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जब वरिष्ठ पत्रकार डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट को किया गया याद...
उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक चिंतक, विचारक और प्रमुख राज्य...
समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक चिंतक, विचारक और प्रमुख राज्य आंदोलनकारी डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट का बीते शनिवार को निधन हो गया था। करीब 71 वर्षीय डॉ. बिष्ट ने शनिवार तड़के अल्मोड़ा में अंतिम सांस ली। दिल्ली के रायसीना रोड पर स्थित प्रेस क्लबमें 28 सितम्बर शाम 4 बजे उनकी भावभीनी श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया, जहां तमाम पत्रकारों ने उनके निधन पर गहरा दुःख व्यक्त किया और इसे उत्तराखंड की अपूरणीय क्षति बताया।
उत्तराखंड जनसंघर्ष वाहिनी के अध्यक्ष रहे डॉ. बिष्ट का जन्म फरवरी-1947 में अल्मोड़ा जिले में स्याल्दे क्षेत्र के खटल गांव में हुआ था। उनका राजनीतिक सफर 1972 में अल्मोड़ा कॉलेज के छात्रसंघ अध्यक्ष के तौर पर शुरू हुआ।
विश्वविद्यालय आंदोलन, चिपको आंदोलन व उत्तराखंड आंदोलन में अग्रणी और कई मोर्चों पर नेतृत्वकारी भूमिका निभाने वाले डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट 1980 के दशक में चले ‘नशा नहीं-रोजगार दो’ आंदोलन का भी प्रमुख स्तम्भ रहे। डॉ. बिष्ट को हर तरह के माफिया राज के खिलाफ आवाज उठाने के लिए भी जाना जाता है।
1989 में जब पौड़ी के पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या हुई और शराब माफिया के खौफ के चलते कोई आवाज नहीं उठा पा रहा था, तब डॉ. बिष्ट कुमायूं से पौड़ी पहुंचे और चंद लोगों के साथ जुलूस निकाला। इसके बाद पहाड़ से ले कर मैदान तक बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ और सरकार को पत्रकार हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंपनी पड़ी थी।
डॉ. बिष्ट उत्तराखंड राज्य आंदोलन से 1070 के दजशक के उत्तरार्ध और 1980 के दशक के उस शुरुआती दौर से जुड़े रहे हैं, जब बहुत कम लोग ही इस मांग को उठा रहे थे। 1980 के दशक में दिल्ली से निकलने वाली हिमालयन कार रैली को उत्तराखंड राज्य की मांग के समर्थन में जब रोका गया और पहाड़ पर न घुसने देने के लिए कई जगह रैली का विरोध हुआ, तब डॉ. बिष्ट उस आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं में प्रमुख थे।
अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय गढ़वाल-कुमाऊं की एकता और पूरे अंचल के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश को समझने के लिए "पहाड़" के प्रमुख डॉ. शेखर पाठक के नेतृत्व में 1974 में आरम्भ हुई करीब एक हजार किलोमीटर की अस्कोट-आराकोट पदयात्रा अभियान में वे शामिल रहे।
इस पदयात्रा में प्रख्यात पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा समेत तत्कालीन उत्तर प्रदेश के इस पर्वतीय अंचल के कुछ अन्य सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी भी शामिल हुए। प्रत्येक 10 वर्ष में आयोजित होने वाले अस्कोट-आराकोट अभियान में डॉ. बिष्ट आगे भी लगातार शामिल रहे।
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