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वरिष्ठ पत्रकार शाजी जमां कुछ यूं सामने लाए हैं मुगल शासक अकबर के 'मन की बात'

भारत पर राज करने वाले मुगल शासक अकबर के बारे में अगर आपको बहुत अधिक जानने की उत्सुकता है तो एबीपी समूह के रीजनल चैनलों के संपादक शाजी जमां का उपन्यास पढ़ सकते हैं, जिसने हाल ही में मार्केट में दस्तक दे दी है। करीब दो दशकों की रिसर्च और पिछले 8 सालों के लेखन के बाद शाजी जमां के उपन्यास ‘अकबर’ ने आकार लिया तो इसकी खासि

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

भारत पर राज करने वाले मुगल शासक अकबर के बारे में अगर आपको बहुत अधिक जानने की उत्सुकता है तो एबीपी समूह के रीजनल चैनलों के संपादक शाजी जमां का उपन्यास पढ़ सकते हैं, जिसने हाल ही में मार्केट में दस्तक दे दी है। करीब दो दशकों की रिसर्च और पिछले 8 सालों के लेखन के बाद शाजी जमां के उपन्यास ‘अकबर’ ने आकार लिया तो इसकी खासियत यही है कि इसका एक भी तथ्य ऐसा नहीं जो ऐतिहासिक रूप से सत्य न हो। अकबर उपन्यास की खासियत इसकी लेखनी में है।

शाजी जमां का कहना है, ‘अकबर के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को समझने के लिए बाबरनामा, अकबरनामा और हुमायूंनामा प्राथमिक स्त्रोत है। उसके साथ ही साथ मुगल मिनिअेचर को पढ़ना भी जरूरी है। हालांकि अकबर के जीवन पर रिसर्च करने के लिए मैं अपना समय उसकी बनाई और उसके जीवन से जुड़ी इमारतों की खोजबीन में लगाया। इससे मैंने अकबर के समय को अच्छे से महसूस किया।’

शाजी जमां ने इसके लिए कलकत्ता के इंडियन म्यूजियम से लेकर लंदन के विक्टोरिया और अल्बर्ट म्यूजियम तक की यात्राएं की और हर एक छोटी से छोटी पेंटिंग से लेकर अकबर और उसके समकालीन मुगल स्थापत्य का गहराई से अध्ययन किया।

किताब में प्रकाशित एक कहानी को आप यहां भी पढ़ सकते हैं-                

सिंधु नदी के किनारे बादशाह सलामत का खेमा लगा था। रात का वक्त था और शाही लश्कर के बीचोबीच आकाश दीया चमक रहा था। बादशाह सलामत अपनी दोआशियाना मंजिल में पादरी मोन्सेराते के साथ बैठे ये देख रहे थे कि नक्शे पर पुर्तगाल उनकी सल्तनत से कितना दूर है।

एकाएक बादशाह सलामत ने सर उठा कर पादरी मोन्सेराते से पूछा, ‘पादरी शादी क्यों नहीं करते? क्या ये खुदा का हुक्म नहीं है कि सभी मर्दों की बीवियां होनी चाहिए? ऐसा लगता है कि आप या तो शादी के खिलाफ हैं या अपनी ही बात को झुठलाते हैं... शादी नहीं करना भी अच्छा है और शादी करना भी अच्छा है।’

पादरी मोन्सेराते ने जवाब दिया, ‘हजरत बादशाह नहीं जानते कि दो अच्छी बातों में एक अक्सर ज्यादा बेहतर होती है? जैसे चांदी अच्छा है, लेकिन सोना और ज्यादा अच्छा। अक्ल सोने से बेहतर है और चरित्र सबसे बेहतर। चांद खूबसूरत है, लेकिन सूरज और भी ज्यादा।’

बादशाह सलामत सहमत हुए तो पादरी मोन्सेराते ने कहा, ‘पादरी शादी नहीं करते ताकि वो इससे बेहतर काम कर सकें। ईसा मसीह जैसा बनें। बीवी-बच्चों और परिवार की परेशानियों के बिना सभी ख्वाहिशों से ऊपर उठ कर जिएं। छठे खुदाई हुक्म के मुताबिक ईसाइयों को बल्कि पूरी इंसानियत को ऐशो आराम मना है।’

बादशाह सलामत ने पूछा, ‘आप लोग ये कहते हैं ना कि ईसा खुदा हैं! तो ये उम्मीद करना गुस्ताखी नहीं है कि आप उन जैसे होना चाहते हैं?’ पादरी ने जवाब दिया, ‘हम ये मानते हैं कि ईसा खुदा हैं, लेकिन इसके साथ हम ये भी कहते हैं कि वो इंसान हैं। बतौर इंसान शादी नहीं कर के उन्होंने हमारे लिए मिसाल कायम की है और इंजील मुकद्दस में शादी नहीं करने को बहुत अच्छा माना गया है। जहां तक खुदा होने की बात है, कोई गुरूर वाला ही होगा जो ईसा जैसा होना चाहेगा। ये तो नामुमकिन मंसूबा है। और ये मंसूबा रखना पागलपन की इंतिहा जाहिर करता है। लेकिन दूसरी तरफ इससे इबादत और भक्ति जाहिर होती है और हम उनके नक्शे कदम पर चल कर उन खूबियों को अपनी जिंदगी में उतार रहे हैं, जो उनकी जिंदगी में थीं। आखिर उनके इंसान बनने की कई वजहों में से एक ये भी थी कि हम सच्ची इंसानियत की उनकी खूबियों को अपनाएं, जैसे विनम्रता, त्याग, पवित्रता, गरीबी, फरमाबरदारी और इससे जुड़ी हुई और खूबियां। कितनी ही बारीकी और एहतियात से काम करने वाला चित्रकार कुदरत जैसा नहीं बना सकता। वो तो यही कहेगा कि उसे कुदरत की खूबी और मजबूती हासिल करनी है। देखा गया है कि हम सभी अपने दिलों में पूरी जद्दोजहद करते हैं कि हम उन खूबियों में ईसा मसीह जैसे हो जाएं जो खूबियां इंसान पा सकता है। फिर भी हम काफी पीछे छूट जाते हैं। उन जैसा होने की कोशिश को ईसा मसीह बहुत पसंद करते हैं। इसे कतई गुरूर या गुस्ताखी नहीं माना जाता।’ इस पर बादशाह सलामत ने कहा, ‘तो आदम से जो सिलसिला शुरू हुआ वो आप तक आकर खत्म हो जाएगा?’

पादरी मोन्सेराते बोले, ‘अगर मैं आठ बरस की उम्र में मर जाता या ठीक शादी के वक्त मर जाता? क्या होता अगर मेरी बीवी मां बनने के काबिल ना होती या मैं बाप बनने के काबिल, जैसे कि कई लोग होते हैं? क्या होता अगर किन्नर पैदा होता या बना दिया जाता, जैसे कि आपके महल में कई हैं? हजरत बादशाह गलती से ऐसा ना समझें कि शादी करने की हिदायत दी गई है। बेशक खुदा ने कुदरती उसूलों के तहत शादी करने पर जोर दिया है ताकि इंसानी नस्ल बढ़े। और हजरत मूसा के कानून के मुताबिक, यहूदियों में भी, ताकि दीन और असली खुदा की इबादत बढ़ती रहे... लेकिन इंजील मुकद्दस के कानून के मुताबिक, जो सभी कानून से वैसे ही बेहतर है, जैसे कोई भी चीज अपनी परछाईं से बेहतर है। इंसानी नस्ल के मुनासिब तौर पर बढ़ जाने के बाद, ईसा मसीह ने शादी के मामले में ये उसूल तय किया कि हर इंसान मर्जी से तय करे और मर्जी से रुक जाए जहां चाहे।’ बादशाह सलामत ने रोक कर कहा, ‘अगर खुदा ने किसी को नदी पार करने का हुक्म दिया है तो गुनाहगार होगा, अगर ऐसा ना करे।’

पादरी ने कहा, ‘सही है। लेकिन जैसा मैंने कुछ ही पल पहले कहा, शादी करने की हिदायत नहीं है। ना ही ये सोचना ठीक होगा कि जो शादी नहीं करते, उनकी औलाद नहीं होगी। रूहानी औलाद होती है। जिनको इंसान ईसाइयत के उसूलों और खूबियों के बारे में बताता है वो एक तरह से उसके बच्चे ही कहलाए, क्योंकि जिनका वो बप्तिस्मा करता है, जो उसके सामने अपने पाप को स्वीकार करते हैं, वो उन रूहानी बच्चों से कम नहीं हुए, जिन्हें वो अपने जिस्म से पैदा करता है। मुझे ये कहने की इजाजत दीजिए ऐ बादशाह कि अगर आप रूडॉल्फ और मेरी सलाह मानें और हमारी बात पर यकीन करें और रूडॉल्फ के हाथों आपका बप्तिस्मा हो तो आप सही और रूहानी तौर पर हुमायूं बादशाह से ज्यादा रूडॉल्फ के बेटे होंगे। हां ये जरूर हो सकता है कि कुछ को मजबूरन शादी करनी पड़े।’

‘जैसे कौन?’ बादशाह सलामत ने पूछा। ‘एक बादशाह, जिसे सल्तनत की सुख शांति के लिए वारिस चाहिए।’

सिंधु नदी के किनारे फौज पचास दिन रुकी। बादशाह सलामत ने पास के जंगल में शिकार कर के अपना वक्त गुजारा। इस दौरान पादरी मोन्सेराते से मुलाकातें होती रहीं, क्योंकि बादशाह सलामत के पास सवालों की लम्बी फेहरिस्त थी।

एक रात बादशाह सलामत ने पूछा, ‘कयामत कब आएगी? क्या ईसा मसीह इंसाफ करेंगे?’ पादरी मोन्सेराते बोले, ‘खुदा ही जानता है कि कयामत कब आएगी। उसकी समझ हमारी पकड़ से बहुत दूर है और इस समझ के मुताबिक उसने ये बात हम से छुपा के रखी है। ईसा मसीह ने भी अपने शगिर्दों को ये बताने से इंकार किया। वो ये नहीं चाहते थे कि हम ये समझ के गाफिल हो जाएं कि कयामत बहुत दूर है या ये सोच के दुखी हो जाएं कि बहुत पास है। लेकिन वो चाहते थे कि हम उस दिन की तैयारी करें और उन नेमतों का सही इस्तेमाल करें, जो उन्होंने हमें दी हैं, और ना जानते हुए भी कि कयामत कब आएगी उस दिन से डरें और गुनाह से दूर रहें और जिन चीजों की मनाही है उनसे दूर रहें, लेकिन ऐसे इशारे मिलेंगे कि लोग अच्छी तरह समझ पाएंगे कि कयामत पास है।’

बादशाह सलामत ने पूछा, ‘किस तरह के इशारे?’ पादरी ने जवाब दिया, ‘ईसा मसीह ने कहा है कि जंग, बगावत, सल्तनतों और मुल्कों का खत्म होना, हमले, तबाही, एक मुल्क का दूसरे मुल्क और एक सल्तनत का दूसरी सल्तनत पर कब्जा... और ये सब हम अपने दौर में बहुत होता हुआ देख रहे हैं।’

पादरियों का वक्त गुजरता गया लेकिन ना तो वो बादशाह सलामत को पूरी तरह समझ पाए, ना ही उन्हें समझा पाए।

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