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डेढ़ साल बाद अब इस पत्रकार को मिली जमानत...
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर जिले के पत्रकार संतोष यादव के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आज एक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने करीब डेढ़ साल बाद जेल में बंद पत्रकार संतोष यादव को जमानत दे दी है। उच्चतम न्याय
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर जिले के पत्रकार संतोष यादव के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आज एक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने करीब डेढ़ साल बाद जेल में बंद पत्रकार संतोष यादव को जमानत दे दी है।
उच्चतम न्यायालय के जस्टिस सिकरी की अध्यक्षता में डबल बेंच ने यह जमानत दी है। पत्रकार संतोष यादव की ओर से मामले की सुनवाई के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोनसालविज अदालत में पेश हुए थे।
पत्रकार संतोष यादव के खिलाफ मामला मुख्य रूप से एक पुलिस अधिकारी की गवाही पर टिकी हुई थी, जिसने अपने बयान कहा था कि उसने रात की रोशनी में सौ से अधिक माओवादी लड़ाकुओं के बीच संतोष यादव की पहचान की थी, लेकिन पहचान परेड के दौरान पुलिस अधिकारी संतोष यादव की पहचान नहीं कर पाए।
गौरतलब है कि पत्रकार संतोष यादव को 29 सितम्बर 2015 को गिरफ्तार किया गया था। उन पर 21 अगस्त 2015 को माओवादी सशस्त्र समूहों द्वारा सुरक्षा बलों पर हुए हमले में शामिल होने का आरोप है। राजस्थान पत्रिका पत्र समूह के दरभा इलाके के प्रतिनिधि को पुलिस ने माओवादियों के साथ कथित संपर्क के आरोप में टाडा और पोटा से भी खतरनाक माने जाने वाले ‘छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा कानून’ के तहत गिरफ्तार किया था।
वहीं, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया का कहना था कि घटना की एफआईआर में दोषी लोगों की सूची में संतोष यादव का नाम दर्ज नहीं है। राज्य पुलिस ने उनके पास से बरामद लाल और हरे रंग के कपड़े व अन्य कुछ सामग्रियों को ‘सबूत’ के तौर पर पेश करके़ उनके माओवादी होने का दावा किया है।
संतोष यादव ने एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया को अगस्त 2016 में बताया था कि उन्हें जेल में एक कैदी द्वारा जान से मारने की धमकी भी दी गई थी। उनके वकील ने यह भी आरोप लगाया है कि जून 2015 में उन्हें राज्य पुलिस द्वारा निर्वस्त्र करके अपमानित किया गया था।
पत्रकारों के लिए नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में काम करना काफी मुश्किल होता जा रहा है। वहां के पत्रकार कई तरह के दबाव में काम कर रहे हैं। एक तरफ तो माओवादियों का दबाव है, वहीं पुलिस भी उनका उत्पीड़न करने में पीछे नहीं है। हाल के दिनों में कई पत्रकारों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया जा चुका है, वहीं कई पत्रकारों को इलाका छोड़ने की धमकी भी दी गई है। कई मामलों में तो पत्रकारों पर नक्सलियों का समर्थन करने का आरोप भी लगाया गया है।
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