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भास्करहिंदी डॉट कॉम के संपादक धर्मेंद्र पैगवार का 'चुनावी' इंटरव्यू

लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। भाजपा पुन: सत्ता में वापसी करेगी या फिर राहुल गांधी...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

नीरज नैय्यर।।

लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। भाजपा पुन: सत्ता में वापसी करेगी या फिर राहुल गांधी इस बार कोई कमाल दिखा पाएंगे, इसका विश्लेषण भी शुरू हो गया है। समाचार4मीडिया ने भी राजनीतिक नब्ज और आम जनता के मिजाज को भलीभांति पहचानने वाले पत्रकारों से यह जानने का प्रयास किया है कि उनकी नज़र में इस बार क्या होने जा रहा है। इसकी पहली कड़ी में पेश है भास्करहिंदी डॉटकॉम के संपादक धर्मेंद्र पैगवार का नजरिया-

आज के वक़्त में मीडिया दो भागों में विभाजित है। सीधे शब्दों में कहें तो प्रो मोदी और एंटी मोदी, तो एक पत्रकार के रूप में मौजूदा परिवेश में काम करना कितना चुनौतीपूर्ण हुआ है?

देखिये, पूरा का पूरा मीडिया ऐसा नहीं है। कुछ चुनिंदा मीडिया हाउस ज़रूर इस दिशा में काम कर रहे हैं, लेकिन तटस्थ पत्रकारों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वैसे भी यह संक्रमण इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ज्यादा है। प्रिंट मीडिया से जुड़ा पत्रकार जब कुछ लिखता है, तो उसे ज्ञात होता है कि ये रिकॉर्ड हो जाएगा, इसलिए यहां समर्थन या विरोध की गुंजाइश कम ही रहती है।

आप पत्रकार हैं, राजनीति पर गहरी पकड़ रखते हैं, आपकी नज़र में इस बार का लोकसभा चुनाव कितना रोचक होगा?

चुनाव हमेशा से ही रोचक रहा है, लेकिन सोशल मीडिया के आने के बाद इसकी रोचकता और भी बढ़ गई है। जिस तरह से मीडिया आजकल सियासी ख़बरों को कवरेज देता है, उसके चलते लोगों में राजनीति को लेकर उत्सुकता बनी रहती है। जहां तक बात लोकसभा चुनाव की है, तो उसके रोचक होने का सबसे बड़ा कारण यही है कि इस बार मुकाबला राष्ट्र के नाम पर होगा।

ऐसे कौन से मुद्दे हैं, जो मतदाता को प्रभावित कर सकते हैं?

जैसा कि मैंने पहले कहा कि इस बार सबसे बड़ा मुद्दा तो राष्ट्रवाद का ही है। पुलवामा हमले के बाद जिस तरह का माहौल पैदा हुआ, उसे लेकर आम जनता भी दो खेमों में विभाजित है। एक तरफ वो लोग हैं, जो एयर स्ट्राइक जैसी कार्रवाई पर सरकार का समर्थन कर रहे हैं और दूसरी तरफ इस पर सवाल उठाने वाले हैं। दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं और यही तर्क वोटिंग के वक़्त भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इसके अलावा मेरी नज़र में नोटबंदी भी चुनाव को प्रभावित कर सकती है। भले ही यह विषय पुराना हो गया हो, लेकिन इसके प्रभाव अभी भी महसूस किये जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त एक और सबसे बड़ी बात यह है कि विपक्ष ने प्रधानमंत्री पद का कोई उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। लिहाजा लोगों के पास विकल्प नहीं है। यदि मोदी उनकी पसंद नहीं हैं, तो वो किसके नाम पर वोट देंगे?

किसानों की कर्जमाफी के मुद्दे को कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में भुनाया, क्या लोकसभा चुनाव में भी उसे इसका फायदा मिलेगा?

कांग्रेस ने तीन राज्यों में कर्जमाफी का वादा किया था और अब वो उसे निभाने का दावा भी कर रही है। चूंकि हम मीडिया से हैं, हम जानते हैं कि इसका फायदा केवल चुनिंदा स्तर पर किसानों को मिला है। जिस बड़े समूह को इसका फायदा नहीं हुआ या जिसने केवल इसी के चलते कांग्रेस को वोट दिया था, उनमें कांग्रेस के प्रति नाराज़गी भी है और इसका नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है।

मध्यप्रदेश में लोकसभा की 29 सीटें हैं, आप कितनी सीटों पर भाजपा-कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर देखते हैं?

देखिये, सबसे कड़ा मुकाबला तो राजधानी भोपाल में ही देखने को मिलेगा। क्योंकि कांग्रेस के दिग्गज लीडर दिग्विजय सिंह यहां से मैदान में हैं। चूंकि यह सीट 1989 के बाद से ही भाजपा जीत रही है, इसलिए सबकी निगाहें इस बात पर टिकीं हैं कि क्या दिग्गी भाजपा के इस विजयी रथ को रोक पाएंगे? इसके अलावा शहडोल में भी दिलचस्प लड़ाई देखने को मिल सकती हैं, यहां कांग्रेस और भाजपा ने एक-दूसरे का दामन छोड़ने वालीं प्रत्याशियों को टिकट दिया है। हिमाद्री सिंह कांग्रेस से भाजपा में आई हैं और प्रमीला सिंह ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस का हाथ थामा है। ऐसे ही खंडवा-बुरहानपुर पर भी सबकी निगाहें हैं, इसकी वजह है भाजपा उम्मीद नंदकुमार सिंह चौहान। दरअसल, भाजपा इस बार पाकिस्तान को निशाने पर रखकर राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ रही है, लेकिन नंदकुमार संभवत: इस आधार पर वोट नहीं मांगेंगे। करीब डेढ़ साल पहले जब नंदकुमार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे, तब क्रिकेट में भारत की हार के बाद बुरहानपुर में बड़े पैमाने पर आतिशबाजी और पाकिस्तान के समर्थन में नारेबाजी हुई थी। पुलिस ने कुछ लोगों पर देशद्रोह का मामला दर्ज करके उन्हें गिरफ्तार भी किया था, लेकिन नंदकुमार चौहान को यह कार्रवाई पसंद नहीं आई। उन्होंने न केवल संबंधित पुलिस अधिकारी का तबादला करवाया, बल्कि सरकार पर दबाव डलवाकर राष्ट्रद्रोह की धाराओं को सामान्य धाराओं में तब्दील करवा दिया। अब भाजपा और नंदकुमार दोनों को यह जवाब देना होगा कि उनके लिए राष्ट्रवाद के क्या मायने हैं? अगर एयर स्ट्राइक राष्ट्रवाद है, तो पाकिस्तान का समर्थन करने वालों पर कार्रवाई इससे अलग कैसे? यह सवाल तो उठेगा ही।

2014 में भाजपा गुना और छिंदवाडा ये दो लोकसभा सीटें हार गई थी, ये सीटें कांग्रेस का गढ़ समझी जाती हैं। 15 साल की भाजपा सरकार में जिसमें 13 साल शिवराज सिंह मुख्यमंत्री रहे, वो भाजपा जो कहती है कि हम कैडर बेस पार्टी हैं, हम कार्यकर्ताओं का निर्माण करते हैं, वो इन 15 सालों में ऐसे लोग तैयार नहीं कर पाई, जो उसके लिए अच्छे कैंडिडेट साबित हो सकें। संघ भी इस दौरान कांग्रेस की जड़ों को भेदने की योजना बनाने में असफल रहा। इसका खामियाजा उसे विधानसभा चुनाव में उठाना पड़ा और अब लोकसभा चुनाव में भी उठाना होगा। इसके अलावा झाबुआ सीट भाजपा 1977 के बाद पहली बार मोदी लहर में जीती थी, लेकिन उपचुनाव में वो सीट फिर कांग्रेस के खाते में चली गई। लिहाजा गुना, छिंदवाडा और झाबुआ का मुकाबला भी दिलचस्प ही रहेगा।

जैसा कि कहा जा रहा है कि भोपाल में मुकाबला शिवराज बनाम दिग्विजय हो सकता है, यदि भाजपा पूर्व मुख्यमंत्री पर दांव खेलती है तो कौन बाजी मारेगा?

कौन बाजी मारेगा यह तो कहना फ़िलहाल मुश्किल है, लेकिन इतना ज़रूर है कि दिग्विजय सिंह कड़ी टक्कर देंगे। क्योंकि उनके पास लंबा राजनीतिक अनुभव है। वैसे यह सीट पूरी तरह से भाजपा की सीट है। हालिया विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को यहाँ से अच्छे परिणाम मिले थे। भोपाल की 8 विधानसभा सीटों में से पांच भाजपा के खाते में ही गईं। एंटी-इनकम्बेंसी फैक्टर था, माई का लाल जैसा एपिसोड था, प्रमोशन में आरक्षण था और लोग शिवराज सिंह चौहान से व्यक्तिगत रूप से नाराज़ थे, इसके बावजूद भोपाल से भाजपा के 5 विधायक जीते। इसलिए यहां एक बेहद नजदीकी मुकाबला देखने को मिल सकता है। वैसे व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि यदि दिग्विजय सिंह कोई दूसरी सीट चुनते, तो ज्यादा अच्छा रहता। कुछ इसी तरह का फैसला उनके गुरु अर्जुन सिंह ने भी लिया था। वो अपनी परंपरागत सीट छोड़कर होशंगाबाद से चुनाव लड़े थे, जहां उस वक़्त भाजपा के बेहद सामान्य चेहरा रहे सरताज सिंह से उन्हें शिकस्त का सामना करना पड़ा था। उस हार के बाद अर्जुन सिंह का राजनीति में उदय नहीं हो पाया।   

आपकी नज़र में क्या भाजपा पिछली बार के आंकड़े से आगे निकल पाएगी?

मुझे नहीं लगता कि इस बार भाजपा पूरी 282 सीटें जीत पायेगी। क्योंकि सबसे बड़ा झटका उसे उत्तर प्रदेश में लगने वाला है। पिछली बार यूपी में वो 80 में से 72 सीट जीती थी, जो इस बार नहीं आने वालीं। उपचुनावों के नतीजों से साफ़ है कि वहां की जनता का मिजाज बदल रहा है, जो निश्चित रूप से भाजपा के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। हां, यदि कोई चमत्कार हो जाए तो अलग बात है। हालांकि भाजपा ने नार्थ ईस्ट में मेहनत की है, लेकिन वहां सीटें ही इतनी कम हैं कि वो उत्तर प्रदेश में नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएंगी। भाजपा बंगाल में अच्छा करेगी, असम में उसका प्रदर्शन अच्छा होगा, लेकिन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में उसके लिए पहले जितना आंकड़ा जुटाना मुश्किल है।


टैग्स चुनाव 2019 धर्मेंद्र पैगवार
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