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क्राइम न्यूज पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, अब मीडिया के लिए तय करेगा गाइडलाइंस...
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। सुप्रीम कोर्ट ने ‘मीडिया ट्रायल’ की वजह से किसी व्यक्ति को होने वाले नुकसान को गंभीरता से लिया है। कोर्ट अब पुलिस द्वारा मीडिया में दी जाने वाली अपराध की खबरों पर गाइडलाइन जारी करेगा। यानी अब गिरफ्तारी क
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
सुप्रीम कोर्ट ने ‘मीडिया ट्रायल’ की वजह से किसी व्यक्ति को होने वाले नुकसान को गंभीरता से लिया है। कोर्ट अब पुलिस द्वारा मीडिया में दी जाने वाली अपराध की खबरों पर गाइडलाइन जारी करेगा।
यानी अब गिरफ्तारी के बाद किसी आरोपी की मीडिया परेड होगी या नहीं, यह सुप्रीम कोर्ट तय करेगा। आरोपी और पीड़ित की पहचान को लेकर भी गाइडलाइन जारी की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट अब यह भी तय करेगा कि पुलिस आपराधिक मामलों में मीडिया को किस तरीके से और कितनी जानकारी जारी करे।
चीफ जस्टिस जे.एस. खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि किसी आपराधिक मामले में जब एफआईआर दर्ज की होती है और आरोपी गिरफ्तार किया जाता है, उसके बाद पुलिस संवाददाता सम्मेलन कर आरोपियों को मीडिया के समक्ष पेश करती है। इस आधार पर मीडिया में आरोपियों के बारे में खबरें चलती हैं, लेकिन यदि बाद में आरोपी बेकसूर साबित होता है तब तक उस व्यक्ति की साख पर बट्टा लग चुका होता है। पीठ ने कहा कि यह एक गंभीर मसला है और किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और उसकी छवि से जुड़ा है, लिहाजा इस पर अंकुश लगाने की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कुछ सवालों के केंद्र सरकार और सब राज्य सरकारों से दो हफ्ते में जवाब मांगा है। पूछा गया है कि एफआईआर दर्ज होने से पहले मीडिया को आरोपी और अपराध के बारे में कितनी जानकारी दी जाए? एफआईआर दर्ज होने के बाद मीडिया को आरोपी के बारे में किस हद तक जानकारी दी जा सकती है? आरोपी के गिरफ्तार होने पर क्या उसकी फोटो या वीडियो दिया जा सकता है? क्या मीडिया के सामने परेड कराई जा सकती है? पीड़ित की पहचान संबंधी ब्यौरा दिया जा सकता है? किसी मामले की जांच से जुड़े ब्योरे को मीडिया के साथ साझा किया जा सकता है? किस हद तक? ऐसा मामला जिससे सामुदायिक हिंसा भड़कने की आशंका हो तो मीडिया को घटना के बारे में किस हद तक ब्यौरा दिया जाए? ऐसी सूचना जिससे अपराध करने वाला पुलिस से बचने के लिए सतर्क हो जाए, कैसे मीडिया को दी जाए? महिलाओं के साथ होने वाले यौन संबंधी अपराधों में पीड़िता और उसकी किसी भी तरह की पहचान वाला ब्यौरा मीडिया को दिया जाए? ऐसे मामले जिनमें नाबालिग शामिल हो, उनमें क्या किया जाए? क्या हर थाने में पुलिस प्रवक्ता नियुक्त किया जाए या फिर किस स्तर का पुलिस अफसर मीडिया को ब्रीफ करे?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जो कोई जवाब दाखिल नहीं करेगा तो यह समझा जाएगा कि उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं है।
पीठ ने कहा कि यह याचिका वर्ष 1999 से लंबित है, इस मसले को और नहीं टालना चाहते। लिहाजा 22 मार्च को इस पर अंतिम सुनवाई करने का निर्णय लिया है।
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