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‘रिपोर्टिंग करते समय काफी चुनौतीपूर्ण होते हैं इस तरह के पल’

कोरोनावायरस (कोविड-19) के खिलाफ जंग में अग्रिम मोर्चे पर तैनात डॉक्टर्स, पुलिसकर्मी, पैरामेडिकल स्टाफ व अन्य के साथ पत्रकार भी तमाम जोखिमों के बीच अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago

कोरोनावायरस (कोविड-19) के खिलाफ जंग में अग्रिम मोर्चे पर तैनात डॉक्टर्स, पुलिसकर्मी, पैरामेडिकल स्टाफ व अन्य के साथ पत्रकार भी तमाम जोखिमों के बीच अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं। इन्हीं में से एक हैं मातृभूमि अखबार की रिपोर्टर और डेढ़ साल की बच्ची की मां अंजलि एन. कुमार, जो केरल के एर्नाकुलम जिले में जनवरी से इस महामारी को कवर कर रही हैं। जब वह अपने घर पहुंच रही होती हैं तो अपने माता-पिता को पहले ही फोन कर छोटी बच्ची को दूसरे कमरे में ले जाने के लिए कह देती हैं, ताकि जब वह घर पहुंचें तो उन्हें अपने आपको सैनिटाइज करने और नहाने का टाइम मिल जाए, जिसके बाद वे निश्चिंत होकर अपनी बेटी को गले लगा सकें, जो पूरे दिन उनका इंतजार करती रहती है।

हमारी सहयोगी अंग्रेजी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) द्वारा शुरू की गई ‘फर्स्ट रेस्पॉन्डर’ (First Responders) नामक सीरीज के तहत हमने अंजलि एन, कुमार से बात कर यह जानने की कोशिश की कि कैसे वे मुश्किल समय में अपने काम को बखूबी अंजाम दे पा रही हैं। बता दें कि इस सीरीज में ऐसे मीडियाकर्मियों को शामिल किया गया है, जो बहादुरी के साथ अपने मोर्चे पर तैनात हैं और दूसरों के लिए उदाहरण पेश कर रहे हैं। प्रस्तुत हैं अंजलि एन कुमार के साथ हुई इस बातचीत के प्रमुख अंश:

कोविड-19 की कवरेज आप कैसे और कब से कर रही हैं?

कोविड-19 जैसी महामारी को लेकर हमने जनवरी में उस समय से ही कवरेज शुरू कर दी थी, जब इसने चीन को अपनी चपेट में लिया था। हमने चीन में रह रहे मलयाली लोगों और वहां पढ़ाई कर रहे छात्रों आदि पर स्टोरीज की थीं। इस महामारी की शुरुआत केरल में फरवरी के पहले हफ्ते में हुई थी। उस समय हमने इस तरह की स्टोरी की थीं कि कैसे यह केरल में फैल सकता है और राज्य सरकार को क्या ऐहतियाती कदम उठाने चाहिए।  

मार्च के बाद चीजें काफी बदल गई और इस महामारी का प्रकोप काफी गहरा गया। हमने वायरस को लेकर वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर तमाम स्टोरीज कीं। हमने प्रत्येक जिले से कोरोना पीड़ितों और इसे मात देकर ठीक हो चुके लोगों का आंकड़ा जुटाना शुरू कर दिया। मैंने इटली के उस परिवार के बारे में भी लिखा, जिसे यहां मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था और वह परिवार इस संक्रमण से ठीक हो गया था। एक टैक्सी ड्राइवर की स्टोरी भी की, जो अस्पताल में भर्ती था और बीमारी के अलावा आइसोलेशन के दौरान उसके अकेलेपन और तनाव को दूर करने के लिए डॉक्टर्स और स्वास्थ्य विभाग किस तरह उसकी मदद में जुटा हुआ था। हम हल्के-फुल्के कंटेंट के साथ अपनी न्यूज और स्टोरीज के द्वारा लोगों के अंदर कुछ सकारत्मकता लाने का प्रयास भी करते हैं।

आपका अब तक का सबसे चुनौतीपूर्ण अनुभव क्या रहा है?

एक पत्रकार के तौर पर अब तक जो भी रिपोर्ट मैंने की है, उसके लिए मैं हमेशा ही वहां (स्पॉट) मौजूद रही हूं,  मैने खुद वहां देखा है और खुद ही उसे लिखा है। हालांकि, वर्तमान परिदृश्य में अब लोगों तक या रिपोर्ट वाली जगह तक पहुंच पाना सीमित हो गया है। इसलिए इस महामारी के दौरान किसी स्टोरी के लिए लोगों से मिल पाना, यहां तक देख पाना ही बहुत बड़ी चुनौती है। हमें विभिन्न स्रोतों से डाटा इकट्ठा तो करना ही है, लेकिन डाटा की प्रामाणिकता सुनिश्चित कर पाना इस समय सबसे टेढ़ा काम है। इसके अलावा, कोरोना से संक्रमित मरीजों और इससे उबर चुके लोगों की कॉन्टैक्ट डिटेल्स जुटा पाना भी मुश्किल है।

इस महामारी को कवर करने के दौरान किसी ऐसी विशेष घटना अथवा अनुभव के बारे में बताएं, जिसने आपको काफी प्रभावित किया हो?

हमें अपने स्रोतों से उन तमाम लोगों के बारे में जानकारी मिलती है, जो वायरस से प्रभावित हुए इससे लड़कर ठीक हो चुके हैं। हमें उनके बारे में और उनके द्वारा किए जा रहे संघर्षों के बारे में कई बातें पता चलती हैं, लेकिन हम यह सब प्रकाशित नहीं कर पाते हैं। मैं तब पूरी तरह से हिल गयी, जब मैंने एक ऐसे भारतीय परिवार को लेकर एक स्टोरी की, जो इटली में काम करता था और अपने बड़े बेटे (7 साल) के साथ समय बिताने के लिए केरल आए हुए थे, जो पहले से ही यहां रह रहा था।  दंपती का छोटा बेटा (दो वर्ष), जो उनके साथ इटली से कोच्चि आया था, उसमें कोरोना को पुष्टि हो गई और इस परिवार को तुरंत ही कालामासेरी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में क्वारंटाइन कराया गया। लेकिन बड़े बच्चे को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि उसके माता-पिता यहां ऐसी स्थिति में थे। वास्तव में मैं इन छोटे बच्चों की हालत देखकर हिल गई और बहुत ज्यादा प्रभावित हुई, क्योंकि मेरा अपना बच्चा सिर्फ डेढ़ साल का है। जब मैं कालामासेरी मेडिकल कॉलेज के आइसोलेशन वार्ड में काम करने वाली नर्स से बात कर रही थी, तो उसकी कही बात ने मेरे दिल को छू लिया कि किस तरह से इन्फेक्शन से अपनी डेढ़ साल की बेटी को दूर रखने के लिए उस नर्स ने स्तनपान कराना बंद कर दिया है। उसकी बेटी मां के लिए रोती रहती है लेकिन वह दिन-रात अस्पताल में अपनी ड्यूटी में लगी रहती है।

आप अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा का किस तरह ध्यान रखते हैं? आपका परिवार आपकी सेफ्टी को लेकर काफी चिंतित रहता होगा?

बिल्कुल, मैं जो काम कर रही हूं, उसे लेकर परिवार चिंतित रहता है, लेकिन वे सभी यही कह सकते हैं कि मैं बस सुरक्षित रहूं। हमने तमाम एहतियाती कदम भी उठाए हैं। जैसे ही मैं काम से घर पहुंचती हूं, मेरी बेटी मुझसे गले लगना चाहती है, लेकिन वर्तमान हालातों को देखते हुए मैं बिना खुद को सैनिटाइज किए और नहाए बिना उसे गले नहीं लगा सकती हूं। दरअसल, जब मैं घर पहुंचने वाली होती हूं, तभी अपने माता-पिता को फोन कर देती हूं कि मेरी बेटी को दूसरे कमरे में ले जाएं, जब तक कि मैं नहा न लूं और खुद को सैनिटाइज न कर लूं। जब भी मैं लेट हो जाती हूं, तो बेटी मेरे बारे में पूछती रहती है कि मम्मी कहां हैं?’

COVID-19 जैसी महामारी की रिपोर्टिंग के दौरान आपको कंपनी की तरफ से किस तरह का समर्थन मिल रहा है?

हमें अपने संस्थान से पूरा सपोर्ट मिल रहा है। मातृभूमि काफी बेहतर प्लेटफॉर्म है, जहां पर आप 100 प्रतिशत सुरक्षा के साथ काम कर सकते हैं।

और अंत में, क्या आप कोई संदेश देना चाहती हैं?

इस महामारी को फैलने से रोकने के लिए तमाम लोग कड़ी मेहनत कर रहे हैं। हमारी सुरक्षा के लिए ये लोग अपनी जान को जोखिम में डालकर ड्यूटी कर रहे हैं। वहीं, मैंने ऐसे कई लोग देखे हैं, जो लॉकडाउन की परवाह न कर बेकार में सड़कों पर निकल रहे हैं। इन लोगों से मैं कहना चाहती हूं कि ऐसा न करें। घर पर रहें और सुरक्षित रहें। यह न केवल आपके लिए बल्कि पूरे समाज के लिए अच्छा है।


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