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NDTV इंडिया के डिजिटल एडिटर विवेक रस्तोगी बोले, कारगर रही कोरोना से 'जंग' में यह रणनीति
एनडीटीवी इंडिया के डिजिटल एडिटर विवेक रस्तोगी का कहना है कि डिजिटल का फैलाव प्रिंट मीडिया के लिए खतरा नहीं बन सकता। हाथ में अखबार लेकर पढ़ने का आनंद मोबाइल फोन या लैपटॉप की स्क्रीन में नहीं आ सकता
समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago
इन दिनों कोरोनावायरस (कोविड-19) ने पूरी दुनिया में अपना कहर बरपा रखा है। कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में लॉकडाउन किया गया है, जिसकी वजह से तमाम उद्योग-धंधों पर विपरीत असर पड़ रहा है। मीडिया इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं है। पहले ही तमाम परेशानियों से जूझ रही इंडस्ट्री के सामने आर्थिक संकट गहराता जा रहा है। लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप बढ़ने के बावजूद विज्ञापनों की संख्या घट रही है। प्रिंट का सर्कुलेशन काफी प्रभावित हुआ है। लोग अब डिजिटली अखबार पढ़ रहे हैं। इसी तरह के तमाम मुद्दों पर हमने 'एनडीटीवी इंडिया' की हिंदी वेबसाइट (khabar.ndtv.com) के एडिटर विवेक रस्तोगी से जानना चाहा कि आखिर वे इस बारे में क्या सोचते हैं? प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश:
कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप काफी बढ़ी है, डिजिटल में आप इसे किस रूप में लेते हैं?
निश्चित रूप से कोरोनावायरस (COVID-19) के चलते लागू किए गए लॉकडाउन की वजह से अधिकतर आबादी घरों में बंद है। इसलिए टीवी की व्युअरशिप का बढ़ना लाज़िमी था। उधर, प्रिंट संस्करणों के वितरण से जुड़ी समस्याओं की वजह से उनका प्रसार शायद घटा होगा, लेकिन डिजिटल मीडिया इस लिहाज से मोटे तौर पर टीवी जैसा है, जिसके पास वितरण की समस्या नहीं है। इसलिए, समाचारों का विश्वसनीय स्रोत होने के नाते एनडीटीवी के पास डिजिटल में भी यूजर्स की संख्या बढ़ी है।
टीवी और प्रिंट में विज्ञापन लगातार घटता जा रहा है, सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की मांग हो रही है, डिजिटल पर विज्ञापन की क्या स्थिति है, इस बारे में कुछ बताएं?
इस बारे में फिलहाल मैं कुछ नहीं कहना चाहूंगा।
अन्य तमाम बिजनेस की तरह मीडिया भी इन दिनों काफी संकट से जूझ रही है। तमाम अखबार और मैगजींस का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, तमाम मैगजींस को तो अपने प्रिंट एडिशन फिलहाल बंद करने पड़े हैं, डिजिटल पर इसका किस तरह असर पड़ा है?
लॉकडाउन और आने-जाने की पाबंदियों के अलावा संक्रमण के डर का प्रभाव निश्चित रूप से पड़ा है। प्रिंट के पास वितरण से जुड़ी समस्याएं भी रही हो सकती हैं, लेकिन टीवी और डिजिटल होने के चलते एनडीटीवी ने कोरोनावायरस से पैदा हुई समस्या का वह विकराल रूप नहीं देखा, जो कुछ अन्य प्रिंट मीडिया संस्थानों को देखना पड़ा। इसके अलावा मीडिया हाउसों में संभवतः सबसे पहले 'वर्क फ्रॉम होम' शुरू करने के कारण भी एनडीटीवी के सामने कोविड-19 की समस्या भयंकर और डरावना रूप नहीं ले पाई। और हां, एनडीटीवी के दर्शक और यूजर्स उसके साथ हमेशा जुड़े रहते है, क्योंकि संकट काल में विश्वसनीय खबरें ज़्यादा पढ़ी जाती हैं।
वर्तमान हालातों को देखते हुए अपने पाठकों से जुड़े रहने के लिए तमाम मीडिया संस्थानों ने डिजिटल को और ज्यादा बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, आपकी नजर में क्या प्रिंट के लिए यह खतरे की घंटी है?
मेरी व्यक्तिगत राय में डिजिटल का फैलाव प्रिंट मीडिया के लिए खतरा नहीं बन सकता, क्योंकि हाथ में अखबार लेकर पढ़ने का आनंद मोबाइल फोन या लैपटॉप की स्क्रीन में नहीं आ सकता। निश्चित रूप से वितरण की समस्या का खात्मा होते ही प्रिंट मीडिया के चाहने वाले अपने-अपने पसंदीदा अखबार की तरफ लौटेंगे। हां, इसके बावजूद डिजिटल मीडिया के लिए यह वक्त फायदेमंद हो सकता है, अगर वह यूजर की नब्ज को पकड़ पाए और उसकी पसंदीदा सामग्री उपलब्ध कराता रह सके।
इस संकटकाल में आप और आपकी टीम किस तरह की स्ट्रैटेजी बनाकर काम कर रही है, इस बारे में कुछ बताएं?
टीम के सभी सदस्यों द्वारा अपने-अपने घर से बैठकर भी टीम की तरह जुड़कर काम करने के लिए सबसे जरूरी था कि सभी एक-दूसरे को भलीभांति समझते-जानते हों। बस, इसी का लाभ मिला। परिवार जैसा माहौल होने के चलते सभी ने एक-दूसरे का ध्यान रखा और उससे भी ज़्यादा लाभदायक यह रहा कि सभी साथियों ने पूरी प्रतिबद्धता के साथ शिफ्ट के समय और घड़ी की तरफ निगाह नहीं डाली और ज़रूरत पड़ने पर हर समय शिफ्ट पर ही मौजूद नज़र आए।
आपकी नजर में कोविड-19 के बाद डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में किस तरह के बदलाव आने की उम्मीद है?
कोविड-19 ज़ल्दी से गुजर जाने वाला नहीं है। जिस रोग का ओर-छोर, कारण और उपचार हमारे हाथ में नहीं है, उसके बारे में कोई भी भविष्यवाणी करना संभव नहीं हो सकता। लॉकडाउन के कारण लोगों के घरों में रहने का डिजिटल मीडिया को कुछ हद तक लाभ मिला और उसके यूजर्स बढ़े हैं। सो, मौजूदा परिस्थितियों के सामान्य हो जाने के बाद भी डिजिटल मीडिया संस्थानों के पास अवसर है कि वे अपने यूजर्स की जरूरतों को पहचानकर उन्हें उनकी पसंद की पठनीय सामग्री बाद में भी उपलब्ध कराते रहें और उन्हें किसी अन्य प्लेटफॉर्म पर लौटने न दें।
रेवेन्यू के लिहाज से यह समय काफी मुश्किलों भरा है। ऐसे में सबस्क्रिप्शन मॉडल पर गौर किया जा रहा है, आपकी नजर में क्या इससे इसकी भरपाई हो सकती है और क्या यह मॉडल सफल होगा, इस बारे में आपके क्या विचार हैं?
फिलहाल मैं इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा
आखिरी सवाल, फेक न्यूज का मुद्दा इन दिनों काफी गरमा रहा है। खासकर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फेक न्यूज की ज्यादा आशंका रहती है। आपकी नजर में फेक न्यूज को किस प्रकार फैलने से रोका जा सकता है?
फेक न्यूज का मुद्दा कतई नया नहीं है और इस पर चर्चा लंबे अरसे से चली आ रही है। संकट काल में इसके फैलाव की आशंका बढ़ जाती है, क्योंकि हमारे समाज का एक काफी बड़ा हिस्सा शोध और सत्यापन की स्थिति में नहीं होता, और न ही उन्हें इसकी आदत रही है। मीडिया संस्थानों की विश्वसनीयता उनके अपने हाथ में होती है। अगर सभी संस्थान एनडीटीवी की भांति कोई भी समाचार 'सबसे पहले' देने के स्थान पर 'सही समाचार' देने का लक्ष्य बना लें, तो इस समस्या से कुछ हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। रही बात सोशल मीडिया की, तो हमारे-आपके बीच ही, यानी हमारे समाज में ही कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें किसी सत्यापन की जरूरत महसूस नहीं होती, जिसके चलते फेक न्यूज़ ज़ोर पकड़ती है। वैसे, फेक न्यूज़ फैलाने के पीछे लोगों के निहित स्वार्थ भी होते हैं और अज्ञान भी। इसलिए, इसके लिए सभी को मिलजुलकर प्रयास करने होंगे। सोशल मीडिया पर समाचार पढ़ने वालों को जागरूक करना होगा कि वे हर किसी ख़बर पर सत्यापन के बिना भरोसा न करें।
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