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जानिए, महिलाओं के प्रति क्या है पत्रकारिता के छात्रों की सोच...
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। आधुनिक दौर में आज की सशक्त महिलाएं न केवल घर की चार दीवारी से बाहर निकल कर अपना अस्तित्व निखार रही हैं, बल्कि देश की तरक्की में भी अपनी अहम भूमिका निभा रही हैं, लेकिन महिलाओं के प्रति भारतीय समाज का नजरिया तो बदला है, लेकिन संकीर्णता की स्थ
समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 years ago
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आधुनिक दौर में आज की सशक्त महिलाएं न केवल घर की चार दीवारी से बाहर निकल कर अपना अस्तित्व निखार रही हैं, बल्कि देश की तरक्की में भी अपनी अहम भूमिका निभा रही हैं, लेकिन महिलाओं के प्रति भारतीय समाज का नजरिया तो बदला है, लेकिन संकीर्णता की स्थिति अभी भी बरकरार है।
मीडिया स्टडीज ग्रुप (एमएसजी) की ओर से किए गए एक ताजा अध्ययन से पता चला है कि भारत में पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले छात्रों में महिलाओं के प्रति रवैये में बदलाव आ रहा है और उनकी सोच भी बदल रही है। इस अध्ययन में छात्रों द्वारा महिलाओं से जुड़ी कुछ बातों को स्वीकार किया जा रहा है, जबकि कुछ अन्य बातों को लेकर धारणा अब भी जस की तस बनी हुई है।
महिला दिवस के मद्देनजर ‘मीडिया स्टडीज ग्रुप’ ने देश के 11 यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों में महिलाओं के प्रति सोच जानने के लिए यह अध्ययन किया है। इस अध्ययन में करीब 150 छात्र शामिल हुए और इसमें कई दिलचस्प निष्कर्ष सामने आए हैं। इस अध्ययन में महिलाओं के प्रति युवा पत्रकारों की सोच और उनकी सुंदरता, कामकाज के अंदाज, परिवार में उनकी भूमिकाओं, उनकी राजनीतिक और आर्थिक सोच जैसे कई विषयों को शामिल किया गया है।
वरिष्ठ पत्रकार और एमएसजी के अध्यक्ष अनिल चमडि़या के मुताबिक, इन विश्वविद्यालयों में एमएसजी के सदस्यों ने सीधे छात्रों के बीच जाकर अध्ययन किया है। उन्होंने बताया कि शोधार्थी चेतना भाटिया इसकी कोर्डिनेटर हैं।
अध्ययन से पता चला कि महिलाओं की बाहरी सुंदरता को लेकर अब पत्रकारिता के छात्रों की सोच में बदलाव आया है और वे आंतरिक सौंदर्य की बात को स्वीकार करने लगे हैं। महिलाओं के घूमने-फिरने की आजादी को लेकर उनकी सोच थोड़ी राहत देने वाली है।
हालांकि, लड़कियों की बाहरी लुक जैसे गोरी होना, पतली होना सुंदरता मानी गई है, लेकिन ज्यादातर युवा पत्रकारों ने इसे खारिज किया है। करीब 29 प्रतिशत छात्रों ने माना कि महिलाओं की बाहरी सुंदरता कोई मायने नहीं रखती, हालांकि, 23 प्रतिशत छात्र इस बात से असहमत नजर आए।
दूसरी तरफ, पत्रकारिता के ज्यादातर छात्रों में अब भी यह सोच कायम है कि महिलाओं का बैंक खाता उनके अपने पति के साथ संयुक्त तौर पर ही रहे। करीब 31.8 प्रतिशत छात्रों की राय है कि महिलाओं का बैंक खाता संयुक्त ही रहे जबकि 24 प्रतिशत छात्र ऐसे भी है जो महिलाओं के अलग से खाता होने के पक्षधर हैं।
चमडि़या के मुताबिक, संयुक्त बैंक खाता इस बात की ओर इशारा करता है कि समाज अभी भी महिलाओं को आर्थिक तौर पर पूरी आजादी देने के पक्ष में नहीं है।
किए गए अध्ययन के मुताबिक, मीडिया के ज्यादातर स्टूडेंट्स का मानना है कि बच्चों की देखरेख के लिए मां जिम्मेदार हैं। इसके साथ ही वे महिलाओं को खाना बनाना, कपड़े धोना, साफ-सफाई, कपड़े प्रेस करना, खाना परोसना आदि कामों से जोड़ कर देखते हैं। ये सोच महिलाओं के घर की चारदीवारी में रखने के लिए काफी हैं। ज्यादातर युवा पत्रकारों का मानना है कि राजनीतिक में बेहतर अनुभव रखने के चलते पुरुष महिलाओं से आगे हैं।
अध्ययन के मुताबिक, युवा पत्रकार मानते हैं कि महिलाएं भावुक होती हैं और शादी करना चाहती हैं। वहीं 61.8 प्रतिशत छात्रों ने सहमति जताई कि वंश बढ़ाने के लिए महिलाओं को मां बनना जरूरी है। युवा पत्रकार महिलाओं के अपने ऊपर अधिकार को लेकर मिली-जुली राय रखते हैं। गर्भ निरोधक गोलियों के इस्तेमाल से उन्हें आपत्ति नहीं है। वहीं 52.1 प्रतिशत युवा पत्रकारों ने लड़कियों के घर के कामकाज में हाथ बंटाने के मुद्दे पर सहमति जताई।
बता दें कि इस अध्ययन में देश भर के 11 शिक्षण संस्थानों- ‘भारतीय जन संचार संस्थान’ (IIMC), ‘जामिया मिलिया इस्लामिया’, ‘श्री गुरु नानक देव खालसा कॉलेज’, ‘भीमराव आंबेडकर कॉलेज’, ‘विवेकानंद इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज’, ‘काशी विद्यापीठ’, ‘शारदा यूनिवर्सिटी’, ‘ओडिशा यूनिवर्सिटी’, ‘कलकत्ता यूनिवर्सिटी’, ‘जम्मू सेंट्रेल यूनिवर्सिटी’ और ‘गुरु घासीदास यूनिवर्सिटी’ को शामिल किया गया। यह अध्ययन मासिक शोध पत्रिका ‘मास मीडिया’ के नए अंक में प्रकाशित हुआ है।
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