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रंग लाईं एबीपी मांझा के एडिटर राजीव खांडेकर की स्ट्रैटेजी, खूब चर्चा बटोर रहे ये शो
महाराष्ट्र से बाहर रहने वाले मराठी भी काफी जागरूक हैं और वे बहुत ही फ्रैंक ओपिनियन देते हैं
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
देश में हो रहे लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र की अपनी खास भूमिका है। कई बड़े नेताओं की कर्मभूमि रहा ये प्रदेश राजनीतिक तौर पर काफी चर्चाएं बटोरता रहता है। ऐसे में इस प्रदेश की राजनीतिक धड़कन को 12 साल से समझ रहा है एबीपी समूह का मराठी चैनल एबीपी मांझा। चुनावी प्रोग्रामिंग से लेकर फेक न्यूज और मीडिया की क्रेडिबिलिटी जैसे अहम मुद्दे पर समाचार4मीडिया डॉट कॉम के एग्जिक्यूटिव एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने बात की एबीपी मांझा के संपादक राजीव खांडेकर से। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-
चुनावी माहौल में आपके चैनल ने मराठी मानुष को किस तरह का कंटेंट उपलब्ध कराया, किस तरह की इलेक्शन प्रोग्रामिंग की प्लानिंग आप लोगों ने की?
देखिए, लोकसभा चुनाव को लेकर एबीपी मांझा ने एक बड़ी प्लानिंग की, जिसके तहत हमने कई नए प्रयोग किए। चुनाव के हर पहलू को मराठियों से जोड़ने की ये कोशिश रंग भी लाई, जिसके चलते हमारे कई शोज लोगों के बीच चर्चा का भी खूब विषय बने। एक खास शो जिसका जिक्र मैं जरूर करना चाहूंगा, वो है TONDI PARIKSHA। ये ऐसा शो है, जिसमें नेता आते हैं और जैसा स्कूल में वायवा (ViVa) लिया जाता है, उसी पैटर्न पर उनसे वैसे ही सारे मुद्दों से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं और चर्चा की जाती है। फिर उसके बाद इन नेताओं को उनकी परफॉर्मेंस के आधार पर मार्क्स दिए जाते हैं। ऐसे में सब नेताओं में काफी उत्सुकता रहती है कि सबसे ज्यादा मार्क्स किसको मिले हैं।
इसी कड़ी में हमने स्टेट ट्रांसपोर्ट की एक बस के जरिये जगह-जगह घूमकर एक शो किया, जिसमें बस के कंडक्टर एक मशहूर मराठी एक्टर-डायरेक्टर थे। इस शो का नाम है- Wari Lok Sabha
क्या महाराष्ट्र से बाहर रहने वाले मराठियों के लिए चैनल ने कोई शो की प्लानिंग की है?
हां, ‘भारत यात्रा’ हमारा ऐसा शो है, जिसमें हम महाराष्ट्र के बाहर रहने वाले मराठियों से बात करते हैं। हमने पाया कि बाहर रहने वाले मराठी भी काफी जागरूक हैं और वे बहुत ही फ्रैंक ओपिनियन देते हैं। लगभग 10,000 किलोमीटर की ये यात्री की। इतने बड़े पैमाने पर ऐसी चुनावी यात्रा किसी भी मराठी न्यूज चैनल ने नहीं की है। कई ऐसे राज्यों में गए, जहां काफी मराठी रहते हैं। ऐसे में हमने राज्यों के मराठी लोगों से बात की, जो खुलकर अपनी राय देते और हमें सच् से अवगत कराते थे।
चुनावी दौर में लोग मीडिया से चुनावी विश्लेषण की भी उम्मीद करते हैं, ऐसे में आपका चैनल कैसे उनकी उम्मीदों को पूरा कर रहा है?
चैनल पर हम सीरियस और गहन विश्लेषण कराते हैं। जैसे आचार संहिता होती है, उसी की तर्ज पर हमने ‘विचार संहिता (Vichar Sahita)’ नाम से एक शो किया है। इस शो के अंतर्गत लोकसत्ता के संपादक गिरीश कुबेर और मैं महाराष्ट्र के प्रमुख इलाकों-विदर्भ, वेस्टर्न महाराष्ट्र में जाकर कई लोगों से मिले। चाहे वो पॉलिटिक्स या इकनॉमिक्स से रिलेटेड हों या फिर आम आदमी, हमने सबसे बात करके जमीन पर क्या स्थिति है, ये जानने की कोशिश की। इसको काफी सराहा जा रहा है।
चैनल ने काउंटिंग डे को लेकर क्या तैयारी की है?
हमने काउंटिंग डे से पहले से ही यानी 19 मई से ही अपनी प्लानिंग कर रखी है। एक्सपर्ट्स और एनालिस्ट्स की एक बड़ी टीम हमारे साथ रहती है। हम महाराष्ट्र के चारों हिस्सों को लेकर अलग-अलग विश्लेषण और ओपिनियन पोल भी करते हैं। इस तरह हम लोगों को इंटरेस्टिंग तरीके से सही जानकारी देते हैं। महाराष्ट्र के मुख्य चार भाग-विदर्भ, मराठवाड़ा, वेस्टर्न महाराष्ट्र और मुंबईकोंकण हैं। हमारी करीब 40 पत्रकारों और विशेषज्ञों की टीम लगातार चारों भागों को लेकर चुनावी चर्चा के साथ कुछ इंटरेस्टिंग इनपुट्स के साथ एक अलग तरह का शो प्रस्तुत करेगी।
क्या रीजनल चैनल लोगों के बीच लोकप्रिय बन पाता है?
महाराष्ट्र की बात करूं तो ये काफी बड़ा स्टेट है। ऐसे में नेशनल चैनल पर यहां के लोगों की जरूरत के अनुसार खबरें मिल नहीं पाती हैं। 24 घंटे के रीजनल चैनल आने से राज्य की हर महत्वपूर्ण खबर लोगों तक पहुंचने लगी है। अब अखबार भी अलग-अलग एडिशन के निकलते हैं। ऐसे में अखबार के पाठक के पास भी उसके क्षेत्र की खबर तो पहुंच जाती है, पर पूरे राज्य की खबरें उसे रीजनल चैनल से ही मिलती हैं। दूसरा ये भी है कि चैनल पर खबर दिखने के बाद उसका इम्पैक्ट भी दिखता है, इसलिए आज रीजनल चैनल राज्य के लोगों के बीच सबसे ज्यादा लोकप्रिय होता है।
न्यूज के साथ हम कुछ ऐसा कंटेंट भी देते हैं, जो पूरी फैमिली के लिए काम का हो। हमारी सोच रीजनल नहीं, नेशनल है, बस भाषा मराठी है। हम वो सब कंटेंट रीजनल चैनल में देते हैं, जो एक नेशनल चैनल देता है। नेशनल और रीजनल दृष्टि से अहम सभी विषयों पर हम कंटेंट प्रसारित करते है।
फेक न्यूज के इस दौर में आप फर्जी खबरो से कैसे निपटते हैं?
आजकल बहुत ज्यादा फेक न्यूज सर्कुलेट की जाती है। लोग कई बार चैनल के लोगो (Logo) या स्क्रीनशॉट लेकर उसके आधार पर नकली या गलत खबर लिखकर सर्कुलेट करते है। हम पूरी सक्रियतापूर्वक अपने शो वायरल चेक (Viral Check) के द्वारा झूठ का नकाब उतारते हैं। लोगों को सच दिखाते हैं। ये बताते हैं कि क्या गलत है और क्या सही। फेक न्यूज के प्रति दर्शकों को जागरूक करने की हम अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह से निभा रहे हैं।
आजकल टीवी डिबेट्स को लेकर काफी आलोचना होती है। इसे लेकर क्या है आपका मानना?
मेरा मानना है कि टीवी डिबेट्स का अर्थ चीखना-चिल्लाना नहीं है, जिस तरह हम सामान्य स्तर (Pitch)पर आपसी संवाद करते हैं, उसी तरह का संवाद टीवी डिबेट्स में होना चाहिए। अगर डिबेट्स अच्छे फॉर्मेट में की जाए, तो लोग पसंद करते हैं। डिबेट में मंथन हो, जो देखने वाला है उसके हाथ में कुछ आए। हमारे शो ‘मांझा विशेष’ में बिल्कुल संतुलित रूप से डिबेट की जाती है। अच्छे से विषय पर मंथन होता है, साथ ही उस विषय के समाधान पर भी चर्चा की जाती है।
मीडिया की क्रेडिबिलिटी पर लगातार सवाल उठ रहे हैं?
क्रेडिबिलिटी बहुत अहम है। हर घंटे, हर पल आपके काम से जुड़ जाती है क्रेडिबिलिटी। अगर एक बार क्रेडिबिलिटी पर सवाल उठता है तो फिर ऊंचाई तक पहुंचना बहुत मुश्किल है। क्रेडिबिलिटी पाने के लिए कोई एक्स्ट्रा कोशिश नहीं करनी पड़ती, आप अपना रोज का काम ईमानदारी से करें, मीडिया हाउसके लिए सबसे जरूरी होती है क्रेडिबिलिटी। आज एबीपी मांझा ने जो स्थान बनाया है, वो उसकी क्रेडिबिलिटी की वजह से ही है। ईमानदारीपूर्ण व पारदर्शी रिपोर्टिंग के साथ पक्ष-विपक्ष दोनों के विचारों का प्रस्तुतिकरण ही आपको क्रेडिबिल बनाता है। हम पत्रकारिता के बेसिक सिद्धांतों को फॉलो करते हैं, जो ट्रांसपैरेंट हैं और कभी एकतरफा पक्ष नहीं लेते।
हरेक पत्रकार को इसका ध्यान रखना होगा। आपको पहाड़ पर चलना तो है, पर पैर जमाकर रखना है। पैर फिसला तो सीधे नीचे यानी क्रेडिबिलिटी के बिना मीडिया का कोई अस्तित्व नहीं है। ऐसे में गलती की कोई जगह नहीं है। एबीपी इसलिए ही लोकप्रिय है, क्योंकि हम पर लोगों का भरोसा है, विश्वास है। हमारी खबरों में कभी कोई मिलावट नहीं है।
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