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मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरया का 'चुनावी' आकलन

लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान में अब कुछ दिन ही शेष रह गए हैं। भाजपा पुन: सत्ता में वापसी करेगी या फिर

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

नीरज नैय्यर।।

लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान में अब कुछ दिन ही शेष रह गए हैं। भाजपा पुन: सत्ता में वापसी करेगी या फिर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कोई कमाल दिखा पाएंगे, इसका विश्लेषण भी शुरू हो गया है। समाचार4मीडिया ने भी राजनीतिक नब्ज और आम जनता के मिजाज को भलीभांति पहचानने वाले पत्रकारों से यह जानने का प्रयास किया है कि उनकी नज़र में इस बार क्या होने जा रहा है। इसकी दूसरी कड़ी में पेश है मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरया का नजरिया।  

आज के वक़्त में मीडिया दो भागों में विभाजित है। सीधे शब्दों में कहें तो प्रो मोदी और एंटी मोदी, तो एक पत्रकार के रूप में मौजूदा परिवेश में काम करना कितना चुनौतीपूर्ण हुआ है?

मेरी नज़र में बिल्कुल भी चुनौतीपूर्ण नहीं है। दरअसल, लोगों से झुकने के लिए कहा जाता है, तो वह पूरी तरह नतमस्तक हो जाते हैं। दुनिया की ऐसी कोई ताकत नहीं है, जो आपको झुका दे। आप भले ही किसी भी समाचारपत्र में हों, अगर आप अपनी इच्छा के विरुद्ध जाना नहीं चाहते, तो आपको कोई बहुत ज्यादा बाध्य नहीं कर सकता। यह हमारी पसंद होती है कि हम क्या करना चाहते हैं और उसे हम भय या प्रलोभन का नाम दे देते हैं। वैसे, जब तूफान आ रहा हो तो थोड़ा झुक जाना भी एक कला है, लेकिन पूरी तरह से नतमस्तक होना अच्छी आदत नहीं। आज स्थिति यह है कि हल्के से संकेत मात्र से ही पत्रकार साष्टांग हो जाते हैं।

आप पत्रकार हैं, राजनीति पर गहरी पकड़ रखते हैं, आपकी नज़र में इस बार का लोकसभा चुनाव कितना रोचक होगा?

आपातकाल के बाद यह दूसरा चुनाव है, जो कई मायनों में रोचक होगा। यह चुनाव तीव्र राजनीतिक ध्रुवीकरण पर आधारित है। दरअसल, एक तरफ ऐसे लोग हैं जो राष्ट्रवाद का नारा दे रहे हैं और दूसरी तरफ वो लोग हैं, जो इसे देश की आज़ादी के तौर पर देख रहे हैं। उनका कहना है कि प्रजातंत्र को बचाए रखने के लिए मोदी को सत्ता से बेदखल करना ज़रूरी है।

आपकी नज़र में ऐसे कौन से मुद्दे हैं, जो मतदाता को प्रभावित कर सकते हैं?

मतदाता के लिए वैसे तो रोटी-कपड़ा और मकान ही मुख्य मुद्दे होते हैं, लेकिन राष्ट्रवाद की जो लहर है, वो यदि और व्यापाक होती चली गई तो दूसरे मुद्दे पीछे छूट जायेंगे। राष्ट्रवाद एक ऐसा मुद्दा है, जिसके समक्ष अन्य सभी बातें गौण लगने लगती हैं।

विधानसभा चुनावों की तरह कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के लिए भी किसानों पर दांव खेला है, क्या इसका फायदा उसे मिलेगा?

यह कहना कि कांग्रेस ने कर्जमाफ़ी की वजह से तीन राज्यों में वापसी की, ये अर्धसत्य है। खासतौर पर यदि मैं मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ की बात करूं तो यहाँ करीब 15 सालों तक भाजपा की सत्ता रही और लोग परिवर्तन की आकांक्षा के साथ जी रहे थे। जैसे कोई कोट भले ही कितना भी अच्छा क्यों न हो, आप उसे कितना भी पसंद क्यों न करते हों, 15-20 साल उसे नहीं पहन सकते। ऐसा ही राजनीति में भी है। हर चीज़ की एक लाइफ साइकिल होती है। हां, इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि कर्जमाफ़ी जैसी घोषणा ने परिवर्तन की आकांक्षा को आगे बढ़ाया। जहां तक बात लोकसभा चुनाव की है तो यदि कांग्रेस के कार्यकर्ता घोषणापत्र के वादों को आम जनता तक सही मायनों में पहुंचा पाए, तो कुछ संभव हो सकता है।

मध्य प्रदेश में लोकसभा की 29 सीटें हैं, आप कितनी सीटों पर भाजपा-कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर देखते हैं?

देखिये, सबसे दिलचस्प मुकाबला तो भोपाल में होगा। दिग्विजय सिंह केवल कांग्रेस के ही प्रत्याशी नहीं हैं, भाजपा में भी उन्हें पसंद करने वालों की अच्छी खासी तादाद है। एक ज़माने में भाजपा के एक धड़े को भाजपा-डी कहा जाता था, यहां डी का अर्थ है दिग्विजय। अब देखना यह होगा कि ऐसे लोग जो दिग्विजय के पॉलिटिकल पे-रोल पर थे, यानी उनकी रजनीतिक सत्ता का लाभ ले रहे थे, वे भाजपा के वफादार होते हैं या व्यक्तिगत रिश्तों के लिए दिग्विजय सिंह के। इसके साथ ही ज्योतिरादित्य सिंधिया यदि गुना या ग्वालियर छोड़कर कहीं और से चुनाव लड़ते हैं, तो वो भी रोचक मुकाबला होगा। क्योंकि उस स्थिति में वह खुद को एक ऐसे नेता के तौर पर स्थापित करने का प्रयास करेंगे जो अपने गढ़ के बाहर निकलकर दबदबा कायम करना चाहता है। जैसा कि दिग्विजय सिंह के साथ हो रहा है।

जैसी कि चर्चा है कि भोपाल में मुकाबला शिवराज बनाम दिग्विजय हो सकता है, तो किसका पलड़ा भारी रहने की संभावना है?

बेशक दिग्विजय सिंह का। दिग्विजय बेहद कड़ी टक्कर देंगे। इसमें कोई दोराय नहीं कि शिवराज सिंह जनप्रिय नेता हैं, लेकिन दिग्विजय के आम जनता के साथ-साथ अपने और विपक्षी लोगों के साथ भी अच्छे रिश्ते हैं। जिसका फायदा उन्हें चुनाव में मिल सकता है।

मौजूदा माहौल को देखते हुए क्या भाजपा पिछली बार का प्रदर्शन दोहरा पाएगी?

जहां तक मुझे लगता है, भाजपा को इस बार कुछ सीटों का नुकसान उठाना पड़ेगा। 15 से 20 सीटों पर उसे कड़ी टक्कर मिलेगी।


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