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ILNA के जरिए परेश नाथ ने अखबार प्रकाशकों को दी ये सलाह...

नोटबंदी, जीएसटी, न्यूजप्रिंट के दामों में इजाफा और अब....

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

नोटबंदी, जीएसटी, न्यूजप्रिंट के दामों में इजाफा और अब डॉलर के मुकाबले रुपए की बिगड़ती सेहत ने मीडिया हाउस को परेशानी में डाल दिया है। इंडियन लैंग्वेज न्यूजपेपर एसोसिएशन (आईएलएनए) की कार्यकारी समिति की पिछले दिनों हुई बैठक में इसी मुद्दे पर विचार-विमर्श किया गया। बैठक में यह भी कहा गया कि उपरोक्त कारणों का सबसे ज्यादा प्रभाव छोटे शहरों व भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होने वाले अखबारों पर पड़ रहा है और सरकार इसे लेकर बिल्कुल भी गंभीर नहीं है। 

बैठक में मौजूद सदस्यों ने कहा कि डीएवीपी किसी न किसी बहाने से अखबारों को मिलने वाले विज्ञापनों पर कैंची चलाकर उन्हें खत्म करने में लगा है। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि डीएवीपी और आरएनआई ने मिलकर नियमों को इतना कठिन बना दिया है कि दिल्ली के बाहर के छोटे प्रकाशकों के लिए रिटर्न, बिल, वाउचर कॉपी आदि फाइल बहुत मुश्किल हो गया है।

सदस्यों ने यह भी कहा कि एक तरफ जहां जीएसटी के चलते छोटे समाचारपत्रों को भी नियमित रिटर्न के दायरे में लाया गया है, वहीं दूसरी तरफ अन्य प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं ने समाचार पत्रों को प्रकाशित करने की लागत में वृद्धि की है। कई समाचार पत्रों ने अपने पृष्ठ कम कर दिए हैं, जबकि कई ने मुफ्त प्रतियां या प्रोमोशनल कॉपी देना बंद कर दिया है। 

आईएलएनए के अध्यक्ष परेश नाथ ने कहा, मैं सभी सदस्यों को याद दिला सकता हूं कि संविधान समाचार पत्र प्रकाशन को बंधनमुक्त अधिकार प्रदान करता है और कई मौकों पर सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया गया है कि सरकार की ऐसी कोई कार्रवाई जो समाचार पत्रों को अपना सर्कुलेशन कम करने पर मजबूर करती है, अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत गलत है और वह अनुच्छेद 19 (2) द्वारा उचित प्रतिबंध के रूप में संरक्षित नहीं है। 

उन्होंने आगे कहा कि अनुच्छेद 19(1)(ए) का दायरा बहुत व्यापक है और यह दुख की बात है कि बड़ी संख्या में समाचार पत्र प्रकाशकों को यह नहीं पता कि वे जो कर रहे हैं वह केवल व्यवसाय ही नहीं बल्कि देश में लोकतंत्र को बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान भी है। जनता की राय न केवल टीवी चैनलों, शहरों तक सीमित बड़े समाचार पत्रों द्वारा निर्मित होती है, बल्कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले प्रकाशन आम जनता से ज्यादा संपर्क में रहते हैं।

उन्होंने कहा कि अधिकांश छोटे भाषाई समाचार पत्रों के मालिक ऐसे लोग हैं, जिन्हें अपने संसाधनों का इस्तेमाल करके अखबार छापना पड़ता है। आईएलएनए इन समाचार पत्रों को यथासंभव सहायता करने के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन आईएलएनए की अपनी सीमाएं हैं कि और इसके पास कोई स्टाफ भी नहीं है, इसके बावजूद यदि प्रकाशक अपनी समस्याओं के बारे में हमें सूचित करते हैं, तो हमारी कोशिश होती है कि उन्हें हर संभव मदद प्रदान की जाए। 

आईएलएनए के अध्यक्ष परेश नाथ ने सभी प्रशासकों से अपील की है कि वो अपनी आवाज बुलंद करें और आईएलएनए को सशक्त बनाने के लिए अपने सुझाव प्रदान करें। साथ ही उन्होंने कहा कि प्रशासकों को अपनी समस्याओं के बारे में प्रत्येक सरकारी संस्था को लिखना चाहिए और उसकी एक कॉपी अपने लेटरहेड पर हमें भी भेजनी चाहिए। यदि छोटे अखबारों को कोई विज्ञापन देने से इंकार किया जाता है और वही विज्ञापन किसी बड़े अखबार में प्रकाशित होता है, तो उन्हें इसकी शिकायत करनी चाहिए। इसी तरह यदि आरएनआई अपनी तारीख नहीं बढ़ाती, या उसकी वेबसाइट काम नहीं करती तो छोटे प्रशासकों को इसका विरोध करना चाहिए। 

नाथ ने आगे कहा, आईएलएनए प्रत्येक प्रशासक की मदद करने में सक्षम नहीं है, लेकिन जब सरकारी संस्थाओं को यह पता चलता है कि शिकायत की एक कॉपी हमारे पास भी भेजी गई है, तो वह सुधारात्मक कदम उठाने को मजबूत हो जाती हैं।

 


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