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जल्‍द बदलने जा रही है पत्रकारिता की सूरत व सीरत: शशि शेखर

माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय के नोएडा सेक्‍टर 62 स्थित स्‍थानीय परिसर में

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

अभिषेक मेहरोत्रा ।।

माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय के नोएडा सेक्‍टर 62 स्थित स्‍थानीय परिसर में शुक्रवार को नवागत विद्यार्थियों के प्रबोधन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्‍य अतिथि व 'हिन्‍दुस्‍तान मीडिया ग्रुप' के प्रधान संपादक शशि शेखर ने छात्रों को पत्रकारिता की बारीकियों और इसकी चुनौतियों से अवगत कराया। उन्‍होंने कहा कि अपनी व्‍यस्‍तता के बावजूद आज यहां के कार्यक्रम में वह इसलिए आए हैं, क्‍योंकि वह समझते हैं कि नई फसल (नए छात्रों) को 'खाद-पानी' देने की जिम्‍मेदारी हमारी भी है।

अतीत के साथ आगे बढ़ने की भी सोच रखें:  शशि शेखर ने कहा, 'मुझे आज भी वह दिन याद है, जब 1980 में मैं एक अखबार में काम करता था। उस समय उस अखबार के दफ्तर में हिंदी के जाने-माने पत्रकार बाबूराव विष्णु पराड़कर के साथ काम किए हुए कई लोग कार्यरत थे। ऐसे में अपने कामकाज के दौरान दिनभर में वे लोग कई बार पराड़कर जी का नाम लेते थे। इस बात पर फिर मैंने उन्‍हें किसी तरह समझाया। कहने का मतलब है कि वे लोग सिर्फ अतीत पर चल रहे थे, जबकि आगे की नहीं सोच रहे थे। जबकि जीवन में हमेशा आगे बढ़ने की सोच रखनी चाहिए।  


बदलने जा रही है पत्रकारिता की पूरी सूरत : जब मेरी उम्र महज 20 वर्ष थी और मैं एमए में पढ़ता था। उस समय मैं पुरातत्‍ववेत्‍ता (आर्कियोलॉजिस्‍ट) बनने का सपना देखा करता था। तब से लेकर अब तक मेरा मानना है कि हर नई टेक्‍नोलॉजी नौजवानों के लिए उम्‍मीदों के नए दरवाजे खोलती है।मुझसे एक दिन किसी ने कहा कि टेक्‍नोलॉजी चेंज होने वाली है। इसलिए मैंने तय किया कि चलो अब यही काम करते हैं। आज टेक्नोलॉजी ही नहीं, पत्रकारिता की पूरी शक्‍ल-सूरत और सीरत बदलने जा रही है। अब बड़े मीडिया संस्‍थान पहले जैसे नहीं रहे हैं। यहां नौकरियां धीरे-धीरे खत्‍म होती जा रही हैं। आपको ध्‍यान होगा कि पुराने जमाने में जिस तरह डायल करने वाला फोन चलता था, वह अब बिल्‍कुल बदल चुका है। देखते ही देखते डाकिए ने भी घर का दरवाजा खटखटाना बंद कर दिया है। देखते ही देखते टाइपराइटर भी खत्‍म हो गया है। मेरा मानना है कि आज से पांच-छह साल के अंदर आपका मोबाइल ही आपकी जिंदगी बन जाएगा।

हालांकि बन तो यह आज भी गया है लेकिन आने वाले समय में तो पूरी तरह आपकी जिंदगी इसी पर निर्भर होगी। इसमें आपके हाथ में ही एक चिप लगा दी जाएगी और आप अपनी हथेली के द्वारा ही इसे ऑपरेट कर सकेंगे। यानी जिस तरह पुराने जमाने में ऋषि-मुनि कहते थे कि मैं ही ब्रह्म हूं, मुझे ऐसा लगता है कि उसी तरह आपका ब्रह्मांड आपकी हथेली में समाया होगा। आपके पास कैमरा होगा, एडिट करने के साधन होंगे और आप चलते फिरते ऐसे व्‍यक्ति में तब्‍दील हो जाएंगे कि जो चाहे-जैसे चाहे खबर कवर कर लो।

नई दुनिया के सपने देखें : आप सभी को नई टेक्‍नोलॉजी के साथ सामंजस्य बिठाकर चलना है। यदि आपने अभी इसके बारे में नहीं सोचा है तो आज से ही सोचना शुरू कर दें। मेरा मानना है कि जितने आप आने वाली नई दुनिया के सपने देखेंगे, उतने ही आपके लिए रास्‍ते बनेंगे। जब सिकंदर ने विश्‍व विजय के बारे में सोचा और दुनिया के महान दार्शनिकों में शुमार अपने गुरु से इसकी चर्चा की तो गुरु ने ग्‍लोब दिखाते हुए कहा कि इतनी बड़ी दुनिया में तुम कहां जाओगे। इस पर सिकंदर ने अपनी तलवार से उस ग्‍लोब को चीर दिया और कहा कि मैं नया ग्‍लोब बनाऊंगा। कहने का मतलब है कि जब उस जमाने में सिकंदर ने ऐसा सोचा तो आप तो नई पीढ़ी के हैं और सपने देखने के लिए स्‍वतंत्र हैं। इसके अलावा टेक्‍नोलॉजी का सपोर्ट भी हम सभी को मिल रहा है। ऐसे में आपको सपने देखकर उन्‍हें पूरा करना है।


बुरी चीज नहीं है बाजार : आज 'बाजार' शब्‍द को स्‍कूलों में काफी बुरे तरीके से बोला जाता है। लेकिन मेरा मानना है कि ऐसा करना ठीक नहीं है। आज यदि बाजार सच्‍चाई है तो इस सच्‍चाई से मुंह मोड़ने का कोई मतलब नहीं है। बाजार को गंदा तालाब बनने से रोकना हमारी जिम्‍मेदारी है लेकिन बाजार को गंदा तालाब मानकर उसमें उतरने से संकोच नहीं करना चाहिए। यह दुनिया पलायनवादियों के लिए नहीं है। यह दुनिया किसी पलायनवादी ने नहीं बल्कि उद्यमियों ने बनाई है। इस दुनिया का हिस्‍सा और एक पत्रकार होने के नाते इस बात को याद रखना कि बाजार कोई बुरी चीज नहीं है।

कभी न छोड़ें सच का साथ : आप लोगों को दो बातें जरूर याद रखनी चाहिए। पहली ये कि खबर का अकेला प्राण तत्‍व और उसकी सांस सत्‍य है। ऐसे में जाने-अनजाने किसी भी रूप में प्रोफेशनल तरीके से सत्‍य का संधान करते रहना चाहिए। यानी उसका साथ नहीं छोड़ना चाहिए। सत्‍य के प्रति आप जितनी आस्‍था बनाकर रखेंगे, उतना ही जनता आपका यकीन करेगी।

हर संघर्ष के पीछे छिपा रहता है नया अवसर : आजकल फेकन्‍यूज का बहुत बोलबाला है। कहा जाता है कि आजकल बड़ा झूठ बोला जा रहा है। ऐसा है तो मेरी नजर में यह अच्‍छा है क्‍योंकि सच बोलने वालों की अहमियत तो तभी पता चलेगी जब झूठ बोलने वाले होंगे। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि यदि रावण नहीं होता तो राम को कौन पूछता। यदि कंस नहीं होता तो कृष्‍ण कैसे होते। कभी-कभी मुझे लगता है कि हम अक्‍सर अवसादों को अपने चारों ओर घेरे रहते हैं जबकि हर संघर्ष और हर बुराई और हर कठिन समय हमारे सामने चुनौती देता रहता है और हमें एक अवसर मुहैया कराता है। मैंने आपको नई उमर की नई फसल इसलिए कहा कि मुझे ऐसा लगता है कि आने वाला समय जब आपका हो और आपको टेक्‍नोलॉजी का भी सपोर्ट मिल रहा हो तो इस अवसर का लाभ जरूर लेना चाहिए।

सोशल मीडिया आपका साथ देगी : आज की युवा पीढ़ी को एक बात और ध्‍यान रखनी चाहिए कि जब दुनिया में कोई आविष्‍कार होता है और दुनिया तेजी से आगे बढ़ती है तो उसके साथ बहुत बुराइयां भी आते हैं। ऐसे में जब आप इनसे लड़ने के लिए पत्रकारिता की मशाल लेकर खड़े होंगे तो फिर चाहे आप अकेले ही क्‍यों न हों, दुनिया के हजारों लोग लाइक और कमेंट्स के जरिये आप का साथ देंगे। ये भूमंडलीयकरण की शुरुआत होगी और आप उस दुनिया का हिस्‍सा बनने के लिए तैयार रहिए।

काम से बनती है पहचान : एक आखिरी बात और आपसे कहना चाहता हूं कि पत्रकारिता न जाने कब और कैसे ग्‍लैमर में तब्‍दील हो गई, पता ही नहीं चला। पत्रकारिता पद व लोकप्रियता आदि से नहीं पहचानी जाती है, क्‍योंकि ये सब चीजें तो आती-जाती रहती हैं। आप लोग शायद ही फिल्मी दुनिया में मशहूर रहे 'मोतीलाल जी' का नाम जानते होंगे, लेकिन मैं आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मोतीलाल जी हिंदी सिनेमा के पहले ऐसे स्‍टार थे जिन्‍होंने टेक्‍नोलॉजी के हिसाब से लोगों को डायलॉग डिलीवरी सिखाई। राजकपूर और दिलीप कुमार व देवानंद उन्‍हें अपनी फिल्‍मों में लेने के लिए इस कदर बेताब रहते थे जैसे बाद के दिनों में अभिनेता प्राण हो गए थे और आज अमिताभ बच्‍चन हो गए हैं। कहने का मतलब है कि नाम उन्‍हीं लोगों के याद रहते हैं, जिन्‍होंने कुछ ठोस काम किया हो।


सरकार गिरा देती है सच्ची पत्रकारिता : पत्रकारिता और सच्‍चाई का कितना प्रभाव पड़ता है, इसे मैं आपको विएतनाम की एक घटना से बताता हूं। उस समय एक आठ साल की बच्‍ची की फोटो किसी फोटोग्राफर ने खींची थी, जिसमें उसके पीछे बमों के धमाके हो रहे थे आग उठ रहे थे और वह निर्वस्‍त्र दौड़ रही थी। जिस दिन वह फोटो अमेरिकी अखबारों में छपी, उसी दिन तय हो गया अब युद्ध नहीं होगा। अमेरिका के लोग विएतनाम के पक्ष में आ गए थे। इसी तरह द्वितीय विश्‍वयुद्ध के दौरान छपी एक फोटो से लोगों के मन में हिटलर के प्रति घृणा काफी बढ़ गई थी।

इंसानियत है तो पत्रकारिता है : मैं आप लोगों से कहना चाहता हूं कि इंसानियत है तो पत्रकारिता है और पत्रकारिता है तो आप और हम हैं। और यदि हम और आप हैं तो पत्रकारिता है। साहिर लुधियानवी की चार पंक्तियों से मैं अपनी बात समाप्‍त करना चाहता हूं...

कल और आएंगे नगमों की खिलती कलियां चुनने वाले

मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले।

तू अपनी अदाएं बख्‍श इन्हें, मैं अपनी वफाएं देता हूं,

जो अपने लिए सोची थी कभी वो सारी दुआएं देता हूं।

 


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