एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप द्वारा हाल ही में हुए आयोजित 'एक्सचेंज4मीडिया' जर्नलिज्म 40 अंडर 40 के मंच पर 'इंडिया टुडे' के मैनेजिंग एडिटर गौरव सावंत ने पत्रकारिता, भारत की बदलती वैश्विक छवि, पश्चिमी मीडिया के नजरिए, देश के मीडिया की ताकत और नैरेटिव की लड़ाई जैसे कई अहम मुद्दों पर खुलकर बात की। एक्सचेंज4मीडिया के सीनियर एडिटर रुहैल अमीन के साथ हुई फायरसाइड चैट में गौरव सावंत ने कहा कि भारत को अपनी कहानी खुद मजबूती से दुनिया के सामने रखनी होगी। उन्होंने कहा कि अगर पश्चिमी मीडिया भारत को किसी खास नजरिए से दिखाता है तो भारत को उस नैरेटिव को स्वीकार करने के बजाय तथ्यों और अपनी पत्रकारिता के जरिए उसका जवाब देना चाहिए।
यहां पढ़िए बातचीत का पूरा अंश:
दुनिया की मीडिया ने भारत को लंबे समय से अलग-अलग नजरिए से पेश किया है। कई बार भारत को लेकर आलोचनाएं भी होती रही हैं। भारत पिछले कुछ वर्षों में काफी तेजी से बदला है। क्या आपको लगता है कि पत्रकारिता भारत के इस बदलाव के साथ कदम मिला पाई है?
अगर भारत के संदर्भ में बात करें तो हमें कई उदाहरण दिखाई देते हैं। जैसे अनुच्छेद 370 का मामला। भारत की संसद हमारी लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्थाओं में से एक है और वहां चुने हुए जनप्रतिनिधियों ने अनुच्छेद 370 को लेकर फैसला किया। अब देखिए कि दुनिया की मीडिया ने उस फैसले पर कैसी प्रतिक्रिया दी और वह प्रतिक्रिया कितनी प्रतिकूल थी।
दूसरी तरफ आज पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में जो स्थिति है, उसे देखिए। वहां बड़े पैमाने पर हिंसा और लोगों की मौत की खबरें सामने आई हैं। लेकिन वही पश्चिमी मीडिया और वही बड़े अखबार पाकिस्तान को लेकर बेहद नरम रवैया अपनाते हुए दिखाई देते हैं। मैं किसी एक अखबार का नाम लेकर बात नहीं करना चाहता, लेकिन अगर आप उनकी हेडलाइंस देखें तो फर्क साफ नजर आता है।
मेरे हिसाब से पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देश के रूप में जाना जाता रहा है। लेकिन भारत की तुलना उससे करना मेरा उद्देश्य नहीं है। मेरा कहना सिर्फ इतना है कि भारत का उभरना कुछ लोगों के लिए एक अलग तरह की चुनौती है। कई अमेरिकी अधिकारियों के बयानों में भी यह बात अलग-अलग शब्दों में सामने आई है कि जिस तरह चीन आगे बढ़ा, उसी तरह भारत को आगे बढ़ने नहीं दिया जाएगा।
मीडिया का एक हिस्सा भी इसी सोच से प्रभावित दिखाई देता है। जम्मू-कश्मीर के मौजूदा हालात को देखिए। वहां लोगों के मारे जाने, परेशान किए जाने और गिरफ्तार या अगवा किए जाने जैसी घटनाओं पर पश्चिमी मीडिया की कवरेज बहुत सीमित दिखाई देती है। अल जजीरा ने भी हाल में एक छोटी रिपोर्ट की, लेकिन सवाल यह है कि बाकी मीडिया कहां है?
इसके उलट भारत में जो कुछ भी होता है, उस पर तुरंत ध्यान दिया जाता है। इसलिए मेरा मानना है कि पश्चिम चाहे भारत के उभरने को स्वीकार करे या नहीं, भारत को आगे बढ़ना होगा।
आपके हिसाब से आज भारत का नैरेटिव कौन बना रहा है? इस कथित पक्षपात की वजह क्या है?
अगर आप अनुमति दें तो मैं एक तस्वीर के जरिए इसे समझाना चाहूंगा। यह तस्वीर बताती है कि पश्चिम भारत को किस नजरिए से देखता है।

मान लीजिए भारत मंगलयान या किसी दूसरे अंतरिक्ष मिशन के जरिए अंतरिक्ष में बड़ी उपलब्धि हासिल करता है। पश्चिमी नजरिए में इसे किस तरह दिखाया जा सकता है? एक गरीब किसान, जिसके साथ गाय है और वह किसी तरह अंतरिक्ष के किसी बड़े क्लब में प्रवेश करने की कोशिश कर रहा है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत वास्तव में ऐसा है? क्या हम किसी और को यह तय करने देंगे कि भारत को दुनिया के सामने किस रूप में दिखाया जाए? मेरा मानना है कि बिल्कुल नहीं।
क्या यही भारत है? खासकर जब आप यहां बैठे 40 अंडर 40 के युवाओं को देखते हैं, तो सवाल उठता है कि क्या हम उन्हें दूसरों से लेक्चर लेने देंगे?
एक समय ऐसा था जब शायद हमें लगता था कि भारत में पर्याप्त प्रतिभा नहीं है और इसलिए पश्चिम से संपादकों को बुलाना चाहिए, चाहे वे भारतीय हों या विदेशी। लेकिन मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूं कि जब 1947 में हम आजाद हुए तो भारतीय सेना ने कम उम्र के अधिकारियों को बड़ी जिम्मेदारियां दी थीं।
उदाहरण के लिए ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान सिर्फ 37 साल के थे, जब उन्होंने ब्रिगेड कमांडर के तौर पर मोर्चे से नेतृत्व किया। इसका मतलब है कि भारत के लोगों में चुनौती के समय आगे बढ़ने और जिम्मेदारी संभालने की क्षमता हमेशा रही है।
हमें पश्चिम से किसी के उपदेश की जरूरत नहीं है। उनके लोकतंत्र की परिभाषा हमें क्यों स्वीकार करनी चाहिए?
आप लोकतंत्र की बात कर रहे हैं। पश्चिमी मीडिया ने भारत को कभी-कभी 'elected autocracy' यानी 'निर्वाचित तानाशाही' जैसे शब्दों से भी पेश किया है। आप इसे कैसे देखते हैं?
क्या भारत में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के बावजूद व्यवस्था निरंकुश होती जा रही है? क्या सच में ऐसा है? मुझे लगता है कि इस तरह की भाषा 140 करोड़ भारतीयों का मजाक उड़ाने जैसी है। अभी हाल में ही हमने देखा कि Gen Z के विरोध-प्रदर्शन के बाद सरकार को दबाव का सामना करना पड़ा और एक मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। क्या यह हमारे देश में पहली बार हुआ है? बिल्कुल नहीं।
किसान कानूनों का उदाहरण देखिए। किसानों ने सड़कों पर उतरकर विरोध किया और आखिरकार उन कानूनों को वापस लेना पड़ा। इसका मतलब यह है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज का असर होता है।
तो क्या हम पश्चिम को यह अधिकार देंगे कि वह हमें बताए कि हमारा लोकतंत्र कैसा होना चाहिए? मुझे नहीं लगता। मुझे लगता है कि नया भारत उनके तय किए हुए नियमों के हिसाब से नहीं चल रहा है।
हाल के Gen Z विरोध-प्रदर्शनों को पश्चिमी मीडिया ने जिस तरह कवर किया, उसमें आपको सबसे ज्यादा क्या परेशान करने वाला लगा? क्या कोई खास हेडलाइन थी जिसने आपको झकझोर दिया?
सच कहूं तो मैं उन युवाओं के सड़कों पर उतरने के तरीके से काफी प्रभावित और गर्व महसूस कर रहा था। मुझे यह देखकर अच्छा लगा कि युवा किसी मुद्दे को लेकर अपनी आवाज उठा रहे थे।
भारत की मीडिया हो या दुनिया की मीडिया, कई जगहों पर इस घटना की कवरेज हुई। कुछ लोगों ने इसे भारत के 'Arab Spring' जैसे आंदोलन के रूप में पेश करने की कोशिश की। एक ऑस्ट्रेलियाई अकादमिक वेद्म की आलोचना करने वालों ने भी इस बात को उठाया कि कुछ लोग इसे भारत का अरब स्प्रिंग मोमेंट बता रहे थे। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं था।
मैं खुद मिस्र में था, जब काहिरा में तहरीर स्क्वायर का आंदोलन हुआ था। उस समय मैंने वहां के लोगों से बात की थी। मैं श्रीलंका में भी जमीन पर था, जब वहां लोग व्यवस्था के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे।
भारत में स्थिति अलग थी। यहां युवा एक खास मकसद से सड़कों पर आए। उन्होंने अपनी मांग रखी, वह मांग पूरी हुई और वे अपने घर लौट गए। वे चाहते थे कि एक मंत्री इस्तीफा दें। वे परीक्षा व्यवस्था में सुधार चाहते थे। परीक्षा व्यवस्था में सुधार का फैसला भारत के कानून बनाने वाले प्रतिनिधि करेंगे।
इसे इस तरह पेश करना कि यह भारत का अरब स्प्रिंग है या श्रीलंका, नेपाल या बांग्लादेश जैसी स्थिति है, सही नहीं है। भारत में जनता अपनी पसंद के प्रतिनिधियों को वोट देती है और फिर वही चुने हुए प्रतिनिधि संसद में जनता की इच्छा के आधार पर फैसले लेते हैं।
हम एक बहुत मजबूत लोकतंत्र हैं। दुनिया इसे स्वीकार करना चाहे या न चाहे, कुछ लोग हमारे लोकतंत्र को 'elected autocracy' कहकर बदनाम करने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन मैं इसे बिल्कुल नहीं मानता।
हमारा लोकतंत्र बहुत मजबूत है और हमारी मीडिया भी बहुत मजबूत है।
आप भारतीय मीडिया को किस तरह देखते हैं?
भारत में बहुत मजबूत और बेहद जीवंत मीडिया है। मैं उन शब्दों का इस्तेमाल भी नहीं करना चाहता जो कुछ लोग भारतीय मीडिया के लिए करते हैं। मैं उन बातों को नहीं मानता। भारत में मीडिया की संख्या और पहुंच बहुत बड़ी है। हमारे यहां बड़ी संख्या में अखबार और पत्रिकाएं हैं। देश में करीब 1.5 लाख के आसपास प्रकाशन होने की बात कही जाती है। इसके अलावा करीब 900 चैनल हैं, जिनमें 400 से ज्यादा टेलीविजन न्यूज चैनल बताए जाते हैं।
इसके साथ डिजिटल मीडिया है, जिसकी पहुंच करोड़ों लोगों तक है। ऐसे में आप सोचिए कि भारत के मीडिया को कोई कैसे नियंत्रित या पूरी तरह सीमित कर सकता है?
अगर कोई यह सोचता है कि भारत के मीडिया को पूरी तरह कंट्रोल किया जा सकता है तो यह उसकी अपनी समझ पर सवाल खड़ा करता है।
फिर भी कई बार ऐसा क्यों लगता है कि भारत की अपनी कहानी वैश्विक स्तर पर कहीं खो जाती है? क्या भारतीय पत्रकारों के कहानी बताने के तरीके में कोई समस्या है?
इसे मैं प्रथम विश्व युद्ध के trench warfare यानी खाइयों में लड़ी जाने वाली लड़ाई जैसा मानता हूं। आपको अपनी जगह पर बने रहना होगा। आपको एक ही बात बार-बार कहनी होगी। आपको वहां मौजूद रहना होगा और लगातार अपनी बात रखनी होगी।
अगर आप सही बात कह रहे हैं और आपके पास सच्चाई है तो आखिरकार लोग उसे स्वीकार करेंगे।
हमारे देश में आत्मसुधार यानी self-correction की व्यवस्था भी है। अगर कोई चीज गलत होती है, चाहे वह मीडिया से जुड़ी हो या किसी और क्षेत्र से, उसे ठीक करने के लिए व्यवस्थाएं मौजूद हैं।
ऐसा नहीं है कि कोई भी गलत बात कहकर बच जाएगा।
आज सोशल मीडिया भी मीडिया पर नजर रखता है। दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म भी नजर रखते हैं। अगर कोई पत्रकार गलत बात कहता है तो उसे तुरंत सामने लाया जाता है। आप इस इंडस्ट्री में गलत जानकारी के साथ लंबे समय तक नहीं टिक सकते।
अगर आप सच्चाई के साथ ईमानदार नहीं हैं और तथ्यों को छिपाते या तोड़ते-मरोड़ते हैं तो आप इस इंडस्ट्री में टिक नहीं पाएंगे। विश्वसनीयता यानी credibility ऐसी चीज है जिसका हर कोई सम्मान करता है और उसे महत्व देता है।
आपने पश्चिमी मीडिया की बात की। यूक्रेन युद्ध के दौरान भी पश्चिमी मीडिया के नैरेटिव पर सवाल उठे थे। आप इसे किस तरह देखते हैं?
जब मैं फरवरी 2022 में यूक्रेन पहुंचा था, उस समय युद्ध शुरू भी नहीं हुआ था। उस समय जो नैरेटिव बनाया जा रहा था, उसमें कहा जा रहा था कि रूस पीछे है, यूक्रेन हमला करेगा या रूस हमला करेगा और यूक्रेन जीतने की स्थिति में है।
2022 से जिस तरह का नैरेटिव बनाया गया, वह यह था कि रूस हार रहा है और यूक्रेन जीत रहा है।
अब 2026 आ चुका है। इतने सालों बाद भी सवाल यही है कि क्या यूक्रेन ने युद्ध जीत लिया है?
पश्चिमी हथियारों की बड़ी मदद के बावजूद यूक्रेन को भारी नुकसान हुआ है। बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं और क्षेत्र का भी नुकसान हुआ है।
हमने खुद जमीन पर जाकर यूक्रेन और रूस से रिपोर्टिंग की है। इसलिए जमीन पर जो स्थिति हमने देखी और जिस तरह का नैरेटिव बनाया गया, उसमें अंतर साफ दिखाई देता था।
इसी तरह इराक में 2003 में सामूहिक विनाश के हथियार यानी Weapons of Mass Destruction यानी WMD होने की बात कही गई थी। मैं उस समय इराक में जमीन पर रिपोर्टिंग कर रहा था। जब सद्दाम हुसैन की सत्ता खत्म हुई तो वहां वे हथियार नहीं मिले जिनके नाम पर इतना बड़ा नैरेटिव बनाया गया था।
तो सवाल उठता है कि वे WMD कहां थे?
इसी तरह आज ईरान को लेकर भी सवाल हैं। अमेरिका ईरान पर बड़ा हमला कर रहा है और यह कहा जा रहा है कि ईरान दबाव में है। लेकिन क्या वास्तव में स्थिति इतनी सीधी है? हमने जमीन पर जो देखा है, वह कई बार अलग तस्वीर दिखाता है।
क्या आपको लगता है कि पश्चिमी मीडिया का भारत को देखने का नजरिया बदलेगा? क्या इसके कोई संकेत दिख रहे हैं या यह पूर्वाग्रह इतना गहरा है कि हमें इसे स्वीकार करना पड़ेगा?
हमें इसे स्वीकार करने की जरूरत नहीं है। हमें इसका जवाब देना होगा।
अगर कोई गलत नैरेटिव बनाया जाता है तो हमें उसका मुकाबला करना होगा। उस कार्टून का उदाहरण देखिए, जिसकी आलोचना के बाद माफी भी मांगी गई थी।
हर बार जब हम बेहतर करेंगे, उन्हें भी अपनी सोच बदलनी पड़ेगी और भारत को देखने का तरीका बदलना पड़ेगा।
कबीर ने भी कहा है कि आलोचक को अपने पास रखना चाहिए, क्योंकि आलोचक आपको बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। लेकिन अगर उस आलोचक का अपना एजेंडा है और वह किसी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए काम कर रहा है, तो आखिरकार वह भी सामने आ जाएगा।
नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA को लेकर भी काफी बड़ा नैरेटिव बनाया गया था। आप इसे किस तरह देखते हैं?
हममें से बहुत से लोगों ने भारत में हुए CAA विरोधी प्रदर्शनों और दंगों को कवर किया था।
उस समय किस तरह का नैरेटिव बनाया गया था? यह कहा गया कि भारतीय मुसलमान अपनी नागरिकता खो देंगे।
शाहीन बाग जैसे प्रदर्शन हुए। लोग सड़कों पर आए। लेकिन सवाल यह है कि CAA का भारतीय मुसलमानों की नागरिकता या उनके वोटिंग अधिकार से क्या लेना-देना था?
CAA का उद्देश्य क्या था? यह भारत के पड़ोसी देशों में परेशान किए जा रहे कुछ धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने से जुड़ा कानून था। इनमें हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन और ईसाई समुदायों के लोग शामिल थे।
अगर भारत के पड़ोसी देशों में इन समुदायों के लोगों को प्रताड़ित किया जाता है तो उन्हें भारत में नागरिकता देने का प्रावधान किया गया। इसका भारतीय मुसलमानों की नागरिकता छीनने से कोई संबंध नहीं था।
मेरे अनुसार कुछ लोगों ने इस मुद्दे को एक एजेंडे के रूप में पेश किया। देश के अंदर और विदेशों में मौजूद कुछ लोगों को सच्चाई पता थी। ऐसा नहीं था कि वे अनपढ़ थे या उन्हें कानून की जानकारी नहीं थी। सच्चाई उनके सामने थी। इसके बावजूद उन्होंने एक खास एजेंडा आगे बढ़ाया और उसका असर देश में हुए प्रदर्शनों और दंगों के रूप में सामने आया।
क्या दूसरे देशों में भी ऐसे कानून या व्यवस्थाएं नहीं रही हैं?
अमेरिका में भी कुछ इसी तरह की व्यवस्थाएं रही हैं। वे बिल्कुल वैसी नहीं थीं, लेकिन कुछ कानूनों के जरिए विशेष समुदायों के लोगों को शरणार्थी या नागरिकता संबंधी प्राथमिकता दी गई।
उदाहरण के तौर पर, अमेरिका में सोवियत संघ और ईरान जैसे देशों से आने वाले यहूदियों, बहाइयों और ईसाइयों को शरणार्थी दर्जे में प्राथमिकता देने जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख मिलता है।
ऐसी व्यवस्थाएं दूसरे देशों में हो सकती हैं, लेकिन अगर भारत अपने पड़ोसी देशों में परेशान किए जा रहे अल्पसंख्यकों के लिए ऐसी व्यवस्था बनाता है तो उस पर सवाल उठाए जाते हैं।
इसी वजह से मेरा मानना है कि एक ऐसा पूरा ecosystem मौजूद है जो किसी खास नैरेटिव या एजेंडे को आगे बढ़ा सकता है।
क्या भारत में अल्पसंख्यकों पर हमले को लेकर भी ऐसे नैरेटिव बनाए गए हैं?
एक समय ऐसा भी था जब कहा गया कि भारत में अल्पसंख्यक खतरे में हैं। हमें एक मामले की रिपोर्टिंग याद है जिसमें कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे और उसे भी एक बड़े नैरेटिव के रूप में पेश किया गया। बाद में जांच में सामने आई सच्चाई अलग थी।
यही वजह है कि समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। मेरा विश्वास है कि आखिरकार सच सामने आता है। लेकिन जब सच सामने आए तो उसे भी बार-बार सामने रखना जरूरी है।
उदाहरण के लिए जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी करने वालों को लेकर भी एक खास नैरेटिव बनाया गया।
जब पैलेट गन का इस्तेमाल शुरू हुआ तो हम जमीन पर इसकी रिपोर्टिंग कर रहे थे। एक वर्ग की विदेशी मीडिया ने इस पर एक अलग नैरेटिव बनाया। लेकिन यह समझना जरूरी है कि पैलेट गन को 2010 के बाद एक गैर-घातक भीड़ नियंत्रण उपाय के रूप में इस्तेमाल किया गया था।
अगर इसके इस्तेमाल में कुछ गलत है तो उसका समाधान हमारी अपनी व्यवस्था के भीतर होना चाहिए।
लेकिन सवाल यह भी है कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए क्या इस्तेमाल किया जाए? क्या असली हथियारों का इस्तेमाल किया जाए? क्या दूसरी तरह के हथियारों का इस्तेमाल किया जाए? या कोई और crowd-control mechanism अपनाया जाए?
पश्चिम में भी कई जगहों पर ऐसे उपाय किए जाते हैं। वहां कभी-कभी इन चीजों को नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि भारत में उसी तरह की कार्रवाई पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है।
हमें इस दोहरे रवैये को सामने लाना चाहिए।
रत के मीडिया को इस तरह के सूचना युद्ध और प्रोपेगेंडा का मुकाबला करने के लिए क्या करना चाहिए?
हमें इसका मुकाबला करना होगा। इसे लेकर हम बिल्कुल स्पष्ट हैं।
भारत की मीडिया को अपनी जगह पर खड़े रहकर सच्चाई बतानी होगी। लगातार और तथ्य के साथ अपनी बात रखनी होगी।
अगर पश्चिमी देशों में बैठे लोग भारत को एक खास नजरिए से देखते हैं तो हम वहां बैठे लोगों की सोच कैसे बदल सकते हैं? भारत जब कोई उपलब्धि हासिल करता है, तब भी क्या उसे सही तरीके से नहीं देखा जाता?
उपलब्धियां बहुत मायने रखती हैं। आपको एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए- दुनिया उगते हुए सूरज को सलाम करती है। जब आप खुद उगता हुआ सूरज बनेंगे, तो दुनिया आपको सलाम करेगी।
इसलिए हमें अपने काम और अपनी उपलब्धियों पर ध्यान देना चाहिए।
आज शाम यहां 40 अंडर 40 के युवा विजेता मौजूद हैं। आप उन्हें भारत की रिपोर्टिंग को लेकर क्या सलाह देना चाहेंगे? उन्हें भारत को किस तरह रिपोर्ट करना चाहिए?
उन्हें अपने दिल और आत्मा से पत्रकारिता करनी चाहिए।
मैं पिछले 32 वर्षों से रिपोर्टिंग कर रहा हूं और मैंने अपने काम के हर दिन का आनंद लिया है। मैंने जम्मू-कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक देश के अलग-अलग हिस्सों में रिपोर्टिंग की है। मैंने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से भी रिपोर्टिंग की है।
मेरा मानना है कि पत्रकारिता करने के लिए जमीन पर जाना बहुत जरूरी है। आपको खुद जाकर चीजों को देखना चाहिए, लोगों से बात करनी चाहिए और फिर अपनी रिपोर्ट बनानी चाहिए।
आज के समय में पत्रकारों के पास पहले से कहीं ज्यादा माध्यम हैं। पहले शायद आपको 400 शब्दों की एक स्टोरी लिखनी होती थी। आज इंस्टाग्राम है, ट्विटर है, अखबार है, डिजिटल है, टेलीविजन है। अंग्रेजी है, हिंदी है, क्षेत्रीय भाषाएं हैं। पॉडकास्ट हैं और ब्लॉग भी हैं।
आज पत्रकारों के पास अपनी बात रखने के लिए बहुत सारे माध्यम हैं।
इसलिए आपको किसी को जवाब देने के लिए पत्रकारिता करने की जरूरत नहीं है। आपको अपना काम पूरी ईमानदारी और पूरी मेहनत से करना चाहिए।