नए जमाने की नई विसंगतियों का आईना है वरिष्ठ पत्रकार पीयूष पांडे का ये व्यंग्य संग्रह

पिछले पांच-एक साल में एक नई बात हुई है। अपन लोग बात-बात पर आहत होने लगे हैं। आहत हैं इसलिए आक्रामक भी हो गए हैं

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 03 February, 2020
Last Modified:
Monday, 03 February, 2020
PIYUSH PANDEY

प्रभात रंजन, वरिष्ठ लेखक।।

पिछले पांच-एक साल में एक नई बात हुई है। अपन लोग बात-बात पर आहत होने लगे हैं। आहत हैं इसलिए आक्रामक भी हो गए हैं। इस चक्कर में दूसरों को आहत करना अपना शगल हो गया है। लेकिन जब आहत होने और आहत करने का अहम काम सामान्य लोग करने लगे हैं तो व्यंग्य लेखक क्या करेगा? जवाब इतना आसान नहीं है, फिर भी कुछ और करे या ना करे अपनी ऐसी-तैसी करने का हक तो उसे है। ये अलग बात है कि किसी समझदार और संवेदनशील आदमी (जो लेखक भी है) की दुर्गति कराते हुए लेखक, पाठक और समाज को वहां लाकर खड़ा कर देता है, जहां से वह अपना पतन साफ-साफ देख सके।

इस हिसाब से ‘कबीरा बैठा डिबेट में’ हमारी मौजूदा सामूहिक सोच का आख्यान है। लगे हाथ, इस सोच का व्याकरण समझने की कोशिश है। ये इत्तेफाक भर है कि पीयूष पांडे ने अपने समाज की मानसिक हालत समझने-समझाने के लिए टीवी की पृष्ठभूमि चुनी है। हालांकि ये सच है कि जो कुछ टीवी की बहस में घटित हो रहा है, कमोबेश वहीं सड़क, संसद और घर के ड्राइंग रूम में भी हो रहा है। हां, ये जरूर है कि पीयूष पांडे ने कई वर्षों तक टेलिविजन में काम करते हुए उसकी कार्य पद्धति और ज्ञान तंत्र को करीब से देखा है। इसलिए जब वो टीवी और उसकी बहस की असंगति को सामने लाते हैं तो सब कुछ प्रमाणिक लगता है।

किताब के पहले ही व्यंग्य ‘कबीरा बैठा डिबेट में’ एक जगह वह लिखते हैं, “‘समझदार’ पैनलिस्ट खोजना गूंगे की आवाज खोजने जैसा मुश्किल है। अव्वल तो न्यूज चैनल पर भद्द पिटवाने समझदार आते नहीं। यदा-कदा घेर घारकर उन्हें स्टूडियो लाया भी जाए तो दस मिनट बाद वो समझदार नहीं रहते। सर्वज्ञानी एंकर उन्हें मूर्ख साबित कर दूसरे समझदार के शिकार के लिए बढ़ जाता है।”

हालांकि, लेखक का उद्देश्य ये बताना नहीं है कि सच दिखाने का दावा करने वाले टीवी चैनलों में सचमुच कितना मानसिक दिवालियापन व्याप्त है। उसका मकसद तो अपनी या अपने जैसे हर संवेदनशील और समझदार आदमी की मौजूदा समाज में हैसियत बताना है। इसलिए वो हिंदी भाषा के सबसे बड़े व्यंग्यकार कबीर को टीवी की बहस में ठेल देते हैं। कबीर के साथ टीवी की बहस शुरू होती है, और इससे गुजरता हुआ पाठक लोटपोट हो जाता है।

टीवी के महाज्ञानी एंकर के सामने कबीर की एक नहीं चलती। अनुभव और ज्ञान का कवच काम नहीं आता। अगर कोई कसर बाकी है तो गेस्ट के तौर पर आए पंडित और मुल्ला पूरी कर देते हैं। डिबेट शो में बैठे दर्शक भी कबीर पर हमला करने के लिए तैयार हो जाते हैं। कबीर से आहत लोगों को बड़े संजोग से मौका मिला और सबने अपनी भड़ास निकाल ली। कबीर का जो होना था सो हुआ। साथ में दो बातें और हुईं। पहला ये कि शो जम गया। साबित हुआ कि मूर्खता का अपना अर्थशास्त्र है, इसलिए इस दौर में उसकी जबरदस्त मांग है। दूसरी ये कि मूर्खता के आगे समझदारी आज कमजोर और बेबस है।

कबीर की दुर्गति पर हंसते-हंसते ये सवाल जरूर दिमाग में आता है कि हम कहां से चले थे और कहां आ गए हैं। इस निष्कर्ष पर लाकर लेखक एक दुख के साथ पाठक को छोड़ देता है। हालांकि बात कबीर से आगे भी जाती है और हमारे नए किस्म के समाज की नई असंगतियों तक जाती है। ये समाज न सिर्फ आहत है, बल्कि इस पर एक अलग तरह की बदहवासी छाई हुई है। दिलचस्प बात ये है कि इस बदहवासी को न्यू नॉर्मल साबित करने की कोशिश हो रही है।

पीयूष पांडे की नजर स्कूल के पीटीएम में गए मां-बाप पर भी है और थोड़ी तोंद निकलने से परेशान हो रहे आदमी पर भी। सभी के पास अपनी महत्वकांक्षाएं हैं और अजब-गजब तर्क। लेखक बारीकी से उस समाज को देख रहा है, जिसके पास ज्ञान का असीम भंडार जमा हो गया है, लेकिन उसने बुनियादी सोच-समझ से तौबा कर लिया है। इसके बाद तुर्रा ये कि वो बात-बात पर आहत हो जाता है। फिर, मरने-मारने पर उतारू हो जाता है। यकीनन लेखक जिस समाज का चित्र खींचता है वहां एक दुर्घटना हो रही है, लेकिन पीयूष पांडे के व्यंग्य की खूबसूरती ये है कि वहां सब कुछ सामान्य तरीके से सामने आता है। किताब पढ़ते हुए पहले हंसी आती है फिर कोफ्त होती है। आखिर में एक टीस रह जाती है।

पीयूष के पास विषयों की कमी नहीं है और कहने का अपना अंदाज है। जंगलश्री के इंतजार में नाम से लिखे व्यंग्य में एक जगह वो लिखते हैं-‘शेर को यूं चुनाव-वुनाव की जरूरत नहीं है। शेर शेर होता है। वो जहां खड़ा हो जाए, वहीं से जंगलराज शुरू होता है। लेकिन, बीते दिनों डेमोक्रेसी के हल्ले में शेर ने जंगल में भी डेमोक्रेसी की स्थापना कर दी थी। शेर यूं तो झपट्टा मारकर सब छीन सकता है, लेकिन जंगल में अब डेमोक्रेसी थी तो शेर नहीं चाहता था कि ऐसा कोई भी काम किया जाए, जो डेमोक्रेसी के खिलाफ हो।’

मिलावट का स्वर्ण काल व्यंग्य की शुरुआत ही दिलचस्प सच्चाई के साथ होती है। वो लिखते हैं, ‘ये मिलावट का स्वर्णकाल है। जित देखिए तित मिलावट। लोग आधुनिकता और विकास का नारा लगाते हुए मिलावट के स्वर्णकाल को एंजॉय कर रहे हैं। मिलावट ही सत्य है। कभी सौभाग्य से शुद्ध माल के दर्शन हो जाएं तो लोग उलझन में पड़ जाते हैं कि फैशन के इस युग में 100 फीसदी टंच माल कहां से आ गया? हाल यह है कि दिल्ली के ज्यादातर लोगों को अगर पूरी तरह शुद्ध हवा मिल जाए तो उनकी तबीयत खराब हो सकती है।’ आदत ही नहीं है।

व्यंग्य लेखन की दुनिया में इन दिनों जो सन्नाटा पसरा है, उसे देखते हुए ‘कबीरा बैठा डिबेट में’ एक उपलब्धि की तरह है। पहले की अपनी दो किताबों ‘छिछोरेबाजी का रिजोल्यूशन’ और ‘धंधे मातरम्’ से जो प्रतिमान उन्होंने बनाया है, अब उससे आगे निकल गए हैं। इस मुश्किल समय में व्यंग्य लिखने के लिए भी पीयूष पांडे अलग से बधाई के पात्र हैं।

‘कबीरा बैठा डिबेट में’

लेखक: पीयूष पांडे

प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन

मूल्य: 250/

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आकाशवाणी व दूरदर्शन में तमाम बड़े पदों पर कार्यरत रहे अरुण कुमार वर्मा का निधन

बिहार की मीडिया के जाने-माने नाम वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार वर्मा का निधन हो गया है। वह पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 22 September, 2020
Last Modified:
Tuesday, 22 September, 2020
Arun Kumar Verma

बिहार की मीडिया के जाने-माने नाम वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार वर्मा का निधन हो गया है। ‘आकाशवाणी’ और ’दूरदर्शन न्यूज’ पटना में न्यूज एडिटर रह चुके अरुण कुमार वर्मा (68) पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। पटना के एक निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। पीआईबी (PIB) पटना के पूर्व जॉइंट डायरेक्टर/डायरेक्टर और बिहार स्टेट इंफॉर्मेशन कमिश्नर, पटना रह चुके अरुण कुमार वर्मा ने सोमवार को इलाज के दौरान अंतिम सांस ली।

‘भारतीय सूचना सेवा’ (इंडियन इंफॉर्मेशन सर्विस) में चयन के बाद अरुण कुमार वर्मा को ‘आकाशवाणी’ पटना में असिस्टेंट न्यूज एडिटर पद की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसके बाद वे यहां पर न्यूज एडिटर, डिप्टी डायरेक्टर (न्यूज), जॉइंट डायरेक्टर/डायरेक्टर (न्यूज) बने। इसके अलावा उन्होंने ‘दूरदर्शन’ पटना में भी न्यूज एडिटर और जॉइंट डायरेक्टर/डायरेक्टर (न्यूज) के पद पर भी कार्य किया था।  

‘इंडियन इंफॉर्मेशन सर्विस’ में चयन से पूर्व अरुण कुमार वर्मा ने बिहार सरकार के एक विभाग में जनसंपर्क अधिकारी के रूप में भी काम किया था। अरुण कुमार वर्मा के निधन पर तमाम पत्रकारों व गणमान्य लोगों ने शोक जताते हुए उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी है।

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मीडिया एजुकेशन के भविष्य की दिशा पर दिग्गजों ने कुछ यूं रखी अपनी राय

आईआईएमसी की ओर से 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: भारत में पत्रकारिता और जनसंचार शिक्षा की भविष्य की दिशा' विषय पर राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 22 September, 2020
Last Modified:
Tuesday, 22 September, 2020
Media Education

‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (आईआईएमसी) द्वारा सोमवार को 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: भारत में पत्रकारिता और जनसंचार शिक्षा की भविष्य की दिशा' विषय पर राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। वेबिनार में ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र’ के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा, ‘मीडिया शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए मीडिया एजुकेशन काउंसिल की आवश्यकता है। इसकी मदद से न सिर्फ पत्रकारिता एवं जनसंचार शिक्षा के पाठ्यक्रम में सुधार होगा, बल्कि मीडिया इंडस्ट्री की जरूरतों के अनुसार पत्रकार भी तैयार किये जा सकेंगे।'

डॉ. जोशी का यह भी कहना था कि नई शिक्षा नीति में कहीं भी मीडिया या पत्रकारिता शब्द का जिक्र नहीं है, लेकिन हमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति से प्रेरणा लेते हुए जनसंचार और पत्रकारिता शिक्षा के भविष्य के बारे में सोचना होगा। उन्होंने कहा, अख्तर अंसारी का एक शेर है, 'अब कहां हूं कहां नहीं हूं मैं, जिस जगह हूं वहां नहीं हूं मैं, कौन आवाज दे रहा है मुझे, कोई कह दो यहां नहीं हूं मैं।' यानी जो कहीं नहीं है, वो हर जगह है। जैसे शिक्षा नीति में मीडिया शब्द न होकर भी हर जगह है। उन्होंने कहा कि तकनीक ने मीडिया को भी बदल दिया है। आज स्कूलों में 3डी तकनीक से पढ़ाई हो रही है।

उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के पॉइंट 11 की चर्चा करते हुए कहा, ‘हमें होलिस्टिक एजुकेशन पर ध्यान देना होगा। इस संदर्भ में अगर हम भारतीय संस्कृति की बात करें, तो प्राचीन काल में भारतीय शिक्षा-क्रम का क्षेत्र बहुत व्यापक था। शिक्षा में कलाओं की शिक्षा भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती थीं और इनमें चौंसठ कलाएं महत्वपूर्ण हैं। अगर हम देखें तो ये कलाएं आज हमारे अत्याधुनिक समाज का हिस्सा हैं।’ 

नई शिक्षा नीति है एक क्रांतिकारी कदम: कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ शिक्षाविद् प्रो. गीता बामजेई ने कहा कि नई शिक्षा नीति भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक क्रांतिकारी कदम है। प्रो. बामजेई ने कहा कि अगर हम इस शिक्षा नीति को सही तरह से अपनाते हैं, तो ये नीति हमें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की तरफ ले जाएगी। उन्होंने कहा कि इस शिक्षा नीति से ज्ञान और कौशल के माध्यम से एक नए राष्ट्र का निर्माण होगा। मीडिया शिक्षा के परिदृश्य पर चर्चा करते हुए प्रो. बामजेई ने कहा, ‘अब समय आ गया है कि हमें जनसंचार शिक्षा में बदलाव करना चाहिए। हमें पत्रकारिता के नए पाठ्यक्रमों का निर्माण करना चाहिए, जो आज के समय के हिसाब से हों।‘ उन्होंने कहा कि हमें अपना विजन बनाना होगा कि पत्रकारिता के शिक्षण को हम किस दिशा में लेकर जाना चाहते हैं।

मीडिया शिक्षण में चल रही है स्पर्धा: नवभारत, इंदौर के पूर्व संपादक प्रो. कमल दीक्षित ने कहा कि मीडिया शिक्षण में एक स्पर्धा चल रही है। अब हमें यह तय करना होगा कि हमारा लक्ष्य स्पर्धा में शामिल होने का है, या फिर बेहतर पत्रकारिता शिक्षण का माहौल बनाने का है। प्रो. दीक्षित ने कहा कि आज के समय में पत्रकारिता बहुत बदल गई है, इसलिए पत्रकारिता शिक्षा में भी बदलाव आवश्यक है। आज लोग जैसे डॉक्टर से अपेक्षा करते हैं, वैसे पत्रकार से भी सही खबरों की अपेक्षा करते हैं। उन्होंने कहा कि हम ऐसे कोर्स बनाएं, जिनमें कंटेट के साथ साथ नई तकनीक का भी समावेश हो। प्रो. दीक्षित ने कहा कि हमें यह तय करना होगा कि पत्रकारिता का मकसद क्या है। क्या हमारी पत्रकारिता बाजार के लिए है, कॉरपोरेट के लिए है, सरकार के लिए है या फिर समाज के लिए है। अगर हमें सच्चा लोकतंत्र चाहिए तो पत्रकारिता को अपने लक्ष्यों के बारे में बहुत गहराई से सोचना होगा।

जो चीज 'चैलेंज' करती है, वहीं 'चेंज' करती है: हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय की प्रो. कंचन मलिक का कहना था कि अगर हम नई शिक्षा नीति का गहन अध्ययन करें, तो हम पाएंगे इसमें कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर जोर दिया गया है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति आत्मनिर्भर बनने पर जोर देती है। इसे हम इस तरह समझ सकते हैं, कि 'जो चीज आपको चैलेंज करती है, वही आपको चेंज करती है।' प्रो. मलिक ने कहा कि जनसंचार शिक्षा का प्रारूप बदलना हमारे लिए बड़ी चुनौती है, लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति से प्रेरणा लेकर हम यह कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया शिक्षा का काम सिर्फ छात्रों को ज्ञान देना नहीं है, बल्कि उन्हें इंडस्ट्री के हिसाब से तैयार भी करना है। मीडिया शिक्षकों को इस विषय पर ध्यान देना होगा।

न्यू मीडिया है अब न्यू नॉर्मल: न्यू मीडिया पर अपनी बात रखते हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की प्रोफेसर पी. शशिकला ने कहा कि न्यू मीडिया अब न्यू नॉर्मल है। हम सब जानते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण लाखों नौकरियां गई हैं। इसलिए हमें मीडिया शिक्षा के अलग अलग पहलुओं पर ध्यान देना होगा। हमें बाजार के हिसाब से प्रोफेशनल तैयार करने चाहिए।

क्षेत्रीय भाषाओं पर ध्यान देने की जरूरत: मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एहतेशाम अहमद खान ने कहा कि नई शिक्षा नीति में क्षेत्रीय भाषाओं पर ध्यान देने की बात कही गई है। जनसंचार शिक्षा के क्षेत्र में भी हमें इस पर ध्यान देना होगा। मीडिया शिक्षा के संस्थानों को तकनीक के हिसाब से खुद को तैयार करना होगा। उन्होंने कहा कि भारतीय जनसंचार संस्थान को इस विषय पर सभी मीडिया संस्थानों का मार्गदर्शन का काम करना चाहिए।

समाज के विकास के लिए संवाद आवश्यक: महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे ने कहा कि किसी भी समाज को आगे ले जाने और उसके विकास के लिए संवाद जरूरी है। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति गुणवत्ता की बात करती है। इसके साथ ही हमें शिक्षा के बाजारीकरण और महंगी होती शिक्षा पर लगाम लगानी होगी। संवाद और संचार का भारतीय मॉडल: भारतीय जन संचार संस्थान के महानिदेशक प्रोफेसर संजय द्विवेदी ने कहा कि यह देश में पहला मौका है, जब हम राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संदर्भ में जनसंचार शिक्षा के बारे में बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य एक बेहतर दुनिया बनाना है।

प्रो. द्विवेदी ने कहा कि मीडिया शिक्षा की यात्रा को वर्ष 2020 में 100 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन हमें अभी भी बहुत काम करना बाकी है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा के पास विदेशी मॉडल की तुलना में बेहतर संचार मॉडल हैं। इसलिए हमें संवाद और संचार के भारतीय मॉडल के बारे में बातचीत शुरू करनी चाहिए। इसके अलावा भारत की शास्त्रार्थ परंपरा पर भी हमें चर्चा करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा का व्यवसायीकरण चिंता का विषय है। इसके खिलाफ सभी लोगों को एकत्र होना चाहिए। हमें समाज के अंतिम आदमी के लिए शिक्षा के द्वार खोलने चाहिए। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि जनसंचार शिक्षा में हमें क्षेत्रीय भाषाओं पर काम करने की जरूरत है।

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राष्ट्र स्तरीय इस प्रतियोगिता के लिए रचनाएं आमंत्रित

इस प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए 18 अक्टूबर 2020 तक अपनी प्रविष्टि भेजी जा सकती हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 21 September, 2020
Last Modified:
Monday, 21 September, 2020
Writing

बेटी बचाओ अभियान के तहत महिला बाल विकास एवं जनकल्याण समिति ‘सरोकार’ की ओर से ‘बिटिया के जन्मदिन के बधाई गीत लेखन’ राष्ट्र स्तरीय प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है। प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए प्रविष्टि भेजने की अंतिम तारीख 18 अक्टूबर 2020 रखी गई है।

इस प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए प्रतिभागियों को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।

1: प्रतिभागी अपनी मौलिक रचना ही भेजें। रचना के साथ मौलिकता का प्रमाण लिखित में देना आवश्यक है।

2: रचनाएं हिंदी अथवा भारत की किसी भी लोकभाषा में हो सकती हैं।

3: एक या एक से अधिक रचनाएं भेजी जा सकती हैं।

4: प्रतियोगी द्वारा भेजी गई रचनाएं उनके नाम के साथ सरोकार के अभियान में उपयोग की जा सकेंगी।

5: अपनी रचना ई-मेल- sarokarzindagi@gmail.com अथवा वॉट्सऐप नंबर- 9926311225 पर लिखित में भेजी जा सकती हैं।

6: रचना के साथ अपनी एक रंगीन तस्वीर और परिचय में अपना नाम, उम्र, जेंडर, व्यवसाय, मोबाइल नंबर, ई-मेल तथा रचना की भाषा का उल्लेख अनिवार्य है। ऐसा न करने पर रचना अस्वीकृत कर दी जाएगी।

7: चयनित सर्वश्रेष्ठ रचनाकारों को सरोकार की ओर से एक प्रमाण पत्र और साथ उन्हें सरोकार के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रचना की प्रस्तुति करने का अवसर दिया जाएगा।

इस बारे में ज्यादा जानकारी के लिए मोबाइल नंबर-9926311225 अथवा sarokarzindagi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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कोरोना ने निगल ली प्रसार भारती के पूर्व ADG अभय कुमार पाधी की जिंदगी

कोरोनावायरस का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। तमाम लोग इसके कारण अपनी जान गंवा चुके हैं, वहीं कोरोना के संक्रमण से पीड़ित कई लोगों का विभिन्न अस्पतालों में इलाज चल रहा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 21 September, 2020
Last Modified:
Monday, 21 September, 2020
Abhay Padhi

कोरोनावायरस (कोविड-19) का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। तमाम लोग इसके कारण अपनी जान गंवा चुके हैं, वहीं कोरोना के संक्रमण से पीड़ित कई लोगों का विभिन्न अस्पतालों में इलाज चल रहा है। ओडिशा से खबर है कि ‘प्रसार भारती’ (Prasar Bharati) के पूर्व एडीजी (Additional Director General) अभय कुमार पाधी (Abhay Kumar Padhi) का कोविड-19 की चपेट में आकर सोमवार को निधन हो गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, करीब 71 वर्षीय पाधी ने कुछ दिन पूर्व कोविड-19 का टेस्ट कराया था, जो पॉजिटिव आया था। इसके बाद उन्हें इलाज के लिए ओडिशा के बारगढ़ कस्बे में स्थित कोविड अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां सोमवार को उन्होंने आखिरी सांस ली।

रिपोर्टिस के अनुसार, पाधी ने प्रसार भारती को वर्ष 1976 में जॉइन किया था। उन्होंने ‘ऑल इंडिया रेडियो’ (AIR) और ‘दूरदर्शन’ (DD) के साथ भी काम किया था। उन्होंने 1970 में गंगाधर मेहर कॉलेज से स्नातक और संबलपुर विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर (पीजी) की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रसारण एजेंसी में अपना करियर शुरू किया था। पूर्व में वह ‘आईआईएमसी’ (IIMC) ढेंकनाल में गेस्ट फैकल्टी भी रहे थे।  

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इस मंच पर जुटेंगे मीडिया जगत के दिग्गज, तमाम पहलुओं पर होगी चर्चा

‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC) 21 सितंबर को 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: भारत में पत्रकारिता और जनसंचार शिक्षा की भविष्य की दिशा' विषय पर राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन करने जा रहा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 19 September, 2020
Last Modified:
Saturday, 19 September, 2020
IIMC

प्रमुख मीडिया शिक्षण संस्थान ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC) 21 सितंबर को 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: भारत में पत्रकारिता और जनसंचार शिक्षा की भविष्य की दिशा' विषय पर राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन करने जा रहा है। वेबिनार का आयोजन गूगल मीट पर शाम चार बजे से 5:45 बजे तक किया जाएगा।

इस वेबिनार में मीडिया शिक्षा एवं पत्रकारिता क्षेत्र के बुद्धिजीवी भाग लेंगे। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी कार्यक्रम के मुख्य अतिथि होंगे तथा वरिष्ठ शिक्षाविद् प्रो. गीता बामजेई कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगी। कार्यक्रम की शुरुआत ‘आईआईएमसी’ के महानिदेशक प्रोफेसर संजय द्विवेदी के वक्तव्य से होगी।

प्रोफेसर द्विवेदी ने बताया कि इस वेबिनार में नवभारत, इंदौर के पूर्व संपादक प्रोफेसर कमल दीक्षित, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय की प्रोफेसर कंचन मलिक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्विद्यालय के प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की प्रोफेसर पी. शशिकला एवं मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एहतेशाम अहमद खान भी अपने विचार रखेंगे।   

संस्थान की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार, वेबिनार का संचालन ‘आईआईएमसी’ के भारतीय भाषायी पत्रकारिता के विभागाध्यक्ष प्रो. आनंद प्रधान करेंगे। रेडियो एवं टेलिविजन विभाग की प्रो.शाश्वती गोस्वामी धन्यवाद ज्ञापन करेंगी।

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कोरोना ने निगल ली वरिष्ठ पत्रकार डॉ.अमी आधार की जिंदगी

कोरोनावायरस (कोविड-19) की चपेट में आकर आगरा के वरिष्ठ पत्रकार डॉ.अमी आधार ‘निडर’ का निधन हो गया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 19 September, 2020
Last Modified:
Saturday, 19 September, 2020
Ami Adhar

आगरा के वरिष्ठ पत्रकार डॉ.अमी आधार ‘निडर’ का निधन हो गया है। कोरोनावायरस (कोविड-19) पॉजिटिव होने के कारण करीब 15 दिन पूर्व उन्हें गुरुग्राम के मेदान्ता हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, जहां शनिवार को उन्होंने अंतिम सांस ली।

करीब 50 वर्षीय अमी आधार स्वराज्य टाइम्स, अमर उजाला व बीपीएन टाइम्स समेत तमाम अखबारों में कार्यरत रहे थे। वे मथुरा में दैनिक जागरण के प्रभारी भी रहे थे। उनके परिवार में पत्नी, एक बेटा व एक बेटी है।

अमी आधार के निधन पर तमाम पत्रकारों ने शोक जताते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी है और भगवान से पीड़ित परिवार को यह दुख सहन करने की शक्ति देने की प्रार्थना की है। गौरतलब है कि कोरोना की चपेट में आकर कुछ माह पूर्व ही दैनिक जागरण, आगरा के वरिष्ठ पत्रकार पंकज कुलश्रेष्ठ का निधन हो गया था।  

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इस वरिष्ठ पत्रकार पर लगा देश व सेना की छवि को खराब करने का आरोप, FIR दर्ज

हाफिज ने पत्रकार पर आरोप लगाया है कि उसने देश और सेना को बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 17 September, 2020
Last Modified:
Thursday, 17 September, 2020
Asad Toor

पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार असद तूर के खिलाफ एक मामला दर्ज किया गया है। उन पर आरोप है कि उन्होंने सोशल मीडिया पर कथित तौर पर पाकिस्तान की और यहां सेना की छवि खराब की और बदनाम करने की कोशिश की। रावलपिंडी में हाफिज एहतेशाम अहमद की शिकायत पर उनके खिलाफ यह मामला दर्ज किया गया है।

हाफिज ने असद तूर पर आरोप लगाया है कि तूर ने देश और सेना को बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया है। असद तूर ने अपने ट्विटर अकाउंट पर एफआईआर की कॉपी को साझा करते हुए लिखा कि शिकायतकर्ता ने दावा किया है कि वह सोशल मीडिया का नियमित यूजर है और उसने पाया कि तूर कुछ दिनों से हाई लेवल सरकारी संस्थानों के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, इनमें पाकिस्तानी सेना भी है। इस तरह वे सेना को बदनाम कर रहे हैं जो कानूनन अपराध है।’

पत्रकार असद पर पाकिस्तान दंड संहिता की धारा 499 (मानहानि), 500 (मानहानि के लिए सार्वजनिक बयानबाजी) और धारा 11 (अभद्र भाषा), धारा 20 (किसी व्यक्ति की गरिमा के खिलाफ अपराध) और धारा 37 (गैरकानूनी ऑनलाइन सामग्री) के तहत मामला दर्ज कि गया है। इसके अलावा उनके खिलाफ पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक अपराध अधिनियम की धाराएं (Peca) 2016 भी लगाई गई हैं।

इस बीच पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (HRCP) ने तूर के खिलाफ मामला दर्ज करने की निंदा की है। आयोग ने ट्विटर पर कहा कि पत्रकारों के खिलाफ हो रही इस तरह की कार्रवाई में खतरनाक वृद्धि इस बात की पुष्टि करती है कि सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करने पर तुली हुई है। आयोग की मांग है कि नागरिकों के अधिकारों का सम्मान किया जाए और सरकार और राज्य दोनों ही इसमें सुधार लाएं।

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‘न्यूज18 इंडिया’ के वरिष्ठ पत्रकार देवेश त्यागी पर हमला, दो गिरफ्तार

‘न्यूज18 इंडिया’ के वरिष्ठ पत्रकार देवेश त्यागी पर सोमवार की रात कुछ दबंगों ने हमला कर दिया, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आयी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 16 September, 2020
Last Modified:
Wednesday, 16 September, 2020
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‘न्यूज18 इंडिया’ के वरिष्ठ पत्रकार देवेश त्यागी पर सोमवार की रात कुछ दबंगों ने हमला कर दिया, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आयी, जिसके बाद उन्हें इलाज के लिए जिला अस्पताल भेजा गया। मामला सहारनपुर के थाना सदर क्षेत्र का है, जहां उन्होंने दबंगो द्वारा कार आगे लगाने और अभद्रता करने का विरोध किया था।

हमले की रिपोर्ट पूर्व ब्लॉक प्रमुख घनश्याम चौधरी, उसके मित्र रवींद्र ठाकुर सहित अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज कराई गई। फिलहाल पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए पूर्व ब्लॉक प्रमुख सहित दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया है।

अपनी शिकायत में पत्रकार देवेश त्यागी ने बताया कि यह उनके साथ यह हमला तब हुआ, जब सोमवार की रात करीब आठ बजे कपिल विहार स्थित अपने घर से कार द्वारा खेलने के लिए स्टेडियम की ओर जा रहे थे। इसी दौरान कोर्ट रोड पुल पर सफेद रंग की कार खलासी लाइन की ओर से पुल पर चढ़ रही थी। उस कार के चालक अनिकेत ने अपनी कार उनकी कार के आगे लगा दी और अभद्रता करने लगा।

आरोप है कि विरोध करने पर कार में बैठे दो युवकों ने तमंचा दिखाया और आगे चलकर देख लेने की धमकी दी। जैसे ही वह जीपीओ रोड पर डाकघर के सामने पहुंचे तो कार चालक ने उनके आगे कार लगा दी। तभी एक स्कॉर्पियो भी वहां आ गई।

आरोप है कि रविंद्र ठाकुर, अनिकेत, पूर्व ब्लॉक प्रमुख घनश्याम चौधरी और आठ दस अन्य लोगों ने लाठी डंडे से उन पर हमला कर दिया, जिसके बाद में वहां जुटे कुछ लोगों ने घनश्याम और रवींद्र को पकड़ लिया। एसपी सिटी विनीत भटनागर भी मौके पर पहुंच गए। बाद में थाना सदर पुलिस दोनों आरोपियों को पकड़कर थाने ले गई। देवेश त्यागी की तहरीर पर पूर्व ब्लॉक प्रमुख घनश्याम, रवींद्र ठाकुर, अनिकेत सहित दस अज्ञात लोगों के खिलाफ जानलेवा हमला और धमकी देने के आरोप में रिपोर्ट दर्ज की है। एसपी सिटी ने बताया कि पुलिस मामले की जांच कर रही है।

  

 

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महिला पत्रकार से झपटमारी दो बदमाशों को कुछ यूं पड़ गई भारी

ऑटो से जा रही दूरदर्शन की महिला पत्रकार का मोबाइल झपटना बाइक सवार दो बदमाशों को काफी भारी पड़ गया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 15 September, 2020
Last Modified:
Tuesday, 15 September, 2020
Female Journalist

दिल्ली में ऑटो से जा रही दूरदर्शन की महिला पत्रकार का मोबाइल झपटना बाइक सवार दो बदमाशों को काफी भारी पड़ गया। दरअसल, महिला पत्रकार ने दिलेरी दिखाते हुए न सिर्फ उन बदमाशों का ऑटो से पीछा किया, बल्कि ऑटो ड्राइवर की मदद से उन्हें दबोचकर पुलिस के हवाले भी कर दिया। घटना के दौरान महिला पत्रकार ऑटो से मालवीय नगर जा रही थीं। महिला पत्रकार की इस दिलेरी की पुलिस ने प्रशंसा की है और दो हजार रुपये का नकद पुरस्कार दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पकड़े गए आरोपितों की पहचान तुगलकाबाद (दिल्ली) निवासी संदीप और अमन के रूप में हुई है। पुलिस ने उनके पास से लूटा गया मोबाइल और घटना में इस्तेमाल बाइक बरामद की है। पुलिस पूछताछ में दोनों ने बताया कि वे नशे की लत को पूरा करने के लिए इस तरह की वारदातों को अंजाम देते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स में पुलिस अधिकारी के हवाले से बताया गया है कि 12 सितंबर की दोपहर करीब एक बजे एक महिला ने दो लुटेरों को पकड़ने की सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने दोनों लुटेरों को हिरासत में ले लिया। महिला ने बताया कि वह दूरदर्शन में पत्रकार हैं। वह ऑटो से कहीं पर जा रही थीं। इस दौरान बाइक से आए दो झपटमारों ने उनका मोबाइल झपट लिया।

महिला ने दोनों आरोपितों का ऑटो से ही पीछा शुरू कर दिया। जगदंबा रोड पर अग्रवाल स्वीट के पास आरोपितों की बाइक गिर गई। इस पर महिला पत्रकार ने ऑटो ड्राइवर की मदद से दोनों को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया। आरोपितों के खिलाफ गोविंदपुरी थाने में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।

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वरिष्ठ पत्रकारों ने भारतीय भाषाओं में अंतर संवाद की जरूरत पर कुछ यूं दिया जोर

देश के प्रतिष्ठित मीडिया शिक्षण संस्थान ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC) में सोमवार को हिंदी पखवाड़े का शुभारंभ किया गया

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 14 September, 2020
Last Modified:
Monday, 14 September, 2020
IIMC

देश के प्रतिष्ठित मीडिया शिक्षण संस्थान ‘भारतीय जनसंचार संस्‍थान’ (IIMC) में सोमवार को हिंदी पखवाड़े का शुभारंभ किया गया। इस मौके पर ‘भारतीय भाषाओं में अंतर-संवाद’ विषय पर आयोजित वेबिनार में वरिष्‍ठ पत्रकार एवं माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय, भोपाल के पूर्व कुलपति अच्‍युतानंद मिश्र ने कहा, ‘भाषा का संबंध इतिहास, संस्‍कृति और परंपराओं से है। भारतीय भाषाओं में अंतर-संवाद की परंपरा काफी पुरानी है और ऐसा सैकड़ों वर्षों से होता आ रहा है, यह उस दौर में भी हो रहा था, जब वर्तमान समय में प्रचलित भाषाएं अपने बेहद मूल रूप में थीं। श्रीमद्भगवत गीता में समाहित श्रीकृष्‍ण का संदेश दुनिया के कोने-कोने में केवल अनेक भाषाओं में हुए उसके अनुवाद की बदौलत ही पहुंचा। उन दिनों अंतर-संवाद की भाषा संस्‍कृत थी, तो अब यह जिम्‍मेदारी हिंदी की है।’

मिश्र का यह भी कहना था, ‘भारतीय भाषाओं के बीच अंतर-संवाद में रुकावट अंग्रेजी के कारण आई और इसकी वजह हम भारतीय ही थे, जिन्‍होंने हिंदी या अन्‍य भारतीय भाषाओं के स्‍थान पर अंग्रेजी को अंतर-संवाद का माध्‍यम बना लिया। उन्‍होंने कहा कि हिंदी के विद्वानों, पत्रकारों और संस्‍थाओं को इस दिशा में कार्य करना चाहिए था, लेकिन उन्‍होंने यह जिम्‍मेदारी नहीं निभाई। जब डॉ. राम मनोहर लोहिया ने ‘अंग्रेजी हटाओ’ अभियान शुरू किया, तो उसका आशय ‘हिंदी लाओ’ कतई नहीं था, लेकिन दुर्भाग्‍यवश ऐसा प्रचारित किया गया। इससे राज्‍यों के मन में भ्रांति फैली। इसका निराकरण हिंदी के विद्वानों, पत्रकारों और संस्‍थाओं को करना चाहिए था। अन्‍य भारतीय भाषाओं के हिंदी के करीब आने का कारण मनोरंजन, पर्यटन और प्रकाशन क्षेत्र है। हिंदी की लोकप्रियता का श्रेय हिंदी के बुद्धिजीवियों को नहीं, अपितु इन क्षेत्रों को दिया जाना चाहिए।’

उन्‍होंने कहा कि वर्तमान सरकार द्वारा घोषित राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति को देखते हुए उससे कुछ अपेक्षाएं हैं। इसमें मातृभाषा में शिक्षा और भारतीय भाषाओं के प्रोत्‍साहन की बात हो रही है, अनुवाद की बात हो रही है। ऐसे में हिंदी से जुड़ी संस्‍थाएं यदि पहल करें तो हिंदी परस्‍पर आदान-प्रदान का व्‍यापक माध्‍यम बन सकती है।

जहां भाषा खत्‍म होती है, वहां संस्‍कृति भी दम तोड़ देती है: अद्वैता काला : मुख्‍य वक्‍ता, पटकथा लेखक एवं स्‍तंभकार अद्वैता काला ने कहा कि जहां भाषा खत्‍म होती है, वहां संस्‍कृति भी उसके साथ दम तोड़ देती है। हमें सभी भाषाओं को महत्‍व देना चाहिए, उन्‍हें समझना चाहिए और उनके संपर्क का माध्‍यम हिंदी है, इसे स्‍वीकार करना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि वैसे भाषा बहुत निजी मामला है। इसके माध्‍यम से हम केवल दुनिया से ही नहीं, बल्कि स्‍वयं से भी संवाद करते हैं।

हिंदी की स्थिति की चर्चा करते हुए उन्‍होंने कहा कि फिल्‍मों की पटकथा और संवाद रोमन लिपि में लिखे जाते हैं, क्‍योंकि लोग हिंदी की लिपि नहीं पढ़ पाते, जबकि हिंदी मीडिया की पहुंच बहुत व्‍यापक है। सुश्री काला ने बताया कि उनकी खुद की हिंदी भी हिंदी में लेखन से जुड़ने के बाद ही बेहतर हुई और उन्‍हें लगता है कि शिक्षा प्रणाली यदि सही रही होती तो ऐसा नहीं होता। उनका सुझाव है कि बच्‍चों को अंग्रेजी और हिंदी के साथ-साथ कोई न कोई क्षेत्रीय भाषा भी पढ़ाई जानी चाहिए।

भाषाओं में अंतर-संवाद कोई नई बात नहीं: श्री मुकेश शाह: गुजराती भाषा के ‘साप्‍ताहिक साधना’ के प्रबंध संपादक मुकेश शाह ने कहा कि शब्‍दों को हमने ब्रह्म माना है और भाषाओं में अंतर-संवाद कोई नई बात नहीं है। उन्‍होंने महात्‍मा गांधी का उदाहरण देते हुए कहा कि बापू ने अंग्रेजी में ‘हरिजन’ प्रकाशित किया, लेकिन उसे जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्‍होंने उसे गुजराती और हिंदी में भी स्‍थापित किया। उन्‍होंने गुजराती में 70 पुस्‍तकों की रचना करने वाले फादर वॉलेस और गुजरात में विद्यालय, महाविद्यालय और विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना करने वाले सयाजीराव गायकवाड़ के योगदान का भी उल्‍लेख किया। उन्‍होंने कहा कि उत्‍तर-दक्षिण भारत की भाषाओं में व्‍यापक अंतर होने के बावजूद उनमें अंतर-संवाद और अनुवाद होता आया है। उन्‍होंने कहा कि भाषाओं का राष्‍ट्रीय चरित्र के निर्माण में योगदान होता है।

परस्‍पर आदान-प्रदान से ही भाषाएं समृद्ध होती हैं: स्‍नेहशीष सुर: कोलकाता प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष स्‍नेहशीष सुर ने कहा कि हिंदी दिवस पर भारतीय भाषाओं के बीच अंतर-संवाद विषय पर विमर्श का आयोजन करके आईआईएमसी ने दर्शाया कि हिंदी दिवस केवल हिंदी के लिए नहीं है। सभी भाषाओं के बीच संवाद, संपर्क, उनके कल्‍याण तथा विकास को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता के पास बहुत विशाल विरासत और व्‍यावसायिक कौशल है लेकिन यह कौशल अंतरराष्‍ट्रीय मानकों के अनुरूप होना चाहिए। समस्‍त भाषाएं आगे बढ़ें और उनकी पत्रकारिता आगे बढ़े, यह प्रयास होना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि हिंदी भारतीय भाषाओं के बीच संपर्क का माध्‍यम है, इसमें कोई दो राय नहीं है। बीतते समय के साथ हिंदी के साथ अन्‍य भाषाओं के लोगों की भी सहजता बढ़ी है और परस्‍पर आदान-प्रदान से दोनों ही भाषाएं समृद्ध होती हैं।

भाषा ही मेल-मिलाप कराती है: अमीर अली खा: हैदराबाद से प्रकाशित होने वाले उर्दू दैनिक ‘डेली सियासत’ के संपादक अमीर अली खान ने कहा कि पाकिस्‍तान ने जब उर्दू को अपनी राजभाषा बनाया, तो यहां हिंदी और उर्दू में अंतर आ गया। खान ने कहा कि भारत छोटे यूरोप की तरह है, इसे एक ही दिशा में नहीं ले जा सकते। यहां विविध भाषाएं हैं और भाषा ही मेल-मिलाप कराती हैं। उन्‍होंने कहा कि हिंदी की किताबों को उर्दू में अनुवाद कराया जाना चाहिए, लेकिन अन्‍य भाषाओं की पुस्‍तकें भी हिंदी में अनुवाद होनी चाहिए। इससे अंतर-संवाद को बढ़ावा मिलेगा। उन्‍होंने कहा कि अंतर संवाद को बढ़ावा देने में योगदान प्रदान कर हम खुद को गौरवान्वित समझेंगे।

समस्‍त भाषाएं, राष्‍ट्रीय भाषाएं हैं: प्रो. संजय द्विवेदी: विमर्श के अध्‍यक्ष एवं आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि सरकार की ओर से घोषित नई राष्‍ट्रीय नीति में सभी भारतीय भाषाओं को महत्‍व दिया गया है। हिंदी अकेली राष्‍ट्र भाषा नहीं है, क्‍योंकि समस्‍त भाषाएं इसी राष्‍ट्र के लोगों के द्वारा बोली जाती हैं, लिहाजा वे सभी राष्‍ट्रीय भाषाएं ही हैं। हर जगह संपर्क का माध्‍यम अंग्रेजी बन जाने से नुकसान पहुंचा है, क्‍योंकि बहुत कम लोग हैं, जो अंग्रेजी बोलते हैं। प्रो. द्विवेदी ने ऐसे अनेक विद्वानों का उल्‍लेख किया, जिन्‍होंने  हिंदी और भाषायी पत्रकारिता में अभूतपूर्व योगदान दिया है। नई राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति की विशेषताएं गिनाते हुए उन्‍होंने कहा कि भारतीय भाषाओं में अंतर संवाद से वे एक-दूसरे के गुण अपनाएंगी और अंतत: सर्वव्‍यापी, सर्वग्राह्य बनेंगी। इससे भाषायी विद्वेष की भावना का अंत होगा, परंपराओं का समन्‍वय होगा और सभी को सामाजिक न्‍याय तथा आर्थिक न्‍याय प्राप्‍त होगा। उन्‍होंने कहा कि भाषायी विविधता और बहुभाषी समाज आज की आवश्‍यकता है और समस्‍त भाषाओं के लोगों ने ही विश्‍व में अपनी उपलब्धियों के पदचिह्न छोड़े हैं। उन्‍होंने कहा कि भारत सदैव वसुधैव कुटुम्‍बकम की बात करता आया है और सभी भाषाओं को साथ लेकर चलने के पीछे भी यही भावना है।

भारतीय भाषाओं के बीच संवाद को व्‍यापक रूप से प्रोत्‍साहन दिया जाना चाहिए : प्रो. आनंद प्रधान : आईआईएमसी के भारतीय भाषायी पत्रकारिता विभाग के प्रो. आनंद प्रधान ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि भारतीय भाषाओं के बीच संवाद को व्‍यापक रूप से प्रोत्‍साहन दिया जाना चाहिए। हिंदी दिवस के अवसर पर इस विषय पर विमर्श का आयोजन इस दिशा में काफी महत्‍वपूर्ण है। उन्‍होंने कहा कि भारतीय भाषाओं में बीच संवाद सैंकड़ों वर्षों से जारी है और इनका विकास भी साथ-साथ ही हुआ है। मसलन, बांग्‍ला और मैथिली में इतनी समानता है कि उनमें अंतर करना मुश्किल है, इसी तरह अवधी और ब्रज भाष तथा हिंदी और उर्दू में भी ऐसा ही है। इस संबंध में उन्‍होंने एक शोध का हवाला दिया। प्रो. प्रधान ने बताया कि हिंदी और उर्दू दैनिकों की भाषा पर हुए एक शोध में देखा गया कि उनमें केवल 23 प्रतिशत शब्‍द ही अलग थे। उन्‍होंने कहा कि वैसे ही हिंदी पत्रकारिता के विकास में मराठी, बांग्‍ला और दक्षिण भारतीय भाषाओं के योगदान की अनदेखी नहीं की जा सकती।

इस कार्यक्रम में आईआईएमसी मुख्‍यालय, क्षेत्रीय केंद्रों के संकाय सदस्‍य, कर्मचारी अधिकारी, भारतीय सूचना सेवा के प्रशिक्षु और पूर्व छात्र शामिल हुए।

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