मेटा के 18 अरब डॉलर वाले चाइल्ड सेफ्टी सेटलमेंट में शामिल नहीं होगा यूट्यूब: नील मोहन

यूट्यूब, बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मेटा के बहु-राज्यीय सेटलमेंट में शामिल होने की योजना नहीं बना रहा है।

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Saturday, 26 September, 2026
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यूट्यूब, बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मेटा के बहु-राज्यीय सेटलमेंट में शामिल होने की योजना नहीं बना रहा है। यूट्यूब के सीईओ नील मोहन ने इसकी वजह बताते हुए कहा कि प्लेटफॉर्म पहले से ही युवा यूजर्स की सुरक्षा के लिए कई कदम उठा चुका है।

मोहन ने सीएनएन से कहा, "हमने यह सुनिश्चित करने के लिए लंबे समय से निवेश किया है कि हमारे प्लेटफॉर्म पर युवा सुरक्षित रहें। यूट्यूब से आप उम्मीद कर सकते हैं कि हम इन चीजों पर लगातार ध्यान देते रहेंगे।"

मोहन ने बुधवार को यूट्यूब के सालाना ‘मेड ऑन यूट्यूब’ कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से बातचीत में यह बात कही। इस कार्यक्रम में कंपनी ने क्रिएटर्स और दर्शकों के लिए नए फीचर्स की भी घोषणा की, जिसमें नए AI टूल्स और मैसेजिंग फीचर्स शामिल हैं।

मेटा ने राज्यों के साथ करीब 18 अरब डॉलर के सेटलमेंट पर सहमति जताई है। यह मामला उन आरोपों से जुड़ा है कि मेटा के प्लेटफॉर्म इस तरह डिजाइन किए गए थे, जिससे युवा यूजर्स के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा। हालांकि, समझौते के तहत मेटा ने किसी गलत काम को स्वीकार नहीं किया है।

इस सेटलमेंट में 13 से 17 साल के यूजर्स के लिए रोजाना इस्तेमाल की समय सीमा, रात के समय इस्तेमाल पर रोक और माता-पिता के लिए ज्यादा मजबूत कंट्रोल जैसे कदम शामिल हैं।

समझौते के तहत मेटा ने कहा है कि वह सेटलमेंट की 70 प्रतिशत रकम का भुगतान करेगा। बाकी 30 प्रतिशत रकम इस बात पर निर्भर करेगी कि यूट्यूब और टिकटॉक इस समझौते में शामिल होते हैं या नहीं और इसी तरह के बदलाव लागू करते हैं या नहीं। राज्यों के अटॉर्नी जनरल ने कहा है कि अगर ये प्लेटफॉर्म समझौते में शामिल नहीं होते हैं तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

नील मोहन ने यूट्यूब के पहले से मौजूद सुरक्षा उपायों का जिक्र किया। इनमें माता-पिता के लिए ऐसा विकल्प भी शामिल है, जिससे वे यह तय कर सकते हैं कि उनके किशोर बच्चे शॉर्ट्स कितनी देर तक देख सकें। उन्होंने यह भी बताया कि यूट्यूब बच्चों की सुरक्षा से जुड़े फीचर्स पर तीसरे पक्ष के विशेषज्ञों के साथ काम करता है।

मोहन ने कहा कि यूट्यूब और मेटा एक-दूसरे से काफी अलग प्लेटफॉर्म भी हैं। उन्होंने यह भी बताया कि कंपनी घरों में टीवी पर यूट्यूब देखने के अनुभव पर ध्यान दे रही है।

टिकटॉक ने मेटा के समझौते में शामिल होने की अपील पर अभी कोई टिप्पणी नहीं की है। वहीं, कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल रॉब बोंटा के कार्यालय ने भी मोहन के इस रुख पर टिप्पणी के लिए भेजे गए अनुरोध का तुरंत जवाब नहीं दिया।

मार्च में लॉस एंजिल्स में हुई एक अलग सुनवाई में यूट्यूब और मेटा को भी जिम्मेदार ठहराया गया था। इस मामले में आरोप था कि उनके प्लेटफॉर्म की वजह से लत और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को बढ़ावा मिला। दोनों कंपनियों ने इस फैसले के खिलाफ अपील करने की योजना बनाई है।

यूट्यूब को युवा यूजर्स से जुड़े अलग-अलग मुकदमों का भी सामना करना पड़ा है। इस साल कंपनी ने टिकटॉक और स्नैप के साथ इसी तरह के दावों से जुड़े कुछ व्यक्तिगत मामलों में समझौता किया है। हालांकि, युवा यूजर्स को नुकसान पहुंचने के आरोपों को लेकर इन कंपनियों के खिलाफ लोगों, परिवारों और स्कूल जिलों की ओर से सैकड़ों मुकदमे अभी भी चल रहे हैं।

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डिलिजेंट मीडिया कॉरपोरेशन की आम बैठक में दो प्रस्ताव मंजूर, मुकेश जिंदल फिर बने डायरेक्टर

डिलिजेंट मीडिया कॉरपोरेशन लिमिटेड की 21वीं सालाना आम बैठक 25 सितंबर 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आयोजित हुई। कंपनी ने बताया कि AGM में रखे गए दोनों प्रस्ताव जरूरी बहुमत के साथ मंजूर हो गए हैं।

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Saturday, 26 September, 2026
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डिलिजेंट मीडिया कॉरपोरेशन लिमिटेड की 21वीं सालाना आम बैठक (AGM) 25 सितंबर 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आयोजित हुई। कंपनी ने बताया कि AGM में रखे गए दोनों प्रस्ताव जरूरी बहुमत के साथ मंजूर हो गए हैं।

AGM दोपहर 12:30 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग/अन्य ऑडियो-विजुअल माध्यम से हुई। कंपनी ने शेयरधारकों को प्रस्तावों पर वोट करने के लिए रिमोट ई-वोटिंग और AGM के दौरान ई-वोटिंग की सुविधा दी थी।

18 सितंबर 2026 की रिकॉर्ड डेट के मुताबिक, कंपनी के कुल 84,624 शेयरधारक थे। AGM में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए प्रमोटर और प्रमोटर ग्रुप के 7 और पब्लिक कैटेगरी के 41 शेयरधारकों ने हिस्सा लिया। दस्तावेज के मुताबिक, प्रमोटर और प्रमोटर ग्रुप के 7 शेयरधारकों की संख्या उनके पास मौजूद फोलियो की संख्या के आधार पर निकाली गई है।

पहला प्रस्ताव: वित्तीय नतीजों को मंजूरी

पहले प्रस्ताव में 31 मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष के कंपनी के ऑडिट किए गए वार्षिक वित्तीय विवरण और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स व ऑडिटर्स की रिपोर्ट को अपनाने की मंजूरी मांगी गई थी। इस प्रस्ताव के पक्ष में कुल 7,86,62,491 वोट पड़े, जबकि 604 वोट इसके खिलाफ रहे। कुल वैध वोटों में 99.999 प्रतिशत वोट प्रस्ताव के पक्ष में रहे।

रिमोट ई-वोटिंग में 169 सदस्यों ने प्रस्ताव के पक्ष में 7,86,62,486 वोट डाले, जबकि AGM के दौरान ई-वोटिंग में 3 सदस्यों ने 5 वोट प्रस्ताव के पक्ष में दिए। वहीं, रिमोट ई-वोटिंग में 15 सदस्यों ने 604 वोट प्रस्ताव के खिलाफ डाले।

दूसरा प्रस्ताव: मुकेश जिंदल की दोबारा नियुक्ति

दूसरे प्रस्ताव में मुकेश जिंदल को कंपनी के नॉन-एग्जीक्यूटिव, नॉन-इंडिपेंडेंट डायरेक्टर के तौर पर दोबारा नियुक्त करने की मंजूरी मांगी गई थी। वह रोटेशन के आधार पर रिटायर होने वाले थे और दोबारा नियुक्ति के लिए पात्र होने के चलते उन्होंने अपना नाम पेश किया था। इस प्रस्ताव के पक्ष में कुल 7,86,61,161 वोट पड़े, जबकि 2,006 वोट इसके खिलाफ रहे। कुल वोटों में 99.997 प्रतिशत वोट प्रस्ताव के पक्ष में रहे।

रिमोट ई-वोटिंग में 165 सदस्यों ने 7,86,61,156 वोट प्रस्ताव के पक्ष में डाले, जबकि AGM के दौरान ई-वोटिंग में 3 सदस्यों ने 5 वोट पक्ष में दिए। वहीं, 19 सदस्यों ने 2,006 वोट प्रस्ताव के खिलाफ डाले। स्क्रूटिनाइजर रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों प्रस्ताव शेयरधारकों ने जरूरी बहुमत के साथ मंजूर कर दिए।

मीता पुष्पल संघवी थीं स्क्रूटिनाइजर

कंपनी ने रिमोट ई-वोटिंग और AGM के दौरान हुई ई-वोटिंग की जांच के लिए एमपी संघवी एंड एसोसिएट्स एलएलपी की डिजाइनटेड पार्टनर मीता पुष्पल संघवी को स्क्रूटिनाइजर नियुक्त किया था।

शेयरधारकों के लिए रिमोट ई-वोटिंग 22 सितंबर 2026 को सुबह 9 बजे शुरू हुई और 24 सितंबर 2026 को शाम 5 बजे समाप्त हुई। 18 सितंबर 2026 की कट-ऑफ डेट तक शेयर रखने वाले वे सदस्य, जिन्होंने रिमोट ई-वोटिंग के जरिए वोट नहीं किया था, उन्हें AGM के दौरान और AGM खत्म होने के 15 मिनट बाद तक ई-वोटिंग की सुविधा दी गई थी।

AGM खत्म होने के बाद 25 सितंबर को ई-वोटिंग के नतीजे खोले गए। स्क्रूटिनाइजर ने बताया कि यह प्रक्रिया दो ऐसे गवाहों की मौजूदगी में हुई, जो कंपनी के कर्मचारी नहीं थे।

 

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Google ने लॉन्च किए Gemini 3.8 Flash TTS और Flash-Lite TTS मॉडल

गूगल ने Google Cloud पर टेक्स्ट को आवाज में बदलने वाले दो नए AI मॉडल पेश किए हैं। इनमें कस्टम आवाज, अलग-अलग भाषाओं और बोलने की गति बदलने की सुविधा है।

Last Modified:
Thursday, 24 September, 2026
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गूगल (Google) ने अपने क्लाउड प्लेटफॉर्म (Cloud Platform) पर टेक्स्ट को आवाज में बदलने वाले दो नए एआई मॉडल (AI Models) जेमिनी 3.8 फ्लैश टीटीएस (Gemini 3.8 Flash TTS) और जेमिनी 3.8 फ्लैश-लाइट टीटीएस (Gemini 3.8 Flash-Lite TTS) पेश किए हैं। दोनों मॉडल लिखे हुए टेक्स्ट को आवाज में बदलने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

कंपनी ने दोनों मॉडल को अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से तैयार किया है। फ्लैश-लाइट टीटीएस को कम खर्च और तेज काम के लिए बनाया गया है, जबकि फ्लैश टीटीएस बेहतर आवाज की गुणवत्ता पर फोकस करता है।

दोनों मॉडल में 2,000 से ज्यादा पहले से तैयार आवाजों का विकल्प मिलता है। डेवलपर्स अपनी जरूरत के हिसाब से नई आवाज भी बना सकते हैं। इसमें आवाज का टोन (Tone), एक्सेंट (Accent) और बोलने की गति बदली जा सकती है। 30 सेकंड के ऑडियो से भी नई आवाज तैयार की जा सकती है।

गूगल के मुताबिक, फ्लैश टीटीएस 130 भाषाओं में और फ्लैश-लाइट टीटीएस 101 भाषाओं में आवाज तैयार कर सकता है। इसके अलावा, आवाज को जरूरत के अनुसार बदलने की सुविधा भी मिलती है। डेवलपर्स यह तय कर सकते हैं कि कोई लाइन किस तरह और कितनी तेजी से बोली जाए।

गूगल एआई से तैयार की गई आवाज में खास वॉटरमार्क (Watermark) भी जोड़ता है। इसे इंसान सुन नहीं सकते, लेकिन कुछ एआई पहचानने वाले टूल (AI Detection Tools) इसे पहचान सकते हैं। कंपनी ऑडियो के साथ एक रिकॉर्ड भी देती है, जिससे यह पता लगाया जा सकता है कि फाइल कब बनाई गई थी।

जेमिनी 3.8 फ्लैश टीटीएस और जेमिनी 3.8 फ्लैश-लाइट टीटीएस गूगल क्लाउड पर डेवलपर्स के लिए उपलब्ध हैं। इनका इस्तेमाल ऑडियोबुक (Audiobook), वॉयस एजेंट (Voice Agent) और दूसरे ऐप बनाने में किया जा सकता है। गूगल के मुताबिक, दोनों मॉडल की आवाज की गुणवत्ता को अलग-अलग परीक्षणों में जांचा गया है। दोनों मॉडल की कीमत अलग-अलग हो सकती है।

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IBDF ने CCI की कार्रवाई का पहली बार किया खुलासा, जांच जारी

इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन ने पहली बार कॉम्पिटिशन कमीशन ऑफ इंडिया (CCI) की ओर से मार्च 2025 में अपने नई दिल्ली स्थित रजिस्टर्ड ऑफिस में की गई सर्च और सीजर कार्रवाई की जानकारी दी है।

Samachar4media Bureau by
Published - Wednesday, 23 September, 2026
Last Modified:
Wednesday, 23 September, 2026
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इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन (IBDF) ने पहली बार कॉम्पिटिशन कमीशन ऑफ इंडिया (CCI) की ओर से मार्च 2025 में अपने नई दिल्ली स्थित रजिस्टर्ड ऑफिस में की गई सर्च और सीजर कार्रवाई की जानकारी दी है। IBDF ने बताया कि यह मामला अभी जांच के स्तर पर है और CCI के डायरेक्टर जनरल (DG-CCI) ने संगठन से अब तक कोई अतिरिक्त जानकारी नहीं मांगी है।

यह जानकारी IBDF के फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स में दी गई है। इसके मुताबिक, CCI की जांच शाखा ने 18 मार्च 2025 को IBDF के रजिस्टर्ड ऑफिस में बिना किसी पूर्व सूचना के सर्च और सीजर की कार्रवाई की थी। इस दौरान IBDF को पता चला कि CCI में यह मामला Suo Motu Case No. 02 of 2024 के तौर पर दर्ज है।

यह खुलासा सर्च कार्रवाई के करीब 18 महीने बाद सामने आया है। मार्च 2025 में हुई इस कार्रवाई के समय IBDF, Advertising Agencies Association of India (AAAI) और Indian Society of Advertisers (ISA) ने सार्वजनिक तौर पर इस सर्च को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की थी।

IBDF के मुताबिक, इसके बाद संगठन ने बाहरी वकीलों की नियुक्ति की। इन वकीलों ने CCI के केस रिकॉर्ड की जांच के लिए इंस्पेक्शन रिक्वेस्ट दाखिल की। वकीलों की शुरुआती जांच के आधार पर IBDF ने बताया कि 9 अगस्त 2024 के CCI के एक आदेश में ISA, AAAI, उनके सदस्यों और IBDF के खिलाफ जांच का निर्देश दिया गया था। इसमें Competition Act, 2002 की Section 3 के प्रथम दृष्टया उल्लंघन की बात कही गई थी।

Competition Act की Section 3 ऐसे समझौतों से जुड़ी है, जिनका प्रतिस्पर्धा पर महत्वपूर्ण प्रतिकूल असर पड़ता है या पड़ने की संभावना होती है।

इंडस्ट्री संगठनों की गतिविधियों की भी जांच

CCI की जांच में यह देखा गया कि क्या ISA, AAAI और IBDF की ओर से जारी गाइडलाइंस, एडवाइजरी और व्यावसायिक तौर-तरीकों से प्रतिस्पर्धा-विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। CCI ने खास तौर पर उन इंडस्ट्री दस्तावेजों और प्रथाओं की जांच की, जो विज्ञापनदाताओं, विज्ञापन एजेंसियों और ब्रॉडकास्टर्स के बीच संबंधों से जुड़ी थीं।

इसके बाद CCI ने कई बड़े विज्ञापन और मीडिया एजेंसियों के दफ्तरों के साथ-साथ इन इंडस्ट्री संगठनों के दफ्तरों में भी सर्च की कार्रवाई की।

CCI की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि उसे कमीशन और अन्य व्यावसायिक शर्तों को लेकर समन्वय के शुरुआती सबूत मिले हैं। हालांकि, ये सभी बातें अभी जांच का हिस्सा हैं और इन्हें किसी अंतिम तौर पर जिम्मेदारी तय करने का निष्कर्ष नहीं माना गया है।

समन को लेकर अदालत में मामला

IBDF ने अपने खुलासे में CCI की जांच से जुड़ी कानूनी कार्यवाही का भी जिक्र किया है। संगठन ने बताया कि एक पक्ष ने दिल्ली हाई कोर्ट में संवैधानिक रिट याचिका दायर की थी। इसके बाद कोर्ट ने समन पर रोक लगा दी थी।

एक दूसरी संवैधानिक रिट याचिका में सुप्रीम कोर्ट ने भी समन पर रोक लगा दी है। यह रोक तब तक जारी रहेगी, जब तक दिल्ली हाई कोर्ट संबंधित मामले पर फैसला नहीं करता।

IBDF ने यह भी बताया कि उसके कुछ कर्मचारियों को DG-CCI के सामने पेश होने के लिए समन मिले थे। संगठन ने इन समन को टालने की मांग करते हुए कहा कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चल रही संबंधित कार्यवाही पूरी होने तक समन पर रोक रखी जाए। संगठन ने बताया कि वह फिलहाल DG-CCI के जवाब का इंतजार कर रहा है। 

IBDF ने साफ किया कि मामला अभी जांच के स्तर पर है और DG-CCI ने संगठन से आगे कोई अतिरिक्त जानकारी नहीं मांगी है। इसी वजह से IBDF ने कहा कि इस मामले को लेकर अपने अलग फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स में किसी तरह के बदलाव की जरूरत नहीं समझी गई।

IBDF का यह खुलासा अब तक इस मामले में संगठन की भूमिका को लेकर सबसे स्पष्ट जानकारी देता है। इससे यह भी साफ होता है कि इंडस्ट्री संगठनों के खिलाफ CCI की कार्रवाई अभी किसी अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंची है।

फिलहाल CCI की जांच जारी है और DG-CCI ने मामले में शामिल संस्थाओं के खिलाफ अपनी कार्यवाही पूरी नहीं की है। प्रतिस्पर्धा कानून का कोई उल्लंघन हुआ है या नहीं, इस पर अंतिम फैसला कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद CCI की ओर से किया जाएगा।

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ब्लिंक डिजिटल ने मेटा से मांगा 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का हर्जाना

डिजिटल विज्ञापन एजेंसी ब्लिंक डिजिटल ने मेटा के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में मुकदमा दायर कर चार बिजनेस अकाउंट बहाल करने और 1,000 करोड़ से ज्यादा हर्जाने की मांग की है।

Last Modified:
Tuesday, 22 September, 2026
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डिजिटल एडवरटाइजिंग एजेंसी ब्लिंक डिजिटल इंडिया (Blink Digital India) ने मेटा (Meta) के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) का रुख किया है। एजेंसी ने अपने बिजनेस अकाउंट्स और कॉरपोरेट पेज बंद किए जाने को चुनौती देते हुए 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा के हर्जाने की मांग की है।

ब्लिंक डिजिटल ने फेसबुक इंडिया ऑनलाइन सर्विसेज (Facebook India Online Services) और मेटा प्लेटफॉर्म्स (Meta Platforms) के खिलाफ कमर्शियल सूट (Commercial Suit) दायर किया है। इसमें चार बिजनेस मैनेजर (Business Manager) अकाउंट्स को बंद किए जाने को चुनौती देते हुए उन्हें बहाल करने की मांग की गई है।

मेटा का बिजनेस मैनेजर प्लेटफॉर्म विज्ञापन एजेंसियों को फेसबुक (Facebook) और इंस्टाग्राम (Instagram) पर कई क्लाइंट अकाउंट्स, एडवरटाइजिंग कैंपेन और बिजनेस पेज मैनेज करने की सुविधा देता है। इन अकाउंट्स के बंद होने से एजेंसियों के लिए कैंपेन मैनेजमेंट और क्लाइंट्स के एडवरटाइजिंग एसेट्स तक पहुंच प्रभावित हो सकती है।

यह मामला 17 सितंबर को जस्टिस संदीप वी. मार्ने (Justice Sandeep V. Marne) के सामने आया। मेटा की ओर से पेश वकील ने ब्लिंक डिजिटल की अंतरिम अर्जी (Interim Application) का विरोध करने के लिए हलफनामा दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा।

कोर्ट ने यह अनुरोध स्वीकार करते हुए मेटा का जवाब मिलने के बाद ब्लिंक डिजिटल को अपना जवाब दाखिल करने के लिए एक अतिरिक्त सप्ताह दिया। अंतरिम अर्जी पर अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को शाम 4:30 बजे तय की गई है।

सुनवाई के दौरान मेटा प्लेटफॉर्म्स की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जनक द्वारकादास (Janak Dwarkadas) ने कहा कि अगली सुनवाई तक कंपनी कानून के मुताबिक ब्लिंक डिजिटल का डेटा सुरक्षित रखेगी। इस आश्वासन को 17 सितंबर के कोर्ट ऑर्डर में दर्ज किया गया है।

कोर्ट ने अभी तक अकाउंट बंद किए जाने की वैधता या ब्लिंक डिजिटल के हर्जाने के दावे पर कोई फैसला नहीं दिया है। अगली सुनवाई में ब्लिंक डिजिटल की अंतरिम राहत की अर्जी पर विचार होगा, जबकि हर्जाने से जुड़ा मुख्य कमर्शियल सूट बॉम्बे हाईकोर्ट में लंबित है।

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फेस्टिव सीजन में ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर नकली और घटिया सामान की होगी जांच

फेस्टिव सीजन में ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर नकली, तस्करी और घटिया उत्पादों की बिक्री रोकने के लिए सीबीआईसी संदिग्ध विक्रेताओं और सामान की जांच कर रही है।

Last Modified:
Tuesday, 22 September, 2026
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फेस्टिव सीजन में बढ़ती ऑनलाइन शॉपिंग के बीच सरकार ने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म (Ecommerce Platforms) पर नकली, तस्करी और घटिया सामान की बिक्री रोकने के लिए निगरानी बढ़ा दी है। इकनॉमिक टाइम्स (Economic Times) की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (Central Board of Indirect Taxes and Customs) यानी सीबीआईसी (CBIC) बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और दूसरी एजेंसियों के साथ मिलकर संदिग्ध विक्रेताओं और उत्पादों की पहचान कर रहा है।

जांच में खासतौर पर ऐसे आयातित सामान पर नजर है, जो असामान्य रूप से कम कीमत पर बेचे जा रहे हैं। इसके अलावा तस्करी के जरिए देश में आने वाले संदिग्ध उत्पादों और जरूरी सर्टिफिकेशन (Certification) या सही घोषणा के बिना बेचे जा रहे सामान की भी जांच की जा रही है।

इस निगरानी में इलेक्ट्रॉनिक सामान, घड़ियां, परफ्यूम और कॉस्मेटिक्स समेत कई कंज्यूमर प्रोडक्ट्स (Consumer Products) शामिल हैं। अधिकारी ऐसे उत्पादों की भी जांच कर रहे हैं, जिन पर जरूरी कंट्री-ऑफ-ओरिजिन (Country of Origin) की जानकारी मौजूद नहीं है।

फेस्टिव सीजन में ऑनलाइन शॉपिंग बढ़ने से डिजिटल मार्केटप्लेस और लास्ट-माइल डिलीवरी नेटवर्क (Last-Mile Delivery Network) के जरिए बड़ी मात्रा में सामान पहुंचता है। इसी वजह से सरकार का फोकस ऑनलाइन सप्लाई चेन (Online Supply Chain) में उत्पादों और विक्रेताओं की जांच पर बढ़ गया है।

सरकार तेजी से बढ़ रहे डार्क स्टोर्स (Dark Stores) के नेटवर्क की भी जांच कर रही है। क्विक-कॉमर्स और ऑनलाइन डिलीवरी में इस्तेमाल होने वाले इन हाइपरलोकल फुलफिलमेंट सेंटर (Hyperlocal Fulfilment Centres) की संख्या तेजी से बढ़ी है। इनका फैला हुआ नेटवर्क निगरानी को चुनौतीपूर्ण बना सकता है। अधिकारियों की नजर संभावित टर्नओवर और रेवेन्यू (Revenue) की अंडर-रिपोर्टिंग से जुड़ी चिंताओं पर भी है।

रिसर्च कंसल्टेंसी इन्फिसम (Infisum) के मुताबिक, भारत का ई-कॉमर्स मार्केट 2024 के 125 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक करीब 345 अरब डॉलर हो सकता है। वहीं, डार्क स्टोर्स का नेटवर्क 2025 के 2,525 आउटलेट्स से बढ़कर 2030 तक करीब 7,500 आउटलेट्स तक पहुंचने का अनुमान है।

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Quint Digital के नए शेयर और वारंट्स की ट्रेडिंग को BSE की मंजूरी, 18 सितंबर से कारोबार

क्विंट डिजिटल लिमिटेड (Quint Digital Limited) ने बताया है कि उसे अपने नए शेयर और वारंट को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराने और उनमें कारोबार शुरू करने के लिए BSE से मंजूरी मिल गई है।

Last Modified:
Friday, 18 September, 2026
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क्विंट डिजिटल लिमिटेड (Quint Digital Limited) ने बताया है कि उसे अपने नए शेयर और वारंट्स को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराने और उनमें कारोबार शुरू करने के लिए बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) से मंजूरी मिल गई है। कंपनी को यह मंजूरी 16 सितंबर 2026 को मिली है।

कंपनी के मुताबिक, इसके तहत 82,61,401 आंशिक रूप से चुकता (Partly Paid-Up) 10 प्रतिशत गैर-संचयी, गैर-भागीदारी और अनिवार्य रूप से परिवर्तनीय प्राथमिकता शेयर (Non-Cumulative Non-Participating Compulsorily Convertible Preference Shares) जारी किए गए हैं।

इन शेयरों का अंकित मूल्य 100 रुपये है। इसके साथ ही 82,61,401 आंशिक रूप से चुकता अलग किए जा सकने वाले वारंट्स (Partly Paid-Up Detachable Warrants) भी जारी किए गए हैं, जिनका अंकित मूल्य 10 रुपये है। इन दोनों में कारोबार शुक्रवार, 18 सितंबर 2026 से शुरू होगा।

कंपनी ने बताया कि यह मंजूरी इस मामले में पहले दी गई जानकारियों के आगे की कड़ी है। इससे पहले कंपनी ने 22 मई, 19 अगस्त, 21 अगस्त, 28 अगस्त, 11 सितंबर और 16 सितंबर 2026 को इस संबंध में शेयर बाजार को जानकारी दी थी।

BSE की ओर से जारी सूचना के मुताबिक, Quint Digital के 82,61,401 प्राथमिकता शेयर अधिकार के आधार पर जारी किए गए हैं। इनका अंकित मूल्य 100 रुपये प्रति शेयर है, जबकि अभी प्रत्येक शेयर पर 50 रुपये चुकाए गए हैं। इन शेयरों का कोड 710058 है और इन्हें QDLCCPS पहचान के साथ कारोबार के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। इनका आवंटन 11 सितंबर 2026 को किया गया था।

इसके अलावा 82,61,401 वारंट भी अधिकार के आधार पर जारी किए गए हैं। प्रत्येक वारंट का अंकित मूल्य 10 रुपये है, जिसमें से अभी 5 रुपये चुकाए गए हैं। इन वारंट का कोड 961921 है और इन्हें QDLDW पहचान के साथ कारोबार के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। इनका आवंटन भी 11 सितंबर 2026 को किया गया था। 

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सेमीकॉन 2.0 में 200 चिप डिजाइन कंपनियों को जोड़ेंगे : अश्विनी वैष्णव

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सेमीकॉन 2.0 के तहत भारत में चिप डिजाइन से जुड़ी कम से कम 200 स्टार्टअप और कंपनियों को जोड़ने का लक्ष्य बताया है।

Last Modified:
Thursday, 17 September, 2026
semicon2.0

इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्री (Electronics and IT Minister) अश्विनी वैष्णव (Ashwini Vaishnaw) ने कहा है कि सरकार सेमीकॉन 2.0 (Semicon 2.0) के तहत भारत में सेमीकंडक्टर चिप डिजाइन (Semiconductor Chip Design) से जुड़ी कम से कम 200 स्टार्टअप और कंपनियों को जोड़ने का लक्ष्य लेकर चल रही है। यह सेमीकॉन 1.0 (Semicon 1.0) में शामिल 105 से ज्यादा स्टार्टअप के आधार पर अगला कदम है।

सेमीकॉन इंडिया समिट 2026 (Semicon India Summit 2026) में वैष्णव ने बताया कि सेमीकॉन 1.0 में शामिल करीब 20 स्टार्टअप को लगभग 800 करोड़ रुपये की वेंचर कैपिटल फंडिंग (Venture Capital Funding) मिली थी। उन्होंने कहा कि इस बार सरकार का लक्ष्य पहले से काफी बड़ा है और भारत में चिप डिजाइन करने वाली कम से कम 200 स्टार्टअप और कंपनियों को इससे जोड़ने की योजना है।

सेमीकॉन 2.0 के छह पिलर (Pillars) में चिप डिजाइन पहला होगा। इसके अलावा मशीन और मटेरियल, सेमीकंडक्टर फैब, एडवांस्ड पैकेजिंग (Advanced Packaging), रिसर्च एंड डेवलपमेंट (Research and Development) और टैलेंट डेवलपमेंट (Talent Development) पर भी फोकस किया जाएगा।

मशीन और मटेरियल से जुड़े पिलर में कैपिटल इक्विपमेंट (Capital Equipment), मेंटेनेंस फैसिलिटी, केमिकल और गैस समेत पूरे सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम (Semiconductor Ecosystem) को शामिल किया जाएगा। वैष्णव ने बताया कि सम्मेलन में 28 से ज्यादा देशों की भागीदारी है।

तीसरे पिलर के तहत डिस्प्ले, मेमोरी, सिलिकॉन, कंपाउंड और लॉजिक फैब (Logic Fab) का विस्तार किया जाएगा। चौथे पिलर में एडवांस्ड पैकेजिंग पर जोर रहेगा। वैष्णव ने कहा कि ओडिशा में 3डी पैकेजिंग यूनिट (3D Packaging Unit) भी स्थापित हो रही है।

पांचवें पिलर के तहत इंडस्ट्री-लेड आरएंडडी (Industry-led R&D) पर फोकस होगा। सरकार अकादमिक संस्थानों और इंडस्ट्री को साथ लाकर एप्लाइड रिसर्च प्रोजेक्ट्स (Applied Research Projects) को बढ़ावा देगी।

टैलेंट डेवलपमेंट के तहत सेमीकॉन 1.0 में 10 साल में 85 हजार डिजाइन इंजीनियरों को ट्रेनिंग देने का लक्ष्य रखा गया था। वैष्णव के मुताबिक, चार साल में ही 70 हजार डिजाइन इंजीनियरों को प्रशिक्षित किया जा चुका है।

उन्होंने बताया कि देश की 400 से ज्यादा यूनिवर्सिटीज में कैडेंस (Cadence), सीमेंस (Siemens) और सिनॉप्सिस (Synopsys) के ईडीए टूल्स (EDA Tools) उपलब्ध हैं। इससे छात्र चिप डिजाइन करने और मोहाली स्थित सेमीकंडक्टर लेबोरेटरी (Semiconductor Laboratory) के जरिए उसे टेप-आउट (Tape-out) प्रक्रिया तक ले जाने में सक्षम हो रहे हैं।

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Jio यूजर्स को Canva का 12 महीने का फ्री सब्सक्रिप्शन, मिलेगा Pro और Pro Lite का लाभ

रिलायंस जियो (Jio) और Canva ने साझेदारी का ऐलान किया है। इसके तहत पात्र Jio यूजर्स को Canva के पेड प्लान का 12 महीने तक बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के इस्तेमाल करने का मौका मिलेगा।

Last Modified:
Thursday, 17 September, 2026
JioCanva51

रिलायंस जियो (Jio) और Canva ने साझेदारी का ऐलान किया है। इसके तहत पात्र Jio यूजर्स को Canva के पेड प्लान का 12 महीने तक बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के इस्तेमाल करने का मौका मिलेगा। यह ऑफर 16 सितंबर 2026 से शुरू हो गया है।

इस ऑफर का फायदा उन यूजर्स को मिलेगा, जो अलग-अलग चैनल के जरिए पात्र Jio रिचार्ज प्लान लेते हैं। यूजर को मिलने वाला Canva सब्सक्रिप्शन उसके रिचार्ज प्लान पर निर्भर करेगा। इसके तहत कुछ यूजर्स को Canva Pro Lite, जबकि पात्र प्लान वाले यूजर्स को Canva Pro मिलेगा।

इस साझेदारी के जरिए Jio अपने बड़े यूजर बेस को Canva के डिजाइन प्लेटफॉर्म से जोड़ रहा है। यूजर्स को प्रीमियम टेम्पलेट्स, फोटो, वीडियो, फॉन्ट और एडिटिंग टूल्स जैसे कई फीचर्स मिलेंगे। Canva हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं को भी सपोर्ट करता है।

Canva Pro Lite में क्या मिलेगा?

Canva Pro Lite में फोटो और वीडियो के लिए Background Remover, Magic Resize, Magic Eraser, प्रिंट के लिए तैयार फाइल एक्सपोर्ट और तीन तक Brand Kits जैसे फीचर्स मिलते हैं। इसके साथ यूजर्स को 50GB Cloud Storage भी मिलेगा।

Canva Pro में मिलेंगे ज्यादा फीचर्स

Canva Pro में Pro Lite के अलावा Content Planner जैसे फीचर्स मिलते हैं, जिसकी मदद से सोशल मीडिया पोस्ट को शेड्यूल किया जा सकता है। इसमें Canva AI का conversation-based chat-to-design फीचर, पांच तक Brand Kits, ज्यादा AI usage limits और 100GB Cloud Storage भी शामिल है।

इस साझेदारी पर रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के प्रेसिडेंट किरण थॉमस ने कहा कि Canva के जरिए AI आधारित डिजाइन टूल्स लाखों भारतीयों तक पहुंचेंगे। उन्होंने कहा कि इससे छात्र, क्रिएटर, उद्यमी और छोटे कारोबारी अपनी पसंद की भाषा में डिजिटल तरीके से काम कर सकेंगे।

Canva के को-फाउंडर और COO क्लिफ ओब्रेक्ट ने कहा कि भारत Canva के तेजी से बढ़ते बाजारों में शामिल है। उनके मुताबिक, Jio के साथ साझेदारी से देश में Canva का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या और बढ़ाने में मदद मिलेगी।

हालांकि, 12 महीने का यह ऑफर यूजर के Jio रिचार्ज प्लान की पात्रता पर निर्भर करेगा। कंपनी के मुताबिक, सामान्य प्रोडक्ट अपडेट के कारण ऑफर में बदलाव भी हो सकता है।

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UPI ट्रांजैक्शन पर शुल्क को लेकर नया नियम : 2000 रुपये तक पेमेंट रहेगा फ्री

सरकार ने छोटे डिजिटल पेमेंट को लेकर नया नोटिफिकेशन जारी किया है। इसके तहत 2000 रुपये तक के UPI और RuPay डेबिट कार्ड ट्रांजैक्शन पर कोई चार्ज नहीं लिया जा सकेगा।

Last Modified:
Tuesday, 15 September, 2026
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यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (Unified Payments Interface) यानी यूपीआई (UPI) ट्रांजैक्शन को लेकर सरकार ने नया नियम जारी किया है। वित्त मंत्रालय (Ministry of Finance) के डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज (Department of Financial Services) ने 14 सितंबर को गैजेट नोटिफिकेशन (Gazette Notification) जारी कर छोटे डिजिटल पेमेंट्स (Digital Payments) के लिए शुल्क से जुड़े नियम स्पष्ट किए हैं।

नोटिफिकेशन के मुताबिक, 2,000 रुपये तक के यूपीआई ट्रांजैक्शन पर बैंक या पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर (Payment System Provider) किसी भी तरह का चार्ज नहीं लगा सकते। यह रोक सीधे लगाए जाने वाले शुल्क के साथ-साथ अप्रत्यक्ष तरीके से लगाए जाने वाले चार्ज पर भी लागू होगी।

यह नियम पेमेंट करने वाले और पेमेंट पाने वाले, दोनों पर लागू है। यानी 2,000 रुपये तक के यूपीआई पेमेंट के लिए न ग्राहक से और न ही दुकानदार या व्यापारी से कोई ट्रांजैक्शन फीस (Transaction Fee) ली जा सकती है।

उदाहरण के तौर पर, अगर कोई ग्राहक किराने की दुकान पर यूपीआई के जरिए 500 रुपये का भुगतान करता है, तो इस पेमेंट के लिए ग्राहक या दुकानदार से अलग से कोई फीस नहीं ली जा सकती। यही नियम 2,000 रुपये तक के पेमेंट के लिए रुपे डेबिट कार्ड (RuPay Debit Card) से किए गए भुगतान पर भी लागू होगा।

यह नियम खास तौर पर कम वैल्यू वाले डिजिटल पेमेंट के लिए अहम है। किराना दुकानों, रेहड़ी-पटरी वालों, छोटी दुकानों और दूसरे छोटे कारोबारों में यूपीआई और डेबिट कार्ड से बड़े पैमाने पर भुगतान लिया जाता है। ऐसे में 2,000 रुपये या उससे कम के पेमेंट पर ग्राहक और व्यापारी से अलग चार्ज नहीं लिया जा सकेगा।

हालांकि, 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई ट्रांजैक्शन को लेकर नोटिफिकेशन में कोई नया फीस स्ट्रक्चर (Fee Structure) नहीं बताया गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि 2,000 रुपये से अधिक के हर यूपीआई पेमेंट पर अब निश्चित रूप से शुल्क लगेगा। ऐसे ट्रांजैक्शन पर लागू नियम और फीस संबंधित प्रावधानों और मौजूदा चार्ज स्ट्रक्चर पर निर्भर करेंगे।

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डिजिटल न्यूज सर्कुलेशन के ऑडिट के लिए ABC ने सरकार से मांगी मंजूरी

ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशंस (ABC) ने डिजिटल ऑडियंस की माप के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) के सामने एक प्रस्ताव रखा है।

Last Modified:
Tuesday, 15 September, 2026
News874

कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।

ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशंस (ABC) ने डिजिटल ऑडियंस की माप के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) के सामने एक प्रस्ताव रखा है। ABC के नवनिर्वाचित चेयरमैन मोहित जैन ने एक्सचेंज4मीडिया को यह जानकारी दी है। उन्होंने कहा कि डिजिटल सर्कुलेशन और ऑडियंस की अहमियत लगातार बढ़ रही है और ऐसे में ABC अपने मौजूदा मापन ढांचे में डिजिटल को भी शामिल करने की योजना बना रहा है।

मोहित जैन के मुताबिक, ABC ने केंद्र सरकार को ‘डिजिटल न्यूज मेजरमेंट’ को व्यापक स्तर पर लागू करने का प्रस्ताव दिया है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इसे लागू करने में समय लग सकता है, क्योंकि इसमें सरकार की मंजूरी के साथ-साथ एक नई मापन व्यवस्था तैयार करने की जटिलता भी शामिल है।

मोहित जैन ने कहा, “हमने डिजिटल न्यूज मेजरमेंट को व्यापक स्तर पर लागू करने के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव दिया है।” उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ABC के प्रमुख ग्राहकों में से एक है और सरकार भी इस मुद्दे पर बात कर रही है। उनके मुताबिक, ऑडिट में डिजिटल ऑडियंस को भी शामिल किया जाना चाहिए।

प्रिंट और डिजिटल के बीच अंतर कम करने की कोशिश

ABC का यह कदम ऐसे समय में आया है जब भारत का प्रिंट मीडिया मापन सिस्टम भी प्रिंट और डिजिटल के बीच की दूरी कम करने की कोशिश कर रहा है। 

मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल इंडिया (MRUCI) भारतीय पाठक सर्वेक्षण (IRS) को फिर से शुरू करने की दिशा में काम कर रही है। IRS आखिरी बार 2019 में जारी हुआ था। प्रस्तावित नए पायलट में प्रिंट के साथ-साथ डिजिटल रीडरशिप को भी मापने की योजना है। इससे विज्ञापनदाताओं को अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर न्यूज कंटेंट की खपत की ज्यादा मौजूदा तस्वीर मिल सकती है।

ABC और IRS की भूमिका हालांकि अलग-अलग रही है। ABC मुख्य रूप से ऑडिटेड सर्कुलेशन का आंकड़ा देता है, यानी किसी प्रकाशन की कितनी प्रतियां सर्कुलेट हो रही हैं। वहीं IRS यह पता लगाने की कोशिश करता है कि किसी प्रकाशन को कितने लोग पढ़ते या इस्तेमाल करते हैं। लेकिन अब जब ऑडियंस तेजी से प्रिंट से डिजिटल की ओर जा रही है, दोनों संस्थाओं के सामने एक बड़ा सवाल है कि मल्टी-प्लेटफॉर्म दौर में किसी पब्लिशर की कुल ऑडियंस को किस तरह मापा जाए।

ABC पहले भी कर चुका है डिजिटल मापन की कोशिश

ABC इससे पहले भी डिजिटल मापन के क्षेत्र में कदम रख चुका है। ब्यूरो ने 2016 में ABC Digital लॉन्च किया था। इसके लिए Nielsen ने PC और मोबाइल पर डिजिटल मापन का समाधान उपलब्ध कराया था। उस समय भी इसका उद्देश्य प्रिंट मापन के साथ डिजिटल ऑडियंस को समझना था, क्योंकि पाठकों का डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर रुझान बढ़ रहा था।

अब डिजिटल विज्ञापन भारतीय विज्ञापन बाजार का एक बड़ा हिस्सा बन चुका है। ऐसे में पब्लिशर्स के लिए वेबसाइट, ऐप और प्रिंट पर कंटेंट देखने वाली ऑडियंस की वैल्यू बताने के लिए भरोसेमंद थर्ड-पार्टी डेटा की जरूरत बढ़ गई है। इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि भारत में डिजिटल ऑडियंस के लिए अलग-अलग उद्देश्यों वाली कई मापन व्यवस्थाएं होंगी या फिर ABC और IRS भविष्य में एक-दूसरे के पूरक बनकर काम करेंगे।

विज्ञापनदाताओं के लिए भी जरूरी है एक साझा मापन सिस्टम

विज्ञापन इंडस्ट्री भी अलग-अलग मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऑडियंस को मापने के लिए एक साझा व्यवस्था की जरूरत पर जोर देती रही है। फिलहाल विज्ञापनदाता अलग-अलग डेटासेट और प्लेटफॉर्म की ओर से दिए गए आंकड़ों का इस्तेमाल करते हैं। इससे अलग-अलग स्क्रीन पर ऑडियंस को एक साथ समझना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। हालांकि, ABC के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती सरकार की मंजूरी है। मोहित जैन ने कहा कि सरकार ABC के प्रमुख हितधारकों में से एक है और पूरी प्रक्रिया में समय लग सकता है।

ABC की वेबसाइट के मुताबिक, ब्यूरो के 750 से ज्यादा पब्लिशर सदस्य हैं। इनमें 562 डेली, 107 वीकली और 50 मैगजीन शामिल हैं। यदि MIB इस प्रस्ताव को मंजूरी देता है तो भारत में डिजिटल ऑडियंस के लिए दो पुराने और प्रमुख संस्थानों की ओर से मापन व्यवस्था तैयार करने की कोशिश सामने आ सकती है। एक तरफ MIB के समर्थन से ABC का डिजिटल मापन ढांचा होगा, वहीं दूसरी तरफ MRUC के जरिए IRS को फिर से शुरू करने की कोशिश चल रही है। ऐसे में सवाल यह है कि इंडस्ट्री को दो अलग-अलग सिस्टम की जरूरत है या दोनों व्यवस्थाओं को एक-दूसरे के पूरक के तौर पर विकसित किया जाना चाहिए।

सात साल से IRS का इंतजार

IRS आखिरी बार 2019 में जारी हुआ था। इसके बाद से फंडिंग, मेथडोलॉजी, रिसर्च पार्टनर और सर्वे के दायरे जैसे मुद्दों पर असहमति के चलते इसकी वापसी लगातार टलती रही है।

इंडस्ट्री के कुछ अधिकारियों का मानना है कि अब सवाल सिर्फ सर्वे को दोबारा शुरू करने का नहीं है, बल्कि यह भी तय करना जरूरी है कि पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदले मीडिया इकोसिस्टम में एक रीडरशिप करेंसी को आखिर मापना क्या चाहिए।

पब्लिशर्स की ओर से फंड किए जाने वाले IRS को MRUC और Readership Studies Council of India (RSCI) मिलकर प्रकाशित करते हैं। इसे दुनिया का सबसे बड़ा लगातार चलने वाला रीडरशिप स्टडी बताया जाता है। इसका सालाना सैंपल साइज 2.56 लाख से ज्यादा उत्तरदाताओं का है। IRS भारत में प्रिंट और दूसरे मीडिया के इस्तेमाल, लोगों की प्रोफाइल, प्रोडक्ट ओनरशिप और उनके इस्तेमाल की तस्वीर पेश करता है। इसके सर्वे में 100 से ज्यादा प्रोडक्ट कैटेगरी भी शामिल हैं।

इस सर्वे पर करीब 40-50 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है, जिसे पब्लिशर्स के योगदान से पूरा किया जाता है। हालांकि, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, प्रिंट सर्कुलेशन में कमी और न्यूज कंजम्पशन की बदलती आदतों के बीच कुछ पब्लिशर्स इसकी उपयोगिता और निवेश पर मिलने वाले रिटर्न को लेकर आश्वस्त नहीं हैं।

एक रीजनल पब्लिशर के मुताबिक, कई पब्लिशर्स ऐसे सर्वे में पैसा लगाने से हिचक रहे हैं, जिसके नतीजे उनकी मार्केट पोजिशन को कमजोर कर सकते हैं और इससे विज्ञापन से होने वाली कमाई पर भी असर पड़ सकता है।

यह चुनौती इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि मीडिया प्लानिंग का तरीका बदल चुका है। डिजिटल प्लेटफॉर्म अब कैंपेन की लगभग रियल-टाइम माप उपलब्ध कराते हैं, जबकि रिटेल मीडिया में सीधे नतीजे मापने की सुविधा है। विज्ञापनदाता भी अब सिर्फ समय-समय पर मिलने वाली रिपोर्ट के बजाय लगातार कैंपेन को बेहतर बनाने की उम्मीद करते हैं।

इसके बावजूद प्रिंट इंडस्ट्री के लिए IRS की गैरमौजूदगी एक बड़ा मापन गैप पैदा करती है। प्रिंट सेक्टर से करीब 20,000 करोड़ रुपये का विज्ञापन कारोबार होने का अनुमान है। ऐसे में पब्लिशर्स का मानना है कि मीडिया प्लानिंग, विज्ञदाताओं का भरोसा और बाजार की तुलना के लिए एक स्वतंत्र इंडस्ट्री करेंसी जरूरी है।

फिलहाल विज्ञापनदाता ABC के सर्कुलेशन डेटा के अलावा पब्लिशर्स की अपनी रिसर्च और अलग-अलग ऑडियंस स्टडीज पर भी निर्भर हैं। अब ABC के डिजिटल ऑडियंस मापन प्रस्ताव और IRS को फिर से शुरू करने की कोशिश के बीच यह देखना अहम होगा कि भारत में डिजिटल न्यूज ऑडियंस के लिए भविष्य का मापन सिस्टम किस दिशा में जाता है।

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