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Mid-Day के दिवाकर शर्मा ने बताया, संकट की घड़ी में क्या रहा सबसे चुनौतीपूर्ण अनुभव
आज के इस एडिशन में ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ने ‘मिड-डे’ (Mid-Day) में क्राइम बीट देख रहे सीनियर कॉरेस्पोंडेंट दिवाकर शर्मा से बातचीत की, जो महामारी के इस दौर में भी अपने कर्तव्य का लगातार पालन कर रहे हैं।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago
हमारी सहयोगी अंग्रेजी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘फर्स्ट रेस्पॉन्डर’ (First Responders) नाम से एक सीरीज चला रही है, जिसमें उन पत्रकारों से बात करने की कोशिश की जाती है, जो इस महामारी को एक योद्धा की तरह कवर कर रहे हैं। उनसे यह जानने की कोशिश की जाती है कि कैसे वे मुश्किल समय में अपने काम को अंजाम दे पा रहे हैं और उनकी राह में किस तरह की चुनौती आ रही हैं। बता दें कि इस सीरीज में ऐसे मीडियाकर्मियों को शामिल किया गया है, जो बहादुरी के साथ अपने मोर्चे पर तैनात हैं और दूसरों के लिए उदाहरण पेश कर रहे हैं।
आज के इस एडिशन में ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ने ‘मिड-डे’ (Mid-Day) में क्राइम बीट देख रहे सीनियर कॉरेस्पोंडेंट दिवाकर शर्मा से बातचीत की, जो महामारी के इस दौर में भी अपने कर्तव्य का लगातार पालन कर रहे हैं। एक पत्रकार के तौर पर उनके लिए ड्यूटी सर्वोपरि है।
वे वसई-विरार क्षेत्र में लगातार अस्पतालों के हालातों, वहां की बुनियादी ढांचों, टेस्टिंग प्रोसेस, हेल्थ स्टाफ की कंडिशन और उन पर कितना वर्कलोड है इस बारे में लगातार लिखते रहे हैं।
पिछले कुछ हफ्तों से आप ‘मिड-डे’ के लिए क्या विशेष कवर कर रहे हैं?
जब लॉकडाउन की घोषणा हुई, उस दिन यानी 24 मार्च से मुंबई और आसपास के क्षेत्रों में काम करने वाले अधिकांश श्रमिकों ने अपने घरों-कस्बों की ओर पैदल ही जाना शुरू कर दिया था, क्योंकि सभी ट्रांसपोर्ट सुविधाएं बंद कर दी गईं थीं। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और गुजरात तक लोग पैदल ही जा रहे थे। इस बीच मैंने कुछ लोगों के इंटरव्यू भी किए और उनकी दुर्दशा के बारे में भी बताया। वसई-विरार क्षेत्र तो COVID-19 वायरस का एक बड़ा केंद्र बन गया था और तब मैंने वहां लगातार अस्पतालों के हालातों की कवरेज की, वहां की बुनियादी ढांचों को कवर किया, टेस्टिंग प्रोसेस के बारे में जानकारी दी, यहां तक कि वहां के हेल्थ स्टाफ की कंडिशन और उन पर कितना वर्कलोड है इस बारे में भी लगातार बताया।
आपका अब तक का सबसे चुनौतीपूर्ण अनुभव क्या रहा है?
अस्पतालों का दौरा करना और कॉन्फिडेंस के साथ डॉक्टर्स से बात करना आसान नहीं था, क्योंकि वे पहले से ही इस वैश्विक संकट से निपटने की कोशिश कर रहे थे। मुझे कई डॉक्टर्स और अन्य फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कर्मियों को यह जानने के लिए कॉन्फिडेंस में लेना पड़ा कि हो क्या रहा है और वे संकट से कैसे निपट रहे हैं। वे अपने आप को सुरक्षित रखने के लिए कौन से उपकरण और सुरक्षात्मक सामान का प्रयोग कर रहे हैं। मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि रिपोर्टिंग करते समय मैं खुद को सुरक्षित रखूं, क्योंकि मेरे माता-पिता सीनियर सिटिजन हैं और मुझे यह सुनिश्चित करना होगा कि हम सभी लोग वायरस से सुरक्षित रहें।
इस महामारी को कवर करने के दौरान किसी ऐसी विशेष घटना अथवा अनुभव के बारे में बताएं, जिसने आपको काफी प्रभावित किया हो?
मुझे यह जानकर सच में तब बहुत हैरानी हुई कि पता चला कि डॉक्टर जो सैम्पल एकत्र कर रहे हैं और इस लड़ाई में सबसे आगे खड़े हैं, उनके पास पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई) सूट नहीं थे। दूसरी बार तब हैरानी हुई जब पता चला कि क्षेत्र के अस्पतालों में कोई एम्बुलेंस ही नहीं थी, जोकि अस्पतालों के बुनियादी ढांचे का ही एक हिस्सा होता है। मैंने इस संबंध में कलेक्टर और अन्य वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों से भी बात की।
COVID-19 जैसी महामारी की रिपोर्टिंग के दौरान आपको कंपनी की तरफ से किस तरह का समर्थन मिल रहा है?
मेरे सहकर्मी और सीनियर स्टाफ बहुत सपोर्टिव है। हम सभी एक टीम की तरह काम करते हैं और अपनी खबरों के लिए एक दूसरे की मदद भी करते हैं।
और अंत में, क्या आप कोई संदेश देना चाहते हैं?
सभी को सुरक्षित रहना चाहिए और सोशल डिस्टेंसिंग को बढ़ावा देते रहना चाहिए। इस बीमारी से लड़ने की शक्ति बुजुर्गों में सबसे कम है और हमें ऐसे कदम उठाने ही होंगे, ताकि हम उनकी सुरक्षा कर सकें। वैसे भी यह महामारी सोशल डिस्टेंसिंग से ही खत्म हो सकती है। यानी यही ऐसी चीज है जिसके चलते हम COVID-19 वायरस से लड़ सकते हैं।
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