नए जमाने की नई विसंगतियों का आईना है वरिष्ठ पत्रकार पीयूष पांडे का ये व्यंग्य संग्रह

पिछले पांच-एक साल में एक नई बात हुई है। अपन लोग बात-बात पर आहत होने लगे हैं। आहत हैं इसलिए आक्रामक भी हो गए हैं

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 03 February, 2020
Last Modified:
Monday, 03 February, 2020
PIYUSH PANDEY

प्रभात रंजन, वरिष्ठ लेखक।।

पिछले पांच-एक साल में एक नई बात हुई है। अपन लोग बात-बात पर आहत होने लगे हैं। आहत हैं इसलिए आक्रामक भी हो गए हैं। इस चक्कर में दूसरों को आहत करना अपना शगल हो गया है। लेकिन जब आहत होने और आहत करने का अहम काम सामान्य लोग करने लगे हैं तो व्यंग्य लेखक क्या करेगा? जवाब इतना आसान नहीं है, फिर भी कुछ और करे या ना करे अपनी ऐसी-तैसी करने का हक तो उसे है। ये अलग बात है कि किसी समझदार और संवेदनशील आदमी (जो लेखक भी है) की दुर्गति कराते हुए लेखक, पाठक और समाज को वहां लाकर खड़ा कर देता है, जहां से वह अपना पतन साफ-साफ देख सके।

इस हिसाब से ‘कबीरा बैठा डिबेट में’ हमारी मौजूदा सामूहिक सोच का आख्यान है। लगे हाथ, इस सोच का व्याकरण समझने की कोशिश है। ये इत्तेफाक भर है कि पीयूष पांडे ने अपने समाज की मानसिक हालत समझने-समझाने के लिए टीवी की पृष्ठभूमि चुनी है। हालांकि ये सच है कि जो कुछ टीवी की बहस में घटित हो रहा है, कमोबेश वहीं सड़क, संसद और घर के ड्राइंग रूम में भी हो रहा है। हां, ये जरूर है कि पीयूष पांडे ने कई वर्षों तक टेलिविजन में काम करते हुए उसकी कार्य पद्धति और ज्ञान तंत्र को करीब से देखा है। इसलिए जब वो टीवी और उसकी बहस की असंगति को सामने लाते हैं तो सब कुछ प्रमाणिक लगता है।

किताब के पहले ही व्यंग्य ‘कबीरा बैठा डिबेट में’ एक जगह वह लिखते हैं, “‘समझदार’ पैनलिस्ट खोजना गूंगे की आवाज खोजने जैसा मुश्किल है। अव्वल तो न्यूज चैनल पर भद्द पिटवाने समझदार आते नहीं। यदा-कदा घेर घारकर उन्हें स्टूडियो लाया भी जाए तो दस मिनट बाद वो समझदार नहीं रहते। सर्वज्ञानी एंकर उन्हें मूर्ख साबित कर दूसरे समझदार के शिकार के लिए बढ़ जाता है।”

हालांकि, लेखक का उद्देश्य ये बताना नहीं है कि सच दिखाने का दावा करने वाले टीवी चैनलों में सचमुच कितना मानसिक दिवालियापन व्याप्त है। उसका मकसद तो अपनी या अपने जैसे हर संवेदनशील और समझदार आदमी की मौजूदा समाज में हैसियत बताना है। इसलिए वो हिंदी भाषा के सबसे बड़े व्यंग्यकार कबीर को टीवी की बहस में ठेल देते हैं। कबीर के साथ टीवी की बहस शुरू होती है, और इससे गुजरता हुआ पाठक लोटपोट हो जाता है।

टीवी के महाज्ञानी एंकर के सामने कबीर की एक नहीं चलती। अनुभव और ज्ञान का कवच काम नहीं आता। अगर कोई कसर बाकी है तो गेस्ट के तौर पर आए पंडित और मुल्ला पूरी कर देते हैं। डिबेट शो में बैठे दर्शक भी कबीर पर हमला करने के लिए तैयार हो जाते हैं। कबीर से आहत लोगों को बड़े संजोग से मौका मिला और सबने अपनी भड़ास निकाल ली। कबीर का जो होना था सो हुआ। साथ में दो बातें और हुईं। पहला ये कि शो जम गया। साबित हुआ कि मूर्खता का अपना अर्थशास्त्र है, इसलिए इस दौर में उसकी जबरदस्त मांग है। दूसरी ये कि मूर्खता के आगे समझदारी आज कमजोर और बेबस है।

कबीर की दुर्गति पर हंसते-हंसते ये सवाल जरूर दिमाग में आता है कि हम कहां से चले थे और कहां आ गए हैं। इस निष्कर्ष पर लाकर लेखक एक दुख के साथ पाठक को छोड़ देता है। हालांकि बात कबीर से आगे भी जाती है और हमारे नए किस्म के समाज की नई असंगतियों तक जाती है। ये समाज न सिर्फ आहत है, बल्कि इस पर एक अलग तरह की बदहवासी छाई हुई है। दिलचस्प बात ये है कि इस बदहवासी को न्यू नॉर्मल साबित करने की कोशिश हो रही है।

पीयूष पांडे की नजर स्कूल के पीटीएम में गए मां-बाप पर भी है और थोड़ी तोंद निकलने से परेशान हो रहे आदमी पर भी। सभी के पास अपनी महत्वकांक्षाएं हैं और अजब-गजब तर्क। लेखक बारीकी से उस समाज को देख रहा है, जिसके पास ज्ञान का असीम भंडार जमा हो गया है, लेकिन उसने बुनियादी सोच-समझ से तौबा कर लिया है। इसके बाद तुर्रा ये कि वो बात-बात पर आहत हो जाता है। फिर, मरने-मारने पर उतारू हो जाता है। यकीनन लेखक जिस समाज का चित्र खींचता है वहां एक दुर्घटना हो रही है, लेकिन पीयूष पांडे के व्यंग्य की खूबसूरती ये है कि वहां सब कुछ सामान्य तरीके से सामने आता है। किताब पढ़ते हुए पहले हंसी आती है फिर कोफ्त होती है। आखिर में एक टीस रह जाती है।

पीयूष के पास विषयों की कमी नहीं है और कहने का अपना अंदाज है। जंगलश्री के इंतजार में नाम से लिखे व्यंग्य में एक जगह वो लिखते हैं-‘शेर को यूं चुनाव-वुनाव की जरूरत नहीं है। शेर शेर होता है। वो जहां खड़ा हो जाए, वहीं से जंगलराज शुरू होता है। लेकिन, बीते दिनों डेमोक्रेसी के हल्ले में शेर ने जंगल में भी डेमोक्रेसी की स्थापना कर दी थी। शेर यूं तो झपट्टा मारकर सब छीन सकता है, लेकिन जंगल में अब डेमोक्रेसी थी तो शेर नहीं चाहता था कि ऐसा कोई भी काम किया जाए, जो डेमोक्रेसी के खिलाफ हो।’

मिलावट का स्वर्ण काल व्यंग्य की शुरुआत ही दिलचस्प सच्चाई के साथ होती है। वो लिखते हैं, ‘ये मिलावट का स्वर्णकाल है। जित देखिए तित मिलावट। लोग आधुनिकता और विकास का नारा लगाते हुए मिलावट के स्वर्णकाल को एंजॉय कर रहे हैं। मिलावट ही सत्य है। कभी सौभाग्य से शुद्ध माल के दर्शन हो जाएं तो लोग उलझन में पड़ जाते हैं कि फैशन के इस युग में 100 फीसदी टंच माल कहां से आ गया? हाल यह है कि दिल्ली के ज्यादातर लोगों को अगर पूरी तरह शुद्ध हवा मिल जाए तो उनकी तबीयत खराब हो सकती है।’ आदत ही नहीं है।

व्यंग्य लेखन की दुनिया में इन दिनों जो सन्नाटा पसरा है, उसे देखते हुए ‘कबीरा बैठा डिबेट में’ एक उपलब्धि की तरह है। पहले की अपनी दो किताबों ‘छिछोरेबाजी का रिजोल्यूशन’ और ‘धंधे मातरम्’ से जो प्रतिमान उन्होंने बनाया है, अब उससे आगे निकल गए हैं। इस मुश्किल समय में व्यंग्य लिखने के लिए भी पीयूष पांडे अलग से बधाई के पात्र हैं।

‘कबीरा बैठा डिबेट में’

लेखक: पीयूष पांडे

प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन

मूल्य: 250/

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जानें, क्यों कपिल शर्मा पर भड़का कायस्थ समाज, दी मुकदमे की चेतावनी

अखिल भारतीय कायस्थ महासभा का कहना है कि यदि कपिल शर्मा ने माफी नहीं मांगी तो उनके शो का बहिष्कार किया जाएगा।

Last Modified:
Tuesday, 31 March, 2020
Kapil Sharma

कॉमेडी किंग कपिल शर्मा इन दिनों विवादों में फंसते नजर आ रहे हैं। दरअसल, अखिल भारतीय कायस्थ महासभा ने उन पर कॉमेडी शो में भगवान श्री चित्रगुप्त का मजाक उड़ाने का आरोप लगाते हुए अपना विरोध जताया है।

अखिल भारतीय कायस्थ महासभा ने कपिल शर्मा से इस मसले पर माफी मांगने के लिए कहा है। महासभा का यह भी कहना है कि यदि कपिल शर्मा ने माफी नहीं मांगी तो उनके शो का बहिष्कार किया जाएगा। यही नहीं, लॉकडाउन खत्म होने पर कपिल शर्मा के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कराया जाएगा।

महासभा के पदाधिकारियों का आरोप है कि शनिवार को कपिल शर्मा ने अपने शो के दौरान भगवान श्री चित्रगुप्त के बारे में भद्दा मजाक किया। कपिल शर्मा के इस कदम की भर्त्सना करते हुए महासभा के पदाधिकारियों ने कहा कि इस कृत्य के लिए कपिल शर्मा अगले एपिसोड में पूरे देशवासियों से माफी मांगें।

वहीं, मीडिया वेंचर ‘पार्लियामेंट्री बिजनेस’ (ParliamentaryBusiness) के सीईओ और वरिष्ठ पत्रकार रोहित सक्सेना ने भी अपने ट्विटर हैंडल पर कपिल शर्मा को माफी मांगने अथवा कानूनी कार्यवाही का सामना करने की चेतावनी दी है।

रोहित सक्सेना द्वारा इस बारे में किए गए ट्वीट को आप यहां देख सकते हैं।

 

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लॉकडाउन में झूठी खबर फैलाने पर पत्रकार के खिलाफ दर्ज हुआ केस

कोरोनावायरस (Coronavirus) के तेजी से फैलते संक्रमण के बीच लोगों में डर का माहौल बना हुआ है। ऐसे में इससे जुड़ी निराधार खबरें सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रही हैं।

Last Modified:
Monday, 30 March, 2020
Fake News

कोरोनावायरस (Coronavirus) के तेजी से फैलते संक्रमण के बीच लोगों में डर का माहौल बना हुआ है। ऐसे में इससे जुड़ी निराधार व झूठी खबरें सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रही हैं। इसी कड़ी में सोशल मीडिया पर फर्जी खबर फैलाने के आरोप में हिमाचल प्रदेश में एक समाचार पत्र (Newspaper) के पत्रकार (Journalist) पर मामला दर्ज किया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोलन के औद्योगिक क्षेत्र बद्दी, नालागढ़ और बरोटीवाला में लॉकडाउन के कारण बड़ी संख्या में श्रमिक फंसे हुए हैं। ऐसे में सूबे के नामी अखबार के पत्रकार ने फेसबुक पर दावा किया कि औद्योगिक क्षेत्र बद्दी, नालागढ़ और बरोटीवाला से 31 मार्च को एक दिन के लिए बसें चलेंगी। यह जानकारी सोशल मीडिया पर भी पोस्ट कर दी गयी, जिसके बाद  पुलिस ने अब फर्जी खबरें फैलाने के आरोप में पत्रकार पर मामला दर्ज किया गया है।

फेसबुक पर फर्जी खबर चलाने के आरोप में पत्रकार पर आईपीसी की धारा 188, 182, 336, 269 और एनडीएमए के एक्ट 54 के तहत बद्दी पुलिस थाने में केस दर्ज किया गया है। बद्दी के एसपी रोहित मलपानी ने बताया कि रिपोर्टर ने सोशल मीडिया पर पोस्ट में कहा कि यहां से विभिन्न हिस्सों में बसें चलाई जा रही हैं।

गौरतलब है कि बद्दी औद्योगिग नगरी है, जहां बड़ी संख्या में लोग फंसे हैं। वहीं सरकार ने अब अंतर जिला में भी एंट्री पर रोक लगा दी है। एसपी ने कहा कि यदि कोई एक जिले से दूसरे जिले में जाने की कोशिश करेगा, तो उसे 14 दिन के लिए क्वारंटीन किया जाएगा। सरकार ने लोगों के लिए खाने-रहने की व्यवस्था की है।

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इस गंभीर बीमारी ने छीन ली पत्रकार अनिल कुमार शर्मा की जिंदगी

आगरा के बालूगंज निवासी अनिल कुमार शर्मा का कई दिनों से जयपुर के अस्पताल में चल रहा था इलाज

Last Modified:
Monday, 30 March, 2020
Anil Kumar Sharma

ब्लड कैंसर से जूझ रहे पत्रकार अनिल कुमार शर्मा का शनिवार को निधन हो गया है। वह जयपुर के अस्पताल में अपना इलाज करा रहे थे। आगरा के करियप्पा रोड बालूगंज निवासी अनिल कुमार शर्मा शासन से मान्यताप्राप्त संवाददाता थे। वह इन दिनों अलीगढ़ से पब्लिश होने वाले अखबार ‘राजपथ’ में आगरा के संवाददाता थे। ताजगंज स्थित मोझधाम में रविवार को उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। उनके परिवार में पत्नी, दो पुत्र और दो पुत्रियां हैं।

ताज प्रेस क्लब के अध्यक्ष अनिल शर्मा, वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ. अजय शर्मा, महामंत्री उपेन्द्र शर्मा, सचिव पवन तिवारी व कोषाध्यक्ष महेश शर्मा ने अनिल कुमार शर्मा के निधन पर दुख व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी है।  

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फोटो जर्नलिस्ट की पीट-पीटकर हत्या, सदमे ने ली बुजुर्ग पिता की भी जान

दिल्ली के पांडव नगर इलाके में एक फोटो जर्नलिस्ट की पीट-पीटकर हत्या करने का मामला सामने आया है।

Last Modified:
Friday, 27 March, 2020
beaten

दिल्ली के पांडव नगर इलाके में एक फोटो जर्नलिस्ट की पीट-पीटकर हत्या करने का मामला सामने आया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, मृतक की पहचान 42 वर्षीय गजेंद्र सिंह  के रूप में हुई है। गजेंद्र परिवार के साथ मंडावली इलाके में रहते थे।

गजेंद्र कई दैनिक अखबारों के लिए फ्रीलांस फोटो जर्नलिस्ट के तौर पर काम करते थे। शनिवार रात परिजनों से किसी काम से बाहर जाने की बात कहकर घर से निकले थे, लेकिन वह पूरी रात वापस नहीं लौटे।

अगले दिन जब तलाश शुरू की गई तो वे संजय झील में घायल हालत में मिले। उनके चेहरे पर चोट के गंभीर निशान थे। गजेंद्र की दोनों आंखें बुरी तरह सूजी हुई थीं। इलाज के लिए गजेंद्र को एलबीएस अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें प्राथमिक उपचार के बाद छुट्टी दे दी गई, लेकिन देर रात को उन्होंने घर पर दम तोड़ दिया। अगले दिन जब पोस्टमार्टम के बाद परिवार शव का अंतिम संस्कार करके घर लौटा, तो सदमे से गजेंद्र के 84 वर्षीय पिता भवान सिंह की भी मौत हो गई। भवान सिंह भी कई बड़े समाचार पत्रों में फोटो पत्रकार रहे थे और उन्होंने कई अवॉर्ड भी जीते थे। पिता-पुत्र की एकस्मात मौत से परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। 

पीड़ित परिवार की शिकायत पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है और गजेंद्र सिंह पर हमला करने वाले आरोपियों की तलाश शुरू कर दी है। पुलिस को पता चला है कि गजेंद्र के पास से उसका मोबाइल फोन नहीं मिला है। पुलिस फोन के आधार पर आरोपियों तक पहुंचने का प्रयास कर रही है।

 

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न्यूज चैनल्स के हितों की रक्षा के लिए आगे आया NBF, सरकार के सामने रखीं ये मांग

कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने की दिशा में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का किया समर्थन

Last Modified:
Tuesday, 24 March, 2020
NBF

न्यूज इंडस्ट्री से जुड़े मुद्दे सुलझाने और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स के हितों की रक्षा के लिए गठित ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स फेडरेशन’ (News Broadcasters Federation) ने कोरोना वायरस से निपटने के लिए किए गए लॉकडाउन व अन्य पहल के तहत देश भर के न्यूज टेलिविजन चैनल्स के हितों की दिशा में सरकार से तत्काल दखल देने की मांग की है।  

इस बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय, कैबिनट सचिवालय, वित्त मंत्रालय, सूचना प्रसारण मंत्रालय आदि को दिए ज्ञापन में ‘एनबीएफ’ ने न्यूज ब्रॉडकास्टिंग सेक्टर पर पड़ रहे वित्तीय और व्यावसायिक असर का मुकाबला करने के लिए सरकारी हस्तक्षेप की मांग की है।

इस ज्ञापन में सरकार से मांग की गई है कि इस वित्तीय संकट को देखते हुए सरकार को टैक्स में छूट दी जाए। इसके साथ ही जीएसटी की दरों को कम करने, टैक्स जमा करने के लिए कम से कम तीन महीने की छूट देने आदि की मांग भी की गई है। फेडरेशन ने सरकार से मार्च और अप्रैल 2020 के लिए डीडी फ्रीडिश प्लेटफॉर्म पर न्यूज चैनल्स की फीस माफ करने की भी मांग की है।

इस बारे में ‘एनबीएफ’ के प्रेजिडेंट अरनब गोस्वामी का कहना है, ‘कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने की दिशा में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का एनबीएफ सपोर्ट करता है और पूरी तरह से सरकार के साथ है। वहीं, इस स्थिति में सरकार को न्यूज ब्रॉडकास्टिंग सेक्टर को बचाने की दिशा में भी कदम उठाने चाहिए, जो हर परिस्थिति में लोगों को सूचनाएं उपलब्ध करा रहा है।’

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'लॉकडाउन' में दिल्ली पुलिस की बर्बरता का शिकार हुए 'आजतक' के ये पत्रकार

कोरोना के बढ़ते संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए दिल्ली को लॉकडाउन कर दिया गया है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 23 मार्च से 31 मार्च तक ‘लॉकडाउन’ की घोषणा की है

Last Modified:
Monday, 23 March, 2020
beaten

कोरोना के बढ़ते संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए दिल्ली को लॉकडाउन कर दिया गया है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 23 मार्च से 31 मार्च तक ‘लॉकडाउन’ की घोषणा की है, लेकिन इस दौरान जरूरी सेवाओं से जुड़े सभी लोगों को आवागमन की अनुमति दी गई है, जिनमें मीडियाकर्मी व पत्रकार भी शामिल हैं। प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी लॉकडाउन में फील्ड में काम करने की छूट है।

बावजूद इसके, ऑफिस जाते समय ‘आजतक’ के एक टीवी पत्रकार दिल्ली पुलिस की बर्बरता का शिकार हो गए। ‘आजतक’ में एग्जिक्यूटिव एडिटर के पद पर काम कर रहे हैं नवीन कुमार ने अपने ट्विटर अकाउंट के जरिए इसकी जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि जब वे सफदरजंग से नोएडा फिल्म सिटी स्थित अपने कार्यालय जा रहे थे कि तभी दिल्ली पुलिस के लोगों ने उनके कार की चाभी निकाल ली, उनका वॉलेट और फोन छीन लिया। इतना ही नहीं उन्हें भद्दी-भद्दी गालियां दी गईं और वैन में डालकर उन्हें पीटा भी गया। एक अपने इस हादसे की पूरी कहानी बताई है, जिसे आप नीचे पढ़ सकते हैं-

 

 

 

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‘जनता कर्फ्यू में इस मीडिया संस्थान ने भी निभाई सामाजिक जिम्मेदारी

कोरोना के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनता कर्फ्यू की अपील पर अमल करने वालों में आम जनता के साथ-साथ कुछ मीडिया संस्थान भी शामिल रहे।

Last Modified:
Monday, 23 March, 2020
Newspaper

कोरोना के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को जनता कर्फ्यू की अपील की थी। इस अपील पर अमल करने वालों में आम जनता के साथ-साथ कुछ मीडिया संस्थान भी शामिल रहे। इन संस्थानों में रविवार को काम नहीं हुआ। ऐसा अमूमन कम ही देखने को मिलता है कि मीडिया हाउस पूरी तरह बंद रहें, लेकिन चूंकि यह तेजी से पैर पसार रहे कोरोना वायरस को कमजोर करने की अपील थी, इसलिए संस्थानों ने सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हुए काम बंद रखा।

मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाला हिंदी दैनिक ‘प्रजातंत्र’ भी इस कड़ी में शामिल रहा। सोमवार को अखबार का अंक पाठकों के हाथों में नहीं पहुंचा। हालांकि, इसकी सूचना पहले ही पाठकों तक पहुंचा दी गई थी। खास बात यह है कि अखबार प्रबंधन ने आगे के लिए भी तैयारी की है, ताकि कोरोना के चक्र को तोड़ने की सरकारी कोशिशों परवान चढ़ाया जा सके। प्रबंधन की तरफ से सभी कर्मियों को एक संदेश भेजा गया है, जिसमें कहा गया है कि ‘23 मार्च से सरकुलेशन/ एचआर और मार्केटिंग विभाग घर से ही काम करेंगे।

अकाउंट विभाग से कोई एक व्यक्ति 11-2 बजे तक ही आए। रिपोर्टर सुबह की मीटिंग संपादक/ सिटी चीफ के साथ वॉट्सऐप ग्रुप पर ही करें। रिपोर्टर अपनी खबरें घर से ही दिन में भेज दें। उन्हें दफ्तर आना है या नहीं, इस पर 2 बजे संपादक से बात कर लें। रिपोर्टर फील्ड पर ना जाएं। फोन पर ही सूचना ले लें, खुद को एक्सपोज बिलकुल ना करें’। इसके अलावा, यह भी कहा गया है कि डेस्क स्टाफ जल्द काम निपटाकर घर जा सकता है। साथ ही यह हिदायत भी दी गई है कि जल्दी जाने का यह मतलब बाहर घूमना नहीं होना चाहिए। ऐसा करके आप अपने और अपने परिवार एवं साथियों के लिए परेशानी खड़ी कर सकते हैं।

कोरोना का खतरा जितना अन्य लोगों को है, उतना ही पत्रकारों को भी, लिहाजा ‘प्रजातंत्र’ प्रबंधन का यह फैसला दर्शाता है कि उसे अपने कर्मियों की चिंता है। इस संबंध में अखबार के भोपाल ब्यूरो चीफ धमेंद्र पैगवार ने कहा, ‘अखबार के एडिटर-इन-चीफ हेमंत शर्मा खुद भी रिपोर्टर रहे हैं, इसलिए वह समझते हैं कि एक रिपोर्टर को खबरों की तलाश में क्या कुछ करना पड़ता है। उन्होंने हमें कई तरह की सहूलियतें प्रदान की हैं, ताकि हम कोरोना के प्रकोप से बचें रहें और वायरस में फैलाव की वजह न बनें।’

‘प्रजातंत्र’ की तरह ‘प्रदेश टुडे’ ने भी जनता कर्फ्यू को ध्यान में रखते हुए रविवार को कामकाज बंद रखा। अखबार ने अपने 21 मार्च के अंक में इसकी सूचना दी थी, जिसमें कहा गया था कि ‘प्रदेश टुडे के 14 संस्करणों का कामकाज रविवार को बंद रहेगा। कोरोना से निपटने के लिए प्रधानमंत्री की अपील का हम समर्थन करते हैं।’

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कोरोना के संक्रमण ने छीन ली दो पत्रकारों की जिंदगी

दुनियाभर के कई देश कोरोना वायरस के संकट से जूझ रहे है। ये संक्रमण तेजी से फैलता जा रहा है। इसकी वजह से स्पेन में दो खेल पत्रकारों की मौत हो गई है।

Last Modified:
Saturday, 21 March, 2020
Accident Death

दुनियाभर के कई देश कोरोना वायरस के संकट से जूझ रहे है। ये संक्रमण तेजी से फैलता जा रहा है। इसकी वजह से स्पेन में दो खेल पत्रकारों की मौत हो गई है। इसकी जानकारी अंतरराष्ट्रीय खेल पत्रकार संघ (एआईपीएस) ने दी है।

संघ के मुताबिक, 59 साल के जोस मारिया कैनडेला और 78 साल के थॉमस डिएज वाल्डेस की गुरुवार को इस भयंकर बीमारी की वजह से मौत हो गई। जोस रेडियो नेशनल डे स्पेन (आरएनई) के लिए काम करते थे, तो वहीं थॉमस मोटरप्वाइंट नेटवर्क एडिटर्स के महानिदेशक थे। वह साथ ही 30 साल तक स्पेन के अखबार एएस के रिपोर्टर भी थे।

आरएनई ने बताया कि जोस का निधन कोरोना वायरस के कारण हुआ है। वह अपने घर में अकेले मृत पाए गए। जोस के दोस्त और एआईपीएस के सदस्य प्रिटो ने कहा कि उनका आज यानि शुक्रवार को जांच होनी थी लेकिन इससे पहले ही वो खत्म हो गए। उन्होंने कहा कि वह कमजोरी महसूस कर रहे थे, लेकिन उनकी जांच शुक्रवार को होनी थी। वे यहां स्पेन में जांच नहीं कर रहे हैं। उनके भाई ने आखिरी बार उनसे बात की थी।

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कोरोना के कहर से नहीं बचा यह मीडियाकर्मी, गई जान

दुनियाभर में कोरोना वायरस के खिलाफ जारी जंग में पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर इस बीमारी के कहर का सामना कर रहे हैं।

Last Modified:
Saturday, 21 March, 2020
nbs

दुनियाभर में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 2,77000 के करीब हो गई है, वहीं 10,000 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। अभी तक करीब 86000 लोग पूरी तरह से ठीक हो चुके हैं। सबसे ज्यादा जानें इटली में गई हैं। वहीं इस बीच कोरोना वायरस ने अमेरिकी मीडियाकर्मी लैरी एडवर्थ की भी जान ले ली है।

लैरी एडवर्थ एनबीसी न्‍यूज में कार्यरत थे और वे इन दिनों कोरोना वायरस से संक्रमित थे। इस बात की एनबीसी न्‍यूज के चेयरमैन एंड्रू लैक ने दी। उन्‍होंने बताया कि लैरी पहले से बीमार चल रहे थे और इसी बीच कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए।

लैरी ने मिडटाउन मैनहट्टन स्थित नेटवर्क के 30 रॉकफेलर प्लाजा कार्यालय के उपकरण कक्ष में काम करते थे। लैरी ने इससे पहले करीब 25 साल तक एनबीसी न्‍यूज के ऑडियो टेक्‍नीशियन के रूप में भी काम किया था।

गौरतलब है कि दुनियाभर में कोरोना वायरस के खिलाफ जारी जंग में पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर इस बीमारी के कहर का सामना कर रहे हैं। अब तक अमेरिका में कोरोना वायरस के संक्रमण से 252 लोगों की मौत हो गई है। यही नहीं इस बीमारी से अब तक अमेरिका में करीब 20 हजार लोग संक्रमित हुए हैं।  

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जीवन के कई 'रंगों' का सार है युवा पत्रकार हिमानी का ये कथा संग्रह

बीते दस सालों से मीडिया की दुनिया में कार्यरत पत्रकार और लेखिका हिमानी का लघु कथा संग्रह 'नमक' इन दिनों चर्चा में है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 18 March, 2020
Last Modified:
Wednesday, 18 March, 2020
HIMANI

अमृत शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार।।

बीते दस सालों से मीडिया की दुनिया में कार्यरत पत्रकार और लेखिका हिमानी का लघु कथा संग्रह 'नमक' इन दिनों चर्चा में है। इस कथा संग्रह की टैगलाइन है जिंदगी को चाहिए 'नमक'। इस टैगलाइन का पूरा सार कथा संग्रह की छोटी-छोटी कहानियों में मिलता है।

इन कहानियों को इस तरह शब्दों में पिरोया गया है कि हर एक कहानी अपनी ही जिंदगी में घटता हुए एक पल मालूम होती है। किसी भी कहानी में किसी भी किरदार को कोई नाम नहीं दिया गया है। हर कहानी में एक लड़का है या एक लड़की या फिर दो लड़कियों की बातचीत।

संवाद की शैली में लिखी गई ये कहानियां कहीं-कहीं आम बातचीत जैसी लगती हैं और कहीं-कहीं कम शब्दों में ताउम्र के लिए एक गहरा असर छोड़ जाती हैं। कथा संग्रह 'नमक' में 80 कहानियां हैं। इन कहानियों को पढ़ते हुए अक्सर चंद्रधर शर्मा गुलेरी की मशहूर कहानी ‘उसने कहा था’ की याद आती है, जिसके संवाद सीधे दिल पर असर करते हैं और फिर पूरी कहानी चाहे भूल भी जाएं, वो संवाद कभी भी यादाश्त से गायब नहीं होते। इस कथा संग्रह में भी ऐसे कई संवाद हैं।

'मैं आज तक कभी इतना रॉन्गसाइड नहीं चली, जितना तुमने मुझे चलवा दिया

न सड़क पर, न जिंदगी में।' 

कहानी 'रॉन्गसाइड' से

पता है ऑर्गेज्म क्या होता है? लड़की ने पूछा

'मेरे लिए तो तुम्हारा खुश होना ऑर्गेज्म होता है... 'लड़के ने जवाब दिया।

कहानी 'ऑर्गेज्म' से

'यहां बहुत ज्यादा गर्मी है। चटक धूप रहती है। घर से बाहर निकलने को जी ही नहीं चाहता। मुझे गर्मी बिलकुल पसंद नहीं है।' लड़के ने खत में लिखा

'इस पर परेशान क्यों होना, मौसम तो बदलते रहते हैं।' लड़की ने जवाब भेजा

कहानी 'मौसम' में

'तुम्हारा जाना मेरे लिए कयामत जैसा था।

और तुम्हारा न जा पाना, तुम्हारे लिए कयामत जैसा होता।

मैंने अपनी कयामत बुला ली।' लड़की ने कहा।

 कहानी 'कयामत' से

80 कहानियों की इस किताब को सात भागों में बांटा गया है। हर भाग के साथ चित्रकार प्रीतिमा वत्स ने चित्रांकन के जरिये दो लोगों के बीच के संबंधों को दिखाने की कोशिश की है। शुरुआती भाग में बेहद मासूम से पलों की कहानियां हैं, तो आखिरी भागों में दर्द और पीड़ा के लम्हों में छिपे प्यार की तड़प को दिखाने वाली कहानियां। कुछ लोग इन कहानियों को लप्रेक शैली से जोड़ सकते हैं, लेकिन इन कहानियों को पढ़ने के बाद ये लप्रेक से ज्यादा छायाचित्र की तरह लगते हैं, जिन्हें पढ़ने का अनुभव पाठक को नई सी ताजगी देता है।

वक्त की कमी के चलते अक्सर किताबें पढ़ने का शौक पूरा न कर पाने वाले लोगों के लिए ये किताब बिलकुल सही है। अगर हिसाब-किताब के अंदाज में बताया जाए तो इस कथा संग्रह की 80 कहानियों को पढ़ने के लिए सिर्फ 80 मिनट चाहिए, लेकिन बदले में ये कहानियां जीवन भर के लिए एक खास अहसास दे जाती हैं।

कथा संग्रह का नाम ‘नमक’ रखे जाने के पीछे की एक वजह इसकी शीर्षक कहानी नमक से भी समझ आती है और दूसरी वजह को लेखिका ने किताब की भूमिका में बहुत खूबसूरती से बयां किया है, जिसे पढ़ते ही किताब को पढ़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार होने में काफी मदद मिलती है।

इस किताब को Authors pride publication ने पब्लिश किया है। 100 पृष्ठों वाली इस किताब की कीमत 125 रुपए रखी गई है। 

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