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प्रिंट और टेलिविजन पर रेडियो पड़ रहा है भारी, जानें कैसे  

समाचार4मीडिया ब्‍यूरो ।।  रेडियो काफी पुराना माध्‍यम है लेकिन यह अभी भी लोगों की पसंद बना हुआ है। हाल ही में आई ‘AZ Research’ की रिपोर्ट के अनुसार, देश की 64 प्रतिशत से ज्‍यादा आबादी रोजना एफएम रेडियो को सुनती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि एफएम रेडियो की सहज उपलब्

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

समाचार4मीडिया ब्‍यूरो ।।

 रेडियो काफी पुराना माध्‍यम है लेकिन यह अभी भी लोगों की पसंद बना हुआ है। हाल ही में आई ‘AZ Research’ की रिपोर्ट के अनुसार, देश की 64 प्रतिशत से ज्‍यादा आबादी रोजना एफएम रेडियो को सुनती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि एफएम रेडियो की सहज उपलब्‍धता के कारण ही इसके श्रोताओं की संख्‍या में बढ़ोतरी हुई है।

 रेडियो के इस्‍तेमाल को लेकर हुई इस रिसर्च ने इस धारणा को झुठला दिया है कि रेडियो का इस्‍तेमाल सिर्फ सेक्‍शन सी (Sec C) के उपभोक्‍ताओं द्वारा किया जाता था। इस रिपोर्ट के मुताबिक रेडियो में सेक्‍शन सी का इस्‍तेमाल सिर्फ 51 प्रतिशत है जबकि सेक्‍शन ए और बी में यह प्रतिशत 72 प्रतिशत है। रिपोर्ट में दूसरा सबसे बड़ा खुलासा श्रोताओं के व्‍यवहार को लेकर किया गया है। इसके अनुसार, 71 प्रतिशत से ज्‍यादा श्रोता निर्धारित समय पर निर्धारित चैनल को सुनना पसंद करते हैं जिससे उसकी विश्‍वसनीयता का पता चलता है। ऐसे श्रोता जो बार-बार चैनल बदलते रहते हैं, उनकी संख्‍या सिर्फ 16 प्रतिशत बताई गई है।

 यदि हम रिकॉल (recall) के दृ‍ष्टिकोण से बात करें अर्थात श्रोताओं अथवा दर्शकों को कार्यक्रम को लेकर कितना ध्‍यान रहता है तो यह संख्‍या टेलिविजन के मुकाबले रेडियो में ज्‍यादा है। रेडियो में जहां यह 43 प्रतिशत सही है वहीं टेलिविजन पर सिर्फ 22 प्रतिशत ही सही है। सिर्फ रेगुलर श्रोता ही बता सके कि प्रोग्राम का नाम क्‍या है, आरजे कौन है, कार्यक्रम का मुख्‍य स्‍पॉन्‍सर कौन है और यहां तक कि एफएम चैनल पर कौन सी प्रतियोगिताएं (contests) चलाई जाती हैं। इस बात से साफ पता चलता है कि टेलिविजन और प्रिंट के मुकाबले एफएम रेडियो कितना सशक्‍त माध्‍यम बना हुआ है।

इस रिसर्च के बारे में AZ Research Pvt Ltd के मैनेजिंग डायरेक्‍टर सुजॉय मिश्रा का कहना है, ‘रेडियो का मार्केट काफी अच्‍छा है लेकिन आमतौर पर इसे कम आंका जाता है। हालांकि मार्केटर्स अब इसका महत्‍व समझ रहे हैं और इस पर फोकस कर रहे हैं। मेरा विश्‍वास है कि न सिर्फ वे रेडियो पर ज्‍यादा खर्च करेंगे बल्कि ब्रैंड बिल्डिंग कैंपेन (brand building campaigns) पर भी ज्‍यादा फोकस करेंगे।’

इस रिपोर्ट के अनुसार, रेडियो का चलन सबसे ज्‍यादा 94 प्रतिशत बेंगलुरु में है। हालांकि टीयर टू (tier 2) शहर जैसे जयपुर (89%) और लखनऊ (82%) भी इस दौड़ में ज्‍यादा पीछे नहीं हैं। यदि हम इसके इस्‍तेमाल (consumption) के तरीके की बात करें तो मोबाइल फोन पर यह 71 प्रतिशत, रेडियो सेट पर 53 प्रतिशत और इंटरनेट पर 21 प्रतिशत है। इसके अलावा रिपोर्ट के द्वारा यह समझाने की कोशिश की गई है कि एफएम रेडियो को लेकर मार्केटर्स और मीडिया बॉयर्स में किस तरह के भ्रम हैं और वास्‍तविक स्थिति क्‍या है। इस स्‍टडी में अहमदाबाद, पुणे, हैदराबाद, चेन्‍नई, जयपुर, लखनऊ और बेंगलुरु शहर के सेक्‍शन ए, बी और सी कैटेगरी के 14 से 50 साल की उम्र के 45000 लोगों को शामिल किया गया था।

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