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TRAI और ब्रॉडकास्टर्स के बीच विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाया ये कदम
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। सुप्रीम कोर्ट ने ट्राई के ड्रॉफ्ट टैरिफ ऑर्डर और इंटरकनेक्शन रेगुलेशन केस को मार्च के आखिरी तक स्थगित कर दिया है। मद्रास हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय लिया है। जैसा कि पहले बताया गया था, ट्राई ने रे
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्राई के ड्रॉफ्ट टैरिफ ऑर्डर और इंटरकनेक्शन रेगुलेशन केस को मार्च के आखिरी तक स्थगित कर दिया है। मद्रास हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय लिया है। जैसा कि पहले बताया गया था, ट्राई ने रेगुलेशंस को लागू करने की अनुमति के मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष अनुमति याचिका (special leave petition) दायर की थी। दोनों का कहना था कि ट्राई ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन किया है। 17 फरवरी को मद्रास हाईकोर्ट ने ट्राई के ड्रॉफ्ट टैरिफ ऑर्डर को लागू करने के मामले को लेकर इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन (IBF) की याचिका को खारिज कर दिया था। हालांकि IBF अब नई याचिका दायर कर सकता है। अगली सुनवाई में कोर्ट ऑल इंडिया डिजिटल केबल फेडेरेशन (AIDCF) की याचिका पर सुनवाई करेगा। मल्टी सिस्टम ऑपरेटर्स (MSOs) की प्रतिनिधि यह संस्था 17 फरवरी को अपना पक्ष प्रस्तुत नहीं कर सकी थी।यह है पूरा मामला
पिछले साल दस अक्टूबर को ट्राई ने टेलिकम्युनिकेशन ड्रॉफ्ट टैरिफ ऑर्डर 2016 (Broadcasting and Cable Services) (Eighth) (Addressable Systems) पेश किया था। ड्रॉफ्ट के नियमों में, ट्राई ने अलग या विशिष्ट आधार (standalone or individual basis) पर सभी चैनलों को उपलब्ध कराना अनिवार्य किया था।
इस नियामक संस्था (regulator) का कहना था, ‘ब्रॉडकास्टर्स अपने सबस्क्राइबर्स को ‘a-la-carte’ आधार पर सभी चैनल ऑफर करेंगे।’ इसके पीछे तर्क यह दिया गया था कि जो उपभोक्ता पैकेज के नाम पर न चाहते हुए भी कुछ चैनलों को लेते हैं, उन्हें कई चॉइस मिल सकेंगी।
ट्राई के चेयरमैन आरएस शर्मा ने कुछ महीने पहले ‘CII Big Picture Summit’ में कहा था, ‘ उपभोक्ताओं के पास यह चॉइस जरूर होनी चाहिए कि वे क्या देखना चाहते हैं। आप यह नहीं कह सकते हैं कि यदि आप इन चैनलों को लेंगे तो आपको इनके साथ ये 10 चैनल भी मिलेंगे।’
ट्राई ने ब्रॉडकास्टर्स को यह मंजूरी दे दी थी कि वे उपभोक्ताओं को चैनलों का पैकेज इस शर्त पर ऑफर कर सकते हैं इन पे चैनर्स का अधिकतम मूल्य (maximum retail price) a-la-carte पे चैनल्स के कुल मूल्य के 85 प्रतिशत से कम नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए- 10 विभिनन चैनल्स अलग-अलग यदि 100 रुपये में लिए जाएंगे तो उन्हें पैकेज में बेचने पर यह राशि 85 रुपये से कम नहीं होनी चाहिए अर्थात सिर्फ 15 प्रतिशत की छूट दी जा सकती है।
इसके अलावा ट्राई ने विभिन्न कैटेगरी के चैनलों के लिए जॉनरवाइज (genre-wise) प्राइस कैप भी निर्धारित की थी। इन नियमों को एक अप्रैल 2017 से प्रभाव में आना था। हालांकि अब यह मामला ट्राई और ब्रॉडकास्टर्स के बीच कानूनी लड़ाई में फंस गया है।
‘स्टार इंडिया’ और ‘विजय टीवी’ की याचिका पर मद्रास हाईकोर्ट इस मामले की जांच कर रहा है कि क्या ट्राई का ड्रॉफ्ट टैरिफ ऑर्डर उसके न्यायिक क्षेत्र से बाहर है और उसने कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन किया है। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रार्इ से कहा है कि सुप्रीम कोर्ट की अनुमति से पूर्व उसे इन रेगुलेशंस को अधिसूचित (notifying) करने से बचना चाहिए। हालांकि कोर्ट ने इस अधिनियम के लिए परामर्शी प्रक्रिया (consultative process) को आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी है।
ब्रॉडकास्टर्स द्वारा ट्राई को दिए गए जवाब में इस ड्रॉफ्ट टैरिफ ऑर्डर से जुड़ी चिंताओं के बारे में बताया गया है।
ब्रॉडकास्टर्स के अधिकारों का हनन (Violation of the rights of broadcasters)
ट्राई के ड्रॉफ्ट टैरिफ ऑर्डर की ‘जी ऐंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ (ZEEL) ने कड़ी आलोचना की है। अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) कायम रखने के ब्रॉडकास्टर्स के विशेषाधिकार की बात करते हुए ZEEL का कहना है कि सबस्क्राइबर्स के बीच चैनल की लोकप्रियता के अनुसार ब्रॉडकास्टर्स को उसकी कीमत का निर्धारण करना चाहिए। यदि उस चैनल को ज्यादा सबस्क्राइबर्स उस कीमत पर नहीं ले रहे हैं तो उसकी कीमत में अपने आप सुधार होना चाहिए।
ट्राई के इस प्रस्ताव की सराहना भी हुई है, जिसमें कहा गया है कि ब्रॉडकास्टर्स को पे चैनलों की एमआरपी सेट करने की छूट मिलनी चाहिए।
लेकिन जॉनरवाइज प्राइस कैप और पे चैनल पर दिए जाने वाले डिस्काउंट को सीमित करने को लेकर ब्रॉडकास्टर्स आपस में बंट गए हैं।
‘सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ (Sony Pictures Networks India Private Limited) भी जॉनरवाइज प्राइस तय किए जाने को लेकर खुश नहीं था। उसका कहना था कि यह काफी कम थे और रिटेल रेट भी 50 प्रतिशत तक घटा दिए गए थे।
सोनी का इस बात को लेकर विरोध था कि चैनलों के पैकेज की कम एमआरपी भी काफी ज्यादा थी। पैकेज चैनल्स को लेकर ब्रॉडकास्टर्स की आजादी की वकालत करते हुए इसका कहना था, ‘मौजूदा समय में पैकेज रेट a-la-carte आधार पर चैनलों के पैकेज की कुल कीमत का 55-65 प्रतिशत है, इसमें थोड़ा बहुत कम ज्यादा DPOs और सबस्क्राइबर्स दोनों के लिए काफी आसान और सुविधाजनक है।’
मीडिया की लोकप्रियता पर प्रभाव और उपभोक्ताओं की पसंद
स्टार इंडिया प्राइवेट लिमिटेड का सुझाव था कि ट्राई का ड्रॉफ्ट टैरिफ रेगुलेशंस टेलिविजन ब्रॉडकास्टर्स के लिए ठीक नहीं हैं। इसका कारण यह बताया गया कि रेगुलेशंस से सिर्फ कुछ चैनल ही रह पाएंगे, क्योंकि a-la-carte सिस्टर्म से छोटे तमाम चैनल खत्म हो जाएंगे।
पे चैनल के पैकेज की एमआआरपी पर डिस्काउंट को सीमित किए जाने की आलोचना करते हुए स्टार इंडिया ने कहा, ‘चैनलों के पैकेज रेट और a-la-carte के आधार पर कीमतों पर इस तरह पाबंदी लगाने का कोई औचित्य नहीं है और इसे मार्केट पर छोड़़ देना चाहिए।’
यही नहीं, ‘TV18 Broadcast Limited’ का तो यहां तक कहना था कि ट्राई ने पे चैनल के पैकेज पर 15 प्रतिशत के सीमित डिस्काउंट को तय करने से पूर्व सही ढंग से रिसर्च नहीं किया।। उसने टाई के उस दावे पर भी सवाल उठाए जिसमें कहा गया था कि a-la-carteनियम से उपभोक्ताओं को चैनल चुनने की आजादी होगी और उन्हें बेकार के चैनल नहीं देखने पड़ेंगे।
टीवी18 का कहना था कि 15 प्रतिशत की जगह डिस्काउंट को बढ़ाकर 25 से 30 प्रतिशत तक कर देना चाहिए। इससे सबस्क्राइर्स को ज्यादा चैनल चुनने का मौका मिलेगा।
जॉनरवाइज कैटेगरी करने की जरूरत
ड्रॉफ्ट टैरिफ ऑर्डर में ब्रॉडकास्टर्स को यह विकल्प दिया गया है कि वे सात की लिस्ट में से किसी एक जॉनर को चुन सकते हैं। इस लिस्ट में devotional, general entertainment, infotainment, kids, movies, news and current affairs and sports कैटेगरी हैं लेकिन ब्रॉडकार्स्ट का मानना है कि जॉनर की संख्या को बढ़ाना चाहिए अथवा इनमें सबजॉनर कैटेगरी भी बनानी चाहिए।
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