IPL की स्ट्रीमिंग रहेगी फ्री या आएगा पेवॉल, इस पर JioStar के ईशान चटर्जी ने कही बड़ी बात

IPL के प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के मुकाबले अपनी स्थिति मजबूत करने के प्रयासों को बेहतर समझने के लिए e4m ने ईशान चटर्जी (चीफ बिजनेस ऑफिसर, स्पोर्ट्स रेवेन्यू, SMB & क्रिएटर, JioStar) से बातचीत की।

Last Modified:
Monday, 03 March, 2025
Ishan8451


अदिति गुप्ता, असिस्टेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।

इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) हमेशा से विज्ञापनदाताओं के लिए एक प्रमुख आयोजन रहा है, जो ब्रैंड्स को अपने विशाल दर्शकों तक पहुंचने का शानदार अवसर प्रदान करता है। जियो और स्टार के विलय के बाद, IPL विज्ञापन जगत में पहले से भी बड़ी ताकत बन चुका है।

इस सीजन में टूर्नामेंट ने कई प्रमुख स्पॉन्सर्स  को अपने साथ जोड़ा है। सूत्रों के मुताबिक, कैंपा और My11Circle (जिनके बारे में एक्सचेंज4मीडिया पहले ही रिपोर्ट कर चुका है) के अलावा, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) और अमूल भी अब इस सूची में शामिल हो गए हैं।

विलय के बाद के विज्ञापन जगत की रणनीतियों, नए जुड़ाव के तरीकों और IPL के प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के मुकाबले अपनी स्थिति मजबूत करने के प्रयासों को बेहतर समझने के लिए, एक्सचेंज4मीडिया ने ईशान चटर्जी (चीफ बिजनेस ऑफिसर, स्पोर्ट्स रेवेन्यू, SMB & क्रिएटर, JioStar) से बातचीत की। उन्होंने IPL 2025 को आकार देने वाले प्रमुख कदमों, विज्ञापन के अवसरों और बाजार की प्रमुख प्रवृत्तियों पर अपनी राय साझा की।

IPL गूगल और मेटा जैसी बड़ी टेक कंपनियों की तुलना में ज्यादा जुड़ाव (एंगेजमेंट) कैसे सुनिश्चित कर रहा है? साथ ही, ब्रेन मैपिंग न्यूरोसाइंस स्टडी और JioStar के विज्ञापनदाताओं के साथ शहरों में किए गए क्लोज़-डोर सेमिनार के बारे में बताएं।

हमारे कुछ बड़े विज्ञापन साझेदारों के पास बहुत उन्नत मॉडल हैं, जो यह सटीक रूप से बताते हैं कि IPL पर किए गए उनके विज्ञापन खर्च से उन्हें कितना रिटर्न मिल रहा है। लेकिन यह सभी प्रकार के विज्ञापनदाताओं के लिए सच नहीं हो सकता।

हम जिन बड़े सवालों का जवाब देने की कोशिश कर रहे थे, उनमें से एक यह था कि IPL या किसी लाइव स्पोर्ट्स इवेंट को देखने वाले दर्शकों की सहभागिता (एंगेजमेंट) का स्तर उतना ही होता है जितना कि वे यूजर-जनरेटेड कंटेंट (UGC) या अन्य ओटीटी कंटेंट पर अनुभव करते हैं या नहीं। इस न्यूरॉन स्टडी को खासतौर पर डिजाइन किया गया था, जिसमें हमने अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग करके आंखों की गतिविधियों को ट्रैक किया। इसका मकसद यह जानना था कि जब कोई व्यक्ति लाइव स्पोर्ट्स इवेंट के दौरान विज्ञापन देखता है तो उसकी एंगेजमेंट लेवल कितना होता है, बनाम जब वह यूजीसी या अन्य प्लेटफॉर्म्स पर विज्ञापन देखता है। इस अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि लाइव स्पोर्ट्स के दौरान विज्ञापन देखने पर दर्शकों की सहभागिता अन्य कंटेंट शैलियों और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की तुलना में काफी अधिक होती है।

जहां तक विज्ञापनदाताओं के साथ हमारी बैठकों की बात है, तो जैसा कि आप जानते हैं, IPL के करीब आते ही हम नियमित रूप से उनके साथ बातचीत करते हैं। हालांकि, दो विशेष आउटरीच कार्यक्रम बहुत महत्वपूर्ण रहे। पहला, हमारी Nielsen के साथ हालिया साझेदारी, जो विशेष रूप से FMCG विज्ञापनदाताओं के लिए प्रासंगिक है। यह सहयोग हमारे अभियान पहुंच मेट्रिक्स की थर्ड-पार्टी वैधता (थर्ड-पार्टी वैलिडेशन) सुनिश्चित करता है, जिससे केवल हमारे डेटा पर ही निर्भरता नहीं रहती। Nielsen अब हमारे साथ एक समर्पित डेटा पाइपलाइन का उपयोग कर रहा है और अपनी ऑडियंस मेजरमेंट विशेषज्ञता लागू कर रहा है। इसका मतलब है कि किसी प्रमुख विज्ञापनदाता के लिए अब Nielsen हमारे अभियान की पहुंच और मेट्रिक्स को प्रमाणित कर रहा है, जिससे इसकी विश्वसनीयता और अधिक बढ़ जाती है।

IPL 2025 में छोटे व्यवसायों के लिए क्या पहल की जा रही हैं?

JioHotstar ने TATA IPL 2025 को "Year of the Advertisers" यानी विज्ञापनदाताओं का साल घोषित किया है, जिसमें हर ब्रांड के लिए समाधान और अवसर प्रदान किए जाएंगे। छोटे और मध्यम आकार के व्यवसायों (SMBs) से राजस्व बढ़ाने पर विशेष ध्यान देने के साथ, JioHotstar ने 10 शहरों में SMB आउटरीच प्रोग्राम शुरू किया है। इस पहल का उद्देश्य छोटे और मध्यम व्यवसायों को IPL की ताकत से जोड़ना है, ताकि वे भी इस मंच के जरिए अपनी वृद्धि को तेज कर सकें—सिर्फ बड़े कॉरपोरेट ब्रांड ही नहीं, बल्कि छोटे व्यवसायों के लिए भी यहां मौके उपलब्ध हैं।

JioHotstar छोटे व्यवसायों को ध्यान में रखते हुए किफायती पैकेज, टार्गेटेड विज्ञापन विकल्प, विभिन्न प्रकार के विज्ञापन प्रारूप और क्रिएटिव सपोर्ट जैसी सुविधाएं दे रहा है। SMB समुदाय से इस पहल को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है, और इस कार्यक्रम ने एक नई लहर के रूप में छोटे विज्ञापनदाताओं को आकर्षित किया है, जिससे वे TATA IPL मंच का उपयोग कर अपने व्यवसाय को बढ़ा सकें।

लोकेशन-बेस्ड टार्गेटिंग इस पहल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उदाहरण के लिए, यदि आप एक रियल एस्टेट डेवलपर या ऑटोमोबाइल डीलर हैं और आप किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र में विज्ञापन केंद्रित करना चाहते हैं, तो JioHotstar अब सटीक टार्गेटिंग की सुविधा प्रदान कर रहा है। यह उन SMBs के लिए बेहद फायदेमंद है जो स्थानीय स्तर पर मार्केटिंग करना चाहते हैं।

साथ ही, JioHotstar यह धारणा तोड़ना चाहता है कि IPL पर विज्ञापन देने के लिए बहुत बड़े बजट की जरूरत होती है। विभिन्न टार्गेटिंग रणनीतियों और किफायती विज्ञापन विकल्पों के माध्यम से यह दिखाया जा रहा है कि छोटे व्यवसायों के लिए भी IPL विज्ञापन किफायती और प्रभावी हो सकता है। जमीन पर सक्रिय प्रचार अभियानों और नई नवाचारों के साथ, JioHotstar को उम्मीद है कि IPL 2025 में रिकॉर्ड संख्या में छोटे व्यवसायों की भागीदारी देखने को मिलेगी।

IPL के विज्ञापन दरों में JioStar के विलय के बाद क्या बदलाव आया है? क्या विज्ञापनदाताओं को टीवी और डिजिटल पर कोई मूल्य लाभ मिल रहा है?

IPL विज्ञापन दरें इंडस्ट्री की मांग और आपूर्ति के आधार पर निर्धारित होती हैं। हमने पहले ही भारत-इंग्लैंड मैचों और चैंपियंस ट्रॉफी के लिए अपनी मूल्य निर्धारण रणनीति लॉन्च कर दी है। इनकी सकारात्मक प्रतिक्रिया को देखते हुए हमें विश्वास है कि यही रणनीति IPL 2025 में भी जारी रहेगी।

हमारी विज्ञापन दरें पहले से ही प्रभावी रूप से लागू हो चुकी हैं, और ये अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। इससे हमें IPL 2025 के लिए भी मजबूत रुझान दिखाई दे रहा है।

IPL 2025 के लिए सेल्स व रेवन्यू लक्ष्य क्या हैं? यह पिछले साल की तुलना में कैसा रहेगा?

फिलहाल हमारे पास कोई सटीक आंकड़े साझा करने के लिए नहीं हैं, लेकिन IPL 2024 ने व्यूअरशिप और एंगेजमेंट के कई रिकॉर्ड तोड़े थे। टीवी पर इसे 525 मिलियन दर्शकों ने देखा था, जबकि डिजिटल (मोबाइल उपकरणों) पर 425 मिलियन दर्शकों ने इसे स्ट्रीम किया था। बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी, भारत-इंग्लैंड सीरीज और अब चैंपियंस ट्रॉफी में जबरदस्त दर्शकों की भागीदारी को देखते हुए हमें विश्वास है कि IPL 2025 की व्यूअरशिप 1 बिलियन से अधिक होगी।

स्वाभाविक रूप से, इस बढ़ी हुई व्यूअरशिप के चलते हमें राजस्व में भी वृद्धि की उम्मीद है। हालांकि, IPL शुरू होने में अभी तीन सप्ताह बाकी हैं, इसलिए हमें देखना होगा कि चीजें कैसे आगे बढ़ती हैं। लेकिन विज्ञापनदाताओं की मांग काफी मजबूत नजर आ रही है, और हम इसे लेकर आशावादी हैं।

IPL 2025 के लिए कितने स्पॉन्सर जुड़े हैं? कौन-कौन सी कैटेगरी आगे चल रही हैं?

मुझे ब्रांड के नाम साझा करने की अनुमति नहीं है, क्योंकि आमतौर पर कंपनियां खुद अपनी IPL साझेदारी की घोषणा करना पसंद करती हैं। हालांकि, इस साल हमने बाजार को 40 श्रेणियों (कैटेगरी) में विभाजित किया है।

कुछ प्रमुख रुझान उभरकर सामने आए हैं। सबसे पहले, प्रीमियम विज्ञापन में बढ़ोतरी हुई है। अब विज्ञापनदाता CTV (कनेक्टेड टीवी), iOS डिवाइसेज़, 50,000 रुपये से अधिक कीमत वाले एंड्रॉइड फोन और HDTV यूजर्स को टारगेट कर सकते हैं, जिससे वे उच्च-स्तरीय (प्रीमियम) दर्शकों तक अधिक प्रभावी तरीके से पहुंच सकते हैं।

इसके अलावा, FMCG ब्रांडों के लिए महिलाओं पर केंद्रित विज्ञापन महत्वपूर्ण हो गया है। पिछले साल, IPL ने सिर्फ टीवी पर 200 मिलियन (20 करोड़) महिला दर्शकों को आकर्षित किया था, और इस सीजन में यह संख्या और बढ़ने की उम्मीद है।

कुछ सबसे सक्रिय श्रेणियों में पेय पदार्थ (गर्मियों की शुरुआत के कारण), एयर कंडीशनर, पंखे, पेंट्स, BFSI (बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं और बीमा), फिनटेक, मोबाइल फोन हैंडसेट और फैंटेसी गेमिंग शामिल हैं।

तेजी से, कंपनियां अपने पूरे मार्केटिंग कैलेंडर को IPL के इर्द-गिर्द प्लान कर रही हैं, यह दर्शाते हुए कि भारत के विज्ञापन क्षेत्र में IPL का कितना बड़ा दबदबा है।

क्या IPL की स्ट्रीमिंग JioStar पर फ्री रहेगी, या इसे पेवॉल के पीछे कर दिया जाएगा?

हमारा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यूजर किसी भी पेवॉल (सशुल्क एक्सेस) तक पहुंचने से पहले कंटेंट के एक महत्वपूर्ण हिस्से का आनंद ले सकें। अभी तक हमने कोई निश्चित संख्या तय नहीं की है, क्योंकि हम अभी भी प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन फ्री एक्सेस काफी हद तक रहेगा—इतना कि यूजर पूरा मैच देख सकें।

यह रणनीति हमें एक संतुलन बनाने में मदद करती है—यूजर्स को हमारे प्लेटफॉर्म का अनुभव देने के लिए पर्याप्त समय देना, साथ ही विज्ञापनदाताओं के उद्देश्यों को पूरा करना। इस मॉडल की सफलता का सबसे अच्छा उदाहरण भारत-पाकिस्तान मैच है, जिसने अब तक की सबसे ज्यादा डिजिटल व्यूअरशिप दर्ज की थी। इस नतीजे ने हमें विश्वास दिलाया है कि हमारी रणनीति IPL 2025 में भी प्रभावी साबित होगी।

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दर्शकों का प्यार और भरोसा मेरी सबसे बड़ी पूंजी: सुधीर चौधरी

समाचार4मीडिया से खास बातचीत में ‘डिकोड’ की सफलता, गोदी मीडिया, AI एंकर, यूट्यूब जर्नलिज्म और टीवी न्यूज इंडस्ट्री की चुनौतियों पर खुलकर बोले सुधीर चौधरी

Last Modified:
Tuesday, 19 May, 2026
Sudhir Chaudhary Interview

भारतीय टीवी पत्रकारिता के सबसे चर्चित चेहरों में से एक, लोकप्रिय न्यूज एंकर और डीडी न्यूज (DD News) के प्राइम टाइम शो ‘डिकोड’ (Decode) के होस्ट सुधीर चौधरी ने समाचार4मीडिया के साथ खास बातचीत की है। इस बातचीत में उन्होंने पत्रकारिता, भरोसे, ‘गोदी मीडिया’, यूट्यूब जर्नलिज्म, AI एंकर, टीवी न्यूज इंडस्ट्री और अपने करियर से जुड़े कई अहम मुद्दों पर खुलकर बात की। इस दौरान उन्होंने बताया कि आखिर दर्शक उनसे इतना भावनात्मक जुड़ाव क्यों महसूस करते हैं, ‘डिकोड’ की सफलता का फॉर्मूला क्या है और आज के दौर में गंभीर पत्रकारिता को बचाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण हो गया है। प्रस्तुत हैं इस विशेष बातचीत के प्रमुख अंश:

दर्शक आपसे तुरंत जुड़ जाते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह क्या मानते हैं? आपकी स्टोरी टेलिंग फिलॉसफी क्या है?

मुझे लगता है कि इसके पीछे सबसे बड़ी वजह दर्शकों की भावनाएं और इमोशंस हैं। अगर आप अपने दर्शकों के साथ भावनात्मक रिश्ता बना लेते हैं तो फिर वह रिश्ता सिर्फ एंकर और दर्शक का नहीं रह जाता, बल्कि परिवार जैसा बन जाता है। मैंने कभी यह नहीं सोचा कि मैं टीवी पर बैठा एक पत्रकार हूं और सामने सिर्फ दर्शक बैठे हैं। मैंने हमेशा अपने हर शो और हर प्रसारण में यही कोशिश की कि मैं खुद को उनके परिवार का सदस्य मानकर बात करूं।

मेरे लिए पत्रकारिता सिर्फ खबर सुनाना नहीं है, बल्कि लोगों को उनकी जिंदगी से जुड़े मुद्दों को सरल तरीके से समझाना भी है। दूसरी चीज स्टोरी सलेक्शन है। आपके पास एक घंटा होता है और उस एक घंटे में आपको ऐसा कंटेंट देना होता है जो पूरे परिवार के काम का हो। जैसे किसी घर में माता-पिता हैं तो उनकी चिंताएं अलग हैं, युवा हैं तो उनके करियर की चिंता अलग है, बच्चे हैं तो सोशल मीडिया और नई चुनौतियों की बातें अलग हैं। मैं हमेशा कोशिश करता हूं कि शो ऐसा हो जिसमें हर वर्ग के दर्शक को लगे कि यह शो उसकी जिंदगी से जुड़ा हुआ है। मुझे लगता है कि यही वजह है कि दर्शक अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर भी मेरे साथ जुड़े रहते हैं। जहां भी मैं गया, दर्शकों का प्यार और आशीर्वाद मेरे साथ आया और वही मेरी सबसे बड़ी ताकत है।

‘ब्रैंड सुधीर चौधरी’ बनने का राज क्या है?

मेरे ख्याल से इसका सबसे बड़ा राज विनम्रता और ईमानदारी है। आप दर्शकों के काम की बात कीजिए और अपने प्रसारण में ईमानदारी रखिए। हमारे देश के लोग बहुत समझदार हैं। जैसे लोग किसी कंपनी के ब्रैंड को देखकर समझ जाते हैं कि वह ईमानदार है या सिर्फ पैसा कमाना चाहती है, वैसे ही टीवी पर दिखने वाले लोगों के बारे में भी वे राय बना लेते हैं।

दर्शक बहुत जल्दी समझ जाते हैं कि सामने बैठा व्यक्ति ईमानदारी से बात कर रहा है या सिर्फ अपनी बात बेचने की कोशिश कर रहा है। मैं यहां कुछ बेचने नहीं आया हूं। मैं अपनी बात ईमानदारी से दर्शकों तक पहुंचाने आया हूं और खुद को उनकी जिंदगी की यात्रा का सहभागी मानता हूं।

मैं हमेशा यही सोचता हूं कि अगर दर्शक अपना कीमती समय मुझे दे रहे हैं तो उसके बदले उन्हें कुछ सार्थक मिलना चाहिए। यही कारण है कि मैंने कभी सिर्फ शोर मचाने या सनसनी फैलाने वाली पत्रकारिता में विश्वास नहीं किया। मेरे लिए भरोसा सबसे बड़ी पूंजी है और उसी भरोसे ने मुझे ‘ब्रैंड सुधीर चौधरी’ बनाया।

डिकोड’ की लगातार बढ़ती लोकप्रियता के पीछे क्या फैक्टर है?

मुझे लगता है कि यह कई चीजों का कॉम्बिनेशन है—मेहनत, रिसर्च, प्रेजेंटेशन और सरल भाषा। हाल ही में पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों वाले दिन हमारे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर लगभग 55 लाख व्यूज आए थे। लेकिन इतने बड़े डेटा में से दर्शकों के लिए जरूरी 10 आसान पॉइंट निकालना बहुत कठिन काम होता है। उसके लिए लगातार रिसर्च करनी पड़ती है, डेटा को समझना पड़ता है और फिर उसे बेहद आसान भाषा में दर्शकों तक पहुंचाना पड़ता है।

मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह रहती है कि कौन सी जानकारी दर्शकों के लिए जरूरी है और कौन सी अनावश्यक। मैं लगातार खुद को फिल्टर करता रहता हूं कि यह जानकारी हटानी चाहिए या रखनी चाहिए। मुझे लगता है कि मेरी सबसे बड़ी ताकत सरलता है और वही सबसे मुश्किल चीज भी है।

इसके अलावा दर्शकों को एक ओवरऑल अनुभव देना भी जरूरी है। सिर्फ खबर पढ़ देना काफी नहीं होता। दर्शकों को यह महसूस होना चाहिए कि उन्हें कुछ नया, उपयोगी और भरोसेमंद मिल रहा है। शायद यही वजह है कि ‘डिकोड’ लगातार दर्शकों के बीच अपनी जगह मजबूत कर रहा है।

डीडी न्यूज के साथ आपका अनुभव कैसा रहा? क्या सरकारी चैनल होने की वजह से कोई सीमाएं महसूस हुईं?

जब मैं डीडी न्यूज से जुड़ने जा रहा था तो कई लोगों ने मुझे बहुत तरह की बातें बताईं। कहा गया कि सरकारी चैनल में काम करने की आजादी नहीं होती, वहां सीमाएं होती हैं और बहुत प्रोफेशनल माहौल नहीं होता। लेकिन मेरा अनुभव बिल्कुल अलग रहा। मुझे वहां बहुत अच्छी टीम मिली और कभी किसी तरह का दबाव महसूस नहीं हुआ। अगर मुझे कोई नया फॉर्मेट ट्राई करना हो, नई टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करनी हो या शो को नए तरीके से प्रस्तुत करना हो, तो पूरा सहयोग मिला।

हमने डिजिटल लाइव व्यूअरशिप स्क्रीन पर दिखाने जैसा नया प्रयोग किया, जो उस समय कई प्राइवेट चैनलों ने भी नहीं किया था। आज हमें एक शो पर 50 लाख तक व्यूज मिल रहे हैं और एक साल में लगभग 1.3 बिलियन व्यूज मिले हैं। यह अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है।

जहां तक राजनीतिक दबाव की बात है, मुझे कभी कोई फोन नहीं आया कि यह करना है या नहीं करना है। लेकिन एक नेशनल ब्रॉडकास्टर होने के नाते आपकी जिम्मेदारी जरूर बढ़ जाती है। लोग आपकी राय को देश की राय मानते हैं, इसलिए संतुलन बनाए रखना बहुत जरूरी होता है।

आज के दौर में सार्थक और गंभीर पत्रकारिता को बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण है?

देखिए, आज ज्यादातर लोग इंफॉर्मेशन से ज्यादा अटेंशन पर फोकस कर रहे हैं। अगर कोई जोर-जोर से बोलेगा या सनसनी फैलाएगा तो लोग एक बार जरूर देखेंगे, लेकिन लंबे समय तक भरोसा नहीं बनाए रख पाएंगे। मैंने हमेशा शांत और गंभीर पत्रकारिता में विश्वास किया है।

मेरा फॉर्मेट हमेशा से ऐसा रहा है, जिसमें खबर को आराम से, विस्तार से और सरल भाषा में समझाया जाए। मेरा मानना है कि दर्शक सिर्फ शोर नहीं चाहते, वे भरोसेमंद जानकारी भी चाहते हैं। अगर आप लगातार ईमानदारी से काम करेंगे तो दर्शक आपके साथ बने रहते हैं।

आपके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण क्या है, व्युअरशिप नंबर्स या दर्शकों का भरोसा?

मेरे लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण दर्शकों का भरोसा है। अगर दर्शक आप पर भरोसा करते हैं तो वे खुद आपके पास आएंगे। लेकिन सिर्फ नंबर्स आने का मतलब यह नहीं कि लोग आप पर भरोसा भी करते हैं। आज बहुत लोग पहले अटेंशन चाहते हैं और बाद में भरोसा। लेकिन मेरी सोच इसके उलट है। मैं पहले भरोसा चाहता हूं। अगर दर्शक यह मान लें कि आप ईमानदारी से अपनी बात रख रहे हैं, तो नंबर्स अपने आप आ जाएंगे।

नंबर्स मेरे लिए बाय-प्रोडक्ट हैं। असली मंजिल भरोसा है। एक बार भरोसा टूट गया तो फिर उसे वापस पाना बहुत मुश्किल होता है। इसलिए मैं हमेशा कोशिश करता हूं कि दर्शकों का भरोसा कभी टूटने न पाए।

आजकल बहुत ज्यादा चर्चा में रहने वाले गोदी मीडिया’ शब्द को आप कैसे देखते हैं?

मेरे हिसाब से यह सोशल मीडिया की उपज है। कुछ लोग एजेंडा चलाते हैं और वही शब्द धीरे-धीरे ट्रेंड बन जाते हैं। अगर आप जमीन पर लोगों के बीच जाएंगे तो आपको इस तरह की सोच बहुत कम दिखाई देगी। असल ‘गोदी मीडिया’ तो उस दौर में था जब बिना मजबूत जनादेश वाली सरकारें थीं और कुछ पत्रकार सत्ता के बदले फायदे लेते थे जैसे-पुरस्कार, पद, संरक्षण और दूसरी सुविधाएं। आज स्थितियां काफी बदल चुकी हैं। अगर जनता किसी नेता या विचार के साथ खड़ी है और पत्रकार उसी भावना को दिखा रहा है, तो उसे गोदी मीडिया कहना गलत है। पत्रकारिता में जनता की सोच और फैसले को समझना और दिखाना भी जरूरी होता है।

न्यूजरूम में AI एंकरों के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर आपकी क्या राय है?

AI एंकर कभी इंसानी एंकर जैसा भावनात्मक रिश्ता नहीं बना पाएंगे। दर्शक किसी ऐसे चेहरे पर भरोसा नहीं करेंगे जिसका कोई असली अनुभव या पहचान न हो। हां, भविष्य में ऐसा हो सकता है कि मेरा AI अवतार मेरी ही बात दर्शकों तक पहुंचाए, लेकिन वह भी तभी चलेगा जब उसके पीछे असली इंसान की विश्वसनीयता होगी। भारत जैसे देश में लोग सिर्फ जानकारी नहीं, बल्कि भरोसा और जुड़ाव भी देखते हैं। यही वजह है कि इंसानी एंकर की जगह AI पूरी तरह नहीं ले पाएगा।

AI के जरिए फर्जी वीडियो और आपकी आवाज के दुरुपयोग को लेकर आपने क्या कदम उठाए?

मुझे कई बार लोगों ने ऐसे वीडियो भेजे जिनमें मेरा चेहरा और आवाज इस्तेमाल की गई थी, जबकि मैंने वह बातें कही ही नहीं थीं। इसके बाद मैंने कानूनी रास्ता चुना और दिल्ली हाई कोर्ट में अपने पर्सनालिटी राइट्स की सुरक्षा के लिए अर्जी लगाई।

कोर्ट से आदेश मिलने के बाद अब अगर कोई मेरे चेहरे या आवाज का गलत इस्तेमाल करता है तो उसे तुरंत नोटिस भेजा जाता है और कंटेंट हटवाया जाता है। लेकिन यह आने वाले समय की बहुत बड़ी चुनौती है। जैसे डिजिटल फ्रॉड बढ़े हैं, वैसे ही AI आधारित फेक कंटेंट भी तेजी से बढ़ेगा। इसके लिए समाज और कानून दोनों को तैयार होना पड़ेगा।

ट्रोलिंग और सोशल मीडिया हमलों को आप कैसे हैंडल करते हैं?

इतने वर्षों में अब समझ आ जाता है कि कौन सा फीडबैक असली दर्शक का है और कौन संगठित आईटी सेल का हिस्सा है। जो लोग एजेंडा चलाने के लिए ट्रोलिंग करते हैं, उन्हें मैं ज्यादा महत्व नहीं देता। लेकिन अगर कोई गंभीर दर्शक अपनी नाराजगी या सुझाव देता है तो मैं उसे बहुत गंभीरता से लेता हूं और जरूरत हो तो तुरंत सुधार भी करता हूं। सोशल मीडिया पर बहुत कुछ सिर्फ दबाव बनाने के लिए किया जाता है ताकि आप अपनी राय बदल लें, लेकिन पत्रकार को अपने काम पर फोकस रखना चाहिए।

अगर आपको अपना न्यूज चैनल शुरू करना हो तो उसमें किन चीजों पर फोकस करना चाहेंगे?

मैं पहले भरोसा और फिर नंबर्स वाले मॉडल पर काम करूंगा। आज ज्यादातर जगह पहले अटेंशन और बाद में जानकारी देने की कोशिश होती है। मेरा हमेशा से ‘स्लो जर्नलिज्म’ में विश्वास रहा है, आराम से बैठकर खबर समझाइए। जैसे कि मेरा मानना है कि अगर मैं वर्ष 2026 में चैनल शुरू करूं तो वह 2026 जैसा दिखना चाहिए। आज भी कई चैनलों का फॉर्मेट 90 के दशक जैसा लगता है। हालांकि सच यह है कि न्यूज चैनल शुरू करना बहुत महंगा काम है। 150-200 करोड़ रुपये सालाना खर्च वाली संस्था खड़ी करना आसान नहीं होता।

डीडी न्यूज से जुड़ने के दौरान आपकी सैलरी को लेकर काफी चर्चा हुई थी। इस पर क्या कहेंगे?

मेरी सैलरी निजी जानकारी थी। वह कॉन्ट्रैक्ट लीक हुआ और फिर उस पर चर्चा शुरू हो गई। इंडस्ट्री में प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या दोनों होती हैं। लेकिन मैं इतना जरूर कहूंगा कि जो वैल्यू और आउटपुट मैं देता हूं, उसके हिसाब से उस रकम को सिर्फ मेरी सैलरी नहीं, बल्कि पूरे शो का प्रोडक्शन कॉस्ट समझना चाहिए। मैं तो चाहता हूं कि न्यूज इंडस्ट्री में भी लोगों को उतना पैसा मिले जितना क्रिकेट, सिनेमा और दूसरे क्षेत्रों में मिलता है।

मेनस्ट्रीम मीडिया से अलग होकर तमाम पत्रकारों का यूट्यूब की ओर जाने को आप कैसे देखते हैं?

बहुत लोग कहते हैं कि उन्हें मेनस्ट्रीम मीडिया में आजादी नहीं मिल रही थी, इसलिए वे यूट्यूब की ओर गए। लेकिन मेरी राय में ज्यादातर लोग वहां तब पहुंचे जब उन्हें मुख्यधारा मीडिया में जगह नहीं मिली। यूट्यूब का बिजनेस मॉडल व्यूज पर चलता है। जितनी सनसनी, उतने ज्यादा व्यूज और उतना ज्यादा पैसा। यही वजह है कि वहां कई बार भाषा और प्रस्तुति काफी आक्रामक हो जाती है। मेनस्ट्रीम मीडिया आज भी बड़ा मंच है। वहां काम करने की जिम्मेदारी और जवाबदेही दोनों ज्यादा होती हैं।

आपने कुछ समय पहले फिल्म निर्माण में कदम रखा है, इस फील्ड में आने का फैसला कैसे हुआ?

न्यूज और सिनेमा दोनों स्टोरी टेलिंग हैं। मुझे हमेशा लगता था कि न्यूज के बाद अगला कदम सिनेमा होगा। ‘द टेरर रिपोर्ट’ आतंकवाद पर आधारित फिल्म है। इसमें ऑपरेशन सिंदूर समेत कई घटनाएं शामिल हैं। वेव्स कॉन्फ्रेंस के दौरान मेरी और एकता कपूर की बातचीत हुई और वहीं से यह आइडिया आगे बढ़ा। इसके बाद दोनों ने मिलकर इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया। आगे सिर्फ न्यूज आधारित फिल्में ही नहीं, किसी भी तरह की कहानी हो सकती है। मुझे सिनेमा की स्टोरी टेलिंग बहुत पसंद है क्योंकि उसमें ठहराव और क्रिएटिविटी की ज्यादा गुंजाइश होती है।

नवागत पत्रकारों और अपने प्रशंसकों को क्या सलाह देना चाहेंगे?

सफलता दूर से आसान लगती है, लेकिन उसके पीछे बहुत मेहनत और त्याग होता है। सबसे जरूरी चीज है- परिश्रम, स्किल और निरंतरता। आपके पास ऐसा क्या है कि लोग अपना कीमती समय आपको दें, इसका जवाब आपके पास होना चाहिए। सिर्फ प्रसिद्धि पाने की इच्छा काफी नहीं होती। मैं 2016 के बाद कभी छुट्टी पर नहीं गया। दर्शक जानते हैं कि रात 9 बजे मैं जरूर आऊंगा। यही निरंतरता धीरे-धीरे भरोसा बनाती है।

सफलता की सबसे बड़ी कीमत बर्नआउट और निजी जिंदगी से दूरी है। जब आप रोज एक तय समय पर लाइव शो करते हैं तो आपकी जिंदगी काफी हद तक मशीन जैसी हो जाती है। परिवार, दोस्त, छुट्टियां और सोशल लाइफ धीरे-धीरे पीछे छूटने लगते हैं। कई बार आपको बीमार होने पर भी काम करना पड़ता है। लोग दूर से सिर्फ सफलता देखते हैं, लेकिन उसके पीछे कितनी निरंतरता, अनुशासन और त्याग होता है, वह बहुत कम लोगों को दिखाई देता है।

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जब तैयारी और अवसर मिलते हैं, तभी लोग आपको भाग्यशाली कहते हैं: प्रशांत कुमार

डॉ. अनुराग बत्रा के साथ हुई बातचीत में, WPP Media South Asia के CEO प्रशांत कुमार ने बतया कैसे बदलते कंज्यूमर व्यवहार, AI की तेजी और रिजल्ट-आधारित बिजनेस मॉडल मीडिया सर्विसेज को पूरी तरह बदल रहे हैं।

Last Modified:
Wednesday, 29 April, 2026
PrashantKumar541

भारत का विज्ञापन बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन जो विज्ञापन एजेंसियों का पारंपरिक बिजनेस मॉडल है, उस पर दबाव बढ़ रहा है और वह पहले जैसा मजबूत नहीं रह गया है। ऐसे माहौल में WPP Media South Asia के CEO प्रशांत कुमार साफ कहते हैं कि अब “खेल के नियम” (rules of the game) बदल चुके हैं, यानी मीडिया और विज्ञापन का पूरा तरीका पहले जैसा नहीं रहा।

BW बिजनेसवर्ल्ड व एक्सचेंज4मीडिया के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ एक विस्तृत बातचीत में प्रशांत कुमार अपनी सोच रखते हैं कि मीडिया अब सिर्फ एक अलग (साइलो) फंक्शन नहीं रहा, बल्कि यह मार्केटिंग का मुख्य ऑपरेटिंग लेयर (मुख्य रीढ़) बन चुका है, जो डेटा, टेक्नोलॉजी और इंटीग्रेटेड थिंकिंग से चलता है।  

लगातार तैयार रहने की संस्कृति

प्रशांत कुमार कह रहे हैं कि उनकी कंपनी की सफलता सिर्फ बड़ी होने की वजह से नहीं है, बल्कि उनकी एक ऐसी कार्य संस्कृति (culture) है जहां हर समय तैयार रहने की आदत है। वे अपने 22 साल के अनुभव के आधार पर बताते हैं कि असली सफलता तब मिलती है जब आपकी तैयारी सही समय पर मौके से मिलती है। इसी वजह से लोग इसे “किस्मत” कहते हैं, लेकिन उनके अनुसार यह असल में तैयारी का नतीजा होता है।

उनका कहना है कि उनकी टीम हमेशा तैयार रहने की सोच के साथ काम करती है- यानी हर समय सीखने, बदलने और नए हालात के अनुसार खुद को ढालने की मानसिकता। क्योंकि मीडिया और मार्केटिंग की दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है, इसलिए पुराने तरीके हर साल काम नहीं करते।

वे यह भी समझाते हैं कि यह तैयारी एक बार की चीज नहीं है, बल्कि लगातार चलने वाली प्रक्रिया है, जो जिज्ञासा और नए तरीकों को अपनाने की इच्छा से आती है। जैसे-जैसे लोगों का व्यवहार अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स और फॉर्मैट्स पर बदल रहा है, वैसे-वैसे रणनीतियां भी बदलनी पड़ती हैं।

वैसे उनका मुख्य संदेश यह है कि आज के समय में मीडिया इंडस्ट्री इतनी तेजी से बदल रही है कि कल का सफल तरीका आज के लिए पुराना हो चुका होता है।

मार्केटिंग ट्रांसफॉर्मेशन के केंद्र में मीडिया

प्रशांत कुमार कहते हैं कि अब मीडिया सिर्फ विज्ञापन दिखाने या चलाने का एक आख़िरी स्टेप नहीं रह गया है। पहले मीडिया को बस एक ऐसा हिस्सा माना जाता था जहां ब्रैंड अपना ऐड टीवी, डिजिटल या किसी प्लेटफॉर्म पर चलाते थे। लेकिन अब बदलाव यह है कि मीडिया खुद पूरी मार्केटिंग स्ट्रैटेजी का केंद्र बन गया है। 

उनके अनुसार अब कंपनियां मीडिया की मदद से सीधे उपभोक्ता को बेहतर तरीके से समझ सकती हैं कि वह क्या देख रहा है, कब देख रहा है और किस समय उसे कौन सा संदेश सबसे ज्यादा असर करेगा। यानी मीडिया अब सिर्फ प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि ग्राहक को समझने और उससे जुड़ने का तरीका भी बन गया है।

वे यह भी बताते हैं कि आज कंटेंट, कॉमर्स (commerce) और डेटा तीनों एक-दूसरे से जुड़ गए हैं। इसका मतलब यह है कि अगर कोई व्यक्ति किसी ऐड या कंटेंट को देखता है, तो उससे खरीदारी होने की संभावना बनती है और अगर वह खरीदारी करता है, तो उसका डेटा आगे और बेहतर मार्केटिंग में इस्तेमाल होता है।

इस वजह से मीडिया, मार्केटिंग और सेल्स के बीच की सीमाएं धुंधली हो रही हैं। अब एजेंसियों का काम सिर्फ विज्ञापन चलाना नहीं रह गया है, बल्कि पूरे बिजनेस और मार्केटिंग की समस्या को हल करना हो गया है।

नया एजेंसी मैनडेट: प्रॉब्लम सॉल्विंग

अब मार्केटिंग और विज्ञापन की दुनिया में सिर्फ एजेंसियां ही नहीं, बल्कि कंसल्टिंग कंपनियां, टेक प्लेटफॉर्म्स और डेटा कंपनियां भी बहुत गहराई से काम करने लगी हैं। इससे एजेंसियों के लिए कम्पटीशन पहले से ज्यादा कठिन हो गया है। लेकिन प्रशांत कुमार इसे खतरे की तरह नहीं देखते। उनके अनुसार यह बदलाव एजेंसियों को और साफ सोचने पर मजबूर करता है कि उनका असली काम क्या है और वे आखिर किस समस्या को हल कर रहे हैं।

वे कहते हैं कि सबसे जरूरी चीज यह है कि पहले यह बिल्कुल साफ हो कि असली समस्या क्या है। उनकी कंपनी का फोकस हमेशा ग्राहक को समझने पर रहता है, यानी लोग क्या चाहते हैं, कैसे सोचते हैं और किस तरह का संदेश उनके लिए काम करेगा। 

उनका मानना है कि अगर समस्या सही तरीके से समझ ली जाए, तो उसका सही समाधान अपने आप निकल आता है। लेकिन अक्सर दिक्कत यही होती है कि क्लाइंट और एजेंसी के बीच समस्या को समझने में ही स्पष्टता नहीं होती। इसलिए वे यह जोर देते हैं कि किसी भी मार्केटिंग काम का नतीजा इस बात पर निर्भर करता है कि शुरुआत में समस्या को कितनी सही और साफ तरह से परिभाषित किया गया है।

कमीशन से आगे नया बिजनेस मॉडल

पिछले 20 सालों में मीडिया और विज्ञापन एजेंसियों का बिजनेस करने का तरीका काफी बदल गया है। पहले एजेंसियां ज्यादातर कमीशन पर काम करती थीं, यानी जितना विज्ञापन खर्च होता था, उसका एक हिस्सा उन्हें मिल जाता था। लेकिन अब वह मॉडल धीरे-धीरे कम हो गया है। उसकी जगह कई नए तरीके आ गए हैं, जैसे फिक्स्ड फीस, परफॉर्मेंस पर आधारित पेमेंट, और ऐसे मॉडल जहाँ एजेंसी को तब ज्यादा फायदा होता है जब उसका काम अच्छे नतीजे देता है।

प्रशांत कुमार इसे किसी संकट की तरह नहीं देखते, बल्कि एक स्वाभाविक बदलाव मानते हैं। उनके अनुसार एजेंसियां अकेले नहीं हैं, बल्कि एक बड़े सिस्टम का हिस्सा हैं जहाँ वे ग्राहकों और पार्टनर्स के लिए समाधान बनाती हैं, और उनका असली मकसद सभी के लिए ग्रोथ लाना होता है।

वे यह भी बताते हैं कि आज अलग-अलग तरह के मॉडल मौजूद हैं। कहीं फीस मिलती है, कहीं कमीशन, और कहीं सीधे नतीजों (outcome) के आधार पर पैसा मिलता है। लेकिन हर मॉडल की असली जड़ सफलता ही है, यानी अगर काम अच्छा होगा तो कमाई भी उसी हिसाब से होगी।

उनका सबसे अहम विचार यह है कि एजेंसियों को अब जिम्मेदारी से डरना नहीं चाहिए। उन्हें अपने काम की पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए, क्योंकि आज के समय में वही एजेंसियां टिकेंगी जो अपने नतीजों की ओनरशिप खुद लेती हैं और उसे मजबूती से निभाती हैं।

पिच जीतने में टैलेंट और इंटीग्रेशन

जब किसी कंपनी को कोई बड़ा विज्ञापन या मार्केटिंग प्रोजेक्ट मिलता है, तो उसे जीतने (pitch जीतने) में सिर्फ कम कीमत या सस्ता ऑफर देना सबसे अहम चीज नहीं है।

प्रशांत कुमार के अनुसार असली फर्क उस टीम के लोगों की काबिलियत (talent) से पड़ता है। यानी कौन लोग उस काम को कर रहे हैं, उनकी सोच, अनुभव और समझ कितनी मजबूत है, यही सबसे बड़ी ताकत होती है। लेकिन वे यह भी कहते हैं कि आज की दुनिया में टैलेंट खुद भी लगातार बदल रहा है, इसलिए उसे संभालना और अपडेट रखना एक बड़ी चुनौती भी है।

इसके साथ ही वे यह समझाते हैं कि अब मार्केटिंग इंडस्ट्री फिर से इस दिशा में जा रही है जहाँ अलग-अलग काम (जैसे क्रिएटिव, मीडिया, डेटा, टेक्नोलॉजी) को अलग-अलग टुकड़ों में नहीं देखा जा रहा, बल्कि सबको मिलाकर एक साथ समाधान देने पर जोर है।

उनका कहना है कि स्पेशलाइजेशन और इंटीग्रेशन को अलग-अलग विभागों की तरह नहीं देखना चाहिए, बल्कि उसे एक बड़े नतीजे (outcome) के हिसाब से समझना चाहिए, यानी ग्राहक को क्या फायदा मिला, यह सबसे अहम है।

वे एक आसान उदाहरण देते हैं कि जैसे एक ऑर्केस्ट्रा में कई अलग-अलग वाद्य यंत्र (instruments) अलग-अलग लोग बजाते हैं, लेकिन असली खूबसूरती तब बनती है जब सब मिलकर सही तालमेल में एक साथ संगीत बनाते हैं। इसी तरह मार्केटिंग में भी अलग-अलग विशेषज्ञ मिलकर काम करें तभी सबसे अच्छा रिजल्ट आता है।

क्लाइंट की तीन बड़ी प्राथमिकताएं

प्रशांत कुमार बता रहे हैं कि आज के समय में जो बड़े ब्रैंड्स के CEO और CMO होते हैं, वे मार्केटिंग फैसलों में तीन चीजों पर सबसे ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। पहली बात यह कि उन्हें आज ही ग्रोथ चाहिए, यानी अभी के अभी बिजनेस बढ़े और बिक्री (sales) में सुधार हो। दूसरी बात यह कि जो पैसा वे अभी विज्ञापन या मार्केटिंग में लगा रहे हैं, उससे उन्हें बेहतर performance और ज्यादा असर चाहिए, यानी हर रुपये का पूरा फायदा मिले। तीसरी बात यह कि वे सिर्फ आज के बारे में नहीं सोच रहे, बल्कि भविष्य के लिए भी खुद को तैयार करना चाहते हैं, ताकि आगे चलकर उनका ब्रैंड मजबूत स्थिति में रहे और प्रतिस्पर्धा में आगे बना रहे।

वे भारत को सिर्फ एक सामान्य बाजार नहीं, बल्कि एक बड़ा अवसर मानते हैं, जहाँ कंपनियां यह सोच रही हैं कि कैसे लगातार मांग (demand) बनाई जाए, आज बेहतर नतीजे कैसे मिलें और कल के लिए भी एक मजबूत बढ़त (edge) कैसे तैयार की जाए। इस वजह से मार्केटिंग पहले से ज्यादा जटिल हो गई है, क्योंकि अब कंपनियों को एक साथ आज का रिजल्ट भी चाहिए और भविष्य की तैयारी भी।

प्रशांत कुमार का मानना है कि इसका समाधान तभी निकल सकता है जब क्लाइंट, एजेंसी और बाकी पार्टनर्स मिलकर काम करें। अगर समस्या को शुरू में सही तरीके से समझ लिया जाए और पार्टनर्स को सही दिशा और आजादी दी जाए, तो बेहतर समाधान निकाले जा सकते हैं।

वे यह भी कहते हैं कि टेक्नोलॉजी, डेटा और कंटेंट अब अलग-अलग नहीं चल सकते, जब ये तीनों एक साथ आते हैं, तभी नए और बेहतर आइडिया और इनोवेशन पैदा होते हैं।

स्ट्रक्चरल प्रेशर के बीच ग्रोथ

WPP Media हाल के समय में कई नए बड़े और छोटे क्लाइंट्स जीतने में सफल रही है, और यह दिखाता है कि कंपनी बदलते हुए मार्केट के हिसाब से खुद को अच्छी तरह ढाल रही है।

प्रशांत कुमार यह बताते हैं कि कंपनी की रणनीति सिर्फ बड़े ब्रैंड्स पर निर्भर रहने की नहीं है, बल्कि वह छोटे और नए ग्राहकों पर भी उतना ही ध्यान देती है, क्योंकि आज का छोटा ग्राहक कल बड़ा बिजनेस बन सकता है। उनके लिए नया बिजनेस हासिल करना बिल्कुल नए ग्राहक जोड़ने जैसा है, जो भविष्य में बड़े अवसर बन सकता है।

लेकिन साथ ही वे यह भी स्वीकार करते हैं कि पूरी इंडस्ट्री कुछ मुश्किलों का सामना कर रही है। भले ही विज्ञापन पर खर्च लगातार बढ़ रहा है, लेकिन एजेंसियों को मिलने वाला मुनाफा उतना नहीं बढ़ रहा। खासकर डिजिटल दुनिया में, जहां कुछ बड़े प्लेटफॉर्म्स का दबदबा है, वहाँ एजेंसियों पर दबाव बना हुआ है।

साधारण भाषा में समझें तो हालात यह हैं कि मार्केट बड़ा हो रहा है और काम भी बढ़ रहा है, लेकिन उस काम से एजेंसियों को उतना फायदा नहीं मिल पा रहा जितना पहले मिलता था।

डिजिटल ड्यूपोली और डाइवर्सिफिकेशन

आज विज्ञापन का बहुत बड़ा हिस्सा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जा रहा है, लेकिन इसके साथ कुछ चिंताएं भी बढ़ गई हैं। जैसे कि कितना पैसा सही तरीके से खर्च हो रहा है, कितना विज्ञापन असली लोगों तक पहुंच रहा है, और कहीं धोखाधड़ी (ad fraud) तो नहीं हो रही।

प्रशांत कुमार मानते हैं कि मौजूदा सिस्टम में अच्छी और बुरी दोनों बातें हैं। बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के पास बहुत बड़ा स्केल और लगातार नए इनोवेशन की ताकत है, लेकिन उसी वजह से कुछ कंपनियों का बहुत ज्यादा दबदबा भी बन गया है। इसका असर यह होता है कि बाकी नए खिलाड़ी भी बीच-बीच में नए समाधान लेकर आते हैं और पूरा सिस्टम और भी प्रतिस्पर्धी हो जाता है।

वे यह भी जोर देते हैं कि इस पूरे डिजिटल इकोसिस्टम में लगातार नजर रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि चीजें बहुत तेजी से बदलती हैं। हर कुछ दिनों में नई टेक्नोलॉजी, नया प्लेटफॉर्म या नया तरीका सामने आ जाता है, इसलिए कंपनियों को हमेशा अपडेट रहना पड़ता है।

आगे वे बताते हैं कि अब सिर्फ पारंपरिक विज्ञापन ही नहीं, बल्कि commerce media (जहाँ विज्ञापन सीधे खरीदारी से जुड़ा होता है), connected TV और performance-based OTT जैसे नए क्षेत्र तेजी से बढ़ रहे हैं। ये सब मिलकर पूरे मीडिया सिस्टम को और ज्यादा फैला रहे हैं।

उनके अनुसार WPP Media की ग्रोथ का बड़ा हिस्सा अब इन नए और पारंपरिक न होने वाले क्षेत्रों से आ रहा है, जैसे कंटेंट, डेटा, एनालिटिक्स, ई-कॉमर्स और influencer marketing। और यह सिर्फ एक छोटा बदलाव नहीं है, बल्कि पूरी इंडस्ट्री के ढांचे (structure) में बड़ा बदलाव है।

अंत में उनका मतलब यह है कि अब एजेंसियां सिर्फ विज्ञापन दिखाने वाली कंपनियां नहीं रह गई हैं, बल्कि वे सीधे बिजनेस के नतीजों (business outcomes) से जुड़ रही हैं—यानी ब्रैंड को बिक्री, ग्रोथ और असली बिजनेस असर दिलाने पर ज्यादा फोकस कर रही हैं, सिर्फ व्यू या क्लिक जैसे पुराने मापदंडों पर नहीं।

इंटीग्रेशन एक स्ट्रेटेजिक जरूरत

WPP की वैश्विक (global) रणनीति अब इस दिशा में जा रही है कि अलग-अलग चीजों (जैसे डेटा, टेक्नोलॉजी और क्रिएटिविटी) को अलग-अलग काम न मानकर एक साथ जोड़कर काम किया जाए।

वे यह समझाते हैं कि अब सिर्फ बड़ी योजना बनाना काफी नहीं है, असली फर्क तब पड़ता है जब उसे जमीन पर सही तरीके से लागू किया जाए। इसलिए कंपनियां अब साझेदारी (partnership), मिलकर काम करने (co-creation) और एकीकृत (integrated) समाधान पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं, क्योंकि यहीं से असली बढ़त मिलती है।

वे यह भी कहते हैं कि भले ही मार्केट में कंपनियों के बीच मुकाबला और consolidation बढ़ रहा है, लेकिन उनका फोकस मार्केट शेयर की लड़ाई पर नहीं है, बल्कि इस बात पर है कि काम कितनी अच्छी तरह से किया जा रहा है। क्योंकि आज जो समाधान काम कर रहा है, वह जरूरी नहीं कि कल भी उतना ही प्रभावी रहेगा।

इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग को लेकर उनका नजरिया यह है कि यह बहुत तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसे वे अकेला समाधान नहीं मानते। उनके अनुसार यह मार्केटिंग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो आगे भी बदलता रहेगा और ब्रैंड्स के साथ लोगों को जोड़ने में मदद करेगा, लेकिन इसका तरीका समय के साथ विकसित होता रहेगा।

सबसे बड़ा बदलाव वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को मानते हैं। उनके अनुसार AI पहले से ही पूरी इंडस्ट्री को बदल रहा है- योजना बनाने से लेकर काम करने और उसे बेहतर करने तक हर जगह इसका असर दिख रहा है।

वे यह भी कहते हैं कि AI का असली फायदा सिर्फ काम को तेज करना नहीं है, बल्कि जो समय बचता है उसका उपयोग बेहतर क्वालिटी और बेहतर सोच के लिए करना है। यानी भविष्य में एजेंसियों की असली पहचान इस बात से होगी कि वे कितना तेज काम करती हैं, उससे ज्यादा इस बात से होगी कि वे कितना बेहतर परिणाम दे रही हैं।

लीडरशिप: ओनरशिप और ह्यूमिलिटी

प्रशांत कुमार जिस तरह से कंपनी चलाते हैं, वही सोच उनकी लीडरशिप फिलॉसफी में भी दिखती है। वे मानते हैं कि किसी भी काम में सबसे जरूरी चीज है जिम्मेदारी लेना (ownership)। उनका साफ कहना है कि अगर कोई व्यक्ति अपने काम की जिम्मेदारी नहीं ले रहा, तो वह अपना समय सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर रहा। उनके अनुसार हर व्यक्ति को यह सोचना चाहिए कि वह टीम और कंपनी में क्या योगदान दे सकता है, और उसी पर ध्यान देना चाहिए।

वे यह भी कहते हैं कि काम करते हुए इंसान को अपनी असली पहचान बनाए रखनी चाहिए, और साथ ही लगातार सीखते रहना चाहिए। मेहनत का मजा लेना भी जरूरी है, लेकिन उसी के साथ लोगों को बेहतर करने के लिए प्रेरित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

आगे की सोच की बात करें तो वे चाहते हैं कि उनकी कंपनी लगातार आगे बढ़ती रहे और बदलते समय के साथ खुद को अपडेट करती रहे। उनका फोकस इस बात पर है कि ग्राहकों के लिए बेहतर नतीजे दिए जाएं, भविष्य के लिए तैयार टैलेंट तैयार किया जाए, और ऐसा काम किया जाए जो इंडस्ट्री में नया मानक (benchmark) बनाए।

वे यह भी साफ कहते हैं कि उनकी कोशिश सिर्फ बड़े होने या स्केल बढ़ाने की नहीं है, बल्कि हर व्यक्ति और पूरी टीम दोनों स्तर पर जीत हासिल करने की है। उनके अनुसार लक्ष्य यह है कि लगातार नया और बेहतर काम किया जाए, नए मॉडल बनाए जाएं और बिजनेस को देखने के तरीके को भी बदला जाए।

अंत में उनका पूरा संदेश यह है कि इस बदलती हुई इंडस्ट्री में सफलता सिर्फ बड़े आकार (scale) से नहीं मिलती, बल्कि इस बात से मिलती है कि कंपनी कितनी जिम्मेदारी से काम कर रही है, कितनी relevant बनी हुई है और कितनी अच्छी तरह असली बिजनेस समस्याओं को हल कर रही है।

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CMO को CEO की तरह सोचना होगा, साथ ही CFO जैसी समझ भी जरूरी: हर्ष राजदान

एक विस्तृत बातचीत में, डेंट्सू के साउथ एशिया के सीईओ हर्ष राजदान ने डॉ. अनुराग बत्रा से एजेंसी के काम करने के तरीके, अलग-अलग सर्विसेज को एक साथ देने की रणनीति, AI और अन्य कई मुद्दों पर बात की।

Last Modified:
Tuesday, 28 April, 2026
HarshRazdan5648

देश में बड़ी ऐडवर्टाइजिंग होल्डिंग कंपनियों के बहुत कम CEO ऐसे होते हैं जो बिना पूछे यह कह दें कि उनकी सबसे बड़ी टक्कर किसी दूसरी एजेंसी नेटवर्क से नहीं, बल्कि उसी को-वर्किंग स्पेस में दो फ्लोर नीचे बैठे किसी स्टार्टअप से है। डेंट्सू साउथ एशिया के सीईओ हर्ष राजदान ऐसे ही लीडर्स में से एक हैं। BW बिजनेसवर्ल्ड व एक्सचेंज4मीडिया के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ एक लंबी बातचीत में, हर्ष राजदान ने 'डेंट्सू इंडिया' को दोबारा खड़ा करने में बिताए तीन सालों का खुलकर जिक्र किया और बताया कि वह इसे एक अलग पहचान के साथ आगे ले जाना चाहते हैं।

हर्ष राजदान ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री से नहीं, बल्कि कंसल्टिंग बैकग्राउंड से आए हैं। उन्होंने Accenture में कई साल टेक्नोलॉजी से जुड़े बदलावों पर काम किया। उनका मानना है कि इसी अनुभव ने 'डेंट्सू इंडिया' की जरूरतों को समझने में उनकी सोच को आकार दिया।

उन्होंने बताया, “जब मैं कंपनी में आया, तो पहला काम डेंट्सू को स्थिर करना था, क्योंकि कुछ समय तक हमारे पास CEO नहीं था और माहौल थोड़ा अनिश्चित था। इसलिए कंपनी और लोगों में स्थिरता और भरोसा लाना जरूरी था।” दूसरा फोकस था ग्रोथ बढ़ाना और तीसरा फेज था कंपनी को दूसरों से अलग बनाना (differentiation), लेकिन इसमें AI ने बड़ा बदलाव ला दिया। AI सबसे बड़ा डिसरप्शन रहा है। इसने मेरे तीसरे साल के टारगेट्स को पूरी तरह बदल दिया और दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया।”

एक टीम, एक बिजनेस और एक ही कमाई-खर्च का हिसाब (One dentsu, one P&L)

हर्ष राजदान 'डेंट्सू' में सबसे बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव “One dentsu ऑपरेटिंग मॉडल” के रूप में किया। इसके तहत 2024 से कंपनी के टॉप 75 क्लाइंट्स को एक ही P&L (यानी एक ही कमाई-खर्च के हिसाब) के तहत लाया गया और उनके लिए अलग-अलग डेडिकेटेड टीमें बनाई गईं, जिनका प्रदर्शन भी एक साथ आंका जाता है।

यह आइडिया उन्हें किसी रिपोर्ट या इंटर्नल ऑडिट से नहीं मिला, बल्कि उन्होंने खुद 50–60 CEOs से सीधे मिलकर समझा। उन्होंने कहा, “अगर आप उनसे सीधे नहीं मिलते, तो सही फीडबैक नहीं मिलता। हमें समझ आया कि हम अपनी सर्विस बेचने की कोशिश कर रहे थे, क्लाइंट की समस्या समझने की नहीं और क्लाइंट का सवाल था- “क्या मेरा बिजनेस बढ़ेगा?”

यही सोच बदलकर (सर्विस बेचने से हटकर क्लाइंट की ग्रोथ की समस्या सुलझाने तक) अब dentsu की पूरी रणनीति बन गई है। इसी वजह से टैलेंट स्ट्रैटेजी भी अलग है। कंपनी ने अलग-अलग इंडस्ट्री से टैलेंट भी हायर किया है- जैसे अब 'डेंट्सू इंडिया' में BFSI हेड पहले Bain & Company में थे, कंज्यूमर और इंडस्ट्रियल लीड Big Four से हैं और हायरिंग Amazon और Flipkart से हो रही है।

हर्ष राजदान कहते हैं, “हमने क्लाइंट से पूछा- आप पिच किसे देंगे? उन्होंने कहा- उस व्यक्ति को जो बिजनेस की भाषा बोल रहा था। बाकी सब एक जैसे थे, लेकिन वह अलग था।” सीधे शब्दों में कहें तो रजदान के मुताबिक, पिच जीतने का फर्क क्रिएटिव से नहीं पड़ता, बल्कि इस बात से पड़ता है कि कौन क्लाइंट से “बिजनेस की भाषा” में बात कर रहा है। जो CEO की तरह सोचकर बात करता है, वही आगे निकलता है।

फिर लौटा बंडलिंग ट्रेंड

पहले इंडस्ट्री में ट्रेंड था कि एजेंसी की अलग-अलग सर्विसेज (जैसे- media, creative, PR, data और technology) को अलग-अलग कंपनियों में बांट दिया जाए (इसे unbundling कहते हैं)। लेकिन अब यह ट्रेंड वापस बदल रहा है। हर्ष राजदान का कहना है कि अब फिर से “बंडलिंग” यानी सारी सर्विसेज एक ही जगह से देने का दौर लौट रहा है, लेकिन फर्क यह होगा कि उस एक सेटअप के अंदर अलग-अलग स्पेशलिस्ट्स मौजूद होंगे।

‘One dentsu’ मॉडल इसी सोच पर आधारित है, जहां बड़े क्लाइंट चाहते हैं कि उन्हें सारी सर्विस एक ही भरोसेमंद पार्टनर से मिले। हालांकि छोटे क्लाइंट, जिनका बजट कम होता है या जिनकी जरूरतें अलग होती हैं, वे अभी भी अलग-अलग एजेंसियों के साथ काम कर सकते हैं।

हर्ष राजदान बोले, “भारत तेजी से बढ़ रहा है, इसलिए दोनों मॉडल साथ-साथ चलते रहेंगे। अगले 20–25 साल तक ग्रोथ रुकने वाली नहीं है।”

इंडस्ट्री के आंकड़े भी यही दिखाते हैं। 'एक्सचेंज4मीडिया-डेंट्सू डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट' के अनुसार भारत का विज्ञापन खर्च (AdEx) लगातार बढ़ रहा है और कुल विज्ञापन खर्च करीब ₹1,75,000 करोड़ तक पहुंच गया है और डिजिटल का हिस्सा लगातार बढ़ रहा है। फिर भी एजेंसियां उसी रफ्तार से नहीं बढ़ रहीं।

हर्ष राजदान कहते हैं कि खासकर क्रिएटिव साइड पर थोड़ी चुनौती है और असली सवाल यह है कि क्या एजेंसियां क्लाइंट को सच में वैल्यू दे रही हैं? उनके मुताबिक, अगर एजेंसियां खुद को बदलने के लिए तैयार नहीं होंगी, तो पीछे रह जाएंगी।

उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ पारंपरिक प्रतिस्पर्धा (दूसरी एजेंसियां) को देखकर नहीं चलना चाहिए, क्योंकि असली खतरा उन छोटे स्टार्टअप्स से है जो तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और बड़ी कंपनियों को पीछे छोड़ सकते हैं।

जापान कनेक्शन और भारत की भूमिका

डेंट्सू की भारत में जो शुरुआत हुई, उसमें जापान का बड़ा रोल रहा। Sony, Toyota जैसे जापानी क्लाइंट्स के साथ मजबूत रिश्तों ने डेंट्सू को भारत में खड़ा होने में मदद की। लेकिन इसका एक नुकसान भी था- कंपनी का फोकस कहीं ज्यादा जापानी क्लाइंट्स पर ही न टिक जाए। आज डेंट्सू इंडिया की कुल कमाई में जापानी क्लाइंट्स का हिस्सा करीब 14–15% है।

हर्ष राजदान के मुताबिक, 2020 से 2022 के बीच कंपनी की पकड़ थोड़ी कमजोर हुई थी, लेकिन अब वह फिर से मजबूत वापसी कर चुकी है। इसमें नए ग्लोबल CEO Takeshi Sano की भी अहम भूमिका रही, जो खुद भारत आकर जापानी क्लाइंट्स से मिले हैं। उम्मीद है कि आने वाले समय में यह सेगमेंट और तेजी से बढ़ेगा।

लेकिन असली कमाई (65–70%) भारतीय क्लाइंट्स से आती है। इसीलिए डेंट्सू ने Tata, Reliance और Adani जैसे बड़े भारतीय ग्रुप्स के लिए अलग-अलग रिलेशनशिप मैनेजर्स तय किए हैं- ठीक वैसे ही जैसे बड़ी FMCG या कंसल्टिंग कंपनियां करती हैं।

हर्ष रजदान का कहना है कि भारतीय क्लाइंट्स बेहद अहम हैं और यहां लगातार नए मौके तलाशते रहना जरूरी है।

AI खतरा नहीं, बल्कि साथी

हर्ष राजदान का कहना है कि आज की एजेंसी स्ट्रैटेजी में AI को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका साफ मानना है कि AI काम को बेहतर और तेज बनाता है (optimise करता है), जबकि असली नए आइडिया और बदलाव इंसान लाते हैं।

उनके मुताबिक जीत उसी की होगी जो AI को सही तरीके से इस्तेमाल करना सीख जाएगा, न कि उससे डरने लगेगा। टीम के अंदर जॉब सिक्योरिटी या IP को लेकर जो डर है, उसे वह समझते हैं, लेकिन उनका मानना है कि असली खतरा जल्दी चलने में नहीं, बल्कि धीमे चलने में है।

इसीलिए 'डेंट्सू इंडिया' में AI और ओपन-सोर्स टीम सीधे उन्हें रिपोर्ट करती है, ताकि फैसले तेजी से हो सकें। उनका कहना है कि इतनी बड़ी कंपनी में बदलाव तभी होता है जब वह ऊपर से लीड किया जाए।

उन्होंने यह भी कहा कि अपनी ही टेक्नोलॉजी (tools) बहुत ज्यादा बनाने के बजाय मार्केट में जो अच्छा है, उसका इस्तेमाल करना ज्यादा समझदारी है, क्योंकि टेक्नोलॉजी बहुत तेजी से बदलती है और जल्दी आउटडेटेड हो सकती है।

जहां तक क्लाइंट्स का सवाल है, उन्होंने बताया कि AI स्टार्टअप्स तेजी और इनोवेशन देते हैं, लेकिन उनमें रिस्क भी होता है (जैसे बंद हो जाना या डेटा/IP का खतरा)। वहीं बड़ी एजेंसियों पर भरोसा इसलिए किया जाता है क्योंकि वे ब्रैंड को सुरक्षित और सही तरीके से संभालती हैं।

कुल मिलाकर AI का सही बैलेंस, स्पीड और भरोसे के साथ, ही आगे जीत दिलाएगा।

स्पोर्ट्स, एक्सपीरिएंशियल और नए दांव

हर्ष राजदान के कार्यकाल में 'डेंट्सू इंडिया' ने कुछ नई सर्विसेज शुरू की हैं, जिनमें स्पोर्ट्स और एंटरटेनमेंट पर खास फोकस है। जापान में 'डेंट्सू' की स्पोर्ट्स दुनिया (जैसे फुटबॉल, Olympic Games और anime) में मजबूत पकड़ है, इसलिए यह भारत में भी एक बड़ा मौका माना जा रहा है।

लेकिन हर्ष रजदान का नजरिया थोड़ा अलग है। उनका कहना है कि फोकस सिर्फ क्रिकेट पर नहीं होना चाहिए, बल्कि esports, e-motor racing और गेमिंग जैसे नॉन-क्रिकेट क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, क्योंकि वहां अभी काफी ग्रोथ की गुंजाइश है। इसी वजह से उन्होंने इस वर्टिकल को संभालने के लिए एक जापानी एक्सपर्ट को जिम्मेदारी दी है, ताकि ग्लोबल अनुभव को भारत में लाया जा सके।

इसके साथ ही, लाइव इवेंट्स और experiential marketing (यानी लोगों को ब्रैंड का असली अनुभव देना) भी उनकी रणनीति का बड़ा हिस्सा है। जैसे-जैसे AI और टेक्नोलॉजी बढ़ रही है, वैसे-वैसे इंसानी अनुभव (human touch) की वैल्यू भी बढ़ रही है। यह ट्रेंड होटल इंडस्ट्री, कॉन्सर्ट्स और ब्रैंड इवेंट्स में साफ दिख रहा है।

हर्ष रजदान कहते हैं, “आज के समय में लाइव इवेंट्स खुद एक बड़ा मौका बन चुके हैं। अगर कोई ब्रैंड इन्हें नजरअंदाज कर रहा है, तो वह एक बड़ा फायदा खो रहा है।”

CMO को CFO की तरह सोचना होगा

हर्ष राजदान का का कहना है कि आज CMO (Chief Marketing Officer) की भूमिका बदल रही है और उसे भी अपने सोचने का तरीका बदलना होगा। अभी ज्यादातर क्लाइंट ब्रीफ ऐसे बनते हैं जैसे कोई सर्विस खरीद रहे हों- यानी फोकस “क्या खरीदना है” पर होता है, न कि “बिजनेस कैसे बढ़ेगा” पर।

हर्ष रजदान के मुताबिक, अगर CMO CEO की तरह सोचें और CFO की तरह पैसों को समझदारी से खर्च करें (यानी हर खर्च का मकसद ग्रोथ हो), तो ब्रीफ्स ज्यादा बेहतर और असरदार बनेंगे।

वह मानते हैं कि जो सफल CMO हैं, वे पहले ही इस दिशा में बदल रहे हैं। वे सिर्फ मार्केटिंग नहीं, बल्कि पूरे बिजनेस की जिम्मेदारी जैसा काम कर रहे हैं, ठीक CEO की तरह।

उन्होंने यह भी कहा कि इंडस्ट्री को आगे बढ़ाने के लिए सिर्फ एजेंसियों का बेहतर होना काफी नहीं है, क्लाइंट्स (मार्केटर्स) को भी बदलना होगा। अगर मार्केटर्स सिर्फ छोटे-छोटे कामों तक सीमित रहेंगे, तो एजेंसियां चाहकर भी ज्यादा वैल्यू नहीं दे पाएंगी।

यानी सीधी बात करते हुए उन्होंने कहा कि ग्रोथ तभी आएगी जब एजेंसी और क्लाइंट- दोनों साथ मिलकर बड़े और स्मार्ट तरीके से सोचेंगे।

अगले 18 महीने 

हर्श राजदान से जब पूछा गया कि अगले एक से डेढ़ साल में 'डेंट्सू इंडिया' से क्या उम्मीद की जाए, तो उनका जवाब काफी साफ और ईमानदारी से भरा था। उन्होंने कहा कि आज AI और टेक्नोलॉजी इतनी तेजी से बदल रही है कि वह तीन साल का प्लान भी साफ-साफ नहीं बता सकते कि वह अभी सिर्फ 6–8 महीने आगे तक ही सोच पा रहे हैं।

इस छोटे समय में उनका फोकस क्या है? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि कंपनी की डबल डिजिट ग्रोथ जारी रखना (जो पिछले 2–3 साल से हो रही है), नई सर्विसेज को और मजबूत करना, बाहर से टैलेंट लाकर टीम को और बेहतर बनाना साथ ही 'डेंट्सू इंडिया' को ग्लोबल मॉडल बनाना।

उन्होंने यह भी कहा कि जापान अब भारत को “India out” मॉडल के रूप में देख रहा है, यानी भारत में जो कामयाब मॉडल बन रहा है, उसे दूसरे देशों में भी अपनाया जा सकता है। मतलब, 'डेंट्सू इंडिया' अब सिर्फ भारत की ग्रोथ स्टोरी नहीं है, बल्कि पूरी ग्लोबल कंपनी के लिए एक उदाहरण बन सकती है।

अंत में रजदान ने कहा कि जब भविष्य में नई एजेंसी मॉडल की “किताब” लिखी जाएगी, तो वह चाहते हैं कि डेंट्सू उसका एक अहम हिस्सा हो। यानी उनका साफ इरादा है कि 'डेंट्सू इंडिया' इंडस्ट्री में एक नया रास्ता दिखाए।

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डिजिटल दौर में भी TV की अहमियत बरकरार, ‘क्रेडिबिलिटी’ ही असली ताकत: राहुल शिवशंकर

डिजिटल युग में टेलीविजन न्यूज की भूमिका, AI की एंट्री और पत्रकारिता की विश्वसनीयता जैसे अहम मुद्दों पर CNN-News18 के एडिटोरियल अफेयर्स डायरेक्टर राहुल शिवशंकर ने समाचार4मीडिया से विस्तार से बात की।

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Friday, 17 April, 2026
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डिजिटल युग में टेलीविजन न्यूज की भूमिका, बदलते न्यूज कंजम्प्शन पैटर्न, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की एंट्री और पत्रकारिता की विश्वसनीयता जैसे अहम मुद्दों पर CNN-News18 के एडिटोरियल अफेयर्स डायरेक्टर राहुल शिवशंकर ने समाचार4मीडिया से विस्तार से बात की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के चुनिंदा अंश:

आपने हाल ही में CNN-News18 में एडिटोरियल अफेयर्स डायरेक्टर की जिम्मेदारी संभाली है। न्यूज रूम को लेकर आपकी प्राथमिकताएं क्या हैं?

मेरे लिए इस समय तीन चीजें सबसे अहम हैं। पहली—ग्रोथ, क्योंकि हर न्यूज रूम को बदलते मीडिया माहौल में प्रासंगिक और प्रतिस्पर्धी बने रहना होता है। दूसरी—क्रेडिबिलिटी, जिसे बहुत ही गंभीरता से सुरक्षित रखना जरूरी है। और तीसरी—इम्पैक्ट, यानी खबरें सिर्फ सूचना न होकर किसी न किसी स्तर पर प्रभाव भी डालें।

ये तीनों चीजें एक-दूसरे से जुड़ी हैं। बिना क्रेडिबिलिटी के इम्पैक्ट नहीं हो सकता और बिना इम्पैक्ट के ग्रोथ नहीं। यही मेरा काम करने का फ्रेमवर्क है। साथ ही हम एक लेगेसी ब्रैंड हैं और CNN के साथ जुड़े हैं, इसलिए जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

टीवी न्यूज की प्रस्तुति को लेकर अक्सर कहा जाता है कि यह कभी-कभी कंटेंट से ज्यादा ‘लाउड’ हो जाती है। आप इसे कैसे देखते हैं?

इस सवाल को हमें उस देश के संदर्भ में देखना चाहिए जिसमें हम रहते हैं। भारत एक बहुत ही अभिव्यक्तिपूर्ण लोकतंत्र है। यहां बहुत कुछ एक साथ घटता है और कई बार अपनी बात रखने के लिए तेज आवाज जरूरी हो जाती है। हमारा लोकतंत्र अक्सर बहसों और चर्चाओं से भरा होता है, जैसे संसद में भी होता है—जहां शोर भी है और महत्वपूर्ण काम भी। यही सार्वजनिक जीवन की वास्तविकता है। हालांकि, फर्क समझना जरूरी है—अपनी बात रखने के लिए बोलना और किसी को दबाने के लिए चिल्लाना, दोनों अलग चीजें हैं। संतुलन यहीं जरूरी है। कुछ समय टीवी न्यूज ने यह सीमा पार की है, लेकिन समय के साथ सुधार भी हुआ है।

क्या यह बदलाव इस वजह से भी है कि भारत में टीवी न्यूज अभी अपेक्षाकृत नई इंडस्ट्री है?

बिल्कुल। पश्चिमी देशों में लाइव टीवी और टॉक रेडियो दशकों से मौजूद हैं, इसलिए वहां मीडिया ने समय के साथ खुद को विकसित किया। भारत में प्राइवेट टीवी न्यूज इंडस्ट्री सिर्फ लगभग 25 साल पुरानी है। उससे पहले मुख्य रूप से सरकारी प्रसारण था। जब निजी चैनल आए तो तेजी से विस्तार हुआ और प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी, जिससे कई बार अतिशयोक्ति के दौर आए और फिर सुधार हुआ। यह एक प्राकृतिक विकास प्रक्रिया है और हम अभी भी सीख रहे हैं।

आज के डिजिटल युग में ‘प्राइम टाइम’ की अवधारणा कितनी बदल गई है?

प्राइम टाइम की परिभाषा अब पूरी तरह बदल चुकी है। पहले यह एक तय समय स्लॉट होता था और उसी से लोकप्रियता जुड़ी होती थी। लेकिन अब कोई भी कंटेंट किसी भी समय वायरल हो सकता है। यूट्यूब या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लोग बिना वर्षों के अनुभव के भी बड़ा ऑडियंस बना सकते हैं। इसलिए अब मेरा मानना है—हर समय प्राइम टाइम है। हर पल महत्वपूर्ण है क्योंकि हर चीज क्लिप होकर डिजिटल दुनिया में पहुंच सकती है।

क्या अब क्रेडिबिलिटी, सीनियरिटी से ज्यादा अहम हो गई है?

बिल्कुल। क्रेडिबिलिटी उम्र या अनुभव से तय नहीं होती। कोई 30 साल काम करके भी भरोसा नहीं जीत सकता अगर वह तथ्यों के साथ लापरवाह हो। वहीं, कोई युवा पत्रकार भी सटीकता और गंभीरता से काम करके भरोसा बना सकता है। असली फर्क इसी में है कि दर्शक आप पर भरोसा करता है या नहीं।

तेज रफ्तार न्यूज साइकिल में आपके लिए क्या ज्यादा अहम है—स्पीड या सटीकता?

स्पीड जरूरी है, लेकिन कभी भी सटीकता की कीमत पर नहीं। मैं व्यक्तिगत रूप से ‘पहले आने’ पर ज्यादा जोर नहीं देता। अगर आपके पास एक्सक्लूसिव है तो आप वैसे भी पहले होंगे। लेकिन अगर जानकारी अस्थिर है, तो मैं इंतजार करना पसंद करूंगा। गलत खबर जल्दी देने से बेहतर है सही खबर थोड़ी देर से देना। अंत में दर्शक उसी पर भरोसा करते हैं जो तथ्यात्मक रूप से मजबूत हो।

क्या इंग्लिश टीवी न्यूज को खुद को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है?

हां, बिल्कुल। अब दर्शक ज्यादा ‘रियल’ और कम प्रोसेस्ड न्यूज चाहते हैं। बहुत ज्यादा एडिटेड या बनावटी कंटेंट का असर कम होता जा रहा है। साथ ही, न्यूज सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रह सकती। अब लोग सामाजिक मुद्दों, जीवन से जुड़ी कहानियों और अलग-अलग विषयों में भी रुचि रखते हैं। टीवी को इस बदलाव के साथ खुद को अपडेट करना होगा।

न्यूज रूम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) फील्ड रिपोर्टिंग की जगह नहीं ले सकता। ग्राउंड पर मौजूद रिपोर्टर की समझ और अनुभव को AI रिप्लेस नहीं कर सकता। लेकिन न्यूज रूम में यह बहुत उपयोगी है—जैसे ट्रांसलेशन, रिसर्च, स्क्रिप्टिंग और प्रोसेसिंग में। यह एक ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ की तरह काम कर सकता है। हालांकि अंतिम जिम्मेदारी हमेशा इंसानों की होगी, क्योंकि तथ्य, संदर्भ और विश्लेषण की समझ AI अभी नहीं दे सकता।

क्या टीवी न्यूज का प्रभाव कम हो रहा है?

नहीं, बल्कि कई मायनों में यह आज भी बेहद प्रभावशाली है। डिजिटल दुनिया में शोर बहुत ज्यादा है—यूट्यूब, सोशल मीडिया, फॉरवर्ड्स, हर जगह जानकारी है। ऐसे में लेगेसी न्यूज ब्रैंड्स की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है, क्योंकि वे फैक्ट-चेक, वेरिफिकेशन और जवाबदेही के साथ काम करते हैं। यही टीवी न्यूज की असली ताकत है।

क्या आज मीडिया पर्सनैलिटी-ड्रिवन हो गया है?

हां, लेकिन यह सिर्फ टीवी तक सीमित नहीं है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी लोग पर्सनैलिटी को फॉलो करते हैं। लेकिन बिना क्रेडिबिलिटी के कोई भी पर्सनैलिटी लंबे समय तक नहीं टिकती। अंत में दर्शक यह देखते हैं कि आप भरोसेमंद हैं या नहीं।

आपके अनुसार एक सफल न्यूज ब्रैंड की सबसे बड़ी ताकत क्या होगी?

क्रेडिबिलिटी, क्रेडिबिलिटी और क्रेडिबिलिटी। यही सबसे महत्वपूर्ण है। अब दर्शक सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं चाहते, वे समझना चाहते हैं कि असल में क्या हो रहा है। जो न्यूज ब्रैंड तथ्य, भरोसे और पारदर्शिता के साथ काम करेगा, वही आगे सफल होगा। 

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AI और डिजिटल के दौर में एजेंसियों पर संकट, बोले संदीप गोयल- ‘खेल पूरी तरह बदल चुका है’

बिजनेसवर्ल्ड ग्रुप और एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ रेडिफ्यूजन के मैनेजिंग डायरेक्टर संदीप गोयल ने तमाम अहम मुद्दों पर खुलकर बात की।

Last Modified:
Saturday, 11 April, 2026
Sandeep Goyal

भारतीय ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री में बहुत कम लोग ऐसे हैं जिन्होंने इस सिस्टम के अंदर रहकर भी काम किया हो और बाहर से भी इसे समझा हो। बहुत ही कम लोगों ने बड़ी एजेंसियों को चलाया है, उन्हें बेचा है, टेक्नोलॉजी कंपनियां बनाई हैं, आर्ट कलेक्ट किया है, किताबें लिखी हैं और फिर दोबारा इस फील्ड में लौटे हैं- वो भी मजबूरी में नहीं, बल्कि अपने काम के प्रति प्यार की वजह से।

'रेडिफ्यूजन ब्रैंड सॉल्यूशंस' के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. संदीप गोयल ऐसे ही लोगों में से एक हैं। 'BW बिजनेसवर्ल्ड' के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ एक लंबी बातचीत में, गोयल ने बिना किसी लाग-लपेट के एजेंसी बिजनेस की हालत, प्लेटफॉर्म्स का दबदबा, बड़े आइडिया का खत्म होना और चार दशक तक इस इंडस्ट्री में टिके रहने के असली फॉर्मूले पर खुलकर बात की।

एजेंसियों पर सीधी राय: साफ-साफ और तथ्यों के साथ

बातचीत की शुरुआत सीधे मुद्दे से हुई। 'पिच मैडिसन ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट' के मुताबिक, भारत की ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री 2025 तक 1.5 लाख करोड़ रुपये के पार जाने वाला है। यानी पैसे बढ़ रहे हैं, लेकिन एजेंसियां उस हिसाब से नहीं बढ़ रहीं। संदीप गोयल ने साफ कहा, “सीधी बात ये है कि आज के समय में जैसा विज्ञापन का बिजनेस हम जानते हैं, वो खत्म हो चुका है।” उन्होंने कहा कि जिस तरह हम विज्ञापन को समझते हैं, जहां क्लाइंट एजेंसियों को पैसे देते हैं, वो मॉडल अब धीरे-धीरे नए प्लेटफॉर्म्स की तरफ जा रहा है। यानी एजेंसियां खत्म हो सकती हैं, लेकिन Google और Meta जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स बचेंगे।

संदीप गोयल ने साफ कहा, “सीधा जवाब है- आज के समय में ऐडवर्टाइजिंग बिजनेस खत्म हो चुका है।” 

यह बदलाव पहले ही शुरू हो चुका है। GroupM के अनुमान के मुताबिक, आज भारत में कुल विज्ञापन खर्च का करीब 70% डिजिटल पर जा रहा है, जो पांच साल पहले सिर्फ 15-20% था। पारंपरिक एजेंसी मॉडल- जो रिटेनर, कमीशन और लंबे रिश्तों पर चलता था- अब कमजोर पड़ चुका है। पैसा प्लेटफॉर्म्स के पास चला गया है और एजेंसियां अब बचा-खुचा पाने के लिए संघर्ष कर रही हैं।

संदीप गोयल ने खासतौर पर क्रिएटिव बिजनेस की हालत पर चिंता जताई। उन्होंने कहा, “एजेंसियों की कमाई नहीं बढ़ रही है। क्रिएटिव काम, जो रिटेनर पर चलता है, सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। अब ज्यादा से ज्यादा क्लाइंट रिटेनर सिस्टम से दूर जाना चाहते हैं।”

उन्होंने WPP के नए मॉडल का जिक्र किया, जिसमें काम के रिजल्ट के आधार पर पेमेंट की बात हो रही है। गोयल का मानना है कि इससे एजेंसियों की मुश्किलें और बढ़ेंगी। उन्होंने कहा, “ये बदलाव हमारे जीवनकाल में ही होगा और इससे एजेंसियों का अंत और तेज हो जाएगा। एजेंसियां इस तरह के बदलाव के लिए न सोच के स्तर पर तैयार हैं, न ही फिलॉसफी के स्तर पर।”

Google सर्च और AI का असर- क्या बदल रहा है?

अगर विज्ञापन एजेंसियों का पारंपरिक मॉडल कमजोर हो रहा है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म पूरी तरह सुरक्षित हैं। उन पर भी बदलाव और खतरे का असर पड़ सकता है। संदीप गोयल का कहना है कि AI के दौर को लेकर जो बातें हो रही हैं, उनमें बहुत शोर है, लेकिन असली बात यह है कि यह बदलाव गहरा और बड़ा है।

संदीप गोयल एक उदाहरण देकर समझाते हैं। वे कहते हैं कि पहले वे क्लाइंट्स से पूछते थे कि दुनिया की सबसे महंगी “जगह” कौन सी है, और जवाब होता था- Google का सर्च बार, क्योंकि वहीं से सबसे ज्यादा विज्ञापन का पैसा आता था। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। लोग अब सर्च कम कर रहे हैं और सीधे सवाल पूछ रहे हैं। और जब वे सवाल पूछते हैं, तो जरूरी नहीं कि वे Google पर ही जाएं, वे ChatGPT, Gemini, Anthropic या Perplexity जैसे AI टूल्स का इस्तेमाल कर सकते हैं। यानी Google की जो 20 साल से सर्च पर पकड़ थी, वही अब कमजोर पड़ सकती है, क्योंकि अगर लोग सर्च ही कम करेंगे, तो उसका पूरा बिजनेस मॉडल प्रभावित होगा।

संदीप गोयल की यह बात सिर्फ राय नहीं है, बल्कि आंकड़े भी इसे सही ठहराते हैं। McKinsey की 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, AI के जरिए जानकारी ढूंढना और सवाल-जवाब करना बहुत तेजी से बढ़ रहा है। इसका मतलब यह है कि पारंपरिक सर्च की जगह अब बातचीत वाले AI सिस्टम ले रहे हैं। इससे सिर्फ Google ही नहीं, बल्कि उसके आसपास बना पूरा डिजिटल विज्ञापन सिस्टम भी प्रभावित हो सकता है। इसलिए गोयल का कहना है कि बड़े प्लेटफॉर्म्स को भी यह नहीं मान लेना चाहिए कि वे हमेशा सुरक्षित रहेंगे।

डेंट्सु के दिन: सही समय पर सही दांव

रेडिफ्यूजन और अपने खुद के बिजनेस से पहले, संदीप गोयल के करियर के आठ साल ऐसे थे जिन्हें वह अपने प्रोफेशनल जीवन का सबसे बेहतरीन समय मानते हैं। इस दौरान उन्होंने Dentsu के साथ मिलकर भारत में एक बहुत मजबूत और प्रभावशाली एजेंसी खड़ी की, जो इंडस्ट्री में अलग पहचान रखती थी।

2003 में उन्होंने देखा कि दुनिया की टॉप 20 कंपनियों में से 9 जापान की थीं। उन्होंने सोचा कि बाकी मार्केट पर ध्यान देने के बजाय जापानी कंपनियों पर पूरा फोकस किया जाए। इसके लिए उन्होंने हर जापानी क्लाइंट के साथ एक जापानी लीडर जोड़ा, ताकि भाषा और काम करने के तरीके को बेहतर समझा जा सके। इससे क्लाइंट की जरूरत समझना आसान हो गया और उसे भारतीय दर्शकों के हिसाब से ढालना भी सरल हो गया। इस रणनीति की वजह से उन्होंने भारत में जापानी कंपनियों के बिजनेस का लगभग 90% हिस्सा अपने पास कर लिया। उनके क्लाइंट्स की लिस्ट में Toyota, Honda, Suzuki, Sony, Panasonic और Yamaha जैसी बड़ी कंपनियां शामिल थीं।

Dentsu के साथ काम करते समय गोयल ने बड़े-बड़े जोखिम लिए, जो उस समय भारतीय विज्ञापन इंडस्ट्री में बहुत कम देखने को मिलते थे। 2005-06 में उन्होंने क्रिकेट वर्ल्ड कप और चैंपियंस ट्रॉफी का पूरा विज्ञापन समय Sony पर 500 करोड़ रुपये में खरीद लिया। जब भारत टूर्नामेंट से जल्दी बाहर हो गया, तो यह फैसला गलत लगने लगा। लेकिन 2008 में IPL शुरू हुआ और स्थिति बदल गई। उन्होंने IPL के पहले सीजन के हर मैच में 800 सेकंड से ज्यादा विज्ञापन समय खरीदा, जो आगे चलकर बड़ा फायदा साबित हुआ। इससे यह दिखता है कि Dentsu में बड़े रिस्क लेने की क्षमता थी।

जब Dentsu से बाहर निकलने का समय आया, तो वह भी एक सोचा-समझा फैसला था। गोयल का कहना है कि बिजनेस में यह जानना जरूरी है कि कब शुरुआत करनी है और कब बाहर निकलना है। Dentsu के पास ज्यादा पैसा था और वह आगे और बड़े निवेश करना चाहता था, जिसमें गोयल उतना हिस्सा नहीं ले सकते थे क्योंकि उनकी हिस्सेदारी 26% थी। ऐसे में जब उन्हें अच्छा ऑफर मिला, तो उन्होंने अपनी हिस्सेदारी बेच दी। इस सौदे में उन्हें कई गुना फायदा हुआ और वह शांत तरीके से कंपनी से बाहर निकल गए, जैसे वह आत्मविश्वास के साथ इसमें आए थे।

रेडिफ्यूजन: नीचे से उठकर फिर खड़ा होना

संदीप गोयल ने करीब पांच साल पहले रेडिफ्यूजन को खरीदा और उन्होंने खुद माना कि इस फैसले में थोड़ा भावनात्मक लगाव (nostalgia) भी था। लेकिन सिर्फ पुरानी यादों के सहारे किसी कमजोर कंपनी को दोबारा खड़ा नहीं किया जा सकता। 2008 में जब मार्टिन सोरेल की अगुवाई में WPP ने रेडिफ्यूजन से दूरी बना ली थी, तब Airtel, Colgate, Citibank और Ford जैसे बड़े क्लाइंट्स भी साथ चले गए थे। इसके बाद एजेंसी लगभग एक दशक तक संभलने की कोशिश करती रही, लेकिन पूरी तरह खड़ी नहीं हो पाई।

संदीप गोयल बताते हैं कि जब Diwan Nanda ने उन्हें एजेंसी संभालने के लिए कहा, तब उसकी हालत बहुत खराब थी, यानी बिल्कुल नीचे जा चुकी थी। लेकिन पिछले पांच साल में उन्होंने एजेंसी को न सिर्फ जिंदा रखा, बल्कि हर साल मुनाफा भी कमाया। यानी उन्होंने धीरे-धीरे इसे घाटे से निकालकर एक स्थिर और फायदे में चलने वाली कंपनी बना दिया।

इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण उनका पारंपरिक एजेंसी मॉडल से हटना था। उन्होंने टेक्नोलॉजी और नए तरीकों पर फोकस किया। रेडिफ्यूजन ने एक एडवांस AI डिजाइन लैब बनाई, जहां एक साल में 400 से ज्यादा वीडियो तैयार किए गए, जिनमें से कम से कम 40 टीवी पर पूरी क्वालिटी के साथ दिखाए गए। इसके साथ ही उन्होंने Rediffusion Narrative नाम से एक नया कंटेंट डिवीजन शुरू किया, जिसे Amitabh Nanda लीड कर रहे हैं। इसका मकसद एजेंसी को सिर्फ विज्ञापन (creative) तक सीमित न रखकर कंटेंट के बड़े बिजनेस में ले जाना है।

कंपनी एक तीसरे नए क्षेत्र (स्पेशलाइज्ड एक्सपीरियंस मार्केटिंग) पर भी काम कर रही है, जो अभी तैयार होने के आखिरी चरण में है।

संदीप गोयल मानते हैं कि टेक्नोलॉजी ने कंटेंट बनाने और लोगों तक पहुंचाने का तरीका पूरी तरह बदल दिया है, लेकिन कई एजेंसियां अभी तक इस बदलाव को ठीक से समझ नहीं पाई हैं। उनका कहना है कि टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल और कम्युनिकेशन के बदलते तरीके मिलकर पूरी एजेंसी इंडस्ट्री को नए रूप में ढाल रहे हैं।

टैलेंट की कमी और इंडस्ट्री की चुनौती

विज्ञापन इंडस्ट्री में एक बड़ी और थोड़ी असहज करने वाली समस्या चल रही है- अच्छे टैलेंट की कमी। संदीप गोयल के मुताबिक इसकी सबसे बड़ी वजह एजेंसियों की कमाई में गिरावट है। पहले एजेंसियां करीब 15% तक कमाती थीं, लेकिन अब यह घटकर 3% रह गई है, और बाकी सेवाएं जोड़कर भी मुश्किल से 5-6% तक पहुंचती है। जब कमाई इतनी कम हो जाती है, तो एजेंसियों के पास अच्छे कॉलेजों और टॉप टैलेंट को हायर करने के लिए पर्याप्त पैसा ही नहीं बचता।

संदीप गोयल बताते हैं कि पहले बड़ी एजेंसियां मुंबई के प्राइम लोकेशंस जैसे Nariman Point में होती थीं, फिर वे Lower Parel शिफ्ट हुईं और अब और सस्ते इलाकों की तरफ जा रही हैं। उनका कहना है कि अब हालत ऐसी हो रही है कि अगला पड़ाव पुणे जैसे शहर हो सकता है, क्योंकि एजेंसियां न तो महंगे ऑफिस का खर्च उठा पा रही हैं और न ही अच्छे लोगों को हायर कर पा रही हैं। यानी धीरे-धीरे उनकी वैल्यू और ताकत कम होती जा रही है।

संदीप गोयल ने हायरिंग के लिए अपना एक फॉर्मूला बताया है- “Breeding, Brains और Beauty”। वे साफ करते हैं कि Breeding का मतलब परिवार या बैकग्राउंड नहीं, बल्कि पढ़ाई-लिखाई और सोच से है। पहले के समय में  Arun Nanda, Balakrishnan और Ambi Parameswaran जैसे लोग टॉप बिजनेस स्कूल्स से आते थे, जिससे क्लाइंट्स के सामने उनकी एक अलग पहचान और सम्मान होता था। Brains यानी मजबूत समझ और सोच, और Beauty का मतलब है कि आप क्लाइंट के सामने खुद को कैसे पेश करते हैं- आपका व्यक्तित्व और प्रेजेंस कैसी है। गोयल कहते हैं कि अगर आप किसी क्लाइंट के पास जाते हैं और वह आपको गंभीरता से नहीं लेता, तो उसकी एक वजह यह भी होती है कि आप उस स्तर के नहीं दिखते या वैसा प्रभाव नहीं डालते।

संदीप गोयल क्लाइंट और एजेंसी के रिश्ते पर खुलकर बात करते हैं। उनका कहना है कि एजेंसियों ने खुद ही क्लाइंट्स को इतना ताकतवर बना दिया कि वे अब हावी हो गए हैं। पिछले 20 सालों में एजेंसियों ने क्लाइंट्स की हर तरह की मांग मान ली, चाहे वह जरूरी हो या नहीं और कभी विरोध नहीं किया। इसका नतीजा यह हुआ कि दोनों के बीच पेशेवर सम्मान कम हो गया और अब एजेंसियां उसी का नुकसान उठा रही हैं। उनका कहना है कि अगर आप एक ही बार में सब कुछ दे देंगे, तो आगे काम करने के मौके ही खत्म हो जाएंगे।

 बड़े आइडिया की जगह मीडिया का पैसा

आज के समय में विज्ञापन की दुनिया में “बड़ा आइडिया” (creative idea) उतना महत्वपूर्ण नहीं रह गया है, जितना पहले हुआ करता था। अब “मीडिया पर पैसा खर्च करना” ज्यादा ताकतवर हो गया है। उदाहरण के तौर पर IPL जैसे बड़े इवेंट में सिर्फ 2024 में ही ₹5,000 करोड़ से ज्यादा का विज्ञापन खर्च हुआ। यानी ब्रैंड्स अब इस बात के लिए पैसे दे रहे हैं कि उन्हें बड़ी संख्या में लोग देख लें, चाहे उनका विज्ञापन कितना भी खास क्यों न हो।

संदीप गोयल यह साफ कहते हैं कि आज अगर किसी ब्रैंड को दिखना है, तो उसे अच्छे आइडिया की जरूरत नहीं है, बल्कि बहुत बड़े बजट की जरूरत है। अगर आपके पास IPL में ₹200 करोड़ खर्च करने की क्षमता है, तो आपका विज्ञापन अपने आप मशहूर हो जाएगा- यदि वह क्रिएटिव तौर पर कमजोर ही क्यों न हो। पहले जो “बड़ा आइडिया” ब्रैंड को पहचान दिलाता था (जैसे Airtel या Maruti के कैंपेन), अब उसकी वैल्यू कम हो गई है। अब अच्छे आइडिया अक्सर छोटे बजट वाले क्लाइंट्स तक सीमित रह जाते हैं, जो उन्हें सिर्फ YouTube जैसे प्लेटफॉर्म पर ही दिखा पाते हैं।

यह पूरा बदलाव इंडस्ट्री में एक बड़ा स्ट्रक्चरल चेंज है। ऐसे समय में अगर कोई एजेंसी फिर से “क्रिएटिविटी” को केंद्र में रखकर काम कर रही है, जैसे Rediffusion कर रही है, तो वह थोड़ा अलग (contrarian) रास्ता चुन रही है, लेकिन शायद यही आगे चलकर जरूरी भी साबित हो।

संदीप गोयल एक सिंपल लेकिन गहरी बात कही- “जो भी करो, मजे लेकर करो।” उनके 40 साल के अनुभव, कई बिजनेस, म्यूजियम और सफल टर्नअराउंड के बाद यह सलाह और भी ज्यादा वजनदार लगती है। मतलब साफ है-  इंडस्ट्री चाहे कितनी भी बदल जाए, काम में आनंद होना सबसे जरूरी है।

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Zee की नई पहल पूरी मीडिया इंडस्ट्री के लिए गेम चेंजर साबित होगी: डॉ. सुभाष चंद्रा

डॉ. सुभाष चंद्रा ने बिजनेसवर्ल्ड ग्रुप और एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा से खास बातचीत में कई मुद्दों पर बेबाक राय रखी।

Last Modified:
Friday, 10 April, 2026
Dr Subhash Chandra.....

भारतीय मीडिया इंडस्ट्री के इतिहास में कई बड़े बदलाव आए हैं—1990 के दशक का केबल बूम, 2000 के दशक की DTH प्रतिस्पर्धा और अब डिजिटल व स्ट्रीमिंग का दौर। लेकिन इन सभी बदलावों के बीच कुछ ही लोग ऐसे रहे हैं, जिन्होंने इन बदलावों को सिर्फ देखा नहीं, बल्कि उन्हें आकार भी दिया। ‘एस्सेल समूह’ (Essel Group) के चेयरमैन और जी एंटरटेनमेंट (Zee Entertainment) को देश-विदेश में पहचान दिलाने वाले डॉ. सुभाष चंद्रा ऐसे ही व्यक्तित्व हैं।

अपने 75वें जन्मदिन के अवसर पर डॉ. सुभाष चंद्रा ने बिजनेसवर्ल्ड ग्रुप और एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा से खास बातचीत की। इस दौरान उन्होंने अपने करियर, असफलताओं, Zee के उतार-चढ़ाव और भविष्य की योजनाओं पर खुलकर अपनी बात रखी।

उम्र सिर्फ एक संख्या

30 नवंबर 2025 को 75 वर्ष के हुए डॉ. चंद्रा का कहना है कि उनके लिए उम्र का कोई विशेष महत्व नहीं है। उन्होंने कहा, ‘यह सिर्फ एक संख्या है, मैं आज भी खुद को 35-37 साल जैसा महसूस करता हूं।’
डॉ, सुभाष चंद्रा ने बताया कि उनकी जिंदगी की असली सीख 1966 में मिली, जब परिवार के बिजनेस के संकट के कारण उन्हें इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी। उस समय वह महज 17 साल के थे। इसके बाद उन्होंने छोटे स्तर पर कारोबार शुरू किया और धीरे-धीरे अपने प्रयासों से एक बड़ा बिजनेस खड़ा किया।

Zee का सफर और चुनौतियां

करीब 34 साल पुरानी Zee Entertainment आज भी भारतीय भाषा के टेलीविजन नेटवर्क्स में एक मजबूत ब्रैंड मानी जाती है, हालांकि पिछले कुछ वर्षों में कंपनी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। डॉ. चंद्रा ने माना कि 2018-19 के IL&FS संकट के बाद Essel Group पर आए वित्तीय दबाव का असर Zee पर भी पड़ा। 25 जनवरी 2019 की घटनाओं के बाद प्रमोटर हिस्सेदारी 42% से घटकर 5% से भी कम रह गई।

उन्होंने कहा कि इसके बाद कंपनी कई समस्याओं में उलझ गई—होस्टाइल टेकओवर की कोशिश, SEBI की कार्यवाही और Sony के साथ तीन साल तक चला मर्जर, जो अंततः सफल नहीं हो पाया। उन्होंने कहा कि इन सभी वजहों से Zee का फोकस भटक गया और जो बदलाव उस समय जरूरी थे, वे नहीं हो पाए।

43,000 करोड़ का कर्ज और बड़ा फैसला

डॉ. चंद्रा ने बताया कि उन्होंने और उनके बेटों—पुनीत और अमित—ने सभी कर्ज चुकाने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने अपनी कई अहम संपत्तियां बेच दीं।
उन्होंने कहा, ‘हमने 43,000 करोड़ रुपये का भुगतान किया। मुझे इसका कोई पछतावा नहीं है, बल्कि अब मैं खुद को पहले से ज्यादा हल्का और खुश महसूस करता हूं।’

Zee में वापसी और बदलाव

जब 2022-23 में Zee के बोर्ड ने उन्हें वापस बुलाया, तो उन्होंने पाया कि कंपनी अपनी पुरानी सफलता के आराम में जी रही थी।
उन्होंने कहा, ’मुझे बदलाव करना पड़ा। कई लोगों से अलग होना पड़ा, क्योंकि वे असफलता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। मेरा मानना है कि जब तक आप अपनी गलती नहीं मानते, सुधार संभव नहीं है।’ इसके बाद Zee ने कंटेंट स्ट्रेटजी में बदलाव किया और omni-content approach अपनाई—यानी कंटेंट अब सिर्फ टीवी तक सीमित नहीं, बल्कि डिजिटल, सोशल और कनेक्टेड टीवी प्लेटफॉर्म्स पर भी फोकस किया गया। आज Zee TV के कई शो टॉप 10 में जगह बना रहे हैं और चैनल की दर्शक हिस्सेदारी 17% से बढ़कर 18.8% तक पहुंच गई है। कंपनी का लक्ष्य इसे 20% से आगे ले जाना है।

विज्ञापन और बिजनेस अप्रोच में बदलाव

डॉ. चंद्रा ने बताया कि उन्होंने हाल ही में विज्ञापन सेल्स टीम के सैकड़ों लोगों से मुलाकात की और उन्हें साफ संदेश दिया कि सिर्फ रेट और रेटिंग पर ध्यान देना काफी नहीं है।
उन्होंने कहा, ’आपको अपने क्लाइंट की समस्या समझनी होगी, वही आपकी सैलरी दे रहा है। हम कहीं न कहीं बहुत ज्यादा ट्रांजैक्शनल हो गए थे।’

ICL की गलती पहली बार स्वीकारी

डॉ. चंद्रा ने 2007 में शुरू हुई इंडियन क्रिकेट लीग (ICL) को लेकर भी बड़ी बात कही। उन्होंने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि ICL के बंद होने के पीछे उनकी अपनी गलतियां थीं।
उन्होंने कहा कि अगर कुछ फैसले अलग होते, तो यह लीग सफल हो सकती थी और चौथे साल से मुनाफा देना शुरू कर देती। बाद में इसी फॉर्मेट को आगे बढ़ाते हुए IPL ने बड़ी सफलता हासिल की।

Zee News और ’नंबर वन’ की सोच से हटा फोकस

Zee News को लेकर उन्होंने कहा कि नंबर वन बनने के बाद संगठन में अहंकार जैसा आ गया था और फोकस दर्शकों से हटकर अन्य चीजों पर चला गया। उन्होंने संकेत दिया कि अब इस दिशा में सुधार किया जा रहा है।

भविष्य की बड़ी योजना

डॉ. चंद्रा ने संकेत दिया कि Zee अगले दो वर्षों में एक ऐसा प्रोजेक्ट लेकर आ सकता है, जो पूरी मीडिया इंडस्ट्री के लिए गेम चेंजर साबित होगा—सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी। उन्होंने कहा, ’अगर हम इसमें सफल होते हैं, तो यह इंडस्ट्री के लिए बहुत बड़ा बदलाव होगा।’ अपने अनुभव को एक लाइन में समेटते हुए उन्होंने कहा, ’आज आप जो ऊर्जा और मेहनत लगाते हैं, उसका असर भविष्य में जरूर दिखता है।’

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मीडिया प्लानिंग नहीं, अब पूरा मार्केटिंग गेम है: कार्तिक शर्मा

ओम्निकॉम मीडिया के ग्रुप सीईओ कार्तिक शर्मा को वह दौर आज भी याद है और पुराने व आज के फर्क से ही वे मीडिया सर्विस इंडस्ट्री के बड़े बदलाव को समझते हैं।

Last Modified:
Wednesday, 08 April, 2026
kartik sharma

करीब 30 साल पहले की बात करें तो उस समय मीडिया प्लानर की भूमिका बहुत सीमित हुआ करती थी। क्लाइंट मीटिंग में उन्हें आखिर में बुलाया जाता था, जहां उन्हें सिर्फ पांच मिनट मिलते थे अपनी बात रखने के लिए। उस दौर में काम करने के लिए टीवी चैनलों के भी ज्यादा विकल्प नहीं थे और जल्दी-जल्दी एक प्लान पेश करना होता था, क्योंकि उसके बाद क्रिएटिव एजेंसी फिर से चर्चा अपने हाथ में ले लेती थी। ओम्निकॉम मीडिया (Omnicom Media) के ग्रुप सीईओ कार्तिक शर्मा को वह समय आज भी अच्छे से याद है और उसी पुराने दौर और आज के समय के बीच का फर्क ही उन्हें यह समझने में मदद करता है कि मीडिया सर्विस इंडस्ट्री में कितना बड़ा बदलाव आ चुका है।

पिछले करीब डेढ़ साल में यह बदलाव और भी तेजी से देखने को मिला है, और इसी के साथ एक बड़ा कॉरपोरेट बदलाव भी हुआ। साल 2025 की शुरुआत में Omnicom Group और Interpublic Group (IPG) के बीच वैश्विक स्तर पर मर्जर पूरा हुआ, जिससे दुनिया की सबसे बड़ी मार्केटिंग सर्विस कंपनियों में से एक का गठन हुआ। भारत में इस मर्जर के बाद नई इकाई का नाम सिर्फ Omnicom Media रखा गया है। कार्तिक शर्मा के मुताबिक, नाम से 'Group' शब्द हटाना एक सोची-समझी रणनीति है, जो यह दिखाता है कि कंपनी अब अपने काम को ज्यादा सरल और स्पष्ट तरीके से पेश करना चाहती है। जैसा कि वे कहते हैं, “हमने ‘Group’ शब्द हटा दिया है और अब हम फिर से Omnicom Media बन गए हैं, जो हमारी पहचान और सोच की सादगी को दर्शाता है।”

कार्तिक शर्मा ने डॉ. अनुराग बत्रा (जो एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप और BW बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ हैं) के साथ एक लंबी और खुली बातचीत में यह बताया कि एक नई मर्ज हुई बड़ी मीडिया कंपनी को ऐसे समय में संभालना कैसा होता है, जब बाजार पहले से कहीं ज्यादा तेजी से बदल रहा है। उन्होंने अंदर की झलक देते हुए समझाया कि आज के समय में मीडिया इंडस्ट्री को चलाना पहले की तुलना में काफी ज्यादा चुनौतीपूर्ण और जटिल हो गया है।

मीडिया प्लानिंग अब बैकरूम से निकलकर बोर्डरूम तक पहुंची

इसके बाद वे एक बहुत अहम बदलाव की बात करते हैं। शर्मा के अनुसार, पहले मीडिया प्लानिंग सिर्फ एक छोटा सा तकनीकी काम हुआ करता था, लेकिन अब यह सीधे कंपनी के टॉप लेवल यानी बोर्डरूम तक पहुंच चुका है। भारत का एडवर्टाइजिंग मार्केट, जिसे Pitch Madison Advertising Report और GroupM This Year Next Year दोनों ही हर साल 10% से 12% की मजबूत ग्रोथ वाला बता रहे हैं, अब सिर्फ पुराने FMCG ब्रैंड्स पर निर्भर नहीं है। अब इसमें बड़ी संख्या में SME (छोटे और मझोले व्यवसाय) और D2C (डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर) ब्रैंड्स भी जुड़ गए हैं। अलग-अलग अनुमान बताते हैं कि सिर्फ SME का ऐडवर्टाइजिंग मार्केट ही ₹40,000 से ₹60,000 करोड़ के बीच हो सकता है। शर्मा कहते हैं कि यदि इसका औसत ₹50,000 करोड़ मान लें, तो यह बहुत बड़ा हिस्सा है, जो पूरे इंडस्ट्री के करीब 60-70% के बराबर बैठता है।

जैसे-जैसे ज्यादा कंपनियां शेयर बाजार में लिस्ट होने की तरफ बढ़ रही हैं और निवेशकों की नजरें उन पर और सख्त हो रही हैं, वैसे-वैसे मार्केटिंग और मीडिया बजट को लेकर बातचीत भी ज्यादा गंभीर और जटिल हो गई है। अब कंपनियों के CFO और बोर्ड यह समझना चाहते हैं कि मार्केटिंग पर खर्च करने से कितना फायदा या असर पड़ता है। इसका मतलब यह है कि अब मीडिया एजेंसियां सिर्फ यह नहीं बतातीं कि विज्ञापन कितने लोगों तक पहुंचेगा या कितनी बार दिखेगा, बल्कि यह भी सलाह देती हैं कि कंपनी अपना पैसा कहां और कैसे लगाए। शर्मा के मुताबिक, अब मीडिया प्लानिंग सिर्फ “मीडिया प्लानिंग” तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह पूरे मार्केटिंग और बिजनेस स्ट्रैटेजी का हिस्सा बन गई है, जिससे क्लाइंट के पूरे बिजनेस पर असर पड़ता है।

अब Omnicom Media का काम पहले से काफी बड़ा और व्यापक हो गया है। पहले जहां एजेंसियां सिर्फ मीडिया प्लानिंग या ऐड खरीदने (buying) तक सीमित रहती थीं, वहीं अब यह कंपनी प्लानिंग, बायिंग, डेटा, टेक्नोलॉजी, कंटेंट और स्पोर्ट्स, हर क्षेत्र में सेवाएं दे रही है। यानी अब यह “फुल-फनल” सर्विस दे रही है, जिसमें क्लाइंट तक पहुंचने के हर स्टेप को कवर किया जाता है। कार्तिक शर्मा का मानना है कि आज के समय में यह विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुका है। क्लाइंट अब अलग-अलग काम के लिए 4-5 एजेंसियों के साथ काम नहीं करना चाहते, क्योंकि कंज्यूमर के सामने तो ब्रैंड एक ही दिखता है। इसलिए कंपनी भी उसी तरह एक ही जगह से पूरी सर्विस देना चाहती है। शर्मा कहते हैं कि जहां-जहां उन्होंने इंटीग्रेटेड (एकजुट) टीम लगाई है, वहां बहुत अच्छे नतीजे मिले हैं।

मर्जर के 90 दिन: अलग-अलग ताकतों से बनी और मजबूत इकाई

Omnicom Group और Interpublic Group के बीच हुआ यह मर्जर विज्ञापन इंडस्ट्री के इतिहास के सबसे बड़े सौदों में से एक माना जा रहा है। भारत में भी इसका असर तेजी से दिखा है। अब Omnicom Media के पास करीब 26-27% मार्केट शेयर है, जिससे यह देश की दूसरी सबसे बड़ी मीडिया एजेंसी बन गई है।

आम तौर पर ऐसे बड़े मर्जर में कई दिक्कतें आती हैं- जैसे क्लाइंट का छोड़कर जाना, कर्मचारियों के बीच तालमेल की कमी या टैलेंट का बाहर जाना। लेकिन शर्मा के मुताबिक, इस बार ऐसा ज्यादा देखने को नहीं मिला। वे बताते हैं कि पिछले 90 दिन बहुत शानदार रहे हैं। उन्होंने पुराने Omnicom और IPG दोनों के क्लाइंट्स से मुलाकात की और उन्हें काफी पॉजिटिव रिस्पॉन्स मिला। साथ ही, दोनों कंपनियों के टैलेंट को वे बहुत मजबूत मानते हैं। पहले IPG एक मजबूत प्रतिस्पर्धी था, लेकिन अब दोनों का साथ आना उन्हें और भी प्रभावशाली लग रहा है।

मर्जर के बाद जो छंटनी (layoffs) की खबरें आई थीं, उस पर Kartik Sharma साफ कहते हैं कि कुछ हद तक एक जैसे काम वाले पदों को कम किया गया है, जो किसी भी M&A (मर्जर) में सामान्य बात होती है। लेकिन वे यह भी जोर देकर कहते हैं कि कंपनी बचाव (defence) नहीं, बल्कि आगे बढ़ने (growth) की रणनीति पर काम कर रही है। उनके मुताबिक यह “growth merger” है, क्योंकि भारत का बाजार GDP और एडवर्टाइजिंग (ADEX) दोनों के स्तर पर तेजी से बढ़ रहा है। खास बात यह है कि क्लाइंट से सीधे जुड़े किसी भी टीम में कोई दिक्कत या बदलाव नहीं आया है। साथ ही, John Wren जैसे ग्लोबल लीडर्स भी भारत को एशिया-पैसिफिक (APAC) में टॉप-3 मार्केट्स में मानते हैं और लगातार सपोर्ट कर रहे हैं।

Omni: जहां से चलता है पूरा मीडिया गेम

Omnicom Media खुद को बाकी कंपनियों से अलग दिखाने के लिए जिस चीज पर सबसे ज्यादा भरोसा करती है, वह है उसका अपना बनाया हुआ प्लेटफॉर्म “Omni”. यह कोई नया AI टूल नहीं है, बल्कि इसे 11-12 साल में धीरे-धीरे बनाया गया है। Forrester ने भी इसे लगातार तीन साल तक बेस्ट-इन-क्लास प्लेटफॉर्म माना है। यह प्लेटफॉर्म एक तरह से “सुपर ऐप” की तरह काम करता है, जहां एक ही जगह पर ब्रीफिंग, ऑडियंस बनाना, मीडिया प्लानिंग, ऑप्टिमाइजेशन, आइडिया बनाना और उसे लागू करना—सब कुछ हो जाता है। यानी एजेंसी और क्लाइंट दोनों एक ही सिस्टम पर मिलकर पूरा काम कर सकते हैं।

मर्जर के बाद यह प्लेटफॉर्म और मजबूत हो गया है, क्योंकि Interpublic Group की डेटा कंपनी Acxiom का डेटा भी इसमें जुड़ गया है। भारत में Acxiom के पास करीब 52 करोड़ यूनिक डिजिटल आईडी और लगभग 91.5 करोड़ लोगों की जानकारी है, और हर व्यक्ति के बारे में 120-150 तरह के डेटा पॉइंट्स मौजूद हैं। इसका सीधा फायदा यह है कि अब विज्ञापन को सही लोगों तक पहुंचाना पहले से कहीं ज्यादा सटीक हो गया है। जहां आम प्लेटफॉर्म पर 30-40% तक ही सही टार्गेटिंग हो पाती है, वहीं यहां 80-82% तक की सटीकता मिल रही है। शर्मा उदाहरण देते हुए बताते हैं कि अब किसी खास ग्राहक समूह (cohort) के बारे में इतनी सटीक जानकारी मिल सकती है कि क्लाइंट खुद कहे कि यह डेटा बिल्कुल सही बैठता है।

Omnicom Media के “Omni” प्लेटफॉर्म के ऊपर एक और टूल जोड़ा गया है, जिसका नाम “Omni Assist” है। यह एक जनरेटिव AI इंजन है, यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित ऐसा सिस्टम जो अलग-अलग प्ल्गइंस (plugins) के साथ मिलकर बहुत तेजी से और बड़े पैमाने पर लोकल (स्थानीय) कंज्यूमर की जानकारी और इनसाइट्स निकाल सकता है। कार्तिक शर्मा के मुताबिक इसकी स्पीड और क्षमता इतनी ज्यादा है कि वह “हैरान कर देने वाली” है। खास बात यह है कि Omnicom ने AI पर काम करने के लिए अपनी टीम करीब 4 साल पहले ही बना ली थी, यानी यह कंपनी इस ट्रेंड में काफी पहले से आगे थी।

अब GRPs नहीं, सीधे बिजनेस रिजल्ट से तय होगी वैल्यू

पहले मीडिया एजेंसियों की वैल्यू इस बात से तय होती थी कि विज्ञापन कितने लोगों तक पहुंचा (reach), कितनी बार दिखा (frequency), या कितने GRPs और impressions मिले। यानी सिर्फ आउटपुट पर फोकस था। लेकिन अब फोकस बदलकर इस बात पर आ गया है कि इससे बिजनेस को असल में क्या फायदा हुआ- जैसे बिक्री बढ़ी या नहीं, मार्केट शेयर बढ़ा या नहीं। Omnicom Media इस बदलाव के लिए “Agile MMM” (Agile Market Mix Modelling) नाम का टूल इस्तेमाल कर रही है। यह पुराने econometric मॉडल का एक एडवांस और ज्यादा तेज वर्जन है, जो लगभग रियल-टाइम में यह बता सकता है कि मीडिया पर खर्च का असर बिजनेस के अलग-अलग पहलुओं (जैसे सेल्स, मार्केट शेयर, लीड्स) पर कितना पड़ रहा है।

कार्तक शर्मा इसे उदाहरण से समझाते हैं कि यदि कोई कंपनी अपना बजट 100 से बढ़ाकर 120 कर देती है, तो इससे उसके बिजनेस (जैसे मार्केट शेयर, बिक्री या लीड्स) पर कितना असर पड़ेगा, यह अब 90% से ज्यादा सटीकता के साथ बताया जा सकता है। खासकर ऑटो जैसी तेज़ी से बदलने वाली इंडस्ट्री में इसका बहुत फायदा है। यहां क्लाइंट पहले से अलग-अलग बजट के विकल्प बनाकर देख सकता है कि किससे सबसे बेहतर रिजल्ट मिलेगा, और उसी हिसाब से अपनी मीडिया स्ट्रैटेजी तय कर सकता है।

परफॉर्मेंस के दौर में ब्रैंड बिल्डिंग की नई चुनौती

आजकल मार्केटिंग में “ब्रैंड” और “परफॉर्मेंस” (जैसे तुरंत बाइंग वाले विज्ञापन) को अलग-अलग माना जाता है, लेकिन कार्तिक शर्मा कहते हैं कि यह सोच पूरी तरह सही नहीं है। भारत में खासकर D2C (डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर) स्टार्टअप्स ने परफॉर्मेंस मार्केटिंग पर ज्यादा भरोसा किया है, इसलिए ऐसा लगने लगा कि ब्रैंड बिल्डिंग कम जरूरी हो गई है। लेकिन शर्मा के मुताबिक ऐसा नहीं है- यह सिर्फ बिजनेस के एक शुरुआती चरण की जरूरत होती है।

वे इसे आसान तरीके से समझाते हैं कि शुरुआत में (zero से कुछ बनने तक) परफॉर्मेंस मार्केटिंग से जल्दी ग्रोथ मिल जाती है, लेकिन यदि आपको बहुत बड़ा और लंबे समय तक चलने वाला ब्रैंड बनाना है (zero से infinity तक), तो सिर्फ परफॉर्मेंस काफी नहीं है। वहां ब्रैंड बिल्डिंग जरूरी हो जाती है। क्योंकि लोग खरीदारी सिर्फ दिमाग से नहीं, बल्कि भावनाओं (emotions) से भी करते हैं, और यह काम ब्रैंडिंग ही करती है।

D2C और इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग पर वे कहते हैं कि यह ट्रेंड कंज्यूमर्स के लिए अच्छा है, क्योंकि इससे नए-नए प्रोडक्ट्स और ब्रैंड्स सामने आ रहे हैं। लेकिन सिर्फ इन्फ्लुएंसर और परफॉर्मेंस पर आधारित रणनीति एक समय के बाद सीमित हो जाती है। भारत में इन्फ्लुएंसर मार्केट अभी तेजी से बढ़ रहा है (करीब ₹2,500–3,500 करोड़), लेकिन एक स्तर के बाद बड़े पैमाने पर बढ़ने के लिए मजबूत ब्रैंड बनाना जरूरी होता है, जो लगातार ब्रैंड विज्ञापन (ATL) से ही बनता है।

कल्चर और भरोसे के बीच कंसल्टेंट्स की बढ़ती भूमिका

मैनेजमेंट कंसल्टिंग कंपनियों जैसे McKinsey & Company, Accenture और Deloitte के मार्केटिंग क्षेत्र में आने की बात की गई है, जिससे पारंपरिक एजेंसियों को खतरा माना जाता है। लेकिन शर्मा इसे खतरे की तरह नहीं देखते। उनके अनुसार, ये कंपनियां और मीडिया एजेंसियां एक-दूसरे की पूरक (complementary) हैं। वे कहते हैं कि असली चुनौती “execution” यानी काम को सही तरीके से लागू करना है, और इसमें एजेंसियों का अनुभव और समझ अभी भी बहुत अहम है, जो आसानी से खत्म नहीं होने वाली।

कार्तिक शर्मा कहते हैं कि उनके काम में सबसे अहम चीज़ है भरोसा (trust) और ईमानदारी (integrity)। क्लाइंट अपनी मेहनत की कमाई उनके पास लाते हैं, इसलिए उनकी जिम्मेदारी है कि वे उस पैसे का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर, डेटा के आधार पर और प्रोफेशनल तरीके से करें। वे इसे ऐसे समझाते हैं जैसे बैंक में पैसा रखना- यदि बैंक भरोसेमंद है, तो पैसा सुरक्षित रहता है। उसी तरह Omnicom Media क्लाइंट के पैसे को “सेफ” रखती है और सही जगह ही निवेश करती है।

वे आगे कहते हैं कि “कल्चर” (संस्कृति) सिर्फ लिखने या बोलने की चीज़ नहीं है, बल्कि यह आपके काम और व्यवहार में दिखनी चाहिए। यदि व्यवहार में नहीं दिखे, तो उसका कोई मतलब नहीं है। लीडरशिप को लेकर भी उनका नजरिया बदला है- पहले वे खुद सब कुछ करने की कोशिश करते थे, लेकिन अब वे टीम को तैयार करने और अच्छे लीडर्स बनाने पर फोकस करते हैं। Ogilvy में काम करने के दौरान उन्होंने एक सीख ली थी कि हमेशा अपने से बेहतर लोगों को हायर करना चाहिए।

आगे की बात करें तो उनका लक्ष्य साफ है- मार्केट लीडर बनना। लेकिन वे इसे किसी को हराने की लड़ाई की तरह नहीं देखते। उनका मानना है कि जब इंडस्ट्री में मजबूत प्रतिस्पर्धा होती है, तो सभी को आगे बढ़ने का मौका मिलता है और पूरी इंडस्ट्री ग्रो करती है।

अंत में, वे इस बात को लेकर काफी सकारात्मक हैं। उन्होंने इंडियन मीडिया इंडस्ट्री को छोटे स्तर से लेकर आज के बड़े और तेजी से बढ़ते बाजार तक पहुंचते देखा है- जहां सैकड़ों दिनों का क्रिकेट कैलेंडर है और SME विज्ञापन बाजार करीब ₹50,000 करोड़ तक पहुंच चुका है। इसलिए उनका यह आत्मविश्वास अनुभव पर आधारित है, और वे इस बदलती इंडस्ट्री को एंजॉय भी कर रहे हैं।

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बदलते ऐडवर्टाइजिंग मार्केट को लेकर सैम बलसारा का मंत्र- लॉन्ग टर्म वैल्यू पर करें फोकस

BW बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन डॉ. अनुराग बत्रा के साथ एक लंबी बातचीत में मैडिसन वर्ल्ड के चेयरमैन सैम बलसारा ने बताया कि भारत की ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री कैसे बदली है और आगे किस दिशा में जा सकती है।

Last Modified:
Monday, 06 April, 2026
SamBalsara874

तेजी से बदलती विज्ञापन दुनिया में, जहां डिजिटल का असर बढ़ रहा है, क्लाइंट्स की उम्मीदें बदल रही हैं और इंडस्ट्री में बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव हो रहे हैं, वहां बहुत कम लोग हैं जो इतने अनुभव के साथ अपनी बात रख पाते हैं जितना कि मैडिसन वर्ल्ड के चेयरमैन सैम बलसारा रखते हैं। एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप और BW बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ एक खुली और लंबी बातचीत में बलसारा ने बताया कि भारत की ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री कैसे बदली है और आगे किस दिशा में जा सकती है।

करीब चार दशकों में सैम बलसारा ने मैडिसन को देश की सबसे बड़ी इंडिपेंडेंट एजेंसी नेटवर्क्स में से एक बना दिया। इस दौरान उन्होंने ग्लोबल कंपनियों के दबदबे, कई स्ट्रक्चरल बदलाव और अब डिजिटल-फर्स्ट दौर को करीब से देखा। लेकिन उनकी सोच में एक बात हमेशा साफ रही- बेसिक्स पर ध्यान, ब्रैंड बनाना और छोटे समय के फायदे के बजाय लंबे समय की वैल्यू पर फोकस करना। 

एक अहम मोड़

मैडिसन का मीडिया की ओर जाना पहले से प्लान नहीं था, बल्कि हालात की वजह से हुआ। शुरुआत में एजेंसी का गोदरेज के साथ जुड़ाव था और जब गोदरेज ने प्रॉक्टर एंड गैंबल (P&G) के साथ साझेदारी की, तब एक बड़ा बदलाव आया। सैम बलसारा बताते हैं कि उस समय मैडिसन में चिंता थी कि यदि गोदरेज P&G के साथ जुड़ता है, तो उनका क्या होगा। आमतौर पर ऐसे मामलों में लोकल एजेंसियों को हटा दिया जाता है।

लेकिन कहानी तब बदली जब P&G ने खुद बलसारा को फोन किया। उन्होंने गोदरेज पर मैडिसन के काम की तारीफ की और अपने कुछ ब्रैंड्स संभालने का मौका दिया।

हालांकि एक शर्त थी- मैडिसन को किसी ग्लोबल एजेंसी के साथ पार्टनर करना होगा। करीब एक साल की बातचीत के बाद DMBNB नाम की एजेंसी के साथ साझेदारी हुई, लेकिन यह ज्यादा समय तक नहीं चली और कुछ सालों में खत्म हो गई। इसके बावजूद P&G ने मैडिसन के साथ मीडिया क्लाइंट के तौर पर रिश्ता बनाए रखा और उसे मीडिया क्लाइंट के तौर पर काम देता रहा। यही वह मोड़ था जिसने मैडिसन को मीडिया स्पेशलाइजेशन की ओर धकेला और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन गई।

स्पेशलाइजेशन क्यों आया काम 

सैम बलसारा ने मीडिया पर फोकस इसलिए किया क्योंकि उस समय एजेंसियों में टैलेंट और स्किल्स की कमी साफ दिख रही थी। उन्होंने कहा कि मीडिया और क्रिएटिव दोनों के लिए अलग-अलग तरह की स्किल्स चाहिए होती हैं। कुछ लोग क्रिएटिव होते हैं और कुछ मीडिया से जुड़े काम में अच्छे होते हैं। उस समय मार्केट में क्रिएटिव टैलेंट पहले से मजबूत था, लेकिन मीडिया का क्षेत्र अभी उतना विकसित नहीं था। ऐसे में यह एक बड़ा मौका था। लिहाजा मैडिसन ने इस मौके को पहचाना और मीडिया में मजबूत टीम बनाई। इसी सोच के साथ मैडिसन ने मीडिया, पब्लिक रिलेशंस और रूरल मार्केटिंग जैसे अलग-अलग वर्टिकल बनाए। हर एक टीम अपने-अपने काम में स्पेशलिस्ट थी। काफी समय तक इस मॉडल से कंपनी को ग्रोथ भी मिली और मार्केट में अलग पहचान भी बनी।

लेकिन धीरे-धीरे इस ज्यादा स्पेशलाइजेशन की दिक्कतें भी सामने आने लगीं। बहुत सारी अलग-अलग टीमों और यूनिट्स की वजह से क्लाइंट्स के लिए काम करना मुश्किल हो गया। एक ही ब्रैंड के लिए उन्हें कई एजेंसियों या टीमों से बात करनी पड़ती थी, जिससे काम जटिल हो गया। अब समय के साथ क्लाइंट्स की सोच भी बदली है। अब वे ऐसे पार्टनर चाहते हैं जो उन्हें एक ही जगह पर पूरा सॉल्यूशन दे सकें, यानि सब कुछ एक साथ। साथ ही वे चाहते हैं कि उनके ब्रैंड की सोच और काम हर प्लेटफॉर्म पर एक जैसा और कंसिस्टेंट रहे।

इसी वजह से अब इंडस्ट्री फिर से पुराने मॉडल की तरफ लौटती दिख रही है, जहां सब काम एक ही जगह से होता है। इसे “अनबंडलिंग” (काम को अलग-अलग करना) से “रीबंडलिंग” (फिर से जोड़ना) की वापसी कहा जा रहा है।

अनबंडलिंग से रीबंडलिंग तक

सैम बलसारा, जो पहले काम को अलग-अलग हिस्सों में बांटने (अनबंडलिंग) के समर्थक थे, अब मानते हैं कि फिर से सब कुछ एक साथ करने वाला मॉडल वापस आना तय है।

उन्होंने उदाहरण दिया कि कोका-कोला जैसी बड़ी कंपनी अब अपने ज्यादातर काम एक ही एजेंसी को दे रही है। यह इस बदलाव का साफ संकेत है कि इंडस्ट्री अब फिर से कंसोलिडेशन (एकजुट होने) की ओर बढ़ रही है।  

सैम बलसारा कहते हैं कि यह बदलाव सिर्फ काम को आसान (एफिशिएंट) बनाने के लिए नहीं हो रहा, बल्कि इसलिए भी जरूरी है कि ब्रैंड में एकरूपता (coherence) बनी रहे। जब काम बहुत ज्यादा हिस्सों में बंट जाता है, तो जिम्मेदारी (accountability) और ब्रैंड की एक जैसी पहचान (consistency) दोनों कमजोर पड़ जाती हैं। इसीलिए अब जो फिर से सब कुछ एक साथ (इंटीग्रेटेड मॉडल) करने की बात हो रही है, वह कोई छोटा ट्रेंड नहीं है, बल्कि इंडस्ट्री में एक जरूरी सुधार (structural correction) है।

संयम और निरंतरता की सोच

यदि मैडिसन की ग्रोथ दूसरी बड़ी एजेंसियों के मुकाबले थोड़ी धीमी लगती है, तो यह सोच-समझकर किया गया है। बलसारा का कहना है कि किसी भी बढ़ती कंपनी को पैसे के पीछे नहीं भागना चाहिए, बल्कि अपने प्रोडक्ट (काम की क्वालिटी) पर ध्यान देना चाहिए। इसी सोच के तहत उन्होंने कंपनी में कुछ “नियम” बनाए, जो फैसले लेने में मदद करते हैं। इनमें से एक “कंजरवेशन का नियम” है, जो पैसों के सही और सोच-समझकर इस्तेमाल (financial discipline) पर जोर देता है।

मैडिसन ने कभी दिखावे वाली चीजों- जैसे महंगे ऑफिस या बड़ी-बड़ी कॉन्फ्रेंस पर ज्यादा खर्च नहीं किया, बल्कि लंबे समय तक टिके रहने पर ध्यान दिया। साथ ही, उनके लिए कंसिस्टेंसी (निरंतरता) बहुत जरूरी है। उनका कहना है कि जो भी काम करें, ऐसा होना चाहिए कि उसे 20 साल तक लगातार किया जा सके।

इसका मतलब है कि बार-बार नई चीजें शुरू करके छोड़ने के बजाय, एक ही चीज को लगातार बेहतर बनाते रहना ज्यादा जरूरी है।

कैडबरी से मिली सीख

सैम बलसारा कहते हैं कि कैडबरी में काम करते समय एक बड़ी सीख मिली कि ब्रैंड की छवि कितनी ताकतवर होती है। कैडबरी की बिक्री उस समय कुछ ही बड़े शहरों तक सीमित थी, लेकिन लोगों को लगता था कि यह बहुत बड़ी और हर जगह मौजूद कंपनी है। यानी असलियत कुछ और थी, लेकिन लोगों की सोच (perception) कुछ और थी। 

इससे उन्हें समझ आया कि ब्रैंड की इमेज (लोगों की नजर में उसकी पहचान) बहुत ताकतवर होती है, कई बार असलियत से भी ज्यादा। यानी यदि आपकी इमेज मजबूत है, तो आप असल साइज से भी बड़े दिख सकते हैं। लिहाजा, इससे उन्होंने सीखा कि एजेंसी का अपना एक मजबूत ब्रैंड होना जरूरी है, यानी लोगों के बीच उसकी एक साफ और प्रभावशाली पहचान होनी चाहिए।

इसी सोच के चलते मैडिसन ने हमेशा इंडस्ट्री में अपनी मौजूदगी बनाए रखी- जैसे थॉट लीडरशिप, अपने आइडियाज शेयर करना आदि। यह सिर्फ मार्केटिंग नहीं था, बल्कि अपनी पोजिशन मजबूत करने का तरीका था।

डिजिटल को लेकर चूक

सैम बलसारा मानते हैं कि डिजिटल को लेकर उन्होंने शुरुआत में गलत आकलन किया। उन्होंने साफ कहा कि उन्होंने डिजिटल को कम आंका था। उनका सोचना था कि डिजिटल सिर्फ एक माध्यम है, इसलिए अलग यूनिट बनाने की जरूरत नहीं है। उन्हें यह भी डर था कि यदि अलग डिजिटल टीम बना दी, तो उनकी मुख्य मीडिया टीम का काम कम हो जाएगा, यानी उनकी असली ताकत कमजोर पड़ सकती है। इस सोच की वजह से मैडिसन ने डिजिटल को अलग यूनिट के रूप में अपनाने में देर कर दी, जिससे शुरुआत में वह बाकी कंपनियों से थोड़ा पीछे रह गई।

लेकिन समय के साथ उन्होंने अपनी सोच बदली और डिजिटल को पूरी तरह अपनाया, लेकिन बाद में यह इंडस्ट्री के साथ तालमेल में आ गई। आज के समय में एक प्रोफेशनल को सिर्फ मीडिया प्लानर ही नहीं, बल्कि डिजिटल प्लानर भी बनना पड़ता है। 

मीडिया का बढ़ता दबदबा और क्रिएटिव की कमी

सैम बलसारा का मानना है कि आजकल इंडस्ट्री में मीडिया पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, जबकि क्रिएटिव पीछे छूटता जा रहा है। उन्होंने कहा कि पिछले 10 सालों से ज्यादातर चर्चाएं सिर्फ मीडिया पर ही हो रही हैं। क्रिएटिव से जुड़े लोग इन मीटिंग्स में कम आते हैं, क्योंकि वहां क्रिएटिव को बेहतर बनाने की बात ही नहीं होती। साथ ही, अब क्लाइंट्स (मार्केटर्स) भी खुद को क्रिएटिव एक्सपर्ट समझने लगे हैं। इससे यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि किसकी बात मानी जाए- क्लाइंट की या एजेंसी की।

इससे एजेंसी और क्लाइंट के बीच टकराव बढ़ रहा है और धीरे-धीरे एजेंसी का क्रिएटिव कंट्रोल कम होता जा रहा है। यह कोई छोटी या अस्थायी समस्या नहीं, बल्कि एक बड़ी और सिस्टम से जुड़ी हुई समस्या बनती जा रही है।

अब हालात ऐसे हो गए हैं कि ब्रैंड की सोच (brand thinking) पर किसका हक है- इस पर भी सवाल उठने लगे हैं, क्योंकि एजेंसी और क्लाइंट दोनों की राय टकरा रही है।

यह जो पूरा काम करने का प्रोसेस है, वह एकदम फिक्स नहीं होता। किसी भी समस्या का हल निकालने के कई तरीके हो सकते हैं। इसलिए एजेंसी और क्लाइंट के बीच सख्ती (rigidity) से ज्यादा आपसी समझ और तालमेल (alignment) होना जरूरी है।

विज्ञापन एक कला है, सिर्फ बिजनेस नहीं

बलसारा नए लोगों को सलाह देते हैं कि विज्ञापन को सिर्फ पैसे कमाने का जरिया न समझें। इसे एक प्रोफेशन और एक कला की तरह लें। उन्होंने यह भी कहा कि आजकल कई मीडिया प्रोफेशनल्स अपने काम में तो अच्छे हैं, लेकिन उन्हें विज्ञापन में दिलचस्पी कम होती जा रही है, जो चिंता की बात है।

फाउंडर बनाम कॉरपोरेट

बलसारा को फाउंडर (कंपनी के मालिक) के साथ काम करना ज्यादा पसंद है, क्योंकि वहां फैसले जल्दी और साफ होते हैं। उनका कहना है कि कॉरपोरेट कंपनियों में कई लोग “ना” कह सकते हैं, लेकिन “हां” सिर्फ एक ही व्यक्ति कहता है। इसका मतलब है कि आखिर में हर फैसला उसी एक व्यक्ति तक जाता है, तो बेहतर है कि सीधे उसी से बात की जाए।

उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया भर में कई अच्छे और असरदार काम अभी भी फाउंडर-लीड कंपनियों से ही निकलते हैं, बड़ी नेटवर्क कंपनियों से नहीं।

एजेंसियों की कमाई का संकट

बलसारा के मुताबिक आज एजेंसियों की कमाई का मॉडल बिगड़ चुका है। उन्होंने साफ कहा कि आज क्लाइंट्स कम से कम पैसे देना चाहते हैं, लेकिन काम ज्यादा से ज्यादा करवाना चाहते हैं। इसी वजह से यह स्थिति पैदा हुई है और यह अब लगभग तय हो चुकी है।

बलसारा कहते हैं कि सिर्फ ज्यादा पैसे देने से क्लाइंट को हमेशा ज्यादा फायदा नहीं मिलता। यानी महंगी एजेंसी ही बेहतर काम करेगी, ऐसा जरूरी नहीं है। लेकिन हकीकत यह है कि आज एजेंसियों पर दबाव बढ़ गया है, उन्हें कम पैसों (कम मार्जिन) में ज्यादा काम करना पड़ रहा है। इससे एजेंसियां बीच में फंस गई हैं। इसका असर टैलेंट पर भी दिख रहा है।

बलसारा के मुताबिक इस इंडस्ट्री में टिके रहने के लिए एक जरूरी बात है- अपने अहंकार को साइड में रखना और हालात के हिसाब से खुद को ढालना, क्योंकि यह पूरी तरह क्लाइंट-ड्रिवन बिजनेस है।

उन्होंने एक उदाहरण दिया कि उन्होंने टॉप कॉलेजों से ट्रेनी हायर किए और उन्हें 20–22 लाख रुपये की सैलरी दी, लेकिन रिजल्ट उम्मीद के मुताबिक नहीं मिला। इससे उन्हें समझ आया कि सिर्फ ज्यादा सैलरी देना ही काफी नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि व्यक्ति इस काम की प्रकृति और जरूरतों के हिसाब से फिट बैठे। यदि पूरे इंडस्ट्री के नजरिए से देखें, तो अभी का समय चुनौतियों और मौकों दोनों से भरा है। एक तरफ कम मार्जिन और बदलाव का दबाव है, तो दूसरी तरफ नए मॉडल, बदलाव और कंसोलिडेशन आगे बढ़ने का रास्ता भी दिखा रहे हैं।

प्रोफेशनल मैनेजमेंट की ओर कदम

मैडिसन में अब एक बदलाव हो रहा है, जहां कंपनी को ज्यादा प्रोफेशनल तरीके से चलाने पर जोर दिया जा रहा है। यह बदलाव सीनियर लीडरशिप की तरफ से आ रहा है, जो कंपनी को ज्यादा सिस्टमेटिक और प्रोसेस के हिसाब से चलाना चाहती है।

बलसारा ने साफ-साफ कहा कि जब लोग कंपनी को “प्रोफेशनल” बनाने की बात करते हैं, तो उसका असली मतलब होता है कि अब उनके (फाउंडर के) दखल कम हो जाएगा। लेकिन वह इसे अच्छा संकेत मानते हैं। उनका कहना है कि यदि कोई कंपनी अपने फाउंडर के बिना भी अच्छे से चल सकती है, तो इसका मतलब है कि वह लंबे समय तक टिकेगी।

पार्टनरशिप: पैसे से ज्यादा सोच जरूरी

जब कंपनी में हिस्सेदारी बेचने की बात आई, तो बलसारा ने कहा कि अभी जल्दी कोई डील होने वाली नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके लिए सबसे जरूरी चीज वैल्यूएशन (कितने पैसे मिलेंगे) नहीं है, बल्कि यह है कि सामने वाले पार्टनर की सोच मिलती हो।

उनके मुताबिक पार्टनर ऐसा होना चाहिए जो इंडस्ट्री के भविष्य को समझे और उनसे भी ज्यादा आगे की सोच रखता हो। यानी सिर्फ पैसा लगाना काफी नहीं है, बल्कि पार्टनर को कंपनी की ग्रोथ में मदद करनी चाहिए और आने वाले समय के बदलावों में साथ देना चाहिए।

साथ ही, वह कोई जल्दीबाजी नहीं करना चाहते। उनका फोकस हमेशा लंबे समय की स्थिरता पर रहता है।

AI और भविष्य

AI को लेकर उन्होंने कहा कि बदलाव बहुत तेजी से हो रहा है और यह उम्मीद से भी जल्दी असर दिखा सकता है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि यह बदलाव हर जगह एक जैसा नहीं होगा- कुछ लोग जल्दी अपनाएंगे, जबकि कुछ पीछे रह जाएंगे।

एजेंसी के स्ट्रक्चर पर सवाल

बलसारा का मानना है कि “क्लाइंट सर्विस” जैसा शब्द सही नहीं है। असल में इस रोल का काम स्ट्रैटेजिक प्लानिंग होना चाहिए था। उन्होंने कहा कि क्रिएटिव और मीडिया टीम को सीधे साथ काम करना चाहिए, बीच में किसी तीसरे की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

छोटे बाजारों में छूटे मौके

बलसारा ने यह भी कहा कि छोटे शहरों और नए बिजनेस को एजेंसियां सही तरीके से नहीं पकड़ पा रही हैं। उनका कहना है कि ये बिजनेस अपने ग्राहकों को अच्छे से समझते हैं और उन्हें लोकल लेवल पर ठीक-ठाक सर्विस भी मिल रही है, लेकिन एजेंसियों के लिए यहां अभी भी बड़ा मौका है।

छोटे शहरों और नए बिजनेस के मामले में असली समस्या यह नहीं है कि उन्हें जानकारी नहीं है, बल्कि दिक्कत यह है कि उन्हें अच्छी और प्रोफेशनल सर्विस तक पहुंच (access) नहीं मिल पाती। जरूरत इस बात की है कि उन्हें ऐसे तरीके दिए जाएं, जिससे वे बेहतर और ज्यादा व्यवस्थित सर्विस ले सकें।

मीजरमेंट की समस्या

बलसारा ने मीजरमेंट (जैसे TRP, व्युअरशिप आदि) को लेकर साफ कहा कि यह एक गवर्नेंस की बड़ी कमी है। उनका कहना है कि यदि ऐडवर्टाइजर्स खुद रिसर्च के लिए पैसा दें, तो यह समस्या आसानी से हल हो सकती है।  अभी हालत यह है कि मीजरमेंट का कंट्रोल मीडिया ओनर्स के हाथ में होता है, जो सही नहीं है, क्योंकि इससे निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।

इतनी बड़ी इंडस्ट्री होने के बावजूद, एक स्वतंत्र और भरोसेमंद मेजरमेंट सिस्टम बनाने में बहुत ज्यादा खर्च नहीं लगेगा, यह कुल विज्ञापन खर्च का छोटा सा हिस्सा ही होगा। फिर भी अभी तक ऐसा सिस्टम नहीं बना है।

पॉलिटिकल कैंपेन

2014 से बीजेपी के कैंपेन पर काम करने के अनुभव को बताते हुए बलसारा ने कहा कि यह काम बहुत बड़े स्तर और हाई क्वॉलिटी का होता है। उन्होंने कहा कि इस काम में जुड़े लोग बहुत तेज, फोकस्ड, मेहनती और डिटेल पर ध्यान देने वाले होते हैं- ऊपर से नीचे तक पूरी टीम बहुत प्रोफेशनल तरीके से काम करती है।

साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि अब इस सिस्टम में टैलेंट का स्तर भी काफी बेहतर हो गया है। अच्छे लोगों को आकर्षित करने के लिए बेहतर सैलरी दी जा रही है, जिससे यह पूरा सिस्टम और मजबूत बन रहा है।

लगातार कई चुनावी कैंपेन करने से उनकी टीम का अनुभव बहुत तेजी से बढ़ा है। धीरे-धीरे पूरा सिस्टम ज्यादा समझदार (informed) और डेटा के आधार पर काम करने वाला (data-driven) बन गया है।

समय के साथ बनी सोच

इंडस्ट्री में बदलाव और आलोचना के अलावा, बलसारा की बातों में उनकी अपनी सोच भी साफ दिखती है, जो उन्होंने कई सालों के अनुभव से बनाई है। उनका फोकस बार-बार नई चीजें शुरू करने के बजाय लगातार एक ही चीज को बेहतर करते रहने पर है। वह दिखावे के बजाय असली काम को ज्यादा अहम मानते हैं और छोटे समय के फायदे के बजाय लंबे समय की वैल्यू पर भरोसा करते हैं।

वह फैसले भी सोच-समझकर लेते हैं, बिना जल्दीबाजी के। उनका मानना है कि बेसिक चीजों पर टिके रहना ज्यादा जरूरी है, बजाय इसके कि सिर्फ बड़ा दिखने या ज्यादा दिखने के पीछे भागा जाए।

एजेंसियों की बदलती छवि

बलसारा ने माना कि पहले “एजेंसी” शब्द को बहुत अच्छा और “कूल” माना जाता था, लेकिन अब इसकी छवि काफी बदल गई है। आज के समय में शेयर बाजार और बिजनेस दुनिया में इसे उतना अच्छा नहीं माना जाता। फिर भी वह पॉजिटिव हैं। उनका मानना है कि एजेंसी मॉडल आगे और बेहतर होगा।

उनके मुताबिक आने वाले समय में ऐडवर्टाइजर, मीडिया ओनर और एजेंसी- तीनों के बीच एक नया संतुलन बनेगा।

अंत में उन्होंने कहा कि बड़े बजट से ज्यादा असर बड़े आइडियाज का होता है, यानी अच्छी सोच और क्रिएटिविटी ही असली ताकत है।

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कंटेंट और क्रेडिबिलिटी ही मीडिया की रीढ़: विनोद अग्निहोत्री

वरिष्ठ पत्रकार और ‘अमर उजाला’ समूह में सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री ने समाचार4मीडिया के साथ खास बातचीत की है।

Last Modified:
Monday, 06 April, 2026
Vinod Agnihotri.

वरिष्ठ पत्रकार और ‘अमर उजाला’ समूह में सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री ने समाचार4मीडिया के साथ खास बातचीत की है। इस बातचीत में उन्होंने चार दशक से अधिक के अपने अनुभव के आधार पर मीडिया के बदलते स्वरूप, कंटेंट के बदलाव, संपादकीय और बाजार के संतुलन, डिजिटल प्रतिस्पर्धा, एआई की भूमिका, अखबारों के भविष्य और पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों पर विस्तार से अपनी बात रखी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के खास अंश:

आपने मीडिया में चार दशक से ज्यादा का समय देखा है। इस दौरान सबसे बड़ा बदलाव क्या मानते हैं?

देखिए, समय के साथ बदलाव होना स्वाभाविक है और बदलाव जरूरी भी है, क्योंकि अगर बदलाव नहीं होंगे तो जड़ता आ जाएगी। जब मैंने पत्रकारिता शुरू की थी, उस समय डिजिटल मीडिया का कोई अस्तित्व नहीं था। टेलीविजन के नाम पर केवल दूरदर्शन था और मुख्य रूप से अखबारों और पत्रिकाओं का दौर था। उस समय बड़ी-बड़ी पत्रिकाएं निकलती थीं, जिनका व्यापक प्रभाव होता था। अखबार भी सीमित शहरों से निकलते थे और उनके संस्करण कम होते थे। लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल गई है—अब अखबारों के कई-कई संस्करण हैं, उप-संस्करण हैं और हर 50-70 किलोमीटर पर नया एडिशन मिल जाता है। प्रसार बहुत बढ़ गया है और काम करने की पूरी कार्यप्रणाली भी बदल चुकी है।

कंटेंट के स्तर पर क्या बदलाव आए हैं?

जब मैंने पत्रकारिता शुरू की थी, उस समय जनसरोकार और राजनीति से जुड़ी खबरों को सबसे ज्यादा प्राथमिकता मिलती थी। पहले पन्ने पर वही खबरें होती थीं जो समाज और देश से जुड़ी होती थीं। खेल की खबरें भी अक्सर आखिरी पन्नों पर जाती थीं और बहुत बड़ी घटनाओं में ही उन्हें प्रमुखता मिलती थी। लेकिन धीरे-धीरे यह बदलने लगा। अब आप देखिए कि मनोरंजन, अपराध और लाइफस्टाइल से जुड़ी खबरें भी लीड बनती हैं और कई बार पहले पन्ने पर आती हैं। 90 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के बाद कंटेंट का स्वर बदलना शुरू हुआ और बाजार का प्रभाव बढ़ने लगा, जिससे खबरों की प्राथमिकताएं भी बदल गईं।

संपादकीय और विज्ञापन के बीच संतुलन में क्या बदलाव आया है?

पहले संपादकीय वर्चस्व का समय था। अगर विज्ञापन आता था और अखबार में जगह नहीं होती थी, तो संपादक के पास अधिकार होता था कि वह तय करे कि विज्ञापन को जगह देनी है या नहीं। संपादकीय निर्णय सर्वोपरि होते थे। लेकिन अब स्थिति उलट गई है। अब कमर्शियल दबाव बहुत ज्यादा हो गया है।  

आज की मीडिया में ‘सबसे पहले’ की होड़ को आप कैसे देखते हैं?

आज के दौर में सबसे पहले खबर देने की होड़ बहुत तेज हो गई है और इसी होड़ के कारण कई बार बिना पुष्टि के खबरें चला दी जाती हैं। लेकिन हमने अपने समय में एक स्पष्ट नीति बनाई थी कि जब तक रिपोर्टर खबर की पुष्टि नहीं करेगा, तब तक उसे नहीं चलाया जाएगा, भले ही वह खबर पांच मिनट देर से क्यों न जाए। अगर किसी माध्यम पर दर्शकों को यह भरोसा हो जाए कि यहां जो खबर मिलेगी वह पक्की होगी, तो वही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन जाती है। जल्दी के चक्कर में गलत खबर चलाने से थोड़े समय का फायदा हो सकता है, लेकिन लंबे समय में नुकसान ही होता है।

क्रेडिबिलिटी कितनी महत्वपूर्ण है?

क्रेडिबिलिटी किसी भी मीडिया संस्थान की सबसे बड़ी ताकत होती है। अगर आपने अपने दर्शकों या पाठकों के बीच यह विश्वास बना लिया कि यहां जो खबर आएगी वह पूरी तरह सही और प्रमाणिक होगी, तो यह आपकी सबसे बड़ी पहचान बन जाती है। यह भरोसा एक-दो दिन में नहीं बनता, इसमें समय लगता है—सालों लगते हैं। लेकिन एक बार यह स्थापित हो जाए तो आपका दर्शक वर्ग पूरी तरह आपके साथ जुड़ जाता है और आपको छोड़ता नहीं है। इसके उलट अगर आप गलत खबरें दिखाते हैं, तो धीरे-धीरे आपकी साख खत्म हो जाती है। कंटेंट और क्रेडिबिलिटी ही मीडिया की असली ताकत हैं।

डिजिटल मीडिया की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

डिजिटल मीडिया में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कई बार थंबनेल कुछ और होता है और अंदर का कंटेंट कुछ और होता है। इससे शुरुआत में लोगों को आकर्षित किया जा सकता है, व्यूज मिल सकते हैं और सब्सक्राइबर भी बढ़ सकते हैं। लेकिन यह लंबे समय तक नहीं चलता। धीरे-धीरे दर्शकों को समझ आने लगता है कि उन्हें भ्रमित किया जा रहा है, और फिर वे उस प्लेटफॉर्म से दूर होने लगते हैं। इसलिए यह एक गंभीर समस्या है और इससे बचना जरूरी है।

मीडिया में AI की एंट्री को आप कैसे देखते हैं?

तकनीक हमेशा एक साधन होती है और ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI) भी उसी तरह एक साधन है। इससे काम आसान होता है, जानकारी जल्दी मिलती है और कई प्रक्रियाएं सरल हो जाती हैं। लेकिन इसे पूरी तरह अपनाकर उस पर निर्भर हो जाना सही नहीं है। एआई का इस्तेमाल सपोर्ट के रूप में करना चाहिए—जैसे एडिटिंग में या अतिरिक्त जानकारी लेने में। लेकिन ह्यूमन इंटरवेंशन यानी मानवीय दखल जरूरी है, क्योंकि अगर सब कुछ एआई करेगा तो कंटेंट में एकरूपता आ जाएगी और विविधता खत्म हो जाएगी।

तकनीक ने पत्रकारिता को कैसे बदला?

जब हमने शुरुआत की थी, उस समय खबरें बहुत मुश्किल तरीके से आती थीं। दूर-दराज के संवाददाता बसों के जरिए पैकेट भेजते थे, जो कई दिन बाद ऑफिस पहुंचते थे। कई बार जरूरी खबरें फोन पर नोट कराई जाती थीं। अब सोचिए कि जो खबर सोमवार को हुई, वह गुरुवार को छपती थी। लेकिन अब तकनीक के विकास के साथ टेलीप्रिंटर, फैक्स, मॉडम, कंप्यूटर और इंटरनेट आ गए हैं। आज गूगल के जरिए तुरंत जानकारी मिल जाती है और खबरें तुरंत पहुंच जाती हैं। इससे पत्रकारिता बहुत तेज और आसान हो गई है।

अखबारों के भविष्य को आप कैसे देखते हैं?

अखबारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पढ़ने की आदत का कम होना है। पहले लोग अखबार को बहुत ध्यान से पढ़ते थे—यहां तक कि एक अखबार को कई लोग मिलकर पढ़ते थे और गांवों में एक व्यक्ति दूसरों को पढ़कर सुनाता था। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। लोग अखबार को सिर्फ स्कैन करते हैं, पूरी तरह पढ़ते नहीं हैं। नई पीढ़ी पढ़ने से ज्यादा देखने में रुचि ले रही है, जो अखबारों के लिए एक बड़ी चुनौती है।

टीवी डिबेट्स और टीआरपी की दौड़ पर आपकी राय?

पहले टीवी डिबेट्स में काफी शोर-शराबा और टकराव देखने को मिलता था, लेकिन अब उसमें कुछ कमी आई है क्योंकि दर्शकों को यह पसंद नहीं आ रहा था और टीआरपी भी नहीं मिल रही थी। हालांकि टीआरपी की दौड़ अब भी जारी है और यही दबाव चैनलों को कई बार अलग तरह का कंटेंट दिखाने के लिए मजबूर करता है। इसलिए इस पर नियंत्रण होना भी जरूरी है।

आपकी किताब ‘आंदोलनजीवी’ लिखने का अनुभव कैसा रहा?

इस किताब को लिखने की योजना काफी समय से थी, लेकिन समय नहीं मिल पा रहा था। कोरोना काल में जब समय मिला, तब इसे पूरा कर पाया। यह किताब मेरे पत्रकारिता जीवन के उस हिस्से को दर्शाती है, जिसमें मैंने विभिन्न आंदोलनों को कवर किया है। खासकर किसान आंदोलन और अन्य जन आंदोलनों को करीब से देखने और समझने का जो अनुभव रहा, वही इस किताब का आधार है।

क्या आप किसी नई किताब पर काम कर रहे हैं?

हां, मैं पत्रकारिता पर एक किताब लिख रहा हूं, जो काफी हद तक पूरी हो चुकी है। इसमें मेरे अनुभव, विभिन्न संस्थानों में काम करने के दौरान सीखी गई बातें और पत्रकारिता के व्यावहारिक पहलुओं को शामिल किया गया है। यह किताब पत्रकारिता के विद्यार्थियों और मीडिया में काम कर रहे लोगों के लिए उपयोगी होगी, क्योंकि इसमें वास्तविक अनुभवों के आधार पर बातें रखी गई हैं।

पत्रकारिता में निष्पक्षता को आप कैसे देखते हैं?

कोई भी व्यक्ति पूरी तरह निष्पक्ष नहीं हो सकता, क्योंकि हर किसी की अपनी पसंद और विचार होते हैं। लेकिन पत्रकार को हमेशा सत्य और तथ्य के साथ खड़ा होना चाहिए। निष्पक्षता का मतलब यह नहीं है कि हर स्थिति में दोनों पक्षों को बराबर दिखाया जाए, बल्कि यह है कि सही को सही और गलत को गलत कहा जाए। पीड़ित का पक्ष सामने लाना और सत्ता से सवाल करना पत्रकार का कर्तव्य है।

रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकार को क्या ध्यान रखना चाहिए?

रिपोर्टिंग करते समय पत्रकार को अपनी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से ऊपर उठना चाहिए। अगर किसी घटना या रैली में बड़ी संख्या में लोग मौजूद हैं, तो उसे उसी रूप में दिखाना चाहिए, जैसा वह है। तथ्य और सत्य के साथ कोई समझौता नहीं होना चाहिए। पत्रकार का काम है सही जानकारी देना, न कि उसे अपने नजरिए के अनुसार बदलना।

युवा पत्रकारों के लिए आपका क्या संदेश है?

युवा पत्रकारों को सबसे पहले यह समझना चाहिए कि तकनीक एक साधन है, उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। इसके साथ ही पढ़ना बहुत जरूरी है—ज्यादा से ज्यादा किताबें पढ़नी चाहिए, अपने विषय को गहराई से समझना चाहिए और लोगों से लगातार संपर्क में रहना चाहिए। गूगल से जानकारी मिल सकती है, लेकिन ज्ञान और समझ पढ़ने और अनुभव से ही आती है। इसलिए पढ़ना और लोगों से जुड़ना बेहद जरूरी है। 

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सिर्फ सत्ता नहीं, बदलाव की कहानी है ‘Revolutionary Raj’: आलोक मेहता

वरिष्ठ संपादक (पद्मश्री) और जाने-माने लेखक आलोक मेहता ने अपनी कॉफी टेबल बुक “Revolutionary Raj: Narendra Modi’s 25 Years” से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है।

Last Modified:
Thursday, 19 February, 2026
Alok Mehta New Book

वरिष्ठ संपादक (पद्मश्री) और जाने-माने लेखक आलोक मेहता की नई कॉफी टेबल बुक “Revolutionary Raj: Narendra Modi’s 25 Years” हाल ही में प्रकाशित हुई है। शुभी पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों (गुजरात के नेतृत्व से लेकर देश की बागडोर संभालने तक) की राजनीतिक, प्रशासनिक और वैचारिक यात्रा का विश्लेषण किया गया है। इस पुस्तक की भूमिका केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने लिखी है। इस पुस्तक से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर समाचार4मीडिया ने आलोक मेहता से विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस विशेष बातचीत के प्रमुख अंश:

आपको यह किताब “Revolutionary Raj: Narendra Modi’s 25 Years” लिखने का विचार कैसे आया? इसे तैयार करने में कितना समय लगा और इसके नाम के पीछे क्या सोच है?

यह विचार मूल रूप से पब्लिशर शुभी पब्लिकेशंस की ओर से आया। वे पहले भी मेरी पुस्तक “नमन नर्मदा” प्रकाशित कर चुके हैं, जिसकी भूमिका स्वयं प्रधानमंत्री ने लिखी थी। उनका सुझाव था कि मैं वर्षों से अखबारों और विभिन्न मंचों पर जो विश्लेषण लिखता रहा हूँ, उसे एक व्यवस्थित और प्रेज़ेंटेबल कॉफी टेबल बुक के रूप में संकलित किया जाए।

मैंने सोचा कि पिछले 25 वर्षों में नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक यात्रा (गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में 13 वर्ष और उसके बाद प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल) को एक समग्र परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। यह केवल 10 वर्षों का नहीं, बल्कि 25 वर्षों के प्रशासनिक अनुभव का विश्लेषण है।

जहां तक नाम की बात है, “Revolutionary Raj” का आशय केवल सत्ता से नहीं, बल्कि उस परिवर्तन से है जो सामाजिक, प्रशासनिक और विकासात्मक स्तर पर दिखाई देता है। क्रांति केवल राजनीतिक उथल-पुथल नहीं होती; पंचायत से लेकर कश्मीर और नॉर्थ-ईस्ट तक जो बदलाव आए, वे भी एक प्रकार का परिवर्तन हैं।

इस किताब की खासियत क्या है, जो पाठकों को इसे पढ़ने के लिए प्रेरित करे?

यह एक विश्लेषणात्मक संदर्भ पुस्तक है। इसमें पंचायत स्तर पर हुए बदलाव, ग्रामीण विकास, बिजली-पानी की उपलब्धता, औद्योगिक विकास, सामाजिक सुधार, स्वास्थ्य योजनाएँ जैसे आयुष्मान भारत, शिक्षा और विदेश नीति—इन सभी पहलुओं को समेटने की कोशिश की गई है। मैं स्वयं एक छोटे गांव से आया हूँ, जहां कभी सड़क, पानी और बिजली जैसी सुविधाएं नहीं थीं। आज जो परिवर्तन दिखता है, उसे एक पत्रकार की दृष्टि से समझना जरूरी है। यह पुस्तक उसी परिवर्तन को परखने और समझने का प्रयास है।

क्या इसमें आलोचनात्मक दृष्टिकोण को भी जगह दी गई है?

यह पुस्तक मेरी दृष्टि से लिखा गया विश्लेषण है। मैंने केवल उपलब्धियों की सूची नहीं बनाई, बल्कि चुनौतियों और समस्याओं का भी उल्लेख किया है—जैसे कश्मीर की परिस्थितियाँ, नॉर्थ-ईस्ट की जटिलताएँ, आतंकवाद और विदेश नीति से जुड़ी चुनौतियां। मेरा मानना है कि पत्रकार का काम केवल आलोचना करना नहीं, बल्कि सकारात्मक परिवर्तनों को भी दर्ज करना है। यदि समाज में 80 प्रतिशत सुधार हुआ है और 20 प्रतिशत समस्याएं हैं, तो दोनों को संतुलित रूप में देखना चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को जब आपने यह पुस्तक भेंट की, तो उनकी क्या प्रतिक्रिया रही?

प्रधानमंत्री जी के लिए यह एक सरप्राइज़ था। इस बारे में मैंने पहले कोई औपचारिक चर्चा नहीं की थी। उन्होंने इसे सकारात्मक रूप से लिया और इस बात पर सहमति जताई कि ऐसी पुस्तकों को लाइब्रेरी तक पहुंचना चाहिए ताकि अधिक लोग पढ़ सकें। अमित शाह जी से भी चर्चा के दौरान मैंने यही आग्रह किया कि लाइब्रेरी सिस्टम को प्रोत्साहित किया जाए। यह किसी सरकार द्वारा प्रायोजित पुस्तक नहीं है, बल्कि एक स्वतंत्र पत्रकार का विश्लेषण है।

क्या आपको लगता है कि मीडिया इन विकासात्मक पहलुओं को पर्याप्त गहराई से नहीं देखता?

मीडिया का स्वभाव आलोचनात्मक होता है और होना भी चाहिए। कमियां उजागर करना उसका दायित्व है। लेकिन साथ ही सकारात्मक बदलावों को भी दर्ज करना जरूरी है। राज्यों में क्षेत्रीय भाषाओं के अखबार कई अच्छे कार्यों को विस्तार से प्रकाशित करते हैं। केवल दिल्ली-केंद्रित दृष्टि से भारत को नहीं देखा जा सकता। विकास और परिवर्तन को संतुलित दृष्टिकोण से देखना आवश्यक है।

डिजिटल दौर में क्या किताबों की प्रासंगिकता कम हो रही है?

मुझे ऐसा नहीं लगता। जब टीवी आया तब कहा गया कि अखबार खत्म हो जाएंगे। जब इंटरनेट आया, तब कहा गया कि किताबें नहीं पढ़ी जाएंगी। लेकिन पुस्तक मेलों में आज भी भारी भीड़ होती है। भारत ही नहीं, दुनिया भर में लोग पढ़ रहे हैं। डिजिटल और पुस्तक—दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। पढ़ने की आदत खत्म नहीं हुई है।

क्या इस पुस्तक का हिंदी संस्करण भी आएगा?

यह निर्णय पब्लिशर पर निर्भर करता है। कॉफी टेबल बुक महंगी होती है, इसलिए संभव है कि हिंदी संस्करण अलग प्रारूप में आए। कई लोगों ने इसकी मांग की है। उम्मीद है कि भविष्य में यह हिंदी पाठकों तक भी पहुंचे।

आलोक मेहता के साथ इस पूरी बातचीत को आप यहां विस्तार से सुन/देख सकते हैं।

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