्त किया है। वह लगभग दो दशक का मार्केटिंग अनुभव लेकर कंपनी से जुड़ी हैं।

Last Modified:
Thursday, 06 August, 2026
vikramsolar

विक्रम सोलर (Vikram Solar) ने हंसवीन कौर (Hansveen Kaur) को हेड ऑफ मार्केटिंग (Head of Marketing) नियुक्त किया है। वह ईजीनोम.एआई (eGenome.ai) और बी'स्पोक वेलनेस (B'spoke Wellness) में वाइस प्रेसिडेंट–ब्रांड मार्केटिंग (Vice President – Brand Marketing) के पद से नई भूमिका में पहुंची हैं।

अपने पिछले कार्यकाल में हंसवीन कौर ने एआई आधारित प्रिवेंटिव हेल्थकेयर प्लेटफॉर्म (AI-driven Preventive Healthcare Platform) eGenome.ai और इसकी पर्सनलाइज्ड न्यूट्रिशन शाखा B'spoke Wellness के लिए ब्रांड रणनीति का नेतृत्व किया।

इससे पहले वह दो वर्षों तक वोल्टास बेको (Voltas Beko) में हेड ऑफ ब्रांड मैनेजमेंट एंड डिजिटल मार्केटिंग (Head of Brand Management & Digital Marketing) के रूप में कार्यरत रहीं। उनके पास मार्केटिंग क्षेत्र में लगभग दो दशक का अनुभव है।

अपने करियर के दौरान हंसवीन कौर ने एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स (LG Electronics), वीडियोकॉन (Videocon), इंगरसोल रैंड (Ingersoll Rand) और मॉम्सप्रेसो (Momspresso) जैसी कंपनियों में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं। विक्रम सोलर के साथ उनकी यह नियुक्ति स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) क्षेत्र में उनकी पहली पेशेवर पारी होगी।

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संसद में MIB का जवाब : प्रसार भारती की स्वायत्तता पर कोई शिकायत नहीं

केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि पिछले एक वर्ष में प्रसार भारती की स्वायत्तता या संपादकीय कार्यप्रणाली को लेकर कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली।

Last Modified:
Wednesday, 05 August, 2026
prasarbharti

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने संसद को बताया है कि पिछले एक वर्ष के दौरान सार्वजनिक प्रसारकों की स्वायत्तता, नियुक्तियों या संपादकीय कार्यप्रणाली को लेकर किसी पत्रकार, कर्मचारी या मीडिया संगठन की ओर से कोई औपचारिक शिकायत या प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं हुआ। लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन ने कहा कि प्रसार भारती में संपादकीय निर्णयों की नियमित रूप से समीक्षा की जाती है, ताकि वे संपादकीय नीतियों और प्रोग्राम कोड के अनुरूप रहें।

सरकार ने यह भी जानकारी दी कि ब्रॉडकास्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर एंड नेटवर्क डेवलपमेंट (BIND) योजना को 31 मार्च 2027 तक बढ़ा दिया गया है। इस योजना का उद्देश्य देशभर में प्रसार भारती के प्रसारण ढांचे का आधुनिकीकरण और विस्तार करना है।

मंत्रालय के अनुसार, दर्शकों की शिकायतों और सुझावों को संबंधित संपादकीय टीमों के पास कार्रवाई के लिए भेजा जाता है तथा समाचारों की गुणवत्ता, सटीकता, संतुलन और प्रस्तुति में सुधार के लिए नियमित समीक्षा की जाती है। हालांकि, सरकार ने संपादकीय पक्षपात या स्वतंत्रता से जुड़ी शिकायतों की संख्या या आंतरिक जांच के निष्कर्ष साझा नहीं किए।

मंत्रालय ने बताया कि नियुक्तियों से संबंधित केवल सात शिकायतें प्राप्त हुईं, जबकि स्वायत्तता या संपादकीय स्वतंत्रता से जुड़ी कोई शिकायत नहीं आई। सरकार के अनुसार, आकाशवाणी देश की लगभग 98% आबादी और 90% भौगोलिक क्षेत्र तक पहुंच रखती है, जबकि डीडी फ्री डिश देश का सबसे बड़ा मुफ्त डीटीएच प्लेटफॉर्म बना हुआ है।

मंत्रालय ने कहा कि प्रसार भारती नियमित रूप से दर्शकों के फीडबैक, व्यूअरशिप डेटा और सोशल मीडिया विश्लेषण के आधार पर अपने कार्यक्रमों में सुधार करता है। हालांकि, सरकार ने सार्वजनिक प्रसारकों की विश्वसनीयता, दर्शक हिस्सेदारी या प्रदर्शन से जुड़े किसी स्वतंत्र सर्वेक्षण या ऑडिट का विवरण संसद में उपलब्ध नहीं कराया।

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मीडिया की निष्पक्षता पर बहस नई नहीं, हर दौर में उठे विश्वसनीयता के सवाल: वाशिंद्र मिश्र

न्यूज इंडिया 24X7 के डायरेक्टर (न्यूज) वाशिंद्र मिश्र ने कहा कि मीडिया की निष्पक्षता, विश्वसनीयता और पत्रकारिता के तौर-तरीकों पर जो बहस आज हो रही है, वह नई नहीं है।

Last Modified:
Wednesday, 05 August, 2026
VashindraMishra541

समाचार4मीडिया के 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में न्यूज इंडिया 24X7 के डायरेक्टर (न्यूज) वाशिंद्र मिश्र ने कहा कि मीडिया की निष्पक्षता, विश्वसनीयता और पत्रकारिता के तौर-तरीकों पर जो बहस आज हो रही है, वह नई नहीं है। उनके मुताबिक, पत्रकारिता के लगभग हर दौर में ऐसे सवाल उठते रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज जंतर-मंतर की घटना को लेकर जिस तरह की चर्चा हो रही है, वैसी ही बहसें पहले भी कई बड़े घटनाक्रमों के बाद होती रही हैं, लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है और पत्रकारिता फिर आगे बढ़ जाती है।

उन्होंने कहा कि वह कार्यक्रम में थोड़ी देर से पहुंचे क्योंकि बारिश की वजह से रास्ते में देर हो गई थी। सुबह से लगातार जंतर-मंतर की घटना पर चर्चा हो रही थी और कई वरिष्ठ पत्रकार इस विषय पर अपनी बात रख चुके थे। इसी वजह से उन्होंने अपनी बात वर्तमान से नहीं, बल्कि अतीत से शुरू करने का फैसला किया।

वाशिंद्र मिश्र ने कहा कि वह सभी को वर्ष 1989 में ले जाना चाहते हैं, जब अयोध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान गोलीबारी हुई थी। उस घटना में कई लोगों की जान गई थी और कई लोग घायल हुए थे। उन्होंने बताया कि उस समय देश में प्रिंट मीडिया का दौर था। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत अंग्रेजी अखबारों से की थी और करीब 18 वर्षों तक टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स और अमर उजाला जैसे संस्थानों में काम किया। इसलिए उन्होंने उस दौर की पत्रकारिता को बहुत करीब से देखा है।

उन्होंने कहा कि उस समय न सोशल मीडिया था और न ही आज जैसी डिजिटल तकनीक। मौके पर मौजूद पत्रकार ही घटनाओं की रिपोर्टिंग करते थे और पूरी दुनिया की नजर उन्हीं की खबरों पर होती थी। इसी दौरान कुछ भारतीय मीडिया संस्थानों ने अयोध्या गोलीकांड की रिपोर्टिंग करते हुए यह खबर प्रकाशित की कि इतने लोग मारे गए कि सरयू नदी का पानी खून से लाल हो गया। यह खबर बड़े-बड़े बैनर हेडलाइन के रूप में प्रकाशित हुई।

वाशिंद्र मिश्र ने बताया कि उस समय प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया काफी प्रभावशाली संस्था मानी जाती थी। सरकार और कई अन्य संगठनों ने प्रेस काउंसिल में शिकायत की कि इस तरह की रिपोर्टिंग से समाज में गलत संदेश जा रहा है और तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। इसके बाद इस पूरे मामले की लंबे समय तक जांच हुई। एडिटर्स गिल्ड सहित कई पक्षों ने अपनी-अपनी बात रखी और इस मुद्दे पर वर्षों तक बहस चलती रही।

उन्होंने कहा कि आखिरकार उस बहस का भी वही हुआ जो आज जंतर-मंतर की घटना को लेकर हो रही चर्चा का भविष्य हो सकता है। कुछ समय बाद लोग उस घटना को भी भूल गए और पत्रकारिता आगे बढ़ गई।

अपने संबोधन में वाशिंद्र मिश्र ने वर्ष 1992 की अयोध्या घटना का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जब बाबरी मस्जिद या विवादित ढांचा गिराया गया, तब वहां रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को भीड़ ने पकड़-पकड़कर पीटा। कई पत्रकार गंभीर रूप से घायल हुए। इस घटना की पूरे देश और दुनिया में निंदा हुई। इस पर भी कई वर्षों तक सेमिनार, संगोष्ठियां और बहसें होती रहीं, लेकिन धीरे-धीरे लोग इस घटना को भी भूल गए और पत्रकारिता का सफर आगे बढ़ता रहा।

उन्होंने कहा कि इसके बाद पत्रकारिता में पेड न्यूज का दौर आया। चुनावों के दौरान पैसे लेकर खबरें प्रकाशित करने और उम्मीदवारों या राजनीतिक दलों के पक्ष में सामग्री छापने को लेकर देशभर में बड़ी बहस छिड़ गई। इस मुद्दे को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी गंभीरता से लिया। इसके लिए अलग-अलग समितियां बनाई गईं और कई संस्थाओं ने इस विषय पर चर्चा और सेमिनार आयोजित किए।

वाशिंद्र मिश्र ने कहा कि जिन मीडिया संस्थानों के मालिकों और संपादकों पर पेड न्यूज के आरोप लगे या जो इस मामले में पकड़े गए, उनके प्रभाव या स्थिति पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा। वे उस समय भी प्रभावशाली थे और आज भी अपनी जगह बने हुए हैं।

उन्होंने कहा कि इसके बाद जब टीवी पत्रकारिता का दौर तेजी से आगे बढ़ा तो वह खुद 1999 में अखबार छोड़कर टीवी मीडिया में आ गए। कुछ वर्षों बाद टीवी पत्रकारिता को लेकर शिकायतें आने लगीं कि कई चैनल जिम्मेदार पत्रकारिता के मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं और गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग से माहौल खराब हो रहा है।

उन्होंने बताया कि इन्हीं शिकायतों को देखते हुए टीवी समाचार चैनलों के लिए एनबीएसए (News Broadcasting Standards Authority) जैसी नियामक संस्था बनाई गई। बाद में इसके स्वरूप में बदलाव हुआ और यह एनबीडीए (News Broadcasters & Digital Association) के रूप में सामने आई।

वाशिंद्र मिश्र ने कहा कि इन संस्थाओं में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को अध्यक्ष बनाया जाता था। समाज के विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित विशेषज्ञ और वरिष्ठ संपादक भी इन समितियों का हिस्सा होते थे। हर बैठक में उन समाचार चैनलों और संपादकों की शिकायतों पर सुनवाई होती थी जिन्होंने मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट का उल्लंघन किया होता था।

उन्होंने बताया कि नियमों का उल्लंघन करने वाले चैनलों और संपादकों को फटकार लगाई जाती थी और उन पर प्रतीकात्मक जुर्माना भी लगाया जाता था। लेकिन बैठक खत्म होने के बाद कई बार वही संस्थान फिर पहले जैसी गलतियां दोहराने लगते थे और अगली बैठक में फिर उन्हें नोटिस और फटकार का सामना करना पड़ता था।

वाशिंद्र मिश्र ने कहा कि बाद में जब डिजिटल मीडिया तेजी से बढ़ा तो यह मांग उठी कि डिजिटल प्लेटफॉर्म को भी इस व्यवस्था में शामिल किया जाए। इसके बाद नियामक व्यवस्था का विस्तार किया गया और डिजिटल मीडिया को भी उसके दायरे में लाया गया।

उन्होंने कहा कि वह खुद को इस मामले में सौभाग्यशाली मानते हैं क्योंकि उन्हें प्रिंट, टीवी और डिजिटल- तीनों दौर की पत्रकारिता को करीब से देखने और इन नियामक समितियों में संपादक के रूप में सदस्य रहने का अवसर मिला। उनके मुताबिक, आज टीवी और सोशल मीडिया में कितनी जिम्मेदार पत्रकारिता हो रही है, इस पर चर्चा लगातार हो रही है, लेकिन पत्रकारिता की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर सवाल कोई नई बात नहीं है। यह बहस दशकों से चलती आ रही है और समय के साथ सिर्फ उसका स्वरूप बदलता रहा है।

वाशिंद्र मिश्र ने आगे कहा कि मीडिया की निष्पक्षता, विश्वसनीयता और किसी सरकार के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने को लेकर जो बहस आज हो रही है, वह कोई नई बात नहीं है। उनके मुताबिक, पत्रकारिता में आने के बाद से ही वह इस तरह की चर्चाएं सुनते और देखते आए हैं। समय के साथ केवल बहस का स्वरूप बदला है, लेकिन सवाल वही बने हुए हैं।

उन्होंने कहा कि आज 'गोदी मीडिया' और 'दरबारी मीडिया' जैसे शब्दों का इस्तेमाल खूब होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अपने न्यूजरूम या अपनी लेखनी में कभी 'गोदी मीडिया' जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते। हालांकि कार्यक्रम में इस विषय का जिक्र हुआ, इसलिए उन्होंने उसी संदर्भ में अपनी बात रखी।

वाशिंद्र मिश्र ने पूरे सम्मान के साथ कहा कि आज जिन वरिष्ठ पत्रकारों की चर्चा होती है, उनमें से कई ऐसे भी रहे हैं जिन्होंने पहले की सरकारों के दौर में सत्ता के पक्ष में लगातार लिखा। उस समय प्रिंट मीडिया का प्रभाव सबसे ज्यादा था और अनेक पत्रकार सरकारों के समर्थन में लेख लिखते थे। उन्होंने कहा कि वह पूरे देश के ऐसे दर्जनों उदाहरण दे सकते हैं।

उन्होंने कहा कि उस दौर में भी सत्ता के करीब रहने वाले पत्रकारों को पद्मश्री, पद्म विभूषण जैसे सम्मान दिए गए। इतना ही नहीं, उन्हें विभिन्न सरकारी नियामक संस्थाओं में नामित किया गया और कई पत्रकारों को विधान परिषद (एमएलसी) तथा राज्यसभा का सदस्य भी बनाया गया। उन्होंने कहा कि यह सिलसिला सिर्फ पहले नहीं था, बल्कि 2014 के बाद भी कई संपादकों और मीडिया मालिकों को राज्यसभा सहित विभिन्न जिम्मेदारियां मिली हैं।

वाशिंद्र मिश्र ने बिहार और झारखंड में सामने आए चारा घोटाले का जिक्र करते हुए कहा कि उस मामले को उजागर करने वाले कुछ पत्रकार बाद में राज्यसभा भी पहुंचे। उन्होंने किसी का नाम लेने से इनकार किया, लेकिन कहा कि ऐसे लोग आज भी राज्यसभा में मौजूद हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या उन्हें केवल निष्पक्ष पत्रकारिता के कारण यह जिम्मेदारी मिली या उसके पीछे अन्य कारण भी थे। उनका कहना था कि यह सवाल हर दौर में पूछा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि दूसरी ओर ऐसे भी अनेक पत्रकार हैं जिन्होंने पूरी ईमानदारी और निष्पक्षता से पत्रकारिता की, लेकिन आज उनके सामने सबसे बड़ा संकट अपने अस्तित्व और रोजगार का है। उन्हें नौकरी तक नहीं मिल रही है। अगर वे पूरी ईमानदारी से काम करना चाहें तो कई संस्थानों में उन्हें काम करने ही नहीं दिया जाता।

उन्होंने कहा कि आज नैतिकता, पत्रकारिता के मूल्यों और मीडिया को सही दिशा देने की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोगों का भी रिकॉर्ड देखा जाना चाहिए। यह देखना जरूरी है कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कैसे की थी और बाद में वे राज्यसभा या अन्य बड़े पदों तक कैसे पहुंचे। उन्होंने कहा कि यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि क्या वे पूरी तरह निष्पक्ष पत्रकारिता के दम पर वहां पहुंचे या उसके पीछे अन्य कारण भी रहे।

वाशिंद्र मिश्र ने कहा कि वह ऐसे कई नेताओं और अधिकारियों को जानते हैं जो वास्तव में निष्पक्ष पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों से दूरी बनाकर रखते हैं। ऐसे पत्रकारों को कई बार उनके दफ्तरों और घरों तक में प्रवेश नहीं मिलता। राजनीतिक दल भी ऐसे पत्रकारों से दूरी बनाए रखते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यदि कोई पत्रकार पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटा चुका है तो वह भविष्य में भी किसी के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है।

उन्होंने बताया कि वह कई ऐसे पत्रकारों को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं जिन्होंने नेताओं और अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जनहित याचिकाएं (PIL) दायर कीं। बाद में सरकारें बदल गईं, लेकिन नए सत्ता पक्ष ने भी अपने लोगों से कहा कि ऐसे पत्रकारों से दूरी बनाए रखें क्योंकि वे किसी के भी खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि वास्तव में निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारिता से केवल नेता या अधिकारी ही नहीं, बल्कि पूरा सिस्टम असहज हो जाता है। व्यवस्था को अक्सर ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो किसी न किसी पक्ष के साथ खड़े हों। लेकिन जो पत्रकार बीच का रास्ता अपनाकर सच को सच और गलत को गलत कहने की कोशिश करता है, वह न पहले पसंद किया जाता था और न आज पसंद किया जाता है।

वाशिंद्र मिश्र ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि 2014 से पहले वह और वरिष्ठ पत्रकार सुधीर एक ही मीडिया समूह में साथ काम करते थे। उस समय वह समूह के सभी क्षेत्रीय चैनलों के संपादक थे, जबकि सुधीर उसी समूह के राष्ट्रीय चैनल के संपादक थे। उन्होंने संस्थान का नाम नहीं लिया, लेकिन कहा कि उस दौर को उन्होंने बहुत करीब से देखा है।

उन्होंने कहा कि 2014 से पहले एक बड़ा नैरेटिव तैयार किया गया था कि असली आजादी तब मिलेगी जब सरकार बदलेगी। यह कहा गया कि 1947 से लेकर 2014 तक देश को गरीबी, बेरोजगारी और अव्यवस्था से वास्तविक मुक्ति नहीं मिली है। मीडिया के एक बड़े हिस्से ने भी इसी नैरेटिव को आगे बढ़ाया और उसे मजबूत करने का काम किया।

उन्होंने कहा कि अब सवाल यह है कि 2014 के बाद जिस बदलाव की बात कही गई थी, उसका रिपोर्ट कार्ड कौन तैयार करेगा। यह भी पूछा जाना चाहिए कि जिन वादों और अभियानों को आगे बढ़ाया गया था, उनमें से कितना पूरा हुआ, कितना बाकी है और जिन लक्ष्यों की बात की गई थी, उन्हें हासिल करने में अभी कितना समय लगेगा। उनके मुताबिक, यदि पहले की सरकारों का मूल्यांकन हो सकता है तो बाद की सरकारों का भी उसी पैमाने पर आकलन होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आज का दौर अवसरों का अधिकतम लाभ उठाकर अपना-अपना एजेंडा आगे बढ़ाने का दौर बन गया है। 2014 से पहले विपक्ष में रही पार्टियों ने जो बड़े-बड़े वादे किए थे, उनका भी रिपोर्ट कार्ड आज जनता के सामने है। उसी तरह 1947 से 2014 तक सत्ता में रही सरकारों का मूल्यांकन भी लोगों के सामने है। उनका मानना है कि यही स्थिति मीडिया पर भी लागू होती है।

वाशिंद्र मिश्र ने कहा कि उन्हें निकट भविष्य में कोई बहुत बड़ा क्रांतिकारी बदलाव दिखाई नहीं देता। जब तक समाज रहेगा और उसकी जरूरतें बनी रहेंगी, तब तक मीडिया भी इसी तरह चलता रहेगा। इसलिए 'दरबारी मीडिया' या 'गोदी मीडिया' की बहस को केवल वर्तमान तक सीमित नहीं देखना चाहिए। यह हर दौर में अलग-अलग रूप में मौजूद रही है।

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि पहले के समय में कई बड़े संपादक सत्ता के करीब रहे और उन्हें विधान परिषद या राज्यसभा जैसी जिम्मेदारियां मिलीं। उस समय यह जानकारी आसानी से लोगों तक नहीं पहुंचती थी क्योंकि सोशल मीडिया नहीं था। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। अब सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के जरिए युवा किसी भी पत्रकार या सार्वजनिक व्यक्ति का पूरा रिकॉर्ड आसानी से देख सकते हैं और यह पता लगा सकते हैं कि वह किस दौर में किस भूमिका में रहा। इसी वजह से अब हर व्यक्ति के काम और उसके इतिहास की जांच पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो गई है।

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