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वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने बताया, कैसा रहेगा कोविड के बाद अखबारों का भविष्य

ऐसा संकट काल मैंने कभी नहीं देखा, फिर चाहे युद्ध का समय ही क्यों न हो। जब मैंने पढ़ाई की या पत्रकारिता की तब भी मैंने इस तरह का दौर नहीं देखा

समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago

'ऐसा संकट काल मैंने कभी नहीं देखा, फिर चाहे युद्ध का समय ही क्यों न हो। जब मैंने पढ़ाई की या पत्रकारिता की, तब भी मैंने इस तरह का दौर नहीं देखा, लेकिन ये सच है कि ये समय कठिन परीक्षा का है।' ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार व पद्मश्री आलोक मेहता का। उन्होंने 'न्यूज टेलीविजन के 20 साल और इसकी बढ़ती प्रासंगिकता' पर अपने विचार व्यक्त किए। ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने शनिवार को वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता के साथ ‘वन टू वन’ (One To One) बातचीत की। वेबिनार सीरीज के तरह दोपहर दो बजे से 3 बजे तक बातचीत हुई, जिसका टॉपिक  '20 Years of News TV and its Growing Relevance' रखा गया था, जिसमें आलोक मेहता ने खुलकर अपने विचार व्यक्त किए।

इस दौरान आलोक मेहता ने कहा कि हमने जमीनी स्तर पर अपना काम शुरू किया था और आज भी इसी तरह से कर रहे हैं। लिहाजा कोरोना काल में लिखने पढ़ने का काम ही चलता रहा है। मैंने कभी भी लिखने पढ़ने का काम बंद नहीं किया, फिर चाहे जर्मनी में रहा हूं या फिर भारत में। कई मौके ऐसे भी आए जब अस्पताल में ही लिखना पढ़ना होता रहा। लेकिन ये दिक्कत कई बार आती है कि आप कितनी देर पढ़ेंगे, लिहाजा अपडेट रहने के लिए कई बार मैं टीवी देख लेता हूं, क्योंकि जैसा कि जानते हैं कि कई टीवी चैनल्स की डिबेट में भी मेरा योगदान रहता है, इसके लिए भी मुझे तैयारी भी करनी पड़ती है।   

उन्होंने कहा कि मैं हमेशा अपने आपको ट्रेनी ही मानता हूं और ट्रेनी मानने से ही पत्रकारिता सही मायने में सार्थक होती है। जीवन भर सीखते रहना चाहिए। मनोहर श्याम जोशी, राजेश माथुर जैसे संपादक रहे, जिनके साथ मैंने काम किया है। इसलिए मुझे लगता है कि जीवनभर सीखते रहना है और इसके लिए चाहे टेलीविजन का काम हो, लिखने का काम हो, जहां तक हो सके उसमें सही बात सही तथ्यों के साथ आए, निष्पक्षता भी दिखाई दे। हां ये जरूर है कि जहां विचार हैं, वहां मतभेद होंगे ही।      

जब उनसे सवाल पूछा गया कि आपने भारतीय मीडिया के 20 वर्ष पूरे होने की पूरी जर्नी देखी है। ये जर्नी कैसी रही है और हम किस तरफ जा रहे हैं?  तो अपने जवाब में उन्होंंने कहा कि देखिए, ये सही बात है कि टेलीविजन आने से एक क्रांति हुई है। जब कलर टेलीविजन आया उस समय मैं जर्मनी में रेडियो चैनल ‘वॉयस ऑफ जर्मनी’ तीन साल काम करके वापस भारत आया था। वहां के टेलिविजन ‘डॉयचे वैले’ का भी शुरुआती दौर था, तब वे न्यूज चैनल के विस्तार की तैयारी कर ही रहे थे। उस समय मैंने ‘वॉयस ऑफ अमेरिका के लिए दिल्ली से बतौर कोऑर्डिनेटर दस वर्ष तक काम किया। भारत में  उस समय एक चैनल ‘स्टार’ की शुरुआत हो रही थी, जिसमें हमारे पुराने मित्र रजत शर्मा भी थे। इस चैनल के आने से एक क्रांति सी आयी। कलर टेलिविजन राजीव गांधी लाए, जिसके बाद प्राइवेट चैनल्स आना शुरू हुए और अब बड़े पैमाने पर भारत में चैनल्स हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मैंने कई देशों की यात्राएं की है और वहां रहा भी हूं। इसलिए मैं कह सकता हूं कि यहां चैनल्स का बहुत ज्यादा विस्तार हुआ है। टेलिविजन आने से रीजनल्स चैनल्स स्कोप बढ़ा है। यहां तक कि अब रीजनल्स अखबारों का भी बढ़ गया है। अखबार हो या टेलीविजन, कोई ये कहे कि यहां मेरा ही संपूर्ण एकाधिकार है, उससे मैं असहमत हूं। संपादक राजेंद्र माथुर जी ने हमेशा मुझे यही सिखाया करते थे कि राष्ट्रीय अखबार तब बनता है, जब हर जिले में या हर प्रदेश में आपका एक एडिशन हो। भारत में टेलीविजन ने न्यूज के या कहें एंटरटेनमेंट के इतने दरवाजे खोल दिए हैं, जितने किसी और देश में नहीं है।

उन्होंने कहा कि टेलीविजन हो, प्रिंट हो या फिर डिजिटल मैं इसे एक दूसरे का पूरक मानता हूं, प्रतियोगिता नहीं। जैसे एक पीढ़ी जाती है, तो दूसरी पीढ़ी को विरासत में कुछ देती है वैसे ही मैं इसे मानता हूं। टेलीविजन जागरूकता बढ़ाने में, भारतीय भाषाओं व हिंदी को बढ़ाने में, अंग्रेजी को सीखाने में क्रांति लाया है। और यहां कहना चाहूंगा कि कमियां हर किसी में है। आप में है, मुझमें है, ऐसे ही टेलीविजन में भी है, लिहाजा इसके लिए आपके पास विकल्प हैं। 

मेहता ने आगे कहा कि हमारे यहां खरीदकर पढ़ने की आदत पहले रही है, लेकिन अब मुफ्त की आदत भी पढ़ गई है। हालांकि इससे गरीब लोगों को तो फायदा है, लेकिन जिनकी तनख्वाह 5 लाख है, उन्हें मुफ्त में क्यों पढ़ाया-दिखाया जाए। मैं बताना चाहूंगा कि मैं जिन अखबारों में संपादक रहा हूं, उन अखबारों को भी हॉकर्स से खरीदकर पढ़ता था। यहां तक कि अपने सभी सहयोगियों के लिए भी यह अनिवार्य किया हुआ था, कि वे अखबार को खरीद कर ही पढ़ें, इसके लिए कंपनी उन्हें पैसा देगी। उनके बिल को मैं पास करता था। ऐसा इसलिए, क्योंकि जब आप कोई चीज खरीद कर पढ़ते हैं, तो उसकी वैल्यू होती है, लेकिन जब मुफ्त में मिलता है तो इंसान सोचता है कि बाद में पढ़-देख लेंगे।  

उनसे जब पूछा गया कि कोविड के बाद अखबारों का भविष्य कैसा रहेगा, तो उन्होंने कहा कि देखिए, संकट का दौर कई बार आता है। पहले भी आया है। 1988 से 1992 के बीच भी संकट का दौर आया था, तब दिल्ली में खासकर हिंदी के कई अखबारों के पेजों की संख्या घट गई थी। तो कई बार अखबार कम हुए, मुश्किलें आईं, न्यूजप्रिंट का क्राइसेस आया, इम्पोर्ट में भी दिक्कतें आईं, पर ठीक होने में थोड़ा समय जरूर लगा। हां इस मुश्किल घड़ी में कई लोगों ने अखबार बंद किए। मैंने भी बंद किए। इस बीच कम्प्यूटर पर अखबार पढ़ने का अभ्यास जारी रखा। हालांकि ये सही है कि ज्यादा अखबार मंगाने की संख्या कम कर हुई है। मेरा मानना है कि मीडिया में ये संकट कम से कम एक साल और रहेगा।

उन्होंने कहा कि यहां कहना चाहूंगा कि यदि आप संकट काल को छोड़ दीजिए तो देखिए कि अंग्रेजी अखबार एक पीक पर पहुंच गए हैं। हालांकि इस समय कई विज्ञापनदाता विज्ञापन देने की कंडीशन में नहीं है, जिसके चलते ही कई बड़े अखबारों ने अपनी पृष्ठ संख्या कम भी की है। लेकिन ये स्थिति आज की है। पर पिछले कई वर्षों के दौरान अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ी ही है, फिर चाहे आप मराठी अखबारों को या फिर गुजराती अखबारों की प्रसार संख्या को देख लीजिए। हां, अखबारों को अब एक चीज देखना जरूरी है कि उन्हें अब किसके पास पहुंचना है। यानी जो पहले से ही पढ़ चुका है, पहले से ही जानता है, वो आपका अखबार क्यों लेगा। नया पाठक हिन्दुस्तान में आज भी सबसे ज्यादा है, जोकि युवा भी हैं और रूरल में भी हैं। क्योंकि मेरा मानना है कि ये लोग जितना ज्यादा योगदान देते हैं, उतना दिल्ली में बैठे लोग नहीं देते हैं। आज भी भारतीय मीडिया को ये सोचना होगा कि हमारा व्युअर कौन हैं।

किसान चैनल की बात करें तो ये सिर्फ चल रहा है, लेकिन मेरा अनुभव ये है कि इस ओर जितना होना चाहिए उतना नहीं हो रहा है। इसलिए रूरल एरिया की ओर ध्यान देने की ज्यादा जरूरत है। जब मैंने ‘नईदुनिया’ दिल्ली में लॉन्च किया तो मेरी शर्त उस समय के प्रबंधन से ये थी कि मैं गांव के लिए एक अखबार निकालना चाहता हूं इसलिए मैं आउटलुक छोड़कर नहीं आना चाहता हूं। तो उन्होंने कहां कि हम निकालेंगे, इसके लिए एक प्रिटिंग मशीन दिखाई भी गई और कहा गया कि हमने गुड़गांव से एक मशीन ऑर्डर की है। लेकिन चार-पांच साल गुजर गए लेकिन वो अखबार नहीं निकला। हालांकि क्या वजह रहीं, इसकी कहानी अलग है। लेकिन कहना चाहूंगा कि मेरा सपना तब भी ये था और आज भी है। इसलिए हमें ये देखना होगा कि नया पाठक कहां है।  

देखिए बातचीत का पूरा अंश-         

  


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