'कई चुनौतीपूर्ण असाइनमेंट करने के बाद भी मेरे लिए बिल्कुल नई है इस तरह की रिपोर्टिंग'

आज के इस एडिशन में ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ने ‘सीएनएन-न्यूज18’ (CNN News18) की विशेष संवाददाता रुनजुन शर्मा से बातचीत की, जो महामारी के इस दौर में पूरी दिल्ली-एनसीआर से लगातार रिपोर्टिंग कर रही हैं

Last Modified:
Monday, 27 April, 2020
runjhun

जब से देश में COVID-19 महामारी को लेकर लॉकडाउन हुआ है, तब से अधिकांश भारतीय दिन में ज्यादा से ज्यादा समय तक न्यूज चैनल ही देख रहे हैं। यह समय पत्रकारों को धन्यवाद करने का भी समय है, क्योंकि वे हर दिन और हर घंटे ताजा खबरें दर्शकों तक पहुंचा रहे हैं।

हमारी सहयोगी अंग्रेजी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘फर्स्ट रेस्पॉन्डर’ (First Responders) नामक सीरीज शुरू की है, जिसमें उन पत्रकारों से बात करने की कोशिश की जाती है, जो इस महामारी को एक योद्धा की तरह कवर कर रहे हैं। उनसे यह जानने की कोशिश की जाती है कि कैसे वे मुश्किल समय में अपने काम को अंजाम दे पा रहे हैं और उनकी राह में किस तरह की चुनौती आ रही हैं। बता दें कि इस सीरीज में ऐसे मीडियाकर्मियों को शामिल किया गया है, जो बहादुरी के साथ अपने मोर्चे पर तैनात हैं और दूसरों के लिए उदाहरण पेश कर रहे हैं।

आज के इस एडिशन में ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ने ‘सीएनएन-न्यूज18’ (CNN News18) की विशेष संवाददाता रुनजुन शर्मा से बातचीत की, जो महामारी के इस दौर में पूरी दिल्ली-एनसीआर से लगातार रिपोर्टिंग कर रही हैं। एक पत्रकार के तौर पर उनके लिए ड्यूटी सर्वोपरि है।

कोविड-19 की कवरेज आप कैसे और कब से कर रही हैं?

मैंने करीब नौ साल तक पॉलिटिक्स, हेल्थ और ह्यूमन राइट्स को कवर किया है। कोविड-19 महामारी को कवर करना न सिर्फ कई मायनों में काफी चुनौतीपूर्ण है, बल्कि काफी रिस्की भी है।

वैश्विक स्तर पर यह काफी महत्वपूर्ण स्टोरी है और इसे काफी सावधानी से कवर किए जाने की जरूरत है। कोविड-19 महामारी सिर्फ स्वास्थ्य से जुड़ी स्टोरी नहीं है बल्कि इसमें विभिन्न अन्य बीट जैसे पॉलिटिक्स, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और मानव अधिकार आदि भी शामिल हैं।

आपका अब तक का सबसे चुनौतीपूर्ण अनुभव क्या रहा है?

रेडियो और प्रिंट के विपरीत, टेलिविजन न्यूज का एक महत्वपूर्ण पहलू विजुअल्स भी हैं, जिसके लिए एक पत्रकार को उन सभी स्थानों पर जाना पड़ता है, जहां इस महामारी के दौरान आम लोगों से बचने की उम्मीद की जाती है।

लॉकडाउन में, हर कोई अपने परिवार के साथ समय बिताना चाहता है। लेकिन जब भी मैं बाहर निकलती हूं, मैं घर में अपने प्रियजनों को खुद से दूर कर लेती हूं। यह भावनात्मक रूप से काफी चुनौतीपूर्ण होता है, खासकर तब जब उन लोगों के संक्रमित होना का भय बना रहता है और इस वजह से मैं कमरे में अकेले रहने का प्रयास करती हूं

इस महामारी को कवर करने के दौरान किसी ऐसी विशेष घटना अथवा अनुभव के बारे में बताएं, जिसने आपको काफी प्रभावित किया हो?

कोरोनो वायरस के फैलते संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए लागू किए गए लॉकडाउन से जब मानवीय संकट शुरू हुआ, तब मैंने बिहार और उत्तर प्रदेश के सैकड़ों प्रवासियों की दुर्दशा पर रिपोर्ट की थी और यमुना नदी के किनारे व डीटीसी बसों के भीतर रातें बिताईं थीं। इस दौरान जब मैंनें एक भूखे प्रवासी (सोनू, एक बूढ़ा व्यक्ति) को अपने खाने का एक हिस्सा (एक छोटे से पेपर प्लेट पर चावल और दाल) दिया, तो उसने उस खाने को अपने भूखे कुत्ते के साथ भी शेयर किया, जिसे देखकर मैं बहुत ज्यादा प्रभावित हुईं।

आप अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा का किस तरह ध्यान रखते हैं? आपका परिवार आपकी सेफ्टी को लेकर काफी चिंतित रहता होगा?

अतीत में मैंने कई चुनौतीपूर्ण असाइनमेंट्स पर काम किया है। छत्तीसगढ़ के नक्सलीय इलाकों में मैंने रिपोर्टिंग के लिए ऐसे जंगलों में भी यात्राएं की, जहां पर बारूदी सुरंगें होती थीं, कई आंदोलनों को भी कवर किया, यहां तक कि दिल्ली के दंगों को भी कवर किया। लेकिन यह असाइनमेंट मेरे लिए इन सबसे अलग है और वह भी कहीं अधिक खतरनाक और जोखिम भरा। यानी कुछ ऐसा, जो मैंने पहले कभी कवर नहीं किया, क्योंकि हम जिस पर रिपोर्ट कर रहे हैं वह अज्ञात है।

जब मैं कोविड के असाइनमेंट के बाद घर वापस जाती हूं, तो मैं घर पर किसी से बातचीत नहीं करती हूं। बल्कि मैं सीधे नहाने जाती हूं और अपने कपड़े धोती हूं। मैं अपने परिवार से जितना हो सके, दूर रहकर एकांत में रहने की कोशिश करती हूं।

COVID-19 जैसी महामारी की रिपोर्टिंग के दौरान आपको कंपनी की तरफ से किस तरह का समर्थन मिल रहा है?

ऑर्गनाइजेशन ने यह स्पष्ट रूप से कहा है कि फील्ड टीम (रिपोर्टर्स, विडियो जर्नलिस्ट्स और ड्राइवर्स) बिना सेफ्टी किट के बाहर न निकलें, जिनमें शूज कवर्स, ग्लव्स, मास्क्स और सैनिटाइजर्स शामिल हैं।

कोविड-19 के इस दौर में CNN News18 में खबरें जुटाना न केवल बेहद ही सुरक्षित और साफ-सुथरे तरीके से किया जा है,  बल्कि इसके लिए इनोवेटिव तरीका भी यूज किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, हम अस्पतालों और अन्य ऐसे क्षेत्रों, जहां संक्रमण फैलने का खतरा ज्यादा हो, वहां जाने के बजाय मेडिकल स्टाफ के साथ ‘जूम’ (Zoom) के जरिए ही इंटरव्यू करते हैं।

और अंत में, क्या आप कोई संदेश देना चाहते हैं?

घर में रहिए और सुरक्षित रहिए।

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मेरे एंकर बनने में इन तीन-चार लोगों की रही अहम भूमिका: आनंद नरसिम्हन

‘नेटवर्क18’ (network18) के एग्जिक्यूटिव एडिटर आनंद नरसिम्हन ने समाचार4मीडिया के साथ एक बातचीत में अपने जीवन के कई पहलुओं पर चर्चा की है।

Last Modified:
Tuesday, 11 May, 2021
Anand Narasimhan

‘नेटवर्क18’ (network18) के एग्जिक्यूटिव एडिटर आनंद नरसिम्हन ने समाचार4मीडिया के साथ एक बातचीत में अपने जीवन के कई पहलुओं पर चर्चा की है। उन्होंने बताया कि मीडिया का कोई बैकग्राउंड नहीं होने के बाद भी वह कैसे इस फील्ड में आए और उन्हें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के मुख्य अंश:

कोरोना के इस कठिन समय में कैसे चीजें बदली हैं और स्टूडियो में क्या बदलाव देखने को मिल रहे हैं?

इस कोरोना काल ने हमारे जीवन में कई चीजों को बदलकर रख दिया है। किसी ने नहीं सोचा था कि चीजें इतनी बदल जाएंगी। मैंने और आपने दोनों ने अपने घर में ये सेटअप किया है और हम एक-दूसरे से बात कर रहे हैं। ये बदलाव को स्वीकार करने के जैसा ही है। अब आप घर पर काम कर रहे हैं तो कभी भी आप लैपटॉप को ऑन कीजिए और मीटिंग में बैठ जाइए।

इसके अलावा स्टूडियो में भी जितने लोग आपके साथ काम करते हैं वो चाहे मेकअपमैन हो या माइक सेट करने वाला हो, हर चीज पहले सैनेटाइज होती है। इसके बाद भी मेरे साथ काम करने वाले दो सहयोगी कोरोना का शिकार हो गए। दिवाली के बाद मुझे भी संक्रमण हुआ था। मैं समय-समय पर एंटीबाडी टेस्ट करवाता रहता हूं।

अपने जीवन के शुरुआती दिनों के बारे में बताएं, आपने शिक्षा कहां से पूरी की?

आमतौर पर आप पाते हैं कि अधिकतर एंकर्स के परिवार का संबंध कहीं न कहीं राजनीति या सरकारी विभागों से होता है लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं था। इसे आप बस नदी का बहाव कह लीजिए कि मैं मीडिया में आ गया।

मैंने बीकॉम की पढ़ाई की है और उसके बाद मैंने जेवियर्स, मुंबई से मासकॉम किया। इसके बाद मैंने अपना डबल एमबीए पूरा किया। मुझे मार्केटिंग और फाइनेंस की अच्छी और गहरी समझ थी। उस समय तक मुझे मीडिया में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उस समय मैं किसी बड़ी एजेंसी के साथ जुड़कर काम करना चाहता था। उसी के साथ साथ मुझे एंकरिंग भी बेहद पसंद थी। मैं उन दिनों थिएटर भी करता था।

उसी दौरान एक दिन वर्ष 1996 में टीचर्स डे पर मुझे एंकरिंग करने को कहा गया था। मुझे कहा गया कि टीचर्स को अंताक्षरी खिलानी है और मैंने उन दोनों क्लोजअप अंताक्षरी में भी भाग लिया था। मुझे सिर्फ 20 मिनट ये करने को कहा गया था, लेकिन वो सिलसिला ढाई घंटे से अधिक चला था।

उस ऑडिटोरियम में उस समय करीब 50 स्टूडेंट थे, लेकिन जब अंताक्षरी खत्म हुई तो स्टूडेंट्स की संख्या 2000 से अधिक हो गई थी। उस दिन मुझसे टीचर्स ने कहा कि आनंद इतना मजा तो जीवन में हमें कहीं नहीं आया। इसके बाद मुंबई में एक काला घोड़ा फेस्टिवल शुरू हुआ था, जिसमें मैंने भाग लिया और वहीं से एंकरिंग का सिलसिला शुरू हुआ था। उस समय मैं काम भी करता था, शो भी करता था और पढ़ाई भी करता था। इसके बाद लगभग पांच साल तक विज्ञापन एजेंसियों के साथ काम किया और उसके बाद ड्रीम जॉब जीता। उसे जीतने के बाद ईएसपीएन स्टार स्पोर्ट्स के साथ एक ब्रैंड मैनेजर के तौर पर सिंगापुर में काम करने का मौका मिला। इसके बाद वर्ष 2007 से 2011 तक मैंने भारत में रहकर टेन स्पोर्ट्स के साथ काम किया।

आप एक स्पोर्ट्स एंकर थे, तो कैसे आप मीडिया में आए? कौन आपको टाइम्स नाउ तक लेकर आया या आपने खुद इधर आने का निर्णय लिया?

देखिए, इसके पीछे तीन महत्वपूर्ण लोग थे। एक मेरी मां जो हमेशा मुझसे कहती थीं कि तुम एक दिन बहुत बड़े एंकर बनोगे और वहीं तुम्हें जाना है। दूसरे थे मेरे एमबीए के डीन जो मेरे कॉरपोरेट सेक्टर में जाने से बेहद नाराज थे और उन्होंने मुझे काफी डांटा भी था।

उन्होंने मुझसे कहा कि आनंद तुम्हे एंकर बनना चाहिए और तीसरे जो इंसान थे वो थे टेन स्पोर्ट्स में मेरे साथ काम कर रहे मजमुदार जी! एक सीरीज के दौरान हमारी मुलाकात हुई थी और उन्होंने मुझसे कहा कि आनंद तुम्हे कुछ अलग करना चाहिए। उन दिनों वह 'टाइम्स नाउ' के साथ काम कर रहे थे तो उन्होंने मुझे अरनब गोस्वामी से मिलवाया। मुझे उस समय अरनब गोस्वामी जी ने मौका दिया और खुलकर मैंने एंकरिंग की। उसके बाद उन्होंने मुझे मुंबई आने को कहा और मैंने उनकी बात मानकर मुंबई डेस्क को जॉइन किया।

वर्ष 2011 में मुझे अरनब गोस्वामी ने कहा कि अब मैं स्पोर्ट्स नहीं करने वाला, तुम क्या करोगे? मैंने उनसे कहा कि ठीक है, मैं भी न्यूज करता हूं। उन्होंने मुझसे कहा कि ठीक है, तुम्हारे पास दो हफ्ते हैं, जितना करना है करो, उसके बाद मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इन तीन-चार लोगों को मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा।

आपने स्पोर्ट्स शो भी किए हैं और अभी पॉलिटिकल शो भी कर रहे हैं, अधिक मेहनत किसमें करनी पड़ती है?

ऐसा कुछ नहीं है और कुछ भी आसान नहीं है। देखिए, ऐसा है कि मेहनत तो हर जगह लगती है। ये सब आपके झुकाव और आपकी समझ पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए-जितने भी स्पोर्ट्स शो में लोग होते हैं या एंकर होते हैं, वो खिलाड़ी होते हैं। मैं तो कभी रणजी भी नहीं खेला हूं, लेकिन मेरा उधर झुकाव है और मुझे समझ है कि मैदान में क्या हो रहा है। बस, यही समझ आपको आगे लेकर जाती है। इसके अलावा मेरी रुचि हर प्रकार के खेल में थी। मैं क्रिकेट के अलावा भी कई खेल खेलता था इसलिए मैदान की मेरी जानकारी और मेरा होमवर्क अच्छा होता था।

जो दूसरे लोगों ने छह साल में सीखा, वो मुझे छह महीने में सीखना पड़ा है। वही चीज मेरे साथ राजनीतिक डिबेट में भी होती है क्योंकि मेरा कोई ऐसा बैकग्राउंड नहीं है। जिस दिन पहली बार मैंने एंकरिंग की, उस दिन मुझे तीन घंटे से भी अधिक एंकरिंग करनी पड़ी।  मैं जितना समय डिबेट करता था, उससे कहीं अधिक समय पढ़ने में जाता था। मैं जितना हो सकता था, लोगों से बात करता था। सीनियर रिपोर्टर्स के साथ बैठता था। कई ऐसे लोग होते हैं, जिनको जब आप पढ़ते हैं तो आपको समझ आता है कि वे कितने गुणी हैं।

सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग और उसके कारण फेक न्यूज की आ रही बाढ़ के बारे में आपका क्या कहना है? सरकार को कोई राय देना चाहेंगे?

देखिए, जब भी आपको फ्रीडम मिलती है तो उसके साथ जिम्मेदारी भी आती है। जैसे कि समाज में कई ऐसे काम हैं, जो नहीं होने चाहिए, लेकिन वो हो रहे हैं। दो चीजे हैं कि एक तो आप गलत कर रहे हैं तो मैं आपको टोककर कहूंगा कि देखिए, आप गलत कर रहे हैं लेकिन अगर प्लेटफॉर्म ही भेदभाव करने लगे तो फिर क्या होगा? अगर एक आदमी जो झूठ बोल रहा है, उसे आप बढ़ावा दे रहे हैं और मैं अगर उसे सही करने की कोशिश कर रहा हूं तो आप मुझे दबा दें, तो ये ठीक नहीं है। इसलिए दिक्क्त प्लेटफॉर्म्स की है।

जब ये लोग नेरेटिव बिल्ड करने लगते हैं तो दिक्क्त वहां आती है। इसलिए इन्हे रेगुलेट करने की  जरूरत है। सरकार को यह तय करना होगा कि देश के 80 करोड़ लोगों का डाटा देश का डाटा है, आप उसे अपने हिसाब से इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। अगर कोई प्लेटफार्म आपकी निजता का उल्लंघन करता है तो उसके बाद आपके पास कोई ऑप्शन नहीं रहता है, क्योंकि वो हमारी सरकार के हाथ में नहीं है। हमारा सारा डाटा देश में नहीं बल्कि उनके पास स्टोर रहता है।

हमारी हर चीज उनके सर्वर पर अपलोड ही रहती है और इसे कंट्रोल करने की जरूरत है। प्लेटफार्म डाटा की ताकत लेकर सरकार को डराने की भी कोशिश करता है। इसलिए इनको लाइन पर लाने की जरूरत है।

पिछले कुछ वर्षों में मीडिया को लेकर काफी निगेटिव बातें हुई हैं। गोदी मीडिया और टुकड़े-टुकड़े गैंग जैसे टर्म्स इस्तेमाल किए जा रहे हैं। आप अपने आप को कहां पाते हैं?

देखिए, मैं एक आम भारतीय हूं और खुद को देश के साथ खड़ा पाता हूं। मेरा जुड़ाव किसी राजनीतिक पार्टी के लिए नहीं है। मेरा जुड़ाव देश से है। अगर देश के लिए कोई अच्छा है तो वो मेरे लिए भी अच्छा है। कौन मेरे देश के बारे में सोच रहा है और कौन मेरे भारत को आगे बढ़ाने के बारे में सोच रहा है। अगर किसी के पास भारत की तरक्की का ब्लूप्रिंट है तो आनंद उसके साथ है। जो समाज के हर वर्ग को बढ़ाने की बात करता है, मैं उसके साथ हूं।

अब आपके गोदी मीडिया वाले प्रश्न पर आते हैं। देखिए, एक समय था जब कई पत्रकार मुफ्त का खाते थे, विदेश यात्राओं में जाते थे और घूम-फिरकर वापस आ जाते थे। इसके बदले में जो आपको खिला रहा है, आप उसके खिलाफ मत लिखिए, ऐसी सोच रखने वाले अपने आप को स्वतंत्र पत्रकार कहते हैं। दूसरी ओर जो निस्वार्थ भाव से ये कहे कि ये गलत है और देश के लिए ठीक नहीं है, वो इनके लिए गोदी मीडिया है। मैं जब भी कभी थोड़ा विचलित हो जाता हूं तो भगवतगीता के अध्याय 2, 3 और 4 को पढ़ता हूं, क्योंकि वो कर्म योग से संबंध रखते हैं।

अगर आपको अपने काम में विश्वास है तो आप बस उस काम को पूरी शिद्द्त से कीजिए। अगर आप ये जानते हैं कि ये गलत है और फिर भी आप उसे कर रहे हैं तो फिर आप गलत कर रहे हैं। अगर मैं अपने देश के लिए कुछ अच्छा कर रहा हूं तो मेरा दिमाग उधर क्लियर है और मैं वो करता हूं।

समाचार4मीडिया के साथ आनंद नरसिम्हन की इस बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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जानें, वरिष्ठ पत्रकार पद्मजा जोशी ने कैसे दी कोरोना को मात, पीड़ितों को दी ये सलाह

कोरोनावायरस (कोविड-19) का प्रकोप कम होने का नाम नहीं ले रहा है। इस महामारी की चपेट में आकर आए दिन तमाम लोगों की जान जा रही है, वहीं कई लोग विभिन्न अस्पतालों में उपचाराधीन है।

पंकज शर्मा by
Published - Thursday, 06 May, 2021
Last Modified:
Thursday, 06 May, 2021
Padmaja Joshi

कोरोनावायरस (कोविड-19) का प्रकोप कम होने का नाम नहीं ले रहा है। इस महामारी की चपेट में आकर आए दिन तमाम लोगों की जान जा रही है, वहीं कई लोग विभिन्न अस्पतालों में उपचाराधीन है। संकट के इस दौर में अपनी जान को जोखिम में डालते हुए तमाम पत्रकार अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं और कोरोना को लेकर रिपोर्टिंग भी कर रहे हैं। ऐसे में कोरोना पीड़ितों में बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी भी शामिल हैं। हालांकि, कई पत्रकार इस महामारी पर विजय पाने में सफल रहे हैं। इन्हीं में वरिष्ठ पत्रकार और अंग्रेजी न्यूज चैनल ‘टाइम्स नाउ’ (Times Now) की कंसल्टिंग एडिटर (पॉलिटिक्स) पद्मजा जोशी भी शामिल हैं। अपने बेबाक अंदाज के लिए पहचानी जानी वालीं पद्मजा जोशी ने समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में बताया कि उनके लिए कोरोना से संक्रमण का दौर कैसा रहा और कैसे उन्होंने इस महामारी पर विजय पाई। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपको कैसे पता चला कि आप कोरोनावायरस से संक्रमित हैं?

मुझे पिछले साल कोरोना का संक्रमण हुआ था। हालांकि उस दौरान कोरोना के लक्षण इतने गंभीर नहीं थे। मुझे हल्का बुखार और खांसी थी। उस समय मौसम में भी बदलाव हो रहा था, इसलिए बुखार-खांसी को मैंने ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया। इसके बाद मुझे बदन में बहुत ज्यादा दर्द होने लगा, यह कोरोना का लक्षण था, जिस पर मुझे कुछ शक हुआ। इसके बाद मैंने खुद को आइसोलेट किया और पहला आरटीपीसीआर (कोरोना संक्रमण का पता लगाने के लिए होने वाली जांच) टेस्ट कराया। हालांकि, यह टेस्ट निगेटिव आया तो मुझे लगा कि मैं कोरोना से संक्रमित नहीं हूं। उस समय दिवाली का समय था और ऑफिस में छुट्टी थी, इसके बाद वीकेंड हो गया था। ऐसे में मैं ऑफिस में नहीं थी। इसके बाद मेरे एक परिचित डॉक्टर ने फोन पर सलाह दी कि बेशक मेरा आरटीपीसीआर टेस्ट निगेटिव आया है तो भी इन लक्षणों (काफी खांसी और बदन दर्द) के आधार पर मुझे चेस्ट का सीटी स्कैन करा लेना चाहिए। इसके बाद जांच कराने पर कोरोना की पुष्टि हुई।

पता चलने पर सबसे पहले आपने क्या किया? आप सेल्फ आइसोलेट हुईं या किसी डॉक्टर को दिखाया?

कोरोना का पता चलते ही मैंने सबसे पहले खुद को आइसोलेट कर लिया। इसके बाद मैंने डॉक्टर्स की सलाह पर सभी आवश्यक मेडिसिन लीं और पूरा कोविड प्रोटोकॉल फॉलो किया।

इलाज के दौरान आपने खाने-पीने का किस तरह से ध्यान रखा और अन्य कौन सी सावधानियां बरतीं?

चूंकि मैं 14 दिन तक होम आइसोलेशन में थी। उस दौरान डॉक्टर्स का फोन आता था और उनके बताए अनुसार मैं दवा लेती रही। जहां तक खाने का सवाल है तो मैं खुद खाना पकाती थी। इस दौरान डॉक्टर्स की सलाह पर मैंने ज्यादा प्रोटीनयुक्त भोजन, जूस, आंवला, विटामिन सी और नारियल पानी का भी काफी सेवन किया।

आइसोलेशन के दौरान आपने अपना समय व्यतीत करने के लिए क्या किया?

इस दौरान मैंने टेलिविजन पर न्यूज तो फॉलो की हीं, इसके साथ ही मुझे पढ़ना भी काफी अच्छा लगता है तो मैंने काफी किताबें पढ़ीं। हालांकि, कोविड में कमजोरी बहुत आ जाती है। पहले हफ्ते में मेरे साथ भी ऐसा हुआ। कमजोरी के कारण मुझे सिरदर्द-आंखों में दर्द और चक्कर भी आए। उस समय मैंने सिर्फ आराम किया।  

इस दौरान परिजनों और अन्य करीबियों का व्यवहार कैसा रहा?

मेरे लिए यह काफी अच्छी बात रही कि मुझे तमाम लोगों का काफी सपोर्ट मिला। मैंने एक बार ट्वीट किया था कि मैं कोविड पॉजिटिव हूं, इसके बाद तो तमाम लोगों ने सोशल मीडिया पर मेरे जल्द स्वस्थ होने की कामना की पोस्ट करनी शुरू कर दीं, कई लोगों ने मुझे कॉल किया। बाकी, मेरे परिचितों और दोस्तों ने भी मेरा हरसंभव ख्याल रखा।

आपकी नजर में कोरोना के संक्रमण से किस तरह बचा जा सकता है?

मेरा मानना है कि काम तो कभी रुक नहीं सकता। ऐसे में आपको सतर्क रहना होगा। इसके साथ ही कोविड को लेकर सरकारी गाइडलाइंस का पालन करना चाहिए। डबल फेसमास्क, लोगों से उचित दूरी और बार-बार हाथ धोने से भी संक्रमण का खतरा कम हो जाता है।

संक्रमण से निजात मिलने पर अब कोरोना से जूझ रहे पीड़ितों को क्या कहना चाहती हैं?

मेरा मानना है कि खुद को सकारात्मक बनाए रखना इस दौरान सबसे ज्यादा जरूरी है। आइसोलेशन में जब कोई रहता है तो उस व्यक्ति के दिमाग में काफी सारी चीजें होती हैं। उस दौरान वह काफी कमजोर होता है, परिवार व दोस्तों से दूर होता है। आसपास डराने वाली खबरें आ रही होती हैं। ऐसे में खुद को सकारात्मक बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए आप अपनी पसंद का कोई भी काम कर सकते हैं जैसे-किसी को म्यूजिक पसंद होता है, किसी को पेंटिंग बनानी पसंद होती है, किसी को किताबें पढ़ना और किसी को दोस्तों से फोन पर बातें करना। कहने का मतलब यह है कि अपनी सोच का सकारात्मक बनाए रखने के लिए आप खुद को अपने पसंदीदा काम में व्यस्त रखें। आप कमरे में ही हल्का-फुल्का व्यायाम और योग भी कर सकते हैं यानी आप खुद को किसी न किसी रूप में मोटिवेट रखें। 

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
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वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय ने यूं लड़ी कोरोना से जंग, मीडिया को लेकर कही ये बात

कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो इस महामारी पर विजय पाने में सफल रहे हैं। इन्हीं में वरिष्ठ पत्रकार और रिलायंस इंडस्ट्रीज के मीडिया निदेशक व प्रेजिडेंट उमेश उपाध्याय भी शामिल हैं।

विकास सक्सेना by
Published - Wednesday, 05 May, 2021
Last Modified:
Wednesday, 05 May, 2021
Umesh-Upadhyay54

देश में कोरोना की दूसरी लहर बेहद भयावह रूप ले रही है। कोरोना का विकराल रूप नियंत्रण में आने की बजाय अधिक विकराल होता जा रहा है। इस महामारी के खिलाफ पूरे देश में ‘जंग’ जारी है। संकट के इस दौर में अपनी जान को जोखिम में डालते हुए तमाम पत्रकार अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं और कोरोना को लेकर रिपोर्टिंग भी कर रहे हैं। ऐसे में कई पत्रकारों के कोरोनावायरस की चपेट में आने से मौत की खबरें भी सामने आई हैं, जबकि कई लोग विभिन्न अस्पतालों में उपचाराधीन है।  हालांकि, कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो इस महामारी पर विजय पाने में सफल रहे हैं। इन्हीं में वरिष्ठ पत्रकार और रिलायंस इंडस्ट्रीज के मीडिया निदेशक व प्रेजिडेंट उमेश उपाध्याय भी शामिल हैं। समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय ने बताया कि उनके लिए कोरोना से संक्रमण का दौर कैसा रहा और कैसे उन्होंने इस महामारी पर विजय पाई। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपको कैसे पता चला कि आप कोरोनावायरस से संक्रमित हैं?

मुझे पहले बुखार आया, जिसके बाद मैंने खुद को चेक करवाया तो रिपोर्ट पॉजिटिव आई। हालांकि मेरी पत्नी सीमा उपाध्याय, जो कि भारतीय एयरफोर्स में काम करती हैं, पहले ही कोरोना पॉजिटिव हो चुकीं थीं, तब मैं सुरक्षित था, क्योंकि उस समय मैंने अपना टेस्ट करवाया था, जो निगेटिव आया था। लेकिन जब मुझे बुखार आने लगा, तो मैंने चेक किया, जिसका रिजल्ट पॉजिटिव आया। मेरी पत्नी मेरे अस्पताल में भर्ती होने से पहले दस दिन तक अस्पताल में थीं। जिस दिन मैं अस्पताल में भर्ती होने गया, उसी दिन वे घर वापस आयीं थीं।   

पता चलने पर सबसे पहले आपने क्या किया? आप सेल्फ आइसोलेट हुए या किसी डॉक्टर को दिखाया?

एक शाम को अचानक से मेरे गले में खराश होने लगी, आवाज बदलने लगी, इसके बाद मुझे खांसी भी आने लगी, यह सब देखते हुए मैंने तुरंत खुद को आइसोलेट किया। इसके बाद मैंने डॉक्टर से संपर्क किया, तो डॉक्टर ने कहा, ‘यह माइल्ड सा है’, इस पर मैंने डॉक्टर को बताया कि मैंने खुद को आइसोलेट कर लिया है। लेकिन अगले दिन मुझे बुखार भी आने लगा, जिसके बाद मैंने अपना कोरोना टेस्ट करवाया, जो पॉजिटिव आया। इसके बाद डॉक्टर से मेरा लगातार संपर्क बना रहा। डॉक्टर ने फोन पर मेरी बड़ी मदद की। वे हमेशा कॉल और वॉट्सऐप पर उपलब्ध रहते थे। डॉक्टर ने जिस तरह से मुझे सपोर्ट किया है, उसके लिए कोई भी शब्द कहना, कम होगा। लेकिन जब बुखार नहीं उतरा और ऑक्सीजन लेवल भी कम होने लगा, तो डॉक्टर ने मुझे अस्पताल में भर्ती हो जाने की सलाह दी, जिसके बाद मैं दिल्ली के सरिता विहार स्थित अपोलो अस्पताल में भर्ती हो गया, जहां मैं करीब 10 दिनों तक भर्ती रहा। इसके बाद जब मैं घर आया तो मैंने खुद को घर में आइसोलेट कर लिया। यह समय करीब 10 दिनों तक रहा। अस्पताल से पहले भी मैं करीब 4-5 दिनों तक घर में आइसोलेट रहा था, इस तरह से यह समय करीब 25 दिनों का रहा। यहां जानकारी के लिए बता दूं कि अस्पताल आपको रिपोर्ट निगेटिव आने पर ही घर नहीं भेजता है, बल्कि जब आप में कोरोना के लक्षण खत्म हो जाते हैं और आप स्टेबल हो जाते हैं, तभी आपको घर भेजा जाता है।।

इलाज के दौरान आपने खाने-पीने का किस तरह से ध्यान रखा और अन्य कौन सी सावधानियां बरतीं?      

सबसे पहले आइसोलेशन में यह बहुत ही आवश्यक है कि कोई भी कोताही नहीं बरतें। यानी आइसोलेशन का अर्थ होता है एकदम अलग हो जाना। किसी से भी आपका संपर्क न हो। जब पहले मैं 4-5 दिन आइसोलेशन में गया, तो मेरे लिए यह एक तरह से नया जीवन था। मैंने स्वयं से दोबारा अपना काम करना सीखा। यानी जिन अलग बर्तनों का मैं प्रयोग करता था, उन्हें स्वयं साफ करना, जिस कमरे में मैं था, उस कमरे को साफ रखना। उसकी डिसइंफेक्टेंट के साथ सफाई करना और खुद के कपड़ों को साफ रखना और धोना।

देखिए, यह संक्रमण है। यह अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, मालिक-नौकर, उद्योगपति-कर्मचारी, बड़े-छोटे अफसर में फर्क नहीं करता। एक तरह से यह सभी चीजों को समतल करता है और मुझे इस बात का अहसास हुआ और मैंने सोचा कि ये सारे काम स्वयं करने हैं। मुझे इससे कष्ट नहीं हुआ, बल्कि मुझे लगा कि ये सभी काम तो कम से कम करने ही चाहिए।  जब मैं अस्पताल में गया, तो मैं वहां डॉक्टर्स को देखता था, नर्सेज को देखता था, सफाईकर्मियों को देखता था। उनका काम काफी मुश्किल और जीवट भरा है। दिल्ली में गर्मियों के समय पीपीई किट पहनकर 12-12 घंटे नौकरी करना काफी मुश्किल है। जब आप पीपीई किट पहने होते हैं, तो आपको काफी पसीना आता है, आप इसे पहनकर चाय भी नहीं पी सकते, खाना भी नहीं खा सकते। कहने का मतलब है कि इसे पहनकर 12-12 घंटे ड्यूटी करना कोई आसान काम नहीं है।

आइसोलेशन के दौरान आपने अपना समय व्यतीत करने के लिए क्या किया?

इस दौरान काफी पढ़ना हुआ। ऑनलाइन तमाम किताबें उपलब्ध हैं। काफी इंट्रैस्टिंग सीरीज देखीं मैंने, जिन्हें देखने की काफी रुचि थी। इस दौरान मैंने जिन सीरीज को देखा, उनमें थी ‘द क्राउन’ (The Crown),  ‘डेसिगनेटेड सर्वाइवर’ (Designated Survivor), ‘चर्नोबिल’ (Chernobyl), ‘द लास्ट जार’ (The Last Jar)। वहीं मिडिल ईस्ट को लेकर भी मैंने बहुत सीरीज देखीं, जिनमें से एक थी ‘द स्पाई’ (The Spy), जोकि इजरायल के एक असली जासूस की कहानी है। इसके अलावा मैं कमरे में टहलता था। कई बार लोगों को लगता है कि टहलने के लिए जगह चाहिए होती है, लेकिन ऐसा नहीं है। मैंने कमरे के अंदर ही रहते हुए एक दिन में दस-दस हजार स्टेप किए। इसलिए कहना चाहूंगा कि व्यस्त रहने के लिए चीजों की जरूरत नहीं होती है।

वहीं मेरी पत्नी जब बीमार थीं, तो अस्पताल के वार्ड में ही पेंटिंग बनाना शुरू किया। उन्होंने इस बीच बहुत सारी पेंटिंग बनायीं। वे पहले से पेंटर नहीं हैं, लेकिन उन्होंने कलर्स मंगवाए और पेंटिंग करना शुरू किया, ताकि वे पॉजिटिव रह सकें। इस तरह से वह खुद को व्यस्त रख सकीं।   

इस दौरान परिजनों और अन्य करीबियों का व्यवहार कैसा रहा?

हमारा बड़ा परिवार है। कई मित्र हैं। सभी फोन करते थे और लगातार उनसे बात होती रहती थी। परिवार तो सबसे बड़ी ताकत और संबल है। मेरे सहयोगी और ऑफिस में काम करने वाले लोगों ने भी मेरा बहुत सहयोग किया। मेरे लिए यह एक नूतन जन्म था। जीवन में नई चीजों को देखने की एक नई दृष्टि आयी। मुझे इन पच्चीस दिनों में आत्मनिरीक्षण करने का समय मिला। बहुत सोचने का समय मिला। समाज कैसे काम करता है, मीडिया कैसे काम करती है, इसको देखने-सोचने का समय मिला।

संक्रमण से निजात मिलने पर अब कोरोना से जूझ रहे पीड़ितों को क्या कहना चाहते हैं? 

सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहूंगा कि बहुत ज्यादा खबरों को न देखें, क्योंकि हमारे देश में बहुत ज्यादा हताश करने वाली खबरें आती हैं। जीवन में उम्मीद, आशा और आकांक्षा, ये मानव को जिंदा रखते हैं। इसलिए सारी चीजों का नियम से पालन करते हुए उम्मीद बनाए रखें कि आप अच्छे होंगे। विश्वास रखें कि आप दुनिया में अच्छे हैं और आपको लोग ठीक होते देखना चाहते हैं। ये भरोसा रखें कि आपके परिजनों को, आपके पड़ोसियों को, आपके मित्रों को, आपके सहयोगियों को आपकी आवश्यकता और चिंता है। चूंकि मैं मीडिया से हूं, इसलिए इस बात को फिर चिन्हित करना चाहता हूं और बहुत ही संजीदगी और गंभीरता से कहना चाहता हूं कि मीडिया में बहुत ज्यादा नकारात्मक दिखाना कि सब जगह त्राहि-त्राहि है। सबकुछ है, वो ठीक है, लेकिन उसको वस्तुपरक खबरें दिखाना चाहिए, न कि नमक-मिर्च लगाकर, क्योंकि जो आदमी अकेले कमरे में टीवी देख रहा है, उसको आप सिर्फ मौत का मंजर दिखा रहे हैं। यह ठीक नहीं है। आप ये भी दिखाइए कि कितने लोग ठीक हो रहे हैं, आप ये भी दिखाइए कि आशा की किरणें कितनी हैं। ऐसा मत दिखाइए कि सबकुछ तबाह हो गया है, नाश हो गया है, क्योंकि यदि अपने दर्शकों, श्रोताओं और पाठकों से उनके जीवन की उम्मीद ले लेंगे, तो आप अपने साथ भी अन्याय करेंगे। अमेरिका में पांच लाख से ज्यादा लोग मारे गए हैं। मैं रोज अमेरिका के अखबार पढ़ता हूं। कहीं ऐसी रोज रोने वाली तस्वीरें नहीं दिखाई जाती। सत्य को बताते हैं वो, लेकिन सत्य को डराने के लिए नहीं बताते हैं, बल्कि लोगों को उम्मीद देने के लिए बताते हैं। खबरों को छिपाना नहीं है। खबरें और मीडिया रूदाली नहीं बन सकता, उसको जीवन से आशा को नहीं छीन लेना है। अफसोस की बात है कि हमारे देश में ऐसा हो रहा है।           

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वरिष्ठ पत्रकार नविका कुमार ने बताया, कैसे लड़ी उन्होंने कोरोना के खिलाफ जंग

कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो इस महामारी पर विजय पाने में सफल रहे हैं। इन्हीं में वरिष्ठ पत्रकार और ‘टाइम्स नेटवर्क’ की ग्रुप एडिटर नविका कुमार भी शामिल हैं।

पंकज शर्मा by
Published - Tuesday, 04 May, 2021
Last Modified:
Tuesday, 04 May, 2021
NavikaKumar454

कोरोनावायरस (कोविड-19) ने पूरे देश में हाहाकार मचा रखा है। रोजाना तमाम लोगों की इस महामारी की चपेट में आकर मौत हो रही है, जबकि कई लोग विभिन्न अस्पतालों में उपचाराधीन है। कोरोना पीड़ितों में बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी भी शामिल हैं। हालांकि, कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो इस महामारी पर विजय पाने में सफल रहे हैं। इन्हीं में वरिष्ठ पत्रकार और ‘टाइम्स नेटवर्क’ (Times Network) की ग्रुप एडिटर (Politics) नविका कुमार भी शामिल हैं। समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में नविका कुमार ने बताया कि उनके लिए कोरोना से संक्रमण का दौर कैसा रहा और कैसे उन्होंने इस महामारी पर विजय पाई। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपको कैसे पता चला कि आप कोरोनावायरस से संक्रमित हैं?

बुखार और कफ की समस्या होने पर मैंने कोविड-19 की जांच कराई थी, जिसमें मुझे संक्रमण होने का पता चला।

पता चलने पर सबसे पहले आपने क्या किया? आप सेल्फ आइसोलेट हुईं या किसी डॉक्टर को दिखाया?

सबसे पहले मैंने खुद को आइसोलेट कर लिया। बाद में ऑक्सीजन लेवल कम होने पर मुझे मेदांता हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। अस्पताल में तीन-चार दिन रहने के बाद मैं घर पर आ गई, क्योंकि मेरा संक्रमण ज्यादा नहीं था।   

इलाज के दौरान आपने खाने-पीने का किस तरह से ध्यान रखा और अन्य कौन सी सावधानियां बरतीं?

बस आइसोलेट रही और जो भी डॉक्टरों ने बताया, उसके अनुसार खाने-पीने का ध्यान रखा। मेरे परिजन भी कोविड पॉजिटिव हो गए थे। इस दौरान मैंने खुद व अन्य परिजनों को मोटिवेट किया। ईश्वर की कृपा रही कि हम सब इस मुश्किल समय से बाहर निकल आए।

आइसोलेशन के दौरान आपने अपना समय व्यतीत करने के लिए क्या किया?

मैंने तो पूरा बिहार इलेक्शन अस्पताल से ही कवर किया। दरअसल, मैं अस्पताल में ही अपना लैपटॉप लेकर चली गई थी। मैंने काम भी वहीं से किया और बीच में समय मिलने पर आराम भी किया। मैंने म्यूजिक भी काफी सुना।

इस दौरान परिजनों और अन्य करीबियों का व्यवहार कैसा रहा?

जाहिर सी बात है कि कोविड पॉजिटिव पता चलने पर फिक्र तो होती है, लेकिन यदि संक्रमण बहुत ज्यादा नहीं है तो थोड़ा रिलीफ भी महसूस होता है। हां, इस दौरान हमने मेडिकल रूटीन को पूरी तरह फॉलो किया। वैसे- आमतौर पर होम आइसोलेशन के लिए 17 दिन का समय रखा जाता है, लेकिन हमने परिवार के सभी सदस्यों के लिए यह समय 19 दिन का रखा। बस, इसी तरह से एहतियात बरतते हुए हमने इस महामारी पर जीत हासिल कर ली।   

आपकी नजर में कोरोना के संक्रमण से किस तरह बचा जा सकता है?

कोरोना से बचाव के लिए लोगों को इस दिशा में तय सरकारी गाइडलाइंस का पालन करना चाहिए। चूंकि इस वायरस का संक्रमण पिछली बार से ज्यादा है, इसलिए डबल मास्क पहनना चाहिए। लोगों से उचित दूरी बनाए रखनी चाहिए। भीड़भाड़ में जाने से बचिए। बहुत जरूरी होने पर ही घर से बाहर निकलिए। यानी पूरी तरह से कोविड प्रोटोकॉल का पालन करना चाहिए। कहा भी जाता है कि Prevention is better than cure।

संक्रमण से निजात मिलने पर अब कोरोना से जूझ रहे पीड़ितों को क्या कहना चाहती हैं?

इस बारे में मैं बस यही कहना चाहती हूं कि बीमारी आप पर उतनी ही हावी होती है, जितनी कम आपकी इच्छाशक्ति (Will Power) होती है। इसलिए, मजबूत इच्छा शक्ति के साथ बीमारी से लड़ना चाहिए। डरने के बजाय यदि थोड़ा साहस और धैर्य से इसका मुकाबला करें और सकारात्मक सोच बनाए रखें तो आप इस बीमारी को मात दे सकते हैं। इस दौरान आप खुद को शांत रखने और सकारात्मक सोच को बनाए रखने के लिए अपने पसंदीदा शौक जैसे म्यूजिक, पेंटिंग या बुक रीडिंग का सहारा ले सकते हैं। इस दौरान म्यूजिक काफी राहत देता है और मुझे यह पसंद भी है, इसलिए मैंने काफी म्यूजिक सुना। बस पॉजिटिव सोच बनाए रखिए कि हम इस बीमारी से बाहर निकल आएंगे। कहने का अभिप्राय यह है कि इस महामारी से लड़ने के लिए मजबूत इच्छा शक्ति और सकारात्मक सोच जरूरी है।

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स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए सोशल मीडिया का मजबूत रहना जरूरी है: राणा यशवंत

इंडिया न्यूज के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस बातचीत में उन्होंने अपने जीवन के तमाम पहलुओं पर चर्चा की है।

Last Modified:
Monday, 26 April, 2021
Rana Yashwant

इंडिया न्यूज के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस बातचीत में उन्होंने अपने जीवन के तमाम पहलुओं पर चर्चा की है। उन्होंने एक मीडियाकर्मी से अपने लेखक बनने के सफर को भी साझा किया है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपके प्रसिद्द शो ‘अर्धसत्य’ की वापसी हो रही है। इस बारे में कुछ बताइए?

यह शो लगभग ढाई साल के बाद वापस आ रहा है। यह शो वर्ष 2014 में शुरु हुआ था और वर्ष 2019 तक एक शानदार सफर इस कार्यक्रम ने पूरा किया। उसके बाद वापस हम इस शो को लेकर आ रहे हैं। आज के समय में पत्रकारिता तयशुदा लकीर पर चलने वाली चीज हो गई है। सच की अपनी-अपनी व्याख्या होती है, लेकिन सच हमेशा सच ही रहता है।

अगर मैं लकीर के दायीं तरफ हूं तो मुझे ये अहसास है कि मुझे उसी तरफ रहना है और अगर मैं बायीं तरफ हूं तो मुझे पक्का यकीन है कि मुझे वहीं रहना है। अगर आप बीच में राय बनाने की कोशिश करते हैं तो ये दर्शक और देश दोनों के साथ बेईमानी है। कुछ आधा सच छोड़ देते हैं और वो जो आधा छोड़ा हुआ सच जब तक लोगों के सामने नहीं आता, वह पूरा नहीं हो सकता है।

आज आप इंडिया न्यूज के मैनेजिंग एडिटर हैं और यहां तक आना इतना आसान तो रहा नहीं होगा? अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए?

जीवन में जब कभी आप चलते हैं तो आपको अंदाजा नहीं होता है कि आप किधर जाएंगे और कैसे सब होगा। कई बार जो आपने नहीं सोचा होता है, आप उस लाइन में आ जाते हैं और वही जीवन का रास्ता हो जाता है। मैंने कभी सोचा नहीं था कि जीवन में आज यहां तक पहुंच जाऊंगा।

मैं बिहार के छपरा जिले से हूं, जहां से निकले लोगों ने बहुत नाम कमाया है, जिनमें जयप्रकाश नारायण जैसे लोग शामिल हैं। छपरा जिले के एक गांव रामपुर कलां में पैदा हुआ और वहीं मेरा बचपन बीता। उसके बाद मैं अपने जिला मुख्यालय के कॉलेज में आया और उसके बाद वहां से पटना, बीएचयू होते आईआईएमसी आया और आज आपके बीच हूं।

आज भी जिंदगी वही गांव की है। मसलन, खेतों से होकर स्कूल जाने की, पानी लगे हुए धान की फसल के बीच से दौड़ने की, स्कूल से लौटते समय चना उखाड़कर खाने की, गर्मी के दिनों में आम की केरियां तोड़कर खाने की और मुझे लगता है कि वो एक अलग ही दुनिया थी।

जब आसमान से कोई विमान जाता था तो बस उसे देखकर सोचना कि कौन जा रहा है और ये क्या है? मेरे दादाजी कांग्रेस के नेता थे। गांव में उस समय बहुत कम लोगों के पास कार होती थी तो मेरे दादाजी की कार के पीछे हम भागते थे। इसके सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि जब आप महानगर के समाज देखते हैं तो दोनों की समझ आपको आ जाती है। गांव से संस्कार बनते हैं और वही चीज जीवन में सबसे अधिक काम भी आती है।

आपने ‘जी’ और ‘आजतक’ जैसे बड़े चैनल्स के लिए काम किया है। अपनी पहली नौकरी और शुरुआती दिनों के बारे में कुछ बताइए?

सच कहूं तो वो दिन बहुत ही मुश्किल भरे थे। जैसे कि किसी ने इस फील्ड में आने के बाद यदि पांच साल बाद नौकरी छोड़ दी तो अगर आप उससे पूछेंगे तो वो कहेगा की यार बड़ा भयानक अनुभव रहा। मेरे साथ ये तय नहीं था कि मैं पत्रकार बनूंगा लेकिन जब आईआईएमसी में था तो ‘जी न्यूज’ के लिए इंटर्नशिप करने का मौका मिला।

उस वक्त आलोक वर्मा जी वहां संपादक थे। मुझे हाई बैंड टेप को लॉक करने को कहा गया यानी कि किस टाइमलाइन पर क्या है, वो आपको लिखना होता है। मैं रात-रात भर ये काम करता था और आंखें फट जाती थीं। लगभग एक महीने तक मैं ये करता रहा।

एक किस्सा मुझे याद है, एक शो बन रहा था और उसका नाम था ‘इनसाइड स्टोरी’, उसके जब एक एपिसोड मैंने लॉक किया तो मुझे यह अहसास हुआ कि ऐसी स्क्रिप्ट तो मैं भी लिख सकता हूं। इस बारे में मैंने अपने संपादक से बात की और उन्होंने कहा कि ठीक है आप लिखिए। रात भर मैंने अपना काम किया और सुबह चार बजे मैं स्क्रिप्ट लिखने बैठा।

सुबह के नौ बजे के करीब मैंने वो स्क्रिप्ट उनकी टेबल पर रख दी और एक नोट लिखा, सर मैं घर जा रहा हूं आप स्क्रिप्ट पढ़ लीजिएगा। उस दिन शाम को मेरे पास कॉल आता है कि आलोक जी मुझसे मिलना चाहते हैं।

मैं जब आलोक जी से मिला तो उन्होंने मुझसे कहा कि तुमने बहुत बढ़िया स्क्रिप्ट लिखी है और इसमें कुछ भी एडिट करने की जरूरत नहीं है। क्रेडिट लाइन में तुम्हारा भी नाम इस बार जाएगा। वो मेरी जिंदगी का सबसे यादगार दिन था कि जब आप पहली बार स्क्रिप्ट लिखें और आपका संपादक कहे कि ये एकदम शानदार है। जब मैंने क्रेडिट लिस्ट में अपना नाम देखा तो वो दिन मेरे लिए यादगार बन गया।

इस घटना के बाद मैंने निर्णय लिया कि पत्रकारिता मेरे लिए सही है लेकिन जीवन इम्तिहान का नाम है। कम उम्र में शादी और मामूली सैलरी, दिल्ली में अपनी पत्नी के साथ रहता था और मुश्किल से घर चलता था। ऐसे समय में जीवन में बड़ी कुंठाएं पैदा हो जाती हैं। कभी कभी लगने लगता है कि हम तो इस लायक ही नहीं हैं। कई बार सोचा कि ये जिंदगी बेमानी है। एक रात यमुना फ्लाईओवर के नीचे खड़ा था। जून-जुलाई के महीने में यमुना लबालब भरी थी। एक पुलिस वाला मेरे पास आया और उसके कहा कि आधी रात है और आप ऐसे खड़े हैं, नीचे नदी है।

मैंने उससे कहा कि नहीं, बस ऐसे ही मैं खड़ा हूं। उसने सोचा कि शायद ये आदमी परेशान है और मैं चला गया तो ये कुछ कर सकता है। उसने मुझसे कहा कि आप मेरी बाइक पर बैठिए मैं आपको छोड़ देता हूं। उसने मुझे सराय काले खां ड्रॉप किया और मैं बस पकड़कर घर आ गया। उस दिन मैं रात को साढ़े बारह बजे घर आया और मैंने निर्णय किया कि जीवन में लड़ना है, हारना नहीं।

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद हुई कवरेज पर एक बहुत बड़े वर्ग में नाराजगी देखी गई है। उसके बारे में आपका क्या कहना है?

सुशांत एक नौजवान अभिनेता थे और उनका ऐसे चले जाना एक बेहद ही संजीदा खबर थी। उनमें बहुत अधिक संभावना थी और उनकी मौत पर वाकई सवाल खड़े हुए हैं। एक छोटी सी जगह से आने वाले आदमी ने बॉलिवुड में अपनी जो जगह बनाई। न जाने कितनी पीड़ा से उसे गुजरना होता है और उसे नाकाम करने की कोशिश भी की जाती है।

सुशांत की मौत को लेकर मेरे मन में आज भी कई तरह के संदेह हैं और कई बुनियादी सवाल हैं, मुझे आज भी उनका जवाब नहीं मिला है। किसी भी संपादक के लिए वो एक बड़ी खबर थी और उसकी मौत के बाद जिस तरह से मीडिया खड़ा रहा, वो जरूरी भी था।

हालांकि, कई लोगों ने उसकी मौत के बाद अपने मुद्दों को उसकी मौत से जोड़कर फायदा उठाने की भी कोशिश की थी। इसके अलावा एक चीज और है कि एम्स की रिपोर्ट सीबीआई के पास है और आज भी उन्होंने उसकी मौत से पर्दा उठाने की कोशिश नहीं की है।

मेरा यह मत है कि सुशांत की मौत एक प्रामाणिक स्टोरी थी और उसकी मौत सिर्फ एक कलाकार की मौत नहीं थी, बल्कि उसके पीछे एक बहुत बड़ा गिरोह शामिल था। वो सिर्फ एक केस नहीं है बल्कि इसके अलावा भी कई ऐसे केस हैं, जिनका सच लोगों के सामने आना बेहद जरूरी है।

पिछले कुछ सालों से डिजिटल मीडिया की ताकत बढ़ी है और फेक न्यूज का सिलसिला बन पड़ा है। इस पर आपके क्या विचार हैं?

आपकी बात सही है। किसी भी औजार को अगर बिना इल्म के इस्तेमाल करना शुरू कर देंगे तो बंदर के हाथ में उस्तरे वाली बात हो जाएगी। देश में सबको अपनी बात कहने का हक है और सोशल मीडिया एक ऐसा प्लेटफार्म है जहां आप अपनी बात रख सकते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि अगर मैं किसी मसले पर राय रखने की बजाय राय तैयार करने लगा तो वो गलत है। राय रखने में और उसे तैयार करने में बड़ा फर्क है।

अगर आप लोगों की सोच को प्रभावित करने लगें, आकंड़ों में घालमेल करने लगें तो ये साजिश है और ये वाकई गलत बात है। देश की आबादी बहुत है और मेरी अपनी राय है कि सोशल मीडिया लोगों की राय रखने के लिए एक खुला मंच होना चाहिए।

बाकी जगह देखें तो वहां शर्तें हो सकती हैं, लेकिन कम से कम सोशल मीडिया पर वो पाबंदी नहीं है। स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए सोशल मीडिया का मजबूत रहना जरूरी है लेकिन एक कायदा होना चाहिए और उसका पालन भी होना चाहिए। देश में कई ऐसे वाहियात लोग हैं, जिनके पीछे एक मंडली खड़ी हो जाती है और आप लोग उन्हें हीरो बनाने लग जाते हैं। इस रास्ते का बंद होना जरूरी है।

पिछले एक साल से भी अधिक समय से मीडिया कोरोना महामारी का सामना कर रहा है और रेवेन्यू का भी नुकसान हुआ है, उस दिशा में आपका चैनल क्या कदम उठा रहा है?

देखिए, कोरोना का संकट असाधारण, विनाशकारी और विस्फोटक है। सिर्फ इस देश में ही नहीं बल्कि बाकी देशों में भी लाखों लोगों ने इस संकट के कारण जीवन खोया है। अमेरिका जैसे विकसित देश में भी हाहाकार मचा है और इस देश से अधिक मौतें वहां हुई हैं। आर्थिक हालात की बात करें तो फिलहाल जल्दी रिकवर होने के कोई चांस नहीं हैं और यही हालत कंपनियों की भी है। मीडिया में जो रेवेन्यू आज से तीन साल पहले आ रहा था, वो आज ध्वस्त हो गया है।

बाकी चैनल्स का भी यही हाल है और इसी वजह से कम संसाधनों में बेहतर काम करने का माद्दा रखना जरूरी है। जैसे परिवार में, खेतीबाड़ी में, उद्योग में परेशानी है, वैसे ही मीडिया में भी संकट है और हर संपादक उससे बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। जीवन में जिस संतुलन से हम चलते हैं, उसी तरीके से हमें इधर भी चलना होगा। कम खर्चे में चैनल कैसे बेहतर हो सके, हमें उसका कौशल भी विकसित करना होगा।

आप कवि हैं और लेखन भी करते हैं। आपका काव्य संग्रह भी पब्लिश हुआ है। इस यात्रा के बारे में कुछ बताएं?

सिर्फ मीडिया में ही नहीं, आप अगर जीवन के किसी और हिस्से में भी हैं तो लिखना, सोचना और बोलना ये सब आपके जीवन का हिस्सा है। कुछ लोग लिखते हैं और कुछ सिर्फ सोचकर रह जाते हैं। लिखने से आपके पास हुनर आ जाता है कि लिखने का सलीका क्या होना चाहिए।

साहित्य की अपनी कुछ शर्तें होती हैं और वो उस पर आपको आजमाता है। आप उसके बाद अनुभव करते हैं कि मैंने जो लिखा है, उसका असर कितनी दूर तक है। इसे लेकर मेरा लगाव बचपन से रहा, कॉलेज के दिनों में भी मैं ये सब करता रहा। मेरे साथ एक अच्छी बात यह रही कि मेरे जितने भी दोस्त थे, उन सबका सरोकार कहीं ना कहीं साहित्य से रहा और यह चीज मेरे अनुकूल हुई।

हम 12वीं कक्षा तक आते-आते बड़े साहित्यकारों और मीडियाकर्मियों के बारे में बात करते थे। देश और दुनिया के बारे में हम बाते करते थे। एक चाव था और दिलचस्पी थी। इसके अलावा कुछ करम ऊपर वाले का भी होता है और कुछ मेहनत आप भी करते हैं।

मैं जब लिखने लगा तो हिंदी साहित्य के लोगों ने उसको सराहा, हिंदी समाज के लोगों ने उसे हाथों हाथ लिया। केदारनाथ जैसे महाकवि जिनको ज्ञानपीठ पुरुस्कार भी प्राप्त हुआ है, उन्होंने भी मेरी कई कविताओं को सराहा है और उनकी तारीफ की है। अलग हालातों और समस्याओं को आप कैसे देखते हैं। अपने साहित्य में उसे कैसे ढालते हैं और इसके अलावा आपकी सोच पर भी यह काफी हद तक निर्भर करता है।

समाचार4मीडिया के साथ राणा यशवंत की इस बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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ABP नेटवर्क के CEO अविनाश पांडेय ने बताया, ग्रुप ने तमिल मार्केट में क्यों रखा कदम

‘एक्सचेंज4मीडिया’ से बातचीत में ‘एबीपी नेटवर्क’ के सीईओ अविनाश पांडेय ने नेटवर्क की नई पेशकश एबीपी नाडु समेत तमाम मुद्दों पर अपने विचार रखे।

Last Modified:
Friday, 23 April, 2021
Avinash Pandey

‘एबीपी नेटवर्क’ (ABP Network) ने अपने विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाते हुए तमिल बोलने और समझने वालों के लिए तमिल भाषा में एक नया डिजिटल प्लेटफॉर्म 'एबीपी नाडु' (ABP Nadu) लॉन्च किया है। इस लॉन्चिंग के जरिये एबीपी नेटवर्क की योजना तमिलनाडु के प्रतिस्पर्धी डिजिटल न्यूज स्पेस में अपना प्रमुख स्थान बनाने की है। इस प्लेटफॉर्म को लेकर योजनाओं और मार्केट में मौजूद अन्य प्लेटफॉर्म्स से यह किस तरह अलग होगा, समेत तमाम मुद्दों पर ‘एबीपी नेटवर्क’ के सीईओ अविनाश पांडेय ने हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

एबीपी नाडु के बारे में हमें बताएं। इसे अभी क्यों लॉन्च किया गया है? क्या यह विस्तार की दिशा में सिर्फ एक कदम है अथवा रीजनल मार्केट से आ रही मजबूत ग्रोथ से प्रेरित है?

इसमें मैं दोनों बात कहना चाहूंगा। पहली बात तो यह कि तमिल मार्केट कंटेंट के लिहाज से अभी काफी उथल-पुथल है, ऐसे में यह हमारे प्रवेश के लिए सही समय है। राज्य में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की दर काफी ज्यादा है और न्यूज कंटेंट ऑनलाइन रूप से हासिल करने में भी तमिल ऑडियंस काफी रुचि दिखा रहे हैं।  

दूसरी बात यह है कि यदि हम कंज्यूमर के लिहाज से देखें तो रीजनल मार्केट में ग्रोथ के अवसर बहुत ज्यादा हैं। पिछले कुछ वर्षों में रीजनल लॉन्चिंग में काफी बढ़ोतरी देखी गई है, क्योंकि लोग अपनी भाषा में कंटेंट हासिल करने को प्राथमिकता देते हैं। एबीपी नेटवर्क भी रीजनल न्यूज और कंटेंट के क्षेत्र में अग्रणी के रूप में उभरा है। नेटवर्क के रीजनल चैनल्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने संबंधित मार्केट्स में सफलतापूर्वक मजबूत ब्रैंड इक्विटी तैयार की है। साथ ही, वे हमारे नेटवर्क के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इसलिए, दक्षिण के बाजार में हमारी एंट्री एबीपी नेटवर्क के लिए मध्यम और दीर्घकालिक अवधि में स्थायी विकास सुनिश्चित करेगी।

एबीपी नाडु से उम्मीद है कि यह युवाओं से जुड़े मुद्दों पर जोर देगा, इस प्लेटफॉर्म पर कंटेंट की कवरेज को कैसे विस्तार देंगे? 

एबीपी नाडु राज्य के मजबूत, शिक्षित और प्रगतिशील युवाओं की कंटेंट की जरूरत को पूरा करेगा। ये वे लोग हैं जो 24x7 अपडेट रहने के इच्छुक हैं और हर एक मिनट में कंटेंट का उपभोग कर रहे हैं।

हम उन्हें सशक्त बनाना चाहते हैं। उन्हें खुद को व्यक्त करने के लिए एक मंच देना चाहते हैं, ताकि वे राज्य के विषय में महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस कर सकें और अपनी राय दे सकें। एबीपी नाडु सभी तरह के यूजर्स को उनकी पसंद का कंटेंट उपलब्ध कराएगा, जिसमें तमिलनाडु से जुड़े ज्वलंत मुद्दे भी शामिल होंगे। इस प्लेटफॉर्म पर डिबेट शो, राजनीतिक विश्लेषण, ब्रेकिंग न्यूज के साथ-साथ एंटरटेनमेंट, एजुकेशन, फाइनेंस, गेमिंग, टेक्नोलॉजी और ऑटो से जुड़ी विस्तृत कवरेज शामिल होगी।   

तमाम लोकप्रिय न्यूज नेटवर्क दक्षिण के मार्केट में पहले से हैं। आपको क्या लगता है कि एबीपी नाडु इस प्रतिस्पर्धी मार्केट में कैसे अपने जगह बना पाएगा?

तमिलनाडु की संस्कृति हमेशा से समृद्ध रही है और यह अपने लोगों में गर्व की भावना पैदा करती है। पूर्व में मुख्यधारा की मीडिया में इस सांस्कृतिक समृद्धि को अक्सर मंदिरों, स्मारकों, राजवंशों आदि से जोड़ा जाता था। हालांकि, वास्तव में तमिल संस्कृति एक विकास, एक पुनर्जागरण देख रही है जो एक नया आयाम ला रही है।

इसलिए, एबीपी नाडु, तमिल संस्कृति की गतिशीलता में इस बदलाव को रेखांकित करता है, जिसे 'न्यू तमिलियन' द्वारा आगे लाया गया है। मुझे विश्वास है कि यह ताजा कदम हमारी सभी पेशकश में सार्थक रूप से प्रतिबिंबित होगा और हमें तमिलनाडु के अत्यधिक प्रतिस्पर्धी बाजार में चमकने और खुद को अलग दिखाने में मददगार साबित होगा।

इसके अलावा, एबीपी नेटवर्क ने इस प्लेटफॉर्म पर काम करने के लिए इंडस्ट्री के प्रतिभाशाली युवाओं को अपने साथ जोड़ा है, वे सभी मिलकर तमिल युजर्स और न्यूज उपभोक्ताओं को उनकी पसंद का कंटेंट उपलब्ध कराएंगे।

क्या आपने इस मार्केट में सिर्फ डिजिटल की पेशकश की है? क्या निकट भविष्य में टीवी न्यूज चैनल शुरू करने की योजना है?

गूगल द्वारा जारी हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 90 प्रतिशत इंटरनेट यूजर्स अपनी स्थानीय भाषा में कंटेंट के इस्तेमाल को प्राथमिकता देते हैं। इसके अलावा, पिछले साल रोजाना इंटरनेट के इस्तेमाल में 42 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी। इसलिए, डिजिटिल कंटेंट का बिजनेस मातृभाषा में काफी आगे बढ़ रहा है और यह तमिलनाडु में ऑडियंस और एडवर्टाइजर्स के लिए काफी अच्छी बात है।

इसे ध्यान में रखते हुए, हम वर्तमान में तमिलनाडु में अपने डिजिटल फुटप्रिंट का विस्तार करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, क्योंकि बाजार में अपार वृद्धि की संभावना है। फिलहाल यह हमारी प्राथमिकता बनी हुई है। यदि भविष्य में हमारे पास किसी न्यूज चैनल को लेकर कोई योजना होगी, तो योजना परवान चढ़ने पर हम उसके बारे में जरूर बताएंगे।

डिजिटल की बात करें तो एबीपी अपने डिजिटल वेंचर्स को लेकर आर्थिक रूप से काफी सफल रहा है, इस बारे में आपका क्या लक्ष्य है? आपकी टॉपलाइन में डिजिटल रेवेन्यू की क्या भूमिका है?

पिछले वर्षों में डिजिटल के यूजर बेस में काफी ग्रोथ होने के साथ एबीपी नेटवर्क ने अपनी डिजिटल मौजूदगी को ज्यादा मजबूत किया है। यूट्यूब पर इसने चार बिलियन से ज्यादा व्यूज का आंकड़ा पार कर लिया है। ट्विटर पर इसके दस मिलियन से ज्यादा और फेसबुक पर करीब 21 मिलियन फॉलोअर्स हैं। एबीपी लाइव ऐप के दस मिलियन से ज्यादा डाउनलोड हो चुके हैं। जनवरी 2020 से जनवरी 2021 के लिए Comscore MMX के ‘Year On Year Review’ के अनुसार, हमारे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। 

इसलिए आगे बढ़ने के साथ-साथ हमारा लक्ष्य इस निरंतर बढ़ते माध्यम पर निर्विवाद रूप से नंबर वन बनने के लिए अपनी डिजिटल पेशकश की गुणवत्ता और विविधता को लगातार ऊपर उठाना है।

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अखबारों को अपनी कीमतों पर एक बार फिर गौर करना पड़ेगा: शशि शेखर

मीडिया के क्षेत्र में ‘हिन्दुस्तान’ के एडिटर-इन-चीफ शशि शेखर का काफी नाम है। समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में शशि शेखर ने अपने जीवन और कार्य से जुड़ी तमाम बातें साझा की हैं।

Last Modified:
Monday, 19 April, 2021
Shashi Shekhar

मीडिया के क्षेत्र में ‘हिन्दुस्तान’ के एडिटर-इन-चीफ शशि शेखर का काफी नाम है। समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में शशि शेखर ने अपने जीवन और कार्य से जुड़ी तमाम बातें साझा की हैं। इसके साथ ही उन्होंने आने वाले समय में प्रिंट मीडिया की चुनौती और अखबारों के भविष्य पर भी चर्चा की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए?

पिताजी बनारस में सरकारी अधिकारी थे, मैं वहीं पैदा हुआ। पिताजी का ट्रांसफर देवरिया होने के कारण मेरी स्कूलिंग वहां हुई, फिर पिताजी मिर्जापुर आ गए और वहां भी मेरी स्कूल की कुछ यादें हैं। इसके बाद इलाहबाद, आगरा और मैनपुरी भी शिक्षा अर्जित की। बाद में उन्होंने बीएचयू जॉइन किया तो मैंने वहीं से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व में एमए किया।

आपने भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व में एमए किया तो मीडिया में आपका कैसे आना हुआ?

जी बिल्कुल, मैंने इस बारे में सोचा नहीं था और हमारे घर में मीडिया को लेकर भी कोई अच्छी बात नहीं होती थी लेकिन मैं छोटी उम्र से ही लिखने लगा था। मेरे कुछ लेख नवभारत टाइम्स में भी प्रकाशित हुए और उसके बाद आज अखबार के प्रॉपराइटर श्री शार्दुल विक्रम गुप्त ने मेरे लेख पढ़कर सोचा कि ये कोई अनुभवी आदमी हैं, जो बनारस से लिख रहे हैं। उन्होंने हमारे संपादक राममनोहर पाठक जी से बात की तो उन्होंने बताया कि ये तो 20 साल का लड़का है और एमए में पढ़ता है। मैं उनसे मिलने गया और उन्होंने मुझसे कहा कि आप अखबार में काम कर लीजिए। उस समय मैंने मना कर दिया लेकिन नियति अपना काम करती है। इसके बाद उन्होंने वापस मुझे बुलाया और उसके बाद मैंने हां कर दी और आप देखिए कि अगले बीस साल तक मैं उस अखबार के लिए काम करता रहा।

समय कभी एक सा नहीं रहता है और बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो समय के साथ चले, आप अपने समय में और आज के समय में कितना अंतर पाते हैं?

आपने सही कहा कि समय कभी एक सा नहीं रहता है लेकिन मेरा यह मत है कि अगर आदमी ईमानदार और समझदार है और परख रखता है तो उसे कभी कोई कठिनाई नहीं होगी। जीवन में हंसी और गम तो एक चक्र में की तरह हैं और बाद में कहानियां बनती हैं लोगों की, लेकिन कहानियों में मेरा यकीं नहीं है। एक यात्रा है 40 वर्ष की जो मैं करता रहा और आज इस मुकाम तक आ गया हूं।

एक समय ऐसा था, जब नौकरी जरूरी लगती थी क्योंकि बच्चे छोटे थे लेकिन अब वो बड़े हो गए हैं और अपना काम करने लगे हैं तो अब लगता है कि किसी के काम आ सकूं, कुछ लोगों के जीवन में बदलाव ला सकूं। आज मेरे साथी कोरोना की वजह से बहुत तनाव में थे और मैंने उन्हें दफ्तर बुलाया और उनसे बात की। मुझे ऐसा लगा कि आज मैंने जीवन का एक सार्थक दिन जीया, जब मैंने किसी की पीड़ा और दुःख को अनुभव किया और उसे दूर करने की कोशिश की। बस इससे अधिक मैं कुछ नहीं सोचता।

वहीं, मैं तब और आज के माहौल में कोई अंतर नहीं पाता, बस तकनीक बदल जाती है। उस समय के प्रिंट मीडिया में और आज के प्रिंट मीडिया में तकनीक का बड़ा अंतर आ गया है लेकिन अखबार के डिजाइन में बैलेंस होना चाहिए, अगर उसको जरा भी इधर-उधर करोगे तो बैलगाड़ी की भांति वो उल्टी टंग जाएगी। आज हम दुनिया के सबसे बड़े डिजाइनर के साथ बैठकर अखबार को रीडिजाइन कर रहे हैं। इससे पहले भी आज से 11 साल पहले मैंने अखबार को डिजाइन करवाया था। गुण और ज्ञान किसी डिग्री से नहीं आते हैं।

पत्रकारिता का मूल तत्व है सच बोलना, आज कौन कह रहा है कि उसमे घालमेल करो?, दरअसल पत्रकार बदल गए हैं। पत्रकारिता वही है और कुछ खास लोगों के बदल जाने से एक अजीब सी मंडी हो गई है। हर आदमी चिल्ला रहा है।

पिछले कुछ सालों से प्रिंट मीडिया के सामने डिजिटल से चुनौती उभरकर आ रही है। इस दिशा में आपका अखबार क्या काम कर रहा है?

साल 1995 की मैं आपको बात बताता हूं, जब फटाफट न्यूज चैनल्स का दौर नहीं था और उस समय मोबाइल भी उतने प्रचलन में नहीं थे। उस समय एक बहुत बड़े व्यक्ति ने मुझसे कहा कि शशि जी, आप खुद को अखबार से अलग कर लीजिए, आने वाले समय में इसका कोई भविष्य नहीं है। उन्होंने पर्यावरण का तर्क देते हुए मुझसे ये बात कही थी। उसके बाद साल 2000 आया और मेरे पास एक 24 घंटे के न्यूज चैनल का ऑफर था।

मैंने वहां काम करना शुरू किया और वहां भी यही सोच थी कि अखबार खत्म हो जाएंगे लेकिन उसके ठीक डेढ़ साल बाद ही मैं एक अखबार में काम करने चला गया और वो भी आधी सैलरी पर, क्योंकि जैसी पत्रकारिता में करना चाह रहा था वो मैं कर नहीं पा रहा था। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि टीवी में ये काम ठीक से नहीं किया जाता है। वो अखबार आठवें नंबर पर था और उसके मालिक भी मुझसे यही कहते थे की अखबार का कोई भरोसा नहीं है भविष्य नहीं है।

हमने कोशिश की और वो देश के तीसरे नंबर का अखबार बन गया। फिर मैं इस अखबार में आया और मुझे बहुत बढ़िया टीम मिली और इतना समय बीत जाने के बाद भी अखबार है। हां, समय बदलता है। मैं कश्मीर में था और वहां मैंने किसी के हाथ में अखबार नहीं देखा। डिजिटल माध्यम बढ़ रहा है। आने वाले समय में विज्ञापन का माध्यम भी बदल जाएगा। अखबारों की मृत्यु मीडियम की मृत्यु नहीं होगी बल्कि सिस्टम की मृत्यु होगी। तकनीक के परिवर्तन के साथ मीडियम बदल जाएगा लेकिन मीडिया वही रहेगा।

तेजी से बढ़ते डिजिटल मीडिया में फेक न्यूज एक बहुत बड़ी समस्या है, इस पर आपके क्या विचार हैं?

इस देश में नारेबाज बहुत हो गए हैं और उनका यह धंधा बन गया है। पत्रकारिता में उन्होंने कोई काम किया है या नहीं इसका उन्हें कोई ज्ञान नहीं है लेकिन दूसरों के बारे में उन्हें बहुत ज्ञान है। अगर फेक न्यूज है तो ऐसे में सही न्यूज बोलने वाले की कद्र बढ़ती है। बाजार का दस्तूर है कि असली सिक्कों की आड़ में खोटे सिक्के चल जाते हैं। अगर सिर्फ खोटे सिक्के चलेंगे तो बाजार बंद हो जाएगा। आज जो योग्य है, उसके लिए काम की कोई कमी नहीं रह गई है, कमी उन लोगों के लिए है जिन्होंने अपनी कोई पहचान नहीं बनाई है।

कुछ सालों में मीडिया में निगेटिव चीजे हुई हैं, गोदी मीडिया जैसी शब्दावली इस्तेमाल की जा रही है, इस पर आपके क्या विचार हैं?

मेरा मानना है कि ये यात्रा है और यात्रा में इससे भी पहले कठिन समय आया है। यात्रा में कई मोड़ आते हैं और अगर किसी को तकलीफ है तो उसे हक है अपनी तकलीफ बयान करने का, कुछ लोगों का तो काम ही है तकलीफ को बोलना जैसा कि मैं आपसे पहले कह चुका हूं। मेरा ये मत है कि इस यात्रा में ये जो पड़ाव है वो भी गुजर जाएगा और जिस तरह कोरोना के बाद लोगों ने अपने जीने का रास्ता ढूंढा और अपने जीवन में बदलाव किए, ठीक उसी तरह से मीडिया भी अपना रास्ता बना लेगा।

हमने कोरोना का एक भयावह दौर देखा और उसके बाद प्रिंट मीडिया में चीजें किस तरह से बदली हैं?

कोरोना का प्रिंट मीडिया पर बड़ा असर हुआ और कई साथियों को उसकी वजह से तकलीफ भी उठानी पड़ी। लेकिन आज के समय की बात करें तो अखबारों का वो बुरा दौर बीत गया है। विज्ञापन भी वापस आ रहे है। लेकिन ये बुरे दिन वापस भी आ सकते हैं इसलिए उनको अपनी कीमतों पर एक बार फिर गौर करना पड़ेगा। रीडर से सीधे संवाद करना होगा और उसे यह समझाना होगा कि हम क्यों अखबार की कीमत बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा डिजिटल कंटेंट जो फ्री है उससे भी बड़ी परेशानी है।

ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने न्यूज पब्लिशर्स के हक में जो निर्णय लिया है क्या ऐसा कार्य भारत सरकार को भी करना चाहिए?

बिल्कुल करना चाहिए। अगर आज कोई इतना समय लगा रहा है और वही कंटेंट कोई अगर फ्री उठाकर डाल दे तो ये गलत है। उसके बाद फेक न्यूज वाले अपने हिसाब से उसे गलत तरीके से वायरल अगर कर दें तो नुकसान है। इसलिए गूगल को भारत में भी कंटेंट पब्लिशर्स को पैसे देने चाहिए। 

आपने मीडिया में एक लंबा सफर तय किया है और कई बड़े इंटरव्यू भी किए है। कोई ऐसा किस्सा जो आपको आज भी याद आता है?

श्रीमती इंदिरा गांधी अचानक से इलाहबाद में 1983 में आईं और उस वक्त मैं रिपोर्टर था। उस समय सिर्फ 4 या 5 रिपोर्टर ही होते थे। मुझे पता चला कि वो प्रोग्राम अचानक से ही बन गया था और किसी को खबर नहीं थी। उस समय पीएम इंदिरा के साथ सिर्फ दो ही लोग थे। गेट पर पुलिस वालों ने हमको रोक दिया। हम कुछ चार पांच थे और हमने कहा कि अरे मिश्रा जी, जरा इंदिरा जी से मिलवाइए। बाद में वो अंदर चले गए और हम सब बाहर खड़े रहे। कुछ देर बाद इंदिरा जी बाहर निकलीं और गाड़ी में बैठने लगी। लेकिन हमारी ओर उन्होंने देखा और इशारे से हमको बुलाया। मैं सबसे आगे था और मैंने चार सवाल सोचे हुए थे जो उनसे पूछे। उसके बाद उन्होंने मेरी ओर देखकर कहा कि तुम ब्यूरो चीफ हो? अच्छा, दिखने में तो  कॉलेज के लगते हो, क्या उम्र है? उसके बाद मैंने जवाब दिया कि 23 साल। उन्होंने फिर मुझसे कहा कि अरे 23 साल की उम्र में ब्यूरो चीफ! अच्छा बताओ तुमने पंडित जी की किताबें पढ़ी हैं? मैंने कहा कि जी, मैंने पढ़ी हैं। उन्होंने फिर मुझसे कहा कि ये मैं तुमसे इसलिए नहीं कह रही कि वो मेरे पिता थे बल्कि इसलिए कह रही हूं क्योंकि वह पत्रकार थे। उसके बाद मुझसे कहा कि खूब पढ़ा लिखा करो और मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझसे कहा कि थोड़ा कसरत किया करो, बहुत पतले हो। मैं उस स्तर का पत्रकार नहीं था और सिर्फ दिल्ली वाले उनसे मिलते थे, लेकिन ये मेरा अनुभव यादगार है।

इस पूरी बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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ABP के साथ मेरी कभी न खत्म होने वाली यादें हैं: दीपांकर दास पुरकायस्थ

एबीपी के पूर्व सीईओ और एमडी ने नेटवर्क के साथ अपनी लंबी पारी और भविष्य की योजनाओं समेत कई मुद्दों पर रखी अपनी बात

Last Modified:
Thursday, 25 March, 2021
Dipankar Das Purkayastha

‘एबीपी प्राइवेट लिमिटेड’ (ABP Pvt Ltd)  में अपनी चार दशक से ज्यादा पुरानी पारी को विराम देते हुए दीपांकर दास पुरकायस्थ (Dipankar Das Purkayastha) ने हाल ही में सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर के पद से इस्तीफा देने का फैसला लिया है। इस नेटवर्क में अपनी इतनी लंबी पारी, पुरानी यादों और भविष्य की योजनाओं को लेकर डीडी पुरकायस्थ ने ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

: एबीपी नेटवर्क के साथ आप चार दशक से ज्यादा समय से जुड़े रहे हैं। इतनी लंबी पारी की अपनी कुछ बेहतरीन यादों के बारे में कुछ बताएं? 

एबीपी के साथ मेरी कभी न खत्म होने वाली यादें हैं। चार दशक पुरानी बात करें तो पूर्व में हमारे पास तकनीकी कम थी। ज्यादातर लोगों का झुकाव अखबार पढ़ने पर था। विज्ञापनों को लेकर ज्यादा स्थिरता नहीं थी और टेलिविजन बहुत ज्यादा आम नहीं था। समय गुजरने के साथ सभी चीजें बदल गईं। प्रतिस्पर्धा बढ़ गई, मीडिया के तमाम माध्यम विकसित हो गए, डिजिटल और मोबाइल टेक्नोलॉजी की शुरुआत हो गई और मैंने इन चार दशकों में अपने सामने इन सब परिवर्तनों को होते हुए देखा है। इस दौरान कंपनी एक छोटे क्षेत्रीय समाचार पत्र से बड़े राष्ट्रीय समूह में विकसित हुई है और टेलिविजन, मैगजींस, न्यूजपेपर्स और डिजिटल क्षेत्र में बहुत मजबूती से अपनी जगह बनाई है। मैं खुश हूं कि मेरे इस्तीफे के समय तक एबीपी देश का एक प्रमुख न्यूज मीडिया ग्रुप बन चुका है।

: बीस-तीस साल पहले राजनीतिक घटनाक्रमों की कवरेज बिल्कुल अलग तरीके से होती थी। आपकी नजर में इस दिशा में क्या बदलाव आया है?

लोग अब सभी चीजें जल्दी से जल्दी जान लेना चाहते हैं। मीडिया का काम समाज में घट रही अच्छी-बुरी घटनाओं को सामने लाना है, लेकिन लोग अच्छे पक्ष को देखना चाहते हैं। इन हालातों में सही तथ्यों को सामने रखना काफी दुविधाजनक होता है। लेकिन एबीपी ने हमेशा से एक साहसिक दृष्टिकोण अपनाया है और समाज के लिए जो सही है, वही पब्लिश करता है।

: जब आप पीछे मुड़कर देखते हैं कि कैसे एबीपी न्यूज नेटवर्क अब एबीपी ब्रैंड बन गया है, तो आपको कैसा लगता है?

एबीपी न्यूज को पहले स्टार न्यूज के नाम से जाना जाता था। इससे पहले कि हम इसे पूरी तरह से खरीद लें, यह सीखने का एक अच्छा अनुभव रहा। स्टार न्यूज रातों रात एबीपी न्यूज बन गया, लेकिन इसके लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया गया, क्योंकि लोगों के दिमाग में किसी की छवि को बदलना इतना आसान नहीं है और बहुत लंबे समय तक इसे स्टार न्यूज कहा जाता था। स्टार ग्रुप से सीखी गईं तकनीकी की बारीकियां और कंटेंट को लेकर एबीपी की तैयारियां ही इसे खास बनाती हैं। यह सहयोग सफल रहा। शुरू से ही हमारा दृष्टिकोण स्पष्ट रहा है कि हम एक प्रमुख स्थान चाहते थे। हम जानते थे कि हमें क्या ब्रॉडकास्ट करना है। हम अपने रीडर्स और व्युअर्स को गंभीर न्यूज और गंभीर पत्रकारिता देना चाहते थे। एबीपी न्यूज ने बंगाली भाषा में अपना चैनल शुरू किया, जो काफी सफल रहा। इसके बाद मराठी और गुजराती भाषा में चैनल शुरू किए गए। महाराष्ट्र में एबीपी माझा नंबर वन न्यूज चैनल बन गया। इसके बाद उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड पर आधारित हिंदी न्यूज चैनल ‘एबीपी गंगा’ (ABP Ganga) की शुरुआत की गई। इसे अभी एक साल ही हुआ है। एबीपी पूरे देश का नंबर वन रीजनल न्यूज मीडिया बनना चाहता है। हम पूरे देश में अपनी मौजूदगी की तैयारी कर रहे हैं और जल्द ही दक्षिणी क्षेत्रों में अपने कदम बढ़ाएंगे और देश का नंबर वन न्यूजपेपर प्लेयर बनने का प्रयास करेंगे।

: निजी और प्रोफेशनल तौर पर पिछले 12 महीने आपके लिए कैसे रहे हैं। चुनौतियों का सामना करने और भविष्य की तैयारी के लिए एबीपी ने क्या किया?

पिछले 12 महीनों की बात करें तो यह काफी अनिश्चितता भरा दौर रहा। हर कोई भोजन और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति को लेकर पूरी तरह निश्चित नहीं था। अखबारों का डिस्ट्रीब्यूशन जीरो हो गया था, विज्ञापन बंद हो गए थे और एक मीडिया कंपनी के रूप में हमारे लिए काफी मुश्किल हो गई। इन चुनौतियों से निपटने और स्ट्रैटेजी के निर्माण के लिए हमने लोगों की एक टीम बनाई। सीमित रेवेन्यू के कारण कंपनी सभी को भुगतान करने में सक्षम नहीं थी, इसलिए छंटनी की गई। लागत को कम करना पड़ा। कुछ बड़े मीडिया संस्थानों ने मुझे फोन कर सुझाव दिया कि रेवेन्यू गिरने के कारण न्यूजपेपर्स की प्रिंटिंग बंद कर देनी चाहिए, लेकिन मैंने इससे यह कहते हुए इनकार कर दिया कि इससे लोग हमें पूरी तरह भूल सकते हैं। 

इससे बाद एक जागरूकता कैंपेन शुरू किया गया कि अखबार सुरक्षित हैं और इससे कोरोना का संक्रमण फैलने का खतरा नहीं है, क्यों प्रॉडक्शन के सभी स्तरों पर तमाम जरूरी सावधानियां बरती जा रही हैं। धीरे-धीरे सेल्स और रेवेन्यू में सुधार आना शुरू हुआ। विज्ञापन रेवेन्यू बढ़ गया। मुझे खुशी है कि मैं ऐसे समय पर इस्तीफा दे रहा हूं और मैंने कंपनी की ग्रोथ में खासकर इस मुश्किल समय में बहुत योगदान दिया है।

: अवीक सरकार और अरुप सरकार के साथ काम करने का आपका कैसा अनुभव रहा है और उनके पेशेवर दृष्टिकोण क्या हैं? 

दोनों बिल्कुल अलग हैं। कई मायनों में वे एक-दूसरे के पूरक हैं, लेकिन व्यक्तित्व में वे थोड़े अलग हैं। अवीक सरकार बहिर्मुखी हैं और लोगों से मिलना-जुलना पसंद करते हैं, दूसरी ओर अरुप सरकार थोड़े अंतर्मुखी हैं, लेकिन दोनों ही बहुत बौद्धिक हैं और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं। वे एम्प्लॉयीज को काम करने की पूरी आजादी देते हैं। उनके साथ काफी अच्छा सफर रहा है।

: अतिदेब सरकार एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर के रूप में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं। कंपनी के भीतर से लीडर्स तैयार करने के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

संस्थान में काफी सक्षम व्यक्ति हैं और एबीपी उन्हें अपने कौशल का प्रदर्शन करने का अवसर देने में विश्वास करता है। अतिदेब को सीईओ के पद पर प्रमोट किया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया क्योंकि परिवार के सदस्य को उस भूमिका में नहीं आना चाहिए। चुने हुए सीईओ अतिदेब को रिपोर्ट करेंगे, जो सभी कार्यों की देखरेख करेंगे क्योंकि वह खुद एक बहुत ही सक्षम पत्रकार हैं। परिवार एक शेयरधारक के रूप में मौजूद हो सकता है लेकिन सीईओ को एक स्वतंत्र व्यक्ति होना चाहिए, जिसका परिवार के साथ कोई सीधा संबंध नहीं हो।

: ऑस्ट्रेलिया में, हाल ही में लिए गए एक फैसले से वहां सोशल मीडिया दिग्गज अब न्यूज दिखाने के बदले अखबारों को भुगतान करेंगे और यदि भारत में भी ऐसा कुछ होता है तो यह अखबार मालिकों को कैसे प्रभावित करेगा?

ऑस्ट्रेलिया में इसे कानूनी मान्यता दे दी गई है और मेरा मानना है कि अन्य देशों की मीडिया इंडस्ट्री में भी इसके दूरगामी प्रभाव देखने को मिलेंगे और उम्मीद है कि भारत और ब्राजील भी इसे फॉलो करेंगे। गूगल और फेसबुक भी इस आर्थिक कदम को नजरंदाज नहीं करेंगे। गूगल ने गूगल शोकेस बनाया है, जो अखबार कंपनियों को प्रति वर्ष एकमुश्त राशि का भुगतान करता है। इस तरह के फैसले से प्रकाशकों को उनकी मेहनत का उचित हिस्सा मिलेगा, जो अभी तक उन्हें नहीं मिलता है।

: एक कंटेंट कंपनी के तौर पर एबीपी ने डिजिटल बेस का विस्तार देखा है। लिहाजा यह अपने डिजिटल फुटप्रिंट पर कैसे काम कर रहा है और इसमें क्या सफलताएं मिल रही हैं?

डिजिटल भविष्य है और विशेष रूप से महामारी के बाद तो चीजें काफी बदल गई हैं। एबीपी में हमारी दो डिवीजन (divisions) हैं, पहली एबीपी लाइव (ABP Live) है, जो वास्तव में बहुत अच्छा कर रही है। दूसरी- एबीपी डिजिटल (ABP Digital), जो आने वाली कई थीम्स के साथ बेहतर कर रही है। टेक्नोलॉजी एक बेहतरीन सुविधा (facilitator) है और इसे समय के साथ हमें स्वीकार करना है, क्योंकि आने वाला समय इसी का है।

: आपको क्या लगता है कि भारतीय मीडिया मालिकों और अखबार मालिकों को प्रासंगिक बने रहने के लिए क्या करना चाहिए?

विश्वसनीयता से कभी समझौता नहीं किया जाना चाहिए। संपादकीय (एडिटोरियल) वास्तविक ताकत है और सही लोगों के लिए गेम-चेंजर है। इसके अलावा, हजारों सालों की तरह यह नई पीढ़ी भी और अधिक जानना चाहती है। सोशल मीडिया के भंवर में बहुत सारे ऐसे तथ्य हैं, जिनकी सच्चाई छिप जाती है। ऐसे कई ब्रैंड से जुड़े अखबार हैं, जो विश्वसनीय जानकारी प्रकाशित करने की हिम्मत रखते हैं। प्रासंगिक और व्यक्तिगत अनुभव केवल डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से ही संभव है। डिजिटल और प्रिंट मीडिया एक दूसरे के पूरक हैं और मुझे लगता है कि इन्हे अलग से नहीं देखा जाना चाहिए। प्रासंगिक रहने के लिए, नए विषयों (themes) के साथ आना जरूरी है। न्यूयॉर्क टाइम्स (New York Times) ने अपने एक पत्रकार को पर्वतारोहियों के साथ रहने के लिए भेजा, जिसे माउंट एवरेस्ट पर चढ़ना पड़ा, ताकि वह उनकी दैनिक दिनचर्या और चोटी पर चढ़ने वाले प्रेरक कारकों के बारे में उनके विचार जान सके। इस खबर ने कई लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि भारत के मीडिया घरानों को भी इसी तरह की परिपाटी को अपनाना चाहिए।

: इतनी दूर आने के बाद, क्या आपको अभी भी लगता है कि कुछ ऐसे काम बाकी रह गए हों, जिन्हें आप पूरा करना चाहते हैं?

बिल्कुल, दुनियाभर में यात्रा करना मेरी तीव्र इच्छा है। महामारी के दौरान, मैंने स्पैनिश सीखी और वेलेंसिया विश्वविद्यालय (University of Valencia) से सीखने के कई लेवल्स को पूरा किया। मैं अब हल्की-फुल्की स्पैनिश बोल सकता हूं और इसे समझ भी सकता हूं। लैटिन अमेरिका की यात्रा करना मेरी दिली इच्छा है और अगले दो सालों में जब सब चीजें थोड़ी सामान्य हो जाएंगी, तो मैं बहुत सी यात्राएं करना चाहूंगा। मैं अलग-अलग व्यंजनों का लुत्फ उठाना चाहता हूं। मैं निकट भविष्य में एक किताब भी लिखना पसंद करूंगा।

इंटरव्यू का पूरा वीडियो फॉर्मेट यहां देखें:

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मीडिया पॉलिसी को लेकर उठे विवाद में बेवजह उछाला जा रहा है मेरा नाम: आलोक मेहता

समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष आलोक मेहता (पदमश्री) ने तमाम मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी।

Last Modified:
Friday, 12 March, 2021
Alok Mehta

डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के लिए केंद्र सरकार ने पिछले दिनों कुछ गाइडलाइंस जारी की हैं। मीडिया के एक वर्ग द्वारा इन गाइडलाइंस को मीडिया को नियंत्रित करने वाला कहकर इनकी आलोचना की जा रही है। कहा जा रहा है कि डिजिटल मीडिया पर सरकार की ताजा गाइडलाइंस आने से बहुत पहले ही मंत्रियों का समूह इस पर लगातार काम कर रहा था और इस पर रिपोर्ट तैयार की गई थी। इस रिपोर्ट्स को ही धीरे-धीरे लागू किया जा रहा है। जिन मंत्रियों के समूह के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है, उनमें पांच कैबिनेट मंत्री थे और चार राज्य मंत्री।

मीडिया जगत में इस रिपोर्ट को लेकर भी चर्चा छिड़ी हुई है। इस रिपोर्ट के बारे में कुछ मीडिया प्रतिष्ठानों का कहना है कि मंत्रियों व तमाम पत्रकारों की भी कुछ मीटिंग हुई थी। ऐसी एक मीटिंग में सरकार के पक्ष में या सकारात्मक खबरें प्रोत्साहित करने के लिए और छवि खराब करने वाली खबरों को रोकने के लिए हुई चर्चा के आधार पर  रणनीति तैयार की गई। समाचार4मीडिया के साथ एक बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष आलोक मेहता (पदमश्री) ने इस पूरे मुद्दे पर खुलकर अपनी राय रखी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश

आपको क्यों लगता है कि इस मीटिंग को गलत तरीके से पेश किया गया?

देखिए, भारत सरकार की एक रिपोर्ट सामने आई है, जो अखबारों में है और वेबसाइट्स पर भी उपलब्ध है। अब यह सरकार ने डाला है यह नहीं कहा जा सकता, लेकिन इसे पहले कारवां मैगजीन ने छापा। कारवां में जब यह रिपोर्ट जारी हुई, तभी मेरे संज्ञान में आया तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि उसमें मेरा नाम पहले है। कई पत्रकारों और मित्रों ने भी मुझसे पूछा तो मैंने कहा कि ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) एक सही फोरम है, जहां मैं अपनी बात रख सकता हूं। देखिए, जिस समय यह हुआ उसकी तारीख 26 जून 2020 है और उस समय चीन और पैंगोंग झील वाला मुद्दा बहुत गरमाया हुआ था। युद्ध जैसी  स्थिति भी थी। वैसे यहां बता दूं कि यह परंपरा रही है कि विदेश मंत्री, विदेश सचिव या सरकार के मंत्री यहां तक कि ज्यादा आवश्यक हो तो प्रधानमंत्री की ओर से भी ऐसे संवाद के लिए संपादकों या वरिष्ठ पत्रकारों को बुलाया जाता था। इनमें से कई मीटिंग्स प्रधानमंत्रियों और विदेश मंत्रियों की ओर से होती थी, जो एक जानकारी के लिए होती थीं कि भारत के हित में क्या हो सकता है?

मुझे मुख्तार अब्बास नकवी जी का फोन आया। पहले उन्होंने मुझसे मेरा हालचाल पूछा, क्योंकि कोरोना पीरियड भी था। फिर उन्होंने मुझे मिलने के लिए बुलाते हुए कहा कि आइए, आप भी होंगे... विदेश मंत्री एस जयशंकर जी रहेंगे, किरण रिजिजू जी रहेंगे, शायद प्रकाश जावड़ेकर जी भी होंगे... या तीन चार लोग रहेंगे... तो आप आइए... लेकिन मेरे यहां नहीं, इस बार किरण रिजिजू जी के यहां आपको आना है। मैंने कहा, ठीक है इसके बाद में मैंने उनका पता देखा और मैं चला गया। फिर वहां बातचीत शुरू हुई, जहां पर एक-दो संपादक थे और कुछ ऐसे लोग थे, जिन्हें हम वरिष्ठ मानते हैं और उनकी अखबारों में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ, तो उन्होंने कहा कि एस जयशंकर जी कहीं फंस गए हैं। उनको प्रधानमंत्री जी ने कुछ जरूरी मीटिंग के लिए बुलाया है, तो वे वहां चले गए हैं। इसके बाद मुझे लगा कि कोई और मंत्री भी आएगा, लेकिन कोई नहीं आया, सिर्फ दो ही मंत्री वहां थे, किरण रिजिजू जी और मुख्तार अब्बास नकवी जी।

हमारा यह अनुभव था कि विदेश मंत्री नटवर सिंह रहे या प्रणव मुखर्जी अथवा जसवंत सिंह या विदेश सचिव श्याम शरण, शशांक, शिवशंकर जो एडिटर्स  और वरिष्ठ डिप्लोमेटिक सीनियर जर्नलिस्ट्स को साउथ ब्लॉक ऑफिस में बुलाया करते थे या फिर कहीं और मिलने के लिए बुला लिया करते थे। इसलिए हम यह मानकर चल रहे थे कि ऐसी कोई ब्रीफिंग है, जिसे हमें रिकॉर्ड नहीं करना है।

किरण रिजिजू जी अरुणाचल के हैं और अरुणाचल को मैं  दुनिया का एक सुन्दर और महत्वपूर्ण  क्षेत्र मानता हूं। हिमालय की दृष्टि से भी और वहां के लोगों के बारे में भी, क्योंकि मैं वहां जा चुका हूं। किरण रिजिजू जी को भी मैं एक अच्छा नेता मानता हूं, लेकिन उनसे मेरा परिचय तो है, पर व्यक्तिगत संबंध इतने नहीं हैं। मुख्तार अब्बास जी से मेरा थोड़ा पुराना परिचय है। मुझे यही प्रलोभन था, वरना मैं कोरोना पीरियड में थोड़ा डर से कहीं भी जाने से बचता रहा हूं। लेकिन गया तो पहले तो अनौपचारिक बात होती रही कि कैसा है, क्या है? मेरा भी था कि इस बीच कम्युनिकेशन भी बहुत कम हो गया है और कोई जानकारी भी नहीं मिल पाती... बशर्ते इसलिए गया। अच्छा वहां ऐसे भी लोग थे, जिन्हें रेगुलर रिपोर्टिंग करनी है, इनमें टीवी के लोग भी थे और कुछ और थे। जयंत  घोषाल जी थे, जिन्हें मैं काफी पहले से जानता हूं। वे आनंद बाजार में रहे हैं। वे हाल में ममता बनर्जी के विशेष  सलाहकार भी रह चुके हैं। वहां प्रफुल्ल केतकर जी भी थे, जो संघ पत्रिका ऑर्गेनाइजर के संपादक हैं। इसके अलावा कुछ ऐसे पत्रकार अलग-अलग भाषा व एजेंसी से थे। हालांकि वहां यह बात की गई, जिसे शिकायतें भी कह सकते हैं कि कवरेज में किस तरह की कठिनाइयां आती हैं। सरकार की ओर से जो कम्युनिकेशन गैप है, उस बात को भी रखा गया। इसके बाद किरण रिजिजू जी ने अरुणाचल प्रदेश को लेकर बातें भी की। लेकिन इन सबके बीच मेरी रुचि चीन के विषय पर सबसे ज्यादा थी, पर इस पर ज्यादा बात नहीं हुई। हालांकि वहां जो संवाददाता थे, उन्हें भी लगा कि ये ऑफ द रिकॉर्ड है और यहां कोई बाइट देने वाले नहीं है, लेकिन बाहर निकलने के बाद शायद रिजिजू जी ने किसी टीवी चैनल को कोई एक-आध बाइट दी थी, लेकिन मुझे नहीं मालूम कि वह किस चैनल से थे।

पिछले साल जून की थी ये बैठक और अब मार्च चल रहा है। अब एक रिपोर्ट आती है जिसमें कहा जाता है कि जिस मीटिंग में आप थे, उसको आधार बनाया गया है। इस रिपोर्ट में पहला नाम मेरा लिखा गया है कि जो मेरे लिए बहुत ही ज्यादा शॉकिंग है। मतलब वो रिपोर्ट, जिसमें मुझे ये तक बताया नहीं गया कि ऐसा कोई कम्युनिकेशन, जो सरकार की पॉलिसी पर बात करने के लिए है, या किस उद्देश्य के लिए बुलाया गया है। मुझे तो बस यही बताया गया था कि आपसे मिलना है। यदि सरकार की ओर से इसे रिकॉर्ड भी किया गया है, तो उसमें देखा जा सकता है कि मैंने तो वहां सलाह देने के बजाय बस शिकायत ही की है वह भी सरकार के कम्युनिकेशन गैप की। और यदि ऐसा कहा तो यह बात तो वैसे ही सरकार के हित में ही होगी, क्योंकि कम्युनिकेशन गैप से नुकसान तो सरकार को ही हो रहा है, मेरा नहीं।

हालांकि इस तरह की बातों को रिपोर्ट किया गया है कि ये मीटिंग सलाह के लिए की गई थी। यह रिपोर्ट 97 पेजों की है, जिसे पूरा तो मैंने भी अभी तक नहीं पढ़ा है, लेकिन जितना पढ़ा है कि उसमें कई और लोगों के नाम भी दिए गए है, जो दूसरे नेता-मंत्री मिले हैं उन्होंने क्या बोला वो सब दिया गया है, लेकिन सिवाय मेरी बात के... क्योंकि शायद उन्हें लगा होगा कि मेरे विचार कमजोर हैं और उसका कोई मतलब नहीं है। इसमें कुछ ऐसे नाम दिए गए हैं, जो मुझसे करीब बीस साल बाद आए होंगे, जो एडिटर्स भी नहीं है, शायद वे किसी और क्षेत्र के हो सकते हैं। उन्होंने क्या बोला, इस रिपोर्ट में उनकी राय दी गई है। लेकिन मैंने क्या अच्छा या बुरा बोला, वो नहीं है।

रिपोर्ट में किरण रिजिजू जी के यहां जो 26 जून 2020 को पहली मीटिंग का जिक्र किया गया है, जिसमें कहा गया है कि लगभग 75 प्रतिशत मीडियाकर्मी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व से प्रभावित हैं और बीजेपी के साथ वैचारिक रूप से जुड़े हुए हैं। अब इस रिपोर्ट में वे 75 प्रतिशत वे किसे मानते हैं, ये मैं नहीं जानता। मैं अच्छा-खराब जैसा भी हूं, लेकिन  अब तक किसी पार्टी से जुड़ा हुआ नहीं हूँ |  इसलिए रिपोर्ट में वे ये तो मानते ही हैं कि वहां 25 प्रतिशत लोग उनकी राय से अलग थे। मंत्रिमंडल समूह की रिपोर्ट में  कुछ अन्य बैठकों में शामिल सम्पादकों या पत्रकारों के नाम के साथ उनके विचार या सुझाव लिखे गए हैं | जबकि रिज्जूजी के निवास पर हुई चर्चा में किसने क्या कहा , लिखा ही नहीं गया | मतलब साफ़ है कि वह बातचीत मीडिया नीति के लिए नहीं थी |

हां, इस बात को मैं कहता हूं कि मेरे सत्ताधारी या विपक्ष के कई नेताओं  मंत्रियों से पहले भी अच्छे संबंध थे और आज भी हैं। संबंध अच्छे हो सकते हैं। मानवीय ढंग से संबंध तो मेरे बीजेपी में भी हैं, कांग्रेस में भी हैं, और जनता दल , समाजवादी पार्टी जैसे अन्य दलों से रहे हैं  है। वह अलग बात है, लेकिन यह प्रचार पूरी तरह गलत है कि मंत्रिमंडल समूह ने मुझसे नीति निर्धारण के लिए किसी औपचारिक सरकारी बैठक में कोई सलाह ली |  मैंने अपनी आपत्ति ‘कारवां’ मैगजीन, जिसने सबसे पहले ये रिपोर्ट प्रकाशित की, उनके एडिटर अनंत नाथ जी को भी दर्ज कराई कि मेरा नाम प्रकाशित करने  से पहले मुझसे पूछा जाना चाहिए था |  तो उन्होंने कहा कि शायद मेरे रिपोर्टर ने आपसे बात की होगी। तब मैंने उनसे कहा कि  नहीं मुझसे किसी ने बात नहीं की , आप मुझसे सीधे पूछते कि क्या आप इस सलाह वाली मीटिंग में गए थे, तो मैं साफ-साफ आपको बता देता कि मुझसे कोई सलाह नहीं ली गई, लेकिन मैं मीटिंग में गया था।  आप सबकी सलाह से कोई कम्युनिकेशन पॉलिसी बनने वाली है, इसलिए राय ली जा रही है ऐसा कुछ नहीं बताया गया था। हां, और लोगों को बताई गई तो मुझे पता नहीं | इंडियन एक्सप्रेस के वरिष्ठ पत्रकार रवीश तिवारी जी ने भी अपनी रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट लिखी छापी है |

आखिर सरकार की चिंता क्या हो सकती  है और इन बैठकों और रिपोर्ट का क्या उद्देश्य हो सकता है ?

इस बात पर सरकार में चिंता होना स्वाभाविक है। हर सरकार में ये होता है कि मीडिया हमारा विरोध करता है, मीडिया हमारी आलोचना करता है। यहां, इमरजेंसी की ही बात नहीं कह रहा हूं, इमरजेंसी से पहले भी सरकार चिंतित रहती थी। इंदिरा गांधी के समय में भी यह था कि मीडिया क्यों नाराज है, क्यों खिलाफ आ रहा है, क्या कारण हैं? पहले भी कुछ ऐसे संपादक होते थे, जो सरकार के अनुकूल रहते थे। कभी कोई पत्रकार रहा, कभी कोई सलाहकार रहा, तो कुछ ऐसे भी रहे, जो राजनीति में चले गए। उनसे भी पूछा जाता था कि क्यों नाराज हैं मीडिया के लोग।

आज तो हर कोई अपना डिजिटल प्लेटफॉर्म खोल लेता है, सोशल मीडिया पर चैनल खोल लेता है, अखबार निकाल लेता है। हालांकि मुझे तो किसी ने नहीं बताया, लेकिन अब जो मैं समझ पा रहा हूं, उससे तो ये लगता है कि कुछ ऐसे लोगों ने राय दी होगी कि कोई ऐसी पॉलिसी बनाइए, जिससे जो गड़बड़ हो रहा है, अनियंत्रित हो रहा है उस पर कुछ विचार करना चाहिए। शायद इसलिए मंत्रियों को जिम्मेदारी दी गई होगी। हां, सरकार का आशय मैं मानता हूं कि ठीक होना चाहिए। सरकार उसको किस ढंग से रखती है, वो उसका अपना एक तरीका है। इसलिए शायद इस रिपोर्ट को लाया गया हो। रिपोर्ट में यही है कि ऐसा हो सकता है, ऐसा किया जाना चाहिए। यही बताया गया है।

कुछ मीडिया संस्थानों का कहना है कि यह मीटिंग सरकार की छवि को चमकाने के लिए की गई थी, इस बारे में आपका क्या कहना है?

देखिए, जो अलग-अलग मंत्रियों ने बात की, उस मीटिंग में भी उसका डायरेक्ट हवाला नहीं था। वो तो लोग पूछते हैं न कि सरकार की किन चीजों में आपको कमी दिखती है। कई और बातें भी आती है। कई बार नाराजगी वाली बातें भी आती हैं, जैसा कि अनौपचारिक बातचीत में होता है। मैंने चीन का उदाहरण दिया। हो सकता है कि इस सरकार में भी कुछ लोगों को बुलाते होंगे, लेकिन जैसा होना, चाहिए वैसा नहीं हो रहा है। लेकिन ये चमकाने वाली बात तो निगेटिव से ही आती है। जब निगेटिव बातें बताई जाएंगी, तभी तो सरकार जागेगी। मेरा आज भी ये कहना है कि मीडिया में 80-90 प्रतिशत लोग बहुत अच्छे ढंग से काम करते हैं। लेकिन जब 10-20 प्रतिशत गड़बड़ होता है, तो लोग उसे ही ज्यादा देखना पसंद करते हैं। लेकिन जो अच्छा काम कर रहे हैं, लोग उसे भी देखना चाहते हैं। पहले अखबारों में पार्लियामेंट के सवालों पर पूरा पेज छपता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। इसलिए सरकार की चिंता स्वाभाविक  है। उनके जो मंत्री होते हैं, उनकी ये जिम्मेदारी है कि वे जो अच्छा काम करें, वो बताएं। इसके लिए पारदर्शिता होना चाहिए |

इस पूरे मामले पर रिपोर्ट के आलोचकों को लेकर आप क्या कहना चाहते हैं? 

मैं नहीं जानता सरकार ने इस रिपोर्ट को जारी करके पब्लिक किया या नहीं किया। यदि किया तो ये भी अपने आप में एक गलती है कि सरकार ने सही ढंग से उसको पेश कर दिया होता, तो ये सवाल नहीं उठ रहा होता। इसलिए आलोचकों का आलोचना करना लाजिमी है। मेरा मानना हर सरकार छवि चमकाने क लिए या फिर बिगड़ी हुई छवि को सुधारने के लिए प्रयास करती है। सोचती है कि क्या करना चाहिए। मनमोहन सिंह जी भी करते थे। मेरे संबंध उनसे भी अच्छे थे और इससे पहले जो भी प्रधानमंत्री रहे हैं, उनसे भी अच्छे थे। मेरा ज्यादातर प्रधानंत्रियों से संपर्क रहा है, इसलिए मैं मानता हूं कि बुराई करने वाले लोग भी होते थे। सरकार को पहले भी ये चिंता होती थी कि उनकी आलोचना क्यों हो रही है? इसलिए इस सरकार ने यदि इसे जारी किया, तो इस पर आलोचना इसलिए हो रही है क्योंकि उसमें ऐसी सिफारिशों का उल्लेख है, जिसके कुछ नियम कानून ऐसे बता दिए गए, जिसे मैं भी उचित नहीं मानता और इसकी आलोचना भी करता हूं। सिफारिश  में  कहा गया कि पत्रकारों की तीन श्रेणी बांट दी जाएं। साथ ही यह भी कहा गया कि यह प्रक्रिया कलर कोडिंग के जरिए शुरू की जानी चाहिए। हरा: फेंस सिटर (जो किसी का पक्ष नहीं लेते), काला: जो हमारे खिलाफ हैं और सफेद: जो हमारा समर्थन करते हैं और यह भी कहा गया कि हमें अपने पक्षधर पत्रकारों का समर्थन करना और उन्हें प्रोत्साहन देना चाहिए।

मैं आलोचकों की बात से सहमत हूं। लेकिन कहना चाहूंगा कि सरकार को आचार संहिता बनानी चाहिए और उसे सही ढंग से लागू करना चाहिए। ये नहीं कि उसे जबरन लागू करे और सजा दे। आलोचकों को भी ये सोचना चाहिए कि आचार संहिता को पारदर्शी ढंग से किस तरीके से लागू किया जा सके। जो गलत है, वो गलत है, लेकिन पूरी रिपोर्ट को गलत कह देना भी गलत है। अब यह कह दो कि सरकार ताला लगाना चाहती है, सरकार गला घोटना चाहती है, सरकार बंद करना चाहती है, ये कह देने से हमारी खुद की भी कमजोरी साबित होती है कि हम कुछ गलत कर रहे हैं। हम यदि कुछ गलत नहीं कर रहे हैं तो कानून लागू करने दीजिए। ऐसे भी डरने से क्या होगा, जो सच है उसकी रिपोर्ट तो लिखना बंद नहीं कर देंगे हम।

क्या संपादक या पत्रकार सरकारों को सलाह देते रहे हैं और अब भी देते हैं?

अभी का तो मुझे कोई मालूम नहीं कि कौन सलाह देते हैं। लेकिन हां, कई ऐसे पत्रकार रहे हैं, जो प्रधानमंत्री के साथ कभी संपर्क में रहे हों या पार्टी से प्रभावित रहे हों। उदाहरण के तौर पर श्रीकांत वर्मा, जो पहले इंदिरा गांधी के भाषण लिखते थे, बाद में राजीव गांधी के लिखते थे और वे पत्रकार भी रहे। उस समय भी पत्रकारिता करते थे। ऐसे ही एक और उदाहरण चंद्रूलाल चंद्राकर का है, जो पहले संपादक थे, बाद में कांग्रेस नेता हुए। बीजेपी में अरुण शौरी जैसे नाम हैं। कुलदीप नायर जी लाल बहादुर शास्त्री के साथ रहे, लेकिन बाद में वे पूरी तरह से पत्रकारिता में आ गए। बीजी वर्गीज जी इंदिरा गांधी के साथ रहे। एचके दुआ जी भी एक उदाहरण हैं, जो अटल बिहारी वाजपेयी जी के भी प्रेस सलाहकार थे और देवेगौड़ा जी के प्रेस सलाहाकार थे। मैं उनका सम्मान करता हूं वे जब इनके साथ थे, तो उन्होंने पत्रकारिता से इस्तीफा दे दिया था। एमजे अकबर भी जब चुनाव लड़ने गए थे तो उन्होंने भी इस्तीफा दे दिया था। कई लोग ऐसे भी थे जो संपादक रहते हुए सलाह भी देते थे। राजेंद्र माथुर जी, जिनके घर कई बड़े मंत्री भी आते थे, लेकिन फिर वे ये नहीं कहते थे कि इनके खिलाफ नहीं लिखना या उनके खिलाफ नहीं लिखना। मनोहर श्याम जोशी जी के अटल बिहारी वाजपेयी के साथ काफी अच्छे संबंध थे, वो फिर पूछा करते थे कि क्या चल रहा है, तो वे यही कहते थे कि आप रिपोर्ट पढ़ लीजिए, आपकी पार्टी सही नहीं कर रही है या ये गड़बड़ हो रहा है। हर बात को सलाह तो नहीं कहा जा सकता, कुछ व्यक्तिगत राय भी होती है।अटलजी से मेरा परिचय 1972 से था | 1977 में विदेश मंत्री और बाद में प्रधान मंत्री बनने तक कई बार इंटरव्यू किये , ऑफ़ द रिकार्ड बात की | लेकिन उनके मुखौटा होने वाली गोविंदाचार्य की डायरी के अंश या सरकार की कमियों पर मैंने बराबर लिखा |

आपने तो कई सरकारों के समय काम किया है? क्या आज की तरह उनके भी नजदीक नहीं माने जाते थे?

बिल्कुल, मैं तो कह ही रहा हूं। जब मैं संपादक था, तो मेरा कई मंत्रियों, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस से व्यक्तिगत परिचय रहा है। मैं उनको कार्यक्रमों में बुलाता भी था। मेरा परिचय नरसिंह राव से लेकर के अटल बिहारी वाजपेयी तक से रहा है। राजीव गांधी  के प्रधान मंत्री बनने से पहले भी परिचय था , उनके साथ बातचीत यात्रा के अवसर भी मिले | उनको मुझ पर भरोसा था, छापने को लेकर भी और न छापने को लेकर भी। मनमोहन सिंह के समय भी कई ऐसी मीटिंग्स हुई, जिसके वीडियो बार-बार चलाए जाते रहे हैं कि पांच संपादकों को बुलाया गया, जिनमें से  आलोक मेहता भी एक थे। बाहर जो जानकारी सार्वजनिक हो सकती थीं, वे बातें बताने वालों में मैं भी एक था। मैं सलाहकार तब भी मनमोहन जी का नहीं था। उन्हीं की सरकार के समय जब मैं नईदुनिया अखबार का प्रधान संपादक था, तब मैंने 2जी पर सीरीज चलाई थी और बताया कि कैसे हर रोज बुधवार को 11 बजे अनिल अंबानी प्रधानमंत्री कार्यालय में आते हैं और 2जी की लंबी-2 रिपोर्ट विनोद अग्निहोत्री जी लिखते थे। जिम्मेदारी एक संपादक की होती है, लिहाजा मेरे खिलाफ नोटिस भी आए थे।

जब 1990 में सबसे पहले हमने चारा कांड को लेकर खबरें छापीं, तब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव के समर्थकों ने टाइम्स ऑफ इंडिया प्रेस तक में आग लगा दी थी, लेकिन जब वह मेरे दफ्तर में आए तो मैंने उनका स्वागत किया और चाय-नाश्ते की व्यवस्था कराई। एडिटर्स गिल्ड की ओर से भी उस समय कोई स्टेटमेंट जारी नहीं हुआ था। कहने का मतलब है कि संबंध अपनी जगह हैं और काम अपनी जगह। लालू यादव जी के परिवार में शादी समारोह में मैं गया हूं, या आलोचना लिखने के बावजूद आडवाणी जी मेरे यहां शादी समारोहों में आए हैं। मुलायम सिंह और सोनिया गांधी के बारे में भी मैंने काफी कुछ लिखा है, लेकिन मेरे व्यक्तिगत संबंध भी उनसे अच्छे रहे हैं। आज की सरकार की बात करें तो मुझे लगता है कि स्थायित्व की सरकार है और उनकी कई नीतियों को मैं उचित मानता हूं। हालांकि, कई मामलों में मै उनकी आलोचना भी करता हूं। जब लोग मुझसे पूछते हैं कि आपको मनमोहन सरकार में पदमश्री मिला, फिर आप उस सरकार की आलोचना क्यों करते हैं तो मेरा कहना होता है कि मैं तो अपना काम करता हूं, उसका पुरस्कार से कोई लेना-देना नहीं है।

तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव के निवास पर एक समारोह में निखिल चक्रवर्ती , कमलेश्वर जैसे वरिष्ठ सम्पादकों के साथ मुझे पुरस्कार के साथ सम्मान दिया गया था | लेकिन बाद  मैंने पूरी किताब लिख दी कि ‘राव के बाद कौन?’ इसमें मैंने बताया कि राव के बाद कौन प्रधानमंत्री हो सकते हैं। मनमोहन सिंह के खिलाफ भी मैंने कई आलोचनात्मक टिप्पणी लिखीं, इसके अलावा उस समय कई मंत्री भी मेरे दफ्तर आते थे, इसका मतलब यह कतई नहीं था कि मैं उनके खिलाफ नहीं लिखूंगा। जब मैंने दिल्ली में नई दुनिया की लॉन्चिंग का कार्यक्रम किया था, उस समय मैंने किसी भी मंत्री, गृहमंत्री को मंच पर जगह नहीं दी, गुलजार, शुभा मुद्गल और जावेद अख्तर आदि ने अखबार को जारी कराया। उस समय मैंने कहा भी कि कल को इस अखबार में अतिथियों की गड़बड़ी को लेकर भी खबर छपी दिख सकती है। मेरा मानना है कि व्यक्तिगत संबंध अलग हैं और जरूरी होने पर आलोचना भी होगी, यह एक संपादक का दायित्व है। आजादी के पहले गांधी जी, तिलक जी समेत अनेक  लोगों ने काफी काम किया, उस समय उनका लक्ष्य देश को आजाद कराना था, उस समय की पत्रकारिता दूसरी तरह की थी। आज आजादी को अक्षुण्य रखना, उसे बनाए रखना और लोकतंत्र को बचाए रखना, यही लक्ष्य होना चाहिए। एक समय तहलका कांड के बाद तत्कालीन रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिस को इस्तीफा देना पड़ा था, हालांकि बाद में वह फिर सत्ता में आ गए थे। ऐस में यह गलतफहमी रखना कि आलोक मेहता या किसी और की वजह से सरकार गिर जाएगी अथवा कोई बड़ा चैनल अथवा अखबार सरकार को बदल देगा, निरर्थक है।

अब वह जमाना नहीं है। डिजिटल में भी जिसके बहुत ज्यादा सबस्काइबर्स हों, वह भी ऐसा नहीं कर पाएगा। एक उदाहरण बताता हूं। आपातकाल के दौरान बीबीसी ऐसा प्रसारणकर्ता था, जिसके बारे में लोग मानते थे कि यह ज्यादा सही जानकारी देगा, क्योंकि यहां मीडिया नियंत्रित है, उसके हिंदी के एडिटर थे रत्नाकर  भारती, जो मूल रूप से मध्य प्रदेश के निवासी थे। उस समय बीजेपी व संघ के काफी नेता उनके संपर्क में थे। इसके बाद देश में जनता पार्टी की सरकार आ गई। 1977 में रत्नाकर  भारती से कहा गया कि आप भारत आकर राजनीति में शामिल हो जाइए। इसके बाद उन्होंने मध्य प्रदेश के बड़नगर से विधान सभा का  चुनाव लड़ा, हालांकि जनता पार्टी की लहर में भी उनती जमानत जब्त हो गई थी। कहने का मतलब यह है कि ये सोचना कि सोशल मीडिया पर इतने फॉलोअर्स होने के कारण आप किसी चुनाव में जीत ही जाएंगे, गलत है। किसी पत्रकार को राजनीति में जाना है तो बेशक जाए और चुनाव लड़े लेकिन एक पत्रकार के रूप में यह गलतफहमी पालना कि सरकार गिरा देंगे अथवा बना देंगे, यह हम लोगों का लक्ष्य नहीं होना चाहिए। 

अब सरकार ने डिजिटल मीडिया के लिए नई गाइडलाइंस जारी की हैं? साथ में प्रेस काउंसिल का उल्लेख भी किया है। आप प्रेस काउंसिल के सदस्य और एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष रहे हैं। उनके कोड यानी नियमों का कितना पालन हो रहा है? 

मैं एडिटर्स गिल्ड का अध्यक्ष और महासचिव भी रहा हूं, इसलिए सबसे पहले मैं इसका जिक्र करूंगा। एडिटर्स गिल्ड में रहने के दौरान एक बार मुझे ब्रिटेन जाने का मौका मिला। वहां ब्रिटेन की सोसाइटी ऑफ एडिटर्स के प्रेजिडेंट के साथ मेरी मीटिंग हुई। वहां मेरी उनसे ब्रिटेन के कोड ऑफ कंडक्ट को लेकर चर्चा हुई और उसकी एक प्रति लेकर आया |आने के बाद मैंने अपने यहां एडिटर्स गिल्ड में प्रस्ताव रखा कि हमें भी इस दिशा में काम करना चाहिए और बीजी वर्गीज जी को इसका प्रमुख बनाना चाहिए, जो काफी अनुभवी और वरिष्ठ थे। स्टेट्समेन  केसंपादक  एस सहाय और नव भारत टाइम्स के संपादक राजेंद्र माथुर पहले भी इस मुद्दे पर मुझसे चर्चा करते थे | हमने मामन मैथ्यू , एस निहाल सिंह , कुलदीप नायर जैसे प्रमुख  सदस्य  संपादकों के सुझाव मांगे और एडिटर्स गिल्ड की ओर से इस बारे में पूरी रिपोर्ट तैयार की गई और कोड ऑफ कंडक्ट तैयार किया गया। एडिटर्स गिल्ड के आग्रह पर उस समय तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने खुद इस कोड ऑफ कंडक्ट को जारी किया। उस समय इस कोड ऑफ कंडक्ट को अपने संपादक मित्रों और तमाम अखबारों को भिजवाया गया, बाद में इसे वेबसाइट पर भी डलवाया गया। हालांकि, सभी अखबार एडिटर्स गिल्ड के मेंबर भी नहीं थे। मेरा मानना है कि इस कोड ऑफ कंडक्ट का पालन नहीं हो रहा है। पहले प्रेस काउंसिल के फैसले कुछ अखबारों में छपते भी थे, लेकिन अब प्रेस काउंसिल की कोई परवाह नहीं करता है और उसकी गाइडलाइंस का पालन नहीं होता है। मुझे तो आश्चर्य है कि वर्तमान सूचना प्रसारण मंत्री जावड़ेकर जी कहते हैं कि प्रेस परिषद् के नियमों का सब पालन कर रहे हैं | मेरा मानना है कि सरकार की तरफ से ये जो गाइडलाइंस जारी की गई हैं, उन्हें कुछ हद तक माना जा सकता है और कुछ चीजों पर असहमति भी हो सकती है, तो उसके लिए अदालत हैं। मैंने अभी इस रिपोर्ट को नहीं पढ़ा है। डिजिटल मीडिया में तमाम अच्छे लोग भी हैं, लेकिन जो लोग इसे उच्छृंखल बना रहे हैं, उन पर लगाम लगनी चाहिए।

अभी आपने पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा का जिक्र किया है। आपकी राय में किस तरह स्वतंत्र मीडिया की लक्ष्मण रेखा लागू होनी चाहिए?

मेरा मानना है कि इसके लिए एक मिला-जुला प्रयास होना चाहिए। फिर चाहे उसमें जुर्माने का प्रावधान ही क्यों न हो। जिस तरह से ब्रिटेन और अमेरिका में कोड ऑफ कंडक्ट है। जैसे- यदि यह सामने आता है कि पुलित्जर अवॉर्ड गलत मिल गया है तो उसे लौटाने के साथ जुर्माना भी देना होता है। मेरा मानना है कि आचार संहिता होनी चाहिए, उसे लागू किया जाए, लेकिन सरकार उसमें इमरजेंसी की तरह सेंसरशिप न लगाए। मेरा मानना है कि जब हम अधिकार मानते हैं तो हमें उत्तरदायित्व भी मानना चाहिए। जहां तक स्वतंत्र मीडिया की लक्ष्मण रेखा की बात है तो इसके लिए पहले की तरह मीडिया आयोग और  मीडिया काउंसिल (जिसमें पूरी मीडिया को शामिल किया जाए) बनाई जाए,  जिसे  वैधानिक मान्यता हो और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त हो। इसमें न्यायाधीश, मीडिया के अनुभवी वरिष्ठ व्यक्ति हों। उनके आदेश का पालन अनिवार्य हो | इससे आचार संहिता लागू करना आसान होगा।

यहां मैं आपको बता दूं कि अगले महीने मेरी एक नई पुस्तक ‘पावर प्रेस एंड पॉलिटिक्स’ आ रही है। जैसा कि मैंने बताया कि उस पुस्तक में मैंने उन सभी उथल-पुथल का जिक्र किया है, जो मैंने अब तक के अपने  50 वर्षों के पत्रकारिता करियर में देखी व महसूस की हैं। यानी इंदिरागांधी के समय से नरेंद्र मोदी के समय तक किस तरह पत्रकारिता हुई है। उस पुस्तक में मैंने एडिटर्स गिल्ड और प्रेस काउंसिल की भूमिका के बारे में भी प्रमाणों और उदाहरणों के साथ बताया है। यहां स्पष्ट कर दूं कि इस पुस्तक में मैंने अपने बारे में कम और अन्य संपादकों के बारे में ज्यादा लिखा है कि कैसे उन्हें तमाम तरह के दबावों का सामना करना पड़ा। एडिटर्स गिल्ड की एक-दो महत्वपूर्ण व चर्चित रिपोर्ट्स को भी इस पुस्तक में शामिल किया गया है।

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टेक्नोलॉजी बिजनेस में पूंजी के दम पर आप दूसरों से आगे नहीं निकल सकते: नवीन तिवारी

‘इनमोबी और ग्लांस’ (InMobi & Glance) के फाउंडर और सीईओ नवीन तिवारी को ‘एक्सचेंज4मीडिया इन्फ्लुएन्सर ऑफ द ईयर’ अवॉर्ड 2020 से सम्मानित किया गया है।

Last Modified:
Monday, 08 March, 2021
NaveenTiwri5

‘इनमोबी और ग्लांस’ (InMobi & Glance) के फाउंडर और सीईओ नवीन तिवारी को ‘एक्सचेंज4मीडिया इन्फ्लुएन्सर ऑफ द ईयर’ (exchange4media Influencer of the Year Award) अवॉर्ड 2020 से सम्मानित किया गया है। शुक्रवार को आयोजित एक कार्यक्रम में नवीन तिवारी को यह अवॉर्ड दिया गया।

इस कार्यक्रम के दौरान नवीन तिवारी और ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के बीच सवाल-जवाब का दौर भी चला। इस दौरान, इनमोबी (InMobi) के लिए पिछले 12 महीने किस तरह से बीते, पिछले पांच वर्षों में क्या चुनौतियां रहीं और इंडस्ट्री को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, समेत तमाम बिंदुओं पर चर्चा हुई।

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश

सवाल: निजी और प्रोफेशनल तौर पर पिछले 12 महीने आपके लिए कैसे रहे हैं?

जवाब: पिछले 12 महीनों में जो हुआ है, उससे दुनिया में सभी चीजें काफी प्रभावित हुई हैं। इस दौरान लोगों को तमाम तरह की शारीरिक व मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ा है, लेकिन बतौर इंसान अब हम सभी इस मुसीबत से बाहर आ गए हैं। इस दौरान हम सभी अलग-अलग तरह से आगे बढ़े  हैं। अपने बिजनेस की बात करूं तो डिजिटल में इस दौरान काफी विकास हुआ है। मानव समाज और व्यक्ति के रूप में हमारा विकास उससे भी कहीं अधिक तेजी से हुआ है, जिसे यहां तक आने में एक या दो दशक लगे होंगे। चाहे पर्यावरण, परिवार और स्वास्थ्य का महत्व समझने की बात हो या उनमें संतुलन बिठाने की बात हो, काफी हद तक हम सभी लोगों की समझ में आई है और उम्मीद है कि लंबे समय तक हम लोग इस बात को समझेंगे। ऐसा लगता है कि प्रकृति के पास सिस्टम को सही करने के अपने तरीके हैं और यह इस दिशा में प्रकृति का काफी बड़ा कदम है। व्यक्तिगत रूप से अपनी बात करूं तो इन महीनों में मेरी सोच में काफी महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं और जीवन जीने के तरीकों में काफी बदलाव आया है। उम्मीद है कि आगे काफी अच्छा होगा।

बेशक, पिछले 12 महीने काफी मुश्किल थे। हमने सोचना शुरू कर दिया था कि निजी तौर पर और प्रोफेशनल तौर पर आगे क्या होगा। तमाम लोगों का कहना था कि यदि आपको बिजनेस चलाना है तो स्टाफ कम करना होगा और खर्चे घटाने होंगे। लेकिन हमने तय कर लिया कि हम अपने किसी भी एम्प्लॉयी को नहीं हटाएंगे। लोगों को परेशानी में डालने के बजाय हमने उन्हें पेमेंट करने का फैसला किया। कंपनी में सभी स्वेच्छा से वेतन कटौती पर सहमत थे। व्यावसायिक रूप से कोई भी उद्धम नहीं चल सकता, यदि उसे सही से न चलाया जाए। मुझे इस बात पर काफी गर्व हुआ कि लोग अपने लिए नहीं बल्कि एक-दूसरे के लिए मिलकर साथ खड़े थे। तमाम मुश्किलों के बावजूद पिछले 12 महीनों के मुकाबले आज हम काफी अच्छी स्थिति में हैं।

सवाल: प्रॉडक्ट्स को तैयार करने और नए बाजार तैयार करने में पिछले पांच वर्षों में आपको किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा?

जवाब: वास्तविकता में हर उद्धम यात्रा सफल नहीं होती है। कुछ ही सफल होती हैं और तमाम असफलताओं के बाद होती हैं। पिछले पांच वर्षों में एक कंपनी के रूप में हम काफी विकसित हुए हैं। शुरुआत में हमारा बिजनेस डिजिटल एडवर्टाइजिंग के क्षेत्र में था। उस समय बिल्कुल साफ था कि गूगल और फेसबुक जिस तरह से मार्केट में काम कर हे हैं, वे इसे टेकओवर कर लेंगे। निवेशकों ने अपने कदम वापस खींच लिए और हमारे लिए इन बड़ी कंपनियों से मुकाबला मुश्किल था। वहां से हमने अपने लिए एक अलग ही रास्ता निकाला, जो दूसरे स्टार्टअप्स से अलग था। हमने कहा कि एक स्टार्टअप होने के बावजूद हमें यह अधिकार नहीं है कि हम लगातार पैसा फूंकते रहें। हमें सबसे पहले एक टिकाऊ बिजनेस शुरू करना होगा। इसके बाद एक साल में हम लाभकारी कंपनी बन गए और तब से बने हुए हैं। इससे हमें काफी आजादी और खुशी मिली है। हम तमाम मीडिया से दूर चले गए। हमें मीडिया से ज्यादा चर्चा नहीं मिली, लेकिन कंपनी के अंदर हमें काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिला और इस दौरान हमने कई कड़े फैसले लिए। बिजनेस न्यूज में बने रहने के लिए नहीं बल्कि कस्टमर को सर्विस देने के लिए हम हैं। भारत में एक उद्यमी के रूप में, बहुत तेजी से आगे बढ़ने की अपनी चुनौतियां हैं और तमाम नए उद्यमियों को इससे बहुत सावधान रहना चाहिए।

दूसरी बड़ी बात कि हमने इनोवेशन पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया। सच्चाई यह है कि टेक्नोलॉजी बिजनेस में पूंजी के दम पर आप दूसरों से आगे नहीं निकल पाएंगे, बल्कि आगे बढ़ने और दूसरों से अलग दिखने के लिए इनोवेशन पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है। हमने तीन बड़े इनोवेशन किए। इनमें पहला एडवर्टाइजिंग के क्षेत्र में था। वर्ष 2015 में अमेरिका में हमारा बिजनेस पांच से 10 प्रतिशत था, जो अब 60 प्रतिशत तक बढ़ गया है। हमने अपने कोर बिजनेस पर इनोवेशन किया इसके बाद हमने कंज्यूमर बिजनेस पर इनोवेशन शुरू कर दिया। हमने इसे अपनी आय से फंड दिया, जो काफी मुश्किल था। इसके बाद हमने ‘ग्लांस’ (Glance) नाम से एक कंज्यूमर प्लेटफॉर्म तैयार किया। इसे 10 से भी कम लोगों के साथ पूरी तरह इनहाउस तैयार किया गया था। हमने फिर से परिभाषित किया कि लॉक स्क्रीन क्या करने में सक्षम है और आज यह इस दिशा में सबसे बड़ा कंटेंट प्लेटफॉर्म है, जिसका हम सभी इस्तेमाल करते हैं।

सवाल: क्या स्टार्टअप के गुणों को अब भी बरकरार रखते हुए इनमोबी (InMobi) आगे बढ़ रही है?

जवाब: हम नक्शे पर देश को बहुत ही महत्वपूर्ण तरीके से पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। तमाम लोग बहुत जल्दी आत्मसंतुष्ट हो जाते हैं। मेरे लिए, स्टार्टअप का मलतब सीखना, जिज्ञासु बने रहना और काम को तेजी से करते हुए आगे बढ़ना है। मुझे उम्मीद है कि हम इसी मानसिकता के साथ स्टार्ट-अप के रूप में बने रहेंगे और तेजी से आगे बढ़ते रहेंगे।

सवाल: ऐसी कौन सी चीजें हैं जो इनमोबी और ग्लांस को बाधित कर रही हैं?

जवाब: पिछले साल, हमने पांच सेक्टर्स पर दांव लगाया था। विज्ञापन के नजरिये से हमने इन पर कभी फोकस नहीं किया। हमने गेमिंग, प्रॉडक्टिविटी, फिन-टेक जैसे नए सेक्टर्स को देखना शुरू किया। हमने ऐसे सेक्टर्स को चुना जो हमारे रेवेन्यू में 5 प्रतिशत योगदान दे रहे थे, लेकिन आज वे हमारे बिजनेस में लगभग 60-70 प्रतिशत का योगदान देते हैं। तीन महीनों के दौरान, हमने थोड़े-बहुत ऐसे बदलाव देखे हैं, जिससे कारोबार में बदलाव हुआ है। जब जुलाई, 2020 में कारोबार फिर से शुरू हुआ, तो हमने इसका फायदा उठाया।

सवाल: क्या आपको लगता है कि देश में एडवर्टाइजिंग अथवा अन्य व्यवसायों में ज्यादा प्रॉडक्ट आधारित कंपनियां आएंगी? एक एंटरप्रिन्योर के रूप में आपकी वैश्विक तौर पर क्या महत्वाकांक्षाएं हैं?

जवाब: आने वाले समय में हमें देश में ज्यादा प्रॉडक्ट कंपनियां देखने को मिलेंगी, खासकर सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में। सॉफ्टवेयर क्षेत्र में तमाम कंपनियां तैयार हो रही हैं, क्योंकि देश यह जान चुका है कि कैसे हाई क्वालिटी की ‘बाजार केंद्रित रणनीति’ (go-to-market) तैयार कर सकते हैं। इस रणनीति को दूर से ही किया जा सकता है।

यदि आप भारत में कोई कंज्यूमर कंपनी तैयार कर सकते हैं तो आप उस बिजनेस को साउथ ईस्ट एशिया अथवा मिडिल ईस्ट में पांच गुना तक बड़े रूप में देख सकते हैं। अचानक आपके बिजनेस का स्कोप बदल सकता है। सच्चाई यह है कि भारत में लोग बहुत हैं, लेकिन मार्केट छोटा है। यहां पर सिर्फ 27 प्रतिशत लोगों के पास ही भुगतान करने की क्षमता है। यदि कंज्यूमर बिजनेस साउथ ईस्ट एशिया और मिडल ईस्ट की तरफ देखते हैं तो वे भारत में लंबा गेम खेल सकते हैं। हम चीन और अमेरिका की तरह नहीं हैं जो काफी भुगतान करेंगे और आप एक स्थायी बिजनेस तैयार कर लेंगे। बिजनेस में स्थिरता तभी आती है, जब आप कुछ दूसरे बिजनेस भी करते हैं।

सवाल: एक इंडस्ट्री के तौर पर हमें किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

जवाब: डिजिटल अब प्राइम टाइम हो गया है और एक साल में काफी बढ़ गया है। लगभग हर कोई ओटीटी की ओर शिफ्ट हो गया है। यह बदलाव तेजी से हुआ है और डिजिटल की यह छलांग असाधारण है। दूसरी छलांग जो अभी हुई है और हो रही है वह AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है। हर कोई इस शब्द का उपयोग तो करता है, लेकिन कई इसे समझ ही नहीं पाते हैं। अगर भारतीय व्यवसायों को सफल होना है, तो उन्हें अपने कस्टमर्स की हर जरूरत को पूरा करने के लिए एआई को गले लगाना होगा। यदि डिजिटाइजेशन के साथ एआई को मिला दिया जाए, तो इसके बाद आप दो साल में ही सफलता के खेल को जीत जाएंगे।

सवाल:आप किन लोगों से सलाह लेते हैं?

जवाब: मेरा मानना है कि आपको सभी लोगों के साथ बातचीत कर उनसे सीखना चाहिए। मेरी पूरी मैनेजमेंट टीम इस बारे में काफी खुले विचारो की है जो लोगों से सलाह लेती है। हमारे देश में टाटा-बिड़ला, इंफोसिस, महिन्द्रा और अंबाने से लेकर तमाम सफल एंटरप्रिन्योर्स हैं। उन्होंने इतने वर्षों में काफी असाधारण बिजनेस तैयार किया है। बेशक, इनमें से तमाम लोग एक ही बिजनेस में नहीं हो सकते हैं, लेकिन बिजनेस के मूल सिद्धांत तो वही होते हैं। इन लोगों से भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है। मैं तमाम इंटरनेशनल कंपनियों से बात करता हूं, जो बिल्कुल अलग तरीके से सोचती हूं। जैसे-हम माइक्रोसॉफ्ट और गूगल के काफी करीब हैं। हम उनके साथ ज्यादा समय गुजारने का प्रयास करते हैं, ताकि हम उनसे कुछ सीख सकें।

एक ऑर्गनाइजेशन के रूप में इनमोबी महिलाओं के लिए क्या कर रही है, खासकर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में?

महिलाओं के डेडिकेशन और प्रतिबद्धता की किसी से तुलना नहीं की जा सकती है। मुझे लगता है कि हमने इस दिशा में कम काम किया है, लेकिन अभी भी हमारे कार्यबल में 38 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं। एक समय ऐसा था जब हमारी कंपनी का प्रत्येक वैश्विक क्षेत्र (global region) महिलाओं द्वारा चलाया जाता था। आज भी चीन में हमारे कुछ प्रमुख बिजनेस पिछले नौ वर्षों से महिलाओं द्वारा चलाए जा रहे हैं। हमारा एशिया बिजनेस भी महिलाएं चलाती हैं। हमारी कंपनी में तमाम महिलाएं शीर्ष पदों पर कार्यरत हैं और हम उन पर गर्व महसूस करते हैं।

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