पत्रकारों को हिरासत में लेने पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया समेत पत्रकार संगठनों ने जताया विरोध

इन संगठनों ने हिरासत में लिए गए सभी पत्रकारों की तत्काल और बिना शर्त रिहाई, जब्त फोन और उपकरण लौटाने तथा दिल्ली पुलिस से सार्वजनिक माफी की मांग की है।

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Saturday, 10 October, 2026
Press Club India


दिल्ली में 10 अक्टूबर को विरोध प्रदर्शन की कवरेज कर रहे पत्रकारों को हिरासत में लेने, उन्हें परेशान करने और उनके उपकरण जब्त करने के मामले में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया समेत पत्रकार संगठनों ने कड़ा विरोध जताया है। इन संगठनों ने हिरासत में लिए गए सभी पत्रकारों की तत्काल और बिना शर्त रिहाई, जब्त फोन और उपकरण लौटाने तथा दिल्ली पुलिस से सार्वजनिक माफी की मांग की है।

10 अक्टूबर को शनिवार के दिन मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे सैकड़ों लोगों को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था। पत्रकार संगठनों के संयुक्त बयान के मुताबिक, इस कार्रवाई के दौरान अपनी पेशेवर जिम्मेदारी निभा रहे पत्रकारों को भी पुलिस बसों में भरकर हिरासत केंद्रों में ले जाया गया। इनमें छत्रसाल स्टेडियम और चाणक्यपुरी पुलिस स्टेशन शामिल हैं।

बयान में कहा गया है कि हिरासत में लिए गए पत्रकारों में परंजॉय गुहा ठाकुरता के अलावा द क्विंट, द वायर, स्क्रॉल, रिपोर्टर टीवी, नवभारत टाइम्स और न्यूजलॉन्ड्री के पत्रकार शामिल थे। पत्रकारों ने बताया कि वे हिरासत की कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे थे, तभी उन्हें हिरासत में ले लिया गया, जबकि उनके पास प्रेस कार्ड भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे थे। बयान के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने इस दौरान कथित तौर पर कहा, ‘आजकल हर कोई खुद को पत्रकार बताता है।’ हिरासत में लिए गए पत्रकारों के आधिकारिक रिपोर्टिंग फोन छीनने और जब्त करने की शिकायतें भी सामने आई हैं।

PIB मान्यता को लेकर भी उठाए सवाल: पत्रकार संगठनों ने पत्रकारों की हिरासत को प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया है। बयान में कहा गया है कि दिल्ली पुलिस ने पहले कहा था कि केवल पत्र सूचना कार्यालय (PIB) से मान्यता प्राप्त पत्रकारों को ही रिपोर्टिंग करने की अनुमति दी जाएगी।

संगठनों ने इस शर्त पर आपत्ति जताते हुए कहा कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को PIB मान्यता से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। डिजिटल और स्वतंत्र मीडिया का एक बड़ा हिस्सा PIB कार्ड नहीं रखता, लेकिन इसके बावजूद उसे कानून के तहत प्रेस के रूप में मान्यता प्राप्त है।

बयान के मुताबिक, पत्रकार संगठनों ने इसी सप्ताह की शुरुआत में दिल्ली पुलिस आयुक्त को एक संयुक्त ज्ञापन सौंपकर इन मुद्दों को उठाया था। हालांकि, संगठनों का आरोप है कि पुलिस ने ज्ञापन में दिए गए सुझावों के विपरीत कार्रवाई की।

पत्रकार संगठनों ने रखीं चार मांगें: संयुक्त बयान में पत्रकार संगठनों ने दिल्ली पुलिस के सामने चार प्रमुख मांगें रखी हैं।

  1. हिरासत में मौजूद सभी पत्रकारों को तत्काल और बिना शर्त रिहा किया जाए।
  2. जब्त किए गए सभी फोन और उपकरण तत्काल लौटाए जाएं।
  3. दिल्ली पुलिस सार्वजनिक रूप से माफी मांगे और उन वरिष्ठ अधिकारियों के आचरण की जांच कराई जाए, जिन्होंने प्रेस पहचान पत्र देखने के बावजूद पत्रकारों को हिरासत में लिया।
  4. स्पष्ट आश्वासन दिया जाए कि पत्रकारों को विरोध प्रदर्शनों की कवरेज करने से नहीं रोका जाएगा, क्योंकि यह उनका संवैधानिक दायित्व है।

राजधानी में पुलिस व्यवस्था पर भी उठाए सवाल: प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के साथ-साथ इंडियन विमेंस प्रेस कॉर्प्स, दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स और केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (दिल्ली यूनिट) की ओर से जारी संयुक्त बयान में कहा गया है कि पत्रकारों को काम करने से रोकना, बिना कारण हिरासत में लेना और शांतिपूर्ण तरीके से संस्थानों से सवाल पूछने की कोशिश को रोकने के लिए राजधानी में किले जैसी व्यवस्था बनाना चिंताजनक है।

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मीडिया इंडस्ट्री के लिए चुनौती बना AI सर्च, क्या खतरे में है भविष्य?

मान लीजिए आपने गूगल पर सवाल सर्च किया और AI बॉक्स में तुरंत जवाब मिल गया, बिना किसी लिंक पर जाए आपने पढ़ा और पेज बंद कर दिया—यही बदलाव अब पब्लिशर्स के लिए बड़ी चुनौती है।

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Saturday, 10 October, 2026
AISearch7845

मान लीजिए आपने गूगल पर सर्च किया- “भारत में महंगाई क्यों बढ़ रही है?” और कुछ ही सेकंड में आपके सामने एक बड़े AI बॉक्स में पूरा जवाब आ गया। न आपको किसी लिंक पर क्लिक करना पड़ा, न किसी वेबसाइट पर जाना पड़ा। आपने बस जवाब पढ़ा और पेज बंद कर दिया। देखने में यह कितना आसान लगता है, लेकिन यही बदलाव अब दुनिया भर के पब्लिशर्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

2026 में मीडिया इंडस्ट्री एक ऐसी जंग के दौर में है, जो न कोर्टरूम में पूरी तरह लड़ी जा रही है और न ही संसद की बहसों में—बल्कि सर्च इंजन के रिजल्ट पेज पर ही इसका असली मुकाबला हो रहा है। एक तरफ अखबार, न्यूज पोर्टल, ब्लॉग और कंटेंट क्रिएटर्स हैं, जिन्होंने सालों मेहनत से अपनी जगह बनाई है, और दूसरी तरफ Artificial Intelligence (AI) है, जो उन्हीं के कंटेंट से सीखकर यूजर्स को सीधे, संक्षिप्त जवाब देने लगा है—और कई बार मूल वेबसाइट तक जाने की जरूरत ही खत्म कर देता है।

Zero-Click का जमाना: जब Click ही नहीं हुई तो पैसा कहां से आएगा?

गूगल ने मई 2024 में अमेरिका में AI Overview (AIO) लॉन्च किया था। मई 2025 तक यह फीचर 200 से ज्यादा देशों और 40 भाषाओं तक पहुंच गया। इसमें भारत की हिंदी, तमिल और तेलुगू जैसी भाषाएं भी शामिल हैं। नतीजा? मीडिया इंडस्ट्री के लिए बड़ा झटका।

प्यू रिसर्च सेंटर (Pew Research Center) ने मार्च 2025 में अमेरिका के 900 लोगों की इंटरनेट इस्तेमाल करने की आदतों को ट्रैक किया और गूगल पर की गई 68 हजार से ज्यादा सर्च का विश्लेषण किया। रिपोर्ट में सामने आया कि जब AI Overview दिखाई देता है, तो लोग सिर्फ 8 फीसदी मामलों में ही किसी लिंक पर क्लिक करते हैं। जबकि बिना AI Overview के यह आंकड़ा 15 फीसदी था। यानी क्लिक में करीब 47 फीसदी की गिरावट आई। सबसे बड़ी बात यह कि AI Overview में दिए गए स्रोतों पर सिर्फ 1 फीसदी लोगों ने क्लिक किया।

Similarweb के आंकड़ों के मुताबिक, मई 2024 से मई 2025 के बीच खबरों से जुड़ी सर्च में “जीरो-क्लिक” सर्च का हिस्सा 56 फीसदी से बढ़कर 69 फीसदी हो गया। आसान शब्दों में कहें तो खबरों से जुड़ी 10 में से करीब 7 सर्च ऐसी रहीं, जिनमें लोग किसी भी वेबसाइट पर नहीं पहुंचे।

वहीं, रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ जर्नलिज्म (Reuters Institute for the Study of Journalism) की जनवरी 2026 की रिपोर्ट और ज्यादा चिंता बढ़ाने वाली है। दुनिया के 51 देशों के 280 मीडिया लीडर्स का सर्वे किया गया, जिनमें 64 एडिटर-इन-चीफ और 64 चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर्स (CEO) शामिल थे। उनका मानना है कि अगले तीन साल में सर्च इंजन से आने वाला ट्रैफिक औसतन 43 फीसदी तक गिर सकता है।

चार्टबीट ने 2,500 से ज्यादा न्यूज वेबसाइट्स के आंकड़ों का अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि नवंबर 2024 से नवंबर 2025 के बीच गूगल सर्च से आने वाले विजिटर्स में 33 फीसदी की गिरावट आई। वहीं, गूगल डिस्कवर से आने वाला ट्रैफिक 21 फीसदी घट गया। अमेरिका में यह गिरावट और ज्यादा, यानी 38 फीसदी रही।

छोटे पब्लिशर्स का हाल सबसे बुरा

इस नुकसान का असर सभी पर एक जैसा नहीं पड़ा। बड़े पब्लिशर्स- जैसे The New York Times, जिसके 2025 के आखिर तक 1.278 करोड़ सब्सक्राइबर्स थे, अभी भी किसी तरह टिके हुए हैं। लेकिन छोटे पब्लिशर्स को सबसे बड़ा झटका लगा। 2025 में छोटे पब्लिशर्स का गूगल रेफरल ट्रैफिक करीब 60 फीसदी तक गिर गया, जबकि बड़े पब्लिशर्स में यह गिरावट 22 फीसदी रही।

Business Insider का ऑर्गेनिक सर्च ट्रैफिक अप्रैल 2022 से अप्रैल 2025 के बीच 55 फीसदी तक गिर गया। हालत ऐसी हुई कि कंपनी को मई 2025 में अपने 21 फीसदी एम्प्लॉयीज की छंटनी करनी पड़ी।

वहीं HuffPost की डेस्कटॉप और मोबाइल साइट्स पर सर्च से आने वाले विजिटर्स की संख्या आधी रह गई। यहां तक कि The New York Times का सर्च ट्रैफिक शेयर भी 2022 के 44 फीसदी से घटकर 2025 में 37 फीसदी पर आ गया।

DMG Media , जो MailOnline और Metro जैसे बड़े ब्रिटिश प्रकाशन चलाती है, ने सितंबर 2025 में बताया कि कुछ खास सर्च में क्लिक-थ्रू रेट 89 फीसदी तक गिर गई।

शिक्षा प्लेटफॉर्म Chegg को तो और बड़ा नुकसान हुआ। जनवरी 2024 से जनवरी 2025 के बीच कंपनी का गैर-सब्सक्राइबर ट्रैफिक 49 फीसदी तक गिर गया। इसके बाद कंपनी ने गूगल के खिलाफ प्रतिस्पर्धा विरोधी कानून (एंटीट्रस्ट) का मुकदमा भी दायर कर दिया।

Google की AI और SEO का बदलता मॉडल

कभी SEO यानी सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन का सीधा मतलब होता था- सही कीवर्ड ढूंढो, अच्छा कंटेंट लिखो, गूगल पर ऊपर जगह बनाओ, ट्रैफिक आएगा और विज्ञापनों से कमाई होगी। यह मॉडल कई सालों तक चलता रहा। लेकिन 2026 तक आते-आते यह मॉडल बुरी तरह बदल चुका है।

Seer Interactive ने जून 2024 से सितंबर 2025 के बीच 42 संस्थाओं की 3,119 जानकारी आधारित सर्च को ट्रैक किया। रिपोर्ट में पाया गया कि जिन सर्च में AI Overview दिखाई देता था, वहां ऑर्गेनिक क्लिक-थ्रू रेट 1.76 फीसदी से गिरकर सिर्फ 0.61 फीसदी रह गई। यानी करीब 61 फीसदी की गिरावट। वहीं पेड क्लिक-थ्रू रेट 19.7 फीसदी से टूटकर 6.34 फीसदी पर आ गई, यानी 68 फीसदी की भारी गिरावट।

Semrush के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 की तीसरी तिमाही तक गूगल की करीब 20 से 25 फीसदी सर्च में AI Overview दिखने लगा था। वहीं Gartner का अनुमान है कि 2026 के आखिर तक ऑर्गेनिक सर्च ट्रैफिक का 25 फीसदी हिस्सा AI चैटबॉट्स और वॉइस असिस्टेंट्स की तरफ चला जाएगा।

भारत में भी तेजी से बदलाव दिख रहा है। AI सर्च इंजन Perplexity ने 2024-25 के दौरान 640 फीसदी की बढ़त दर्ज की, खासकर Airtel के साथ साझेदारी के बाद। वहीं ChatGPT अब भारत में प्रोफेशनल्स के बीच दूसरा सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला प्लेटफॉर्म बन चुका है।

टियर-2 और टियर-3 शहरों में 58 फीसदी सर्च अब आवाज के जरिए हो रही हैं। लोग हिंदी, तमिल, तेलुगू और बंगाली जैसी भाषाओं में सवाल पूछ रहे हैं।

इस बदलाव ने SEO इंडस्ट्री की दिशा ही बदल दी है। पहले कीवर्ड रैंकिंग सबसे ज्यादा मायने रखती थी, लेकिन अब “जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन” यानी GEO का दौर शुरू हो गया है। इसका मतलब है कि AI के जवाबों में आपके ब्रैंड या कंटेंट का जिक्र हो, चाहे यूजर आपकी वेबसाइट पर आए या नहीं।

अहरेफ्स की दिसंबर 2025 की स्टडी के मुताबिक, जिन कीवर्ड्स पर AI Overview दिखती है, वहां पहले नंबर पर आने वाली वेबसाइट की क्लिक-थ्रू रेट में 34.5 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई।

Ad Revenue की तस्वीर: पब्लिशर्स का दर्द

पब्लिशर्स का बिजनेस मॉडल काफी सीधा था — ज्यादा ट्रैफिक आएगा, ज्यादा विज्ञापन दिखेंगे और ज्यादा कमाई होगी। लेकिन गूगल के AI सिस्टम ने इस पूरे खेल को बदल दिया है।

अब जब लोग वेबसाइट पर पहुंच ही नहीं रहे, तो विज्ञापन कौन देखेगा? पेज व्यूज कहां से आएंगे? और क्लिक कैसे गिने जाएंगे?

पब्लिशर्स की विज्ञापन कमाई पर दो तरफ से असर पड़ रहा है। पहला, वेबसाइट्स पर ट्रैफिक लगातार घट रहा है। दूसरा, विज्ञापन देने वाली कंपनियां खुद गूगल और Meta जैसे बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की तरफ जा रही हैं, क्योंकि वहां ग्राहकों को ज्यादा सटीक तरीके से टारगेट किया जा सकता है।

मार्च 2026 की फिक्की-ईवाई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर 2025 में 9 फीसदी बढ़कर 2.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। लेकिन इस बढ़त का सबसे ज्यादा फायदा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को मिला, पारंपरिक टीवी और न्यूज पब्लिशर्स को नहीं।

डिजिटल विज्ञापन बाजार 26 फीसदी बढ़कर 947 अरब रुपये तक पहुंच गया। यानी ब्रैंड्स का पैसा डिजिटल दुनिया में जा रहा है, लेकिन न्यूज वेबसाइट्स पर नहीं, बल्कि गूगल और Meta जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स के इकोसिस्टम में।

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की ‘जर्नलिज्म एंड टेक्नोलॉजी ट्रेंड्स 2026’ रिपोर्ट के अनुसार, सर्वे में शामिल पब्लिशर्स ने कहा कि अब कमाई के लिए सब्सक्रिप्शन और मेंबरशिप उनकी पहली प्राथमिकता बन चुकी है। 76 फीसदी पब्लिशर्स ने इसे सबसे अहम बताया, जबकि डिस्प्ले विज्ञापन को 68 फीसदी ने दूसरी प्राथमिकता माना। 

पब्लिशर्स भी चुप नहीं बैठे हैं। वे इस संकट से निपटने के लिए कई मोर्चों पर लड़ाई लड़ रहे हैं।

  1. AI Licensing Deals: कंटेंट का दाम वसूलो

    बड़े पब्लिशर्स अब AI कंपनियों के साथ समझौते कर रहे हैं। मतलब- AI कंपनियां उनका कंटेंट इस्तेमाल करें और बदले में उन्हें पैसा दें।

    News Corp ने OpenAI के साथ 5 साल की 25 करोड़ डॉलर से ज्यादा की डील की है। वहीं The New York Times को Amazon की एलेक्सा और रूफस शॉपिंग असिस्टेंट सेवाओं से हर साल करीब 2 से 2.5 करोड़ डॉलर मिल रहे हैं।

    इसके अलावा Associated Press, Time, Fortune, CNN, The Washington Post और Condé Nast जैसी कई बड़ी मीडिया कंपनियां किसी न किसी AI कंपनी के साथ समझौते कर चुकी हैं।

    लेकिन यह मॉडल फिलहाल सिर्फ बड़े खिलाड़ियों के लिए फायदेमंद दिख रहा है। मिड-साइज पब्लिशर्स को 10 लाख से 50 लाख डॉलर तक की डील मिल सकती है, जो उनके ट्रैफिक नुकसान की भरपाई के लिए काफी नहीं है। वहीं छोटे पब्लिशर्स और स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स के लिए अभी ऐसे समझौतों के दरवाजे लगभग बंद हैं।

    इसी बीच Cloudflare ने “पे पर क्रॉल” नाम का एक मार्केटप्लेस शुरू किया है। इसमें पब्लिशर्स तय कर सकते हैं कि AI कंपनियां उनके कंटेंट को स्कैन करने के बदले कितना पैसा देंगी।

    जून 2025 में Cloudflare के आंकड़ों ने एक चौंकाने वाली तस्वीर दिखाई। गूगल हर 9 से 14 पेज स्कैन करने पर एक विजिटर वेबसाइट को भेजता है। लेकिन OpenAI करीब 1,700 पेज स्कैन करने के बाद सिर्फ एक विजिटर भेजता है। वहीं Anthropic का अनुपात तो 73,000 पेज पर सिर्फ एक विजिटर का रहा।

    यही वजह है कि दुनिया की 79 फीसदी बड़ी न्यूज वेबसाइट्स ने कम से कम एक AI ट्रेनिंग बॉट को ब्लॉक कर दिया है।

  1. सब्सक्रिप्शंस और डायरेक्ट ऑडियंस: प्लेटफॉ़र्म पर नहीं, खुद पर भरोसा

जो पब्लिशर्स AI की मार से बचे हैं, उनका एक कॉमन सिक्रेट है- उन्होंने गूगल पर निर्भरता कम की।

The New Yorker ने 2025 में रिकॉर्ड कमाई, रिकॉर्ड मुनाफा और रिकॉर्ड सब्सक्राइबर्स हासिल किए। वहीं The New York Times के 2025 के आखिर तक 1.278 करोड़ सब्सक्राइबर्स हो चुके थे। कंपनी का लक्ष्य 2027 तक इसे बढ़ाकर 1.5 करोड़ तक पहुंचाने का है।

Time मैगजीन का अनुमान है कि 2026 में उसकी कुल कमाई का 50 फीसदी हिस्सा इवेंट्स से आएगा, जबकि 2023 में यह हिस्सा 28 फीसदी था। वहीं Bloomberg Media के ग्लोबल फोरम्स से 2025 में स्पॉन्सरशिप कमाई में 30 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई।

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक, 76 फीसदी मीडिया लीडर्स का कहना है कि अब वे चाहते हैं कि उनके कर्मचारी “क्रिएटर्स” की तरह काम करें। यानी सिर्फ खबर लिखना नहीं, बल्कि ऑडियंस के साथ सीधा जुड़ाव बनाना भी जरूरी हो गया है।

इसके अलावा 50 फीसदी पब्लिशर्स अब क्रिएटर पार्टनरशिप्स पर काम कर रहे हैं, ताकि नए दर्शकों तक पहुंच बनाई जा सके।

  1. SEO का नया अवतार: GEO (Generative Engine Optimization)
पहले SEO का मतलब था — गूगल के टॉप 10 रिजल्ट्स में जगह बनाओ। लेकिन अब दौर GEO यानी “जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन” का है। अब कोशिश यह होती है कि AI के जवाबों में आपकी वेबसाइट या कंटेंट का जिक्र आए।

रिसर्च बताती है कि जिन वेबसाइट्स का नाम AI ओवरव्यू में आता है, उनकी ऑर्गेनिक क्लिक-थ्रू रेट 35 फीसदी ज्यादा रहती है। वहीं पेड क्लिक-थ्रू रेट 91 फीसदी तक बढ़ जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जिस कंटेंट का ढांचा साफ और व्यवस्थित होगा — जैसे सवाल-जवाब फॉर्मेट, छोटे हेडिंग्स और लिस्ट्स — उसे AI ज्यादा आसानी से समझता है और अपने जवाबों में ज्यादा इस्तेमाल करता है।

ग्रोथ मेमो के फरवरी 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, किसी आर्टिकल के शुरुआती 30 फीसदी हिस्से से ही 44 फीसदी AI सिटेशंस आती हैं। यानी अब आर्टिकल की शुरुआती लाइनें पहले से कहीं ज्यादा अहम हो गई हैं।

भारत में यह बदलाव एक बड़े मौके की तरह भी देखा जा रहा है। हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में AI द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कंटेंट की अभी कमी है। गूगल का AI सिस्टम अब हिंदी में भी जवाब देने लगा है, लेकिन हिंदी कंटेंट क्रिएटर्स अभी GEO के हिसाब से कंटेंट तैयार नहीं कर रहे। ऐसे में जो लोग जल्दी इस दिशा में काम करेंगे, उन्हें सबसे बड़ा फायदा मिल सकता है।

ChatGPT से Traffic: उम्मीद कम, हकीकत और कम

कुछ लोगों को लगता है कि अगर गूगल से ट्रैफिक कम हो रहा है, तो उसकी भरपाई ChatGPT जैसे AI प्लेटफॉर्म्स से हो जाएगी।

सितंबर से नवंबर 2025 के बीच ChatGPT ने पब्लिशर्स को करीब 1.2 अरब आउटगोइंग रेफरल्स भेजे, जो पिछले साल के मुकाबले 52 फीसदी ज्यादा थे। सुनने में यह आंकड़ा अच्छा लगता है, लेकिन असली तस्वीर अलग है।

कंडक्टर की रिसर्च के मुताबिक, सभी AI प्लेटफॉर्म्स मिलकर भी पब्लिशर्स के कुल ट्रैफिक का सिर्फ 1 फीसदी हिस्सा ही भेज पा रहे हैं।

वहीं रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट बताती है कि अकेला गूगल, ChatGPT के मुकाबले 500 गुना ज्यादा रेफरल्स भेजता है। अगर गूगल सर्च और गूगल डिस्कवर को साथ जोड़ दें, तो यह अंतर 1,300 गुना तक पहुंच जाता है।

यानी AI सर्च अभी नया ट्रैफिक स्रोत नहीं बन पाया है। उल्टा, उसने पब्लिशर्स का पुराना ट्रैफिक कम कर दिया है।

भारत के पब्लिशर्स के लिए क्या मायने रखता है?

भारत में internet users की संख्या 2025 के अंत तक 1.03 billion यानी एक अरब तीन करोड़ पार कर गई। यहाँ digital news market 2026 के अंत तक $1 billion revenue generate करने का अनुमान है।

लेकिन AI का असर भारत पर भी उतना ही गहरा है। Perplexity अब India में US से भी बड़ा market बन गया है। ChatGPT फरवरी 2026 तक 900 मिलियन वीकली एक्टिव यूजर्स तक पहुंच गया और भारत में भी 10 करोड़ weekly users। Google AI Overviews 40 भाषाओं में हैं जिनमें हिंदी भी शामिल है।

भारत के हिंदी न्यूज़ पोर्टल्स, regional language sites और छोटे digital पब्लिशर्स — जो Google Search से अपना ज़्यादातर traffic पाते थे — अब एक बड़े transition के मुहाने पर खड़े हैं।

असली सवाल: कंटेंट बनाने वाले को पैसा कौन देगा?

यह सिर्फ बिजनेस मॉडल का मामला नहीं है, बल्कि पत्रकारिता के अस्तित्व का सवाल बन चुका है।

अगर पब्लिशर्स कमाई नहीं कर पाएंगे, तो वे रिपोर्टर्स नहीं रख पाएंगे। रिपोर्टर्स नहीं होंगे, तो ग्राउंड रिपोर्टिंग कम हो जाएगी। और जब ग्राउंड रिपोर्टिंग ही नहीं होगी, तो एआई के पास इस्तेमाल करने के लिए ओरिजिनल कंटेंट भी नहीं बचेगा। बिना ओरिजिनल कंटेंट के एआई सिस्टम भी ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएंगे।

यानी यह एक खतरनाक चक्र बनता जा रहा है, जो पूरे कंटेंट इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा सकता है।

Cloudflare के मुख्य कार्यकारी अधिकारी Matthew Prince ने जुलाई 2025 में पब्लिशर्स को ऐसे टूल्स दिए, जिनकी मदद से वे एआई बॉट्स को ब्लॉक कर सकते हैं। नए Cloudflare ग्राहकों के लिए यह सुविधा डिफॉल्ट रूप से शुरू की गई।

इसका मतलब है कि अब पब्लिशर्स अपने कंटेंट को एआई कंपनियों के लिए मुफ्त में उपलब्ध नहीं कराना चाहते। वे अपने कंटेंट की अहमियत और कमी दोनों बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन गूगल को पूरी तरह ब्लॉक करना आसान नहीं है, क्योंकि सर्च बाजार में उसकी हिस्सेदारी 90 फीसदी से ज्यादा है। अगर कोई पब्लिशर गूगल को ब्लॉक कर दे, तो उसकी वेबसाइट इंटरनेट पर लगभग गायब जैसी हो सकती है।

आगे का रास्ता

Dotdash Meredith के चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर Neil Vogel का कहना है कि AI प्लेटफॉर्म्स को पब्लिशर्स और क्रिएटर्स को उनके कंटेंट का उचित पैसा देना होगा। वहीं Condé Nast के मुख्य कार्यकारी अधिकारी Roger Lynch ने कहा कि OpenAI के साथ साझेदारी से पारंपरिक सर्च से होने वाले कमाई के नुकसान की कुछ हद तक भरपाई हो रही है।

लेकिन छोटे पब्लिशर्स की सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि उनके पास न तो OpenAI जैसी बड़ी कंपनियों के साथ डील है और न ही Condé Nast जैसा बड़ा ब्रैंड नाम।

ऐसे में 2026 में पब्लिशर्स के सामने टिके रहने के लिए कुछ ही रास्ते बचे हैं। जैसे — सब्सक्रिप्शन और मेंबरशिप बढ़ाना, अपनी ऑडियंस के साथ सीधा रिश्ता बनाना जिसे कोई प्लेटफॉर्म छीन न सके, न्यूजलेटर्स को कमाई का मजबूत जरिया बनाना, इवेंट्स और वास्तविक अनुभवों पर निवेश करना और जीईओ यानी “जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन” सीखना।

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट में एक और दिलचस्प बात सामने आई। पब्लिशर्स अब सबसे ज्यादा निवेश YouTube पर करना चाहते हैं। 2025 में इसका नेट स्कोर 52 था, जो 2026 में बढ़कर 74 हो गया। इससे साफ है कि मीडिया इंडस्ट्री तेजी से वीडियो पत्रकारिता की तरफ बढ़ रही है।

एक युग का अंत, एक नई शुरुआत

जिस क्लिक इकॉनमी पर पिछले 20 साल की डिजिटल पत्रकारिता टिकी हुई थी, वह अब तेजी से बदल रही है। AI ने सामान्य कंटेंट को लगभग एक जैसी चीज बना दिया है। अब साधारण सवालों के जवाब AI खुद देने लगा है।

ऐसे में वही पत्रकारिता टिक पाएगी, जिसमें ओरिजिनल रिपोर्टिंग हो, एक्सक्लूसिव आंकड़े हों, विशेषज्ञों का विश्लेषण हो और ऐसा कंटेंट हो जिसे AI आसानी से कॉपी न कर सके।

2026 की मीडिया दुनिया की सबसे बड़ी चिंता यही है — “इनविजिबल पब्लिशर”। यानी वह पब्लिशर जो कंटेंट तो बना रहा है, जवाब भी उसी के कंटेंट से तैयार हो रहे हैं, लेकिन लोग उसकी वेबसाइट तक पहुंच ही नहीं रहे।

हालांकि इतिहास बताता है कि हर बड़ी तकनीकी क्रांति के समय मीडिया इंडस्ट्री ने खुद को बदला है। जब रेडियो आया तो अखबारों को डर लगा। टीवी आया तो रेडियो को खतरा महसूस हुआ। इंटरनेट आया तो टीवी इंडस्ट्री चिंतित हो गई। लेकिन हर दौर में मीडिया ने खुद को नए तरीके से ढाला।

अब AI सर्च के दौर में भी पब्लिशर्स को खुद को बदलना होगा। सिर्फ गूगल के हिसाब से नहीं, बल्कि अपने पाठकों और दर्शकों की जरूरतों के हिसाब से।

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Meta ने 7 देशों में ByteDance के ऐड पर लगाई रोक, TikTok की मार्केटिंग पर पड़ेगा असर

मेटा (Meta) ने डिजिटल विज्ञापन के बाजार में बड़ा कदम उठाते हुए सात देशों में बाइटडांस (ByteDance) के विज्ञापनों पर रोक लगा दी है।

Last Modified:
Saturday, 10 October, 2026
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मेटा (Meta) ने डिजिटल विज्ञापन के बाजार में बड़ा कदम उठाते हुए सात देशों में बाइटडांस (ByteDance) के विज्ञापनों पर रोक लगा दी है। बाइटडांस, टिकटॉक (TikTok) की मूल कंपनी है। यह रोक फेसबुक (Facebook), इंस्टाग्राम (Instagram) और मेटा के दूसरे प्लेटफॉर्म पर लागू की गई है। इसके साथ ही दोनों कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा अब यूजर्स और कंटेंट क्रिएटर्स तक सीमित न रहकर विज्ञापन के कारोबार तक पहुंच गई है।

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, यह रोक गुरुवार, 8 अक्टूबर से लागू हुई है। अमेरिका, कनाडा, मिस्र, इंडोनेशिया, जापान, थाईलैंड और वियतनाम में बाइटडांस के विज्ञापन नहीं चलाए जा सकेंगे। इसमें बाइटडांस की ओर से सीधे दिए जाने वाले विज्ञापनों के साथ-साथ उन तीसरे पक्ष के विज्ञापनदाताओं के अभियान भी शामिल हैं, जो यूजर्स को टिकटॉक या बाइटडांस के दूसरे प्लेटफॉर्म पर ले जाते हैं।

मेटा ने इस फैसले को अपनी विज्ञापन नीतियों में व्यापक बदलाव के बजाय कारोबारी फैसला बताया है। कंपनी के प्रवक्ता क्रिस स्ग्रो ने ब्लूमबर्ग से कहा कि मेटा अपने उत्पादों और यूजर अनुभव के जरिए प्रतिस्पर्धियों से मुकाबला करना जारी रखेगी। हालांकि, इस रोक के बाद बाइटडांस के लिए इन सात देशों में मेटा के विज्ञापन नेटवर्क का इस्तेमाल करके अपनी सेवाओं का प्रचार करना मुश्किल हो जाएगा।

यूजर्स और विज्ञापनदाताओं के लिए बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा

यह फैसला दिखाता है कि सोशल मीडिया कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा अब सिर्फ यूजर्स को अपने प्लेटफॉर्म से जोड़ने तक सीमित नहीं है। फेसबुक और इंस्टाग्राम की टिकटॉक से यूजर्स, कंटेंट क्रिएटर्स और विज्ञापनदाताओं को लेकर सीधी प्रतिस्पर्धा है। छोटे वीडियो सोशल मीडिया का एक अहम हिस्सा बन चुके हैं।

मेटा की इस रोक से बाइटडांस के पास नए यूजर्स तक पहुंचने का एक रास्ता सीमित हो सकता है। हालांकि, इससे कंपनी के कुल विज्ञापन कारोबार या नए यूजर्स जोड़ने की रणनीति पर कितना असर पड़ेगा, यह अभी साफ नहीं है।

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर भी विवाद

दोनों कंपनियों के बीच यह खींचतान ऐसे समय में हो रही है, जब इंटरनेट पर बच्चों और किशोरों की सुरक्षा को लेकर बहस तेज है।

अगस्त में मेटा ने अमेरिका के कई राज्यों के साथ एक समझौता किया था, जिसकी कीमत 18 अरब डॉलर तक बताई गई। यह समझौता मेटा के प्लेटफॉर्म पर बच्चों और किशोरों को कथित नुकसान पहुंचने से जुड़े आरोपों के मामले में हुआ। इसके तहत फेसबुक और इंस्टाग्राम पर कम उम्र के यूजर्स के इस्तेमाल को लेकर बदलाव करने होंगे। इनमें रोजाना इस्तेमाल की समय-सीमा, रात के समय इस्तेमाल पर रोक और उम्र के हिसाब से प्रतिबंधित सामग्री के लिए ज्यादा सुरक्षा उपाय शामिल हैं। मेटा ने इस मामले में लगाए गए आरोपों को खारिज किया है।

इसके बाद मेटा ने टिकटॉक और गूगल के स्वामित्व वाले यूट्यूब (YouTube) से भी इसी तरह के सुरक्षा उपाय अपनाने की मांग की। कंपनी का कहना है कि किशोरों की सुरक्षा पूरे उद्योग की जिम्मेदारी होनी चाहिए, न कि किसी एक प्लेटफॉर्म की।

इस मुद्दे पर दोनों कंपनियों के बीच मतभेद भी सामने आए हैं। मेटा ने जरूरत से ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल और ऑनलाइन सुरक्षा पर होने वाली चर्चाओं में टिकटॉक की भूमिका की सार्वजनिक रूप से आलोचना की है।

टिकटॉक ने भी उठाए कदम

विज्ञापन को लेकर दोनों कंपनियों के बीच विवाद का असर प्लेटफॉर्म की सुविधाओं पर भी दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, टिकटॉक ने यूजर प्रोफाइल से इंस्टाग्राम के लिए दिए जाने वाले खास लिंक हटा दिए हैं। हालांकि, यूजर्स अब भी अपनी प्रोफाइल में ऐसे वेबसाइट लिंक जोड़ सकते हैं, जो लोगों को दूसरी सेवाओं तक ले जाते हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि टिकटॉक ने किशोरों की सुरक्षा को लेकर समान प्रतिबद्धताएं अपनाने की मांग करने वाले मेटा के विज्ञापनों को अपने प्लेटफॉर्म पर जगह नहीं दी।

इस तरह दोनों कंपनियां दो मोर्चों पर मुकाबला कर रही हैं। एक ओर वे यूजर्स और कंटेंट क्रिएटर्स को अपने साथ जोड़ना चाहती हैं, वहीं दूसरी ओर बच्चों और किशोरों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर अपनी बात भी आगे बढ़ा रही हैं। मेटा का विज्ञापनों पर रोक लगाने का फैसला इस प्रतिस्पर्धा में कारोबारी कदम है, लेकिन बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी बहस इससे कहीं ज्यादा व्यापक है।

अमेरिका में टिकटॉक के 20 करोड़ से ज्यादा यूजर्स

टिकटॉक अमेरिका में एक ऐसे संयुक्त उपक्रम के जरिए काम कर रहा है, जिसमें अमेरिकी निवेशकों की बहुमत हिस्सेदारी है। यह व्यवस्था अमेरिकी यूजर्स के डेटा की सुरक्षा और देशभर में टिकटॉक पर प्रतिबंध से बचने के उद्देश्य से की गई है।

अमेरिका में टिकटॉक के 20 करोड़ से ज्यादा यूजर्स हैं। ऐसे में यह बाजार यूजर्स का ध्यान खींचने और विज्ञापन से होने वाली कमाई के लिहाज से काफी अहम है।

विज्ञापनदाताओं पर क्या होगा असर?

मेटा की रोक के बाद सात प्रभावित देशों में टिकटॉक और बाइटडांस की दूसरी सेवाओं का प्रचार करने वाले विज्ञापनदाताओं को अपने कैंपेंस की योजना बनाते समय इन प्रतिबंधों का ध्यान रखना होगा। यह रोक सिर्फ बाइटडांस के अपने विज्ञापनों तक सीमित नहीं है। उन तीसरे पक्ष के विज्ञापनदाताओं पर भी लागू होगी, जिनके अभियान यूजर्स को बाइटडांस के प्लेटफॉर्म पर ले जाते हैं।

इसलिए मेटा का यह फैसला केवल कुछ विज्ञापनों को रोकने तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया कंपनियां जब एक ही तरह के यूजर्स, क्रिएटर्स और कारोबारी साझेदारियों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही हैं, तो विज्ञापन चलाने की सुविधा भी मुकाबले का एक अहम हिस्सा बन गई है।

फिलहाल यह देखना बाकी है कि इस फैसले से यूजर्स के व्यवहार या विज्ञापन बजट पर कितना असर पड़ता है। इतना जरूर है कि मेटा और टिकटॉक के बीच प्रतिस्पर्धा में अब एक नया मोर्चा खुल गया है।

 

 

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अंकिता आचार्य बनीं WPP मीडिया में नेस्ले की ग्लोबल स्ट्रैटेजी डायरेक्टर

अंकिता आचार्य ने WPP मीडिया में नेस्ले के लिए ग्लोबल स्ट्रैटेजी डायरेक्टर की जिम्मेदारी संभाली है। इससे पहले वह एसेंसमीडियाकॉम में एडिडास के लिए ब्रांड स्ट्रैटेजी डायरेक्टर थीं।

Last Modified:
Thursday, 08 October, 2026
wpp media

अंकिता आचार्य (Ankitha Acharya) ने डब्ल्यूपीपी मीडिया (WPP Media) में नेस्ले (Nestlé) के लिए ग्लोबल स्ट्रैटेजी डायरेक्टर (Global Strategy Director) के रूप में नई जिम्मेदारी संभाली है। इस नियुक्ति से पहले आचार्य एसेंसमीडियाकॉम (EssenceMediacom) में एडिडास (adidas) के लिए ब्रांड स्ट्रैटेजी डायरेक्टर, इमर्जिंग मार्केट्स (Brand Strategy Director, Emerging Markets) थीं। यहां उन्होंने 17 उभरते बाजारों में स्ट्रैटेजी की जिम्मेदारी संभाली।

इससे पहले वह माइंडशेयर (Mindshare) में वोल्वो (Volvo) के लिए प्लानिंग एंड स्ट्रैटेजी डायरेक्टर, यूरोप (Planning and Strategy Director, Europe) थीं। इस भूमिका में उन्होंने छह यूरोपीय बाजारों में प्लानिंग और स्ट्रैटेजी का नेतृत्व किया।

आचार्य वेवमेकर (Wavemaker) और परफॉर्मिक्स इंडिया (Performics India) सहित अन्य कंपनियों में भी अलग-अलग भूमिकाओं में काम कर चुकी हैं। उनके पास ग्लोबल और लोकल मार्केट्स में काम करने का अनुभव है। उनकी विशेषज्ञता ब्रांड स्ट्रैटेजी (Brand Strategy), प्लानिंग (Planning) और ऑडियंस प्लानिंग (Audience Planning) में है।

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महेश सिंह ने वंडर सीमेंट में संभाली नई कॉरपोरेट ब्रांड कम्युनिकेशन जिम्मेदारी

वंडर सीमेंट ने महेश सिंह को वाइस प्रेसिडेंट – कॉरपोरेट ब्रांड कम्युनिकेशन नियुक्त किया है। वह ब्रांड स्ट्रैटेजी, डिजिटल मार्केटिंग, पब्लिक रिलेशंस की जिम्मेदारी संभालेंगे।

Last Modified:
Thursday, 08 October, 2026
maheshsingh

प्रमुख सीमेंट निर्माता कंपनी वंडर सीमेंट (Wonder Cement) ने महेश सिंह को वाइस प्रेसिडेंट – कॉरपोरेट ब्रांड कम्युनिकेशन (Vice President – Corporate Brand Communication) नियुक्त किया है। नई भूमिका में वह कंपनी की कॉरपोरेट ब्रांड स्ट्रैटेजी और कम्युनिकेशन की जिम्मेदारी संभालेंगे।

महेश सिंह के दायरे में डिजिटल और परफॉर्मेंस मार्केटिंग (Digital and Performance Marketing), पब्लिक रिलेशंस (Public Relations), ट्रेड, इवेंट्स, एग्जिबिशंस, स्पोर्ट्स और एक्सपीरिएंशियल मार्केटिंग (Experiential Marketing) शामिल होंगे।

महेश के पास मार्केटिंग और कम्युनिकेशंस के क्षेत्र में दो दशक से अधिक का अनुभव है। उनके करियर में ऑटोमोटिव इंडस्ट्री, एजेंसी और उद्यमिता से जुड़ी अलग-अलग भूमिकाएं रही हैं। उन्होंने होंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर इंडिया (Honda Motorcycle & Scooter India) के साथ एक दशक से अधिक समय तक काम किया।

यहां उन्होंने इंटीग्रेटेड कम्युनिकेशन (Integrated Communication), मीडिया, डिजिटल, रिटेल और कंज्यूमर एंगेजमेंट से जुड़े कार्यों की जिम्मेदारी संभाली। इस दौरान उन्होंने कंपनी की डिजिटल मार्केटिंग क्षमताओं को विकसित करने में भी योगदान दिया।

वंडर सीमेंट से जुड़ने से पहले महेश डेंट्सु एक्स इंडिया (dentsu X India) में वाइस प्रेसिडेंट – स्ट्रैटेजी एंड प्लानिंग (Vice President – Strategy & Planning) थे। यहां उन्होंने ऑटोमोटिव, ऑटो कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, एफएमसीजी, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स, बीएफएसआई, अपैरल और ब्रांड कंसल्टिंग जैसी कई कैटेगरी में काम किया।

डेंट्सु एक्स में उनकी जिम्मेदारियों में मीडिया और मार्केटिंग स्ट्रैटेजी, प्रोडक्ट लॉन्च, कंटेंट, परफॉर्मेंस मार्केटिंग और कंज्यूमर एक्टिवेशन शामिल रहे। महेश की नियुक्ति के साथ वंडर सीमेंट को ऐसा मार्केटिंग प्रोफेशनल मिला है, जिसका अनुभव कम्युनिकेशंस इकोसिस्टम के ब्रांड, एजेंसी और एंटरप्रेन्योरियल—तीनों पक्षों में रहा है।

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MediaOne Global Entertainment को जून तिमाही में 39.02 लाख रुपये का हुआ घाटा

मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र की कंपनी Media One Global Entertainment Limited ने 30 जून 2026 को खत्म हुई पहली तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी कर दिए हैं।

Last Modified:
Thursday, 08 October, 2026
MediaOne471

मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र की कंपनी Media One Global Entertainment Limited ने 30 जून 2026 को खत्म हुई पहली तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी कर दिए हैं। कंपनी के बोर्ड ने 14 अगस्त 2026 को हुई बैठक में इन अनऑडिटेड वित्तीय नतीजों को मंजूरी दी। कंपनी ने इसकी जानकारी स्टॉक एक्सचेंज को 8 अक्टूबर 2026 को दी।

कंपनी ने यह जानकारी BSE Limited को दी है। यह जानकारी सेबी के लिस्टिंग नियमों के तहत जारी की गई है। कंपनी के वित्तीय नतीजों के मुताबिक, 30 जून 2026 को खत्म तिमाही में कंपनी को 39.02 लाख रुपये का शुद्ध घाटा हुआ है। वहीं, 31 मार्च 2026 को खत्म पिछली तिमाही में कंपनी का शुद्ध घाटा 51.01 लाख रुपये था।

कंपनी के आंकड़ों के अनुसार, 30 जून 2025 को खत्म तिमाही में शुद्ध घाटा 64.95 लाख रुपये रहा था। वहीं, 31 मार्च 2026 को खत्म पूरे वित्त वर्ष में कंपनी का शुद्ध घाटा 277.56 लाख रुपये, यानी करीब 2.78 करोड़ रुपये रहा था। इस तरह पिछली तिमाही के मुकाबले जून 2026 तिमाही में कंपनी के घाटे में कमी आई है।

प्रति शेयर आय भी निगेटिव रही

कंपनी की 10 रुपये अंकित मूल्य वाले शेयर पर बेसिक और डाइल्यूटेड अर्निंग प्रति शेयर (EPS) जून 2026 तिमाही में माइनस 0.27 रुपये रही। मार्च 2026 की तिमाही में यह माइनस 0.35 रुपये, जून 2025 की तिमाही में माइनस 0.48 रुपये और पूरे वित्त वर्ष 2025-26 में माइनस 1.89 रुपये रही थी।

कंपनी की पेड-अप इक्विटी शेयर कैपिटल 1,472 लाख रुपये, यानी 14.72 करोड़ रुपये है। प्रत्येक शेयर का फेस वैल्यू 10 रुपये है। कंपनी के बैलेंस शीट में रीवैल्यूएशन रिजर्व को छोड़कर रिजर्व माइनस 4,830.80 लाख रुपये दर्ज किया गया है।

कंपनी का कारोबार तीन हिस्सों में बंटा

Media One Global Entertainment ने अपने कारोबार को तीन मुख्य हिस्सों में बांटा है। इनमें एग्जिबिशन, डिस्ट्रीब्यूशन और प्रोडक्शन शामिल हैं। एग्जिबिशन कारोबार में फिल्मों की प्रदर्शनी से जुड़ी गतिविधियां शामिल हैं, जबकि डिस्ट्रीब्यूशन में फिल्मों के वितरण और प्रोडक्शन में फिल्मों के निर्माण से जुड़ा कारोबार शामिल है।

कंपनी ने भारतीय लेखा मानक यानी Ind AS 108 के तहत इन तीनों को अपने ऑपरेटिंग सेगमेंट के तौर पर बताया है। कंपनी की ओर से जारी वित्तीय नतीजों में ऑपरेशनल आय और खर्चों को इन्हीं अलग-अलग कारोबारी हिस्सों के आधार पर दिखाया गया है।

कुल खर्च में भी अलग-अलग मदें शामिल

कंपनी के खर्चों में सामग्री की लागत, स्टॉक-इन-ट्रेड की खरीद, तैयार माल और काम के दौरान मौजूद स्टॉक में बदलाव, कर्मचारियों पर होने वाला खर्च, वित्तीय लागत और मूल्यह्रास व अमोर्टाइजेशन जैसे खर्च शामिल हैं। प्रोडक्शन कारोबार के तहत तिमाही में स्टॉक और वर्क-इन-प्रोग्रेस में बदलाव माइनस 36.41 लाख रुपये दर्ज किया गया। कर्मचारियों पर खर्च 6.65 लाख रुपये और वित्तीय लागत 0.14 लाख रुपये रही।

कंपनी के अन्य खर्चों में बिजली और ईंधन तथा अन्य खर्च शामिल हैं। उपलब्ध वित्तीय विवरण के मुताबिक, बिजली और ईंधन पर खर्च 37.19 लाख रुपये, अन्य खर्च 13.34 लाख रुपये और कुल खर्च 114.89 लाख रुपये से संबंधित आंकड़े दिए गए हैं। वित्तीय परिणामों में जून 2026 तिमाही के लिए टैक्स से पहले का घाटा 39.02 लाख रुपये बताया गया है।

ऑडिटर ने की सीमित समीक्षा

कंपनी के सांविधिक ऑडिटर Vivekanandan Associates, Chartered Accountants ने जून 2026 तिमाही के वित्तीय नतीजों की सीमित समीक्षा (Limited Review) की है। 

ऑडिटर ने कहा कि यह समीक्षा भारतीय चार्टर्ड अकाउंटेंट संस्थान (ICAI) की ओर से जारी Standard on Review Engagements (SRE) 2410 के तहत की गई। सीमित समीक्षा में मुख्य रूप से कंपनी के कर्मचारियों से पूछताछ और वित्तीय आंकड़ों की विश्लेषणात्मक प्रक्रिया शामिल होती है। ऑडिटर ने स्पष्ट किया कि यह पूर्ण ऑडिट नहीं है और इसलिए उसने ऑडिट राय नहीं दी है।

ऑडिटर की समीक्षा के आधार पर ऐसी कोई बात सामने नहीं आई, जिससे यह माना जाए कि कंपनी के अनऑडिटेड स्टैंडअलोन वित्तीय नतीजे लागू भारतीय लेखा मानकों और संबंधित नियमों के मुताबिक तैयार नहीं किए गए हैं या उनमें कोई महत्वपूर्ण गलत जानकारी दी गई है।

निवेशकों की शिकायतें लंबित नहीं

कंपनी ने बताया कि तिमाही की शुरुआत में निवेशकों की कोई शिकायत लंबित नहीं थी। तिमाही के दौरान भी कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई। कंपनी के पास निपटारे के लिए कोई शिकायत नहीं थी और तिमाही के अंत में भी कोई शिकायत लंबित नहीं रही।

कंपनी के मुताबिक, वित्तीय नतीजों की समीक्षा ऑडिट कमेटी ने की और इसके बाद इन्हें बोर्ड की बैठक में मंजूरी दी गई। कंपनी ने यह भी बताया कि वित्तीय नतीजे Companies Act, 2013 की धारा 133 के तहत लागू भारतीय लेखा मानकों और सेबी के लिस्टिंग नियमों के अनुसार तैयार किए गए हैं।

कंपनी ने पिछले साल के आंकड़ों को जहां जरूरी था, वहां दोबारा वर्गीकृत किया है, ताकि उनकी तुलना मौजूदा आंकड़ों से की जा सके। इन वित्तीय नतीजों को Media One Global Entertainment Limited की ओर से एजिशनल डायरेक्टर जयबालान जयकुमार ने जारी किया है। 

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डिज्नी ने की FCC कार्रवाई रोकने की मांग, ABC के लाइसेंस की समयपूर्व समीक्षा पर उठाए सवाल

वॉल्ट डिज्नी ने अमेरिका की एक अदालत से फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन यानी FCC की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की है।

Last Modified:
Thursday, 08 October, 2026
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वॉल्ट डिज्नी ने अमेरिका की एक अदालत से फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन यानी FCC की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की है। कंपनी ने कहा है कि FCC की ओर से उसके स्वामित्व वाले आठ एबीसी टीवी स्टेशनों के लाइसेंस की समय से पहले समीक्षा करना असामान्य है। डिज्नी का आरोप है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन कंपनी पर ऐसे कंटेंट को लेकर दबाव बना रहा है, जो उसे पसंद नहीं है।

डिज्नी ने इस मामले में अगस्त में मुकदमा दायर किया था। कंपनी का कहना है कि यह मामला अमेरिका के संविधान के पहले संशोधन (First Amendment) के तहत प्रसारकों की अभिव्यक्ति की आजादी और सरकार की मीडिया नीतियों के बीच एक महत्वपूर्ण कानूनी परीक्षा बन गया है।

‘हम संपादकीय फैसले अलग तरीके से ले रहे हैं’

मंगलवार को सुनवाई के दौरान डिज्नी की वकील बेथ विल्किन्सन ने अमेरिकी जिला जज लॉरेन अलीखान से कहा कि कंपनी को चिंता है कि मौजूदा स्थिति का उसके संपादकीय फैसलों पर असर पड़ रहा है।

उन्होंने कहा कि कंपनी अपने हर कदम को लेकर सावधानी बरत रही है, क्योंकि प्रशासन की नाराजगी और FCC की कार्रवाई का डर बना हुआ है। विल्किन्सन ने एबीसी की स्थिति की तुलना फ्रांसीसी क्रांति के दौरान सिर पर तलवार लटकने जैसी स्थिति से की।

उन्होंने कहा कि यहां तक कि राष्ट्रपति के किसी भाषण का लाइव प्रसारण नहीं करने जैसे फैसले पर भी प्रशासन की नाराजगी सामने आती है।

ट्रंप के भाषण का लाइव प्रसारण नहीं किया था ABC ने

विल्किन्सन जिस मामले का जिक्र कर रही थीं, वह 16 जुलाई का है। उस दिन एबीसी ने ट्रंप के एक भाषण का लाइव प्रसारण नहीं किया था। इस भाषण में ट्रंप ने अमेरिकी चुनाव व्यवस्था की सुरक्षा को लेकर अपने पुराने आरोप फिर दोहराए थे।

कॉमकास्ट के स्वामित्व वाले एनबीसी ने भी इस भाषण का लाइव प्रसारण नहीं किया था। इसके बाद ट्रंप ने दोनों चैनलों के लाइसेंस रद्द करने की मांग की थी।

न्यूयॉर्क और लॉस एंजिल्स समेत आठ स्टेशन जांच के दायरे में

FCC चेयरमैन ब्रेंडन कैर ने अप्रैल में डिज्नी के आठ एबीसी स्टेशनों के लाइसेंस की समय से पहले समीक्षा का आदेश दिया था। इनमें न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स, शिकागो और ह्यूस्टन जैसे बड़े शहरों के स्टेशन शामिल हैं। इनमें से कुछ स्टेशन डिज्नी के सबसे ज्यादा कमाई करने वाले स्टेशन हैं।

इन स्टेशनों के लाइसेंस की सामान्य अवधि 2028 से 2031 के बीच खत्म होनी थी। हालांकि, कैर ने पिछले सप्ताह कहा था कि उन्होंने अभी यह तय नहीं किया है कि इस मामले में आगे क्या कदम उठाया जाएगा।

प्रशासन ने ‘गिलोटिन’ वाली तुलना को गलत बताया

ट्रंप प्रशासन के वकील दिमितार जॉर्जिएव-रेमेल ने सुनवाई में डिज्नी की गिलोटिन वाली तुलना को गलत बताया। उन्होंने कहा कि किसी भी स्थिति में डिज्नी को प्रशासनिक प्रक्रिया और उसके बाद न्यायिक समीक्षा के दौरान अपने एबीसी लाइसेंस बनाए रखने का अवसर मिलेगा।

जज अलीखान ने इससे पहले FCC को इन लाइसेंसों को सार्वजनिक सुनवाई के लिए भेजने संबंधी आदेश जारी करने से रोकने से इनकार कर दिया था। हालांकि, FCC ने अदालत को आगे की कार्रवाई से कम से कम 48 घंटे पहले सूचना देने पर सहमति जताई है।

करीब दो घंटे चली सुनवाई में जज को यह तय करना है कि डिज्नी की मांग पर FCC की कार्रवाई रोकने के लिए शुरुआती तौर पर रोक का आदेश जारी किया जाए या नहीं।

दस्तावेजों को लेकर शुरू हुआ था विवाद

FCC चेयरमैन ब्रेंडन कैर ने मार्च 2025 में डिज्नी की विविधता से जुड़ी नीतियों की जांच शुरू की थी। कैर के मुताबिक, कंपनी ने मांगे गए दस्तावेज पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं कराए थे।

ब्रेंडन कैर का कहना है कि दस्तावेजों की मांग का जल्द जवाब नहीं मिलने के कारण एबीसी स्टेशनों के लाइसेंस की समय से पहले समीक्षा की गई। 

हालांकि, सुनवाई के दौरान जज अलीखान ने प्रशासन के इस तर्क पर सवाल उठाया कि मामला सिर्फ दस्तावेज उपलब्ध कराने से जुड़े विवाद का है। उन्होंने पूछा कि अगर ऐसे विवाद कई लाइसेंसधारकों के साथ होते हैं, तो एबीसी का मामला इतना अलग क्या है कि उसके लाइसेंस की समय से पहले समीक्षा की जरूरत पड़ी।

वहीं, प्रशासन ने तर्क दिया कि डिज्नी को यह मुकदमा सीधे संघीय अपील अदालत में दायर करना चाहिए था और पहले FCC के कर्मचारियों की ओर से लाइसेंस की समीक्षा के आदेश के खिलाफ अपील करनी चाहिए थी।

50 साल से ज्यादा समय बाद ऐसी कार्रवाई

रिपोर्ट के मुताबिक, FCC ने इससे पहले 50 साल से ज्यादा समय तक किसी प्रसारक के लाइसेंस की ऐसी समयपूर्व समीक्षा का आदेश नहीं दिया था। इस मामले में लाइसेंस की समीक्षा का आदेश उस समय आया, जब ट्रंप ने एबीसी से लेट-नाइट होस्ट जिमी किमेल को हटाने की मांग की थी।

अमेरिका में ब्रॉडकास्ट टीवी चैनलों को सार्वजनिक एयरवेव का इस्तेमाल करने के लिए FCC लाइसेंस की जरूरत होती है। लाइसेंस रद्द किए जाने के मामले बेहद दुर्लभ हैं। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि लाइसेंस खोने की धमकी प्रसारकों पर दबाव बना सकती है और कार्यक्रमों से जुड़े संपादकीय फैसलों में सरकारी दखल की चिंता पैदा कर सकती है।

‘The View’ की भी FCC कर रहा जांच

FCC एबीसी के राजनीतिक चर्चा वाले डे-टाइम शो ‘The View’ की भी जांच कर रहा है। आयोग ने कहा है कि यह कार्यक्रम राजनीतिक उम्मीदवारों को समान अवसर देने से जुड़े संघीय नियमों के दायरे में आ सकता है।

डिज्नी का कहना है कि फरवरी से ‘The View’ में किसी भी राजनीतिक उम्मीदवार को नहीं बुलाया गया है और कंपनी ने इसके पीछे FCC के दबाव को कारण बताया है।

पिछले महीने जिमी किमेल ने भी कहा था कि FCC की धमकियों के कारण उनके शो में टेक्सस के डेमोक्रेटिक सीनेट उम्मीदवार जेम्स तालारिको का इंटरव्यू प्रसारित नहीं हो सका। बाद में यह इंटरव्यू यूट्यूब पर जारी किया गया, जिसे अब तक 1.3 करोड़ से ज्यादा बार देखा जा चुका है।

 

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थियोब्रोमा ने आनंद तोमर को चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर नियुक्त किया

आनंद तोमर ने थियोब्रोमा में चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर की जिम्मेदारी संभाली है। इससे पहले वह एलाइड ब्लेंडर्स, मैकडॉनल्ड्स और मैरिको में टेक्नोलॉजी और आईटी से जुड़ी नेतृत्वकारी भूमिकाएं निभा चुके हैं।

Last Modified:
Wednesday, 07 October, 2026
anandtomar

आनंद तोमर (Anand Tomar) ने थियोब्रोमा (Theobroma) में चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर (Chief Technology Officer) के रूप में नई जिम्मेदारी संभाली है। वह कंपनी के टेक्नोलॉजी फंक्शन (Technology Function) का नेतृत्व करेंगे।

थियोब्रोमा से पहले तोमर एलाइड ब्लेंडर्स एंड डिस्टिलर्स लिमिटेड (Allied Blenders & Distillers Ltd.) में चीफ इंफॉर्मेशन ऑफिसर (Chief Information Officer) थे। उन्होंने मई 2025 से सितंबर 2026 तक इस भूमिका में कंपनी की टेक्नोलॉजी और आईटी एजेंडा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभाली।

इससे पहले तोमर मैकडॉनल्ड्स (McDonald’s) से जुड़े थे, जहां उन्होंने अगस्त 2021 से मई 2025 तक हेड ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (Head of Information Technology) के रूप में काम किया।

तोमर ने मैरिको लिमिटेड (Marico Limited) के साथ भी छह साल से ज्यादा समय तक काम किया। वह फरवरी 2015 से अगस्त 2021 तक कंपनी में टेक्नोलॉजी लीड (Technology Lead) रहे। उनके अनुभव में टेक्नोलॉजी लीडरशिप, सिस्टम इंटीग्रेशन और आईटी मैनेजमेंट शामिल हैं।

थियोब्रोमा में नई भूमिका में तोमर कंपनी की टेक्नोलॉजी स्ट्रैटेजी और डिजिटल पहलों (Digital Initiatives) का नेतृत्व करेंगे। कंपनी अपने ऑपरेशंस को आगे बढ़ा रही है और इसी विस्तार के बीच वह टेक्नोलॉजी से जुड़े काम की जिम्मेदारी संभालेंगे।

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कर्नाटक कोर्ट ने मीडिया को बिना पुष्टि वाली इस मामले की खबरें प्रकाशित करने से रोका

कर्नाटक की एक अदालत ने मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को व्यक्ति और उसके परिवार से जुड़ी बिना पुष्टि वाली, आधारहीन या मानहानिकारक सामग्री प्रकाशित और प्रसारित करने से रोक दिया है।

Last Modified:
Wednesday, 07 October, 2026
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कर्नाटक की एक अदालत ने एक व्यक्ति और उसके परिवार के सदस्यों से जुड़े मामले में मीडिया संस्थानों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को बिना पुष्टि वाली, आधारहीन, मानहानिकारक या पक्षपातपूर्ण कंटेंट प्रकाशित और प्रसारित करने से रोक दिया है। अदालत ने मामले में एकतरफा अस्थायी रोक (एक्स-पार्टी टेंपरेरी इंजंक्शन) का आदेश दिया है।

अदालत ने कहा कि यह ऐसा मामला है, जिसमें अगर प्रतिवादियों को पहले नोटिस जारी किया गया और इस दौरान समय बीत गया, तो राहत देने का उद्देश्य ही खत्म हो सकता है। इसी वजह से अदालत ने नोटिस जारी करने से पहले ही अस्थायी रोक लगाने को उचित माना।

अदालत के आदेश के मुताबिक, प्रतिवादी, उनके कर्मचारी या उनकी ओर से काम करने वाला कोई भी व्यक्ति अगली सुनवाई तक शिकायतकर्ता और उसके परिवार के सदस्यों से संबंधित ऐसी खबर, लेख, हेडलाइन, ऑडियो, वीडियो, इंटरव्यू आदि को प्रसारित, प्रकाशित, लिख, साझा या अपलोड नहीं कर सकता, जिनका कोई ठोस आधार नहीं है।

यह रोक विधान सौधा पुलिस द्वारा क्राइम नंबर 89/2026 में की जा रही जांच और कर्नाटक लोक सेवा आयोग (KPSC) के पशु चिकित्सा अधिकारियों की भर्ती से जुड़े कथित घोटाले में ED, CID और SIT की जांच से संबंधित कंटेंट पर लागू होगी।

पहले से प्रकाशित कंटेंट हटाने का भी निर्देश

अदालत ने केवल नई कंटेंट प्रकाशित करने पर रोक नहीं लगाई, बल्कि पहले से प्रकाशित कंटेंट को लेकर भी निर्देश दिया है। शिकायतकर्ता ने अदालत से ऐसी कंटेंट हटाने के लिए अनिवार्य रोक लगाने की मांग की थी।

इस पर अदालत ने संबंधित प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में शिकायतकर्ता और उसके परिवार के सदस्यों के बारे में प्रकाशित या अपलोड की गई ऐसी खबरें, लेख, इंटरव्यू, ऑडियो और वीडियो को निष्क्रिय किया जाए, जिनमें आधारहीन खबरें दी गई हैं।

24 प्रतिवादियों के खिलाफ दायर किया मुकदमा

शिकायतकर्ता ने 24 नामित प्रतिवादियों के खिलाफ स्थायी रोक लगाने की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया था। इन प्रतिवादियों में बड़े टेलीविजन न्यूज चैनल, अखबार और गूगल, मेटा यानी फेसबुक, वॉट्सऐप, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म शामिल हैं।

शिकायतकर्ता, जो खुद को तुमकुरु विश्वविद्यालय के सिंडिकेट का सदस्य बताता है, ने आरोप लगाया कि उसकी गिरफ्तारी के बाद कुछ मीडिया संस्थानों ने उसके खिलाफ 'मीडिया ट्रायल' किया।

उसका आरोप है कि मीडिया रिपोर्टों में उसे इस घोटाले का 'किंगपिन' और 'बिचौलिया' बताया गया। इसके अलावा कुछ खबरों में ऐसे सवाल और दावे भी किए गए, जैसे वह पांच साल में शून्य से करोड़पति कैसे बन गया और उसने कथित अपराध से मिले पैसों से जमीन खरीदी।

शिकायतकर्ता का कहना है कि इन आरोपों को बिना पर्याप्त पुष्टि के इस तरह पेश किया गया, जैसे वे साबित तथ्य हों। उसके मुताबिक, ऐसी रिपोर्टों से उसकी प्रतिष्ठा और समाज में उसकी छवि को नुकसान पहुंच रहा है।

KPSC भर्ती घोटाले से जुड़ा है मामला

यह मामला कर्नाटक लोक सेवा आयोग की पशु चिकित्सा अधिकारियों की भर्ती में कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले से संबंधित है। मामले में विधान सौधा पुलिस के अलावा प्रवर्तन निदेशालय (ED), अपराध जांच विभाग (CID) और विशेष जांच दल (SIT) की जांच का भी उल्लेख अदालत के आदेश में किया गया है।

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने 1 अक्टूबर को कर्नाटक हाई कोर्ट के उस निर्देश पर रोक लगा दी थी, जिसमें KPSC की पशु चिकित्सा अधिकारी भर्ती में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए SIT गठित करने और नए सिरे से जांच कराने का आदेश दिया गया था।

अदालत का मौजूदा आदेश अगली सुनवाई तक शिकायतकर्ता और उसके परिवार के खिलाफ जांच से जुड़ी ऐसी कंटेंट के प्रकाशन और प्रसारण पर रोक लगाता है, जिसे आधारहीन या अपुष्ट बताया गया है।

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गीता प्रेस की पत्रिका ‘कल्याण’ के शताब्दी समारोह में शामिल होंगे सीएम योगी

गीता प्रेस की पत्रिका ‘कल्याण’ के शताब्दी समारोह का आयोजन 7 अक्टूबर को गोरखपुर में होगा, जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ करेंगे और कई विद्वान संबोधित करेंगे।

Last Modified:
Tuesday, 06 October, 2026
geetapress

गोरखपुर में गीता प्रेस की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘कल्याण’ के शताब्दी समारोह का आयोजन 7 अक्टूबर को किया जाएगा। शाम 4 बजे होने वाले इस समारोह की अध्यक्षता उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ करेंगे।

यह आयोजन श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार के 134वें जयंती महोत्सव के अवसर पर किया जा रहा है। समारोह में देश के कई प्रख्यात विद्वान और विचारक ‘कल्याण’ की 100 साल की वैचारिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक यात्रा पर अपने विचार रखेंगे।

समारोह को पूर्व सांसद प्रो. राकेश सिन्हा, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय, भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) के पूर्व महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी और भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के निदेशक डा. ओमजी उपाध्याय संबोधित करेंगे।

‘कल्याण’ ने एक शताब्दी से भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा, आध्यात्मिक चिंतन और नैतिक जीवन-मूल्यों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह पत्रिका भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक चेतना को लोगों तक पहुंचाने का माध्यम रही है। शताब्दी समारोह में इसकी ऐतिहासिक भूमिका, वैचारिक योगदान और आज के समाज में इसकी प्रासंगिकता पर भी चर्चा होगी।

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महिला पत्रकार से यौन उत्पीड़न के आरोपों के बीच दिल्ली पुलिस के ACP का प्रमोशन

एक महिला पत्रकार से कथित यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना कर रहे दिल्ली पुलिस के एक सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) को सोमवार को अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त के पद पर प्रमोट किया गया है।

Last Modified:
Tuesday, 06 October, 2026
DelhiPolice985

दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान एक महिला पत्रकार से कथित यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना कर रहे दिल्ली पुलिस के एक सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) को सोमवार को अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (Additional Deputy Commissioner) के पद पर प्रमोट किया गया है। उनके साथ 11 अन्य पुलिस अधिकारियों को भी प्रमोशन दिया गया है।

एक आधिकारिक आदेश के मुताबिक, प्रमोशन पाने वाले अधिकारियों में डॉ. विकास श्योकंद, ए. वेंकटेश, गुरसेवक सिंह, रेणु लता, विदुषी कौशिक, मनु हिमांशु, सकारिया मिहिर प्रवीनभाई, गरिमा तिवारी, विवेक भगत, आशीष कुमार, मनीष लडला और रोहित गुप्ता शामिल हैं।

पुलिस ने प्रमोशन को बताया नियमित प्रक्रिया

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि ये प्रमोशन नियमित प्रक्रिया के तहत किए गए हैं और प्रमोशन के लिए अनुरोध काफी पहले ही भेजा गया था।

तीन महिला पत्रकारों ने लगाए थे आरोप

यह मामला 3 अक्टूबर को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर चुनाव आयोग के खिलाफ हुए प्रदर्शन से जुड़ा है। इस प्रदर्शन के दौरान तीन महिला पत्रकारों ने दिल्ली पुलिस के अधिकारियों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। दिल्ली पुलिस को इन मामलों में शिकायतें मिली थीं और आगे की जांच के लिए इन्हें क्राइम ब्रांच को भेज दिया गया है।

दिल्ली पुलिस ने रविवार को अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर बताया था कि 3 अक्टूबर के प्रदर्शन के दौरान नई दिल्ली इलाके में कानून-व्यवस्था की स्थिति बनी थी। इसी दौरान तीन महिला पत्रकारों ने पुलिस अधिकारियों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए। पुलिस के मुताबिक, निष्पक्ष और उचित जांच के लिए शिकायतों को क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर किया गया है। इन आरोपों के बाद कई स्वतंत्र पत्रकारों ने पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन के बाहर प्रदर्शन भी किया और आरोपी अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की।

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