प्रदर्शन की कवरेज के दौरान पत्रकारों से बर्ताव पर सवाल, SC से दिशा-निर्देश बनाने की मांग

प्रदर्शन और विरोध-प्रदर्शनों की कवरेज करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर फ्री स्पीच कलेक्टिव (Free Speech Collective) ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।

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Tuesday, 13 October, 2026
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प्रदर्शन और विरोध-प्रदर्शनों की कवरेज करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर फ्री स्पीच कलेक्टिव (Free Speech Collective) ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। संगठन ने पुलिस की ओर से पत्रकारों को कथित तौर पर हिरासत में लेने, उनके साथ मारपीट करने, डराने और रिपोर्टिंग में बाधा डालने की घटनाओं को रोकने के लिए अदालत से बाध्यकारी दिशा-निर्देश बनाने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से पत्रकारों समेत अन्य पेशेवरों के काम में बाधा नहीं डालने का निर्देश दिए जाने के बाद भी ऐसी घटनाएं सामने आई हैं।

याचिका के मुताबिक, प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को कथित तौर पर घसीटा गया, उनके साथ धक्का-मुक्की की गई और उन्हें पुलिस वाहनों में बैठाकर ले जाया गया। कुछ पत्रकारों ने प्रेस कार्ड दिखाया या अपनी पहचान बताई, इसके बावजूद उनके साथ कथित तौर पर बल प्रयोग किया गया। याचिका में रिपोर्टिंग के दौरान एक मीडियाकर्मी के घायल होने का भी जिक्र है।

संगठन का कहना है कि भीड़ को नियंत्रित करने के नाम पर पत्रकारों के खिलाफ बल प्रयोग को सामान्य कार्रवाई नहीं माना जा सकता। इससे जनता तक जानकारी पहुंचाने की प्रक्रिया प्रभावित होती है और सरकारी कार्रवाई की स्वतंत्र रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों में डर पैदा होता है।

मौलिक अधिकारों की रक्षा की मांग

फ्री स्पीच कलेक्टिव ने संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a), 19(1)(d) और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों को लागू कराने की मांग की है। ये अनुच्छेद कानून के सामने समानता, बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी, देश में स्वतंत्र रूप से आने-जाने के अधिकार और जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा से जुड़े हैं।

याचिका में कथित घटनाओं की स्वतंत्र और तय समय-सीमा के भीतर जांच कराने, जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों की पहचान करने और हिरासत व बल प्रयोग की परिस्थितियों का पता लगाने के लिए पुलिस के रिकॉर्ड और वीडियो सुरक्षित रखने की मांग भी की गई है।

11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिया था निर्देश

यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के 11 अक्टूबर के उस निर्देश के बाद दाखिल की गई है, जिसमें अदालत ने कहा था कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों को अपने पेशेवर कर्तव्यों का पालन करने से किसी भी तरह नहीं रोका जाना चाहिए।

यह निर्देश मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान हिरासत में लिए जाने से जुड़े मामलों पर सुनवाई के बाद दिया गया था।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि अदालत के निर्देश के बाद भी पत्रकारों से जुड़ी कुछ और घटनाएं सामने आईं। संगठन का कहना है कि इससे साफ होता है कि प्रदर्शन और भीड़ नियंत्रण के दौरान पत्रकारों के साथ पुलिस के व्यवहार के लिए अलग और स्पष्ट सुरक्षा व्यवस्था जरूरी है।

10 और 11 अक्टूबर की घटनाओं का जिक्र

याचिका में 10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को कथित तौर पर हिरासत में लेने, घसीटने, उनके साथ धक्का-मुक्की करने और रिपोर्टिंग की जगह से दूर ले जाने की घटनाओं का जिक्र किया गया है। इसमें ऐसे मामले भी शामिल हैं, जिनमें पत्रकारों को पुलिस की कार्रवाई रिकॉर्ड करने से रोकने और एक कैमरापर्सन के घायल होने की बात कही गई है।

याचिका के अनुसार, प्रभावित पत्रकारों में Scroll, Newslaundry, Reuters, Business Standard, BOOMLive, India Today, The News Minute, Maktoob Media, The Indian Express, PTI और The Quint समेत कई मीडिया संस्थानों से जुड़े पत्रकार शामिल हैं।

प्रेस कार्ड दिखाने के बाद भी हिरासत में लेने का आरोप

याचिका में Scroll के पत्रकार आयुष तिवारी को एचकेएस सुरजीत भवन के बाहर हिरासत में लिए जाने की घटना का उल्लेख है। आरोप है कि उनके पास प्रेस पास होने के बावजूद उन्हें हिरासत में लिया गया।

इसी तरह, याचिका में Peek TV के पत्रकार वेदांता अग्रवाल और सारा खान को कनॉट प्लेस में कथित तौर पर घसीटकर हिरासत में लेने का जिक्र है। याचिका के अनुसार, दोनों ने अपने प्रेस कार्ड भी दिखाए थे।

इसके अलावा, The News Minute की पत्रकार निधि सुरेश और एक अन्य महिला पत्रकार को कई घंटे तक हिरासत में रखने का आरोप लगाया गया है। याचिका में यह भी कहा गया है कि The Hindu से जुड़ी एक महिला पत्रकार को उनकी पेशेवर पहचान स्वीकार किए जाने के बाद ही छोड़ा गया।

पत्रकारों को प्रदर्शनकारी समझने पर उठाए सवाल

याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने कुछ पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग करने वाले लोगों के बजाय प्रदर्शन में शामिल लोगों की तरह देखा। संगठन का कहना है कि प्रदर्शनकारियों के पास मौजूद होने या मौके पर भ्रम की स्थिति के कारण पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई की गई।

याचिका में कहा गया है कि किसी प्रदर्शन के पास खड़े होने का मतलब यह नहीं है कि कोई पत्रकार उसमें शामिल है। खबर जुटाने के लिए पत्रकारों को कई बार प्रदर्शनकारियों के करीब खड़े होकर घटनाओं को देखना, सुनना और रिकॉर्ड करना पड़ता है।

संगठन के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों के पास मौजूद होने, कैमरा या रिकॉर्डिंग उपकरण रखने, सवाल पूछने या हिरासत की घटना रिकॉर्ड करने को बल प्रयोग या हिरासत का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। ऐसा करने से पुलिस की कार्रवाई की निगरानी मुश्किल होती है और प्रदर्शन की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों में डर पैदा हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का भी दिया हवाला

याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 18 अगस्त के आदेश का भी हवाला दिया गया है। उस आदेश के तहत छात्र प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की गई थी।

इस समिति को पुलिस कार्रवाई की जरूरत और उसके अनुपात, जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान, महिलाओं के खिलाफ कथित हिंसा और पुलिस की जवाबदेही जैसे मुद्दों की जांच करनी थी।

याचिका में 9 अक्टूबर को सार्वजनिक परिवहन पर लगी पाबंदियों के संबंध में हुई सुनवाई का भी उल्लेख है। उस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जरूरी सार्वजनिक परिवहन पर पूरी तरह रोक लगाना जरूरत से ज्यादा कदम लग रहा है। अदालत ने 10 अक्टूबर के प्रदर्शनों के मद्देनजर मेट्रो सेवाओं और जनता के लिए जारी की जाने वाली सूचनाओं को लेकर निर्देश दिए थे।

दिल्ली में पाबंदियों का भी जिक्र

याचिका में प्रदर्शनों के दौरान लगाई गई कई पाबंदियों का उल्लेख किया गया है। इनमें मेट्रो स्टेशन बंद करना, मध्य दिल्ली के कुछ हिस्सों में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं रोकना, बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात करना और जंतर-मंतर तक पहुंच सीमित करना शामिल है।

संगठन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में पहले हुई सुनवाई में पुलिस कार्रवाई और लोगों की आवाजाही पर लगी पाबंदियों जैसे मुद्दों पर विचार किया गया था, लेकिन प्रदर्शन स्थलों तक पत्रकारों की पहुंच और पुलिस कार्रवाई की रिपोर्टिंग करते समय उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए, इस बारे में व्यापक व्यवस्था नहीं बनाई गई।

याचिका के अनुसार, 11 अक्टूबर के निर्देश के साथ कोई स्पष्ट कार्यप्रणाली, निगरानी की जिम्मेदारी या शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई करने की व्यवस्था नहीं होने के कारण कथित घटनाओं को रोकने में पर्याप्त मदद नहीं मिली।

पुलिस के रिकॉर्ड और वीडियो सुरक्षित रखने की मांग

फ्री स्पीच कलेक्टिव ने सुप्रीम कोर्ट से 10 अक्टूबर से पत्रकारों से जुड़ी घटनाओं के सभी जरूरी रिकॉर्ड तत्काल सुरक्षित रखने और उन्हें अदालत के सामने पेश करने का निर्देश देने की मांग की है।

इन रिकॉर्ड में शामिल हैं:

  • सीसीटीवी फुटेज।
  • पुलिसकर्मियों के शरीर पर लगे कैमरों की रिकॉर्डिंग।
  • पुलिस की ओर से बनाई गई वीडियो रिकॉर्डिंग।
  • पुलिस वायरलेस संदेशों का रिकॉर्ड।
  • पुलिस नियंत्रण कक्ष (PCR) में आई कॉल का रिकॉर्ड।
  • ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों की सूची।
  • पुलिस बल की तैनाती से जुड़े चार्ट।
  • पुलिस वाहनों की आवाजाही का रिकॉर्ड।
  • हिरासत से जुड़े रजिस्टर और गिरफ्तारी के दस्तावेज।
  • मेडिकल रिकॉर्ड और पत्रकारों से जुड़ी शिकायतें।

याचिका में यह जानकारी भी मांगी गई है कि अलग-अलग जगहों पर किन पत्रकारों और मीडियाकर्मियों को हिरासत में लिया गया, वहां से हटाया गया, दूसरी जगह ले जाया गया, चोट लगी या रिपोर्टिंग करने से रोका गया। साथ ही, उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए बताए गए कानूनी आधार, संबंधित अधिकारियों के नाम, हिरासत की जगह और अवधि तथा उन्हें दी गई चिकित्सा सहायता का ब्योरा भी मांगा गया है।

स्वतंत्र जांच और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग

याचिका में पत्रकारों को कथित तौर पर हिरासत में लेने, शारीरिक हिंसा करने, चोट पहुंचाने, जबरन हटाने और रिपोर्टिंग में बाधा डालने के आरोपों की जांच के लिए स्वतंत्र और समयबद्ध व्यवस्था बनाने की मांग की गई है।

इस व्यवस्था के तहत सीधे जिम्मेदार अधिकारियों के साथ-साथ निगरानी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय करने की मांग भी की गई है। संगठन ने कानून के अनुसार अनुशासनात्मक या दूसरी कार्रवाई करने, उचित मुआवजा देने और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने का अनुरोध किया है।

पुलिस और पत्रकारों के बीच व्यवहार के लिए दिशा-निर्देश बनाने की मांग

फ्री स्पीच कलेक्टिव ने सुप्रीम कोर्ट से प्रदर्शन और सार्वजनिक सभाओं के दौरान पुलिस और पत्रकारों के बीच व्यवहार को लेकर बाध्यकारी दिशा-निर्देश बनाने की मांग की है।

प्रस्तावित सुरक्षा उपायों में ये बातें शामिल हैं:

  1. पुलिसकर्मियों की पहचान स्पष्ट रूप से दिखाई दे।
  2. पत्रकारों की पहचान के लिए प्रेस कार्ड को मान्यता दी जाए, लेकिन केवल औपचारिक मान्यता-पत्र को ही पत्रकार होने का एकमात्र आधार न माना जाए।
  3. बल प्रयोग करने के लिए स्पष्ट नियम तय हों।
  4. किसी पत्रकार को हिरासत में लेने या मौके से हटाने के कारण दर्ज किए जाएं।
  5. पत्रकारों को वकीलों और अपने मीडिया संस्थानों से संपर्क करने की सुविधा मिले।
  6. जरूरत पड़ने पर चिकित्सा सहायता दी जाए।
  7. पत्रकारों के कैमरे, रिकॉर्डिंग उपकरण और डेटा की सुरक्षा की जाए।
  8. घटनाओं के समय तैयार हुए सबूतों और रिकॉर्ड को सुरक्षित रखा जाए।

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से यह घोषित करने की भी मांग की गई है कि पेशेवर काम कर रहे पत्रकारों को मनमाने तरीके से हिरासत में लेना, जबरन हटाना, डराना, उन पर हमला करना या उनके खिलाफ दूसरे तरह का बल प्रयोग करना संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a), 19(1)(d) और 21 के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन है। याचिका में कहा गया है कि ऐसी कार्रवाई जनता के जानने के अधिकार पर भी अनुचित रोक लगाती है।

महिला पत्रकारों की सुरक्षा के लिए अलग याचिका

पत्रकारों के संगठन नेटवर्क ऑफ वुमेन इन मीडिया, इंडिया (NWMI) ने भी प्रदर्शन की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट में अलग याचिका दाखिल की है। इस याचिका में महिला पत्रकारों की गरिमा और सुरक्षा पर खास जोर दिया गया है।

NWMI का कहना है कि पुलिस की कथित ज्यादतियों की जांच के लिए पहले से चल रही प्रक्रिया में प्रदर्शन स्थलों तक पत्रकारों की पहुंच, उन्हें हिरासत में लेने या जबरन हटाने और खबर जुटाने के दौरान जरूरी सुरक्षा उपायों पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है।

संगठन ने केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देने की मांग की है कि सही तरीके से खबर जुटाने या रिपोर्टिंग करने वाली महिला पत्रकारों को केवल प्रदर्शन, सार्वजनिक सभा, भीड़ नियंत्रण की कार्रवाई या किसी अन्य महत्वपूर्ण सार्वजनिक घटना के पास मौजूद होने के कारण शारीरिक रूप से परेशान न किया जाए, डराया न जाए, मनमाने तरीके से हिरासत में न लिया जाए और जबरन वहां से न हटाया जाए।

ये दोनों ही याचिकाएं अधिवक्ता-ऑन-रिकॉर्ड आरती राजन के माध्यम से दाखिल की गई हैं। 

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महिला पत्रकारों से बदसलूकी व हिरासत का मामला SC पहुंचा, NWMI ने मांगे सुरक्षा नियम

दिल्ली में 10 और 11 अक्टूबर को SIR के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों के दौरान महिला पत्रकारों के साथ कथित मारपीट, बदसलूकी व मनमाने तरीके से हिरासत में लिए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है।

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Tuesday, 13 October, 2026
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दिल्ली में 10 और 11 अक्टूबर को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग के दौरान महिला पत्रकारों के साथ कथित मारपीट, बदसलूकी और मनमाने तरीके से हिरासत में लिए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। नेटवर्क ऑफ वुमेन इन मीडिया, इंडिया (NWMI) ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर पत्रकारों की सुरक्षा के लिए ऐसे नियम बनाने की मांग की है, जिनका पालन करना अनिवार्य हो।

NWMI ने अपनी याचिका में दिल्ली पुलिस पर आरोप लगाया है कि राष्ट्रीय राजधानी में विरोध-प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग कर रहीं कई महिला पत्रकारों के साथ कथित तौर पर मारपीट और बदसलूकी की गई। उन्हें अपना काम करने से रोका गया और मनमाने तरीके से हिरासत में लिया गया। संगठन के मुताबिक, इन पत्रकारों ने खुद को प्रेस का सदस्य बताया था और अपने वैध प्रेस पहचान पत्र भी दिखाए थे।

प्रेस की आजादी पर असर पड़ने की आशंका

NWMI का कहना है कि पुलिस की कथित कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिली प्रेस की आजादी पर सीधा हमला है। संगठन ने आशंका जताई है कि इस तरह की घटनाओं से पत्रकारों में डर पैदा हो सकता है और वे अपना काम करने से हिचक सकते हैं। इसका असर खास तौर पर उन महिला पत्रकारों पर पड़ सकता है, जो घटनास्थल पर जाकर रिपोर्टिंग करती हैं।

प्रदर्शन के दौरान पुलिस और मीडिया के बीच बातचीत के लिए नियम बनाने की मांग

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि वह विरोध-प्रदर्शनों, धरनों और सार्वजनिक सभाओं के दौरान पुलिस और मीडिया के बीच बातचीत और व्यवहार को लेकर स्पष्ट नियम और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तय करे। इन नियमों का मकसद रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

संगठन ने अदालत से दिल्ली पुलिस को निर्देश देने की भी मांग की है कि वह अपने पेशेवर काम में लगे पत्रकारों को न तो रोके, न उनके साथ मारपीट करे और न ही उन्हें हिरासत में ले। याचिका में यह भी कहा गया है कि रिपोर्टिंग के दौरान महिला पत्रकारों को शारीरिक उत्पीड़न या मनमाने तरीके से हिरासत में लिए जाने से बचाया जाए।

10 और 11 अक्टूबर की घटनाओं की स्वतंत्र जांच की मांग

NWMI ने 10 और 11 अक्टूबर को हुई घटनाओं की स्वतंत्र जांच कराने और कथित मारपीट व हिरासत के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करने की भी मांग की है।

SIR के खिलाफ दिल्ली में हो रहे हैं प्रदर्शन

यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब SIR प्रक्रिया, मतदाता सूची से कथित तौर पर नाम हटाए जाने और चुनावी अनियमितताओं के आरोपों को लेकर दिल्ली में विपक्षी गठबंधन INDIA के दलों, युवा संगठनों और नागरिक समाज के समूहों की ओर से बड़े स्तर पर प्रदर्शन किए जा रहे हैं। इन प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत प्रतिबंध लगाए थे। इसके अलावा कुछ मेट्रो स्टेशनों को बंद किया गया और इंटरनेट सेवाओं पर भी पाबंदियां लगाई गईं।

सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को इन प्रतिबंधों पर ध्यान दिया था और सामान्य सेवाएं बहाल करने का आदेश दिया था। NWMI की याचिका का मंगलवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने उल्लेख किए जाने की संभावना है।

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महिला पत्रकारों से बदसलूकी के खिलाफ हैदराबाद में प्रदर्शन, दोषियों पर कार्रवाई की मांग

दिल्ली व दूसरे शहरों में प्रदर्शनों की कवरेज के दौरान महिला पत्रकारों के साथ कथित मारपीट और गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लिए जाने के विरोध में हैदराबाद में महिला पत्रकारों ने प्रदर्शन किया।

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Tuesday, 13 October, 2026
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दिल्ली और दूसरे शहरों में प्रदर्शनों की कवरेज के दौरान महिला पत्रकारों के साथ कथित मारपीट, यौन उत्पीड़न और गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लिए जाने के विरोध में सोमवार शाम हैदराबाद में महिला पत्रकारों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारी टैंक बंड स्थित अंबेडकर की प्रतिमा के पास जुटीं। उन्होंने हिरासत में लिए गए पत्रकारों को रिहा करने, उनके खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने और पुलिस के व्यवहार की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की।

प्रदर्शन के दौरान महिला पत्रकारों ने ऐसे पोस्टर भी दिखाए, जिन पर लिखा था, “मीडिया की आजादी दबाना बंद करो” और “डर हमें चुप नहीं करा पाएगा।”

पत्रकार होने की जानकारी देने के बाद भी हमले का आरोप

प्रदर्शनकारी महिलाओं ने एक बयान में आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों और सादे कपड़ों में मौजूद पुरुषों ने पत्रकारों के प्रेस का सदस्य होने की जानकारी देने के बावजूद उन पर हमला किया। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग से जुड़े विरोध-प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को डराया गया और उनका काम रोकने की कोशिश की गई।

बयान में तीन महिला पत्रकारों के साथ पुलिस की ओर से कथित यौन उत्पीड़न किए जाने के आरोपों का भी जिक्र किया गया।

NHRC ने दिल्ली पुलिस से मांगी रिपोर्ट

मामले पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने स्वतः संज्ञान लिया है। आयोग ने दिल्ली पुलिस आयुक्त से दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। प्रदर्शनकारियों ने 11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की ओर से गैरकानूनी हिरासत के संबंध में दिए गए निर्देशों का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि अदालत को यह भरोसा दिलाए जाने के बावजूद कि पत्रकारों और दूसरे पेशेवर लोगों को अपना काम करने से नहीं रोका जाएगा, इस तरह की घटनाएं जारी हैं।

प्रेस की आजादी और महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा उठाया

महिला पत्रकारों ने कहा कि पत्रकारों पर इस तरह के कथित हमले प्रेस की आजादी के साथ-साथ महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा का भी उल्लंघन हैं। उन्होंने प्रदर्शनों में शामिल होने आई महिलाओं पर कथित हमलों की भी निंदा की।

प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि पत्रकारों को बिना किसी धमकी या हिरासत के डर के सार्वजनिक कार्यक्रमों और प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करने दी जाए। साथ ही, इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

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क्रिस्टन मस्करेनहास बनीं स्टारकॉम की ग्रुप हेड : पब्लिसिस ग्रुप में नई भूमिका

क्रिस्टन मस्करेनहास ने पब्लिसिस ग्रुप की स्टारकॉम में ग्रुप हेड के रूप में नई जिम्मेदारी संभाली है। इससे पहले वह डब्ल्यूपीपी में एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट क्लाइंट सर्विसेज पद पर थीं।

Last Modified:
Monday, 12 October, 2026
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क्रिस्टन मस्करेनहास (Kristen Mascarenhas) ने पब्लिसिस ग्रुप (Publicis Groupe) की स्टारकॉम (Starcom) में ग्रुप हेड (Group Head) के रूप में नई जिम्मेदारी संभाली है। यह मीडिया और एडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री में उनकी नई पारी है।

स्टारकॉम से जुड़ने से पहले मस्करेनहास डब्ल्यूपीपी (WPP) में एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट - क्लाइंट सर्विसेज (Associate Vice President – Client Services) के पद पर थीं। उन्होंने अगस्त 2026 में यह भूमिका संभाली थी।

इससे पहले उन्होंने माइंडशेयर (Mindshare) में तीन साल से अधिक समय तक काम किया। जनवरी से अगस्त 2023 के बीच वह मर्कल सोक्राटी (Merkle Sokrati) में मैनेजर - बिजनेस स्ट्रैटेजी (Manager – Business Strategy) के पद पर भी रहीं। मस्करेनहास ने लिंक्डइन (LinkedIn) पर अपनी नई भूमिका की जानकारी साझा करते हुए इसे अपने करियर का नया अध्याय बताया।

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हर्षद जैन बने आरपी-संजीव गोयनका ग्रुप के एफएमसीजी बिजनेस के सीईओ

आरपी-संजीव गोयनका ग्रुप ने हर्षद जैन को अपने एफएमसीजी बिजनेस का मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया है। जैन 35 वर्षों से अधिक नेतृत्व अनुभव के साथ 12 अक्टूबर 2026 से जिम्मेदारी संभालेंगे।

Last Modified:
Monday, 12 October, 2026
harshadjain

आरपी-संजीव गोयनका ग्रुप (RP-Sanjiv Goenka Group) ने हर्षद जैन (Harshad Jain) को अपने एफएमसीजी बिजनेस (FMCG Business) का मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त किया है। वह 12 अक्टूबर 2026 से नई जिम्मेदारी संभालेंगे।

जैन के पास एविएशन, मीडिया और एंटरटेनमेंट, कंज्यूमर बिजनेस और टेलीकम्युनिकेशन जैसे क्षेत्रों में 35 वर्षों से अधिक का लीडरशिप अनुभव है। उनकी विशेषज्ञता पीएंडएल मैनेजमेंट (P&L Management), सेल्स और मार्केटिंग, बिजनेस ट्रांसफॉर्मेशन, मर्जर एंड एक्विजिशन (M&A), जॉइंट वेंचर मैनेजमेंट और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन में है।

हाल ही में जैन कई कंपनियों के बोर्ड के साथ एडवाइजरी भूमिकाओं में जुड़े थे, जहां उन्होंने स्ट्रैटेजिक ग्रोथ, ट्रांसफॉर्मेशन और बिजनेस एक्सपेंशन में सहयोग किया। इससे पहले वह अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स (Adani Airport Holdings Ltd.) में सीईओ - नॉन एयरो (CEO – Non Aero) के पद पर कार्यरत थे।

जैन इससे पहले एचटी मीडिया (HT Media Ltd), भारती एयरटेल (Bharti Airtel Ltd), वर्ल्ड स्पेस इंडिया (World Space India) और पेप्सिको इंडिया (PepsiCo India) में भी लीडरशिप भूमिकाएं निभा चुके हैं। वह आरपीएसजी हाउस (RPSG House) से काम करेंगे और ग्रुप के वाइस चेयरमैन को रिपोर्ट करेंगे।

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विक्रम धालीवाल बने सिग्निफाई के ग्लोबल हेड ऑफ स्ट्रैटेजी एंड कमर्शियल एक्सीलेंस

विक्रम धालीवाल ने सिग्निफाई में ग्लोबल हेड ऑफ स्ट्रैटेजी एंड कमर्शियल एक्सीलेंस की जिम्मेदारी संभाली है। नई भूमिका में वह कंज्यूमर बिजनेस की कमर्शियल प्रभावशीलता और प्रदर्शन सुधार की देखरेख करेंगे।

Last Modified:
Monday, 12 October, 2026
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विक्रम धालीवाल (Vikram Dhaliwal) ने सिग्निफाई (Signify) में ग्लोबल हेड ऑफ स्ट्रैटेजी एंड कमर्शियल एक्सीलेंस - कंज्यूमर की जिम्मेदारी संभाली है। नई भूमिका में उनकी जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं और अब कंज्यूमर बिजनेस की समग्र कमर्शियल इफेक्टिवनेस भी उनके दायरे में होगी।

धालीवाल ग्लोबल कंज्यूमर बिजनेस के कमर्शियल इफेक्टिवनेस फ्रेमवर्क की देखरेख करेंगे। इसमें कमर्शियल वॉटरफॉल तय करना, कस्टमर सेगमेंटेशन और ग्रॉस-टू-नेट परफॉर्मेंस को बेहतर बनाने से जुड़े प्रयास शामिल होंगे।

इससे पहले वह सिग्निफाई में ग्लोबल हेड ऑफ स्ट्रैटेजी - कंज्यूमर के पद पर कार्यरत थे। धालीवाल के पास दो महाद्वीपों में काम करने का 22 वर्षों का अनुभव है।

उन्होंने ओलिवर वायमन (Oliver Wyman), स्ट्रैटेजी& (Strategy&) और डब्ल्यूपीपी ग्रुप (WPP Group) की कंपनियों में नेतृत्वकारी भूमिकाएं निभाई हैं। उनका अनुभव कंज्यूमर, रिटेल और टेक्नोलॉजी क्षेत्रों में है। उन्होंने यूरोप, एशिया और अमेरिका में काम किया है।

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पत्रकारों को हिरासत में लेने पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया समेत पत्रकार संगठनों ने जताया विरोध

इन संगठनों ने हिरासत में लिए गए सभी पत्रकारों की तत्काल और बिना शर्त रिहाई, जब्त फोन और उपकरण लौटाने तथा दिल्ली पुलिस से सार्वजनिक माफी की मांग की है।

Last Modified:
Saturday, 10 October, 2026
Press Club India

दिल्ली में 10 अक्टूबर को विरोध प्रदर्शन की कवरेज कर रहे पत्रकारों को हिरासत में लेने, उन्हें परेशान करने और उनके उपकरण जब्त करने के मामले में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया समेत पत्रकार संगठनों ने कड़ा विरोध जताया है। इन संगठनों ने हिरासत में लिए गए सभी पत्रकारों की तत्काल और बिना शर्त रिहाई, जब्त फोन और उपकरण लौटाने तथा दिल्ली पुलिस से सार्वजनिक माफी की मांग की है।

10 अक्टूबर को शनिवार के दिन मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे सैकड़ों लोगों को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था। पत्रकार संगठनों के संयुक्त बयान के मुताबिक, इस कार्रवाई के दौरान अपनी पेशेवर जिम्मेदारी निभा रहे पत्रकारों को भी पुलिस बसों में भरकर हिरासत केंद्रों में ले जाया गया। इनमें छत्रसाल स्टेडियम और चाणक्यपुरी पुलिस स्टेशन शामिल हैं।

बयान में कहा गया है कि हिरासत में लिए गए पत्रकारों में परंजॉय गुहा ठाकुरता के अलावा द क्विंट, द वायर, स्क्रॉल, रिपोर्टर टीवी, नवभारत टाइम्स और न्यूजलॉन्ड्री के पत्रकार शामिल थे। पत्रकारों ने बताया कि वे हिरासत की कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे थे, तभी उन्हें हिरासत में ले लिया गया, जबकि उनके पास प्रेस कार्ड भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे थे। बयान के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने इस दौरान कथित तौर पर कहा, ‘आजकल हर कोई खुद को पत्रकार बताता है।’ हिरासत में लिए गए पत्रकारों के आधिकारिक रिपोर्टिंग फोन छीनने और जब्त करने की शिकायतें भी सामने आई हैं।

PIB मान्यता को लेकर भी उठाए सवाल: पत्रकार संगठनों ने पत्रकारों की हिरासत को प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया है। बयान में कहा गया है कि दिल्ली पुलिस ने पहले कहा था कि केवल पत्र सूचना कार्यालय (PIB) से मान्यता प्राप्त पत्रकारों को ही रिपोर्टिंग करने की अनुमति दी जाएगी।

संगठनों ने इस शर्त पर आपत्ति जताते हुए कहा कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को PIB मान्यता से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। डिजिटल और स्वतंत्र मीडिया का एक बड़ा हिस्सा PIB कार्ड नहीं रखता, लेकिन इसके बावजूद उसे कानून के तहत प्रेस के रूप में मान्यता प्राप्त है।

बयान के मुताबिक, पत्रकार संगठनों ने इसी सप्ताह की शुरुआत में दिल्ली पुलिस आयुक्त को एक संयुक्त ज्ञापन सौंपकर इन मुद्दों को उठाया था। हालांकि, संगठनों का आरोप है कि पुलिस ने ज्ञापन में दिए गए सुझावों के विपरीत कार्रवाई की।

पत्रकार संगठनों ने रखीं चार मांगें: संयुक्त बयान में पत्रकार संगठनों ने दिल्ली पुलिस के सामने चार प्रमुख मांगें रखी हैं।

  1. हिरासत में मौजूद सभी पत्रकारों को तत्काल और बिना शर्त रिहा किया जाए।
  2. जब्त किए गए सभी फोन और उपकरण तत्काल लौटाए जाएं।
  3. दिल्ली पुलिस सार्वजनिक रूप से माफी मांगे और उन वरिष्ठ अधिकारियों के आचरण की जांच कराई जाए, जिन्होंने प्रेस पहचान पत्र देखने के बावजूद पत्रकारों को हिरासत में लिया।
  4. स्पष्ट आश्वासन दिया जाए कि पत्रकारों को विरोध प्रदर्शनों की कवरेज करने से नहीं रोका जाएगा, क्योंकि यह उनका संवैधानिक दायित्व है।

राजधानी में पुलिस व्यवस्था पर भी उठाए सवाल: प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के साथ-साथ इंडियन विमेंस प्रेस कॉर्प्स, दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स और केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (दिल्ली यूनिट) की ओर से जारी संयुक्त बयान में कहा गया है कि पत्रकारों को काम करने से रोकना, बिना कारण हिरासत में लेना और शांतिपूर्ण तरीके से संस्थानों से सवाल पूछने की कोशिश को रोकने के लिए राजधानी में किले जैसी व्यवस्था बनाना चिंताजनक है।

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मीडिया इंडस्ट्री के लिए चुनौती बना AI सर्च, क्या खतरे में है भविष्य?

मान लीजिए आपने गूगल पर सवाल सर्च किया और AI बॉक्स में तुरंत जवाब मिल गया, बिना किसी लिंक पर जाए आपने पढ़ा और पेज बंद कर दिया—यही बदलाव अब पब्लिशर्स के लिए बड़ी चुनौती है।

Last Modified:
Saturday, 10 October, 2026
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मान लीजिए आपने गूगल पर सर्च किया- “भारत में महंगाई क्यों बढ़ रही है?” और कुछ ही सेकंड में आपके सामने एक बड़े AI बॉक्स में पूरा जवाब आ गया। न आपको किसी लिंक पर क्लिक करना पड़ा, न किसी वेबसाइट पर जाना पड़ा। आपने बस जवाब पढ़ा और पेज बंद कर दिया। देखने में यह कितना आसान लगता है, लेकिन यही बदलाव अब दुनिया भर के पब्लिशर्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

2026 में मीडिया इंडस्ट्री एक ऐसी जंग के दौर में है, जो न कोर्टरूम में पूरी तरह लड़ी जा रही है और न ही संसद की बहसों में—बल्कि सर्च इंजन के रिजल्ट पेज पर ही इसका असली मुकाबला हो रहा है। एक तरफ अखबार, न्यूज पोर्टल, ब्लॉग और कंटेंट क्रिएटर्स हैं, जिन्होंने सालों मेहनत से अपनी जगह बनाई है, और दूसरी तरफ Artificial Intelligence (AI) है, जो उन्हीं के कंटेंट से सीखकर यूजर्स को सीधे, संक्षिप्त जवाब देने लगा है—और कई बार मूल वेबसाइट तक जाने की जरूरत ही खत्म कर देता है।

Zero-Click का जमाना: जब Click ही नहीं हुई तो पैसा कहां से आएगा?

गूगल ने मई 2024 में अमेरिका में AI Overview (AIO) लॉन्च किया था। मई 2025 तक यह फीचर 200 से ज्यादा देशों और 40 भाषाओं तक पहुंच गया। इसमें भारत की हिंदी, तमिल और तेलुगू जैसी भाषाएं भी शामिल हैं। नतीजा? मीडिया इंडस्ट्री के लिए बड़ा झटका।

प्यू रिसर्च सेंटर (Pew Research Center) ने मार्च 2025 में अमेरिका के 900 लोगों की इंटरनेट इस्तेमाल करने की आदतों को ट्रैक किया और गूगल पर की गई 68 हजार से ज्यादा सर्च का विश्लेषण किया। रिपोर्ट में सामने आया कि जब AI Overview दिखाई देता है, तो लोग सिर्फ 8 फीसदी मामलों में ही किसी लिंक पर क्लिक करते हैं। जबकि बिना AI Overview के यह आंकड़ा 15 फीसदी था। यानी क्लिक में करीब 47 फीसदी की गिरावट आई। सबसे बड़ी बात यह कि AI Overview में दिए गए स्रोतों पर सिर्फ 1 फीसदी लोगों ने क्लिक किया।

Similarweb के आंकड़ों के मुताबिक, मई 2024 से मई 2025 के बीच खबरों से जुड़ी सर्च में “जीरो-क्लिक” सर्च का हिस्सा 56 फीसदी से बढ़कर 69 फीसदी हो गया। आसान शब्दों में कहें तो खबरों से जुड़ी 10 में से करीब 7 सर्च ऐसी रहीं, जिनमें लोग किसी भी वेबसाइट पर नहीं पहुंचे।

वहीं, रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ जर्नलिज्म (Reuters Institute for the Study of Journalism) की जनवरी 2026 की रिपोर्ट और ज्यादा चिंता बढ़ाने वाली है। दुनिया के 51 देशों के 280 मीडिया लीडर्स का सर्वे किया गया, जिनमें 64 एडिटर-इन-चीफ और 64 चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर्स (CEO) शामिल थे। उनका मानना है कि अगले तीन साल में सर्च इंजन से आने वाला ट्रैफिक औसतन 43 फीसदी तक गिर सकता है।

चार्टबीट ने 2,500 से ज्यादा न्यूज वेबसाइट्स के आंकड़ों का अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि नवंबर 2024 से नवंबर 2025 के बीच गूगल सर्च से आने वाले विजिटर्स में 33 फीसदी की गिरावट आई। वहीं, गूगल डिस्कवर से आने वाला ट्रैफिक 21 फीसदी घट गया। अमेरिका में यह गिरावट और ज्यादा, यानी 38 फीसदी रही।

छोटे पब्लिशर्स का हाल सबसे बुरा

इस नुकसान का असर सभी पर एक जैसा नहीं पड़ा। बड़े पब्लिशर्स- जैसे The New York Times, जिसके 2025 के आखिर तक 1.278 करोड़ सब्सक्राइबर्स थे, अभी भी किसी तरह टिके हुए हैं। लेकिन छोटे पब्लिशर्स को सबसे बड़ा झटका लगा। 2025 में छोटे पब्लिशर्स का गूगल रेफरल ट्रैफिक करीब 60 फीसदी तक गिर गया, जबकि बड़े पब्लिशर्स में यह गिरावट 22 फीसदी रही।

Business Insider का ऑर्गेनिक सर्च ट्रैफिक अप्रैल 2022 से अप्रैल 2025 के बीच 55 फीसदी तक गिर गया। हालत ऐसी हुई कि कंपनी को मई 2025 में अपने 21 फीसदी एम्प्लॉयीज की छंटनी करनी पड़ी।

वहीं HuffPost की डेस्कटॉप और मोबाइल साइट्स पर सर्च से आने वाले विजिटर्स की संख्या आधी रह गई। यहां तक कि The New York Times का सर्च ट्रैफिक शेयर भी 2022 के 44 फीसदी से घटकर 2025 में 37 फीसदी पर आ गया।

DMG Media , जो MailOnline और Metro जैसे बड़े ब्रिटिश प्रकाशन चलाती है, ने सितंबर 2025 में बताया कि कुछ खास सर्च में क्लिक-थ्रू रेट 89 फीसदी तक गिर गई।

शिक्षा प्लेटफॉर्म Chegg को तो और बड़ा नुकसान हुआ। जनवरी 2024 से जनवरी 2025 के बीच कंपनी का गैर-सब्सक्राइबर ट्रैफिक 49 फीसदी तक गिर गया। इसके बाद कंपनी ने गूगल के खिलाफ प्रतिस्पर्धा विरोधी कानून (एंटीट्रस्ट) का मुकदमा भी दायर कर दिया।

Google की AI और SEO का बदलता मॉडल

कभी SEO यानी सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन का सीधा मतलब होता था- सही कीवर्ड ढूंढो, अच्छा कंटेंट लिखो, गूगल पर ऊपर जगह बनाओ, ट्रैफिक आएगा और विज्ञापनों से कमाई होगी। यह मॉडल कई सालों तक चलता रहा। लेकिन 2026 तक आते-आते यह मॉडल बुरी तरह बदल चुका है।

Seer Interactive ने जून 2024 से सितंबर 2025 के बीच 42 संस्थाओं की 3,119 जानकारी आधारित सर्च को ट्रैक किया। रिपोर्ट में पाया गया कि जिन सर्च में AI Overview दिखाई देता था, वहां ऑर्गेनिक क्लिक-थ्रू रेट 1.76 फीसदी से गिरकर सिर्फ 0.61 फीसदी रह गई। यानी करीब 61 फीसदी की गिरावट। वहीं पेड क्लिक-थ्रू रेट 19.7 फीसदी से टूटकर 6.34 फीसदी पर आ गई, यानी 68 फीसदी की भारी गिरावट।

Semrush के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 की तीसरी तिमाही तक गूगल की करीब 20 से 25 फीसदी सर्च में AI Overview दिखने लगा था। वहीं Gartner का अनुमान है कि 2026 के आखिर तक ऑर्गेनिक सर्च ट्रैफिक का 25 फीसदी हिस्सा AI चैटबॉट्स और वॉइस असिस्टेंट्स की तरफ चला जाएगा।

भारत में भी तेजी से बदलाव दिख रहा है। AI सर्च इंजन Perplexity ने 2024-25 के दौरान 640 फीसदी की बढ़त दर्ज की, खासकर Airtel के साथ साझेदारी के बाद। वहीं ChatGPT अब भारत में प्रोफेशनल्स के बीच दूसरा सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला प्लेटफॉर्म बन चुका है।

टियर-2 और टियर-3 शहरों में 58 फीसदी सर्च अब आवाज के जरिए हो रही हैं। लोग हिंदी, तमिल, तेलुगू और बंगाली जैसी भाषाओं में सवाल पूछ रहे हैं।

इस बदलाव ने SEO इंडस्ट्री की दिशा ही बदल दी है। पहले कीवर्ड रैंकिंग सबसे ज्यादा मायने रखती थी, लेकिन अब “जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन” यानी GEO का दौर शुरू हो गया है। इसका मतलब है कि AI के जवाबों में आपके ब्रैंड या कंटेंट का जिक्र हो, चाहे यूजर आपकी वेबसाइट पर आए या नहीं।

अहरेफ्स की दिसंबर 2025 की स्टडी के मुताबिक, जिन कीवर्ड्स पर AI Overview दिखती है, वहां पहले नंबर पर आने वाली वेबसाइट की क्लिक-थ्रू रेट में 34.5 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई।

Ad Revenue की तस्वीर: पब्लिशर्स का दर्द

पब्लिशर्स का बिजनेस मॉडल काफी सीधा था — ज्यादा ट्रैफिक आएगा, ज्यादा विज्ञापन दिखेंगे और ज्यादा कमाई होगी। लेकिन गूगल के AI सिस्टम ने इस पूरे खेल को बदल दिया है।

अब जब लोग वेबसाइट पर पहुंच ही नहीं रहे, तो विज्ञापन कौन देखेगा? पेज व्यूज कहां से आएंगे? और क्लिक कैसे गिने जाएंगे?

पब्लिशर्स की विज्ञापन कमाई पर दो तरफ से असर पड़ रहा है। पहला, वेबसाइट्स पर ट्रैफिक लगातार घट रहा है। दूसरा, विज्ञापन देने वाली कंपनियां खुद गूगल और Meta जैसे बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की तरफ जा रही हैं, क्योंकि वहां ग्राहकों को ज्यादा सटीक तरीके से टारगेट किया जा सकता है।

मार्च 2026 की फिक्की-ईवाई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर 2025 में 9 फीसदी बढ़कर 2.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। लेकिन इस बढ़त का सबसे ज्यादा फायदा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को मिला, पारंपरिक टीवी और न्यूज पब्लिशर्स को नहीं।

डिजिटल विज्ञापन बाजार 26 फीसदी बढ़कर 947 अरब रुपये तक पहुंच गया। यानी ब्रैंड्स का पैसा डिजिटल दुनिया में जा रहा है, लेकिन न्यूज वेबसाइट्स पर नहीं, बल्कि गूगल और Meta जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स के इकोसिस्टम में।

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की ‘जर्नलिज्म एंड टेक्नोलॉजी ट्रेंड्स 2026’ रिपोर्ट के अनुसार, सर्वे में शामिल पब्लिशर्स ने कहा कि अब कमाई के लिए सब्सक्रिप्शन और मेंबरशिप उनकी पहली प्राथमिकता बन चुकी है। 76 फीसदी पब्लिशर्स ने इसे सबसे अहम बताया, जबकि डिस्प्ले विज्ञापन को 68 फीसदी ने दूसरी प्राथमिकता माना। 

पब्लिशर्स भी चुप नहीं बैठे हैं। वे इस संकट से निपटने के लिए कई मोर्चों पर लड़ाई लड़ रहे हैं।

  1. AI Licensing Deals: कंटेंट का दाम वसूलो

    बड़े पब्लिशर्स अब AI कंपनियों के साथ समझौते कर रहे हैं। मतलब- AI कंपनियां उनका कंटेंट इस्तेमाल करें और बदले में उन्हें पैसा दें।

    News Corp ने OpenAI के साथ 5 साल की 25 करोड़ डॉलर से ज्यादा की डील की है। वहीं The New York Times को Amazon की एलेक्सा और रूफस शॉपिंग असिस्टेंट सेवाओं से हर साल करीब 2 से 2.5 करोड़ डॉलर मिल रहे हैं।

    इसके अलावा Associated Press, Time, Fortune, CNN, The Washington Post और Condé Nast जैसी कई बड़ी मीडिया कंपनियां किसी न किसी AI कंपनी के साथ समझौते कर चुकी हैं।

    लेकिन यह मॉडल फिलहाल सिर्फ बड़े खिलाड़ियों के लिए फायदेमंद दिख रहा है। मिड-साइज पब्लिशर्स को 10 लाख से 50 लाख डॉलर तक की डील मिल सकती है, जो उनके ट्रैफिक नुकसान की भरपाई के लिए काफी नहीं है। वहीं छोटे पब्लिशर्स और स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स के लिए अभी ऐसे समझौतों के दरवाजे लगभग बंद हैं।

    इसी बीच Cloudflare ने “पे पर क्रॉल” नाम का एक मार्केटप्लेस शुरू किया है। इसमें पब्लिशर्स तय कर सकते हैं कि AI कंपनियां उनके कंटेंट को स्कैन करने के बदले कितना पैसा देंगी।

    जून 2025 में Cloudflare के आंकड़ों ने एक चौंकाने वाली तस्वीर दिखाई। गूगल हर 9 से 14 पेज स्कैन करने पर एक विजिटर वेबसाइट को भेजता है। लेकिन OpenAI करीब 1,700 पेज स्कैन करने के बाद सिर्फ एक विजिटर भेजता है। वहीं Anthropic का अनुपात तो 73,000 पेज पर सिर्फ एक विजिटर का रहा।

    यही वजह है कि दुनिया की 79 फीसदी बड़ी न्यूज वेबसाइट्स ने कम से कम एक AI ट्रेनिंग बॉट को ब्लॉक कर दिया है।

  1. सब्सक्रिप्शंस और डायरेक्ट ऑडियंस: प्लेटफॉ़र्म पर नहीं, खुद पर भरोसा

जो पब्लिशर्स AI की मार से बचे हैं, उनका एक कॉमन सिक्रेट है- उन्होंने गूगल पर निर्भरता कम की।

The New Yorker ने 2025 में रिकॉर्ड कमाई, रिकॉर्ड मुनाफा और रिकॉर्ड सब्सक्राइबर्स हासिल किए। वहीं The New York Times के 2025 के आखिर तक 1.278 करोड़ सब्सक्राइबर्स हो चुके थे। कंपनी का लक्ष्य 2027 तक इसे बढ़ाकर 1.5 करोड़ तक पहुंचाने का है।

Time मैगजीन का अनुमान है कि 2026 में उसकी कुल कमाई का 50 फीसदी हिस्सा इवेंट्स से आएगा, जबकि 2023 में यह हिस्सा 28 फीसदी था। वहीं Bloomberg Media के ग्लोबल फोरम्स से 2025 में स्पॉन्सरशिप कमाई में 30 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई।

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक, 76 फीसदी मीडिया लीडर्स का कहना है कि अब वे चाहते हैं कि उनके कर्मचारी “क्रिएटर्स” की तरह काम करें। यानी सिर्फ खबर लिखना नहीं, बल्कि ऑडियंस के साथ सीधा जुड़ाव बनाना भी जरूरी हो गया है।

इसके अलावा 50 फीसदी पब्लिशर्स अब क्रिएटर पार्टनरशिप्स पर काम कर रहे हैं, ताकि नए दर्शकों तक पहुंच बनाई जा सके।

  1. SEO का नया अवतार: GEO (Generative Engine Optimization)
पहले SEO का मतलब था — गूगल के टॉप 10 रिजल्ट्स में जगह बनाओ। लेकिन अब दौर GEO यानी “जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन” का है। अब कोशिश यह होती है कि AI के जवाबों में आपकी वेबसाइट या कंटेंट का जिक्र आए।

रिसर्च बताती है कि जिन वेबसाइट्स का नाम AI ओवरव्यू में आता है, उनकी ऑर्गेनिक क्लिक-थ्रू रेट 35 फीसदी ज्यादा रहती है। वहीं पेड क्लिक-थ्रू रेट 91 फीसदी तक बढ़ जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जिस कंटेंट का ढांचा साफ और व्यवस्थित होगा — जैसे सवाल-जवाब फॉर्मेट, छोटे हेडिंग्स और लिस्ट्स — उसे AI ज्यादा आसानी से समझता है और अपने जवाबों में ज्यादा इस्तेमाल करता है।

ग्रोथ मेमो के फरवरी 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, किसी आर्टिकल के शुरुआती 30 फीसदी हिस्से से ही 44 फीसदी AI सिटेशंस आती हैं। यानी अब आर्टिकल की शुरुआती लाइनें पहले से कहीं ज्यादा अहम हो गई हैं।

भारत में यह बदलाव एक बड़े मौके की तरह भी देखा जा रहा है। हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में AI द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कंटेंट की अभी कमी है। गूगल का AI सिस्टम अब हिंदी में भी जवाब देने लगा है, लेकिन हिंदी कंटेंट क्रिएटर्स अभी GEO के हिसाब से कंटेंट तैयार नहीं कर रहे। ऐसे में जो लोग जल्दी इस दिशा में काम करेंगे, उन्हें सबसे बड़ा फायदा मिल सकता है।

ChatGPT से Traffic: उम्मीद कम, हकीकत और कम

कुछ लोगों को लगता है कि अगर गूगल से ट्रैफिक कम हो रहा है, तो उसकी भरपाई ChatGPT जैसे AI प्लेटफॉर्म्स से हो जाएगी।

सितंबर से नवंबर 2025 के बीच ChatGPT ने पब्लिशर्स को करीब 1.2 अरब आउटगोइंग रेफरल्स भेजे, जो पिछले साल के मुकाबले 52 फीसदी ज्यादा थे। सुनने में यह आंकड़ा अच्छा लगता है, लेकिन असली तस्वीर अलग है।

कंडक्टर की रिसर्च के मुताबिक, सभी AI प्लेटफॉर्म्स मिलकर भी पब्लिशर्स के कुल ट्रैफिक का सिर्फ 1 फीसदी हिस्सा ही भेज पा रहे हैं।

वहीं रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट बताती है कि अकेला गूगल, ChatGPT के मुकाबले 500 गुना ज्यादा रेफरल्स भेजता है। अगर गूगल सर्च और गूगल डिस्कवर को साथ जोड़ दें, तो यह अंतर 1,300 गुना तक पहुंच जाता है।

यानी AI सर्च अभी नया ट्रैफिक स्रोत नहीं बन पाया है। उल्टा, उसने पब्लिशर्स का पुराना ट्रैफिक कम कर दिया है।

भारत के पब्लिशर्स के लिए क्या मायने रखता है?

भारत में internet users की संख्या 2025 के अंत तक 1.03 billion यानी एक अरब तीन करोड़ पार कर गई। यहाँ digital news market 2026 के अंत तक $1 billion revenue generate करने का अनुमान है।

लेकिन AI का असर भारत पर भी उतना ही गहरा है। Perplexity अब India में US से भी बड़ा market बन गया है। ChatGPT फरवरी 2026 तक 900 मिलियन वीकली एक्टिव यूजर्स तक पहुंच गया और भारत में भी 10 करोड़ weekly users। Google AI Overviews 40 भाषाओं में हैं जिनमें हिंदी भी शामिल है।

भारत के हिंदी न्यूज़ पोर्टल्स, regional language sites और छोटे digital पब्लिशर्स — जो Google Search से अपना ज़्यादातर traffic पाते थे — अब एक बड़े transition के मुहाने पर खड़े हैं।

असली सवाल: कंटेंट बनाने वाले को पैसा कौन देगा?

यह सिर्फ बिजनेस मॉडल का मामला नहीं है, बल्कि पत्रकारिता के अस्तित्व का सवाल बन चुका है।

अगर पब्लिशर्स कमाई नहीं कर पाएंगे, तो वे रिपोर्टर्स नहीं रख पाएंगे। रिपोर्टर्स नहीं होंगे, तो ग्राउंड रिपोर्टिंग कम हो जाएगी। और जब ग्राउंड रिपोर्टिंग ही नहीं होगी, तो एआई के पास इस्तेमाल करने के लिए ओरिजिनल कंटेंट भी नहीं बचेगा। बिना ओरिजिनल कंटेंट के एआई सिस्टम भी ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएंगे।

यानी यह एक खतरनाक चक्र बनता जा रहा है, जो पूरे कंटेंट इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा सकता है।

Cloudflare के मुख्य कार्यकारी अधिकारी Matthew Prince ने जुलाई 2025 में पब्लिशर्स को ऐसे टूल्स दिए, जिनकी मदद से वे एआई बॉट्स को ब्लॉक कर सकते हैं। नए Cloudflare ग्राहकों के लिए यह सुविधा डिफॉल्ट रूप से शुरू की गई।

इसका मतलब है कि अब पब्लिशर्स अपने कंटेंट को एआई कंपनियों के लिए मुफ्त में उपलब्ध नहीं कराना चाहते। वे अपने कंटेंट की अहमियत और कमी दोनों बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन गूगल को पूरी तरह ब्लॉक करना आसान नहीं है, क्योंकि सर्च बाजार में उसकी हिस्सेदारी 90 फीसदी से ज्यादा है। अगर कोई पब्लिशर गूगल को ब्लॉक कर दे, तो उसकी वेबसाइट इंटरनेट पर लगभग गायब जैसी हो सकती है।

आगे का रास्ता

Dotdash Meredith के चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर Neil Vogel का कहना है कि AI प्लेटफॉर्म्स को पब्लिशर्स और क्रिएटर्स को उनके कंटेंट का उचित पैसा देना होगा। वहीं Condé Nast के मुख्य कार्यकारी अधिकारी Roger Lynch ने कहा कि OpenAI के साथ साझेदारी से पारंपरिक सर्च से होने वाले कमाई के नुकसान की कुछ हद तक भरपाई हो रही है।

लेकिन छोटे पब्लिशर्स की सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि उनके पास न तो OpenAI जैसी बड़ी कंपनियों के साथ डील है और न ही Condé Nast जैसा बड़ा ब्रैंड नाम।

ऐसे में 2026 में पब्लिशर्स के सामने टिके रहने के लिए कुछ ही रास्ते बचे हैं। जैसे — सब्सक्रिप्शन और मेंबरशिप बढ़ाना, अपनी ऑडियंस के साथ सीधा रिश्ता बनाना जिसे कोई प्लेटफॉर्म छीन न सके, न्यूजलेटर्स को कमाई का मजबूत जरिया बनाना, इवेंट्स और वास्तविक अनुभवों पर निवेश करना और जीईओ यानी “जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन” सीखना।

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट में एक और दिलचस्प बात सामने आई। पब्लिशर्स अब सबसे ज्यादा निवेश YouTube पर करना चाहते हैं। 2025 में इसका नेट स्कोर 52 था, जो 2026 में बढ़कर 74 हो गया। इससे साफ है कि मीडिया इंडस्ट्री तेजी से वीडियो पत्रकारिता की तरफ बढ़ रही है।

एक युग का अंत, एक नई शुरुआत

जिस क्लिक इकॉनमी पर पिछले 20 साल की डिजिटल पत्रकारिता टिकी हुई थी, वह अब तेजी से बदल रही है। AI ने सामान्य कंटेंट को लगभग एक जैसी चीज बना दिया है। अब साधारण सवालों के जवाब AI खुद देने लगा है।

ऐसे में वही पत्रकारिता टिक पाएगी, जिसमें ओरिजिनल रिपोर्टिंग हो, एक्सक्लूसिव आंकड़े हों, विशेषज्ञों का विश्लेषण हो और ऐसा कंटेंट हो जिसे AI आसानी से कॉपी न कर सके।

2026 की मीडिया दुनिया की सबसे बड़ी चिंता यही है — “इनविजिबल पब्लिशर”। यानी वह पब्लिशर जो कंटेंट तो बना रहा है, जवाब भी उसी के कंटेंट से तैयार हो रहे हैं, लेकिन लोग उसकी वेबसाइट तक पहुंच ही नहीं रहे।

हालांकि इतिहास बताता है कि हर बड़ी तकनीकी क्रांति के समय मीडिया इंडस्ट्री ने खुद को बदला है। जब रेडियो आया तो अखबारों को डर लगा। टीवी आया तो रेडियो को खतरा महसूस हुआ। इंटरनेट आया तो टीवी इंडस्ट्री चिंतित हो गई। लेकिन हर दौर में मीडिया ने खुद को नए तरीके से ढाला।

अब AI सर्च के दौर में भी पब्लिशर्स को खुद को बदलना होगा। सिर्फ गूगल के हिसाब से नहीं, बल्कि अपने पाठकों और दर्शकों की जरूरतों के हिसाब से।

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Meta ने 7 देशों में ByteDance के ऐड पर लगाई रोक, TikTok की मार्केटिंग पर पड़ेगा असर

मेटा (Meta) ने डिजिटल विज्ञापन के बाजार में बड़ा कदम उठाते हुए सात देशों में बाइटडांस (ByteDance) के विज्ञापनों पर रोक लगा दी है।

Last Modified:
Saturday, 10 October, 2026
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मेटा (Meta) ने डिजिटल विज्ञापन के बाजार में बड़ा कदम उठाते हुए सात देशों में बाइटडांस (ByteDance) के विज्ञापनों पर रोक लगा दी है। बाइटडांस, टिकटॉक (TikTok) की मूल कंपनी है। यह रोक फेसबुक (Facebook), इंस्टाग्राम (Instagram) और मेटा के दूसरे प्लेटफॉर्म पर लागू की गई है। इसके साथ ही दोनों कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा अब यूजर्स और कंटेंट क्रिएटर्स तक सीमित न रहकर विज्ञापन के कारोबार तक पहुंच गई है।

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, यह रोक गुरुवार, 8 अक्टूबर से लागू हुई है। अमेरिका, कनाडा, मिस्र, इंडोनेशिया, जापान, थाईलैंड और वियतनाम में बाइटडांस के विज्ञापन नहीं चलाए जा सकेंगे। इसमें बाइटडांस की ओर से सीधे दिए जाने वाले विज्ञापनों के साथ-साथ उन तीसरे पक्ष के विज्ञापनदाताओं के अभियान भी शामिल हैं, जो यूजर्स को टिकटॉक या बाइटडांस के दूसरे प्लेटफॉर्म पर ले जाते हैं।

मेटा ने इस फैसले को अपनी विज्ञापन नीतियों में व्यापक बदलाव के बजाय कारोबारी फैसला बताया है। कंपनी के प्रवक्ता क्रिस स्ग्रो ने ब्लूमबर्ग से कहा कि मेटा अपने उत्पादों और यूजर अनुभव के जरिए प्रतिस्पर्धियों से मुकाबला करना जारी रखेगी। हालांकि, इस रोक के बाद बाइटडांस के लिए इन सात देशों में मेटा के विज्ञापन नेटवर्क का इस्तेमाल करके अपनी सेवाओं का प्रचार करना मुश्किल हो जाएगा।

यूजर्स और विज्ञापनदाताओं के लिए बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा

यह फैसला दिखाता है कि सोशल मीडिया कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा अब सिर्फ यूजर्स को अपने प्लेटफॉर्म से जोड़ने तक सीमित नहीं है। फेसबुक और इंस्टाग्राम की टिकटॉक से यूजर्स, कंटेंट क्रिएटर्स और विज्ञापनदाताओं को लेकर सीधी प्रतिस्पर्धा है। छोटे वीडियो सोशल मीडिया का एक अहम हिस्सा बन चुके हैं।

मेटा की इस रोक से बाइटडांस के पास नए यूजर्स तक पहुंचने का एक रास्ता सीमित हो सकता है। हालांकि, इससे कंपनी के कुल विज्ञापन कारोबार या नए यूजर्स जोड़ने की रणनीति पर कितना असर पड़ेगा, यह अभी साफ नहीं है।

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर भी विवाद

दोनों कंपनियों के बीच यह खींचतान ऐसे समय में हो रही है, जब इंटरनेट पर बच्चों और किशोरों की सुरक्षा को लेकर बहस तेज है।

अगस्त में मेटा ने अमेरिका के कई राज्यों के साथ एक समझौता किया था, जिसकी कीमत 18 अरब डॉलर तक बताई गई। यह समझौता मेटा के प्लेटफॉर्म पर बच्चों और किशोरों को कथित नुकसान पहुंचने से जुड़े आरोपों के मामले में हुआ। इसके तहत फेसबुक और इंस्टाग्राम पर कम उम्र के यूजर्स के इस्तेमाल को लेकर बदलाव करने होंगे। इनमें रोजाना इस्तेमाल की समय-सीमा, रात के समय इस्तेमाल पर रोक और उम्र के हिसाब से प्रतिबंधित सामग्री के लिए ज्यादा सुरक्षा उपाय शामिल हैं। मेटा ने इस मामले में लगाए गए आरोपों को खारिज किया है।

इसके बाद मेटा ने टिकटॉक और गूगल के स्वामित्व वाले यूट्यूब (YouTube) से भी इसी तरह के सुरक्षा उपाय अपनाने की मांग की। कंपनी का कहना है कि किशोरों की सुरक्षा पूरे उद्योग की जिम्मेदारी होनी चाहिए, न कि किसी एक प्लेटफॉर्म की।

इस मुद्दे पर दोनों कंपनियों के बीच मतभेद भी सामने आए हैं। मेटा ने जरूरत से ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल और ऑनलाइन सुरक्षा पर होने वाली चर्चाओं में टिकटॉक की भूमिका की सार्वजनिक रूप से आलोचना की है।

टिकटॉक ने भी उठाए कदम

विज्ञापन को लेकर दोनों कंपनियों के बीच विवाद का असर प्लेटफॉर्म की सुविधाओं पर भी दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, टिकटॉक ने यूजर प्रोफाइल से इंस्टाग्राम के लिए दिए जाने वाले खास लिंक हटा दिए हैं। हालांकि, यूजर्स अब भी अपनी प्रोफाइल में ऐसे वेबसाइट लिंक जोड़ सकते हैं, जो लोगों को दूसरी सेवाओं तक ले जाते हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि टिकटॉक ने किशोरों की सुरक्षा को लेकर समान प्रतिबद्धताएं अपनाने की मांग करने वाले मेटा के विज्ञापनों को अपने प्लेटफॉर्म पर जगह नहीं दी।

इस तरह दोनों कंपनियां दो मोर्चों पर मुकाबला कर रही हैं। एक ओर वे यूजर्स और कंटेंट क्रिएटर्स को अपने साथ जोड़ना चाहती हैं, वहीं दूसरी ओर बच्चों और किशोरों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर अपनी बात भी आगे बढ़ा रही हैं। मेटा का विज्ञापनों पर रोक लगाने का फैसला इस प्रतिस्पर्धा में कारोबारी कदम है, लेकिन बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी बहस इससे कहीं ज्यादा व्यापक है।

अमेरिका में टिकटॉक के 20 करोड़ से ज्यादा यूजर्स

टिकटॉक अमेरिका में एक ऐसे संयुक्त उपक्रम के जरिए काम कर रहा है, जिसमें अमेरिकी निवेशकों की बहुमत हिस्सेदारी है। यह व्यवस्था अमेरिकी यूजर्स के डेटा की सुरक्षा और देशभर में टिकटॉक पर प्रतिबंध से बचने के उद्देश्य से की गई है।

अमेरिका में टिकटॉक के 20 करोड़ से ज्यादा यूजर्स हैं। ऐसे में यह बाजार यूजर्स का ध्यान खींचने और विज्ञापन से होने वाली कमाई के लिहाज से काफी अहम है।

विज्ञापनदाताओं पर क्या होगा असर?

मेटा की रोक के बाद सात प्रभावित देशों में टिकटॉक और बाइटडांस की दूसरी सेवाओं का प्रचार करने वाले विज्ञापनदाताओं को अपने कैंपेंस की योजना बनाते समय इन प्रतिबंधों का ध्यान रखना होगा। यह रोक सिर्फ बाइटडांस के अपने विज्ञापनों तक सीमित नहीं है। उन तीसरे पक्ष के विज्ञापनदाताओं पर भी लागू होगी, जिनके अभियान यूजर्स को बाइटडांस के प्लेटफॉर्म पर ले जाते हैं।

इसलिए मेटा का यह फैसला केवल कुछ विज्ञापनों को रोकने तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया कंपनियां जब एक ही तरह के यूजर्स, क्रिएटर्स और कारोबारी साझेदारियों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही हैं, तो विज्ञापन चलाने की सुविधा भी मुकाबले का एक अहम हिस्सा बन गई है।

फिलहाल यह देखना बाकी है कि इस फैसले से यूजर्स के व्यवहार या विज्ञापन बजट पर कितना असर पड़ता है। इतना जरूर है कि मेटा और टिकटॉक के बीच प्रतिस्पर्धा में अब एक नया मोर्चा खुल गया है।

 

 

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अंकिता आचार्य बनीं WPP मीडिया में नेस्ले की ग्लोबल स्ट्रैटेजी डायरेक्टर

अंकिता आचार्य ने WPP मीडिया में नेस्ले के लिए ग्लोबल स्ट्रैटेजी डायरेक्टर की जिम्मेदारी संभाली है। इससे पहले वह एसेंसमीडियाकॉम में एडिडास के लिए ब्रांड स्ट्रैटेजी डायरेक्टर थीं।

Last Modified:
Thursday, 08 October, 2026
wpp media

अंकिता आचार्य (Ankitha Acharya) ने डब्ल्यूपीपी मीडिया (WPP Media) में नेस्ले (Nestlé) के लिए ग्लोबल स्ट्रैटेजी डायरेक्टर (Global Strategy Director) के रूप में नई जिम्मेदारी संभाली है। इस नियुक्ति से पहले आचार्य एसेंसमीडियाकॉम (EssenceMediacom) में एडिडास (adidas) के लिए ब्रांड स्ट्रैटेजी डायरेक्टर, इमर्जिंग मार्केट्स (Brand Strategy Director, Emerging Markets) थीं। यहां उन्होंने 17 उभरते बाजारों में स्ट्रैटेजी की जिम्मेदारी संभाली।

इससे पहले वह माइंडशेयर (Mindshare) में वोल्वो (Volvo) के लिए प्लानिंग एंड स्ट्रैटेजी डायरेक्टर, यूरोप (Planning and Strategy Director, Europe) थीं। इस भूमिका में उन्होंने छह यूरोपीय बाजारों में प्लानिंग और स्ट्रैटेजी का नेतृत्व किया।

आचार्य वेवमेकर (Wavemaker) और परफॉर्मिक्स इंडिया (Performics India) सहित अन्य कंपनियों में भी अलग-अलग भूमिकाओं में काम कर चुकी हैं। उनके पास ग्लोबल और लोकल मार्केट्स में काम करने का अनुभव है। उनकी विशेषज्ञता ब्रांड स्ट्रैटेजी (Brand Strategy), प्लानिंग (Planning) और ऑडियंस प्लानिंग (Audience Planning) में है।

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महेश सिंह ने वंडर सीमेंट में संभाली नई कॉरपोरेट ब्रांड कम्युनिकेशन जिम्मेदारी

वंडर सीमेंट ने महेश सिंह को वाइस प्रेसिडेंट – कॉरपोरेट ब्रांड कम्युनिकेशन नियुक्त किया है। वह ब्रांड स्ट्रैटेजी, डिजिटल मार्केटिंग, पब्लिक रिलेशंस की जिम्मेदारी संभालेंगे।

Last Modified:
Thursday, 08 October, 2026
maheshsingh

प्रमुख सीमेंट निर्माता कंपनी वंडर सीमेंट (Wonder Cement) ने महेश सिंह को वाइस प्रेसिडेंट – कॉरपोरेट ब्रांड कम्युनिकेशन (Vice President – Corporate Brand Communication) नियुक्त किया है। नई भूमिका में वह कंपनी की कॉरपोरेट ब्रांड स्ट्रैटेजी और कम्युनिकेशन की जिम्मेदारी संभालेंगे।

महेश सिंह के दायरे में डिजिटल और परफॉर्मेंस मार्केटिंग (Digital and Performance Marketing), पब्लिक रिलेशंस (Public Relations), ट्रेड, इवेंट्स, एग्जिबिशंस, स्पोर्ट्स और एक्सपीरिएंशियल मार्केटिंग (Experiential Marketing) शामिल होंगे।

महेश के पास मार्केटिंग और कम्युनिकेशंस के क्षेत्र में दो दशक से अधिक का अनुभव है। उनके करियर में ऑटोमोटिव इंडस्ट्री, एजेंसी और उद्यमिता से जुड़ी अलग-अलग भूमिकाएं रही हैं। उन्होंने होंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर इंडिया (Honda Motorcycle & Scooter India) के साथ एक दशक से अधिक समय तक काम किया।

यहां उन्होंने इंटीग्रेटेड कम्युनिकेशन (Integrated Communication), मीडिया, डिजिटल, रिटेल और कंज्यूमर एंगेजमेंट से जुड़े कार्यों की जिम्मेदारी संभाली। इस दौरान उन्होंने कंपनी की डिजिटल मार्केटिंग क्षमताओं को विकसित करने में भी योगदान दिया।

वंडर सीमेंट से जुड़ने से पहले महेश डेंट्सु एक्स इंडिया (dentsu X India) में वाइस प्रेसिडेंट – स्ट्रैटेजी एंड प्लानिंग (Vice President – Strategy & Planning) थे। यहां उन्होंने ऑटोमोटिव, ऑटो कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, एफएमसीजी, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स, बीएफएसआई, अपैरल और ब्रांड कंसल्टिंग जैसी कई कैटेगरी में काम किया।

डेंट्सु एक्स में उनकी जिम्मेदारियों में मीडिया और मार्केटिंग स्ट्रैटेजी, प्रोडक्ट लॉन्च, कंटेंट, परफॉर्मेंस मार्केटिंग और कंज्यूमर एक्टिवेशन शामिल रहे। महेश की नियुक्ति के साथ वंडर सीमेंट को ऐसा मार्केटिंग प्रोफेशनल मिला है, जिसका अनुभव कम्युनिकेशंस इकोसिस्टम के ब्रांड, एजेंसी और एंटरप्रेन्योरियल—तीनों पक्षों में रहा है।

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